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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष कक्षा: 3सरा दिन - राशियां, भाव और भावेश

तीसरे दिन की कक्षा तक दो या तीन छात्र ही किताबें लेकर आए। शेष ने बारह दिन की कक्षा के दौरान ही सारी ज्‍योतिषी बोर्ड पर ही समझने की ठान ली थी। इसके चलते उन्‍होंने किताबें खरीदने के बजाय केवल मुझसे सुनकर जितना हासिल हो सके उतना ही हासिल करने का मानस बनाया है। तीसरे दिन कक्षा के बाद मैं पोस्‍ट नहीं लिख पाया। अब कई दिन बाद पोस्‍ट लिख रहा हूं। सो इस बीच छात्रों को किताबें खरीदने के लिए तैयार करने की कोशिश करता रहा। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि कक्षा के बारह छात्रों में से आठ ने किताबें खरीद ली हैं। इनमें से दो ने देवकीनन्‍दन सिंह की ज्‍योतिष रत्‍नाकर खरीदी तो शेष छह पुस्‍तक महल की फलित ज्‍योतिष रेडीरेकनर खरीद लाए हैं। ठीक है एलीमेंट्री ज्‍योतिष के लिए यह किताब भी बुरी नहीं है। कक्षा में पढ़ाए विषय की बात से पहले स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा कि ज्‍योतिष अध्‍ययन बहुत शादी अंदाज है। इसे तब तक पढ़ा नहीं जा सकता जब तक आप समय और धन खर्च करने के लिए मानसिक रूप से पर्याप्‍त तैयार नहीं हो जाते। वरना गद्दी तपने वाले ज्‍योतिषी से अधिक नहीं बन पाएंगे। गद्दी तपने के अंदाज पर एक जुदा पोस्‍ट फिर कभी....
फिलहाल तो ज्‍योतिष की कक्षा का एक फोटो... अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर अजीज भुट्टा ने अपने कैमरे की नजरे इनायत की और हमारा एक फोटो खींचकर हमें मेल कर दिया। हालांकि एक फोटो अखबार में भी छपा था, लेकिन समाचार पत्र की पॉलिसी की वजह से उसमें फैकल्‍टी का फोटो नहीं दिया गया था।

भचक्र की बारह राशियां
तारों और उससे बने नक्षत्रों के बारे में हम पहले पढ़ चुके हैं। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं। नक्षत्रों के नौ चरणों से एक राशि बनती है। यानि सवा दो नक्षत्रों की एक राशि होती है। राशियां कुल बारह हैं। पहली राशि मेष, द्वितीय वृष, तृतीय मिथुन, चतुर्थ कर्क, पंचम सिंह, छठी कन्‍या, सातवीं तुला, आठवीं वृश्चिक, नौंवी धनु, दसवीं मकर, ग्‍यारहवीं कुंभ और बारहवीं राशि मीन है। हर राशि का अधिपति होता है। सूर्य और चंद्रमा के आधिपत्‍य में एक-एक राशि है और शेष अन्‍य ग्रहों के अधिकार में दो-दो राशियां हैं। मेष और वृश्चिक राशि का अधिपति मंगल है। वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्‍या का बुध अधिपति है। चंद्रमा का कर्क राशि पर अधिकार है और सूर्य का सिंह राशि पर। धनु और मीन राशि का अधिपति गुरु है और मकर व कुंभ राशि का शनि अधिपति है।
भाव और भावेश क्‍या है?

भचक्र के 360 अंशों को 12 भागों में बांटा गया है। इनमें से हर भाग 30 डिग्री का है। इस भाग को भाव कहते हैं। जब कोई कुण्‍डली हमारे सामने आती है तो उसमें बारह खाने बने हुए होते हैं। इनमें से सबसे ऊपर वाला पहला भाव होता है। कुण्‍डली के भावों को कुछ इस तरह से बताया जा सकता है। जिस भाव में जो संख्‍या लिखी है वह भाव की संख्‍या है। पहला भाव कुण्‍डली का सबसे महत्‍वपूर्ण भाव होता है। इसे लग्‍न कहते हैं। जातक के जन्‍म के समय यही भाव पूर्व दिशा में उदय हो रहा होता है। लग्‍न से जातक की आत्‍मा, मूल स्‍वभाव, उसका स्‍वास्‍थ्‍य देखा जाता है। अन्‍य विषयों के विश्‍लेषण के दौरान भी लग्‍न की स्थिति प्रमुखता से देखी जाती है। यदि लग्‍न मजबूत होता है तो कुण्‍डली अपने आप दुरुस्‍त हो जाती है। अगर किसी जातक की कुण्‍डली में लग्‍न खराब हो रहा हो तो पहले उसी का उपचार किया जाता है।
जहां दो लिखा है वह द्वितीय भाव है। यहां से जातक का परिवार और धन देखा जाता है। तीसरा भाव भाई बंधु और छोटी यात्राएं देखने के लिए है। चौथा भाव माता और घर की शांति बताता है, पांचवा भाव जातक की उत्‍पादकता और संतान के बारे में बताता है। छठा भाव ऋण, रोग और शत्रुओं की जानकारी देता है। सातवां भाव पत्‍नी और व्‍यापार में साझेदार के बारे में बताता है। आठवां भाव आयु और गुप्‍त कार्यों, नौंवा भाव भाग्‍य, दसवां कर्म, ग्‍यारहवां आय और बारहवां भाव व्‍यय की जानकारी देता है। आय, व्‍यय और कर्म किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।

लग्‍न में कोई भी राशि हो सकती है। बारह राशियों में से जो राशि लग्‍न में होगी जातक का लग्‍न उसी राशि के अनुरुप कहा जाएगा। यदि जातक के जन्‍म के समय मिथुन या तुला राशि का उदय हो रहा है तो कहेंगे कि जातक का लग्‍न मिथुन या तुला का है। फर्ज कीजिए कि एक जातक 7 जून 2011 को रात 8 बजकर 19 मिनट पर बीकानेर में पैदा होता है तो उसकी कुण्‍डली कुछ इस तरह होगी। (दाएं ओर के चित्र में दर्शाए अनुसार)
इसमें कुण्‍डली के लग्‍न में धनु राशि है। ऐसे में कहेंगे कि धनु लग्‍न की कुण्‍डली है। धनु राशि का स्‍वामी गुरु है। ऐसे में कहेंगे कि लग्‍न का अधिपति गुरु है। दूसरे व तीसरे भाव का अधिपति शनि। चौथे का फिर से गुरु, पांचवें व बारहवें का मंगल, छठे व ग्‍यारहवें का शुक्र, सातवें और दसवें का बुध, आठवें का चंद्र, नौंवे का सूर्य अधिपति होगा। ज्‍योतिषीय शब्‍दावली में इसे कहेंगे कि लग्‍नेश गुरु, द्वितीयेश व तृतीयेश शनि, चतुर्थेश गुरु, पंचमेश मंगल, षष्‍ठेश शुक्र, सप्‍तमेश बुध, अष्‍टमेश चंद्र, नवमेश सूर्य, दशमेश बुध, एकादशेश शुक्र, द्वादशेश मंगल है।
ज्‍योतिष की कक्षा में तीसरे दिन हम करेंगे राशियों से परिचय। इसमें हम मेष से मीन तक की बारह राशियों की विशेषताओं पर चर्चा करेंगे।

ज्‍योतिष की कक्षा - पांचवां दिन

अब तक हमने पढ़ा है ज्‍योतिष की जरूरत क्‍यों है, ग्रह, नक्षत्र और राशियां क्‍या है और पिछली पोस्‍ट में हमने राशियों से परिचय प्राप्‍त करना शुरू किया था। मेष, वृष और मिथुन राशि के बाद आज हम पढ़ेंगे कर्क राशि के बारे में। हालांकि मैं इन राशियों के बारे में छोटी छोटी जानकारी ही दे रहा हूं, लेकिन ये वह जानकारी है जिसे पढ़ने के बाद आप जातक को देखकर अनुमान लगा सकते हैं कि यह किस राशि का जातक हो सकता है। या किस राशि का प्रभाव जातक पर अधिक है। इस बारे में विशद जानकारी के लिए आपको ज्‍योतिष रत्‍नाकर और फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी पुस्‍तकें भी पढ़नी चाहिए। अगर आप पढ़ेंगे नहीं तो... अब क्‍या कहें।

सर्वाधिक राजयोग बनाने वाली कर्क राशि

दरअसल मुझे पहली बार इस राशि का परिचय ऐसे ही प्राप्‍त हुआ था। आप गौर कीजिए कि कर्क लग्‍न होने पर कुण्‍डली क्‍या बनेगी।

इस कुण्‍डली में चारों केन्‍द्र ऐसे हैं जिनमें ग्रह उच्‍च के होते हैं। लग्‍न में कर्क राशि में गुरु आएगा तो उच्‍च का होगा, चौथे भाव में शनि उच्‍च का होगा, सातवें भाव में मंगल और दसवें भाव में सूर्य उच्‍च का होगा। इसके अलावा लग्‍न से ग्‍यारहवां भाव आय का है। चंद्रमा अगर उच्‍च का हुआ तो इस भाव में होगा। सूर्य, बुध और शुक्र के सर्वाधिक संबंध बनते हैं। ऐसे में कर्क लग्‍न वालों के धन और आय के संबंध के योग भी कमोबेश अधिक बनते हैं। शुक्र बेहतर होने पर पैसा और प्रसिद्धि साथ साथ मिलते हैं। किसी भी लग्‍न में पाया जाने वाला यह दुर्लभ योग है जो कर्क में सहजता से उपलब्‍ध होता है। इन सभी बिंदुओं के चलते कर्क लग्‍न को राजयोग का लग्‍न कहा गया है।

कर्क राशि की विशेषताएं

यह पृष्‍ठ से उदय होने वाली राशि है। इनका बेढंगा शरीर, दुर्बल अवयव और शक्तिशाली पंजा होता है। इनके शरीर का ऊपर हिस्‍सा बड़ा होता है। उम्र बढ़ने के साथ इनकी तोंद भी बढ़ती जाती है। केश कत्‍थई और भूरापन लिए होते हैं। अस्थिर चेतना वाले इन जातकों की जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आते हैं। चंद्र का आधिपत्‍य इन्‍हें उर्वर कल्‍पनाशीलता होती है। धन संपन्‍नता या सम्‍मान की स्थिति पाने के लिए ये लोग दक्षता से जन समूह को प्रेरित कर देते हैं। ये लोग घर परिवार औ सुख की कामना करते हैं। उपहास और समालोचना का भय इन्‍हें विचारशील, कूटनीतिज्ञ और लौकिक बना देता है। जातक का स्‍वास्‍थ्‍य जवानी में खराब रहता है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ स्‍वास्‍थ्‍य सुधरता जाता है। इस राशि वाले जातकों के लिए मंगलवार का दिन शुभ होता है। हस्‍तलेखन अस्थिर होता है, शुभ रंग श्‍वेत, क्रीम और लाल है। शुक्रवार को ये लोग आनन्‍द और लाभ अर्जित कर सकते हैं।

कर्क राशि से प्रभावितों के उदाहरण

भारतीय राज व्‍यवस्‍था में कर्क राशि का बड़ा महत्‍व रहा है। आजानुभुज राम कर्क लग्‍न के थे। उनकी कुण्‍डली में सूर्य, मंगल, गुरु, शनि, शुक्र और चंद्रमा उच्‍च के थे। वर्तमान दौर में इंदिरा गांधी, अटलबिहारी वाजपेयी और अब सोनिया गांधी की कुण्‍डली कर्क लग्‍न की बताई जाती है। मैंने खुद ने अब तक ये कुण्‍डलियां देखी नहीं है इसलिए मैंने लिखा बताई जाती हैं, अटल बिहारी वाजपेयी की कुण्‍डली तो जिस ज्‍योतिषी ने देखी उन्‍होंने ही मुझे बताया कि उनके कर्क लग्‍न और लग्‍न में शनि है।

लेख बड़ा हो गया इसलिए इस बार केवल कर्क राशि का ही विश्‍लेषण करेंगे। अगली कक्षा में हम बात करेंगे सिंह और कन्‍या राशि की...

Encyclopedia of astrological remedies : LALA KITAB

उपायों का विश्‍वकोष : लाल किताब

ज्‍योतिष के मूल रूप से दो भाग हैं। इनमें से एक है सिद्धांत और दूसरा है फलित। सिद्धांत पक्ष में ज्‍योतिष का वह भाग है जो खगोलीय गणनाओं से संबंधित है और इन गणनाओं में से ज्‍योतिष के उपयोग में आने वाली गणनाओं का इस्‍तेमाल किया गया है। जैसे कि आकाश को 360 डिग्री में बांटकर उसका 12 बराबर भागों में विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की गति और ग्रहण जैसी घटनाएं। आकशीय घटनाओं की पुख्‍ता जानकारी मिलने के बाद उनका मानव जीवन पर असर के बारे में अध्‍ययन ज्‍योतिष का फलित हिस्‍सा है। 

             फलित ज्‍योतिष में आकाशीय घटनाओं का मानव जीवन से संबंध जोड़ा गया है। जब ज्‍योतिषी ग्रहों की चाल के आधार पर जातक को भविष्‍य बता देता है तो जातक का अगला सवाल होता है कि ग्रहों की चाल के कारण बन रही खराब स्थितियों से कैसे बचा जाए। इसके लिए फलित ज्‍योतिष में उपायों का विकास हुआ। 

             प्राचीन या वैदिक कही जाने वाली भारतीय फलित ज्‍योतिष में उपचारों के लिए दान, जप और पूजन का प्रावधान दिया गया था। यह कमोबेश ग्रहों की स्थिति के कारण बन रही खराब स्थितियों के लिए प्रायश्चित की तरह था, लेकिन लाल किताब ने उपायों की एक नई सीरीज शुरू की। हालांकि यह पारंपरिक ज्‍योतिष से कुछ हटकर गणनाएं करती है, लेकिन उसके आधार पर बताए गए उपचार इतने अधिक और सटीक हैं कि हमें ग्रहों के कारण बन रही खराब स्थितियों से निपटने के लिए बहुत अधिक संभावनाएं मिल जाती हैं। 

             लाल किताब ज्‍योतिष की ऐसी पुस्‍तक है जो पारंपरिक ज्‍योतिष की तरह कुण्‍डलियों के विश्‍लेषण को दरकिनार कर अपनी पद्धति पेश करती है। इसके अनुसार राशियों की चाल का कोई महत्‍व नहीं है। लग्‍न हमेशा मेष राशि होगी और इसी तरह बारह भावों में बारह राशियां स्थिर कर दी गई हैं। 

             उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न के जातक की कुण्‍डली भी बनाई जाए तो भी लग्‍न मेष ही रहेगा। शेष ग्रह जिस भाव में बैठे हैं उन्‍हीं का इस्‍तेमाल किया जाएगा। ऐसे में कोई ग्रह उच्‍च या नीच का होगा तो भावों में स्थिति की वजह से होगा। इसकी भाषा मूल रूप से उर्दू और हिन्‍दी का मिला जुला रूप है। जो ग्रह खराब प्रभाव वाले हैं उन्‍हें अपने स्‍थान से हटाकर दूसरे स्‍थानों पर ले जाया जा सकता है। 

             अगर सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हकीकत में खगोलीय पिण्‍डों को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर खिसकाना असंभव है, लेकिन लाल किताब कहती है कि ग्रहों को भले ही न खिसकाया जा सकता हो, लेकिन जातक की कुण्‍डली में उसके प्रभाव को बदला जा सकता है। हर ग्रह के प्रभाव को बदलने के लिए लाल किताब ने तय सिद्धांत भी बनाए हैं। मसलन किसी ग्रह को लग्‍न में लाने के लिए उससे संबंधित रत्‍न, धातु अथवा वस्‍तु को गले में पहनना होगा। इससे ग्रह का असर ऐसा होगा कि वह लग्‍न में बैठा है। 

             इसी तरह दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए घर में वस्‍तु स्‍थापित करें, तीसरे भाव के लिए हाथ में, चौथे के लिए बहते पानी में, पांचवे के लिए स्‍कूल में, छठे के लिए कुएं में, सातवें के लिए जमीन में, आठवें के लिए श्‍मशान में, नौंवे के लिए धर्मस्‍थान में, दसवें के लिए सरकारी प्‍लाट या भवन में और बारहवें भाव में किसी वस्‍तु तो पहुंचाने के लिए छत पर संबंधित वस्‍तुओं को रखना होगा। लाल किताब कहती है कि ग्‍यारहवां भाव आय या लाभ का होता है, इस भाव के लिए कोई उपचार नहीं है। उपायों से ग्रहों को अपने पक्‍के या बेहतर लाभ देने वाले भावों में पहुंचाने और खराब प्रभाव देने वाले ग्रहों को हटाने का प्रयास किया जाता है।

मसनुई ग्रह

पारंपरिक ज्‍योतिष के इतर लाल किताब ग्रहों की युति यानी दो या अधिक ग्रहों के एक ही भाव में बैठने को मसनुई ग्रह की उपाधि देती है। इसके अनुसार अगर किसी भाव में दो या इससे अधिक ग्रह बैठे हैं तो उन सभी का प्रभाव किसी अन्‍य ग्रह की तरह होने लगेगा। ग्रहों की युति किसी अन्‍य ग्रह को सहायता भी कर सकती है और उसके प्रभाव को खराब भी कर सकती है। उदाहरण के तौर पर गुरु और सूर्य एक भाव में बैठकर चंद्रमा का प्रभाव पैदा करते हैं, इसी तरह बुध और शुक्र से सूर्य, सूर्य और बुध से मंगल, शुक्र और गुरु से शनि का प्रभाव पैदा होता है। इसी के आधार पर संबंधित ग्रह का उपचार कर दिया जाता है। 

विशिष्‍ट शब्‍दावली

लाल किताब ने न केवल उपायों का पूरा शास्‍त्र रच दिया, बल्कि अपनी विशिष्‍ट शब्‍दावली भी पेश की है। जैसे पक्‍का घर। हर ग्रह का अपना पक्‍का घर होता है। यह वह भाव होता है जहां ग्रह अपने सबसे अच्‍छे प्रभाव के साथ होता है। शक्‍की हालत का ग्रह उसे कहते हैं जो अपने निश्चित भाव को छोड़कर किसी और भाव में बैठा हो। सोया हुआ ग्रह उसे कहते हैं जब कोई ग्रह ऐसे भाव में बैठा हो जिससे सातवें भाव में कोई ग्रह न हो। इसके साथ ही ग्रहों के बलिदान के बारे में भी बताया गया है। 
             इसके अनुसार किसी ग्रह की स्थिति खराब होने पर उससे संबंधित दूसरे ग्रहों का प्रभाव खराब हो जाता है। इस हालत में लाल किताब के अनुसार बलिदान दे रहे ग्रहों का उपचार किए जाने की जरूरत होती है। 

             लाल किताब की भाषा मूलत: उर्दू है और भाषा प्रभाव से लगता है कि सौ या डेढ़ सौ साल पहले इसे पंजाब के किसी प्रांत में विकसित किया गया था। कुछ लोग इसे अरुण संहिता का नाम भी देते हैं, लेकिन इसके वास्‍तविक लेखक का कहीं जिक्र नहीं आता है। इसकी सामान्‍य से अलग भाषा के कारण कई बार लोग इसके कथ्‍य को समझ नहीं पाते हैं और कई गलत अर्थ निकाल लिए जाते हैं। 
             इस कारण लाल किताब के उपचार जहां मूल रूप से लोगों की जिंदगी को आसान बनाने का प्रयास करते नजर आते हैं, वहीं इसकी भाषा से उपजे समान अर्थ लोगों में भय भी पैदा कर देते हैं। इसके बावजूद वर्तमान दौर में उपायों के मामले में लाल किताब का कोई विकल्‍प नहीं है। दान, पूजन और साधना के जरिए दीर्धकाल में मिलने वाले लाभ की तुलना में लोग लाल किताब के तुरत फुरत उपचार करने में अधिक सहज महसूस करते हैं।
STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA

बुधवार, फ़रवरी 08, 2012

Naptune cycle in houses

नेप्‍च्‍यून का भावों में विचरण


Astrology today by sidharth Joshi

पश्चिमी ज्‍योतिषियों के अनुसार नेप्‍च्‍यून सपनों और छद्म प्रभावों का ग्रह है। यह भावों, राशियों एवं अन्‍य ग्रहों को अपना विशिष्‍ट प्रभाव देता है। राशियों में यह गुरु के साथ मीन राशि का आधिपत्‍य साझा करता है। इसे भौतिक और आध्‍‍यात्मिक दुनिया के बीच की कड़ी मानते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह जातक के अवचेतन के संबंधों के बारे में जानकारी देता है। इस ग्रह की ऊर्जा को धोखे, भ्रम और निराशाजनक लत के रूप में देखा जा सकता है। देसी अंदाज में कहें तो जातक की कुण्‍डली में नेप्‍च्‍यून ग्रह जिस स्‍थान पर होगा, उस स्‍थान से संबंधित चमत्‍कार पैदा करेगा। बारह भावों और बारह राशियों में नेप्‍च्‍यून के असर को देखा जा सकता है। हर राशि और भाव में नेप्‍च्‍यून रहस्‍य, आदर्श, अध्‍यात्‍म और कल्‍पनाओं के तीव्र असर का समावेश कर देगा। उदाहरण के तौर पर अगर नेप्‍च्‍यून दूसरे भाव में है तो जातक धन कमाने के लिए नए और असामान्‍य तरीके काम में लेगा। 

नेप्‍च्‍यून एक राशि में करीब 14 साल तक रहता है। इसके चलते पूरी एक जनरेशन के स्‍वभाव में एक जैसा प्रभाव भी देखा जा सकता है। भारतीय परिपेक्ष्‍य में देखें तो आजादी के पहले के सालों को चौदह-चौदह सालों में विभाजित करें तो हर दौर में एक विशिष्‍ट श्रेणी के लोग अधिक आए। आजादी के बाद भी पीढि़यों की विशिष्‍टता के दौर जारी हैं। कोई राष्‍ट्रवादी पीढ़ी है तो कोई भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाली। कोई दौर पश्चिमी अंधानुकरण वालों का रहा तो कोई दौर देश के लिए काम करने वाले लोगों का रहा। पश्चिमी देशों को देखा जाए तो मिथुन राशि बौद्धिकता की परिचायक है। ऐसे में वर्ष 1887 से 1901 के बीच रचनात्‍मक जीनियस लोगों की भरमार रही। इसी तरह वर्तमान दौर (1998 से 2012) में नेप्‍च्‍यून कुंभ राशि में है। यह राशि मानवतावाद और मौलिक चिंतन वाली है। इस दौर के लोग परम्‍परागत सोच से हटकर काम करने वाले और मानवता की सहायता करने वाले काम करने वाले सिद्ध हो सकते हैं। 

नेप्‍च्‍यून का गोचर


इस ग्रह को एक राशिचक्र पूरा करने में 164 साल का समय लगता है। ऐसा माना जाता है कि नेप्‍च्‍यून का असर इस पर निर्भर करता है कि हम इससे प्रभाव से पैदा हुई स्थितियों के साथ जीने की कोशिश कर रहे हैं अथवा इसका विरोध कर रहे हैं। दरअसल यह ग्रह अपने गोचर के प्रथम चरण में भ्रम पैदा करता है और बाद में स्थितियों को चमत्‍कारिक रूप से साफ दिखाता है। हकीकत में यह अमूर्त से हमारे तीसरी शक्ति से संपर्क का माध्‍यम बनता है, और अपने गोचर के अंत में फिर से भौतिक जगत में ले आता है। इस ग्रह का प्रभाव कहां कितना होगा और किस तरह कार्य करेगा इस बारे में भी बताना कुछ मुश्किल है। हां, संकेत निकाले जा सकते हैं, लेकिन ठीक ठीक क्रियाविधि बताना टेढ़ा काम है।

नेप्‍च्‍यून (Naptune) को एक राशिचक्र (Cycle) पूरा करने में तकरीबन 164 साल का समय लगता है। एक सामान्‍य व्‍यक्ति को इतनी लंबी अवधि तक जिंदा नहीं रहता है। दूसरी बात यह भी है कि कोई एक ज्‍योतिषी नेप्‍च्‍यून के प्रभावों का अध्‍ययन करने जितना भी नहीं जी सकता। ऐसे में प्राचीन घटनाओं, महापुरुषों की जीवनियों और इतिहास के साक्ष्‍यों को नेप्‍च्‍यून के गोचर के साथ मिलाकर अध्‍ययन कर कुछ निष्‍कर्ष निकाले गए हैं। रहस्‍य के मालिक इस ग्रह के विभिन्‍न भावों में प्रभावों के बारे में कई जगह बताया गया है। नेप्‍च्‍यून के अधिकार की राशि गुरु की दूसरी और भचक्र की आखिरी राशि मीन दी गई है। इसी के साथ बारहवां भाव भी नेप्‍च्‍यून का प्रिय भाव बताया गया है। इस नए नवेले और धीमे चलने वाले ग्रह के बारे में कुछ पश्चिमी पुस्‍तकों से मिली जानकारी को संक्षेप में यहां पेश करने का प्रयास कर रहा हूं। इसी के साथ कुण्‍डलियों पर इस ग्रह के स्‍थाई प्रभाव के बारे में अध्‍ययन जारी है। इसे master of disguise भी कहा जाता है।

परम्‍परागत भारतीय ज्‍योतिष में उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में मिले नेप्‍च्‍यून ग्रह को लेकर कोई सामग्रमी नहीं मिलती लेकिन बाद के साहित्‍य में इसे स्‍थान तो मिला, पर पहचान नहीं। यूरेनस को लेकर मेरा निजी अनुभव भी कुछ खास अच्‍छा नहीं रहा है। इसके बावजूद पिछले कुछ समय में नेप्‍च्‍यून को लेकर उत्‍साह में बढ़ोतरी हुई है। इस ग्रह को मास्‍टर ऑफ डिस्‍गायस भी कहा जाता है। आइए देखते हैं क्‍या है इस ग्रह में..

यहां नेप्‍च्‍यून के राशिचक्र में गोचर (Gochar) के प्रभाव के बारे में मिली जानकारी आपके साथ शेयर कर रहा हूं। वर्तमान में नेप्‍च्‍यून कुंभ राशि में विचरण कर रहा है। ऐसे में आप अपनी कुण्‍डली के अनुसार यह पता कर सकते हैं कि यह आपको किस तरह प्रभावित कर रहा है। मेष लग्‍न वालों के ग्‍यारहवें भाव को, वृष लग्‍न के दसवें भाव को, मिथुन के नौंवे, कर्क के आठवें, सिंह के सातवें, कन्‍या के छठे, तुला के पांचवें, वृश्चिक के चौथे, धनु के तीसरे, मकर के दूसरे और कुंभ लग्‍न के पहले और मीन लग्‍न के बारहवें भाव में विचरण कर रहा है। इसके अनुसार आप अपनी लग्‍न पर हो रहे प्रभाव का अध्‍ययन कर सकते हैं। 

पहले भाव में गोचर

यह दिमाग, शरीर और आत्‍मा को प्रभावित करता है। इन्‍हें अधिक ऊर्जा क्षेत्र में ले जाता है। जातक आस पास के लोगों की भावनाओं को अधिक दक्षता से समझने लगते हैं। जातक जब दूसरे लोगों से संपर्क करेंगे तो एक छद्म वातावरण का निर्माण करेगा। ऐसे लोग प्रेक्टिकल होने के बजाय आदर्शवादी, स्‍पप्‍नवादी अथवा संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाएंगे। कुछ जातकों का आत्‍मविश्‍वास घट भी सकता है। इनके जीवन की राह अनिश्चित होती है। 

दूसरे भाव में गोचर

यह नैतिक एवं अन्‍य प्रकार के मूल्‍यों में तेजी से बदलाव करता है। दूसरे भाव में नेप्‍च्‍यून के पहुंचने पर जातक धन को लेकर लापरवाह भी हो जाते हैं। इससे लंबे समय में वित्‍तीय असुरक्षा का वातावरण बनता है। ऐसे समय में घोटाले और सट्टेबाजी का दौर तेज हो जाता है। 

तीसरे भाव में गोचर

तीसरे भाव में विचारण के दौरान जातक अंतर्ज्ञान के बारे में जानना और समझना शुरू करता है। ऐसे जातकों को दुनियादारी की सामान्‍य बातें समझने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। जैसे, सरकारी अथवा अन्‍य स्रोतों से मिले आंकड़े। ऐसे समय में जातक दिए गए समय पर पहुंचने में चूक करने लगता है, यहां तक कि उसे तारीख और वार तक का भान भी नहीं रहता। संगीत, कविता और अन्‍य कला क्षेत्रों में ऐसे जातक तेजी से अपनी जगह बनाने लगते हैं। ये जातक अधिक कल्‍पनाशील हो जाते हैं और जीवन के नए रास्‍ते अपनी कल्‍पनाओं के आधार पर तय करने लगते हैं। इन जातकों की कवित्‍व शक्ति न केवल कविताएं गढ़ने के काम आती हैं, बल्कि कई बार प्रेरणादायक भी बन जाती हैं। 

चौथे भाव में गोचर

गोचर में चौथे में आया नेप्‍च्‍यून आपके परिवार, भूतकाल या पारिवारिक जीवन में उलझनें अथवा विभ्रम की स्थिति पैदा करता है। रिश्‍तों के प्रति आप व्‍यवहारिक के बजाय आदर्शात्‍मक सोच रखने लगते हैं। अगर आप सचेत नहीं होते हैं तो नेप्‍च्‍यून की यह स्थिति कई तरह की नई समस्‍याएं भी खड़ी कर देता है। परिवार के प्रति आपका कोई कमिटमेंट नहीं होना परिवार के सदस्‍यों के लिए मानसिक अवसाद अथवा दुख का कारण बनने लगता है। जब परिवार को आपके त्‍याग की जरूरत होती है तब आप उसके लिए उपलब्‍ध नहीं होते हैं। इस गोचर के दौरान आप सामान्‍य से अधिक नींद भी लेने लगते हैं। इसका एक कारण आपका जल्‍दी थक जाना भी हो सकता है। 

पंचम भाव में गोचर

नेप्‍च्‍यून के इस गोचर के दौरान आपके जीवन में रोमांस को अधिक शिद्दत से महसूस करने लगते हैं। इसी दौरान एक गड़बड़ होती है कि आप अपने प्रेमी अथवा जीवनसाथी से प्रेम अथवा व्‍यवहार के संबंध में कई तरह की उम्‍मीदें बांधना शुरू कर देते हैं। भले ही वे यर्थार्थ से दूर ही क्‍यों न हों। ऐसे में संबंधों में तनाव की स्थिति बनने लगती है। इसी के साथ आपकी संतान के संबंध में कई तरह की उलझनें सामने आने लगती हैं। अगर रचनाशीलता के कोण से देखें तो यह आपकी जिंदगी का सर्वश्रेष्‍ठ समय भी हो सकता है। 

छठे भाव में गोचर

आपकी रुचि दवाओं या रसायनों के प्रति बढ़ने लगती है। ऐसे में ध्‍यान रखने की बात यह है कि तनाव इस लंबे कालखण्‍ड में आपको शारीरिक तौर पर तोड़कर रख सकता है। इस दौरान आपका पेशा सहायता संबंधी सेवाओं में हो सकता है। इसमें दान और अन्‍य सहायता सेवाएं शामिल हैं। इस भाव में नेप्‍च्‍यून की स्थिति आपकी दैनिकचर्या और जीवनचर्या को प्रभावित करने वाली भी सिद्ध हो सकती है। 

सातवें भाव में गोचर

करीबी साझेदारों से दो तरह का व्‍यवहार देखने को मिल सकता है। साझेदारी में अनिश्चितता की स्थिति आपको परेशान करने लगती है। इसके साथ ही खुद आपके व्‍यवहार में अपने साझेदार अथवा पत्‍नी या पति के प्रति खराबी आने लगती है। साझा टूटने की हद तक की समस्‍याएं आप खुद बढ़ाने लगते हैं। दूसरों को आकर्षित करने की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ ही आपमें एक स्‍वाभाविक असुरक्षा की भावना भी बढ़ने लगती है, इससे आपके आस-पास के लोग परेशान होने लगते हैं। 

आठवें भाव में गोचर

नेप्‍च्‍यून के इस गोचर के दौरान आपके समक्ष साझा किए गए धन और संपत्ति के संबंध में समस्‍याएं बढ़ने लगती हैं। दूसरी ओर ऋण एवं अन्‍य वित्‍तीय सहायताएं भी उम्‍मीद से बेहतर अंदाज में मिलने लगती हैं। निजी संबंधों में प्रगाढ़ता आती है। इस दौर यह मेरा है, वह तुम्‍हारा है वाली भावना भी अपेक्षाकृत कम होने लगती है। आपके साझेदार की वित्‍तीय स्थिति खराब होने से व्‍यापार या व्‍यवसाय का आपका हिस्‍सा भी खराब होने लगता है। इस दौर में धोखे से सावधान रहने की बहुत जरूरत है। 

नौंवे भाव में गोचर

आपके जीवन से जुड़ी अधिकांश चीजों में बढ़ोतरी होने के संकेत मिलने लगते हैं। चाहे वह परिवार हो या समाज, धन हो या सफलता। यहां तक कि आध्‍यात्मिक क्षेत्र में भी उन्‍नति के अवसर मिलते हैं। आपके व्‍यक्तित्‍व में भी कुछ अधिक आकर्षण बढ़ता है। आपके स्‍वभाव में कुछ रहस्‍यमयी भावों के साथ दूसरों के प्रति नाजुकता का भाव आता है, इससे समाज और सर्किल में आपकी पकड़ तेजी से बढ़ती है। भावों से जुड़े कला क्षेत्रों में आपका रुझान भी तेजी से बढ़ता है। यात्रा, कानूनी मामलों और उच्‍च शिक्षा के प्रति उलझनें बढ़ने की परेशानी रहती है। 

दसवें भाव में गोचर

आपकी दृष्टि पर एक धुंधलापन आने लगता है। इससे अच्‍छी भली चल रही जिंदगी में भूचाल की आशंका परेशान करने लगती है। अगर आपने अपनी जिंदगी का एक मास्‍टर प्‍लान बना रखा है तो नेप्‍च्‍यून के इस भाव में गोचर के दौरान आपको इसकी उपादेयता पर शक होने लगता है। आपके कॅरियर और साख के साथ अनपेक्षित घटनाएं, संयोग, निजता और रहस्‍य खेलने लगते हैं। भले ही दूसरे लोगों को लगता रहे कि आप जैसे पहले थे वैसे ही अब भी हैं, लेकिन आप अंदर से परेशान होते हैं। अपने इस व्‍यवहार को काबू कर आप सफलता से इस दौर को पार कर सकते हैं। 

ग्‍यारहवें भाव में गोचर

नेप्‍च्‍यून का यहां यह प्रभाव होता है कि आपकी सामाजिक प्रतिष्‍ठा में तेजी से बढ़ोतरी होती है। इस राशि भ्रमण के दौरान यह ग्रह आपको खुद से जुदा लगभग प्रत्‍येक चीज से एक सुरक्षित दूरी बनाने के लिा बाध्‍य करता है। इससे हो सकता है कि आपके मित्र समूह या संगठन में आपकी साख को बट्टा लग रहा हो, लेकिन आप सुरक्षित रहने में ही भलाई समझने लगते हैं। यह दौर आपको सिखा देता है कि कौन मित्र हैं और किनसे दूरी रखनी है। 

बारहवें भाव में गोचर

नेप्‍च्‍यून का यह सबसे प्रिय भाव है। यहां गोचर कर रहा ग्रह आपको अकेले में बैठकर आनन्‍द लेने योग्‍य बनाता है। इस समय आपको किसी की भी जरूरत नहीं रहती। इस समय आप बेहतरीन सपने लेते हैं। प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों को आप अधिक शिद्दत से महसूस करने लगते हैं। तीसरी शक्ति के प्रति आस्‍था भी नेप्‍च्‍यून के इस गोचर के दौरान तेजी से बढ़ती है।

भारतीय ज्‍योतिष की किसी भी प्राचीन पुस्‍तक में इन ग्रहों के बारे में स्‍पष्‍ट जानकारी उपलब्‍ध नहीं है। हालांकि मैंने सभी पुस्‍तकें जांची नहीं हैं, लेकिन इस बारे में मैंने अपने गुरुओं से पूछा है। उन्‍होंने बताया कि इस ग्रह की खोज होने के बाद भी भारतीय ज्‍योतिषियों ने इस पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया है। जो कुछ थोड़ा बहुत फौरी अध्‍ययन हुआ है वह पश्चिमी ज्‍योतिषियों ने ही किया है।

बुधवार, नवंबर 02, 2011

सोच की गति से पैसा

देखने में यह काल्‍पनिक विषय है लेकिन ऐसा होता है। जो लोग सालों तक बिजनेस में लगे रहते है उन्‍हें पता है कि एक समय ऐसा भी होता है जब सोच की गति से पैसा बनना शुरू हो जाता है। हालांकि हर समय ऐसा नहीं होता। जिन लोगों के जीवनकाल में ऐसा वक्‍त आकर जा चुका होता है वे बार-बार ज्‍योतिषियों के पास जाते हैं और अपने उसी दौर को फिर से जीने की कोशिश करते हैं।

guy with money thoughtज्‍योतिष की नजर में क्‍या होता है सोच की गति से पैसा बनाना और कितने लोग सफल होते हैं इस प्रकार धन कमाने में। यह बताने से पहले मैं स्‍पष्‍ट करता हूं कि प्रकृति के अनुसार लोग चार प्रकार के होते हैं। यह प्रकृति राशियों के आधार पर बनाई गई है।

मेष, सिंह और धुन राशियां अग्नितत्‍वीय होती हैं,

वृष, कन्‍या और मकर राशियां पृथ्‍वीतत्‍वीय होती हैं,

मिथुन, तुला और कुंभ राशियां वायुतत्‍वीय होती हैं

कर्क, वृश्चिक और मीन राशियां जलतत्‍वीय होती हैं।

इन्‍हीं राशियों के आधार पर लोग भी चार प्रकार के होते हैं। हर प्रकार के व्‍यक्ति की कुण्‍डली में ऐसा वक्‍त जरूर आता है जब वह अपने मूल तत्‍व, कारक ग्रह, उसकी दशा और घटनाओं के प्रति सामंजस्‍य बैठा लेता है। यही वक्‍त होता है जब व्‍यवसायी सोच की गति से पैसा बना पाता है। अब एक आम आदमी का सवाल होता है कि उसे कैसे पता चलेगा कि उसका ‘वह’ वक्‍त आ गया है। इसे जानने के लिए आपको पता करना होगा कि आपकी कुण्‍डली का लग्‍न अथवा राशि कौनसी है। कुछ कुण्‍डलियां लग्‍न से ऑपरेट होती हैं तो कुछ राशि से। ऐसे में जो अधिक प्रभावी है वहीं से देखा जाएगा। इसके बाद हर लग्‍न की कुण्‍डली का एक निश्चित कारक ग्रह होता है। उस कारक ग्रह की दशा में ही हमारे प्रयासों के उत्‍कृष्‍ट परिणाम आते हैं। जैसे कि मेष लग्‍न की कुण्‍डली में सूर्य की दशा में और तुला लग्‍न की कुण्‍डली में शनि की दशा में सर्वाधिक अच्‍छे परिणाम आएंगे।

तो कुछ लोगों का सवाल यह भी होता है कि कारक ग्रह की दशा से पहले क्‍या किया जाए। इसके लिए मेरा जवाब यही है कि कारक ग्रह की दशा आने से पूर्व तक आपको इसकी तैयारी करनी होती है। अगर कारक ग्रह की दशा से पहले पर्याप्‍त ठोस जमीन तैयार नहीं की गई होगी तो कारक दशा बीतने तक आप परिस्थितियों को अनुकूल बनाते रहेंगे और बेहतर परिणामों के लिए फिर से किसी अंतरदशा या प्रत्‍यंतर दशा का इंतजार करना पड़ेगा। यानि काम करते रहना होगा, सही समय आने पर उसके बेहतरीन परिणाम में आएंगे। वैसे हर एक की कुण्‍डली का व्‍यक्तिगत विश्‍लेषण कर ही निकाला जा सकता है कि अमुक व्‍यक्ति का स्‍वर्णकाल कब आ रहा है।

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो...


अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो उसकी कुण्‍डली क्‍या होगी?

फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकें पढ़कर फलादेश शुरू कर देने वाले ज्‍योतिषियों को एक सवाल पिछले कई दिनों से पूछा जा रहा है। मेरी भी लगभग यही श्रेणी मानी जाती है इसलिए मुझे भी यही सवाल पूछा गया। सवाल सुनते ही मेरे दिमाग में भौतिक का वह सवाल कौंध गया जिसमें पूछा गया है कि धरती से चंद्रमा की ओर जा रहे किसी यान की एक विशेष स्थिति में गतिक और स्‍थैतिक ऊर्जा क्‍या होगी। क्‍या इसे निकाला जा सकता है। इस सवाल में अंतरिक्ष में बालक पैदा हो रहा था, लेकिन कहां इस बारे में स्‍पष्‍ट नहीं था। मेरे दिमाग में अंतरिक्ष यान था जिसमें कि बालक पैदा हो सकता होगा।

प्रेक्टिकली हो सकता है या नहीं यह बात अलग है लेकिन अगर... हो भी तो खुले अंतरिक्ष में तो कतई पैदा नहीं सकता। ऐसे में मेरे दिमाग में पहले पहल यही ख्‍याल आया कि अंतरिक्ष यान में पैदा हो रहा है। इसके साथ ही मैंने यह भी सोच लिया कि वह धरती से चंद्रमा की ओर जा रहा है। जबकि सवाल यह है ही नहीं। बस इतना है कि पृथ्‍वी से अलग दूर अंतरिक्ष में बालक पैदा हो तो उसकी कुण्‍डली क्‍या होगी। इससे मुझे यह समझ में आया कि जिस तरह पृथ्‍वी के कॉर्डिनेट्स हैं वैसे ही अंतरिक्ष के कॉर्डिनेट्स भी होंगे। इन कॉर्डिनेट्स के अनुसार पहले यह तय करना होगा कि बच्‍चा अंतरिक्ष में कहां है। फिर पृथ्‍वी पर मिलने वाले पांचांगों के इतर एक अन्‍य गणना तय करनी होगी जिसमें अंतरिक्ष के उस बिंदू से ग्रहों की विभिन्‍न नक्षत्रों में स्थिति का वर्णन स्‍पष्‍ट हो। यह निकालने योग्‍य होना चाहिए। यानि मेहनत की जाए तो शायद निकाला जा सकता है। इसके बाद जो कुण्‍डली बनेगी उसमें ग्रहों का प्रभाव और नक्षत्रों का फल पृथ्‍वी के किसी जातक से भिन्‍न होना चाहिए। क्‍योंकि अब किरणों का प्रभाव और वातवरण पूर्णतया बदल चुके हैं।


अंतरिक्ष यान से पृथ्‍वी उदय होते हुए का दृश्‍य 

अब कुछ सवाल और पैदा और होते हैं 

गुणी ज्‍योतिषी  बता सकते हैं कि ऐसी स्थिति में बालक के जन्‍म को लेकर कैसे फलादेश निकाले जा सकेंगे।

? क्‍या बालक की कुण्‍डली में एक ग्रह पृथ्‍वी भी जुड़ जाएगा,

? सूर्य और चंद्र के सन्निपात से उत्‍पन होने वाले राहू और केतू का क्‍या होगा,

? चंद्रमा का प्रभाव कितना बचेगा,

? जब गुरूत्‍वाकर्षण नहीं है तो क्‍या फलों में कुछ परिवर्तन होगा

? क्‍या बालक के पृथ्‍वी पर लौटने के समय को लेकर उसकी कुण्‍डली बनाई जाए,

? क्‍या कुछ अति‍रिक्‍त ग्रह भी कुण्‍डली में जुड़ेंगे,

? क्‍या निकटस्‍थ ग्रह की भूमिका बढ़ जाएगी या कम हो जाएगी,

? पृथ्‍वी पर तत्‍व तो पांच ही हैं फिर अंतरिक्ष में कितने तत्‍व शामिल किए जाएंगे,

? किसे लग्‍न मानेंगे और यह किस ओर से उदय होगा ?

कुछ हजार सवाल और पैदा हो रहे हैं इस स्थिति पर, फिलहाल इतने ही,

कुछ आप भी सुझाएं :)


यह तस्‍वीरें NASA Image of the Day से ली गई है

गुरुवार, मार्च 05, 2009

Exaltation or debilitation of planet : And it's meaning

नीच, नीच नहीं और उच्‍च अच्‍छा हो जरूरी नहीं


मेरे बच्‍चे का गुरू नीच का है तो क्‍या वह पढ़ाई नहीं कर पाएगा। मेरी कुण्‍डली में शुक्र नीच का है इसीलिए मेरी अपनी पत्‍नी से बनती नहीं हैं, मेरा सूर्य नीच का होने के कारण हमेशा बॉस से झगड़ा रहता है। ऐसे ही कई सवाल कई लोग मुझसे कुण्‍डली के विश्‍लेषण के दौरान पूछते हैं। 

           ग्रहों के उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व पर उनका इतना भरोसा होता है कि जब मैं कहता हूं कि आपकी कुण्‍डली तो तुला लग्‍न की है इसमें गुरू अकारक है या आपकी कुण्‍डली धनु लग्‍न की है इसमें शुक्र अकारक है। उच्‍च का हो या नीच का कोई फर्क नहीं पड़ता तो वे मेरी बात पर एक बारगी विश्‍वास ही नहीं कर पाते हैं। क्‍योंकि शब्‍द और शब्‍दों का विश्‍लेषण करने वाले कई ज्‍योतिषी उन्‍हें विश्‍वास दिला चुके होते हैं कि जो कुछ है इन्‍हीं ग्रहों के उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व में है। जबकि मेरा मनाना है कि ग्रहों के उच्‍च-नीच का होने से ग्रहों के प्रभाव के तरीके में नहीं बल्कि उनकी तीव्रता में अन्‍तर आता है।

           ग्रहों के व्‍यवहार को दर्शाने के लिए ज्‍योतिष की जो टर्मिनोलॉजी इस्‍तेमाल की जाती है उससे कई बार यह भ्रम होता है कि फलां ग्रह की दशा या अन्‍तर दशा या कुण्‍डली में स्थिति का भी यही परिणाम होगा। अधिकांश नए ज्‍योतिषी भी इस प्रकार की टर्मिनोलॉजी में उलझ जाते हैं। मुझे यह बात स्‍वीकार करने में कोई झिझक नहीं होती कि शुरूआत में मैं खुद भी इसमें उलझ गया था। अब दूसरे लोगों को उलझे हुए देख रहा हूं। 
तो क्‍या होता है उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व का प्रभाव- 

           सबसे पहली बात हर ग्रह अपनी उच्‍च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्‍डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्‍च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्‍या में, गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्‍च के परिणाम देते हैं। यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं। इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्‍या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं। 

           पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्‍च का ग्रह हमेशा अच्‍छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्‍च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्‍छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्‍य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्‍च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्‍यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्‍यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्‍यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्‍च के ग्रहों को खराब कहा होगा। 

           कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्‍च का परिणाम देते हैं। यह मुख्‍य रूप से लग्‍न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्‍न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है। तुला लग्‍न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक। अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्‍ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्‍न में सूर्य उच्‍च का परिणाम देता है और वास्‍तव में देखा भी यही गया। 

           लग्‍न में उच्‍च का सूर्य गुरू के सा‍थ हो तो जातक अपने संस्‍थान में शीर्ष स्‍थान पर पहुंचता है। यानि ट्रेनी की पोस्‍ट से भी शुरू करे तो एमडी की पोस्‍ट तक जा सकता है। चारों लोगों के साथ ऐसा ही हुआ। अगर वे सीधे एमडी नहीं भी बने तो उसी संस्‍थान का एक विभाग और बना और वे उसके अध्‍यक्ष बन गए। इस तरह योग भी पूरा हुआ और नीच के सूर्य का उच्‍च परिणाम भी दिखाई दिया। मैं अपने जातकों को डिस्‍क्‍लोज नहीं करता सो उनके नाम नहीं दे रहा हूं लेकिन इन चार लोगों में से एक देश के बड़े सरकारी महकमे के अध्‍यक्ष रहे, दूसरे एक निजी संस्‍थान के किसी अनुभाग के प्रमुख हैं। शेष दो लोग निजी कंपनियों के अनुभाग प्रमुख ही हैं।

GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA