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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष कक्षा : 7वां दिन - तुला और वृश्चिक राशि

ज्‍योतिष की कक्षा में आज हम बात करेंगे शुक्र के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि तुला और मंगल के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि वृश्चिक की। इनमें से एक राशि शुक्र के आधिपत्‍य की है तो दूसरी मंगल के आधिपत्‍य की। आइए देखते हैं कैसे होते हैं ये लोग...

वणिक बुद्धि वाले तुला राशि के जातक

तुला राशि के जातकों की मनोदशा का केवल यही वर्णन नहीं है। भारतीय जनतंत्र में आज जिस व्‍यक्ति की छाप सबसे बड़ी है वह तुला राशि का ही जातक था। मैं बात कर रहा हूं राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी की। बाजार में अपनी तुला लिए खड़े व्‍यक्ति के रूप में तुला राशि को दिखाया गया है। विचारों से सम और हर बात को पूरी तरह तौलकर देखने वाला जातक तुला राशि का होगा। हालांकि इस राशि पर शुक्र का आधिपत्‍य है, इस कारण तुला राशि के जातकों को बनने संवरने, संगीत, चित्रकारी और बागवानी जैसे शौक होते हैं। इसके बावजूद रचनात्‍मक आलोचना और राजनैतिक चातुर्य इन जातकों का ऐसा कौशल होता है कि दूसरे लोग इनसे चकित रहते हैं। वणिक बुद्धि के कारण वाद विवाद में पड़ने के बजाय समझौता करने में अधिक यकीन रखते हैं। इन जातकों का शरीर दुबला पतला और अच्‍छे गठन वाला होता है। चेहरा सुंदर भी न हो तो मुस्‍कान मोहक होती है। इन जातकों को विपरीत योनि वाले सहज आकर्षित करते हैं। हालांकि इन जातकों की शारीरिक संरचना सुदृढ़ होती है, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण बीमारियों की पकड़ में जल्‍दी आते हैं। साझीदार के साथ व्‍यापार करना इनके लिए ठीक रहता है। जातक उचित समय पर सही सलाह देता है। ऐसे में साझेदार भी ज्‍यादातर फायदे में रहते हैं। एक बार मित्र बना लें तो हमेशा के लिए अच्‍छे मित्र सिद्ध होते हैं। इन जातकों का पंचमेश शनि होता है। इस कारण तुला लग्‍न के जातकों के अव्‍वल तो संतान कम होती है और अधिक हो भी जाए तो संतान का सुख कम ही मिलता है। इनके लिए शुभ दिन रविवार और सोमवार बताए गए हैं। शुभ रंग नारंगी, श्‍वेत और लाल तथा शुभ अंक एक व दस हैं।

हताश होना नहीं सीखा वृश्चिक ने

वृश्चिक राशि के जातकों की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वे कभी हार नहीं मानते। एक बार जिस काम में जुट गए उससे जल्‍दी से उकताते नहीं है और आखिरी दम तक उस काम को पूरा करने में जुटे रहते हैं। वृश्चिक राशि के लोग दो तरह के होते हैं। एक जो अपनी इंद्रियों को जीतकर जितेन्द्रिय बन जाते हैं। और दूसरे निम्‍न कोटि के जो ईर्ष्‍यालु और असभ्‍य होते हैं। इस राशि पर मंगल का आधिपत्‍य है सो अच्‍छा खासा डील डौल और चौड़ा माथा होता है। बालों में स्‍वाभाविक रुप से घुंघरालापन होता है। दवाओं से जुड़े कामों में अच्‍छा लाभ कमा सकते हैं। जलतत्‍वीय राशि होने के कारण इन लोगों का अंतर्ज्ञान भी ठीक होता है। बात दैहिक सुख की हो या गुप्‍त साहसिक कार्यों की, ये लोग पूर्ण संतुष्टि के साथ जिंदगी जीना पसंद करते हैं। मंगल के कारण आई उत्‍तेजना, अधिकार, उग्रता और द्ढृता इन लोगों को जिंदगी के कई क्षेत्रों में सफल बनाती है। ये अच्‍छे नौकर सिद्ध होते हैं, जब तक कि मालिक इनके साथ ईमानदार रहे। एक बार इन्‍हें नीचा दिखा दिया जाए या धोखा दे दिया जाए तो क्रूरता की हद तक जाकर बदला लेते हैं। कठोर वाणी से शत्रु बनाते हैं। अगर वृश्चिक राशि वाले लोग बोलना सीख लें तो अपने पीछे फॉलोअर्स की अच्‍छी संख्‍या एकत्रित कर सकते हैं। अधिकार की अति भावना के कारण ये चाहते हैं कि परिवार में भी बिना किसी लॉजिक या सवाल जवाब के इनकी बात सुन ली जाए और उस पर अमल हो। घर में कलह का यह सबसे बड़ा कारण बनता है, वरना इन लोगों को शांत और सहज पारिवारिक वातावरण पसंद है। स्त्रियों में वृश्चिक लग्‍न के मामले में तो केएस कृष्‍णामूर्ति ने यहां तक कहा है कि वृश्चिक लग्‍न की स्‍त्री हो और लग्‍न व मंगल अशुभ पीडि़त हो तो ऐसी औरत से विवाह करना अभिशाप है। वृश्चिक लग्‍न के जातकों के लिए रविवार, सोमवार, मंगलवार और गुरुवार सफलता देने वाले हैं। पीला, लाल, नारंगी और क्रीम रंग शुभ है।

अगली कक्षा में हम बात करेंगे धनु और मकर राशियों की...

सोमवार, मार्च 08, 2010

GEM STONE : WHO, WHEN, HOW and many more questions?

रत्‍न : कब, कौनसा और कैसे पहनें

आमतौर पर ज्‍योतिष और ज्‍योतिष से जुड़ी किसी भी विधा को विज्ञान का दर्जा दे दिया जाता है। लेकिन रत्‍न विज्ञान को इस तर्ज पर विज्ञान का दर्जा नहीं मिला है। जैमोलॉजी वास्‍तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्‍छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्‍थरों ने अपना यह स्‍थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्‍लेटिनम की तरह। इसमें ज्‍योतिष का कोई रोल नहीं है। 

            यकीन मानिए भाग्‍य के साथ रत्‍नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्‍या में गोमेद रत्‍न प्राप्‍त हुए हैं। यह सामान्‍य अवस्‍था में पाया जाने वाला रत्‍न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्‍तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्‍ताओं के लिए भी आश्‍चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्‍यों दिखाई, या गोमेद का रत्‍न के रूप में धारण करने के अतिरिक्‍त भी कोई उपयोग होता था, यह स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है। 

            इंटरनेट और किताबों में रत्‍नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके इतर मेरी पोस्‍ट इसकी वास्‍तविक आवश्‍यकता के बारे में है। मैं एक ज्‍योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्‍नों को पहनने का महत्‍व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्‍तविक आवश्‍यकता बताने का प्रयास करूंगा।

दो विधाओं में उलझा रत्‍न विज्ञान

वर्तमान दौर में हस्‍तरेखा और परम्‍परागत ज्‍योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्‍नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्‍तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्‍वामित्‍व दर्शाया है। ऐसे में कुण्‍डली देखकर रत्‍न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्‍तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। 

            जैसे बुध के लिए बताया गया पन्‍ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्‍योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्‍पष्‍ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्‍न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। 

शरीर से टच तो हुआ ही नहीं

शुरूआती दौर में जब मुझे ज्‍योतिष की टांग-पूछ भी पता नहीं थी, तब मैं एक पंडितजी के पास जाया करता था। वहां एक जातक को लेकर गया, उन्‍होंने मोती पहनने की सलाह दी। मैंने जातक के साथ गया और मोती की अंगूठी बनवाकर पहना दी। कई सप्‍ताह गुजर गए। कोई फर्क महसूस नहीं हुआ तो जातक महोदय मेरे पास आए और मुझे लेकर फिर से पंडितजी के पास पहुंचे। 

            पंडितजी ने कहा दिखाओ कहां है अंगूठी। दिखाई तो वे खिलखिलाकर हंस दिए। बोले यह तो शरीर के टच ही नहीं हो रही है तो इसका असर कैसे पड़ेगा। मैंने पूछा तो टच कैसे होगी। तो उन्‍होंने बताया कि बैठकी मोती खरीदो और फलां दुकान से बनवा लो। हम दौड़े-दौड़े गए और बैठकी मोती लेकर बताई गई दुकान पर पहुंच गए। हमने बताया कि टच होने वाली अंगूठी बनानी है। दुकानदार समझ गया कि पंडित जी ने भेजा है। उसने कहा कल ले जाना। 

            और अगले दिन अंगूठी बना दी। वह इस तरह थी कि नीचे का हिस्‍सा खाली था। इससे मोती अंगुली को छूता था। कुछ ही दिनों में मोती पहनाने का असर भी हो गया। मेरे मन में भक्ति भाव जाग गया, और एक बात हमेशा के लिए सीख गया कि जो भी रत्‍न पहनाओ उसे शरीर के टच कराना जरूरी है। 

टच से क्‍या होता है किरणें महत्‍वपूर्ण हैं 

अंग्रेजी में इसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं और हिन्‍दी में मैं कहूंगा दृष्टिकोणीय झटका। एक दूसरे हस्‍तरेखाविज्ञ कई साल बाद मुझसे मिले। मैं किसी को उपचार बता रहा था और साथ में शरीर से टच होने वाली नसीहत भी पेल रहा था, कि हस्‍तरेखाविज्ञ ने टोका कि टच होने से क्‍या होता है, यह कोई आयुर्वेदिक दवा थोड़े ही है। रत्‍नों के जरिए तो किरणों से उपचार होता है। मैंने स्‍पष्‍ट कह दिया समझा नहीं तो उन्‍होंने समझाया कि 

            हम जो रत्‍न पहनते हैं वे ब्रह्माण्‍ड की निश्‍चित किरणों को खींचकर हमारे शरीर की कमी की पूर्ति करते हैं। इससे हमारे कष्‍ट दूर हो जाते हैं। विज्ञान का ठोठा स्‍टूडेंट होने के बावजूद मुझे पता था कि हम जो रंग देखते हैं वास्‍तव में वह उस पदार्थ द्वारा रिफलेक्‍ट किया गया रंग होता है। यानि स्‍पेक्‍ट्रम के एक रंग को छोड़कर बाकी सभी रंग वह पदार्थ निगल लेता है, जो रंग बचता है वही हमें दिखाई देता है। ऐसा ही कुछ रत्‍नों के साथ भी होता होगा। यह सोचकर मुझे उनकी बात में दम लगा।

अब मैं तो कंफ्यूजन में हूं कि 
वास्‍तव में टच करने से असर होगा या 
किरणों से असर होगा।
वास्‍तव में रत्‍नों की जरूरत है भी कि नहीं
रत्‍नों का विकल्‍प क्‍या हो सकता है
रत्‍न किसे पहनाना आवश्‍यक है

            इन सब बातों को लेकर कालान्‍तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए। अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।

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सोमवार, मार्च 30, 2009

दूसरे ज्‍योतिषी हैं बाबू मास्‍टर

महाराज की कथा के बार अब मैं बताना चाह रहा हूं बाबू मास्‍टर के बारे में। चाहता तो था कि साथ ही लिख दूं लेकिन इससे पोस्‍ट बहुत लम्‍बी हो जाती।

अब बात बाबू मास्‍टर की। लम्‍बा चौड़ा शरीर, घोड़े जैसे दांत, सिर मुंडाया हुआ और पीछे मोटी चोटी। और वर्णन करूंगा तो पहचान पुख्‍ता हो जाएगी। हां, तो बाबू मास्‍टर से मिलना कुछ इस तरह हुआ कि वे बीकानेर आए हुए थे। उनके सो कॉल्‍ड गुरूजी बीकानेर के ही हैं। हालांकि उनके गुरू का ज्‍योतिष के बजाय अध्‍यात्‍म में अधिक रुझान है। क्‍या कहूं। बाबू मास्‍टर जिन्‍हें गुरुजी कहता है उनकी छवि इतनी बड़ी है कि लगता है बाबू मास्‍टर ने केवल अपनी छतरी पुख्‍ता करने के लिए उनका नाम इस्‍तेमाल किया। अब उनके गुरू ऐसा क्‍यों करने दे रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं है।

मैं अपने एक रिश्‍तेदार के साथ उनसे मिलने के लिए पहुंचा। हमारी मुलाकात से पहले बाबू मास्‍टर को बताया गया था कि एक ऐसा मरीज आ रहा है जो बिल्‍कुल सुस्‍त है और कुछ काम नहीं करना चाहता। ज्‍योतिष के नाम पर निठल्‍ला बैठा है। कहता है समय खराब है सो कुछ करना बेकार है। वह रोगी साथ ही था।

हम जब उनके आश्रमनुमा स्‍थान पर पहुंचे तो बाबू मास्‍टर ने मुझे देखते ही पहचान लिया और अपनी दमदार आवाज में झिड़कने लगे कि क्‍यों ऐसी क्‍या समस्‍या है कि सब काम छोड़कर बैठे हो। मैं सकपका गया, लेकिन हाथों-हाथ संभल गया। मैंने बताया कि हम इसे दिखाने लाए हैं मैं तो नौकरी करता हूं। बाबू ने पूछा क्‍या नौकरी करता है। मैंने कहा पत्रकार हूं। अब बाबू ने पलटवार किया कहा तेरी नौकरी तो कुछ नहीं करने के बराबर ही है। मैंने खून का घूंट पी लिया। कुछ सीखने की गरज जो थी। अब शुरू हुआ ईलाज का क्रम। बाबू मास्‍टर ने रोगी से नाम पता और डेट ऑफ बर्थ पूछी। रोगी बता रहा था और बाबू के दो असिस्‍टेंट नोट कर रहे थे। रोगी बोल रहा था कि बाबू ने अपने असिस्‍टेंटों से चर्चा करनी शुरू कर दी। बातचीत में लगातार विदेशी शब्‍द आ रहे थे। कुछ देर की चर्चा के बाद बाबू रोगी की ओर मुड़े और बोले कोई समस्‍या नहीं है। यह लड़का कुछ काम नहीं करना चाहता इसलिए ऐसा कहता है। इसका भाग्‍य प्रबल है। हमने उन्‍हें बताया नहीं था कि जिस रोगी को लाया गया है वह स्किजोफ्रीनिया का पेशेंट है। सो उनके इस कथन के बाद मैंने बता दिया। तो बाबू बिफर गए। बोले मुझे सिखाता है क्‍या। मैं सहमकर चुप हो गया।

कुछ देर बाद रोगी को एक मंत्र देकर पीछे भेज दिया और कहा जब तक न कहूं उठना मत। इसके बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ। इतनी देर में बाबू को समझ आया कि मैं ज्‍योतिष में रुचि रखता हूं। सो उन्‍होंने एस्‍ट्रोलॉजिकल टर्म इस्‍तेमाल करनी ही बंद कर दी। अपनी हर बात को थाई अंक पद्धति से शुरू किया और वहीं पर खत्‍म कर दिया। मैं मूर्खों की तरह बस मुंह बांए बैठा रहा।

बातचीत के बीच एक के बाद एक, दो फोन आए। बाबू ने बिना जातक से प्रश्‍न पूछे इलाज बता दिया और फोन रख दिया। बाबू के व्‍यवहार से अब तक मैं पूरी तरह हतोत्‍साहित हो चुका था लेकिन फोन कॉल के बाद तो मैं हैरान था। अपनी रौ में लगातार बोल रहे बाबू को मैंने टोका कि आपने बिना समस्‍या पूछे समाधान कैसे बता दिया। उन्‍होंने कहा कि यह तो मेरा काम है। इसके बाद वे अपने कामों का वर्णन करते रहे। एक इंटरनेश्‍ाल बैंक में एनालिस्‍ट का पद छोड़ चुके थे, इसके बाद एक फाइनेंस कंसल्‍टेंसी फर्म खोली वह भी बंद कर दी। इसके बाद मार्केटिंग का काम किया और वह भी छोड़ दिया। आखिरी बार जिस अंतरराष्‍ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे उसमें थाईलैण्‍ड में पोस्‍टेड थे। वहां थाई अंक ज्‍योतिष सीखी और नौकरी छोड़ पूरी तरह ज्‍योतिष में लग गए। यह सारी बातें उन्‍होंने ने ही बताई है। मैंने आज तक वापस इसकी पुष्टि नहीं की है।

खैर मैंने कहा कि ज्‍योतिष की ऐसी कौनसी विद्या है जिसमें बिना जातक को जाने, बिना उससे सवाल जवाब किए उसके बारे में इतना स्‍पष्‍ट बताया जा सकता है। थोड़ी देर बाद तो मैंने दावा भी कर दिया कि यह ज्‍योतिष ही नहीं है। बाबू हैरान करने पर ही तुले हुए थे। उन्‍होंने कहा हां मैं ज्‍योतिष नहीं करता। मैंने कहा तो क्‍या करते है। बाबू ने कहा मैं लोगों को मूर्ख बनाता हूं। मेरा धंधा मूर्ख बनाने का ही है। यह जवाब मैं पहले सुन चुका था। अब दूसरी बार सुन रहा था। ज्‍योतिष के क्षेत्र में कई साल तक लोगों के सम्‍पर्क में रहने और नौकरी के कारण काफी पॉलिश भी हो चुका था। सो मैं संयत बना रहा। मैंने अध्‍यात्मिक गुरू के आश्रम की आड़ लेकर पूछा कि आपको संतुष्टि मिल जाती है लोगों को ऐसे मूर्ख बनाकर। तो बाबू बोले मैं खुद थोड़े ही जाता हूं मूर्ख बनाने के लिए। वे खुद आते हैं। और सही पूछो तो लोग मूर्ख ही बनना चाहते हैं। आप उन्‍हें समस्‍याओं का ठोस कारण बताओगे तो वे पचा नहीं पाएंगे। एक आम आदमी की समस्‍या है कि वह गलतियां खुद करता है और उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना चाहता है। मैं तो बस उनकी मदद करता हूं। कभी ठीकरा वास्‍तु के सिर फूटता है, कभी ज्‍योतिष पर तो कभी किसी व्‍यक्ति विशेष पर। उन्‍होंने कहा तूं मुझे बस तडि़त चालक समझ सकता है। जो बिजली गिरने की दिशा तय करता है।

अब तक मैं हंसने लगा था। यह ईलाज का दूसरा व्‍यवहारिक तरीका था। पहले तरीके में महाराज प्रायश्चित करा रहे थे तो यहां बाबू मास्‍टर लोगों को लॉलीपॉप पकड़ा रहा था। दोनों ही लोगों ने ग्‍लानि को आवरण दिया और सहारा लिया ज्‍योतिष का। इन दोनों ही लोगों को अपने क्षेत्र का प्रकाण्‍ड विद्वान समझा जाता है। महाराज ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब बड़ा घर और कार ले चुका है और बाबू मास्‍टर अपनी मल्‍टीनेशनल कंपनी की नौकरी में तीस से चालीस हजार रुपए तक की तनख्‍वाह पाता था अब रोज के पांच से सात हजार रुपए कमा रहा है। लोगों के दुख और तकलीफ जितने बढ़ते जाते हैं इन लोगों का रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है। पता नहीं ईलाज किसका हो रहा है लेकिन इन दोनों ने एक बीमारी को कुछ समय के लिए तो खत्‍म कर ही दिया है। और वह बीमारी है खुद की गरीबी। :)

इन दोनों के बाद मैं आपको बताउंगा एक ऐसे ज्‍योतिषी के बारे में जो परम्‍परागत भारतीय पद्धति से कुण्‍डलियां देखता था लेकिन उन्‍हें मैनेज इंग्लिश स्‍टाइल से करता था। उसने इतना तगड़ा नेटवर्क बनाया कि उसकी मृत्‍यु के पांच साल बाद भी उनके पुत्र आराम से अपनी जीविका चला रहे हैं। भले ही वे अपने पिता जितने अच्‍छे ज्‍योतिषी नहीं है लेकिन सिस्‍टम ने उन्‍हें दौड़ में जमा रखा है।

शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009

कब तक डरते रहोगे साढ़ेसाती से

बहुत जगहों पर पढ़ता रहा हूं। साढ़ेसाती के बारे में। अब तक सैकड़ों सवाल भी सुन और झेल चुका हूं। हर बार समझाने की कोशिश करता हूं कि साढ़ेसाती से डरने का कोई फायदा नहीं है। इसका कोई उपचार भी नहीं है। तो इतना पुस्‍तकों, मैग्‍जीनों, न्‍यूज चैनलों और पंडितों के यहां साढ़े साती के बारे में सुना है क्‍या सब फिजूल है।

मेरा जवाब है हां जी सबकुछ फिजूल है। मैं स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करता हूं। पहले यह कि साढ़ेसाती होती क्‍या है। आपकी कुण्‍डली में चंद्रमा जिस राशि में जिस डिग्री पर बैठा है उस चंद्रमा से 45 डिग्री के घेरे में जब गोचर का शनि (यानि फिलहाल जो शनि की गति है उसके हिसाब से) आता है तो आपको शनि की साढ़ेसाती लग जाती है। साढ़ेसाती का अर्थ है यह साढ़े सात साल तक चलती है। 45 डिग्री के दायरे में आने के साथ शुरू होती है और चंद्रमा से आगे निकलकर 45 डिग्री दूर चली जाए तब तक चलती है। एक राशि तीस डिग्री की होती है। शनि का एक राशि में भ्रमण ढाई साल का होता है। चंद्रमा के दोनों ओर डेढ़ डेढ़ राशि तक इसका भ्रमण यह स्थिति पैदा करता है। यानि ढाई ढाई साल के तीन हिस्‍से किए जा सकते हैं।

अब सवाल कि यह करती क्‍या है। जैसा कि मैंने किताबों में पढ़ा है और मेरे वरिष्‍ठजनों से राय ली है साढ़े साती हमें अधिक मेहनत करने के लिए विवश करती है। जब हम समय के साथ इसके अनुसार दौड़ नहीं पाते तो निठल्‍ले होकर बैठ जाते हैं। किसी व्‍यक्ति पर साढ़ेसाती का बुरा प्रभाव है या नहीं यह चैक करने के लिए मेरे पास एक बहुत आसान रास्‍ता है। मैं उस व्‍यक्ति से पूछता हूं कि अभी क्‍या समय हुआ है। साढ़ेसाती का पीडि़त अधिकांशत: इसका गलत जवाब देगा। अगर शनि खराब प्रभाव नहीं कर रहा है तो जवाब सही आएगा। इस फार्मूले को निकालने के पीछे ठोस कारण यह है कि खराब शनि हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्‍टम पर आक्रमण करता है और हमारे दैनिक कार्य करने में भी परेशानी आने लगती है। इसी से शुरू होती है टाइमिंग की समस्‍या। यानि गलत समय पर आप सही जगह पर पहुंचते हैं या सही समय पर गलत जगह पर। यह साढ़ेसाती का दूसरा बड़ा साइन है।

यह तो मैंने बताया कि समस्‍या कहां दृष्टिगोचर होती है और कैसे होती है। अब सवाल कि इससे डरा क्‍यों जाए और डरा क्‍यों न जाए। पहले सवाल का जवाब है कि जब पता चल गया कि शनि की साढ़ेसाती टाइमिंग और टाइम सेंस को खराब करती है तो सबसे पहले इसी पर चेक लगाया जाए। यानि इसे दुरुस्‍त करने के जमीनी उपाय शुरू कर दिए जाएं। मसलन घड़ी पहनी जाए और दिनांक और समय के प्रति सचेत रहा जाए। प्‍लान बनाकर काम किए जाएं और जहां जाएं वहां समय नष्‍ट करने के बजाय पूर्व में पूरी जानकारी एवं समय लेकर पहुंचा जाए। इसी तरह के खुद के मैनेजमेंट के हजारों उपाय हैं।

इससे साढ़ेसाती का असर नब्‍बे प्रतिशत तक कम हो जाएगा। दूसरा सवाल कि डरा क्‍यों न जाए। वह इसलिए कि एक आदमी की औसत आयु सत्‍तर साल भी मान ली जाए तो उस व्‍यक्ति की जिंदगी में तीन बसा साढ़ेसाती आएगी। यानि साढे़ बाइस साल तक साढ़ेसाती का काल रहेगा। यही नहीं कुछ योग शनि के कंटक के भी बनेंगे। यानि उस दौरान भी साढ़ेसाती के कुछ असर रहेंगे। इस तरह तो पहले चालीस साल के सक्रिय जीवनकाल में ही पंद्रह साल ऐसे आ जाएंगे जब इस डर के साथ जीना पड़ेगा। अब यह बात कैसे मानी जा सकती है कि किसी व्‍यक्ति के चालीस में से पंद्रह साल तो खराब ही हो गए। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। साढ़े साती पूरी तरह खराब भी नहीं होती। अपने तीन चरणों में वह सिर, पेट और पैर में या इससे ठीक उल्टे क्रम में रहती है। जब सिर में होगी तो सोचने के लिए मजबूर करेगी और जब पांव में होगी तो दौड़ने के लिए और जब पेट में होगी तो ढेर सारा धन दिलाएगी। यानि पेट भर देगी। अगर ऐसी है साढ़ेसाती तो डरने की नहीं बल्कि रोलर कोस्‍टर राइड करने का समय है। तो अब मैं सोच सकता हूं कि इस बार जब कोई आपको बताएगा कि आपकी साढ़ेसाती शुरू होती है अब... और आपको दिमाग में आएगा कि ठीक है चलो चलते हैं राइड पर।

कब चिंता करनी चाहिए...

जब आपके किसी वृद्ध परिजन को साढ़ेसाती लगे तो चिंता करनी चाहिए। आमतौर पर तीसरी साढ़ेसाती जीवन के साथ ही खत्‍म होती है और तीसरी किसी तरह निकल जाए तो चौथी आखिरी होती है। हर कोई जानता है कि वृद्ध लोग रोलरकोस्‍टर राइड नहीं कर पाते हैं। साढेसाती में यही होता है। इसी से बड़े बूढों को दिल और दिमाग की बीमारियां होती है। कुछ लोग शारीरिक रूप से थक कर हार जाते हैं तो कुछ मानसिक लड़ाई में टूटते हैं। लेकिन जवानों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता।

मैंने आपकी जिंदगी के पहले पचास साल सिक्‍योर कर दिए हैं साढ़ेसाती के प्‍वाइंट आफ व्‍यू से। अब आपकी बारी है मुझे नया विचार देने की। :)