नेप्च्यून (Naptune) को एक राशिचक्र (Cycle) पूरा करने में तकरीबन 164 साल का समय लगता है। एक सामान्य व्यक्ति को इतनी लंबी अवधि तक जिंदा नहीं रहता है। दूसरी बात यह भी है कि कोई एक ज्योतिषी नेप्च्यून के प्रभावों का अध्ययन करने जितना भी नहीं जी सकता। ऐसे में प्राचीन घटनाओं, महापुरुषों की जीवनियों और इतिहास के साक्ष्यों को नेप्च्यून के गोचर के साथ मिलाकर अध्ययन कर कुछ निष्कर्ष निकाले गए हैं। रहस्य के मालिक इस ग्रह के विभिन्न भावों में प्रभावों के बारे में कई जगह बताया गया है। नेप्च्यून के अधिकार की राशि गुरु की दूसरी और भचक्र की आखिरी राशि मीन दी गई है। इसी के साथ बारहवां भाव भी नेप्च्यून का प्रिय भाव बताया गया है। इस नए नवेले और धीमे चलने वाले ग्रह के बारे में कुछ पश्चिमी पुस्तकों से मिली जानकारी को संक्षेप में यहां पेश करने का प्रयास कर रहा हूं। इसी के साथ कुण्डलियों पर इस ग्रह के स्थाई प्रभाव के बारे में अध्ययन जारी है। इसे master of disguise भी कहा जाता है।
बुधवार, फ़रवरी 08, 2012
Naptune cycle in houses
नेप्च्यून (Naptune) को एक राशिचक्र (Cycle) पूरा करने में तकरीबन 164 साल का समय लगता है। एक सामान्य व्यक्ति को इतनी लंबी अवधि तक जिंदा नहीं रहता है। दूसरी बात यह भी है कि कोई एक ज्योतिषी नेप्च्यून के प्रभावों का अध्ययन करने जितना भी नहीं जी सकता। ऐसे में प्राचीन घटनाओं, महापुरुषों की जीवनियों और इतिहास के साक्ष्यों को नेप्च्यून के गोचर के साथ मिलाकर अध्ययन कर कुछ निष्कर्ष निकाले गए हैं। रहस्य के मालिक इस ग्रह के विभिन्न भावों में प्रभावों के बारे में कई जगह बताया गया है। नेप्च्यून के अधिकार की राशि गुरु की दूसरी और भचक्र की आखिरी राशि मीन दी गई है। इसी के साथ बारहवां भाव भी नेप्च्यून का प्रिय भाव बताया गया है। इस नए नवेले और धीमे चलने वाले ग्रह के बारे में कुछ पश्चिमी पुस्तकों से मिली जानकारी को संक्षेप में यहां पेश करने का प्रयास कर रहा हूं। इसी के साथ कुण्डलियों पर इस ग्रह के स्थाई प्रभाव के बारे में अध्ययन जारी है। इसे master of disguise भी कहा जाता है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
बुधवार, अक्टूबर 19, 2011
आपका खुद का विजयोत्सव
गुणपूजक भारतीय मान्यता में गुणों की ही विजय हुई है और अवगुणों का नाश हुआ है। राम द्वारा रावण का वध और कृष्ण द्वारा कंस का वध जैसे उदाहरण भी भारतीय मान्यता में मिलते हैं, लेकिन तब भी हमें केवल यही संकेत दिया जाता है कि धर्म की अधर्म पर या असत्य पर सत्य की विजय हुई है, न कि किसी एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर। बुराई को खत्म करने का प्रयास किया जाता है न कि बुरे व्यक्ति को। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने जब अर्जुन को मित्रों और शत्रुओं का ज्ञान दिया तो उसकी एक टीका यह भी है कि कौरव और पाण्डव हमारे भीतर के अच्छाई और बुराई के प्रतीक हैं और हम अपनी इच्छाशक्ति से ही अच्छाई का पोषण कर बुराई को खत्म कर सकते हैं। इसके लिए किसी प्रकार की आसक्ति या विरक्ति के भाव को आड़े नहीं आने देना चाहिए।
ज्योतिष के दृष्टिकोण से विजय को लाभ और आत्मोन्नति से जोड़कर देखा जाता है। कुण्डली का छठा भाव शत्रुओं का और बारहवां भाव हानि का बताया गया है। किसी कार्य में विजय के लिए हमारे भीतर की ताकत पर्याप्त होनी चाहिए, यह लग्न से देखी जाएगी। हमारे भीतर का साहस तीसरे भाव से देखा जाएगा और हमारी प्राप्त करने की इच्छाशक्ति ग्यारहवें भाव से देखी जाएगी। इसके साथ ही कुण्डली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होनी चाहिए। किसी कार्य को शुरू करने में हमें पहले उसका सपना देखना होगा। इसके लिए चंद्रमा हमारा सहयोग करता है। इसके बाद कार्य को शुरू करने का निश्चय करने के लिए लग्न हमारी मदद करता है। तीसरा भाव में हमें आगे बढ़ने का साहस देता है और ग्यारहवां भाव हमारे इच्छित साधन की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। ये सभी कार्यों में सफलता या विफलता हमारे दसवें भाव यानी कर्म पर आधारित होती है। इनमें से किसी भी एक भाव के पर्याप्त सुदृढ़ नहीं होने की स्थिति में हमें कई बार विफलता भी झेलनी पड़ती है। चंद्रमा कमजोर होने पर हमारी कल्पना और सोचने की शक्ति हमारा साथ नहीं देती, लग्न कमजोर होने पर कार्य शुरू करने का निर्णय नहीं जुटा पाते, तीसरा भाव कमजोर होने पर हम निर्णय लेने के बाद भी कार्य संपादन शुरू नहीं कर पाते, दसवां भाव कमजोर होने पर हमारे प्रयासों में कमी रहती है और ग्यारहवां भाव कमजोर होने पर हम इच्छित फल प्राप्त करने से वंचित रह सकते हैं। हालांकि लाभ-हानि, यश-अपयश और जय-पराजय छह ऐसे विषय हैं जिनका अंतिम निर्णय ईश्वर ने अपने पास सुरक्षित रखा है, लेकिन लग्न से दसवें भाव तक के कार्य हमारे हाथ में है। इस बीच हमारी समस्याएं, चिंताएं और शत्रु हमारे कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं।
छठे भाव से आती है समस्याएं
कार्य को संपादित करने के दौरान हमारे समक्ष कई बार समस्याएं भी आती हैं। इन समस्याओं को कुण्डली के छठे भाव से देखा जाता है। कुंडली के छठे घर के बलवान होने से तथा किसी विशेष शुभ ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में अधिकतर समय अपने शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है। उसके शत्रु अथवा प्रतिद्वंदी उसे कोई विशेष नुकसान पहुंचाने में आम तौर पर सक्षम नहीं होते। कुंडली के छठे घर के बलहीन होने से अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में बार-बार शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों के द्वारा नुकसान उठाता है तथा ऐसे व्यक्ति के शत्रु आम तौर पर बहुत ताकतवर होते हैं। कुल मिलाकर हमारी जो कमजोरियां हैं, वे सभी छठे भाव से देखी जाएंगी और इसी घर से आठवें भाव यानी लग्न से हम अपनी क्षमताओं, विशेषताओं, अंदरूनी ताकत के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। अगर किसी जातक का लग्न बहुत अधिक शक्तिशाली हो तो हम किसी भी स्तर के शत्रुओं से मुकाबला कर सकते हैं।
लग्न के अनुसार शत्रु
हर लग्न की अपनी खासियत और कमियां होती हैं। मेष लग्न के जातक उग्र होते हैं और एक ही बार में कार्य का संपादन पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। एक ही कार्य को बार बार नहीं कर पाने की बाध्यता उनकी कमजोरी है। इसे हम कुण्डली में भी देख सकते हैं कि मेष लग्न में रिपु भाव का अधिपति बुध है। इसी प्रकार वृष लग्न के जातक कुछ विलासी और आरामपसंद होते हैं। यही उनके लग्न की विशेषता है और यही उनकी कमजोरी भी। हम देखते हैं कि वृष लग्न में शुक्र ही शत्रु भाव का अधिपति है। मिथुन लग्न के जातकों की खासियत समस्या को हल्के में लेने और जिंदगी को सामान्य ढंग से लेने में है। मेष लग्न में कठिन परिस्थितियों से लड़ना सिखाने वाला मंगल शत्रु भाव का अधिपति है। कर्क राशि जलतत्वीय राशि है और एक विचार पर अधिक देर तक काम नहीं कर सकने वालों की है। कर्क लग्न के लिए गुरु जो कतिपय अधिक स्थिर और दुनिया को साथ लेकर चलने वाला ग्रह है शत्रु भाव का अधिपति बनता है। सिंह राशि के जातक स्वभाव से तेज और गर्वीले होते हैं। सिंह के शत्रु भाव का अधिपति शनि है जो धीमा चलता है और बहुत अधिक सोच विचार कर अपना निर्णय करता है। कन्या राशि के लोग बहुत अधिक बोलने वाले और आवश्यकता से अधिक विश्लेषण करने वाले होते हैं। इस लग्न के अधिपति को भी शनि जैसा न्यायप्रिय शत्रु मिलता है। धनु लग्न के जातक सौम्य और पढ़े लिखे दिखाई देते हैं और सादगी से जिंदगी जीने का प्रयास करते हैं। इनके शत्रुओं के रूप में हम शुक्र से चलित लोगों को देख सकते हैं। मकर राशि के लोग अपेक्षाकृत दढ़ और धीमे होते हैं। अपनी जबान पर कायम नहीं रह सकने वाले बुध के लोग इस लग्न के शत्रु होते हैं। कुंभ राशि के जातक एक ही काम में दीर्ध अवधि तक लगे रहने वाले और दृढ़ होते हैं, इनका शत्रु चंद्रमा होता है जो किसी एक काम में अधिक लंबे समय तक नहीं टिकता। मीन राशि को जातक अपेक्षाकृत सादी जिंदगी जीने वाले होते हैं, इनके शत्रु भाव का स्वामी सूर्य है। इस तरह हम देखते हैं कि हर लग्न की अपनी खासियत होती है, इसी के संदर्भ में उनके शत्रुओं की भी अपनी प्रकृति होती है। अगर एक जातक अपनी नैसर्गिक प्रकृति को मजबूत करता रहे तो शत्रु की प्रकृति अपने आप कमजोर होती जाएगी।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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मंगलवार, जून 28, 2011
ज्योतिष के बदलते आयाम
दूसरी ओर ज्योतिष के प्रति लोगों के बढ़ रहे रुझान के साथ मीडिया और कुछ ज्योतिष संस्थानों ने ऐसे भ्रम फैलाए हैं कि लोगों को लगता है कि जिंदगी के हर क्षेत्र में ज्योतिष का दखल है। हकीकत में जीवन में होने वाली हर घटना की समीक्षा और गणना ज्योतिष के जरिए की जा सकती है, लेकिन न तो ज्योतिषियों के पास इतना समय है और न ही जातकों के पास कि छोटी मोटी बातों के विश्लेषण के लिए वे ज्योतिषियों के चक्कर निकालें।
ध्यान रखें - बक्से में सवाल और डाटा भरते समय अपना नाम, जन्म तिथि, जन्म समय और जन्म स्थान के अलावा ईमेल आईडी ध्यानपूर्वक भरें। इनमें गलती होने से आगे का संवाद प्राथमिक स्तर पर ही खत्म हो जाता है।
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रविवार, सितंबर 06, 2009
'तीस साल बाद लौटा है शनि'
ऐसा मैं अभी कल ही एक लेख के हैडिंग में पढ़ चुका हूं। इसमें बताया गया था कि नौ सितम्बर को शनि तीस साल बाद कन्या राशि में लौटेगा। मुझे किसी ने यह लेख लाकर दिखाया तो हंसी छूट गई। हैडिंग करीब साठ प्वाइंट के फोंट में थी। आमतौर पर किसी रहस्योद्याटन के समय ऐसे फोंट इस्तेमाल किए जाते हैं। जो मुझे दिखा रहा था, उसके चेहरे का नूर गायब था। क्योंकि उसकी राशि में शनि के इस परिवर्तन को खराब बताया गया था। स्थिति हद से ज्यादा हास्यास्पद थी। लेकिन क्या किया जाए। जिस विधा को परम्परागत और बोगस करार देकर किनारे फेंक दिया जाएगा उसके परिणाम ऐसे ही आएंगे। ऐसा क्या है, कि ज्योतिष की प्राथमिक जानकारियों से भी लोग दूर रहते हैं। इसी कारण चाहे हल्के साहित्य वाली किताबें, ज्योतिष की मैग्जीन हो या भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इन प्राथमिक जानकारियों को सनसनीखेज खुलासे के रूप में पेश करते हैं। और लोग जो वास्तव में डरना चाहते हैं और अपनी असफलताओं का ठीकरा ग्रहों पर डालना चाहते हैं इनसे जबरदस्त प्रभावित होते हैं। हर तरफ यही चर्चा होने लगती है। सोचने की बात है कि क्या आम आदमी की जिंदगी को वास्तव में शनि इस कदर प्रभावित करेगा कि सारा वातावरण ही बदल जाए। क्या शनि पहली बार इस राशि में आया है। क्या शनि इतना खतरनाक है। क्या हर राशि इससे प्रभावित होगी।
वाह शनि को अल्टीमेट विलेन हो गया है ग्रेट इंडियन एस्ट्रोलॉजिकल सर्कस में :)
सही कहूं तो आम आदमी जो इस प्रकार के खुलासों और सनसनीखेज से प्रभावित होता है इस सर्कस का कॉमेडियन है।
गोचर के ग्रहों की अपनी नियमित चाल है और दुनिया में छह अरब लोग इन ग्रहों और नक्षत्रों की छांव में आराम से अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। सूर्य के चारों और ग्रहों की गति और पृथ्वी से उनका सापेक्ष घूर्णन विभिन्न राशियों में ग्रहों की उपस्थिति को बताता है। ऐसे में ग्रहों का गोचर भ्रमण आम जिंदगी को बहत अधिक प्रभावित नहीं कर सकता। दूसरी बात राशियों की। कुछ लोग सूर्य राशि से देखते हैं, कुछ चंद्र राशि से और जिन्हें थोड़ा अधिक ज्ञान है वे लग्न से देखते हैं। वास्तव में कहां से कहां तक मार होगी कहीं स्पष्ट नहीं है। न ही कोई करना चाहता है। क्योंकि ऐसे गोचर का प्रभाव मण्डेन पर तो स्पष्ट हो सकता है लेकिन किसी व्यक्ति विशेष पर हो ऐसा मुझे तो नहीं लगता। क्योंकि इन ग्रहों की चाल निश्चित है। इतनी अधिक कि दस हजार साल बाद इनकी क्या स्थिति होगी, आज बताया जा सकता है। ऐसे में फलादेश निकालते समय ग्रहों के गोचर का परिणाम भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
अब देखें कहां से आया शनि और कहां जा रहा है
हर ग्रह की अपनी चाल होती है। सूर्य एक माह में, चंद्रमा ढाई दिन में, मंगल डेढ महीने में, शुक्र सत्ताईस दिन में, गुरू तेरह महीने में, बुध तीस दिन में, राहू और केतू डेढ़ साल में और शनि ढाई साल में एक बार अपनी राशि बदलता है। यानि एक साल में सूर्य बारह राशियां बदल लेता है तो इतनी ही राशियां बदलने में शनि को पूरे तीस साल लगते हैं। अब आपको समझ में आ गया होगा कि तीस साल तक शनि कहां था। अरे कहीं नहीं गया था यहीं था अभी कन्या में आया है, इससे पहले सिंह में था, उससे पहले कर्क में। हर ढाई साल में एक-एक राशि बदलता हुआ आखिर वापस कन्या में आ पहुंचा है। इसमें अटपटा कुछ भी नहीं है।
साढ़ेसाती, कंटक और ढैय्या
इसके बारे में मैं एक लेख में पहले दे चुका हूं। किसी जातक की जिंदगी में कम से कम तीन बार साढ़े साती आती है। यानि जन्म राशि के पैंतालीस डिग्री के अन्दर शनि का प्रवेश और पैंतालीस डिग्री बाहर निकलने तक। कब तक डरते रहेंगे साढ़े साती से लेख में आप इस बारे में अधिक विस्तार से पढ़ सकते हैं।
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गुरुवार, अगस्त 27, 2009
नास्त्रेदमस की टाइमिंग
इन दिनों 2012 की चिंता के साथ एक बार फिर नास्त्रेदमस लाइम लाइट में आ चुके हैं। बहुत छोटा था तब नास्त्रेदमस की पुस्तक मेरी माताजी खरीद कर लाई थीं। उन्हें पक्का विश्वास था कि दुनिया जल्दी ही खत्म हो जाएगी। और नास्त्रेदमस भी यही कह रहे थे। मेरी माताजी के इस विश्वास के कई कारण थे लेकिन नास्त्रेदमस के पास कुछ जुदा कारण हैं। किताब के मुखपृष्ठ पर नास्त्रेदमस का अपने क्रिस्टल के साथ इतना आकर्षक फोटो था कि मैं घण्टों तक केवल फोटो को ही देखता रहता था। वह मूल किताब का हिन्दी अनुवाद था।
मुझे बहुत अधिक समझ नहीं थी लेकिन इतना उसमें स्पष्ट था कि नास्त्रेदमस ने दुनिया का भविष्य बहुत साल पहले ही लिख दिया है। और वह जल्द ही खत्म भी होने वाली है। अलग अलग सूत्रों का विश्लेषण करके बताया गया था कि इतिहास में अब तक जो घटनाएं हुई हैं उन्हें नास्त्रेदमस ने अपने क्रिस्टल बॉल में देख लिया था और उलझी हुई भाषा में लिख दिया था। ताकि उसे तत्काल कोई परेशान न करे। उसमें यह भी बताया गया था कि अब वे भविष्यवाणियां सच साबित हो रही हैं।
इसके बाद कई साल तक नास्त्रेदमस का नाम सुनाई नहीं दिया। जब मैं लाल किताब पढ़ रहा था तो उसकी भाषा और नास्त्रेदमस की चौपाइयों में कई समानताएं दिखाई दी। भाषा के दृष्टिकोण से। तब नास्त्रदेमस की दोबारा याद आई। ढूंढ-ढांढकर किताब निकाली और उसे फिर पढ़ गया। शेर और चीते की लड़ाई का एक दृश्य को अब भी ऐसा जेहन में बैठा है कि लगता है लड़ाई मेरे सामने हुई थी। उन दिनों मैंने कई लोगों के समक्ष नास्त्रेदमस की बात की। लेकिन उस दौर में किसी को भी मेरी बातों में इंट्रेस्ट नहीं आया। मैं किनारे हो गया।
फिर इराक पर हुए हमले और इराक के पास जैविक हथियारों के जखीरे की खबरों के बाद एक बार फिर नास्त्रदेमस का नाम चमका। कई किताबें बाजार में आ गई। घोषणा हुई कि वाईटूके वास्तव में एक सिंबल है जो बताता है कि दुनिया इक्कीसवीं सदी के दर्शन ही नहीं कर पाएगी। कई लोग बहुत चिंतित थे। बीकानेर में जहां हर समय अलमस्त मौसम रहता है कई लोगों के चेहरे पर प्रलय का भय दिखाई देने लगा। लोग पाप और पुण्य की बातें करने लगे। हालांकि बैकग्राउंड में जैविक हथियारों के काम करने के तरीके पर भी बहस चल रही होती लेकिन मुद्दा वही था कि दुनिया तो खत्म हो जाएगी।
इसके बाद अब तीसरा दौर देख रहा हूं। पिछले साल अमरीका बुरी तरह मंदी की चपेट में आ गया। लोगों के घर बिक गए, नौकरियां छूट गई और धंधे बंद हो गए। पूरी तरह ऑटोमैटिक घरों में रहने वाले लोग कारों में रहने और सोने लगे। यानि सोसायटी से कटने के बाद अब सुविधाओं से भी कट चुके लोगों के पास जीने का कोई कारण नहीं बचा। ऐसे में एक बार फिर नास्त्रेदमस आ गए हैं। इस बार आए हैं 2012 की भविष्यवाणी लेकर। इसमें दुनिया में आज तक हुए बदलावों और मशीनीकरण पर खुलकर चर्चा की गई है। देश, समाज और उपलब्ध संसाधनों के तेजी से हो रहे क्षय पर चर्चा है। और साथ में सवाल खड़ा किया गया है कि क्या वास्तव में नास्त्रदेमस के अनुसार वर्ष 2012 में दुनिया खत्म हो जाएगी।
यह भूमिका समझिए अगली पोस्ट में चर्चा करूंगा कि क्यों ऐसा होता है कि जब दुनिया में संकट आता है तभी नास्त्रेदमस याद आते हैं। और मुझे नास्त्रेदमस की चौपाइयों में क्या दिखता है।
चित्र गूगल सर्च से साभार
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रविवार, अगस्त 23, 2009
इक्कीसिया गणेशजी : विशेष मांग पर
ज्योतिष का यह ब्लॉग शुरू किया तो विषय पर लिखने के दौरान कई बार लगता कि ब्लॉग सूना-सूना लगता है। सो इस पर अपने ईष्टदेव इक्कीसिया गणेशजी का फोटो लगा दिया। शुरूआत में लोगों ने ध्यान दिया या नहीं लेकिन बाद में बहुत से लोगों ने पूछा कि ये इक्कीसिया गणेशजी कहां है, इनका क्या महत्व है।
शायद ज्योतिष के ब्लॉग पर गणेशजी की तस्वीर होने के कारण कौतुहल का कारण बनी होगी। आज गणेश चतुर्थी है। गणेशजी का खास दिन है सो लगा आज ही इक्कीसिया गणेशजी के बारे में जानकारी देनी चाहिए। बीकानेर शहर के पश्चिमी कोने में किराडूओं की बगीची में स्थित गणेशजी के इस मंदिर की स्थापना का दिन तो मुझे नहीं पता लेकिन इसके साथ एक तथ्य जुड़ा है। वह यह कि इसे इक्कीस पुष्य नक्षत्रों के दिन बनाया गया था। जितनी देर तक पुष्य नक्षत्र चलता उतनी देर तक मूर्ति बनाने का काम होता और बाद में अगले नक्षत्र पर फिर से शुरू होता। इक्कीस पुष्य नक्षत्रों तक यह काम चला और मूर्ति बन गई। इसमें गणेशजी की गोद में सिद्धि भी विराजमान है। आमतौर पर मूर्ति का श्रृंगार इतना अधिक होता है कि पता ही नहीं चलता कि मूर्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है। एक दिन हमारा फोटोग्राफर नौशाद अली मंदिर पहुंचा तो उसे बिना श्रृंगार के गणेशजी दिखाई दिए। वह उनकी फोटो ले आया। उसी फोटो को मैंने इस ब्लॉग पर लगा रखा है।
मन्नतें पूरी होती गई
इस मंदिर की खासियत यह है कि इक्कीस दिन तक रोजाना बिना बोले मंदिर जाने और गणेशजी की इक्कीस फेरी रोजाना लगाने पर मन की इच्छा पूरी हो जाती है। मैं जब पहली बार इस मंदिर में गया था तो यह छोटा सा मंदिर था। गर्भग्रह के पीछे इतनी कम जगह थी कि एक बार में दो जन फेरी नहीं लगा पाते थे। लेकिन गणेशजी का चमत्कार ही है कि उन्होंने लोगों की इच्छाएं इतनी तेजी से पूरी की कि मंदिर बड़ा होता गया। अब यह शहर का सबसे ग्लोरियस मंदिर बन गया। जब मैंने जाना शुरू किया था तो मैं डिप्रेशन में था और एकांत की खोज में वहां जाकर बैठता था। मन को बड़ा सुकून मिलता था। तीन साल तक रोज जाता रहा। कभी कुछ मांगा नहीं लेकिन मेरी स्थिति में तेजी से बिना मांगे सुधार होता गया। एकाध बार मैंने मन में इच्छा लेकर फेरी निकालनी शुरू की तो बाधा आ गई और फेरियां पूरी नहीं कर पाया। तो फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया। जब भी बिना मांगे जाता था तो नियमित रूप से बिना नागा महीनों तक यह क्रम चलता रहता। मांगने पर ही बाधा आती। बहुत से लोग इक्कीस दिन फेरियां नहीं निकाल पाते हैं। कुछ लोग जो निकाल लेते हैं उन्हें पुत्र संपत्ति जैसी चीजें आसानी से मिल जाती है। कालान्तर में दूसरे लोगों की इच्छाएं पूरी हुई तो मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। अब तो हालात ये हैं कि बुधवार के दिन गणेशजी की परिक्रमा एक साथ चालीस या पचास लोग करते हैं। कई बार तो दर्शन भी मुश्किल से होते हैं। अब मैंने जाना कम कर दिया है। साल में एकाध बार ही जा पा रहा हूं। लेकिन मन में वही पुरानी वाली छवि है। कभी उपापोह में होता हूं तो गणेशजी को याद करता हूं और समस्या का समाधान हो जाता है। यह मेरी आस्था से अधिक जुड़ा है सो यही मेरे ईष्ट हुए।
बस इतनी सी बात है... :)
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शनिवार, अप्रैल 25, 2009
नेता और ज्योतिषी- यूं पत्थर बन गया भगवान
यह किस्सा भी महाराज से जुड़ा है। चुनाव के दिनों में महाराज बहुत बिजी रहते हैं। पिछले आठ महीने से तो उन्हें सांस खाने की भी फुरसत नहीं मिल रही है। पहले विधानसभा चुनाव और अब लोकसभा चुनाव।
यह किस्सा पिछले विधानसभा चुनाव का है। यानि जब वसुंधरा की सरकार बनी थी तब का। उन दिनों राम की पार्टी वाले कई नेताओं को राहू का भय सता रहा था। सो महाराज को मिला एसी का टिकट। जयपुर की किसी फार्म हाउस में उनके रहने की पुख्ता व्यवस्था कर दी गई थी। महाराज की सेवा सुबह एक नेता आता, दोपहर को दूसरा और रात को तीसरा। कई दिनों से यही क्रम चल रहा था। रिसोर्ट पर महाराज रोजाना नेताओं की शक्ल देखकर बोर होने लगे। तो एक दिन अपने कुछ चेलों को वहीं बुला लिया। एक दिन महाराज अपने चेलों के साथ बैठे थे कि एक चेले ने पूछ लिया कि महाराज भगवान कहां है। महाराज तरंग में थे, सवाल पर नाड़ खिंच गई, बोले बेटा वो सामने छोटा सा पत्थर पड़ा है ना उसमें भगवान है। चेला हंसा तो महाराज तन गए बोले 'हंस मत, अभी घण्टेभर में इसकी पूजा कराके बताउंगा।'
थोड़ी देर में एक नेताजी आए। आते ही उनकी कुण्डली देखी और बोले मंगल का भीषण कोप है। आपको एक तांत्रिक क्रिया करनी होगी तभी शांति होगी। आप तुरंत एक पत्थर लेकर आओ। नेताजी को पसीना आ गया। उन्होंने अपने चेले को बोला पत्थर लाओ। चेला लपका कि महाराज ने टोका कि नहीं आप खुद लेकर आओ। इलाज आपका करना है तो पत्थर भी आपको ही लाना पड़ेगा। गोल-मटोल नेताजी सोफे पर से मुश्किल से उठे। थोड़ी सहायता महाराज ने कर दी। बोले वो सामने जो पत्थर पड़ा है उसे ही ले आओ। नेताजी तुरंत लपके और पत्थर उठा लाए। अब महाराज ने उन्हें एक लाल रंग का धागा दिया और कहा इसे पत्थर के चारों ओर लपेट दो। नेताजी लगे लपेटने। पूरा धागा पत्थर पर लपेट दिया तो उसकी आकृति गोल हो गई। महाराज ने पूजन की विधि बता दी और पत्थर को पूजाघर में रखने को कह दिया। नेताजी खुशी-खुशी पत्थर को लेकर अपने घर चले गए। महाराज ने गर्व से चेले की ओर देखा। चेला नतमस्तक, लेकिन सवाल भी दागा कि महाराज नेताजी इस पत्थर की पूजा करेंगे क्या।
महाराज ने कहा चलकर देख लेंगे। दो दिन बाद महाराज अपने चेलों को लेकर नेताजी के घर पहुंच गए। नेताजी भी प्रसन्न हुए सीधे अपने मंदिर में ले गए और बताया कि दो दिन से वे मंत्र जप रहे हैं और अब गोटियां भी ठीक फिट हो रही हैं।
चुनाव के बाद नेताजी जीत गए और शायद अब भी वह पत्थर नेताजी के पूजागृह की शोभा बढ़ा रहा होगा। सालों से सुनता और पढ़ता आ रहा हूं कि कण-कण में भगवान है लेकिन महाराज ने इसे सिद्ध करके बता दिया था।
अगली बार चुनाव और पॉलिटिकल बाबा का किस्सा।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, अप्रैल 21, 2009
अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो...
अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो उसकी कुण्डली क्या होगी?

फलित ज्योतिष की पुस्तकें पढ़कर फलादेश शुरू कर देने वाले ज्योतिषियों को एक सवाल पिछले कई दिनों से पूछा जा रहा है। मेरी भी लगभग यही श्रेणी मानी जाती है इसलिए मुझे भी यही सवाल पूछा गया। सवाल सुनते ही मेरे दिमाग में भौतिक का वह सवाल कौंध गया जिसमें पूछा गया है कि धरती से चंद्रमा की ओर जा रहे किसी यान की एक विशेष स्थिति में गतिक और स्थैतिक ऊर्जा क्या होगी। क्या इसे निकाला जा सकता है। इस सवाल में अंतरिक्ष में बालक पैदा हो रहा था, लेकिन कहां इस बारे में स्पष्ट नहीं था। मेरे दिमाग में अंतरिक्ष यान था जिसमें कि बालक पैदा हो सकता होगा।
प्रेक्टिकली हो सकता है या नहीं यह बात अलग है लेकिन अगर... हो भी तो खुले अंतरिक्ष में तो कतई पैदा नहीं सकता। ऐसे में मेरे दिमाग में पहले पहल यही ख्याल आया कि अंतरिक्ष यान में पैदा हो रहा है। इसके साथ ही मैंने यह भी सोच लिया कि वह धरती से चंद्रमा की ओर जा रहा है। जबकि सवाल यह है ही नहीं। बस इतना है कि पृथ्वी से अलग दूर अंतरिक्ष में बालक पैदा हो तो उसकी कुण्डली क्या होगी। इससे मुझे यह समझ में आया कि जिस तरह पृथ्वी के कॉर्डिनेट्स हैं वैसे ही अंतरिक्ष के कॉर्डिनेट्स भी होंगे। इन कॉर्डिनेट्स के अनुसार पहले यह तय करना होगा कि बच्चा अंतरिक्ष में कहां है। फिर पृथ्वी पर मिलने वाले पांचांगों के इतर एक अन्य गणना तय करनी होगी जिसमें अंतरिक्ष के उस बिंदू से ग्रहों की विभिन्न नक्षत्रों में स्थिति का वर्णन स्पष्ट हो। यह निकालने योग्य होना चाहिए। यानि मेहनत की जाए तो शायद निकाला जा सकता है। इसके बाद जो कुण्डली बनेगी उसमें ग्रहों का प्रभाव और नक्षत्रों का फल पृथ्वी के किसी जातक से भिन्न होना चाहिए। क्योंकि अब किरणों का प्रभाव और वातवरण पूर्णतया बदल चुके हैं।
अंतरिक्ष यान से पृथ्वी उदय होते हुए का दृश्य
अब कुछ सवाल और पैदा और होते हैं
गुणी ज्योतिषी बता सकते हैं कि ऐसी स्थिति में बालक के जन्म को लेकर कैसे फलादेश निकाले जा सकेंगे।
? क्या बालक की कुण्डली में एक ग्रह पृथ्वी भी जुड़ जाएगा,
? सूर्य और चंद्र के सन्निपात से उत्पन होने वाले राहू और केतू का क्या होगा,
? चंद्रमा का प्रभाव कितना बचेगा,
? जब गुरूत्वाकर्षण नहीं है तो क्या फलों में कुछ परिवर्तन होगा
? क्या बालक के पृथ्वी पर लौटने के समय को लेकर उसकी कुण्डली बनाई जाए,
? क्या कुछ अतिरिक्त ग्रह भी कुण्डली में जुड़ेंगे,
? क्या निकटस्थ ग्रह की भूमिका बढ़ जाएगी या कम हो जाएगी,
? पृथ्वी पर तत्व तो पांच ही हैं फिर अंतरिक्ष में कितने तत्व शामिल किए जाएंगे,
? किसे लग्न मानेंगे और यह किस ओर से उदय होगा ?
कुछ हजार सवाल और पैदा हो रहे हैं इस स्थिति पर, फिलहाल इतने ही,
कुछ आप भी सुझाएं :)
यह तस्वीरें NASA Image of the Day से ली गई है
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, अप्रैल 07, 2009
कर्म बड़ा या भाग्य?
जब से ज्योतिष विषय का झण्डा उठाया तब से मेरे आस-पास के अधिकांश विचारकों ने यह सवाल हमेशा मेरे सामने खड़ा किया कि क्या आवश्यकता है ज्योतिष की जबकि लॉजिक यह कहता है कि जैसा कर्म करोगे वैसे ही फल मिलेंगे। इसके साथ ही दूसरा सवाल यह कि जब सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो तुम्हारा रोल शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है।
दोनों की बातें मेरे इस पेशे को खत्म कर देने वाली थीं। लेकिन केवल उन्हीं लोगों के समक्ष जो कि इन बातों को इसी अंदाज में समझ चुके थे। बाकी लोगों को अब भी लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान मेरे पास है। फिर भी एक विद्यार्थी होने के नाते यह सवाल मेरे सामने बड़ी स्पष्टता से रहा कि कर्म ही हमारी कुण्डली है या भाग्य पहले से लिखा जा चुका है। अगर भाग्य पहले से तय नहीं है तो क्या कर्म से कुण्डली को बदला जा सकता है।
इसी क्रम में पिछले दिनों कुरुक्षेत्र के हितेश शर्माजी ने एक बार फिर मुझसे यही सवाल दोहराया कि
'Kya Bhagya vaastav mein he karm se bada hota hai aur kya jyotis se bhagya ko badla ja sakta hai.'
इस सवाल का स्पष्ट जवाब है पता नहीं।
तो मैं यहां क्या कर रहा हूं। इसके जवाब में मैं यह कह सकता हूं कि जो लोग अपने कर्म से भाग्य को बदलने की सोच रहे हैं मैं उनकी मदद कर रहा हूं। एक ज्योतिषी किसी जातक की क्या मदद कर सकता है इसका बहुत सटीक वर्णन दक्षिण के प्रसिद्ध ज्योतिषी के.एस. कृष्णामूर्ति अपनी पुस्तक फंडामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्ट्रोलॉजी में कर चुके हैं। उनके अनुसार नदी में नाव खेते हुए जब एक नाविक किनारा नहीं मिलने पर हारने लगता है तो उसके पास से गुजर रहा एक अन्य नाविक उसे बताता है कि आगे इतनी दूरी पर उथला किनारा या जमीन मिल जाएगी। दूसरा नाविक ज्योतिषी हो सकता है।
मुझे भी अधिकांश मामलों में अपना रोल ऐसा ही लगता है। जिसे जो भोगना है वह तो भागेगा ही, लेकिन यह भोग कब खत्म होगा या कैसे मुक्ति मिल सकती है इस बारे में मैं संकेत मात्र दे सकता हूं। न तो किसी और का दुर्भाग्य जी सकता हूं न ही किसी को मोक्ष दिला सकता हूं।
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गुरुवार, अप्रैल 02, 2009
घोड़े की नाल और तीन दुर्घटनाएं
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सोमवार, मार्च 30, 2009
दूसरे ज्योतिषी हैं बाबू मास्टर
महाराज की कथा के बार अब मैं बताना चाह रहा हूं बाबू मास्टर के बारे में। चाहता तो था कि साथ ही लिख दूं लेकिन इससे पोस्ट बहुत लम्बी हो जाती।
अब बात बाबू मास्टर की। लम्बा चौड़ा शरीर, घोड़े जैसे दांत, सिर मुंडाया हुआ और पीछे मोटी चोटी। और वर्णन करूंगा तो पहचान पुख्ता हो जाएगी। हां, तो बाबू मास्टर से मिलना कुछ इस तरह हुआ कि वे बीकानेर आए हुए थे। उनके सो कॉल्ड गुरूजी बीकानेर के ही हैं। हालांकि उनके गुरू का ज्योतिष के बजाय अध्यात्म में अधिक रुझान है। क्या कहूं। बाबू मास्टर जिन्हें गुरुजी कहता है उनकी छवि इतनी बड़ी है कि लगता है बाबू मास्टर ने केवल अपनी छतरी पुख्ता करने के लिए उनका नाम इस्तेमाल किया। अब उनके गुरू ऐसा क्यों करने दे रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं है।
मैं अपने एक रिश्तेदार के साथ उनसे मिलने के लिए पहुंचा। हमारी मुलाकात से पहले बाबू मास्टर को बताया गया था कि एक ऐसा मरीज आ रहा है जो बिल्कुल सुस्त है और कुछ काम नहीं करना चाहता। ज्योतिष के नाम पर निठल्ला बैठा है। कहता है समय खराब है सो कुछ करना बेकार है। वह रोगी साथ ही था।
हम जब उनके आश्रमनुमा स्थान पर पहुंचे तो बाबू मास्टर ने मुझे देखते ही पहचान लिया और अपनी दमदार आवाज में झिड़कने लगे कि क्यों ऐसी क्या समस्या है कि सब काम छोड़कर बैठे हो। मैं सकपका गया, लेकिन हाथों-हाथ संभल गया। मैंने बताया कि हम इसे दिखाने लाए हैं मैं तो नौकरी करता हूं। बाबू ने पूछा क्या नौकरी करता है। मैंने कहा पत्रकार हूं। अब बाबू ने पलटवार किया कहा तेरी नौकरी तो कुछ नहीं करने के बराबर ही है। मैंने खून का घूंट पी लिया। कुछ सीखने की गरज जो थी। अब शुरू हुआ ईलाज का क्रम। बाबू मास्टर ने रोगी से नाम पता और डेट ऑफ बर्थ पूछी। रोगी बता रहा था और बाबू के दो असिस्टेंट नोट कर रहे थे। रोगी बोल रहा था कि बाबू ने अपने असिस्टेंटों से चर्चा करनी शुरू कर दी। बातचीत में लगातार विदेशी शब्द आ रहे थे। कुछ देर की चर्चा के बाद बाबू रोगी की ओर मुड़े और बोले कोई समस्या नहीं है। यह लड़का कुछ काम नहीं करना चाहता इसलिए ऐसा कहता है। इसका भाग्य प्रबल है। हमने उन्हें बताया नहीं था कि जिस रोगी को लाया गया है वह स्किजोफ्रीनिया का पेशेंट है। सो उनके इस कथन के बाद मैंने बता दिया। तो बाबू बिफर गए। बोले मुझे सिखाता है क्या। मैं सहमकर चुप हो गया।
कुछ देर बाद रोगी को एक मंत्र देकर पीछे भेज दिया और कहा जब तक न कहूं उठना मत। इसके बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ। इतनी देर में बाबू को समझ आया कि मैं ज्योतिष में रुचि रखता हूं। सो उन्होंने एस्ट्रोलॉजिकल टर्म इस्तेमाल करनी ही बंद कर दी। अपनी हर बात को थाई अंक पद्धति से शुरू किया और वहीं पर खत्म कर दिया। मैं मूर्खों की तरह बस मुंह बांए बैठा रहा।
बातचीत के बीच एक के बाद एक, दो फोन आए। बाबू ने बिना जातक से प्रश्न पूछे इलाज बता दिया और फोन रख दिया। बाबू के व्यवहार से अब तक मैं पूरी तरह हतोत्साहित हो चुका था लेकिन फोन कॉल के बाद तो मैं हैरान था। अपनी रौ में लगातार बोल रहे बाबू को मैंने टोका कि आपने बिना समस्या पूछे समाधान कैसे बता दिया। उन्होंने कहा कि यह तो मेरा काम है। इसके बाद वे अपने कामों का वर्णन करते रहे। एक इंटरनेश्ाल बैंक में एनालिस्ट का पद छोड़ चुके थे, इसके बाद एक फाइनेंस कंसल्टेंसी फर्म खोली वह भी बंद कर दी। इसके बाद मार्केटिंग का काम किया और वह भी छोड़ दिया। आखिरी बार जिस अंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे उसमें थाईलैण्ड में पोस्टेड थे। वहां थाई अंक ज्योतिष सीखी और नौकरी छोड़ पूरी तरह ज्योतिष में लग गए। यह सारी बातें उन्होंने ने ही बताई है। मैंने आज तक वापस इसकी पुष्टि नहीं की है।
खैर मैंने कहा कि ज्योतिष की ऐसी कौनसी विद्या है जिसमें बिना जातक को जाने, बिना उससे सवाल जवाब किए उसके बारे में इतना स्पष्ट बताया जा सकता है। थोड़ी देर बाद तो मैंने दावा भी कर दिया कि यह ज्योतिष ही नहीं है। बाबू हैरान करने पर ही तुले हुए थे। उन्होंने कहा हां मैं ज्योतिष नहीं करता। मैंने कहा तो क्या करते है। बाबू ने कहा मैं लोगों को मूर्ख बनाता हूं। मेरा धंधा मूर्ख बनाने का ही है। यह जवाब मैं पहले सुन चुका था। अब दूसरी बार सुन रहा था। ज्योतिष के क्षेत्र में कई साल तक लोगों के सम्पर्क में रहने और नौकरी के कारण काफी पॉलिश भी हो चुका था। सो मैं संयत बना रहा। मैंने अध्यात्मिक गुरू के आश्रम की आड़ लेकर पूछा कि आपको संतुष्टि मिल जाती है लोगों को ऐसे मूर्ख बनाकर। तो बाबू बोले मैं खुद थोड़े ही जाता हूं मूर्ख बनाने के लिए। वे खुद आते हैं। और सही पूछो तो लोग मूर्ख ही बनना चाहते हैं। आप उन्हें समस्याओं का ठोस कारण बताओगे तो वे पचा नहीं पाएंगे। एक आम आदमी की समस्या है कि वह गलतियां खुद करता है और उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना चाहता है। मैं तो बस उनकी मदद करता हूं। कभी ठीकरा वास्तु के सिर फूटता है, कभी ज्योतिष पर तो कभी किसी व्यक्ति विशेष पर। उन्होंने कहा तूं मुझे बस तडि़त चालक समझ सकता है। जो बिजली गिरने की दिशा तय करता है।
अब तक मैं हंसने लगा था। यह ईलाज का दूसरा व्यवहारिक तरीका था। पहले तरीके में महाराज प्रायश्चित करा रहे थे तो यहां बाबू मास्टर लोगों को लॉलीपॉप पकड़ा रहा था। दोनों ही लोगों ने ग्लानि को आवरण दिया और सहारा लिया ज्योतिष का। इन दोनों ही लोगों को अपने क्षेत्र का प्रकाण्ड विद्वान समझा जाता है। महाराज ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब बड़ा घर और कार ले चुका है और बाबू मास्टर अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी में तीस से चालीस हजार रुपए तक की तनख्वाह पाता था अब रोज के पांच से सात हजार रुपए कमा रहा है। लोगों के दुख और तकलीफ जितने बढ़ते जाते हैं इन लोगों का रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है। पता नहीं ईलाज किसका हो रहा है लेकिन इन दोनों ने एक बीमारी को कुछ समय के लिए तो खत्म कर ही दिया है। और वह बीमारी है खुद की गरीबी। :)
इन दोनों के बाद मैं आपको बताउंगा एक ऐसे ज्योतिषी के बारे में जो परम्परागत भारतीय पद्धति से कुण्डलियां देखता था लेकिन उन्हें मैनेज इंग्लिश स्टाइल से करता था। उसने इतना तगड़ा नेटवर्क बनाया कि उसकी मृत्यु के पांच साल बाद भी उनके पुत्र आराम से अपनी जीविका चला रहे हैं। भले ही वे अपने पिता जितने अच्छे ज्योतिषी नहीं है लेकिन सिस्टम ने उन्हें दौड़ में जमा रखा है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है
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मंगलवार, मार्च 24, 2009
हर क्षण अपने आप में पूर्ण है
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गुरुवार, मार्च 05, 2009
Exaltation or debilitation of planet : And it's meaning
GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA
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मंगलवार, फ़रवरी 24, 2009
संकेतों का ज्योतिषीय संदर्भ
पूर्व में अपने दो या तीन लेखों में अलग अलग तरीके से संकेतों की चर्चा कर चुका हूं। इस बार सीधे संकेत पर ही चर्चा करनी पड़ेगी। लेख के शुरू में ही मैं बता देना चाहता हूं कि मैं संकेतों का विशेषज्ञ नहीं हूं। हालांकि मेरी कुण्डली के योग और वंशक्रम में पाराशर गोत्र का होने के कारण मुझे विरासत में संकेतों को समझने की नेमत मिली है। इन्हें समझ लेना और इनका विशेषज्ञ होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मेरे लेख को पढ़ने वाले गुणीजनों में कोई विशेषज्ञ भी हो तो मेरा आग्रह है कि वे मेरा मार्गदर्शन करें। अब भगवान गणेश को नमन करते हुए मैं अपनी बात रखता हूं।
संकेतों से मेरा परिचय कब का है पता नहीं लेकिन जब ज्योतिष सीखी तो इसे समझने का क्रम भी शुरू हुआ। गुरूजी प्रदीप पणियाजी ने मुझे बताया कि मैं अपनी विशेषता का कैसे इस्तेमाल कर सकता हूं। इसके लिए पहले जरूरत है ओमेन को समझने की। हमारे चारों ओर का वातावरण हम पर और हम अपने वातावरण पर नियमित रूप से प्रभाव डालते हैं। भले ही हम इसके लिए सक्रिय रूप से सोच रहे हों या नहीं। यह देखने में ऐसी बात लगती है जैसा कि चण्डूछाप तांत्रिक कहते हैं या फिर बहुत सिद्ध योगी। ईश्वर ने किसी भी एक को विशेषाधिकार देकर नहीं भेजा है। उसकी नजर में सब बराबर हैं। हां कभी कभार लगता है कि वह खुद तक एप्रोच बनाने के रास्ते सभी को अलग-अलग देता है। कोई बात नहीं पहुंचेंगे तो वहीं। तो जब ईश्वर ने सभी को एक जैसी शक्तियां दी हैं तो हर कोई उसे इस्तेमाल भी कर सकता है, निर्भर करता है कि अपनी सोई शक्तियों को जगाने के लिए हमने कितना प्रयास किया।
चाहे हेमवंता नेमासा काटवे हों या के.एस. कृष्णामूर्ति सभी यही कहते हैं कि जब हम अपने आस-पास के वातावरण के प्रति संवेदनशीलता खो देते हैं तो आगामी घटनाओं की जानकारी लेने के लिए ज्योतिष का सहारा लेना पड़ता है। कई साल ज्योतिष के साथ जुड़े रहने के बाद अब यह बात समझ में आने लगी है। कैसे हम घटनाओं और वस्तुओं के साथ तारतम्य बना लेते हैं और कैसे पूर्व की घटनाएं, वस्तुएं और अन्य संकेत आने वाले समय की सूचना देने लगते हैं।
एक उदाहरण देना चाहूंगा। यह मेरा सुना हुआ है। हो सकता है इसमें अतिरंजना हो लेकिन समझने के लिए अच्छा है। सामान्य बातें धीरे-धीरे समझ में आती है और अतिरंजना बड़ी तस्वीर का काम करती है।
एक वणिक था। उसे एक पंडित ने कहा कि रोजाना किसी ने किसी भूखे या अतृप्त को भोजन कराओगे तो तुम्हारा व्यवसाय दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। वणिक ने भोजन कराना शुरू भी कर दिया। कुछ दिन में उसका व्यवसाय फलने फूलने लगा। एक दिन ऐसा हुआ कि उसे सुबह से दोपहर तक कोई अतृप्त नहीं मिला। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है लेकिन नहीं मिला। सो वह ढूंढता हुआ पहाड़ी की ओर निकल गया। वहां एक सांड जैसा आदमी सोया हुआ दिखा। उसके होठों पर भी पपड़ी जमी हुई थी। वणिक ने सोचा यही सही व्यक्ति है। उसने पालकी मंगवाई और उस बलिष्ठ दिखने वाले व्यक्ति को घर ले आया। उसे पानी पिलाकर होश में लाया और भरपेट खाना खिलाया। थोड़ी ही बातचीत में पता चल गया कि वह शरीर से तो तंदुरुस्त है लेकिन अकल से गूंगा है। जैसे ही उस आदमी ने खाना खाया उसे जोश आ गया। खाना खिलाने के बाद वणिक ने तो उस आदमी को विदा कर दिया लेकिन रास्ते में उस मेंटली रिटार्टेड आदमी ने सड़क पर पड़ा लठ्ठ लेकर एक गाय पर भीषण प्रहार किया। इस प्रहार से गाय की मौत हो गई। उधर गाय मरी और इधर वणिक की हालत खराब होने लगी। एक जहाज विदेश से माल लेकर आ रहा था वह पानी में डूब गया। राजा ने शास्ति लगा दी। व्यापार में घाटा आने लगा। अब वणिक भागा वापस ज्योतिषी के पास। ज्योतिषी से पूछा कि आपके बताए अनुसार उपचार किए लेकिन मेरी तो हालत खराब हो रही है। कहां चूक हुई। ज्योतिषी ने पिछले कुछ दिनों का हाल पूछा और पता लगाने की कोशिश की कि कहां गड़बड़ हुई है। काफी देर की कसरत के बाद पता लगा लिया गया कि गाय की मौत का ठीकरा वणिक के सिर फूटा है। इसके दो कारण हैं। गाय को मारते वक्त उस आदमी के पेट में वणिक का अन्न था। तो उस आदमी के सिर दोष होना चाहिए। हो भी सकता था लेकिन वह आदमी को मेंटली रिटार्टेड था सो उसे इस बात का विवेक ही नहीं था। यानि वह केवल वणिक और गाय की मौत के बीच माध्यम भर बना था। इसके बाद ज्योतिषी ने गाय की हत्या के कुछ उपचार वणिक को बताए। उन्हें करने के बाद वणिक की स्थिति वापस सुधरने लगी।
इसमें अतिरंजना तो यह हुई कि उपचारों पर ही पूरा व्यापार खड़ा कर दिया गया है, दूसरा यह कि गणना से यह पता लगा लिया गया कि गाय की मौत हुई है। जो भी हो कहानी है...
मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम ऐसे करते हैं जिनका मंतव्य अच्छा होता है और काम भी अच्छे दिखते हैं लेकिन उनके परिणाम कितनी दूरी पर जाकर क्या रंग लाते हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। वणिक नहीं चाहता था कि गाय की मौत हो लेकिन हुई और वणिक उसका एक बड़ा कारण बना। न वह उस आदमी को घर लेकर आता और न उसे खाना खिलाता तो गाय की मौत नहीं होती।
तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के कामों का क्या परिणाम निकलेगा इसका पता कैसे लगाया जाए। जैसा कि मस्तिष्क पर शोध करने वाले लोग कुछ साल पहले तक कहते थे कि हम अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत हिस्सा काम में लेते हैं, कुछ दिन पहले तक कहने लगे कि एक प्रतिशत ही काम में लेते हैं और कुछ समय पहले तो सुना कि एक प्रतिशत से भी कम काम में लेते हैं। इसीलिए मुझे विज्ञान और इसमें शोध कर रहे लोगों पर कभी पूरा भरोसा नहीं होता। खैर जो भी है...
शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन का है। वह हमारे लिए गणना करता है कि आपकी गतिविधियों, आपके व्यवहार, मौसम, आपके घर का सामान, आपके दोस्तों, उनके द्वारा बोली गई बातों, रास्ते में बज रहे संगीत, बस में आपकी सीट के पास बैठे व्यक्ति की हरकतों, पशु पक्षियों की मुद्राएं और आवाजों और हजारों संकेतों के क्या मायने हो सकते हैं। चूंकि हम एक विशिष्ट भाषा और शैली से बोलना, चलना और समझना सीखते हैं। जिंदगी के पहले पांच सालों में इसकी जबरदस्त ट्रेनिंग होती है। बस वही भाषा हमें आती है। बाकी संकेतों को हम उतने बेहतर तरीके से समझ नहीं पाते। एलन पीज ने अपनी पुस्तक बॉडी लैंग्वेज में इसी अवचेतन के संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। स्टीफन आर कोवे इसी अवचेतन को सक्रिय करने के लिए सात आदतें डालने का आग्रह करते नजर आते हैं।
अब फिर से बात करता हूं कि जिन लोगों ने भविष्य देखने या इंट्यूशन की प्रेक्टिस नहीं की है उन्हें यह सब कैसे और क्यों दिखाई देता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कुण्डली का आठवां भाव और बारहवां भाव तथा राहू और कमजोर चंद्रमा हमें ऐसे दृश्य देखने और सोचने में सहायता करते हैं। आम चिकित्सक के पास जाने पर वह आपको खुद को व्यस्त रखने की सलाह देता है। अल्पनाजी को यह पता है। उन्होंने इसके अलावा कोई और उपाय हो तो बताने के लिए कहा है। ठीक है एक सवाल के साथ...
अब यहां एक और गंभीर सवाल है जो आमतौर पर नए ज्योतिषीयों के समक्ष आता है वह यह कि इंट्यूशन और कल्पना में क्या अन्तर है। मैंने अपने लेख इंट्यूशन और कल्पना में अन्तर में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की थी। इसमें मैंने कुछ हद तक स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि दोनों में क्या अन्तर है। कई बार हमारे भय, चिंताएं, विचारों की शृंखला, भीषण घटनाएं हमारे दिमाग में अनिष्ट या ईष्ट की इच्छा के बुलबुले बनाने लगते हैं। नए ज्योतिषियों के साथ तो ऐसा होता है कि वे जातक की आर्थिक स्िथति और पर्सनेलिटी तक से प्रभावित हो जाते हैं और उसके सुखद या दुखद भविष्य की कल्पना कर बैठते हैं। वे इतने जोश में होते हैं कि उसी कल्पना को इंट्यूशन समझकर फलादेश भी ठोंक देते हैं। जब जातक लौटकर आता है तो शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है।
इसी दौरान एक और बात आई वह थी एक ही अंक का बार बार दिखना। अखिल तिवारी जी कहते हैं कि पिछले कई सालों से एक विशेष समय को कभी घड़ी, कभी मोबाइल. कभी कंप्यूटर तो कभी कही भी, दीवाल पे, नही तो सामने जाती हुई गाड़ी के नम्बर पर.. एक विशेष combination (12:22) रोज दीखता है. हम किसी भी दो संयोगों को मिलाकर चार कर सकते हैं। और जब तक दो और दो चार होते रहें तब तक तो ठीक है लेकिन कई बार यही दो और दो पांच दिखने लगे तो कठिनाई आती है। अब इसी उदाहरण की बात की जाए तो मैं सोच सकता हूं कि इस विशेष नम्बर से कहीं उनका जुड़ाव होगा। अगर वे देखने की बजाय आब्जर्व करने लगें तो पता चलेगा कि केवल ये विशेष संख्याएं ही नहीं अनन्त संख्याएं उनके सामने आती हैं लेकिन जिंदगी में कही न कहीं इन संख्याओं से जुड़ी याद होने के कारण ये अधिक तेजी से उनके दिमाग में ब्लिंक करती हैं। अब संख्या तो आ रही है लेकिन उसके साथ जुड़ी याद अवचेतन में पीछे कहीं दूर धकेल दी गई है। सो उनका परेशान होना स्वाभाविक है। अगर मैं एक न्यूमरोलॉजिस्ट की तरह बात करूं यानि सिट्टा हाथ में उठा लूं, तो पहले तो इन संख्याओं को जोडकर सात बना लूंगा। फिर बताउंगा कि चूंकि ये संख्याएं दो भागों में बंटी है इसलिए पहले तीन का और बाद में चार का असर आएगा। यानि तीन की संख्या से गुरू और चार की संख्या से सूर्य आता है। इससे पता चलता है कि जब आप किसी प्रॉब्लम में उलझे होते हैं तो आपको किताबों और ऑथेरिटी की जरूरत होती है। अगर अखिल जी मेरी बात को सीरियस लेते हैं तो वे याद करेंगे और उन्हें याद भी आ जाएगा कि उन्होंने कई बार प्रॉब्लम में होने पर किताबों में जानकारी ली और अपने सीनियर्स की मदद भी। लेकिन एक सिस्टम एनालिस्ट ऐसे नहीं बनता है। यकीन मानिए। उसे समस्याओं को खुद ही हल करना होता है। चाहे किसी की भी सहायता ले लेकिन लगातार सामने आ रही समस्या उसकी निजी होती है और उससे लड़ने वाला भी वह खुद ही होता है। अब जिन बातों का जस्टिफिकेशन हमारे पास नहीं होता उन बातों के लिए हम उन लोगों पर निर्भर हो जाते हैं जिन्हें वास्तव में खुद कुछ नहीं मालूम। जैसा कि मेरे एक दोस्त कहते हैं दो अंधे मिलकर एक आंख से देखने लगते हैं। अब (12:22) संकेत तो है लेकिन भविष्य का हो जरूरी नहीं।
अब बात पराभौतिक कनेक्शन की: यह हर किसी का होता है। चाहे वह उसे प्रदर्शित कर पाए या नहीं। जब हाजिर दिमाग काम करना बंद कर देता है तब यह पराभौतिक कनेक्शन अधिक मुखरता से महसूस होने लगते हैं। हम किसी से कोई बात करते हैं, कोई जानकारी लेते या देते हैं, कोई गाना सुनते हैं, कोई समाचार देखते हैं तो दिमाग तत्काल जो रिएक्शन देता है वह हाजिर दिमाग की होती है। मान लीजिए कि आपने टीवी में एक सड़क दुर्घटना का दृश्य देखा। इससे आपके दिमाग में हाथों हाथ यह आएगा कि आजकल सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं, लोग लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं वगैरह वगैरह.. कुल मिलाकर तात्कालिक प्रतिक्रियाएं तत्काल आती हैं और समाप्त भी हो जाती हैं। इसी दौरान आपका अवचेतन गणना करने लगता है। (यह केवल उदाहरण के लिए है सिद्धांत नहीं) वह आपको याद दिला देता है कि आपका छोटा भाई भी लापरवाही से गाड़ी चलाता है। आजकल किसी बड़े शहर में है जहां उसके पास दुपहिया वाहन भी है। हालांकि दुपहिया वाहन कम चलाता है लेकिन चलाता तो है। अब दूसरा विचार कि आपके भाई का शहर और दुर्घटना वाला शहर कितना मिलता जुलता है। इस जैसे हजारों विचार दिमाग के बैकग्राउंड में चलते हैं। इसी दौरान आपके भाई का दोस्त भी यही देख रहा होता है और शायद उसका अवचेतन भी ऐसी ही कुछ चाल चलता है। अब आप और आपके दोस्त का भाई कहीं रास्ते में मिलते हैं। आपका दिमाग बात करता है गाड़ी को सही मेंनटेंन करने और सही तरीके से चलाने के बारे में यही आपके भाई के दोस्त के दिमाग में भी चल रहा होता है। दोनों मिलकर बात कर लेते हैं। और निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि आपका भाई तो ढंग से गाड़ी चलाता है। इसके लिए कहीं भी आपके भाई या दुर्घटना का जिक्र नहीं होता। लेकिन मैसेज कन्वे हो गया। अब आपकी चिंता बढ़ रही है और आप अपने भाई को फोन लगाते हैं तो वह वही बातें कर रहा होता है जो आपने अब तक सोची थी। लेकिन वह यह बताना भूल जाता है कि उसके दोस्त का भी फोन आया था। आपकी सोच बदल जाती है। आप सोचने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। जबकि तीनों लोगों के अवचेतन इस कांबिनेशन को बना रहे थे। यह एक उदाहरण है। लेकिन इससे स्पष्ट हो सकता है कि कैसे हम कोई बात सोचते हैं दूसरा उसी बात को बोलता है। इसे मैं दो लोगों के एक ही मानसिक स्तर में होना कहता हूं। साइकोलॉजिस्ट क्या कहते हैं मुझे पता नहीं। अब अल्पना वर्मा जी कहती हैं कि एक व्यक्ति को कभी कभी कोई घटना -अक्सर दुर्घटना - दिमाग में बार बार तब तक दिखायी देती रहे..और कुछ दिन में या कुछ घंटे या मिनटों के अन्तर पर वो सच हो जाए। कभी कोई मिलने आने वाला हो और घर के नज़दीक होने पर उस की तस्वीर दिमाग में स्पष्ट दिखायी दे। यह यकीनन कोई मनोरोग नहीं है। हां यह मनोरोग नहीं है बस आपके अवचेतन का एक ट्रेलर मात्र है। बिल्कुल वैसी की वैसी घटना न भी हो तो आपकी कल्पना की घटना और वास्तविक घटना की एकरूपता को जस्टिफाई आपका दिमाग ही तो करेगा। अगर वह क्रूर विश्लेषण करे तो दोनों घटनाओं में हजारों अन्तर ढूंढ निकालेगा और मनोविनोद की बात हो तो अंतर ढूंढने का कारण ही नहीं रह जाएगा। हम भविष्य तो देख भी लें तो वह वैसा हमारे सामने कभी नहीं आएगा जैसा कि वास्तव में है। बस संकेत आते हैं। आप जिनती कुशलता से इन संकेतों को समझ लेते हैं वही भविष्य की या दूरदृष्टि है।
शेष शुभम्
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009
कब तक डरते रहोगे साढ़ेसाती से
बहुत जगहों पर पढ़ता रहा हूं। साढ़ेसाती के बारे में। अब तक सैकड़ों सवाल भी सुन और झेल चुका हूं। हर बार समझाने की कोशिश करता हूं कि साढ़ेसाती से डरने का कोई फायदा नहीं है। इसका कोई उपचार भी नहीं है। तो इतना पुस्तकों, मैग्जीनों, न्यूज चैनलों और पंडितों के यहां साढ़े साती के बारे में सुना है क्या सब फिजूल है।
मेरा जवाब है हां जी सबकुछ फिजूल है। मैं स्पष्ट करने का प्रयास करता हूं। पहले यह कि साढ़ेसाती होती क्या है। आपकी कुण्डली में चंद्रमा जिस राशि में जिस डिग्री पर बैठा है उस चंद्रमा से 45 डिग्री के घेरे में जब गोचर का शनि (यानि फिलहाल जो शनि की गति है उसके हिसाब से) आता है तो आपको शनि की साढ़ेसाती लग जाती है। साढ़ेसाती का अर्थ है यह साढ़े सात साल तक चलती है। 45 डिग्री के दायरे में आने के साथ शुरू होती है और चंद्रमा से आगे निकलकर 45 डिग्री दूर चली जाए तब तक चलती है। एक राशि तीस डिग्री की होती है। शनि का एक राशि में भ्रमण ढाई साल का होता है। चंद्रमा के दोनों ओर डेढ़ डेढ़ राशि तक इसका भ्रमण यह स्थिति पैदा करता है। यानि ढाई ढाई साल के तीन हिस्से किए जा सकते हैं।
अब सवाल कि यह करती क्या है। जैसा कि मैंने किताबों में पढ़ा है और मेरे वरिष्ठजनों से राय ली है साढ़े साती हमें अधिक मेहनत करने के लिए विवश करती है। जब हम समय के साथ इसके अनुसार दौड़ नहीं पाते तो निठल्ले होकर बैठ जाते हैं। किसी व्यक्ति पर साढ़ेसाती का बुरा प्रभाव है या नहीं यह चैक करने के लिए मेरे पास एक बहुत आसान रास्ता है। मैं उस व्यक्ति से पूछता हूं कि अभी क्या समय हुआ है। साढ़ेसाती का पीडि़त अधिकांशत: इसका गलत जवाब देगा। अगर शनि खराब प्रभाव नहीं कर रहा है तो जवाब सही आएगा। इस फार्मूले को निकालने के पीछे ठोस कारण यह है कि खराब शनि हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर आक्रमण करता है और हमारे दैनिक कार्य करने में भी परेशानी आने लगती है। इसी से शुरू होती है टाइमिंग की समस्या। यानि गलत समय पर आप सही जगह पर पहुंचते हैं या सही समय पर गलत जगह पर। यह साढ़ेसाती का दूसरा बड़ा साइन है।
यह तो मैंने बताया कि समस्या कहां दृष्टिगोचर होती है और कैसे होती है। अब सवाल कि इससे डरा क्यों जाए और डरा क्यों न जाए। पहले सवाल का जवाब है कि जब पता चल गया कि शनि की साढ़ेसाती टाइमिंग और टाइम सेंस को खराब करती है तो सबसे पहले इसी पर चेक लगाया जाए। यानि इसे दुरुस्त करने के जमीनी उपाय शुरू कर दिए जाएं। मसलन घड़ी पहनी जाए और दिनांक और समय के प्रति सचेत रहा जाए। प्लान बनाकर काम किए जाएं और जहां जाएं वहां समय नष्ट करने के बजाय पूर्व में पूरी जानकारी एवं समय लेकर पहुंचा जाए। इसी तरह के खुद के मैनेजमेंट के हजारों उपाय हैं।
इससे साढ़ेसाती का असर नब्बे प्रतिशत तक कम हो जाएगा। दूसरा सवाल कि डरा क्यों न जाए। वह इसलिए कि एक आदमी की औसत आयु सत्तर साल भी मान ली जाए तो उस व्यक्ति की जिंदगी में तीन बसा साढ़ेसाती आएगी। यानि साढे़ बाइस साल तक साढ़ेसाती का काल रहेगा। यही नहीं कुछ योग शनि के कंटक के भी बनेंगे। यानि उस दौरान भी साढ़ेसाती के कुछ असर रहेंगे। इस तरह तो पहले चालीस साल के सक्रिय जीवनकाल में ही पंद्रह साल ऐसे आ जाएंगे जब इस डर के साथ जीना पड़ेगा। अब यह बात कैसे मानी जा सकती है कि किसी व्यक्ति के चालीस में से पंद्रह साल तो खराब ही हो गए। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। साढ़े साती पूरी तरह खराब भी नहीं होती। अपने तीन चरणों में वह सिर, पेट और पैर में या इससे ठीक उल्टे क्रम में रहती है। जब सिर में होगी तो सोचने के लिए मजबूर करेगी और जब पांव में होगी तो दौड़ने के लिए और जब पेट में होगी तो ढेर सारा धन दिलाएगी। यानि पेट भर देगी। अगर ऐसी है साढ़ेसाती तो डरने की नहीं बल्कि रोलर कोस्टर राइड करने का समय है। तो अब मैं सोच सकता हूं कि इस बार जब कोई आपको बताएगा कि आपकी साढ़ेसाती शुरू होती है अब... और आपको दिमाग में आएगा कि ठीक है चलो चलते हैं राइड पर।
कब चिंता करनी चाहिए...
जब आपके किसी वृद्ध परिजन को साढ़ेसाती लगे तो चिंता करनी चाहिए। आमतौर पर तीसरी साढ़ेसाती जीवन के साथ ही खत्म होती है और तीसरी किसी तरह निकल जाए तो चौथी आखिरी होती है। हर कोई जानता है कि वृद्ध लोग रोलरकोस्टर राइड नहीं कर पाते हैं। साढेसाती में यही होता है। इसी से बड़े बूढों को दिल और दिमाग की बीमारियां होती है। कुछ लोग शारीरिक रूप से थक कर हार जाते हैं तो कुछ मानसिक लड़ाई में टूटते हैं। लेकिन जवानों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता।
मैंने आपकी जिंदगी के पहले पचास साल सिक्योर कर दिए हैं साढ़ेसाती के प्वाइंट आफ व्यू से। अब आपकी बारी है मुझे नया विचार देने की। :)
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मंगलवार, फ़रवरी 17, 2009
वास्तु और इसके नियम
पिछली पोस्ट में एक बेहतरीन सवाल मेरे पास आया वह यह कि जिन घरों में भूमि पूजन नहीं कराया गया हो वहां कैसे सुख समृद्धि रहेगी। वास्तु के हिसाब से वे कैसे अच्छे घर सिद्ध हो सकते हैं। यह सवाल किया था अल्पना वर्मा जी ने उन्हीं के शब्दों में
'अगर किसी कारणवश किसी इमारत को बनाने से पहले नींव पूजन न होसके तो क्या करना चाहिये?
भारत के अलावा कई पश्चिमी देशों में भूमि पूजन या नींव पूजन आदि नहीं कराये जाते तब भी वहां सब ठीक रहता है.'
यहां मैं बताना चाहूंगा कि वास्तु विषय के मुताबिक पूजन कराना अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि एक सुविधा है। यानि अगर पूजन नहीं भी कराया है तो उस घर में सुखी और समृद्ध बनकर रहा जा सकता है। लेकिन अब भी वास्तु के नियम वही रहेंगे।
बात कुछ उलझ रही लग सकती है। ठीक है पहले समझते हैं वास्तु आखिर में है क्या। किसी भी स्थान की अवस्था को वास्तु कहा जा सकता है। स्थान की अवस्था का आकलन करने के लिए यह देखा जाएगा कि वह कहां स्थित है, हवा, पानी, रोशनी आदि की कैसी व्यवस्था है, घर के बाहर के क्या हालात हैं आदि। यह तो हुई स्थान की इंडिपेंडेंट बात। अब उस स्थान के मालिक और स्थान में भी एक संबंध होता है। यही संबंध तय स्थान पर हुए निर्माण में दृष्टिगोचर होता है। कैसे ?
बहुत सामान्य बात है। शनि से प्रभावित लोगों के घरों में आप ट्यूबलाइट अधिक देखेंगे और वह भी धीमी जल रही होगी। बाकी अधिकांश घर ऐसा होगा कि दिन में भी अंधेरा महसूस हो। मंगल और सूर्य से प्रभावित लोग अपने घर के आगे और पीछे इतनी जगह छोड़ते हैं कि देखने वाले को लगता है कि जमीन कुछ ज्यादा ही बड़ी ले ली लेकिन घर छोटे भाग में ही बनाया है। हर व्यक्ति के व्यक्तित्व की छाप उसके आवास पर दिखाई देगी। अब यह तो बात हुई वास्तु की उपस्थिति की। अब यह पूजन का क्लॉज कब जुड़ गया। मैं तो कहूंगा कि यह भी जरूरी भाग है। प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक भारत से शुरू से ही नहीं समझा। पहले योगियों का भी मजाक उड़ाया जाता था अब योग फैशन बन रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि प्राणायाम के क्या क्या लाभ हैं इसका निर्णय होना अभी बाकी है। यह न केवल सामान्य रोगों को ठीक करता है बल्कि कई प्रकार के जेनेटिक डिसऑर्डर को भी दुरुस्त कर देता है। ऐसी ही स्थिति नींव पूजन के साथ भी है। बहुत से लोगों को पता नहीं है कि इसका क्या महत्व है।
लेकिन जब तक इसका महत्व लैबोरेट्रीज में पता चले उससे पहले तो कम से कम इसे जिंदा रखने के लिए हमें भूमि पूजन कराते रहना चाहिए। रही बात पश्चिमी सभ्यता के लोगों की जो भूमि पूजन नहीं कराते हैं। वे हमारी तरह ही कभी सुखी कभी दुखी होते रहते हैं। हां हम एक बात में उनसे आगे रहते हैं वह यह कि हमें महसूस होता है कि हां कोई तीसरी शक्ति है जो पर्दे के पीछे रहकर लगातार हमारी सहायता कर रही है। बस यही है भूमि पूजन का वास्तविक महत्व...
मेरा शहर बीकानेर, अगली बार बताउंगा विश्व और आपके शहर का वास्तु
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शुक्रवार, जुलाई 20, 2007
प्रश्न कुण्डली और फलादेश
कई बार लोगों की उलझन होती है कि हमारा जन्म समय या तिथि सही ज्ञात नहीं है। ऐसे में ज्योतिष संबंधी फलादेश कैसे किए जाएं। ज्योतिष में इसका सटीक जवाब प्रश्न कुण्डली है।
पिछले कुछ सालों में अस्पतालों में शिशु जन्म की स्थितियां बढ़ने के कारण जन्म समय कमोबेश सही मिलने लगे हैं। पर अब भी जन्म समय को लेकर कई तरह की उलझनें बनी हुई है। आमतौर पर शिशु के गर्भ से बाहर आने को ही जन्म समय माना जाता है। इसके अलावा माता से नाल के कटने या पहली सांस लेने का भी जन्म समय लेने के मत देखने को मिलते हैं। ऐसे में प्रश्न कुण्डली ऐसा जवाब है जिससे जन्म तिथि और जन्म समय को नजरअंदाज किया जा सकता है।
प्रश्न कुण्डली वास्तव में समय विशेष की एक कुण्डली है जो उस समय बनाई जाती है, जिस समय जातक प्रश्न पूछता है। यानि जातक द्वारा पूछे गए प्रश्न का ही भविष्य देखने का प्रयास किया जाता है। इसमें सवाल कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर तात्कालिक समस्या ही सवाल होती है। ऐसे में समस्या समाधान का जवाब देने के लिए प्रश्न कुण्डली सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है। ध्यान रखने की बात यह है, कि प्रश्न के सामने आते ही उसकी कुण्डली बना ली जाए। इससे समय के फेर की समस्या नहीं रहती। इसके साथ ही जातक की मूल कुण्डली भी मिल जाए और वह प्रश्न कुण्डली को इको करती हो तो समस्या का हल ढूंढना और भी आसान हो जाता है। कई बार जातक जो मूल कुण्डली लेकर आता है, वह भी संदेह के घेरे में होती है। ओमेने (जो कि संकेतों का विज्ञान है) बताता है कि जातक का ज्योतिषी के पास आने का समय और जातक की कुण्डली दोनों आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। ऐसे में प्रश्न कुण्डली बना लेना फलादेश के सही होने की गारंटी को बढ़ा देता है।
प्रश्न कुण्डली के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि जातक के सवाल का सही नहीं होना। ज्योतिष की जिन पुस्तकों में प्रश्नों के सवाल देने की विधियां दी गई हैं उन्हीं में छद्म सवालों से बचने के तरीके भी बताए गए हैं। इसका पहला नियम यह है कि ज्योतिषी को टैस्ट करने के लिए पूछे गए सवालों का जवाब कभी मत दो। ऐसा इसलिए कि ओमेने के सिद्धांत के अनुसार छद्म सवाल का कोई उत्तर नहीं होता। जातक का सवाल सही नहीं होने पर प्रश्न और कुण्डली एक-दूसरे के पूरक नहीं बन पाते हैं। ऐसे में प्रश्न कुण्डली बनाने के साथ ही ज्योतिषी को प्रश्न के स्वभाव का प्रारंभिक अनुमान भी कर लेना चाहिए। इससे प्रश्न में बदलाव की संभावना कम होती है।
कमोबेश एक जैसे सवाल
ज्योतिष कार्यालय चलाने वाले लोग जानते हैं कि एक दिन में एक ही प्रकार की समस्याओं वाले लोग अधिक आते हैं। इसका कारण यह है कि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति होती है उससे पीडि़त होने वाले लोगों का स्वभाव भी एक जैसा ही होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि समान राशि या कुण्डली वाले लोगों को एक जैसी समस्याएं होगी बल्कि ग्रह योगों की समान स्थिति से समान स्वभाव की समस्याएं सामने आएंगी। मेरा अनुभव बताता है कि जिस दिन गोचर में चंद्रमा और शनि की युति होगी, तो उस दिन मानसिक समस्याओं से घिरे लोग अधिक आएंगे। हां, मानसिक समस्याओं का प्रकार लग्न और अन्य ग्रहों के कारण बदल जाता। कोई सिजोफ्रीनिया से पीडि़त हो सकता है तो कोई क्रोनिक डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। किसी को दिमागी सुस्ती की समस्या हो सकती है तो कोई साइको-सोमेटिक डिजीज से ग्रस्त हो सकता है। इस तरह प्रश्न कुण्डली से एक ओर जातक का विश्लेषण आसान हो जाता है तो दूसरी ओर भूतकाल स्पष्ट करने के बजाय भविष्य कथन में अधिक ध्यान लगाया जा सकता है।
प्रश्न कुण्डली के फायदे
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