भचक्र के 360 अंशों को 12 भागों में बांटा गया है। इनमें से हर भाग 30 डिग्री का है। इस भाग को भाव कहते हैं। जब कोई कुण्डली हमारे सामने आती है तो उसमें बारह खाने बने हुए होते हैं। इनमें से सबसे ऊपर वाला पहला भाव होता है। कुण्डली के भावों को कुछ इस तरह से बताया जा सकता है। जिस भाव में जो संख्या लिखी है वह भाव की संख्या है। पहला भाव कुण्डली का सबसे महत्वपूर्ण भाव होता है। इसे लग्न कहते हैं। जातक के जन्म के समय यही भाव पूर्व दिशा में उदय हो रहा होता है। लग्न से जातक की आत्मा, मूल स्वभाव, उसका स्वास्थ्य देखा जाता है। अन्य विषयों के विश्लेषण के दौरान भी लग्न की स्थिति प्रमुखता से देखी जाती है। यदि लग्न मजबूत होता है तो कुण्डली अपने आप दुरुस्त हो जाती है। अगर किसी जातक की कुण्डली में लग्न खराब हो रहा हो तो पहले उसी का उपचार किया जाता है।
रविवार, अक्टूबर 05, 2025
ज्योतिष कक्षा: 3सरा दिन - राशियां, भाव और भावेश
भचक्र के 360 अंशों को 12 भागों में बांटा गया है। इनमें से हर भाग 30 डिग्री का है। इस भाग को भाव कहते हैं। जब कोई कुण्डली हमारे सामने आती है तो उसमें बारह खाने बने हुए होते हैं। इनमें से सबसे ऊपर वाला पहला भाव होता है। कुण्डली के भावों को कुछ इस तरह से बताया जा सकता है। जिस भाव में जो संख्या लिखी है वह भाव की संख्या है। पहला भाव कुण्डली का सबसे महत्वपूर्ण भाव होता है। इसे लग्न कहते हैं। जातक के जन्म के समय यही भाव पूर्व दिशा में उदय हो रहा होता है। लग्न से जातक की आत्मा, मूल स्वभाव, उसका स्वास्थ्य देखा जाता है। अन्य विषयों के विश्लेषण के दौरान भी लग्न की स्थिति प्रमुखता से देखी जाती है। यदि लग्न मजबूत होता है तो कुण्डली अपने आप दुरुस्त हो जाती है। अगर किसी जातक की कुण्डली में लग्न खराब हो रहा हो तो पहले उसी का उपचार किया जाता है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
ज्योतिष कक्षा : 7वां दिन - तुला और वृश्चिक राशि
ज्योतिष की कक्षा में आज हम बात करेंगे शुक्र के आधिपत्य वाली दूसरी राशि तुला और मंगल के आधिपत्य वाली दूसरी राशि वृश्चिक की। इनमें से एक राशि शुक्र के आधिपत्य की है तो दूसरी मंगल के आधिपत्य की। आइए देखते हैं कैसे होते हैं ये लोग...
वणिक बुद्धि वाले तुला राशि के जातक
तुला राशि के जातकों की मनोदशा का केवल यही वर्णन नहीं है। भारतीय जनतंत्र में आज जिस व्यक्ति की छाप सबसे बड़ी है वह तुला राशि का ही जातक था। मैं बात कर रहा हूं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की। बाजार में अपनी तुला लिए खड़े व्यक्ति के रूप में तुला राशि को दिखाया गया है। विचारों से सम और हर बात को पूरी तरह तौलकर देखने वाला जातक तुला राशि का होगा। हालांकि इस राशि पर शुक्र का आधिपत्य है, इस कारण तुला राशि के जातकों को बनने संवरने, संगीत, चित्रकारी और बागवानी जैसे शौक होते हैं। इसके बावजूद रचनात्मक आलोचना और राजनैतिक चातुर्य इन जातकों का ऐसा कौशल होता है कि दूसरे लोग इनसे चकित रहते हैं। वणिक बुद्धि के कारण वाद विवाद में पड़ने के बजाय समझौता करने में अधिक यकीन रखते हैं। इन जातकों का शरीर दुबला पतला और अच्छे गठन वाला होता है। चेहरा सुंदर भी न हो तो मुस्कान मोहक होती है। इन जातकों को विपरीत योनि वाले सहज आकर्षित करते हैं। हालांकि इन जातकों की शारीरिक संरचना सुदृढ़ होती है, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण बीमारियों की पकड़ में जल्दी आते हैं। साझीदार के साथ व्यापार करना इनके लिए ठीक रहता है। जातक उचित समय पर सही सलाह देता है। ऐसे में साझेदार भी ज्यादातर फायदे में रहते हैं। एक बार मित्र बना लें तो हमेशा के लिए अच्छे मित्र सिद्ध होते हैं। इन जातकों का पंचमेश शनि होता है। इस कारण तुला लग्न के जातकों के अव्वल तो संतान कम होती है और अधिक हो भी जाए तो संतान का सुख कम ही मिलता है। इनके लिए शुभ दिन रविवार और सोमवार बताए गए हैं। शुभ रंग नारंगी, श्वेत और लाल तथा शुभ अंक एक व दस हैं।
हताश होना नहीं सीखा वृश्चिक ने
वृश्चिक राशि के जातकों की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वे कभी हार नहीं मानते। एक बार जिस काम में जुट गए उससे जल्दी से उकताते नहीं है और आखिरी दम तक उस काम को पूरा करने में जुटे रहते हैं। वृश्चिक राशि के लोग दो तरह के होते हैं। एक जो अपनी इंद्रियों को जीतकर जितेन्द्रिय बन जाते हैं। और दूसरे निम्न कोटि के जो ईर्ष्यालु और असभ्य होते हैं। इस राशि पर मंगल का आधिपत्य है सो अच्छा खासा डील डौल और चौड़ा माथा होता है। बालों में स्वाभाविक रुप से घुंघरालापन होता है। दवाओं से जुड़े कामों में अच्छा लाभ कमा सकते हैं। जलतत्वीय राशि होने के कारण इन लोगों का अंतर्ज्ञान भी ठीक होता है। बात दैहिक सुख की हो या गुप्त साहसिक कार्यों की, ये लोग पूर्ण संतुष्टि के साथ जिंदगी जीना पसंद करते हैं। मंगल के कारण आई उत्तेजना, अधिकार, उग्रता और द्ढृता इन लोगों को जिंदगी के कई क्षेत्रों में सफल बनाती है। ये अच्छे नौकर सिद्ध होते हैं, जब तक कि मालिक इनके साथ ईमानदार रहे। एक बार इन्हें नीचा दिखा दिया जाए या धोखा दे दिया जाए तो क्रूरता की हद तक जाकर बदला लेते हैं। कठोर वाणी से शत्रु बनाते हैं। अगर वृश्चिक राशि वाले लोग बोलना सीख लें तो अपने पीछे फॉलोअर्स की अच्छी संख्या एकत्रित कर सकते हैं। अधिकार की अति भावना के कारण ये चाहते हैं कि परिवार में भी बिना किसी लॉजिक या सवाल जवाब के इनकी बात सुन ली जाए और उस पर अमल हो। घर में कलह का यह सबसे बड़ा कारण बनता है, वरना इन लोगों को शांत और सहज पारिवारिक वातावरण पसंद है। स्त्रियों में वृश्चिक लग्न के मामले में तो केएस कृष्णामूर्ति ने यहां तक कहा है कि वृश्चिक लग्न की स्त्री हो और लग्न व मंगल अशुभ पीडि़त हो तो ऐसी औरत से विवाह करना अभिशाप है। वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए रविवार, सोमवार, मंगलवार और गुरुवार सफलता देने वाले हैं। पीला, लाल, नारंगी और क्रीम रंग शुभ है।
अगली कक्षा में हम बात करेंगे धनु और मकर राशियों की...
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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मंगलवार, अक्टूबर 12, 2010
सबल ग्रह का रत्न धारण करें या निर्बल ग्रह का?
यह भी एक टेढ़ा सवाल है। वास्तव में ऐसा होता है मुझे इसमें भी शक है। दरअसल, कृष्णामूर्ति का तो कथन है कि लग्न और नवम भाव तथा इनसे सम्बन्धित ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कोई ग्रह निर्बल हो या सबल क्या फर्क पड़ता है। इस लेख को पढ़ने से पहले पाठक को चाहिए कि मेरे रत्नों पर लिखे कुछ पिछले लेखों को देख लेना चाहिए। ये लेख हैं...
1. मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो... चलेगा
2. लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल
3. ईलाज किसका करना है परिस्थितियों का, दूसरों का या खुद का
4. मैं जिज्ञासा बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं...
इन लेखों में मैंने वर्तमान में रत्न को लेकर चल रहे कई सिद्धांतों और उनके कारण पैदा हो रहे व्याघात को समझाने का प्रयास किया है। निर्बल और उच्च ग्रह का उपचार भी ऐसा ही एक और व्याघात है।
कैसे, समझाने का प्रयास करता हूं...
एक उदाहरण की कुण्डली लेते हैं। मान लीजिए एक तुला लग्न की कुण्डली है। उसमें शुक्र लग्न का अधिपति हुआ। एक केन्द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शनि इस कुण्डली में कारक ग्रह है। नवम भाव का अधिपति होने के कारण बुध का उपचार भी किया जा सकता है। अब कृष्णामूर्ति की माने तो इस कुण्डली के शुक्र, शनि और बुध ग्रह का ही इलाज किया जा सकता है। अब इस कुण्डली में अगर गुरू, सूर्य या मंगल खराब स्थिति में है तो उनके इलाज की जरूरत ही नहीं है। एक व्यक्ति राजमहल में रह रहा हो तो उसे ज्ञान, आधिपत्य, और ताकत स्वत: मिलती है, और अगर न भी मिले तो उसके लिए प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। ऐसा जातक अगर ज्योतिषी से यह मांग करे कि उसे अपने आधिपत्य, ताकत और ज्ञान में बढ़ोतरी की जरूरत है तो मान लीजिए कि वह केवल किसी लालसा की वजह से कुछ समय के लिए भटककर यह सवाल कर रहा है। वास्तव में उसे जो चाहिए वह ऐश्वर्य, विरासत, कंफर्ट, कम्युनिकेशन स्किल और अपनी चाही गई चीजों के लिए ईज ऑफ एक्सस की जरूरत है। यानि वह अपनी जरूरतों के लिए लम्बी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार नहीं है। अगर वह जातक किसी साधन या व्यवस्था को पाने का प्रयास कर रहा है या रही है तो यह कुछ समय की बात हो सकती है दीर्घकालीन जरूरत नहीं। ऐसे में तुला लग्न में बैठे नीच के सूर्य को ताकतवर बनाने के लिए माणिक्य भी पहना दिया तो फायदा करने के बजाय नुकसान अधिक करेगा।
यही बात अन्य लग्नों के लिए भी लागू होती है। तो जातक का इलाज करते समय यह ध्यान रखने वाली बात है कि वास्तव में जातक का मूल स्वभाव क्या है। उसे अपनी मूल स्थिति में लौटाने से अधिक सुविधाजनक कुछ भी नहीं है। भाग्य को धोखा नहीं दिया जा सकता, लेकिन मानसिक स्थिति में सुधार कर खराब समय की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। ऐसे में किसी एक जातक की लालसा का पोषण करने के बजाय उसे सही रास्ते की ओर भेजना मेरी समझ में सबसे सही उपाय है। ऐसे में मेष से लेकर मीन राशि और लग्न वाले जातकों के लिए अलग-अलग उपचार होंगे। आप गौर करेंगे कि कुछ ग्रहों को कारक तो कुछ को अकारक भी बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी कुण्डली में कारक ग्रहों का प्रभाव होता है और अकारक का नहीं होता। प्रभाव तो सभी ग्रहों का होगा, लेकिन मूल स्वभाव कारक ग्रह के अनुसार ही होगा। ऐसे में उपचार के समय भी कारक ग्रहों का ही ध्यान रखा जाए।
रही बात उच्च और नीच की... यह तो रश्मियों का प्रभाव है। नीच ग्रह की कम रश्मियां जातक तक पहुंचती है और उच्च ग्रह की अधिक रश्मियां। ऐसे में अगर कारक ग्रह अच्छी स्थिति यानि अच्छे भाव में बैठकर कम रश्मियां दे रहा है तो उसके लिए उपचार करना चाहिए। और अकारक ग्रह खराब स्थिति में या नीच का भी है तो उसे छेड़ने की जरूरत नहीं है।
यह मेरा अब तक के अध्ययन से उपजा विश्लेषण है.. जरूरी नहीं है कि सही ही हो, लेकिन अब तक जितने जातकों का इलाज इन तथ्यों को ध्यान में रखकर किया है, मुझे बेहतर परिणाम मिले हैं। एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। एक जातक तुला लग्न का ही था और अपने संगठन में टॉप लेवल पर पहुंचने के लिए प्रयासरत था, मुझे लगा कि वह अपनी ताकत और प्रबंधन गुण की वजह से तो टॉप लेवल पर नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन शनि का नेगेटिव प्रभाव बढ़ाने से बात बन सकती है। पांचवे भाव में स्व राशि का होने के बावजूद मैंने जातक को लोहे की अंगूठी गले में पहना दी, और गले में पहना रक्त चंदन का सूर्य उतरवा दिया। शनि का असर तेजी से बढ़ा, लग्न में बैठे सूर्य और गुरू भी इतना असर नहीं कर पाए जितना शनि ने किया। अब वह अपने संगठन के बहुत महत्वपूर्ण ऊंचे पद पर आसीन है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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शनिवार, अगस्त 14, 2010
किस भाव से क्या देखेंगे – कारक
कारक विचार फलादेश की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। कई बार जातक जब समस्या बताता है तो नए ज्योतिषियों को पता ही नहीं चलता है कि इसे किस भाव या ग्रह से देखें। ऐसे में जितने कारक फौरी तौर पर ध्यान में होते हैं, उन्हीं के अनुसार ज्योतिषी निष्कर्ष पेश करने की कोशिश करते हैं। कई बार तो यह भी स्पष्ट नहीं हो पाता है कि सवाल का जवाब कुण्डली में कहां खोजा जाए। शुरूआती दिनों में मेरी भी यही समस्या थी, गुरुजी ने जितने कारक बता दिए उतने तो कंठस्थ थे, लेकिन हर बार नई समस्या आने पर फिर गुरुजी को पूछता। तो एक दिन उन्होंने मुझे स्पष्ट किया कि मुझे पहले कारक पर ही काम करना चाहिए। तब जो पुस्तक मुझे सबसे सहायक लगी वह थी हेमवंता नेमासा काटवे। उनकी कारकत्व विचार पुस्तक में इतने कारक दिए गए हैं कि लगता है कि हर सवाल का जवाब दिया जा सकता है। काटवे के बाद केएस कृष्णामूर्ति की सैकण्ड रीडर पढ़ने के बाद तो लगा कि हर सवाल का जवाब ज्योतिष से दिया जा सकता है, बशर्ते आप कारकत्व के बारे में विस्तार से जानते हों। यहां मैं भावों के कारकों के बारे में बताने का प्रयास कर रहा हूं।
प्रथम भाव- इस भाव का कारक सूर्य है। यह सबसे प्रमुख भाव है। इसी भाव की राशि, इसमें बैठे ग्रह और इसके अधिपति ग्रह की स्थिति से जातक की स्थिति की प्राथमिक जानकारी मिल जाती है। बाकी भावों की तुलना में जातक की आत्मा को जानने का यह सबसे महत्वपूर्ण भाव है। जातक की जन्मकुण्डली अथवा प्रश्नकुण्डली के किसी सवाल के जवाब में उसके स्वास्थ्य, जीवंतता, सामूहिकता, व्यक्तित्व, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, आत्मप्रकाश, आत्मा आदि को देखा जाता है। हर सवाल के जवाब में पहले लग्न देखना ही होगा...
1st house - Sun. Health, vitality, integrity, personality, integration, confidence, healthy self-esteem, self-expression, soul radiance.
दूसरा भाव – इस भाव का कारक गुरु है। वैदिक ज्योतिष में इसे धन भाव कहा जाता है। इससे बैंक एकाउण्ट, पारिवारिक पृष्ठभूमि, कई मामलों में आंखें देखी जाती है। इसके अलावा यह संसाधन, नैतिक मूल्य और गुणों के बारे में बताता है।
2nd house - Jupiter. Abundance of resources, values and virtues.
तीसरा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे सहज भाव भी कहते हैं। कुण्डली को ताकत देने वाला भाव यही है। इसे आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन भाग्य के ठीक विपरीत अपनी बाजुओं की ताकत से कुछ कर दिखाने वाले लोगों का यह भाव बहुत शक्तिशाली होता है। बौद्धिक विकास, साहसी विचार, दमदार आवाज, प्रभावी भाषण एवं संप्रेषण के अन्य तरीके इस भाव से देखे जाएंगे। छोटे भाई के लिए भी इसी भाव को देखा जाएगा।
3nd house - Mars. Strong development of mind, bold constructive ideas, strong healthy voice, influential oratory and other communication.
चौथा भाव - इसका कारक चंद्रमा है। यह सुख का घर है। किसी के घर में कितनी शांति है इस भाव से पता चलेगा। इसके अलावा माता के स्वास्थ्य और घर कब बनेगा जैसे सवालों में यह भाव प्रबल संकेत देता है। शांति देने वाला घर, सुरक्षा की भावना, भावनात्मक शांति, पारिवारिक प्रेम जैसे बिंदुओं के लिए हमें चौथा भाव देखना होगा।
4th house - Moon. Peaceful home, sense of safety and security, emotional peace of mind, unconditional love in the family.
पांचवां भाव - इसका कारक गुरु है। इसे प्रॉडक्शन हाउस भी कह सकते हैं। इंसान क्या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्य, पुत्र और पेटेंट वाली खोजें तक शामिल हो सकती हैं। ईमानदारी से की गई रिसर्च भी इसी से देखी जाएगी। ईमानदारी से मेरा अर्थ है ऐसी रिसर्च जिससे विद्यार्थी अथवा विषय के लिए कुछ नया निकलकर आ रहा हो। इसके अलावा आनन्दपूर्ण सृजन, सुखी बच्चे, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्द, सत्कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखना जरूरी है।
5th house - Jupiter. Joyful creation, blessed children, successful, investment. Joy in life, grounded in spiritual consciousness and devotion, and good karma naturally flowing from that.
छठा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे रोग का घर भी कहते हैं। प्रेम के सातवें घर से बारहवां यानि खर्च का घर है। शत्रु और शत्रुता भी इसी भाव से देखे जाते हैं। कठोर परिश्रम, सश्रम आजीविका, स्वास्थ्य, घाव, रक्तस्राव, दाह, सर्जरी, डिप्रेशन, उम्र चढ़ना, कसरत, नियमित कार्यक्रम के सम्बन्ध में यह भाव संकेत देता है।
6th house - Mars, Saturn. Hard work, application of self in service to worthy causes. In health, Mars and Saturn are first-class malefics, fostering wounding, bleeding, inflammation, surgery, (Mars) and inertia, depression, losses, and aging (Saturn). Exercise, work, austerities, regular program or lifestyle, taking the long view to do what will maintain health over the lifetime are positive uses of Mars and Saturn in the 6th house.
सातवां भाव - इसका कारक शुक्र है। लग्न को देखने वाला यह भाव किसी भी तरह के साथी के बारे में बताता है। राह में साथ जा रहे दो लोगों के लिए, प्रेक्टिकल के लिए टेबल शेयर कर रहे दो विद्यार्थियों के लिए, एक ही समस्या में घिरे दो साथ-साथ बने हुए लोगों के लिए यह भाव देखा जाएगा। जीवनसाथी, करीबी दोस्त, सुंदरता, लावण्य जैसे विषय इसी भाव से जुड़े हुए हैं। सभी विपरीत लिंग वालों के लिए। समलैंगिकों को कैसे देखेंगे यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन कभी ऐसी कुण्डली आती है तो मैं दोनों का सातवां भाव ही देखने का प्रयास करूंगा।
7th house - Venus. We desire peaceful relations with all, especially with significant others, a life full of love and affection, sattvic and full of goodness, beauty, graciousness.
आठवां भाव - इसका कारक शनि है। स्वाभाविक रूप से गुप्त क्रियाओं, अनसुलझे मामलों, आयु, धीमी गति के काम इससे देखे जाएंगे। इसके अलावा दूसरे के संसाधनों का सृजन में इस्तेमाल, जिंदगी की जमीनी सच्चाइयां, तंत्र-मंत्र के लिए यही भाव है।
8th house - Saturn. Conservative use of other's resources. Serious attitude to plumb the depths of reality. Conservative use of reproductive resources or ojas. Practice of yoga and austerities.
नौंवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। इसे भाग्य भाव भी कहते हैं। पिछले जन्म में किए गए सत्कर्म प्रारब्ध के साथ जुड़कर इस जन्म में आते हैं। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा से अधिक कब और कितना मिल सकता है। धर्म, अध्यात्म, समर्पण, आशीर्वाद, बौद्धिक विकास, सच्चाई से प्रेम, मार्गदर्शक जैसे गुणों को भी इसमें देखा जाता है।
9th house - Jupiter. Religious-spiritual experience, realization, and devotion. Love of God as a foundation for life and blessings all around. vision, perspective, increase in wisdom, compassion, love of truth. Spiritual teacher (guru) and spiritual teachings and path shown by the 9th house.
दसवां भाव - इसके कारक ग्रह अधिक हैं। गुरु, सूर्य, बुध और शनि के पास दसवें घर का कारकत्व है। हम जो सोचते हैं वही बनते हैं। यह भाव हमारी सोच को कर्म में बदलने वाला भाव है। हर तरह का कर्म दसवें भाव से प्रेरित होगा। बस बाध्यता इतनी है कि एक्शन हमारा होना चाहिए। रिएक्शन के बारे में यह भाव नहीं बताता। प्रोफेशनल सफलताएं, साख, प्रसिद्धि, नेतृत्व, लेखन, भाषण, सफल संगठन, प्रशासन, स्किल बांटना जैसे काम यह भाव बताता है।
10th house - Jupiter, Sun, Mercury, Saturn. Professional success, good reputation based on virtue, fame, leadership (Jupiter, Sun). Success in commerce, writing, speaking (Mercury). Successful organization, administration, teaching essentials, sharing expertise and wisdom of experience (Saturn). Jupiter shows the spiritual basis for worldly success - doing well by doing good.
ग्यारहवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। यह ज्यादातर उपलब्धि से जुड़ा भाव है। आय, प्रसिद्ध, मान सम्मान और शुभकामनाएं तक यह भाव एकत्रित करता है। हम कुछ करेंगे तो उस कर्म का कितना फल मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह भाव अधिक स्पष्ट करता है। यह कर्म का संग्रह भाव है। उपलब्धि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। धैर्य, विकास और सफलता भी इसी भाव से देखे जाते हैं।
11th house - Jupiter. Success in achieving goals and dreams. Success in friendships, in groups and community. Broad vision of well-being, tolerance, diversity, generosity for the common good. Jupiter again shows the spiritual basis for life success and flourishing community.
बारहवां भाव - इसका कारक शनि है। यह खर्च का घर है। हर तरह का खर्च, शारीरिक, मानसिक, धन और जो भी खर्च हो सकते हैं सभी इसी से आएंगे। विद्या का खर्च भी इसी भाव से होता है। इस कारण बारहवें भाव में बैठा गुरु बेहतर होता है ग्यारहवें भाव की तुलना में क्योंकि सरस्वती की उल्टी चाल होती है, जितना संग्रह करेंगे उतनी कम होगी और जितना खर्च करेंगे उतनी बढ़ेगी। इसके अलावा बाहरी सम्बन्धों, विदेश यात्रा, धैर्य, ध्यान और मोक्ष इस भाव से देखे जाएंगे।
12th house - Saturn. The benefits of solitude and the contemplative life. Esoteric or metaphysical studies. Patience, depth, application of self over time. Meditation, contemplation, study of scriptures, initiation, effective therapy, excellent listening. Seeking the truth on all levels. Karma from truth or falsity, sincerity or insincerity, application of self or not, depth or lack of it, character or lack of it, justice or injustice - Saturn weighs and sifts all of that. Completions. Moksha or liberation.
हालांकि यह लेख लम्बा हो गया है, लेकिन कारकों के बारे में एक ही स्थान पर बताने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पाया। विद्यार्थियों को तो इस पोस्ट का प्रिंट निकालकर अपने पास रखना चाहिए। वैसे हर भाव के स्वभाव और क्षेत्र के बारे में आगे भी विस्तार से चर्चा होती रहेगी, लेकिन एक साथ इतना मैटर दोबारा लिख नहीं पाउंगा, सो इस लेख के लिंक बाद में भी आते रहेंगे।
जय गणेश...
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शनिवार, अप्रैल 25, 2009
नेता और ज्योतिषी- यूं पत्थर बन गया भगवान
यह किस्सा भी महाराज से जुड़ा है। चुनाव के दिनों में महाराज बहुत बिजी रहते हैं। पिछले आठ महीने से तो उन्हें सांस खाने की भी फुरसत नहीं मिल रही है। पहले विधानसभा चुनाव और अब लोकसभा चुनाव।
यह किस्सा पिछले विधानसभा चुनाव का है। यानि जब वसुंधरा की सरकार बनी थी तब का। उन दिनों राम की पार्टी वाले कई नेताओं को राहू का भय सता रहा था। सो महाराज को मिला एसी का टिकट। जयपुर की किसी फार्म हाउस में उनके रहने की पुख्ता व्यवस्था कर दी गई थी। महाराज की सेवा सुबह एक नेता आता, दोपहर को दूसरा और रात को तीसरा। कई दिनों से यही क्रम चल रहा था। रिसोर्ट पर महाराज रोजाना नेताओं की शक्ल देखकर बोर होने लगे। तो एक दिन अपने कुछ चेलों को वहीं बुला लिया। एक दिन महाराज अपने चेलों के साथ बैठे थे कि एक चेले ने पूछ लिया कि महाराज भगवान कहां है। महाराज तरंग में थे, सवाल पर नाड़ खिंच गई, बोले बेटा वो सामने छोटा सा पत्थर पड़ा है ना उसमें भगवान है। चेला हंसा तो महाराज तन गए बोले 'हंस मत, अभी घण्टेभर में इसकी पूजा कराके बताउंगा।'
थोड़ी देर में एक नेताजी आए। आते ही उनकी कुण्डली देखी और बोले मंगल का भीषण कोप है। आपको एक तांत्रिक क्रिया करनी होगी तभी शांति होगी। आप तुरंत एक पत्थर लेकर आओ। नेताजी को पसीना आ गया। उन्होंने अपने चेले को बोला पत्थर लाओ। चेला लपका कि महाराज ने टोका कि नहीं आप खुद लेकर आओ। इलाज आपका करना है तो पत्थर भी आपको ही लाना पड़ेगा। गोल-मटोल नेताजी सोफे पर से मुश्किल से उठे। थोड़ी सहायता महाराज ने कर दी। बोले वो सामने जो पत्थर पड़ा है उसे ही ले आओ। नेताजी तुरंत लपके और पत्थर उठा लाए। अब महाराज ने उन्हें एक लाल रंग का धागा दिया और कहा इसे पत्थर के चारों ओर लपेट दो। नेताजी लगे लपेटने। पूरा धागा पत्थर पर लपेट दिया तो उसकी आकृति गोल हो गई। महाराज ने पूजन की विधि बता दी और पत्थर को पूजाघर में रखने को कह दिया। नेताजी खुशी-खुशी पत्थर को लेकर अपने घर चले गए। महाराज ने गर्व से चेले की ओर देखा। चेला नतमस्तक, लेकिन सवाल भी दागा कि महाराज नेताजी इस पत्थर की पूजा करेंगे क्या।
महाराज ने कहा चलकर देख लेंगे। दो दिन बाद महाराज अपने चेलों को लेकर नेताजी के घर पहुंच गए। नेताजी भी प्रसन्न हुए सीधे अपने मंदिर में ले गए और बताया कि दो दिन से वे मंत्र जप रहे हैं और अब गोटियां भी ठीक फिट हो रही हैं।
चुनाव के बाद नेताजी जीत गए और शायद अब भी वह पत्थर नेताजी के पूजागृह की शोभा बढ़ा रहा होगा। सालों से सुनता और पढ़ता आ रहा हूं कि कण-कण में भगवान है लेकिन महाराज ने इसे सिद्ध करके बता दिया था।
अगली बार चुनाव और पॉलिटिकल बाबा का किस्सा।
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मंगलवार, अप्रैल 21, 2009
अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो...
अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो उसकी कुण्डली क्या होगी?

फलित ज्योतिष की पुस्तकें पढ़कर फलादेश शुरू कर देने वाले ज्योतिषियों को एक सवाल पिछले कई दिनों से पूछा जा रहा है। मेरी भी लगभग यही श्रेणी मानी जाती है इसलिए मुझे भी यही सवाल पूछा गया। सवाल सुनते ही मेरे दिमाग में भौतिक का वह सवाल कौंध गया जिसमें पूछा गया है कि धरती से चंद्रमा की ओर जा रहे किसी यान की एक विशेष स्थिति में गतिक और स्थैतिक ऊर्जा क्या होगी। क्या इसे निकाला जा सकता है। इस सवाल में अंतरिक्ष में बालक पैदा हो रहा था, लेकिन कहां इस बारे में स्पष्ट नहीं था। मेरे दिमाग में अंतरिक्ष यान था जिसमें कि बालक पैदा हो सकता होगा।
प्रेक्टिकली हो सकता है या नहीं यह बात अलग है लेकिन अगर... हो भी तो खुले अंतरिक्ष में तो कतई पैदा नहीं सकता। ऐसे में मेरे दिमाग में पहले पहल यही ख्याल आया कि अंतरिक्ष यान में पैदा हो रहा है। इसके साथ ही मैंने यह भी सोच लिया कि वह धरती से चंद्रमा की ओर जा रहा है। जबकि सवाल यह है ही नहीं। बस इतना है कि पृथ्वी से अलग दूर अंतरिक्ष में बालक पैदा हो तो उसकी कुण्डली क्या होगी। इससे मुझे यह समझ में आया कि जिस तरह पृथ्वी के कॉर्डिनेट्स हैं वैसे ही अंतरिक्ष के कॉर्डिनेट्स भी होंगे। इन कॉर्डिनेट्स के अनुसार पहले यह तय करना होगा कि बच्चा अंतरिक्ष में कहां है। फिर पृथ्वी पर मिलने वाले पांचांगों के इतर एक अन्य गणना तय करनी होगी जिसमें अंतरिक्ष के उस बिंदू से ग्रहों की विभिन्न नक्षत्रों में स्थिति का वर्णन स्पष्ट हो। यह निकालने योग्य होना चाहिए। यानि मेहनत की जाए तो शायद निकाला जा सकता है। इसके बाद जो कुण्डली बनेगी उसमें ग्रहों का प्रभाव और नक्षत्रों का फल पृथ्वी के किसी जातक से भिन्न होना चाहिए। क्योंकि अब किरणों का प्रभाव और वातवरण पूर्णतया बदल चुके हैं।
अंतरिक्ष यान से पृथ्वी उदय होते हुए का दृश्य
अब कुछ सवाल और पैदा और होते हैं
गुणी ज्योतिषी बता सकते हैं कि ऐसी स्थिति में बालक के जन्म को लेकर कैसे फलादेश निकाले जा सकेंगे।
? क्या बालक की कुण्डली में एक ग्रह पृथ्वी भी जुड़ जाएगा,
? सूर्य और चंद्र के सन्निपात से उत्पन होने वाले राहू और केतू का क्या होगा,
? चंद्रमा का प्रभाव कितना बचेगा,
? जब गुरूत्वाकर्षण नहीं है तो क्या फलों में कुछ परिवर्तन होगा
? क्या बालक के पृथ्वी पर लौटने के समय को लेकर उसकी कुण्डली बनाई जाए,
? क्या कुछ अतिरिक्त ग्रह भी कुण्डली में जुड़ेंगे,
? क्या निकटस्थ ग्रह की भूमिका बढ़ जाएगी या कम हो जाएगी,
? पृथ्वी पर तत्व तो पांच ही हैं फिर अंतरिक्ष में कितने तत्व शामिल किए जाएंगे,
? किसे लग्न मानेंगे और यह किस ओर से उदय होगा ?
कुछ हजार सवाल और पैदा हो रहे हैं इस स्थिति पर, फिलहाल इतने ही,
कुछ आप भी सुझाएं :)
यह तस्वीरें NASA Image of the Day से ली गई है
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
शुक्रवार, अप्रैल 17, 2009
Mangal dosh ? Astrologically it does not exist :)
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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मंगलवार, अप्रैल 07, 2009
कर्म बड़ा या भाग्य?
जब से ज्योतिष विषय का झण्डा उठाया तब से मेरे आस-पास के अधिकांश विचारकों ने यह सवाल हमेशा मेरे सामने खड़ा किया कि क्या आवश्यकता है ज्योतिष की जबकि लॉजिक यह कहता है कि जैसा कर्म करोगे वैसे ही फल मिलेंगे। इसके साथ ही दूसरा सवाल यह कि जब सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो तुम्हारा रोल शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है।
दोनों की बातें मेरे इस पेशे को खत्म कर देने वाली थीं। लेकिन केवल उन्हीं लोगों के समक्ष जो कि इन बातों को इसी अंदाज में समझ चुके थे। बाकी लोगों को अब भी लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान मेरे पास है। फिर भी एक विद्यार्थी होने के नाते यह सवाल मेरे सामने बड़ी स्पष्टता से रहा कि कर्म ही हमारी कुण्डली है या भाग्य पहले से लिखा जा चुका है। अगर भाग्य पहले से तय नहीं है तो क्या कर्म से कुण्डली को बदला जा सकता है।
इसी क्रम में पिछले दिनों कुरुक्षेत्र के हितेश शर्माजी ने एक बार फिर मुझसे यही सवाल दोहराया कि
'Kya Bhagya vaastav mein he karm se bada hota hai aur kya jyotis se bhagya ko badla ja sakta hai.'
इस सवाल का स्पष्ट जवाब है पता नहीं।
तो मैं यहां क्या कर रहा हूं। इसके जवाब में मैं यह कह सकता हूं कि जो लोग अपने कर्म से भाग्य को बदलने की सोच रहे हैं मैं उनकी मदद कर रहा हूं। एक ज्योतिषी किसी जातक की क्या मदद कर सकता है इसका बहुत सटीक वर्णन दक्षिण के प्रसिद्ध ज्योतिषी के.एस. कृष्णामूर्ति अपनी पुस्तक फंडामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्ट्रोलॉजी में कर चुके हैं। उनके अनुसार नदी में नाव खेते हुए जब एक नाविक किनारा नहीं मिलने पर हारने लगता है तो उसके पास से गुजर रहा एक अन्य नाविक उसे बताता है कि आगे इतनी दूरी पर उथला किनारा या जमीन मिल जाएगी। दूसरा नाविक ज्योतिषी हो सकता है।
मुझे भी अधिकांश मामलों में अपना रोल ऐसा ही लगता है। जिसे जो भोगना है वह तो भागेगा ही, लेकिन यह भोग कब खत्म होगा या कैसे मुक्ति मिल सकती है इस बारे में मैं संकेत मात्र दे सकता हूं। न तो किसी और का दुर्भाग्य जी सकता हूं न ही किसी को मोक्ष दिला सकता हूं।
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गुरुवार, अप्रैल 02, 2009
घोड़े की नाल और तीन दुर्घटनाएं
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सोमवार, मार्च 30, 2009
दूसरे ज्योतिषी हैं बाबू मास्टर
महाराज की कथा के बार अब मैं बताना चाह रहा हूं बाबू मास्टर के बारे में। चाहता तो था कि साथ ही लिख दूं लेकिन इससे पोस्ट बहुत लम्बी हो जाती।
अब बात बाबू मास्टर की। लम्बा चौड़ा शरीर, घोड़े जैसे दांत, सिर मुंडाया हुआ और पीछे मोटी चोटी। और वर्णन करूंगा तो पहचान पुख्ता हो जाएगी। हां, तो बाबू मास्टर से मिलना कुछ इस तरह हुआ कि वे बीकानेर आए हुए थे। उनके सो कॉल्ड गुरूजी बीकानेर के ही हैं। हालांकि उनके गुरू का ज्योतिष के बजाय अध्यात्म में अधिक रुझान है। क्या कहूं। बाबू मास्टर जिन्हें गुरुजी कहता है उनकी छवि इतनी बड़ी है कि लगता है बाबू मास्टर ने केवल अपनी छतरी पुख्ता करने के लिए उनका नाम इस्तेमाल किया। अब उनके गुरू ऐसा क्यों करने दे रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं है।
मैं अपने एक रिश्तेदार के साथ उनसे मिलने के लिए पहुंचा। हमारी मुलाकात से पहले बाबू मास्टर को बताया गया था कि एक ऐसा मरीज आ रहा है जो बिल्कुल सुस्त है और कुछ काम नहीं करना चाहता। ज्योतिष के नाम पर निठल्ला बैठा है। कहता है समय खराब है सो कुछ करना बेकार है। वह रोगी साथ ही था।
हम जब उनके आश्रमनुमा स्थान पर पहुंचे तो बाबू मास्टर ने मुझे देखते ही पहचान लिया और अपनी दमदार आवाज में झिड़कने लगे कि क्यों ऐसी क्या समस्या है कि सब काम छोड़कर बैठे हो। मैं सकपका गया, लेकिन हाथों-हाथ संभल गया। मैंने बताया कि हम इसे दिखाने लाए हैं मैं तो नौकरी करता हूं। बाबू ने पूछा क्या नौकरी करता है। मैंने कहा पत्रकार हूं। अब बाबू ने पलटवार किया कहा तेरी नौकरी तो कुछ नहीं करने के बराबर ही है। मैंने खून का घूंट पी लिया। कुछ सीखने की गरज जो थी। अब शुरू हुआ ईलाज का क्रम। बाबू मास्टर ने रोगी से नाम पता और डेट ऑफ बर्थ पूछी। रोगी बता रहा था और बाबू के दो असिस्टेंट नोट कर रहे थे। रोगी बोल रहा था कि बाबू ने अपने असिस्टेंटों से चर्चा करनी शुरू कर दी। बातचीत में लगातार विदेशी शब्द आ रहे थे। कुछ देर की चर्चा के बाद बाबू रोगी की ओर मुड़े और बोले कोई समस्या नहीं है। यह लड़का कुछ काम नहीं करना चाहता इसलिए ऐसा कहता है। इसका भाग्य प्रबल है। हमने उन्हें बताया नहीं था कि जिस रोगी को लाया गया है वह स्किजोफ्रीनिया का पेशेंट है। सो उनके इस कथन के बाद मैंने बता दिया। तो बाबू बिफर गए। बोले मुझे सिखाता है क्या। मैं सहमकर चुप हो गया।
कुछ देर बाद रोगी को एक मंत्र देकर पीछे भेज दिया और कहा जब तक न कहूं उठना मत। इसके बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ। इतनी देर में बाबू को समझ आया कि मैं ज्योतिष में रुचि रखता हूं। सो उन्होंने एस्ट्रोलॉजिकल टर्म इस्तेमाल करनी ही बंद कर दी। अपनी हर बात को थाई अंक पद्धति से शुरू किया और वहीं पर खत्म कर दिया। मैं मूर्खों की तरह बस मुंह बांए बैठा रहा।
बातचीत के बीच एक के बाद एक, दो फोन आए। बाबू ने बिना जातक से प्रश्न पूछे इलाज बता दिया और फोन रख दिया। बाबू के व्यवहार से अब तक मैं पूरी तरह हतोत्साहित हो चुका था लेकिन फोन कॉल के बाद तो मैं हैरान था। अपनी रौ में लगातार बोल रहे बाबू को मैंने टोका कि आपने बिना समस्या पूछे समाधान कैसे बता दिया। उन्होंने कहा कि यह तो मेरा काम है। इसके बाद वे अपने कामों का वर्णन करते रहे। एक इंटरनेश्ाल बैंक में एनालिस्ट का पद छोड़ चुके थे, इसके बाद एक फाइनेंस कंसल्टेंसी फर्म खोली वह भी बंद कर दी। इसके बाद मार्केटिंग का काम किया और वह भी छोड़ दिया। आखिरी बार जिस अंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे उसमें थाईलैण्ड में पोस्टेड थे। वहां थाई अंक ज्योतिष सीखी और नौकरी छोड़ पूरी तरह ज्योतिष में लग गए। यह सारी बातें उन्होंने ने ही बताई है। मैंने आज तक वापस इसकी पुष्टि नहीं की है।
खैर मैंने कहा कि ज्योतिष की ऐसी कौनसी विद्या है जिसमें बिना जातक को जाने, बिना उससे सवाल जवाब किए उसके बारे में इतना स्पष्ट बताया जा सकता है। थोड़ी देर बाद तो मैंने दावा भी कर दिया कि यह ज्योतिष ही नहीं है। बाबू हैरान करने पर ही तुले हुए थे। उन्होंने कहा हां मैं ज्योतिष नहीं करता। मैंने कहा तो क्या करते है। बाबू ने कहा मैं लोगों को मूर्ख बनाता हूं। मेरा धंधा मूर्ख बनाने का ही है। यह जवाब मैं पहले सुन चुका था। अब दूसरी बार सुन रहा था। ज्योतिष के क्षेत्र में कई साल तक लोगों के सम्पर्क में रहने और नौकरी के कारण काफी पॉलिश भी हो चुका था। सो मैं संयत बना रहा। मैंने अध्यात्मिक गुरू के आश्रम की आड़ लेकर पूछा कि आपको संतुष्टि मिल जाती है लोगों को ऐसे मूर्ख बनाकर। तो बाबू बोले मैं खुद थोड़े ही जाता हूं मूर्ख बनाने के लिए। वे खुद आते हैं। और सही पूछो तो लोग मूर्ख ही बनना चाहते हैं। आप उन्हें समस्याओं का ठोस कारण बताओगे तो वे पचा नहीं पाएंगे। एक आम आदमी की समस्या है कि वह गलतियां खुद करता है और उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना चाहता है। मैं तो बस उनकी मदद करता हूं। कभी ठीकरा वास्तु के सिर फूटता है, कभी ज्योतिष पर तो कभी किसी व्यक्ति विशेष पर। उन्होंने कहा तूं मुझे बस तडि़त चालक समझ सकता है। जो बिजली गिरने की दिशा तय करता है।
अब तक मैं हंसने लगा था। यह ईलाज का दूसरा व्यवहारिक तरीका था। पहले तरीके में महाराज प्रायश्चित करा रहे थे तो यहां बाबू मास्टर लोगों को लॉलीपॉप पकड़ा रहा था। दोनों ही लोगों ने ग्लानि को आवरण दिया और सहारा लिया ज्योतिष का। इन दोनों ही लोगों को अपने क्षेत्र का प्रकाण्ड विद्वान समझा जाता है। महाराज ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब बड़ा घर और कार ले चुका है और बाबू मास्टर अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी में तीस से चालीस हजार रुपए तक की तनख्वाह पाता था अब रोज के पांच से सात हजार रुपए कमा रहा है। लोगों के दुख और तकलीफ जितने बढ़ते जाते हैं इन लोगों का रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है। पता नहीं ईलाज किसका हो रहा है लेकिन इन दोनों ने एक बीमारी को कुछ समय के लिए तो खत्म कर ही दिया है। और वह बीमारी है खुद की गरीबी। :)
इन दोनों के बाद मैं आपको बताउंगा एक ऐसे ज्योतिषी के बारे में जो परम्परागत भारतीय पद्धति से कुण्डलियां देखता था लेकिन उन्हें मैनेज इंग्लिश स्टाइल से करता था। उसने इतना तगड़ा नेटवर्क बनाया कि उसकी मृत्यु के पांच साल बाद भी उनके पुत्र आराम से अपनी जीविका चला रहे हैं। भले ही वे अपने पिता जितने अच्छे ज्योतिषी नहीं है लेकिन सिस्टम ने उन्हें दौड़ में जमा रखा है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है
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मंगलवार, मार्च 24, 2009
हर क्षण अपने आप में पूर्ण है
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गुरुवार, मार्च 05, 2009
Exaltation or debilitation of planet : And it's meaning
GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA
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मंगलवार, फ़रवरी 24, 2009
संकेतों का ज्योतिषीय संदर्भ
पूर्व में अपने दो या तीन लेखों में अलग अलग तरीके से संकेतों की चर्चा कर चुका हूं। इस बार सीधे संकेत पर ही चर्चा करनी पड़ेगी। लेख के शुरू में ही मैं बता देना चाहता हूं कि मैं संकेतों का विशेषज्ञ नहीं हूं। हालांकि मेरी कुण्डली के योग और वंशक्रम में पाराशर गोत्र का होने के कारण मुझे विरासत में संकेतों को समझने की नेमत मिली है। इन्हें समझ लेना और इनका विशेषज्ञ होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मेरे लेख को पढ़ने वाले गुणीजनों में कोई विशेषज्ञ भी हो तो मेरा आग्रह है कि वे मेरा मार्गदर्शन करें। अब भगवान गणेश को नमन करते हुए मैं अपनी बात रखता हूं।
संकेतों से मेरा परिचय कब का है पता नहीं लेकिन जब ज्योतिष सीखी तो इसे समझने का क्रम भी शुरू हुआ। गुरूजी प्रदीप पणियाजी ने मुझे बताया कि मैं अपनी विशेषता का कैसे इस्तेमाल कर सकता हूं। इसके लिए पहले जरूरत है ओमेन को समझने की। हमारे चारों ओर का वातावरण हम पर और हम अपने वातावरण पर नियमित रूप से प्रभाव डालते हैं। भले ही हम इसके लिए सक्रिय रूप से सोच रहे हों या नहीं। यह देखने में ऐसी बात लगती है जैसा कि चण्डूछाप तांत्रिक कहते हैं या फिर बहुत सिद्ध योगी। ईश्वर ने किसी भी एक को विशेषाधिकार देकर नहीं भेजा है। उसकी नजर में सब बराबर हैं। हां कभी कभार लगता है कि वह खुद तक एप्रोच बनाने के रास्ते सभी को अलग-अलग देता है। कोई बात नहीं पहुंचेंगे तो वहीं। तो जब ईश्वर ने सभी को एक जैसी शक्तियां दी हैं तो हर कोई उसे इस्तेमाल भी कर सकता है, निर्भर करता है कि अपनी सोई शक्तियों को जगाने के लिए हमने कितना प्रयास किया।
चाहे हेमवंता नेमासा काटवे हों या के.एस. कृष्णामूर्ति सभी यही कहते हैं कि जब हम अपने आस-पास के वातावरण के प्रति संवेदनशीलता खो देते हैं तो आगामी घटनाओं की जानकारी लेने के लिए ज्योतिष का सहारा लेना पड़ता है। कई साल ज्योतिष के साथ जुड़े रहने के बाद अब यह बात समझ में आने लगी है। कैसे हम घटनाओं और वस्तुओं के साथ तारतम्य बना लेते हैं और कैसे पूर्व की घटनाएं, वस्तुएं और अन्य संकेत आने वाले समय की सूचना देने लगते हैं।
एक उदाहरण देना चाहूंगा। यह मेरा सुना हुआ है। हो सकता है इसमें अतिरंजना हो लेकिन समझने के लिए अच्छा है। सामान्य बातें धीरे-धीरे समझ में आती है और अतिरंजना बड़ी तस्वीर का काम करती है।
एक वणिक था। उसे एक पंडित ने कहा कि रोजाना किसी ने किसी भूखे या अतृप्त को भोजन कराओगे तो तुम्हारा व्यवसाय दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। वणिक ने भोजन कराना शुरू भी कर दिया। कुछ दिन में उसका व्यवसाय फलने फूलने लगा। एक दिन ऐसा हुआ कि उसे सुबह से दोपहर तक कोई अतृप्त नहीं मिला। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है लेकिन नहीं मिला। सो वह ढूंढता हुआ पहाड़ी की ओर निकल गया। वहां एक सांड जैसा आदमी सोया हुआ दिखा। उसके होठों पर भी पपड़ी जमी हुई थी। वणिक ने सोचा यही सही व्यक्ति है। उसने पालकी मंगवाई और उस बलिष्ठ दिखने वाले व्यक्ति को घर ले आया। उसे पानी पिलाकर होश में लाया और भरपेट खाना खिलाया। थोड़ी ही बातचीत में पता चल गया कि वह शरीर से तो तंदुरुस्त है लेकिन अकल से गूंगा है। जैसे ही उस आदमी ने खाना खाया उसे जोश आ गया। खाना खिलाने के बाद वणिक ने तो उस आदमी को विदा कर दिया लेकिन रास्ते में उस मेंटली रिटार्टेड आदमी ने सड़क पर पड़ा लठ्ठ लेकर एक गाय पर भीषण प्रहार किया। इस प्रहार से गाय की मौत हो गई। उधर गाय मरी और इधर वणिक की हालत खराब होने लगी। एक जहाज विदेश से माल लेकर आ रहा था वह पानी में डूब गया। राजा ने शास्ति लगा दी। व्यापार में घाटा आने लगा। अब वणिक भागा वापस ज्योतिषी के पास। ज्योतिषी से पूछा कि आपके बताए अनुसार उपचार किए लेकिन मेरी तो हालत खराब हो रही है। कहां चूक हुई। ज्योतिषी ने पिछले कुछ दिनों का हाल पूछा और पता लगाने की कोशिश की कि कहां गड़बड़ हुई है। काफी देर की कसरत के बाद पता लगा लिया गया कि गाय की मौत का ठीकरा वणिक के सिर फूटा है। इसके दो कारण हैं। गाय को मारते वक्त उस आदमी के पेट में वणिक का अन्न था। तो उस आदमी के सिर दोष होना चाहिए। हो भी सकता था लेकिन वह आदमी को मेंटली रिटार्टेड था सो उसे इस बात का विवेक ही नहीं था। यानि वह केवल वणिक और गाय की मौत के बीच माध्यम भर बना था। इसके बाद ज्योतिषी ने गाय की हत्या के कुछ उपचार वणिक को बताए। उन्हें करने के बाद वणिक की स्थिति वापस सुधरने लगी।
इसमें अतिरंजना तो यह हुई कि उपचारों पर ही पूरा व्यापार खड़ा कर दिया गया है, दूसरा यह कि गणना से यह पता लगा लिया गया कि गाय की मौत हुई है। जो भी हो कहानी है...
मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम ऐसे करते हैं जिनका मंतव्य अच्छा होता है और काम भी अच्छे दिखते हैं लेकिन उनके परिणाम कितनी दूरी पर जाकर क्या रंग लाते हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। वणिक नहीं चाहता था कि गाय की मौत हो लेकिन हुई और वणिक उसका एक बड़ा कारण बना। न वह उस आदमी को घर लेकर आता और न उसे खाना खिलाता तो गाय की मौत नहीं होती।
तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के कामों का क्या परिणाम निकलेगा इसका पता कैसे लगाया जाए। जैसा कि मस्तिष्क पर शोध करने वाले लोग कुछ साल पहले तक कहते थे कि हम अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत हिस्सा काम में लेते हैं, कुछ दिन पहले तक कहने लगे कि एक प्रतिशत ही काम में लेते हैं और कुछ समय पहले तो सुना कि एक प्रतिशत से भी कम काम में लेते हैं। इसीलिए मुझे विज्ञान और इसमें शोध कर रहे लोगों पर कभी पूरा भरोसा नहीं होता। खैर जो भी है...
शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन का है। वह हमारे लिए गणना करता है कि आपकी गतिविधियों, आपके व्यवहार, मौसम, आपके घर का सामान, आपके दोस्तों, उनके द्वारा बोली गई बातों, रास्ते में बज रहे संगीत, बस में आपकी सीट के पास बैठे व्यक्ति की हरकतों, पशु पक्षियों की मुद्राएं और आवाजों और हजारों संकेतों के क्या मायने हो सकते हैं। चूंकि हम एक विशिष्ट भाषा और शैली से बोलना, चलना और समझना सीखते हैं। जिंदगी के पहले पांच सालों में इसकी जबरदस्त ट्रेनिंग होती है। बस वही भाषा हमें आती है। बाकी संकेतों को हम उतने बेहतर तरीके से समझ नहीं पाते। एलन पीज ने अपनी पुस्तक बॉडी लैंग्वेज में इसी अवचेतन के संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। स्टीफन आर कोवे इसी अवचेतन को सक्रिय करने के लिए सात आदतें डालने का आग्रह करते नजर आते हैं।
अब फिर से बात करता हूं कि जिन लोगों ने भविष्य देखने या इंट्यूशन की प्रेक्टिस नहीं की है उन्हें यह सब कैसे और क्यों दिखाई देता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कुण्डली का आठवां भाव और बारहवां भाव तथा राहू और कमजोर चंद्रमा हमें ऐसे दृश्य देखने और सोचने में सहायता करते हैं। आम चिकित्सक के पास जाने पर वह आपको खुद को व्यस्त रखने की सलाह देता है। अल्पनाजी को यह पता है। उन्होंने इसके अलावा कोई और उपाय हो तो बताने के लिए कहा है। ठीक है एक सवाल के साथ...
अब यहां एक और गंभीर सवाल है जो आमतौर पर नए ज्योतिषीयों के समक्ष आता है वह यह कि इंट्यूशन और कल्पना में क्या अन्तर है। मैंने अपने लेख इंट्यूशन और कल्पना में अन्तर में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की थी। इसमें मैंने कुछ हद तक स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि दोनों में क्या अन्तर है। कई बार हमारे भय, चिंताएं, विचारों की शृंखला, भीषण घटनाएं हमारे दिमाग में अनिष्ट या ईष्ट की इच्छा के बुलबुले बनाने लगते हैं। नए ज्योतिषियों के साथ तो ऐसा होता है कि वे जातक की आर्थिक स्िथति और पर्सनेलिटी तक से प्रभावित हो जाते हैं और उसके सुखद या दुखद भविष्य की कल्पना कर बैठते हैं। वे इतने जोश में होते हैं कि उसी कल्पना को इंट्यूशन समझकर फलादेश भी ठोंक देते हैं। जब जातक लौटकर आता है तो शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है।
इसी दौरान एक और बात आई वह थी एक ही अंक का बार बार दिखना। अखिल तिवारी जी कहते हैं कि पिछले कई सालों से एक विशेष समय को कभी घड़ी, कभी मोबाइल. कभी कंप्यूटर तो कभी कही भी, दीवाल पे, नही तो सामने जाती हुई गाड़ी के नम्बर पर.. एक विशेष combination (12:22) रोज दीखता है. हम किसी भी दो संयोगों को मिलाकर चार कर सकते हैं। और जब तक दो और दो चार होते रहें तब तक तो ठीक है लेकिन कई बार यही दो और दो पांच दिखने लगे तो कठिनाई आती है। अब इसी उदाहरण की बात की जाए तो मैं सोच सकता हूं कि इस विशेष नम्बर से कहीं उनका जुड़ाव होगा। अगर वे देखने की बजाय आब्जर्व करने लगें तो पता चलेगा कि केवल ये विशेष संख्याएं ही नहीं अनन्त संख्याएं उनके सामने आती हैं लेकिन जिंदगी में कही न कहीं इन संख्याओं से जुड़ी याद होने के कारण ये अधिक तेजी से उनके दिमाग में ब्लिंक करती हैं। अब संख्या तो आ रही है लेकिन उसके साथ जुड़ी याद अवचेतन में पीछे कहीं दूर धकेल दी गई है। सो उनका परेशान होना स्वाभाविक है। अगर मैं एक न्यूमरोलॉजिस्ट की तरह बात करूं यानि सिट्टा हाथ में उठा लूं, तो पहले तो इन संख्याओं को जोडकर सात बना लूंगा। फिर बताउंगा कि चूंकि ये संख्याएं दो भागों में बंटी है इसलिए पहले तीन का और बाद में चार का असर आएगा। यानि तीन की संख्या से गुरू और चार की संख्या से सूर्य आता है। इससे पता चलता है कि जब आप किसी प्रॉब्लम में उलझे होते हैं तो आपको किताबों और ऑथेरिटी की जरूरत होती है। अगर अखिल जी मेरी बात को सीरियस लेते हैं तो वे याद करेंगे और उन्हें याद भी आ जाएगा कि उन्होंने कई बार प्रॉब्लम में होने पर किताबों में जानकारी ली और अपने सीनियर्स की मदद भी। लेकिन एक सिस्टम एनालिस्ट ऐसे नहीं बनता है। यकीन मानिए। उसे समस्याओं को खुद ही हल करना होता है। चाहे किसी की भी सहायता ले लेकिन लगातार सामने आ रही समस्या उसकी निजी होती है और उससे लड़ने वाला भी वह खुद ही होता है। अब जिन बातों का जस्टिफिकेशन हमारे पास नहीं होता उन बातों के लिए हम उन लोगों पर निर्भर हो जाते हैं जिन्हें वास्तव में खुद कुछ नहीं मालूम। जैसा कि मेरे एक दोस्त कहते हैं दो अंधे मिलकर एक आंख से देखने लगते हैं। अब (12:22) संकेत तो है लेकिन भविष्य का हो जरूरी नहीं।
अब बात पराभौतिक कनेक्शन की: यह हर किसी का होता है। चाहे वह उसे प्रदर्शित कर पाए या नहीं। जब हाजिर दिमाग काम करना बंद कर देता है तब यह पराभौतिक कनेक्शन अधिक मुखरता से महसूस होने लगते हैं। हम किसी से कोई बात करते हैं, कोई जानकारी लेते या देते हैं, कोई गाना सुनते हैं, कोई समाचार देखते हैं तो दिमाग तत्काल जो रिएक्शन देता है वह हाजिर दिमाग की होती है। मान लीजिए कि आपने टीवी में एक सड़क दुर्घटना का दृश्य देखा। इससे आपके दिमाग में हाथों हाथ यह आएगा कि आजकल सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं, लोग लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं वगैरह वगैरह.. कुल मिलाकर तात्कालिक प्रतिक्रियाएं तत्काल आती हैं और समाप्त भी हो जाती हैं। इसी दौरान आपका अवचेतन गणना करने लगता है। (यह केवल उदाहरण के लिए है सिद्धांत नहीं) वह आपको याद दिला देता है कि आपका छोटा भाई भी लापरवाही से गाड़ी चलाता है। आजकल किसी बड़े शहर में है जहां उसके पास दुपहिया वाहन भी है। हालांकि दुपहिया वाहन कम चलाता है लेकिन चलाता तो है। अब दूसरा विचार कि आपके भाई का शहर और दुर्घटना वाला शहर कितना मिलता जुलता है। इस जैसे हजारों विचार दिमाग के बैकग्राउंड में चलते हैं। इसी दौरान आपके भाई का दोस्त भी यही देख रहा होता है और शायद उसका अवचेतन भी ऐसी ही कुछ चाल चलता है। अब आप और आपके दोस्त का भाई कहीं रास्ते में मिलते हैं। आपका दिमाग बात करता है गाड़ी को सही मेंनटेंन करने और सही तरीके से चलाने के बारे में यही आपके भाई के दोस्त के दिमाग में भी चल रहा होता है। दोनों मिलकर बात कर लेते हैं। और निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि आपका भाई तो ढंग से गाड़ी चलाता है। इसके लिए कहीं भी आपके भाई या दुर्घटना का जिक्र नहीं होता। लेकिन मैसेज कन्वे हो गया। अब आपकी चिंता बढ़ रही है और आप अपने भाई को फोन लगाते हैं तो वह वही बातें कर रहा होता है जो आपने अब तक सोची थी। लेकिन वह यह बताना भूल जाता है कि उसके दोस्त का भी फोन आया था। आपकी सोच बदल जाती है। आप सोचने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। जबकि तीनों लोगों के अवचेतन इस कांबिनेशन को बना रहे थे। यह एक उदाहरण है। लेकिन इससे स्पष्ट हो सकता है कि कैसे हम कोई बात सोचते हैं दूसरा उसी बात को बोलता है। इसे मैं दो लोगों के एक ही मानसिक स्तर में होना कहता हूं। साइकोलॉजिस्ट क्या कहते हैं मुझे पता नहीं। अब अल्पना वर्मा जी कहती हैं कि एक व्यक्ति को कभी कभी कोई घटना -अक्सर दुर्घटना - दिमाग में बार बार तब तक दिखायी देती रहे..और कुछ दिन में या कुछ घंटे या मिनटों के अन्तर पर वो सच हो जाए। कभी कोई मिलने आने वाला हो और घर के नज़दीक होने पर उस की तस्वीर दिमाग में स्पष्ट दिखायी दे। यह यकीनन कोई मनोरोग नहीं है। हां यह मनोरोग नहीं है बस आपके अवचेतन का एक ट्रेलर मात्र है। बिल्कुल वैसी की वैसी घटना न भी हो तो आपकी कल्पना की घटना और वास्तविक घटना की एकरूपता को जस्टिफाई आपका दिमाग ही तो करेगा। अगर वह क्रूर विश्लेषण करे तो दोनों घटनाओं में हजारों अन्तर ढूंढ निकालेगा और मनोविनोद की बात हो तो अंतर ढूंढने का कारण ही नहीं रह जाएगा। हम भविष्य तो देख भी लें तो वह वैसा हमारे सामने कभी नहीं आएगा जैसा कि वास्तव में है। बस संकेत आते हैं। आप जिनती कुशलता से इन संकेतों को समझ लेते हैं वही भविष्य की या दूरदृष्टि है।
शेष शुभम्
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009
कब तक डरते रहोगे साढ़ेसाती से
बहुत जगहों पर पढ़ता रहा हूं। साढ़ेसाती के बारे में। अब तक सैकड़ों सवाल भी सुन और झेल चुका हूं। हर बार समझाने की कोशिश करता हूं कि साढ़ेसाती से डरने का कोई फायदा नहीं है। इसका कोई उपचार भी नहीं है। तो इतना पुस्तकों, मैग्जीनों, न्यूज चैनलों और पंडितों के यहां साढ़े साती के बारे में सुना है क्या सब फिजूल है।
मेरा जवाब है हां जी सबकुछ फिजूल है। मैं स्पष्ट करने का प्रयास करता हूं। पहले यह कि साढ़ेसाती होती क्या है। आपकी कुण्डली में चंद्रमा जिस राशि में जिस डिग्री पर बैठा है उस चंद्रमा से 45 डिग्री के घेरे में जब गोचर का शनि (यानि फिलहाल जो शनि की गति है उसके हिसाब से) आता है तो आपको शनि की साढ़ेसाती लग जाती है। साढ़ेसाती का अर्थ है यह साढ़े सात साल तक चलती है। 45 डिग्री के दायरे में आने के साथ शुरू होती है और चंद्रमा से आगे निकलकर 45 डिग्री दूर चली जाए तब तक चलती है। एक राशि तीस डिग्री की होती है। शनि का एक राशि में भ्रमण ढाई साल का होता है। चंद्रमा के दोनों ओर डेढ़ डेढ़ राशि तक इसका भ्रमण यह स्थिति पैदा करता है। यानि ढाई ढाई साल के तीन हिस्से किए जा सकते हैं।
अब सवाल कि यह करती क्या है। जैसा कि मैंने किताबों में पढ़ा है और मेरे वरिष्ठजनों से राय ली है साढ़े साती हमें अधिक मेहनत करने के लिए विवश करती है। जब हम समय के साथ इसके अनुसार दौड़ नहीं पाते तो निठल्ले होकर बैठ जाते हैं। किसी व्यक्ति पर साढ़ेसाती का बुरा प्रभाव है या नहीं यह चैक करने के लिए मेरे पास एक बहुत आसान रास्ता है। मैं उस व्यक्ति से पूछता हूं कि अभी क्या समय हुआ है। साढ़ेसाती का पीडि़त अधिकांशत: इसका गलत जवाब देगा। अगर शनि खराब प्रभाव नहीं कर रहा है तो जवाब सही आएगा। इस फार्मूले को निकालने के पीछे ठोस कारण यह है कि खराब शनि हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर आक्रमण करता है और हमारे दैनिक कार्य करने में भी परेशानी आने लगती है। इसी से शुरू होती है टाइमिंग की समस्या। यानि गलत समय पर आप सही जगह पर पहुंचते हैं या सही समय पर गलत जगह पर। यह साढ़ेसाती का दूसरा बड़ा साइन है।
यह तो मैंने बताया कि समस्या कहां दृष्टिगोचर होती है और कैसे होती है। अब सवाल कि इससे डरा क्यों जाए और डरा क्यों न जाए। पहले सवाल का जवाब है कि जब पता चल गया कि शनि की साढ़ेसाती टाइमिंग और टाइम सेंस को खराब करती है तो सबसे पहले इसी पर चेक लगाया जाए। यानि इसे दुरुस्त करने के जमीनी उपाय शुरू कर दिए जाएं। मसलन घड़ी पहनी जाए और दिनांक और समय के प्रति सचेत रहा जाए। प्लान बनाकर काम किए जाएं और जहां जाएं वहां समय नष्ट करने के बजाय पूर्व में पूरी जानकारी एवं समय लेकर पहुंचा जाए। इसी तरह के खुद के मैनेजमेंट के हजारों उपाय हैं।
इससे साढ़ेसाती का असर नब्बे प्रतिशत तक कम हो जाएगा। दूसरा सवाल कि डरा क्यों न जाए। वह इसलिए कि एक आदमी की औसत आयु सत्तर साल भी मान ली जाए तो उस व्यक्ति की जिंदगी में तीन बसा साढ़ेसाती आएगी। यानि साढे़ बाइस साल तक साढ़ेसाती का काल रहेगा। यही नहीं कुछ योग शनि के कंटक के भी बनेंगे। यानि उस दौरान भी साढ़ेसाती के कुछ असर रहेंगे। इस तरह तो पहले चालीस साल के सक्रिय जीवनकाल में ही पंद्रह साल ऐसे आ जाएंगे जब इस डर के साथ जीना पड़ेगा। अब यह बात कैसे मानी जा सकती है कि किसी व्यक्ति के चालीस में से पंद्रह साल तो खराब ही हो गए। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। साढ़े साती पूरी तरह खराब भी नहीं होती। अपने तीन चरणों में वह सिर, पेट और पैर में या इससे ठीक उल्टे क्रम में रहती है। जब सिर में होगी तो सोचने के लिए मजबूर करेगी और जब पांव में होगी तो दौड़ने के लिए और जब पेट में होगी तो ढेर सारा धन दिलाएगी। यानि पेट भर देगी। अगर ऐसी है साढ़ेसाती तो डरने की नहीं बल्कि रोलर कोस्टर राइड करने का समय है। तो अब मैं सोच सकता हूं कि इस बार जब कोई आपको बताएगा कि आपकी साढ़ेसाती शुरू होती है अब... और आपको दिमाग में आएगा कि ठीक है चलो चलते हैं राइड पर।
कब चिंता करनी चाहिए...
जब आपके किसी वृद्ध परिजन को साढ़ेसाती लगे तो चिंता करनी चाहिए। आमतौर पर तीसरी साढ़ेसाती जीवन के साथ ही खत्म होती है और तीसरी किसी तरह निकल जाए तो चौथी आखिरी होती है। हर कोई जानता है कि वृद्ध लोग रोलरकोस्टर राइड नहीं कर पाते हैं। साढेसाती में यही होता है। इसी से बड़े बूढों को दिल और दिमाग की बीमारियां होती है। कुछ लोग शारीरिक रूप से थक कर हार जाते हैं तो कुछ मानसिक लड़ाई में टूटते हैं। लेकिन जवानों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता।
मैंने आपकी जिंदगी के पहले पचास साल सिक्योर कर दिए हैं साढ़ेसाती के प्वाइंट आफ व्यू से। अब आपकी बारी है मुझे नया विचार देने की। :)
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मंगलवार, फ़रवरी 17, 2009
वास्तु और इसके नियम
पिछली पोस्ट में एक बेहतरीन सवाल मेरे पास आया वह यह कि जिन घरों में भूमि पूजन नहीं कराया गया हो वहां कैसे सुख समृद्धि रहेगी। वास्तु के हिसाब से वे कैसे अच्छे घर सिद्ध हो सकते हैं। यह सवाल किया था अल्पना वर्मा जी ने उन्हीं के शब्दों में
'अगर किसी कारणवश किसी इमारत को बनाने से पहले नींव पूजन न होसके तो क्या करना चाहिये?
भारत के अलावा कई पश्चिमी देशों में भूमि पूजन या नींव पूजन आदि नहीं कराये जाते तब भी वहां सब ठीक रहता है.'
यहां मैं बताना चाहूंगा कि वास्तु विषय के मुताबिक पूजन कराना अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि एक सुविधा है। यानि अगर पूजन नहीं भी कराया है तो उस घर में सुखी और समृद्ध बनकर रहा जा सकता है। लेकिन अब भी वास्तु के नियम वही रहेंगे।
बात कुछ उलझ रही लग सकती है। ठीक है पहले समझते हैं वास्तु आखिर में है क्या। किसी भी स्थान की अवस्था को वास्तु कहा जा सकता है। स्थान की अवस्था का आकलन करने के लिए यह देखा जाएगा कि वह कहां स्थित है, हवा, पानी, रोशनी आदि की कैसी व्यवस्था है, घर के बाहर के क्या हालात हैं आदि। यह तो हुई स्थान की इंडिपेंडेंट बात। अब उस स्थान के मालिक और स्थान में भी एक संबंध होता है। यही संबंध तय स्थान पर हुए निर्माण में दृष्टिगोचर होता है। कैसे ?
बहुत सामान्य बात है। शनि से प्रभावित लोगों के घरों में आप ट्यूबलाइट अधिक देखेंगे और वह भी धीमी जल रही होगी। बाकी अधिकांश घर ऐसा होगा कि दिन में भी अंधेरा महसूस हो। मंगल और सूर्य से प्रभावित लोग अपने घर के आगे और पीछे इतनी जगह छोड़ते हैं कि देखने वाले को लगता है कि जमीन कुछ ज्यादा ही बड़ी ले ली लेकिन घर छोटे भाग में ही बनाया है। हर व्यक्ति के व्यक्तित्व की छाप उसके आवास पर दिखाई देगी। अब यह तो बात हुई वास्तु की उपस्थिति की। अब यह पूजन का क्लॉज कब जुड़ गया। मैं तो कहूंगा कि यह भी जरूरी भाग है। प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक भारत से शुरू से ही नहीं समझा। पहले योगियों का भी मजाक उड़ाया जाता था अब योग फैशन बन रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि प्राणायाम के क्या क्या लाभ हैं इसका निर्णय होना अभी बाकी है। यह न केवल सामान्य रोगों को ठीक करता है बल्कि कई प्रकार के जेनेटिक डिसऑर्डर को भी दुरुस्त कर देता है। ऐसी ही स्थिति नींव पूजन के साथ भी है। बहुत से लोगों को पता नहीं है कि इसका क्या महत्व है।
लेकिन जब तक इसका महत्व लैबोरेट्रीज में पता चले उससे पहले तो कम से कम इसे जिंदा रखने के लिए हमें भूमि पूजन कराते रहना चाहिए। रही बात पश्चिमी सभ्यता के लोगों की जो भूमि पूजन नहीं कराते हैं। वे हमारी तरह ही कभी सुखी कभी दुखी होते रहते हैं। हां हम एक बात में उनसे आगे रहते हैं वह यह कि हमें महसूस होता है कि हां कोई तीसरी शक्ति है जो पर्दे के पीछे रहकर लगातार हमारी सहायता कर रही है। बस यही है भूमि पूजन का वास्तविक महत्व...
मेरा शहर बीकानेर, अगली बार बताउंगा विश्व और आपके शहर का वास्तु
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गुरुवार, फ़रवरी 28, 2008
स्त्री की सुंदरता : ज्योतिषीय दृष्टिकोण
तरुणाई से निकलकर यौवन में प्रवेश करते समय हर आदमी के दिमाग में होता है कि कौनसी लडकी उसकी जिंदगी में आएगी और कैसी होगी। कौनसी लडकी आएगी यह तो ब्रह्मा ही निर्धारित करते हैं लेकिन दिखने में कैसी होनी चाहिए इस बारे में ज्योतिष ग्रंथों में काफी लिखा गया है। एक पुस्तक विवाह ज्योतिष में तो बाकायदा वर्णन किया गया है कि एक व्यक्ति को अपने पुत्र के लिए कैसी कन्या का चुनाव करना चाहिए। इस वर्णन से पूर्व बताया गया है कि पांच सयाने व्यक्तियों में एक लडके का पिता, एक कुलगुरु, एक समाज का आदमी, एक परिवार का बुजुर्ग और एक वृद्ध आदमी स्त्री को देखने के लिए जाते हैं।
क्या देखते हैं स्त्री में- कन्या को सिर से पांव तक देखा जाता है। पांव के तलुए से लेकर सिर के बालों तक का अलग-अलग भागों में वर्णन किया गया है।
पांव: तलवे बिल्कुल चिकने, मुलायम, पूर्ण विकसित और गुलाबी रंग के हों। स्वास्तिक, कमल, ध्वजा जैसे शुभ निशान औरत को राजयोग दिलाते हैं। पांव के नाखून भी गदराए हुए और सीधे हों। नाखून में गुलाबी रंगत का अहसास होना चाहिए। अंगूठा गोल, चिकना, पूर्ण विकसित होना चाहिए। पांव की अंगुलियों और अंगूठे में स्वाभाविक उभार होना चाहिए। अगर कन्या चलते समय मिट्टी को ऊपर की ओर उडाती है तो पिता, पति अथवा माता के परिवार को कष्ट देने वाली होती है। तलवों के ऊपर का हिस्सा सीधा और बिना बालों का होना चाहिए।
ऐडी: ऐडी को मैने पांव से अलग लिखना ठीक समझा क्योंकि एडी स्त्री के गुप्तांग का वर्णन करती है। किसी स्त्री की एडी गोल, गदराई हुई और सुंदर हो तो उसके गुप्तांग भी बिल्कुल सही काम करने वाले होते हैं।
नाभि बिल्कुल सीधी और पर्याप्त गहराई पर होनी चाहिए। पेट और कमर पर बाल नहीं होने चाहिए। नितंब भारी और गोलाई लिए हों। छाती और स्तनों पर बाल नहीं होने चाहिए। कंधे सीधे और ऊपर की ओर उठे हुए हों। अंगुलियों के नाखूनों पर किसी प्रकार का दाग अथवा लहसुन का निशान नहीं होना चाहिए। बाल गहरे काले और लम्बे हों। दांत लम्बे हों और मसूडे दिखाई नहीं देते हों। मुस्कुराने पर मसूडे दिखाई दें तो स्त्री भाग्यहीन होती है। आंखें काली और उभरी हुई हों। ललाट उभरा हुआ और ऊपर की ओर उठा हुआ होना चाहिए। होंठ लाल हों।
रंगों की चर्चा - इस सबके दौरान भी स्त्री के रंग पर कहीं भी चर्चा नहीं की गई है। यह बात गौर करने वाली है। ललासी का तो ध्यान रखा गया है लेकिन रंग का नहीं। यानि स्त्री किसी भी रंग की हो काली या गोरी वह अच्छे लक्षणों से युक्त हो सकती है। आवाज के बारे में अलग स्थानों पर दिया गया है लेकिन आवाज से केवल व्यक्ति के व्यक्तित्व और रोग के बारे में जानकारी मिलती है भाग्य के बारे में नहीं। यह लक्षण कुंवारी कन्याओं में देखे जाते हैं। विवाह होने के बाद स्त्रियों में काफी बदलाव आ जाते हैं।
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