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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष कक्षा: पहला दिन - ज्‍योतिष और कर्म

इस साल वास्‍तु के साथ ज्‍योतिष की कक्षा लेने का मौका मिला है। आज कक्षा का पहला दिन था। कक्षा की शुरूआत में वास्‍तु की कक्षा की ही तरह मैंने विद्यार्थियों से पूछा कि उन्‍होंने अब तक अपने विषय में क्‍या ज्ञान हासिल किया है। ताकि एक स्‍तर तक का ज्ञान होने पर उससे आगे की बात की जा सके। आश्‍चर्य की बात यह है कि करीब डेढ़ दर्जन विद्यार्थियों ने एक स्‍वर में कहा कि इस विषय में अपनी राशि पढ़ने से अधिक कोई ज्ञान नहीं है। सो कक्षा का स्‍तर शुरू हुआ शून्‍य से। चूंकि लाइव पढ़ाना एक अलग अनुभव है और ब्‍लॉग पर ज्‍योतिष लेख लिखना जुदा बात। सो मैंने निर्णय किया कि अठारह दिन तक चलने वाली कक्षाओं में विद्यार्थियों से रूबरू होने के साथ इस ब्‍लॉग पर भी रोजाना एक पोस्‍ट ठेलने का प्रयास करूंगा। ताकि लाइव अनुभव के साथ ऑनलाइन सीखने वालों को भी अच्‍छा कंटेंट मिल जाए। तो आज से शुरू करते हैं ज्‍योतिष की कक्षा का पहला दिन---

ज्‍योतिष की जरूरत क्‍यों ?
(यह सवाल मैंने खुद ने खड़ा किया। ताकि विद्यार्थियों को स्‍पष्‍ट हो सके कि जिस विषय को पढ़ना है उसे क्‍यों पढ़ा जा रहा है।)
इसके लिए मैंने अपने ही एक पुराने विचार का सहारा लिया। जिस पर मैं इसी ब्‍लॉग पर एक लेख भी ठेल चुका हूं। स्‍वंतत्रता की संभावना शीर्षक से अपने निजी विचारों वाले ब्‍लॉग में इस पर चर्चा कर चुका हूं। ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण से इस पर कभी लेख प्रस्‍तुत नहीं कर पाया। कक्षा में कही मेरी बात कुछ इस तरह थी... 
“यह सृष्टि ईश्‍वर की बनाई है। चाहे कपिल मुनि के सांख्‍य दर्शन की बात करें या शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत की। हमें ईश्‍वरवादी धर्म एक बात स्‍पष्‍ट कर देते हैं कि जो कुछ हो रहा है वह ईश्‍वर द्वारा तय है। सबकुछ पूर्व नियत है। कोई घटना या मनुष्‍य के दिमाग में उपजा विचार तक ईश्‍वर द्वारा पूर्व निर्धारित किया गया है। सृष्टि का एक भाग बनकर हम केवल उसे जी रहे हैं।
ऐसे में इच्‍छा स्‍वातंत्रय (freedom of will) की कितनी संभावना शेष रह जाती है, यह सोचने का विषय है। क्‍योंकि या तो सबकुछ पूर्व नियत हो सकता है या हमारे कर्म से बदलाव किया जा सकता है। अगर कर्म से पत्‍ता भी हिलाया जा सकता है, जो ईश्‍वर की इच्‍छा नहीं है तो सबकुछ परिवर्तित किया जा सकता है। यह कर्म आधारित सिद्धांत बन जाएगा। यानि जैसा कर्म करेंगे वैसा भोगेंगे।
तो कुछ भी पूर्व नियत नहीं रह जाता है। इस बात का यह अर्थ हुआ कि ज्‍योतिष भी समाप्‍त हो जाएगी। अब ग्रह नक्षत्रों के बजाय यह देखना होगा कि जातक ने अब तक क्‍या कर्म किए हैं। कुछ प्रश्‍न फिर अनुत्‍तरित रह जाते हैं कि जातक की पैदा होने की तिथि, परस्थिति, माता-पिता, परिजन आदि उसका खुद का चुनाव नहीं हैं, ना ही अन्‍य परिस्थितियों का चुनाव वह कर पाता है। इसका जवाब फिर से प्रारब्‍ध में आ जुड़ता है।
अगर सबकुछ पूर्व नियत है तो हमें कुछ भी करने की जरूरत ही नहीं है या जो कर रहे हैं उसका पुण्‍य और पाप भी हमारा नहीं बल्कि सृष्टिकर्ता का ही हुआ और अगर कुछ भी पूर्व नियत नहीं है तो बिना चुनाव के हमें मिले जीवन के खेल के पत्‍तों का सवाल अनुत्‍तरित रह जाता है।
अब तीसरी स्थिति सामने आती है कि ईश्‍वर ने कुछ पूर्व में ही नियत कर रखा है और कुछ इच्‍छा स्‍वातंत्रय की संभावना शेष रखी है। यहां यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि हमें कितनी स्‍वतंत्रता मिली हुई है।”

बात दृढ़ और अदृढ़ कर्मों की
कक्षा में एक छात्र ने कहा कि हमें कर्मों का फल भी तो भुगतना है। इस पर मैंने ज्‍योतिष मार्तण्‍ड प्रोफेसर के.एस. कृष्‍णामूर्ति को ज्‍यों का त्‍यों कोट कर दिया। उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी में स्‍पष्‍ट किया है कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार है दृढ़ कर्म। ये ऐसे कार्य है तो तीव्र मनोवेगों के साथ किए जाते हैं। चाहे चोरी हो या हत्‍या। पूर्व जन्‍म के इन कर्मों का फल भी तीव्रता से मिलता है। दूसरा है अदृढ़ कर्म। इस प्रकार के कर्मों के प्रति व्‍यक्ति सचेत नहीं होता है, लेकिन कर्म तो होता ही है। जैसे अनचाहे किसी का नुकसान कर देना अथवा दिल दुखा देना। ऐसे कर्मों का फल हल्‍का होता है। तीसरा प्रकार है दृढ- अदृढ़ कर्म। ये कार्य तीव्र अथवा हल्‍के मनोभावों से किए जा सकते हैं, लेकिन इनकी परिणीति से इतर भावों के स्‍तर पर कर्मों का फल मिलता है।
इन तीन अवस्‍थाओं के साथ चौथी स्थिति मैंने अपनी तरफ से जोड़ी निष्‍काम कर्म की। कर्मयोग में बताया गया है कि अगर हम किसी भी कार्य को बिना आसक्ति के भाव से करते हैं तो वे कर्म बंधन पैदा नहीं करते। कर्मयोग की ऊंची अवस्‍थाओं में ही व्‍यक्ति ऐसे कर्म कर पाता है। ऐसे जातक जन्‍म और मृत्‍यु के बंधन से मुक्‍त होकर कैवल्‍य या मोक्ष प्राप्‍त कर लेते हैं।

कल बात करेंगे ज्‍योतिष की कक्षा के दूसरे दिन की... हालांकि कक्षा शुरू हुए तीन दिन हो चुके हैं लेकिन पोस्‍ट लिखने में कुछ अधिक समय लग रहा है। ऐसे में किन्‍हीं दो दिनों को मैं एक साथ पेश कर दूंगा, ताकि आगे नियमितता बनी रह सके।

ज्‍योतिष कक्षा: 3सरा दिन - राशियां, भाव और भावेश

तीसरे दिन की कक्षा तक दो या तीन छात्र ही किताबें लेकर आए। शेष ने बारह दिन की कक्षा के दौरान ही सारी ज्‍योतिषी बोर्ड पर ही समझने की ठान ली थी। इसके चलते उन्‍होंने किताबें खरीदने के बजाय केवल मुझसे सुनकर जितना हासिल हो सके उतना ही हासिल करने का मानस बनाया है। तीसरे दिन कक्षा के बाद मैं पोस्‍ट नहीं लिख पाया। अब कई दिन बाद पोस्‍ट लिख रहा हूं। सो इस बीच छात्रों को किताबें खरीदने के लिए तैयार करने की कोशिश करता रहा। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि कक्षा के बारह छात्रों में से आठ ने किताबें खरीद ली हैं। इनमें से दो ने देवकीनन्‍दन सिंह की ज्‍योतिष रत्‍नाकर खरीदी तो शेष छह पुस्‍तक महल की फलित ज्‍योतिष रेडीरेकनर खरीद लाए हैं। ठीक है एलीमेंट्री ज्‍योतिष के लिए यह किताब भी बुरी नहीं है। कक्षा में पढ़ाए विषय की बात से पहले स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा कि ज्‍योतिष अध्‍ययन बहुत शादी अंदाज है। इसे तब तक पढ़ा नहीं जा सकता जब तक आप समय और धन खर्च करने के लिए मानसिक रूप से पर्याप्‍त तैयार नहीं हो जाते। वरना गद्दी तपने वाले ज्‍योतिषी से अधिक नहीं बन पाएंगे। गद्दी तपने के अंदाज पर एक जुदा पोस्‍ट फिर कभी....
फिलहाल तो ज्‍योतिष की कक्षा का एक फोटो... अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर अजीज भुट्टा ने अपने कैमरे की नजरे इनायत की और हमारा एक फोटो खींचकर हमें मेल कर दिया। हालांकि एक फोटो अखबार में भी छपा था, लेकिन समाचार पत्र की पॉलिसी की वजह से उसमें फैकल्‍टी का फोटो नहीं दिया गया था।

भचक्र की बारह राशियां
तारों और उससे बने नक्षत्रों के बारे में हम पहले पढ़ चुके हैं। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं। नक्षत्रों के नौ चरणों से एक राशि बनती है। यानि सवा दो नक्षत्रों की एक राशि होती है। राशियां कुल बारह हैं। पहली राशि मेष, द्वितीय वृष, तृतीय मिथुन, चतुर्थ कर्क, पंचम सिंह, छठी कन्‍या, सातवीं तुला, आठवीं वृश्चिक, नौंवी धनु, दसवीं मकर, ग्‍यारहवीं कुंभ और बारहवीं राशि मीन है। हर राशि का अधिपति होता है। सूर्य और चंद्रमा के आधिपत्‍य में एक-एक राशि है और शेष अन्‍य ग्रहों के अधिकार में दो-दो राशियां हैं। मेष और वृश्चिक राशि का अधिपति मंगल है। वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्‍या का बुध अधिपति है। चंद्रमा का कर्क राशि पर अधिकार है और सूर्य का सिंह राशि पर। धनु और मीन राशि का अधिपति गुरु है और मकर व कुंभ राशि का शनि अधिपति है।
भाव और भावेश क्‍या है?

भचक्र के 360 अंशों को 12 भागों में बांटा गया है। इनमें से हर भाग 30 डिग्री का है। इस भाग को भाव कहते हैं। जब कोई कुण्‍डली हमारे सामने आती है तो उसमें बारह खाने बने हुए होते हैं। इनमें से सबसे ऊपर वाला पहला भाव होता है। कुण्‍डली के भावों को कुछ इस तरह से बताया जा सकता है। जिस भाव में जो संख्‍या लिखी है वह भाव की संख्‍या है। पहला भाव कुण्‍डली का सबसे महत्‍वपूर्ण भाव होता है। इसे लग्‍न कहते हैं। जातक के जन्‍म के समय यही भाव पूर्व दिशा में उदय हो रहा होता है। लग्‍न से जातक की आत्‍मा, मूल स्‍वभाव, उसका स्‍वास्‍थ्‍य देखा जाता है। अन्‍य विषयों के विश्‍लेषण के दौरान भी लग्‍न की स्थिति प्रमुखता से देखी जाती है। यदि लग्‍न मजबूत होता है तो कुण्‍डली अपने आप दुरुस्‍त हो जाती है। अगर किसी जातक की कुण्‍डली में लग्‍न खराब हो रहा हो तो पहले उसी का उपचार किया जाता है।
जहां दो लिखा है वह द्वितीय भाव है। यहां से जातक का परिवार और धन देखा जाता है। तीसरा भाव भाई बंधु और छोटी यात्राएं देखने के लिए है। चौथा भाव माता और घर की शांति बताता है, पांचवा भाव जातक की उत्‍पादकता और संतान के बारे में बताता है। छठा भाव ऋण, रोग और शत्रुओं की जानकारी देता है। सातवां भाव पत्‍नी और व्‍यापार में साझेदार के बारे में बताता है। आठवां भाव आयु और गुप्‍त कार्यों, नौंवा भाव भाग्‍य, दसवां कर्म, ग्‍यारहवां आय और बारहवां भाव व्‍यय की जानकारी देता है। आय, व्‍यय और कर्म किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।

लग्‍न में कोई भी राशि हो सकती है। बारह राशियों में से जो राशि लग्‍न में होगी जातक का लग्‍न उसी राशि के अनुरुप कहा जाएगा। यदि जातक के जन्‍म के समय मिथुन या तुला राशि का उदय हो रहा है तो कहेंगे कि जातक का लग्‍न मिथुन या तुला का है। फर्ज कीजिए कि एक जातक 7 जून 2011 को रात 8 बजकर 19 मिनट पर बीकानेर में पैदा होता है तो उसकी कुण्‍डली कुछ इस तरह होगी। (दाएं ओर के चित्र में दर्शाए अनुसार)
इसमें कुण्‍डली के लग्‍न में धनु राशि है। ऐसे में कहेंगे कि धनु लग्‍न की कुण्‍डली है। धनु राशि का स्‍वामी गुरु है। ऐसे में कहेंगे कि लग्‍न का अधिपति गुरु है। दूसरे व तीसरे भाव का अधिपति शनि। चौथे का फिर से गुरु, पांचवें व बारहवें का मंगल, छठे व ग्‍यारहवें का शुक्र, सातवें और दसवें का बुध, आठवें का चंद्र, नौंवे का सूर्य अधिपति होगा। ज्‍योतिषीय शब्‍दावली में इसे कहेंगे कि लग्‍नेश गुरु, द्वितीयेश व तृतीयेश शनि, चतुर्थेश गुरु, पंचमेश मंगल, षष्‍ठेश शुक्र, सप्‍तमेश बुध, अष्‍टमेश चंद्र, नवमेश सूर्य, दशमेश बुध, एकादशेश शुक्र, द्वादशेश मंगल है।
ज्‍योतिष की कक्षा में तीसरे दिन हम करेंगे राशियों से परिचय। इसमें हम मेष से मीन तक की बारह राशियों की विशेषताओं पर चर्चा करेंगे।

ज्‍योतिष कक्षा : 7वां दिन - तुला और वृश्चिक राशि

ज्‍योतिष की कक्षा में आज हम बात करेंगे शुक्र के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि तुला और मंगल के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि वृश्चिक की। इनमें से एक राशि शुक्र के आधिपत्‍य की है तो दूसरी मंगल के आधिपत्‍य की। आइए देखते हैं कैसे होते हैं ये लोग...

वणिक बुद्धि वाले तुला राशि के जातक

तुला राशि के जातकों की मनोदशा का केवल यही वर्णन नहीं है। भारतीय जनतंत्र में आज जिस व्‍यक्ति की छाप सबसे बड़ी है वह तुला राशि का ही जातक था। मैं बात कर रहा हूं राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी की। बाजार में अपनी तुला लिए खड़े व्‍यक्ति के रूप में तुला राशि को दिखाया गया है। विचारों से सम और हर बात को पूरी तरह तौलकर देखने वाला जातक तुला राशि का होगा। हालांकि इस राशि पर शुक्र का आधिपत्‍य है, इस कारण तुला राशि के जातकों को बनने संवरने, संगीत, चित्रकारी और बागवानी जैसे शौक होते हैं। इसके बावजूद रचनात्‍मक आलोचना और राजनैतिक चातुर्य इन जातकों का ऐसा कौशल होता है कि दूसरे लोग इनसे चकित रहते हैं। वणिक बुद्धि के कारण वाद विवाद में पड़ने के बजाय समझौता करने में अधिक यकीन रखते हैं। इन जातकों का शरीर दुबला पतला और अच्‍छे गठन वाला होता है। चेहरा सुंदर भी न हो तो मुस्‍कान मोहक होती है। इन जातकों को विपरीत योनि वाले सहज आकर्षित करते हैं। हालांकि इन जातकों की शारीरिक संरचना सुदृढ़ होती है, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण बीमारियों की पकड़ में जल्‍दी आते हैं। साझीदार के साथ व्‍यापार करना इनके लिए ठीक रहता है। जातक उचित समय पर सही सलाह देता है। ऐसे में साझेदार भी ज्‍यादातर फायदे में रहते हैं। एक बार मित्र बना लें तो हमेशा के लिए अच्‍छे मित्र सिद्ध होते हैं। इन जातकों का पंचमेश शनि होता है। इस कारण तुला लग्‍न के जातकों के अव्‍वल तो संतान कम होती है और अधिक हो भी जाए तो संतान का सुख कम ही मिलता है। इनके लिए शुभ दिन रविवार और सोमवार बताए गए हैं। शुभ रंग नारंगी, श्‍वेत और लाल तथा शुभ अंक एक व दस हैं।

हताश होना नहीं सीखा वृश्चिक ने

वृश्चिक राशि के जातकों की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वे कभी हार नहीं मानते। एक बार जिस काम में जुट गए उससे जल्‍दी से उकताते नहीं है और आखिरी दम तक उस काम को पूरा करने में जुटे रहते हैं। वृश्चिक राशि के लोग दो तरह के होते हैं। एक जो अपनी इंद्रियों को जीतकर जितेन्द्रिय बन जाते हैं। और दूसरे निम्‍न कोटि के जो ईर्ष्‍यालु और असभ्‍य होते हैं। इस राशि पर मंगल का आधिपत्‍य है सो अच्‍छा खासा डील डौल और चौड़ा माथा होता है। बालों में स्‍वाभाविक रुप से घुंघरालापन होता है। दवाओं से जुड़े कामों में अच्‍छा लाभ कमा सकते हैं। जलतत्‍वीय राशि होने के कारण इन लोगों का अंतर्ज्ञान भी ठीक होता है। बात दैहिक सुख की हो या गुप्‍त साहसिक कार्यों की, ये लोग पूर्ण संतुष्टि के साथ जिंदगी जीना पसंद करते हैं। मंगल के कारण आई उत्‍तेजना, अधिकार, उग्रता और द्ढृता इन लोगों को जिंदगी के कई क्षेत्रों में सफल बनाती है। ये अच्‍छे नौकर सिद्ध होते हैं, जब तक कि मालिक इनके साथ ईमानदार रहे। एक बार इन्‍हें नीचा दिखा दिया जाए या धोखा दे दिया जाए तो क्रूरता की हद तक जाकर बदला लेते हैं। कठोर वाणी से शत्रु बनाते हैं। अगर वृश्चिक राशि वाले लोग बोलना सीख लें तो अपने पीछे फॉलोअर्स की अच्‍छी संख्‍या एकत्रित कर सकते हैं। अधिकार की अति भावना के कारण ये चाहते हैं कि परिवार में भी बिना किसी लॉजिक या सवाल जवाब के इनकी बात सुन ली जाए और उस पर अमल हो। घर में कलह का यह सबसे बड़ा कारण बनता है, वरना इन लोगों को शांत और सहज पारिवारिक वातावरण पसंद है। स्त्रियों में वृश्चिक लग्‍न के मामले में तो केएस कृष्‍णामूर्ति ने यहां तक कहा है कि वृश्चिक लग्‍न की स्‍त्री हो और लग्‍न व मंगल अशुभ पीडि़त हो तो ऐसी औरत से विवाह करना अभिशाप है। वृश्चिक लग्‍न के जातकों के लिए रविवार, सोमवार, मंगलवार और गुरुवार सफलता देने वाले हैं। पीला, लाल, नारंगी और क्रीम रंग शुभ है।

अगली कक्षा में हम बात करेंगे धनु और मकर राशियों की...

Encyclopedia of astrological remedies : LALA KITAB

उपायों का विश्‍वकोष : लाल किताब

ज्‍योतिष के मूल रूप से दो भाग हैं। इनमें से एक है सिद्धांत और दूसरा है फलित। सिद्धांत पक्ष में ज्‍योतिष का वह भाग है जो खगोलीय गणनाओं से संबंधित है और इन गणनाओं में से ज्‍योतिष के उपयोग में आने वाली गणनाओं का इस्‍तेमाल किया गया है। जैसे कि आकाश को 360 डिग्री में बांटकर उसका 12 बराबर भागों में विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की गति और ग्रहण जैसी घटनाएं। आकशीय घटनाओं की पुख्‍ता जानकारी मिलने के बाद उनका मानव जीवन पर असर के बारे में अध्‍ययन ज्‍योतिष का फलित हिस्‍सा है। 

             फलित ज्‍योतिष में आकाशीय घटनाओं का मानव जीवन से संबंध जोड़ा गया है। जब ज्‍योतिषी ग्रहों की चाल के आधार पर जातक को भविष्‍य बता देता है तो जातक का अगला सवाल होता है कि ग्रहों की चाल के कारण बन रही खराब स्थितियों से कैसे बचा जाए। इसके लिए फलित ज्‍योतिष में उपायों का विकास हुआ। 

             प्राचीन या वैदिक कही जाने वाली भारतीय फलित ज्‍योतिष में उपचारों के लिए दान, जप और पूजन का प्रावधान दिया गया था। यह कमोबेश ग्रहों की स्थिति के कारण बन रही खराब स्थितियों के लिए प्रायश्चित की तरह था, लेकिन लाल किताब ने उपायों की एक नई सीरीज शुरू की। हालांकि यह पारंपरिक ज्‍योतिष से कुछ हटकर गणनाएं करती है, लेकिन उसके आधार पर बताए गए उपचार इतने अधिक और सटीक हैं कि हमें ग्रहों के कारण बन रही खराब स्थितियों से निपटने के लिए बहुत अधिक संभावनाएं मिल जाती हैं। 

             लाल किताब ज्‍योतिष की ऐसी पुस्‍तक है जो पारंपरिक ज्‍योतिष की तरह कुण्‍डलियों के विश्‍लेषण को दरकिनार कर अपनी पद्धति पेश करती है। इसके अनुसार राशियों की चाल का कोई महत्‍व नहीं है। लग्‍न हमेशा मेष राशि होगी और इसी तरह बारह भावों में बारह राशियां स्थिर कर दी गई हैं। 

             उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न के जातक की कुण्‍डली भी बनाई जाए तो भी लग्‍न मेष ही रहेगा। शेष ग्रह जिस भाव में बैठे हैं उन्‍हीं का इस्‍तेमाल किया जाएगा। ऐसे में कोई ग्रह उच्‍च या नीच का होगा तो भावों में स्थिति की वजह से होगा। इसकी भाषा मूल रूप से उर्दू और हिन्‍दी का मिला जुला रूप है। जो ग्रह खराब प्रभाव वाले हैं उन्‍हें अपने स्‍थान से हटाकर दूसरे स्‍थानों पर ले जाया जा सकता है। 

             अगर सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हकीकत में खगोलीय पिण्‍डों को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर खिसकाना असंभव है, लेकिन लाल किताब कहती है कि ग्रहों को भले ही न खिसकाया जा सकता हो, लेकिन जातक की कुण्‍डली में उसके प्रभाव को बदला जा सकता है। हर ग्रह के प्रभाव को बदलने के लिए लाल किताब ने तय सिद्धांत भी बनाए हैं। मसलन किसी ग्रह को लग्‍न में लाने के लिए उससे संबंधित रत्‍न, धातु अथवा वस्‍तु को गले में पहनना होगा। इससे ग्रह का असर ऐसा होगा कि वह लग्‍न में बैठा है। 

             इसी तरह दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए घर में वस्‍तु स्‍थापित करें, तीसरे भाव के लिए हाथ में, चौथे के लिए बहते पानी में, पांचवे के लिए स्‍कूल में, छठे के लिए कुएं में, सातवें के लिए जमीन में, आठवें के लिए श्‍मशान में, नौंवे के लिए धर्मस्‍थान में, दसवें के लिए सरकारी प्‍लाट या भवन में और बारहवें भाव में किसी वस्‍तु तो पहुंचाने के लिए छत पर संबंधित वस्‍तुओं को रखना होगा। लाल किताब कहती है कि ग्‍यारहवां भाव आय या लाभ का होता है, इस भाव के लिए कोई उपचार नहीं है। उपायों से ग्रहों को अपने पक्‍के या बेहतर लाभ देने वाले भावों में पहुंचाने और खराब प्रभाव देने वाले ग्रहों को हटाने का प्रयास किया जाता है।

मसनुई ग्रह

पारंपरिक ज्‍योतिष के इतर लाल किताब ग्रहों की युति यानी दो या अधिक ग्रहों के एक ही भाव में बैठने को मसनुई ग्रह की उपाधि देती है। इसके अनुसार अगर किसी भाव में दो या इससे अधिक ग्रह बैठे हैं तो उन सभी का प्रभाव किसी अन्‍य ग्रह की तरह होने लगेगा। ग्रहों की युति किसी अन्‍य ग्रह को सहायता भी कर सकती है और उसके प्रभाव को खराब भी कर सकती है। उदाहरण के तौर पर गुरु और सूर्य एक भाव में बैठकर चंद्रमा का प्रभाव पैदा करते हैं, इसी तरह बुध और शुक्र से सूर्य, सूर्य और बुध से मंगल, शुक्र और गुरु से शनि का प्रभाव पैदा होता है। इसी के आधार पर संबंधित ग्रह का उपचार कर दिया जाता है। 

विशिष्‍ट शब्‍दावली

लाल किताब ने न केवल उपायों का पूरा शास्‍त्र रच दिया, बल्कि अपनी विशिष्‍ट शब्‍दावली भी पेश की है। जैसे पक्‍का घर। हर ग्रह का अपना पक्‍का घर होता है। यह वह भाव होता है जहां ग्रह अपने सबसे अच्‍छे प्रभाव के साथ होता है। शक्‍की हालत का ग्रह उसे कहते हैं जो अपने निश्चित भाव को छोड़कर किसी और भाव में बैठा हो। सोया हुआ ग्रह उसे कहते हैं जब कोई ग्रह ऐसे भाव में बैठा हो जिससे सातवें भाव में कोई ग्रह न हो। इसके साथ ही ग्रहों के बलिदान के बारे में भी बताया गया है। 
             इसके अनुसार किसी ग्रह की स्थिति खराब होने पर उससे संबंधित दूसरे ग्रहों का प्रभाव खराब हो जाता है। इस हालत में लाल किताब के अनुसार बलिदान दे रहे ग्रहों का उपचार किए जाने की जरूरत होती है। 

             लाल किताब की भाषा मूलत: उर्दू है और भाषा प्रभाव से लगता है कि सौ या डेढ़ सौ साल पहले इसे पंजाब के किसी प्रांत में विकसित किया गया था। कुछ लोग इसे अरुण संहिता का नाम भी देते हैं, लेकिन इसके वास्‍तविक लेखक का कहीं जिक्र नहीं आता है। इसकी सामान्‍य से अलग भाषा के कारण कई बार लोग इसके कथ्‍य को समझ नहीं पाते हैं और कई गलत अर्थ निकाल लिए जाते हैं। 
             इस कारण लाल किताब के उपचार जहां मूल रूप से लोगों की जिंदगी को आसान बनाने का प्रयास करते नजर आते हैं, वहीं इसकी भाषा से उपजे समान अर्थ लोगों में भय भी पैदा कर देते हैं। इसके बावजूद वर्तमान दौर में उपायों के मामले में लाल किताब का कोई विकल्‍प नहीं है। दान, पूजन और साधना के जरिए दीर्धकाल में मिलने वाले लाभ की तुलना में लोग लाल किताब के तुरत फुरत उपचार करने में अधिक सहज महसूस करते हैं।
STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA

प्रश्‍न कुण्‍डली और फलादेश

कई बार लोगों की उलझन होती है कि हमारा जन्‍म समय या तिथि सही ज्ञात नहीं है। ऐसे में ज्‍योतिष संबंधी फलादेश कैसे किए जाएं। ज्‍योतिष में इसका सटीक जवाब प्रश्‍न कुण्‍डली है। प्रश्न कुण्डली में कार्य भाव और कार्येश की भूमिका अहम होती है। कार्य से यहां अर्थ उस विचार या इच्छा से है जिसके लिये प्रश्न कुण्डली का निर्माण किया गया है। जैसे अगर कोई व्यक्ति यह जानना चाहता है कि क्या वह यात्रा करेगा, तो इस स्थिति में कार्यभाव तृतीय भाव हो गया। कार्येश से अभिप्राय कुण्डली के उस भाव से है, जिससे संबन्धित प्रश्न किया गया है। इस प्रश्न में यात्रा के विषय में कहा गया है तो तृ्तीय भाव का स्वामी कार्येश हो गया। इस प्रकार प्रश्न कुण्डली में कार्य भाव और कार्येश का संबन्ध प्रश्न की सफलता दर्शाता है। सप्तम भाव वह व्यक्ति या विषय वस्तु है, जिससे संबन्धित प्रश्न किया गया है। उस व्यक्ति की स्थिति को समझने के लिये सांतवें घर का विश्लेषण किया जाता है.

प्रश्‍न कुण्‍डली वास्‍तव में समय विशेष की एक कुण्‍डली है जो उस समय बनाई जाती है, जिस समय जातक प्रश्‍न पूछता है। इस कुण्‍डली से जातक के प्रश्‍न का ही भविष्‍य देखने का प्रयास किया जाता है। इस विधि में सवाल कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर तात्‍कालिक समस्‍या ही सवाल होती है। ऐसे में समस्‍या समाधान का जवाब देने के लिए प्रश्‍न कुण्‍डली सर्वाधिक उपयुक्‍त तरीका है। ध्‍यान रखने की बात यह है, कि प्रश्‍न के सामने आते ही उसकी कुण्‍डली बना ली जाए। इससे समय के फेर की समस्‍या नहीं रहती। इसके साथ ही जातक की मूल कुण्‍डली भी मिल जाए और वह प्रश्‍न कुण्‍डली को इको करती हो तो समस्‍या का हल ढूंढना और भी आसान हो जाता है। कई बार जातक जो मूल कुण्‍डली लेकर आता है, वह भी संदेह के घेरे में होती है। ओमेन (संकेतों का विज्ञान) बताता है कि जातक का ज्‍योतिषी के पास आने का समय और जातक की कुण्‍डली दोनों आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली बना लेना फलादेश के सही होने की गारंटी को बढ़ा देता है। पूर्व में जब हाथ से कुण्‍डली बनाई जाती थी, तब हाथों हाथ प्रश्‍न कुण्‍डली बनाना संभव नहीं था, लेकिन वर्तमान दौर में कंम्‍प्‍यूटर और सक्षम सॉफ्टवेयर की मदद से जब हाथों हाथ कुण्‍डलियां बनाई जा रही है, तब ज्‍योतिषी जातक की मूल कुण्‍डली के साथ ही प्रश्‍न कुण्‍डली बना लेते हैं। यह फलादेश के काम को आसान बना देता है।

छद्म प्रश्‍नों की समस्‍या

प्रश्‍न कुण्‍डली के साथ बड़ी समस्‍या है जातक के सवाल का सही नहीं होना। ज्‍योतिष की जिन पुस्‍तकों में प्रश्‍नों के सवाल देने की विधियां दी गई हैं उन्‍हीं में छद्म प्रश्‍नों से बचने के तरीके भी बताए गए हैं। इसका पहला नियम यह है कि ज्‍योतिषी को टैस्‍ट करने के लिए पूछे गए सवालों का जवाब कभी मत दो। ऐसा इसलिए कि ओमेने के सिद्धांत के अनुसार छद्म सवाल का कोई उत्‍तर नहीं होता। जातक का सवाल सही नहीं होने पर प्रश्‍न और कुण्‍डली एक-दूसरे के पूरक नहीं बन पाते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली बनाने के साथ ही ज्‍योतिषी को प्रश्‍न के स्‍वभाव का प्रारंभिक अनुमान भी कर लेना चाहिए। इससे प्रश्‍न में बदलाव की संभावना कम होती है।

कमोबेश एक जैसे सवाल

ज्‍योतिष कार्यालय चलाने वाले लोग जानते हैं कि एक दिन में एक ही प्रकार की समस्‍याओं वाले लोग अधिक आते हैं। इसका कारण यह है कि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति होती है उससे पीडि़त होने वाले लोगों का स्‍वभाव भी एक जैसा ही होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि समान राशि या कुण्‍डली वाले लोगों को एक जैसी समस्‍याएं होगी बल्कि ग्रह योगों की समान स्थिति से समान स्‍वभाव की समस्‍याएं सामने आएंगी। मेरा अनुभव बताता है कि जिस दिन गोचर में चंद्रमा और शनि की युति होगी, तो उस दिन मानसिक समस्‍याओं से घिरे लोग अधिक आएंगे। हां, मानसिक समस्‍याओं का प्रकार लग्‍न और अन्‍य ग्रहों के कारण बदल जाता। कोई सिजोफ्रीनिया से पीडि़त हो सकता है तो कोई क्रोनिक डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। किसी को दिमागी सुस्‍ती की समस्‍या हो सकती है तो कोई साइको-सोमेटिक डिजीज से ग्रस्‍त हो सकता है। इस तरह प्रश्‍न कुण्‍डली से एक ओर जातक का विश्‍लेषण आसान हो जाता है तो दूसरी ओर भूतकाल स्‍पष्‍ट करने के बजाय भविष्‍य कथन में अधिक ध्‍यान लगाया जा सकता है।

जन्म समय की समस्‍या का समाधान

पिछले कुछ सालों में अस्‍पतालों में शिशु जन्‍म की स्थितियां बढ़ने के कारण जन्‍म समय कमोबेश सही मिलने लगे हैं। पर अब भी जन्‍म समय को लेकर कई तरह की उलझनें बनी हुई है। आमतौर पर शिशु के गर्भ से बाहर आने को ही जन्‍म समय माना जाता है। इसके अलावा माता से नाल के कटने या पहली सांस लेने का भी जन्‍म समय लेने के मत ज्‍योतिष में देखने को मिलते हैं। सही जन्‍म समय को लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली ऐसा जवाब है जिससे जन्‍म तिथि और जन्‍म समय के बिना फलादेश किया जा सकता है। सामान्यता: प्रश्न कुण्डली की आयु वार्षिक मानी गई है। प्रश्न कुण्डली में लग्न समय निश्चित होता है। प्रश्न कर्ता की चिन्ताओं की जानकारी चन्द्रमा से देखी जा सकती है। प्रश्न कुण्डली में लग्न भाव में बली चन्द्र की स्थिति निवास चिन्ता, दूसरे भाव में धन, तीसरे भाव में घर से दूर रहने की चिन्ता, चौथे भाव में मकान/ पानी से संबधित परेशानी, पांचवे भाव में संतान, छठे भाव में ऋण, सांतवेंभाव में विवाह या साझेदारी, आंठवें भाव में पैतृक संम्पति में या अप्रयाशित लाभ, नवम भाव में चन्द्र लम्बी दूरी की यात्रा, दशम भाव में आजीविका, एकादश भाव में आय वृ्द्धि / पदोन्नति, द्वादश भाव में बली चन्द्र विदेश यात्रा से जुडी चिन्ताएं होने का संकेत देता है.

प्रश्‍न कुण्‍डली के फायदे

- जन्‍म समय का फेर नहीं होता

- अगर आपको पास सॉफ्टवेयर है तो यह हाथों-हाथ तैयार हो जाती है

- सही सवालों के जवाब स्‍पष्‍ट मिलते सकते हैं

- हर तरह के सवाल का जवाब दिया जा सकता है, बशर्ते सवाल सही हो।

- जिन लोगों को जन्‍म समय नहीं हैं, उनके अलावा जिन लोगों की गलत कुण्‍डली बनी हुई है वे भी अपनी चिंताओं का सही जवाब ले सकते हैं।

- भविष्‍य कथन के बजाय मौजूदा समस्‍याओं से संबंधित कई सवालों के सटीक जवाब मिलते हैं

- पूर्ण भविष्‍य कथन के बजाय ऐसे सवाल जिनके हां या ना में उत्‍तर होते हैं उनके अपेक्षाकृत सटीक जवाब मिलते हैं।

शुक्रवार, जून 24, 2011

ज्‍योतिष की कक्षा : छठा दिन

ज्‍योतिष की कक्षा में हम राशियों का परिचय प्राप्‍त कर रहे हैं। पूर्व के लेखों में हम मेष, वृष, मिथुन और कर्क राशियों पर चर्चा कर चुके हैं। इस कक्षा में हम बात करेंगे सिंह और कन्‍या राशि की। अब तक जिन पाठकों ने फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी पुस्‍तक का हिन्‍दी अनुवाद ज्‍योतिष के आधारभूत सिद्धांत खरीद ली है, वे मेरे इन लेखों के साथ तेजी से आगे बढ़ सकते हैं और जो पाठक केवल इन लेखों के भरोसे हैं, उन्‍हें केवल राशियों का फौरी परिचय ही मिल सकेगा। सालने वाली बात यह है कि हर लेख में इक्‍का दुक्‍का कमेंट और पांच सात मेल के अलावा पाठकों का रुझान नहीं मिल पा रहा है। एक ओर जहां ज्‍योतिष से संबंधित भ्रांतियों को दूर करने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जाती है वहीं इस विषय को विषय के तौर पर पढ़ने और समझने वाले लोगों की कमी खलती है। मैं अब देरी से आए पाठकों से भी आग्रह करूंगा कि वे पूर्व में बताई गई पुस्‍तकों को शीघ्र खरीदें और अठारह लेखों की इस शृंखला के दौरान अधिक से अधिक सवाल जवाब तक सीखने का प्रयत्‍न करें। एक बात और पिछले लेखों में एक दो लोगों ने जिसासा प्रकट की थी कि राशियों का प्रभाव लग्‍न से देखा जाए या चंद्रमा से। इस बारे में मैं बहुत पहले बता चुका हूं, यहां पुनरावृत्ति कर देता हूं कि लग्‍न और राशि में से जो अधिक प्रबल होगा उसी राशि का प्रभाव जातक पर अधिक दिखाई देगा।

जंगलों और वीराने में घूमते ‘सिंह’

Animals-0010सिंह राशि से प्रभावित जातकों की यह सबसे बड़ी विशेषता होती है। इस राशि पर सूर्य का प्रभाव है। अग्नि तत्‍व की यह राशि शुष्‍क, पुरुष, धनात्‍मक और स्थिर है। चंद्र, मंगल और गुरु सूर्य के मित्र होने के नाते सिंह में आने पर मित्रक्षेत्री होते हैं और शनि, शुक्र और बुध शत्रुक्षेत्री। सिंह राशि के जातकों की हड्डियां उन्‍नत होती हैं, कंधे और माथा चौड़े होते हैं। ये जातक बैठे हुए ठिगने दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि इनका धड़ छोटा और टांगें लम्‍बी होती हैं। जब ये उठकर खड़े होते हैं और औसत से अधिक कद के होते हैं। जिन जातकों की कुण्‍डली में सूर्य और गुरु की अच्‍छी युति होती है वे परपीड़ा को समझने में कामयाब होते हैं। चिकित्‍सकों और बेहतर प्रशासकों की कुण्‍डली में यह योग प्रमुखता से दिखाई देता है। सूर्य का प्रभाव होने से जातक अपने आध्‍यात्मिक उत्‍थान का अपने स्‍तर पर प्रयास करते हैं। इसी कारण सिंह राशि वाले जातक जंगलों या वीराने अथवा पहाड़ों में अकेले घूमते हुए देखे जा सकते हैं। इनका संगीत, नाटक और खेल से लगाव होता है। ये स्‍पष्‍ट वक्‍ता, उन्‍मुक्‍त और निष्‍पक्ष होते हैं। न क्षुद्र व्‍यवहार करते हैं और न दूसरों का ऐसा व्‍यवहार बर्दाश्‍त कर पाते हैं। इसी कारण समूह में इनकी भूमिका सदैव नेतृत्‍व की ही रहती है। ये सामान्‍यता उच्‍च पद अथवा समाज में ऊंचा दर्जा पाने का प्रयास करते नजर आते हैं। इनके लिए साख ही सबकुछ है इसलिए साख बढ़ाने के लिए निरन्‍तर प्रयत्‍नशील रहते हैं। इनके लिए रविवार का दिन शुभ है, सोमवार को धन का व्‍यय होता है और मंगलवार को बड़ी सफलताएं प्राप्‍त करते हैं। बुधवार को भाग्‍य साथ देता है। शनिवार को धोखा खाते हैं। शुभ रंग नारंगी है और शुभ अंक एक। माणिक और पन्‍ना पहनने से भाग्‍य में बढ़ोतरी होती है।

अत्‍यधिक विश्‍लेषण से परेशान करने वाले कन्‍या जातक

ganesh jiआपको भी कभी न कभी ऐसे व्‍यक्ति मिले होंगे जो छोटी सी बात को बहुत अधिक विस्‍तार से समझते और समझाते हैं। एक बार गलती से भी इन लोगों को सामान्‍य बात का विश्‍लेषण पूछ लिया जाए तो घंटों तक उस तथ्‍य की चीरफाड़ करते रहते हैं। ये कन्‍या जातक के लोग हैं। कन्‍या राशि का स्‍वामित्‍व बुध के पास है। यहीं पर बुध उच्‍च का भी होता है। सो ये लोग किसी न किसी रूप में फायनेंस, पब्लिकेशन या अन्‍य पढ़ने लिखने के काम से जुड़े हुए होते हैं। अपने प्रोफेशन में भले ही अपनी विश्‍लेषण क्षमता के कारण ये लोग पूछे जाते हों, लेकिन सामाजिक तौर पर इनकी स्थिति एक समय बाद यह हो जाती है कि लोग बात करने से कतराने लगते हैं। अगर कन्‍या जातक खुद पर कंट्रोल रखना सीख लें तो इनके आकर्षक और सम्‍मोहित करने वाला जातक ढूंढना मुश्किल है। ये लोग दिमाग अधिक काम में लेते हैं सो शरीर का इस्‍तेमाल कम से कम करने का प्रयास करते हैं। इन्‍हें आराम की अवस्‍था पसंद है। बुध के पूरे प्रभाव के चलते ये  लोग नए कपड़े भी पहने तो वे मैले जैसे दिखाई देंगे। बुध का प्रभाव लग्‍न पर अधिक हुआ तो दांत भी गंदे दिखाई देंगे। यहां बुध उच्‍च और शुक्र नीच होता है। यानि सांसारिक साधनों से अधिक इन लोगों को ज्ञान की परवाह होती है। जातक लम्‍बा, पतला, आंखें काली, भौंहें झुकी हुई, आवाज पतली और कर्कश होती है। हमेशा तेज चलते हैं और अपनी उम्र से कम के दिखाई देते हैं। ये लोग लेखा कार्यों में होशियार होते हैं और अपनी नौकरी लाभ के अवसर के अनुसार लगातार बदलते रहते हैं। कार्यों को इतनी अधिक सावधानी से करते हैं कि हर काम में पुनरावृत्ति तक करने को तैयार रहते हैं। ताला बंद करेंगे तो  दो बार चेक करेंगे। पत्र लिखेंगे तो गीले गोंद लगे पत्र को फिर से खोलकर पढ़ेंगे। इन लोगों को अपने स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर वार्तालाप करना पसंद होता है। इतना अधिक कि छोटी सी बीमारी को लेकर घंटों और दिनों तक बातें कर सकते हैं। उसके हर एक पहलु पर इतना विस्‍तार से वर्णन करते हैं कि सुनने वाला ही भाग खड़ा हो। व्‍यावसायिक प्रवृत्ति के कारण धन के प्रति सावधान होते हैं। इन लोगों को किसी भी ट्रस्‍ट या संस्‍थान में कोषाध्‍यक्ष बनाया जा सकता है। इनके लिए शुभ रंग हरा और शुभ दिन बुधवार होता है। भाग्‍य को बढ़ाने के लिए इन लोगों को पन्‍ना, मोती और हीरा पहनना चाहिए।

राशियों का मूल स्‍वभाव है यह

मैंने राशि के जो गुण बताए हैं वे लग्‍न अथवा चंद्रमा होने पर प्रकट होते दिखाई देते हैं। अन्‍यथा राशि जिस भाव में होगी वैसे ही भाव के गुणों में परिवर्तन आएगा। यहां राशि के मूल स्‍वभाव दिए जा रहे हैं। क्रूर अथवा सौम्‍य राशियों का प्रभाव होने अथवा केन्‍द्र व त्रिकोण जैसे भावों में होने पर इनमें कुछ अंतर भी आता है। उनकी गणना अलग से की जाएगी। पहले राशि से परिचय हो जाए। फिर ग्रहों और भावों के परिचय होने के बाद सम्‍पूर्ण कुण्‍डली का समग्र विश्‍लेषण किया जाएगा। तब तक पाठक राशियों के मूल स्‍वभाव से ही परिचित हों। कहीं-कहीं हो सकता है कि पाठकों को अपने गुण मिलते हुए लगें, लेकिन ये अपना पूरा प्रभाव अपनी दशा अथवा अंतरदशा में देते हैं, भले ही मूल स्‍वभाव इससे इतर हो।

अगली कक्षा में हम बात करेंगे तुला और वृश्चिक राशियों की...

गुरुवार, मार्च 11, 2010

लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

लाल किताब प्राचीन नहीं है, जैसा कि लाल किताब के बहुत से विज्ञापनों में लिखा गया होता है 'असली प्राचीन लाल किताब।' बल्कि यह मध्‍ययुगीन है। मेरी जानकारी के अनुसार यवनों के भारत में प्रवेश के बाद भारत और पाकिस्‍तान के पंजाब वाले क्षेत्रों में इस ज्‍योतिष का तेजी से विकास हुआ। अनुमान लगा सकता हूं कि कोई छोटा ग्रुप रहा होगा, जिन्‍होंने मिलकर परम्‍परागत भारतीय ज्‍योतिष में शाबरी मंत्रों जैसे प्रयोग किए और ऐसे लोकरंजन के उपाय निकाल लिए जो अपनाने में आसान और कारगर हों।
लाल किताब के प्राचीन नहीं होने से इसकी महत्‍ता कम नहीं हो जाती। वर्तमान दौर में उपायों के लिए अगर कोई पुस्‍तक मदद करती है तो वह है लाल किताब, इसके अलावा पटियाला और चंडीगढ़ के कुछ लोगों ने, अगर सही कहूं तो एक युवा ज्‍योतिषी ने सुनहरी किताब भी प्रकाशित की। वह युवा बहुत कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गया लेकिन जो सुनहरी किताब लिखकर गया है, वह लाल किताब को भी पीछे छोड़ती है,
लेकिन अभी बात उपचारों की
आप किसी भी पुराने ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए। उसमें ग्रहों की गड़बड़ पर शांति के उपचार बताए गए हैं। दान, भेंट, पूजा, यज्ञ अथवा मंत्रोच्‍चार से समस्‍याओं का समाधान  पाया जा सकता है। फौरी तौर पर चंद्र राशियों के आधार पर ग्रहों के रत्‍नों की जानकारी भी कहीं-कहीं मिल जाती है, लेकिन वह भी ग्रह शांति उपचारों से ही संबंधित है।
उपचारों का बिंदू आने के साथ ही मेरे दिमाग में सबसे पहले लाल किताब आती है। इसके दो कारण हैं। पहला कि इस किताब में उपचारों की इतनी लम्‍बी रेंज दी गई है कि एक उपचार नहीं कर सको तो दूसरा कर लो, दूसरा नहीं तो तीसरा, इसी तर्ज पर लिखी गई सुनहरी किताब तो उपचारों की पूरी लिस्‍ट ही थमा देती है। अपनी इच्‍छा के अनुसार उपचार चुनो और कर लो। दूसरा कारण है कि मेरे गुरूजी ने मुझे बताया कि लाल किताब के उपचार तांत्रिक विधियों पर आधारित है। जातक जैनुइन है तो उसे लाल किताब का ही उपचार बताओ, जातक की जितनी अधिक आस्‍था होगी, उपचार उतनी ही तेजी से काम करेगा।
वर्तमान दौर में लोगों को प्रसव पीड़ा भोगने की बजाय लोगों को सिजेरियन ऑपरेशन अधिक सहज लगता है। इसलिए उन्‍हें वही दो, जो वे मांगते हैं। यह बात मुझे शुरूआती दौर में ही महसूस होने लगी थी। किसी को कोई उपचार बताओ और कहो कि पांच साल बाद सब‍कुछ दुरुस्‍त हो जाएगा तो, या तो वह ज्‍योतिषी को दिमागी रूप से दिवालिया समझेगा, वरना अपनी समस्‍याओं की लिस्‍ट बताकर तात्‍कालिक स्थितियों से तत्‍काल छुटकारा दिलाने की गुहार लगाएगा।
रत्‍नों की सीरीज में यह लाल किताब कहां घुस गई
हां, अभी तो रत्‍नों पर लगातार लिख रहा हूं, इस बीच यह लाल किताब कहां से घुस आई। जैसा कि मैंने अपने पुराने लेखों में लिखा है ज्‍योतिष की एक विधा में दूसरी विधा का घालमेल इतनी आसानी से होता है कि दोनों विधाओं के लिंक मिले जुले नजर आने लगते हैं। रत्‍नों से उपचार में एक ओर जहां हस्‍तरेखा शास्‍त्र घुसा हुआ है वहीं दूसरी ओर लाल किताब भी घुस चुकी है। लाल किताब का सूत्र है कि जो ग्रह किसी स्‍थान पर बैठकर खराब फल दे रहा हो उसे वहां से हटाकर दूसरी जगह पहुंचा दो। यह इतना आसान है, गुरू जैसे बड़े ग्रह को बिना उसके बारह चंद्रमा को छेड़े उठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंचा दिया जाता है। यह ऐसे ही नहीं हो जाता है। इसके लिए कुछ नियम हैं। उसकी बात बाद में...


लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह से संबंधित वस्‍तुओं को
- प्रथम भाव में पहुंचाना हो उसे गले में पहनिए
- दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए मंदिर में रखिए
- तीसरे भाव में पहुंचाने के लिए संबंधित वस्‍तु को हाथ में धारण करें
- चौथे भाव में पहुंचाने के लिए पानी में बहाएं
- पांचवे भाव के लिए स्‍कूल में पहुंचाएं,
- छठे भाव में पहुंचाने के लिए कुएं में डालें
- सातवें भाव के लिए धरती में दबाएं
- आठवें भाव के लिए श्‍मशान में दबाएं
- नौंवे भाव के लिए मंदिर में दें
- दसवें भाव के लिए पिता या सरकारी भवन को दें
- ग्‍यारहवें भाव का उपाय नहीं
और बारहवें भाव के लिए ग्रह से संबंधित चीजें छत पर रखें।

हां, तो यह हुआ लाल किताब का हिसाब किताब।
अब बात मेरे एक अनुभव की। मैं एक जातक को परम्‍परागत पंडितजी के पास लेकर गया। उन्‍हें कुण्‍डली दिखाई। जातक कन्‍या लग्‍न का था। पंडितजी ने कहा चंद्रमा खराब है, इसे मोती पहनाना पड़ेगा। मैंने कहा ठीक है मैं अंगूठी बनवाने के लिए बोल देता हूं, तो पंडितजी ने मना कर दिया। कहां कि कन्‍या लग्‍न के जातक को लॉकेट में ही चंद्रमा बनवाकर पहनना होगा। क्‍यों... पंडितजी से पूछा नहीं...
मैं बताता हूं इसका कारण
लाल किताब के अनुसार चंद्रमा की अंगूठी बनाकर पहनने से चंद्रमा चला जाएगा तीसरे घर में, यानि वृश्चिक राशि में, इससे चंद्रमा नीच का हो जाएगा। अब एक तरफ लाल किताब राशियों को मानती ही नहीं है। वह हर कुण्‍डली को मेष लग्‍न की कुण्‍डली मानती है और हर घर को तयशुदा राशियां दे रखी हैं। ऐसे में परम्‍परागत ज्‍योतिष और लाल किताब का घालमेल रत्‍न को पहनने में एक और बाधा बन गया। परम्‍परागत ज्‍योतिष ने तो बस इतना कहा कि चंद्रमा के उपचार के लिए मोती पहनाना चाहिए, लेकिन लाल किताब बता रही है कि हाथ में नहीं गले में पहनो...
अब जिन लोगों ने मेरे पिछले लेख पढ़े हैं वे समझ रहे होंगे कि रत्‍न केवल टच करने या किरणों से ही उपचार नहीं करते बल्कि कैसे पहने हैं इससे भी फर्क पड़ता है। तो इस तरह किसी एक रत्‍न को पहनने के लिए मेरे पास तीन अलग-अलग आधार हो गए, जो कभी भी किसी भी स्थिति में एक-दूसरे का निषेध कर सकते हैं। कब और कैसे करेंगे यह तय नहीं है।
अगली पोस्‍ट में मैं चर्चा करूंगा कि इन सब बाधाओं के बावजूद रत्‍न क्‍यों पहनाया जाता है, क्‍या इसे पहनाए बिना काम नहीं चल सकता...

इंतजार कीजिए अगली कड़ी का...

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

क्‍या हो ज्‍योतिषी की भूमिका ?

यह सवाल कमोबेश हर ज्‍योतिष सीखने वाले विद्यार्थी के समक्ष आती है। कभी अध्‍ययन की शुरूआत में तो कभी अध्‍ययन के दौरान तो कभी ज्‍योतिष से उकता जाने के बाद। बहुत से लोग ज्‍योतिष सीखना शुरू करते हैं। कुछेक फलादेश देते हैं और इसके बाद इस विषय को इसी कारण छोड़ देते हैं कि वे अपनी भूमिका तय नहीं कर पाते हैं। हालांकि बाजार में कुछ ऐसे ज्‍योतिषी भी हैं जो कमोबेश तांत्रिक की भूमिका निबाहते हैं। मैंने उनके मुंह से अपने जातक को यह तक कहते सुना है आप कहें तो आपके विरोधी का पेशाब बंद कर दूं। आप कहें तो सोते को खड़ा कर दूं। कुछ इसी तरह के जोश दिला देने वाले वाक्‍य सुनकर जातक हैरान रह जाता है। विरोधी का कुछ हो न हो जातक का पेशाब तो बंद हो ही जाता है। वह उपचार करने और फीस देने के लिए तैयार नजर आने लगता है। कई चक्‍कर निकालने के बाद भले ही जातक का मोहभंग हो जाए लेकिन एक समय के लिए तो वह जैसे ज्‍योतिषी का अनुयायी बन जाता है। ज्‍योतिषी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक जातक छूटे या बंधा रहे, क्‍योंकि उसके पास तो पूरी कतार होती है मूर्ख बनने वालों की। प्रोफेशनली ज्‍योतिष का व्‍यवसाय करने के दौरान मेरे सामने यह सवाल आया था कि क्‍या है ज्‍योतिषी की भूमिका और कहां तक वह जातक की जिन्‍दगी में दखल कर सकता है। वह कैसे उपचार बता सकता है जो उसकी जिन्‍दगी में सुधार लाए या सोते को खड़ा कर दे। मैंने कालान्‍तर में कई वरिष्‍ठ ज्‍योतिषियों और अपने साथियों से बात भी की। कुछ लोगों के दिमाग में स्‍पष्‍ट धारणा थी तो कई ने वैसे ही जवाब दिए जो वे अपने जातकों को देते थे। वास्‍तव में अधिकांश ज्‍योतिषी यह नहीं जानते कि उनकी भूमिका क्‍या है। जैसे एक चिकित्‍सक के पास जाते हैं और उसे रोग बताते हैं तो वह उपचार लिखकर दे देता है। अब रोगी पर निर्भर करता है कि वह कितनी गंभीरता से दवाएं लेता है, परहेज रखता है और बीमार करने वाली परिस्थितियों से दूर रहता है। चिकित्‍सक रोगी का रोग खुद नहीं ले सकता है। इसके उलट जो ज्‍योतिषी एक तरह से दावा करते हैं कि वे जातक का दुख दूर कर देंगे हो सका तो उनका दुख भी खुद ले लेंगे। यह मुझे इस परा विद्या के मामले में अतिरेक लगता है। हालांकि कई ज्‍योतिषियों ने यह तो बताया है कि एक आदर्श ज्‍योतिषी कैसा होना चाहिए, उसकी कुण्‍डली में क्‍या योग होने चाहिए या साइकोलॉजिकली वह कितना स्‍ट्रांग होना चाहिए। लेकिन ज्‍योतिषी और जातक के इंटरएक्‍शन में ज्‍योतिषी की क्‍या भूमिका होनी चाहिए इस पर अधिक नहीं दिया गया है। जैसा कि मुझे लगता है प्राचीन भारतीय मान्‍यता की तुलना में फलित ज्‍योतिष अपेक्षाकृत नया विषय है। ऐसे में ज्‍योतिषी की भूमिका के लिए नया प्रोटोकॉल ज्‍योतिषियों को ही बनाना पड़ेगा। वैसे एक जगह दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णा‍मूर्ति ने एक जगह स्‍पष्‍ट किया है कि ज्‍योतिषी की क्‍या भ‍ूमिका हो सकती है। वे बताते हैं कि गहरी झील में नाव खे रहा जातक जब थक जाता है तो पास से गुजरता हुआ ज्‍योतिषी उसे यह संकेत दे सकता है कि कहां पानी उथला है और कितनी देर तक और उसे नाव खेनी पड़ेगी। यह बहुत स्‍थूल उदाहरण हुआ लेकिन इससे बहुत कुछ संकेत मिल जाते हैं। मेरा प्रबुद्ध ज्‍योतिषियों से आग्रह है कि वे इस विषय पर अपने विचार पेश करें…… यथा

संगीता पुरी जी ने कहा ….

…जहां तक मेरा मानना है कि एक ज्योतिषी को मानवतावादी होना चाहिए….कोई व्यक्ति उसके पास खुद की परेशानी लेकर आता है…..उसे मनोवैज्ञानिक तौर पर सम्बल प्रदान करना एक ज्योतिषी का काम है…..पर वह ऐसा न करे कि उसके विरोधियों की तकलीफ बढ जाए….वैसे तो एक ज्योतिषी के हाथ में यह सब होता ही नही ….हम जातको के सम्मुख सिर्फ लाल और हरी बत्ती दिखा सकते हैं…..हमारा काम लोगों को यह समझाना है कि उसे अपने कर्तब्यों का फल पूर्ण तौर पर कब से मिलने लगेगा।