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मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

राफेल की मुण्‍डेन ज्‍योतिष

मुण्‍डेन ज्‍योतिष के बारे में बहुत कम लिखा गया है। वास्‍तव में यह विषय शुरू से ही अछूता रहा है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि अधिकांश ज्‍योतिषी जातक की कुण्‍डली देखने में अधिक सहज महसूस करते हैं। कारण स्‍पष्‍ट है कि पैसा तो वही देगा। ऐसे में समष्टि की बजाय व्‍यक्तिगत काम अधिक हो रहा है। दूसरा कारण है कि बड़े पैमाने पर सोचने और उस पर फलादेश देना अपेक्षाकृत कठिन भी है। इसके लिए कहीं दिशा-निर्देश नहीं मिलते। ऐसे में मुण्‍डेन ज्‍योतिष का उपेक्षित होना स्‍वाभाविक है। मेरे आदरणीय गुरुओं में से एक ने मुझे बताया कि अगर मुण्‍डेन पर काम करना है तो पहले राफेल पढ़ो। मैंने खुब खोजा लेकिन राफेल की किताब कहीं नहीं मिली। स्‍थानीय पुस्‍तक विक्रेता ने भी उसे उपलब्‍ध कराने से मना कर दिया। लेकिन पिछले दिनों वह मुझे ऑनलाइन कहीं मिल गई। अब मैं यहां उसका हिन्‍दी अनुवाद दे रहा हूं। इससे हो सकता है कि ज्‍योतिष के कई विद्यार्थियों को लाभ मिल जाए। मुझे तो खैर दोहरा लाभ पहले से ही हो रहा है। पहला कि इस किताब को और अधिक ध्‍यान से पढ़ पाउंगा और दूसरा कि मेरे ब्‍लॉग के लिए एक और पोस्‍ट मिल जाएगी। अब मैं इसी पोस्‍ट में राफेल की किताब के अंश देना शुरू कर रहा हूं।



राफेल की पुस्‍तक का पहला भाग

क्‍या है मुण्‍डेन ज्‍योतिष
वास्‍तव में यह ज्‍योतिष की एक शाखा है जो देशों, राज्‍यों और शहरों का भाग्‍य बताती है। एक सामान्‍य कुण्‍डली की तरह किसी स्‍थान विशेष की कुण्‍डली बनाई जाती है। किसी राष्‍ट्र के सम्‍बन्‍ध में बात करते समय कारकों का वर्गीकरण निम्‍न अनुसार होगा।
प्रथम भाव - यह आम आदमी से सम्‍बन्धित होगा। जनता का स्‍वास्‍थ्‍य, राष्‍ट्र की सामान्‍य परिस्थितियां और सामान्‍य तौर पर देश की गृह विभाग की स्थिति।
द्वितीय भाव- राष्‍ट्रीय एक्‍सचेंजर, रेवेन्‍यू, स्‍टॉक मार्केट, बैंकें, व्‍यावसायिक मामले और ट्रेडिंग इस भाव से देखी जाएगी।
तृतीय भाव- रेलवे और इससे सम्‍बन्धित अन्‍य मुद्दे, ट्रेफिक, स्‍टॉक एवं शेयर, टेलिग्राफ, टेलिफोन एवं पोस्‍टल मुद्दे, यातायात के साधन, मोटरें, बसें, किताबें, समाचारपत्र और साहित्यिक गतिविधियां इस भाव से देखी जाएंगी।
चतुर्थ भाव- मौसम, कृषि, फसलें और जमीन सम्‍बन्‍धी मुद्दे, खानें, सार्वजनिक इमारतें। इसके अलावा देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी इस भाव से देखेंगे।
पंचम भाव- थियेटर, म्‍युजिक हॉल और मनोरंजन के स्‍थान, बच्‍चे, शिक्षा, जन्‍मदर, स्‍कूलें, नैतिक मूल्‍य और सट्टा प्रवृत्ति इस भाव से देखी जाएगी।
छठा भाव- बीमारी, जनता का स्‍वास्‍थ्‍य, थल और जल  सेना, आराधना के तरीके और सामान्‍य तौर पर कामकाजी जनता को इससे देखा जाएगा।
सातवां भाव- विदेशी मामले और अन्‍य ताकतों के साथ सम्‍बन्‍ध, युद्ध व अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के विवाद, शादियां, तलाक और विदेशी व्‍यापार इससे देखा जाएगा।
आठवां भाव- मृत्‍युदर, आत्‍महत्‍याएं और गुप्‍त समूहों को इससे देखा जाएगा।
नौंवा भाव- अदालतें, जज, पंडित, इमाम, पादरी और हुजूरी के अलावा कॉलोनियल ट्रेड अफेयर, व्‍यावसायिक ताकतें, विज्ञान, शिपिंग और इससे जुड़े अन्‍य मामले इस भाव से देखे जाएंगे।
दसवां भाव- राजा, शाहीपन, सरकारें, सत्‍ताधारी ताकतें, एरिस्‍टोक्रेसी, नोबेलिटी व समाज इस भाव से देखे जाएंगे।
ग्‍यारहवां भाव- संसद, राज्‍यसभा, लेजिस्‍लेशन इस भाव से देखेंगे।
बारहवां भाव- कैदी, वर्कशॉप या गोदियां, अस्‍पताल, दानदाता ट्रस्‍ट, अपराध, हत्‍याएं, अपराधी, जासूस और गुप्‍त शत्रु इस भाव से देखने होंगे।

यह तो हुआ भावों के कारकों का उल्‍लेख। अब इनके इस्‍तेमाल के तरीके आगामी पोस्‍टों में बताने का प्रयास करूंगा। अभी इतना ही यह था भाग एक...

सोमवार, अक्टूबर 25, 2010

ग्रहों से जुड़ी वनस्‍पति

ज्‍योतिष में ईलाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। एक सफल ज्‍योतिषी वही है जो न केवल समस्‍या को पहचान ले बल्कि समस्‍या के निदान के लिए पुख्‍ता उपाय भी बता दे। हर ज्‍योतिषी के पास ईलाज का अपना तरीका है। मैंने अलग-अलग गुरुओं से सीखा, सो मैं कई तरह के उपचार काम में लेने की कोशिश करता हूं। इसका मुझे यह फायदा होता है कि उपचार की लम्‍बी फेहरिस्‍त हमेशा मेरे पास होती है और जातक के पास एक नहीं तो दूसरा उपचार चुनने की स्‍वतंत्रता बची रहती है।

उपचार का एक महत्‍वपूर्ण भाग है वनस्‍पतियां, वेदों और पुराणों में ग्रह शांति का सबसे सशक्‍त माध्‍यम यज्ञ को बताया गया है। बाद के विद्वानों ने स्‍पष्‍ट भी किया है कि कौनसी वनस्‍पति के काष्‍ठ की आहूति देने पर क्‍या उपचार हो सकता है। यज्ञ के बारे में मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन जो पहले दिया जा चुका है उसे यहां शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही वास्‍तु में वनस्‍पति के उपचार भी इस लेख में शामिल करने का प्रयास करता हूं। मुझे यह तैयार माल पिछले दिनों बीकानेर में राष्‍ट्रीय स्‍तर की संगोष्‍ठी में मिला। गुरुकुल कांगड़ी विश्‍वविद्यालय हरिद्वार के प्रोफेसर डी.आर. खन्‍ना ने अपने पत्रवाचन में यह तैयार सामग्री परोसी।

- यज्ञाग्नि प्रज्‍‍वलित रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले काष्‍ठ को समिधा अथवा इध्‍म कहते हैं।

- प्रत्‍येक लकड़ी को समिधा नहीं बनाया जा सकता।

- आह्निक सूत्रावली में ढाक, फल्‍गु, वट, पीपल, विकंकत, गूलर, चन्‍दन, सरल, देवदारू, शाल, खैर का विधान है।

- वायु पुराण में ढाक, काकप्रिय, बड़, पिलखन, पीपल, विकंकत, गूलर, बेल, चन्‍दन, पीतदारू, शाल, खैर को यज्ञ के लिए उपयोगी माना गया है।

- दयानन्‍द सरस्‍वती ने सत्‍यार्थ प्रकाश में यज्ञ के लिए पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आम व विल्‍व को उपयोगी बताया है। उन्‍होंने चन्‍दन, पलाश और आम को सर्वश्रेष्‍ठ बताया है।

- सूर्य के लिए अर्क, चंद्र के लिए ढाक, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग, गुरू के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी और राहू के लिए दूर्वा व केतू के लिए कुश वनस्‍पतियां उपचार में ली जा सकती हैं।

वास्‍तु से जुड़ी वनस्‍पतियां

घर के आगे नवग्रहों के वृक्षों की स्‍थापना के लिए भी सिद्धांत बताए गए हैं। इसके लिए स्‍पष्‍ट किया गया है कि पूर्व में गूलर, पश्चिम में शमी, उत्‍तर में पीपल, दक्षिण में खैर और मध्‍य में आक का वृक्ष लगाना लाभदायी है। इसके अलावा उत्‍तर पूर्व में लटजीरा, उत्‍तर पश्चिम में कुश, दक्षिण पश्चिम में दूब और दक्षिण पूर्व में ढाक का वृक्ष लगाना चाहिए।

यह प्रोफेसर खन्‍ना के पत्रवाचन का ज्‍यों का त्‍यों सार दिया गया है। इसमें मैंने अपनी ओर से कोई विचार नहीं दिया है। आगे किसी लेख में वनस्‍पतियों के उपचार में इस्‍तेमाल के तरीके एवं अन्‍य वनस्‍पतियों के रोल के बारे में स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करूंगा।

यथा...

मंगलवार, अक्टूबर 12, 2010

सबल ग्रह का रत्‍न धारण करें या निर्बल ग्रह का?

आयाम 

यह भी एक टेढ़ा सवाल है। वास्‍तव में ऐसा होता है मुझे इसमें भी शक है। दरअसल, कृष्‍णामूर्ति का तो कथन है कि लग्‍न और नवम भाव तथा इनसे सम्‍बन्धित ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कोई ग्रह निर्बल हो या सबल क्‍या फर्क पड़ता है। इस लेख को पढ़ने से पहले पाठक को चाहिए कि मेरे रत्‍नों पर लिखे कुछ पिछले लेखों को देख लेना चाहिए। ये लेख हैं...

1. मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो... चलेगा

2. लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

3. ईलाज किसका करना है परिस्थितियों का, दूसरों का या खुद का

4. मैं जिज्ञासा बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं... 

इन लेखों में मैंने वर्तमान में रत्‍न को लेकर चल रहे कई सिद्धांतों और उनके कारण पैदा हो रहे व्‍याघात को समझाने का प्रयास किया है। निर्बल और उच्‍च ग्रह का उपचार भी ऐसा ही एक और व्‍याघात है।

कैसे, समझाने का प्रयास करता हूं...

एक उदाहरण की कुण्‍डली लेते हैं। मान लीजिए एक तुला लग्‍न की कुण्‍डली है। उसमें शुक्र लग्‍न का अधिपति हुआ। एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शनि इस कुण्‍डली में कारक ग्रह है। नवम भाव का अधिपति होने के कारण बुध का उपचार भी किया जा सकता है। अब कृष्‍णामूर्ति की माने तो इस कुण्‍डली के शुक्र, शनि और बुध ग्रह का ही इलाज किया जा सकता है। अब इस कुण्‍डली में अगर गुरू, सूर्य या मंगल खराब स्थिति में है तो उनके इलाज की जरूरत ही नहीं है। एक व्‍यक्ति राजमहल में रह रहा हो तो उसे ज्ञान, आधिपत्‍य, और ताकत स्‍वत: मिलती है, और अगर न भी मिले तो उसके लिए प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। ऐसा जातक अगर ज्‍योतिषी से यह मांग करे कि उसे अपने आधिपत्‍य, ताकत और ज्ञान में बढ़ोतरी की जरूरत है तो मान लीजिए कि वह केवल किसी लालसा की वजह से कुछ समय के लिए भटककर यह सवाल कर रहा है। वास्‍तव में उसे जो चाहिए वह ऐश्‍वर्य, विरासत, कंफर्ट, कम्‍युनिकेशन स्किल और अपनी चाही गई चीजों के लिए ईज ऑफ एक्‍सस की जरूरत है। यानि वह अपनी जरूरतों के लिए लम्‍बी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार नहीं है। अगर वह जातक किसी साधन या व्‍यवस्‍था को पाने का प्रयास कर रहा है या रही है तो यह कुछ समय की बात हो सकती है दीर्घकालीन जरूरत नहीं। ऐसे में तुला लग्‍न में बैठे नीच के सूर्य को ताकतवर बनाने के लिए माणिक्‍य भी पहना दिया तो फायदा करने के बजाय नुकसान अधिक करेगा।

यही बात अन्‍य लग्‍नों के लिए भी लागू होती है। तो जातक का इलाज करते समय यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि वास्‍तव में जातक का मूल स्‍वभाव क्‍या है। उसे अपनी मूल स्थिति में लौटाने से अधिक सुविधाजनक कुछ भी नहीं है। भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता, लेकिन मानसिक स्थिति में सुधार कर खराब समय की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। ऐसे में किसी एक जातक की लालसा का पोषण करने के बजाय उसे सही रास्‍ते की ओर भेजना मेरी समझ में सबसे सही उपाय है। ऐसे में मेष से लेकर मीन राशि और लग्‍न वाले जातकों के लिए अलग-अलग उपचार होंगे। आप गौर करेंगे कि कुछ ग्रहों को कारक तो कुछ को अकारक भी बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी कुण्‍डली में कारक ग्रहों का प्रभाव होता है और अकारक का नहीं होता। प्रभाव तो सभी ग्रहों का होगा, लेकिन मूल स्‍वभाव कारक ग्रह के अनुसार ही होगा। ऐसे में  उपचार के समय भी कारक ग्रहों का ही ध्‍यान रखा जाए।

रही बात उच्‍च और नीच की... यह तो रश्मियों का प्रभाव है। नीच ग्रह की कम रश्मियां जातक तक पहुंचती है और उच्‍च ग्रह की अधिक रश्मियां। ऐसे में अगर कारक ग्रह अच्‍छी स्थिति यानि अच्‍छे भाव में बैठकर कम रश्मियां दे रहा है तो उसके लिए उपचार करना चाहिए। और अकारक ग्रह खराब स्थिति में या नीच का भी है तो उसे छेड़ने की जरूरत नहीं है।

यह मेरा अब तक के अध्‍ययन से उपजा विश्‍लेषण है.. जरूरी नहीं है कि सही ही हो, लेकिन अब तक जितने जातकों का इलाज इन तथ्‍यों को ध्‍यान में रखकर किया है, मुझे बेहतर परिणाम मिले हैं। एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। एक जातक तुला लग्‍न का ही था और अपने संगठन में टॉप लेवल पर पहुंचने के लिए प्रयासरत था, मुझे लगा कि वह अपनी ताकत और प्रबंधन गुण की वजह से तो टॉप लेवल पर नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन शनि का नेगेटिव प्रभाव बढ़ाने से बात बन सकती है। पांचवे भाव में स्‍व राशि का होने के बावजूद मैंने जातक को लोहे की अंगूठी गले में पहना दी, और गले में पहना रक्‍त चंदन का सूर्य उतरवा दिया। शनि का असर तेजी से बढ़ा, लग्‍न में बैठे सूर्य और गुरू भी इतना असर नहीं कर पाए जितना शनि ने किया। अब वह अपने संगठन के बहुत महत्‍वपूर्ण ऊंचे पद पर आसीन है।

शनिवार, अगस्त 14, 2010

किस भाव से क्‍या देखेंगे – कारक

कारक विचार फलादेश की सबसे महत्‍वपूर्ण कड़ी है। कई बार जातक जब समस्‍या बताता है तो नए ज्‍योतिषियों को पता ही नहीं चलता है कि इसे किस भाव या ग्रह से देखें। ऐसे में जितने कारक फौरी तौर पर ध्‍यान में होते हैं, उन्‍हीं के अनुसार ज्‍योतिषी निष्‍कर्ष पेश करने की कोशिश करते हैं। कई बार तो यह भी स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता है कि सवाल का जवाब कुण्‍डली में कहां खोजा जाए। शुरूआती दिनों में मेरी भी यही समस्‍या थी, गुरुजी ने जितने कारक बता दिए उतने तो कंठस्‍थ थे, लेकिन हर बार नई समस्‍या आने पर फिर गुरुजी को पूछता। तो एक दिन उन्‍होंने मुझे स्‍पष्‍ट किया कि मुझे पहले कारक पर ही काम करना चाहिए। तब जो पुस्‍तक मुझे सबसे सहायक लगी वह थी हेमवंता नेमासा काटवे। उनकी कारकत्‍व विचार पुस्‍तक में इतने कारक दिए गए हैं कि लगता है कि हर सवाल का जवाब दिया जा सकता है। काटवे के बाद केएस कृष्‍णामूर्ति की सैकण्‍ड रीडर पढ़ने के बाद तो लगा कि हर सवाल का जवाब ज्‍योतिष से दिया जा सकता है, बशर्ते आप कारकत्‍व के बारे में विस्‍तार से जानते हों। यहां मैं भावों के कारकों के बारे में बताने का प्रयास कर रहा हूं।

प्रथम भाव- इस भाव का कारक सूर्य है। यह सबसे प्रमुख भाव है। इसी भाव की राशि, इसमें बैठे ग्रह और इसके अधिपति ग्रह की स्थिति से जातक की स्थिति की प्राथमिक जानकारी मिल जाती है। बाकी भावों की तुलना में जातक की आत्‍मा को जानने का यह सबसे महत्‍वपूर्ण भाव है। जातक की जन्‍मकुण्‍डली अथवा प्रश्‍नकुण्‍डली के किसी सवाल के जवाब में उसके स्‍वास्‍थ्‍य, जीवंतता, सामूहिकता, व्‍यक्तित्‍व, आत्‍मविश्‍वास, आत्‍मसम्‍मान, आत्‍मप्रकाश, आत्‍मा आदि को देखा जाता है। हर सवाल के जवाब में पहले लग्‍न देखना ही होगा...

1st house - Sun. Health, vitality, integrity, personality, integration, confidence, healthy self-esteem, self-expression, soul radiance.

दूसरा भाव – इस भाव का कारक गुरु है। वैदिक ज्‍योतिष में इसे धन भाव कहा जाता है। इससे बैंक एकाउण्‍ट, पारिवारिक पृष्‍ठभूमि, कई मामलों में आंखें देखी जाती है। इसके अलावा यह संसाधन, नैतिक मूल्‍य और गुणों के बारे में बताता है।

2nd house - Jupiter. Abundance of resources, values and virtues.

तीसरा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे सहज भाव भी कहते हैं। कुण्‍डली को ताकत देने वाला भाव यही है। इसे आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन भाग्‍य के ठीक विपरीत अपनी बाजुओं की ताकत से कुछ कर दिखाने वाले लोगों का यह भाव बहुत शक्तिशाली होता है। बौद्धिक विकास, साहसी विचार, दमदार आवाज, प्रभावी भाषण एवं संप्रेषण के अन्‍य तरीके इस भाव से देखे जाएंगे। छोटे भाई के लिए भी इसी भाव को  देखा जाएगा।

3nd house - Mars. Strong development of mind, bold constructive ideas, strong healthy voice, influential oratory and other communication.

चौथा भाव - इसका कारक चंद्रमा है। यह सुख का घर है। किसी के घर में कितनी शांति है इस भाव से पता चलेगा। इसके अलावा माता के स्‍वास्‍थ्‍य और घर कब बनेगा जैसे सवालों में यह भाव प्रबल संकेत देता है। शांति देने वाला घर, सुरक्षा की भावना, भावनात्‍मक शांति, पारिवारिक प्रेम जैसे बिंदुओं के लिए हमें चौथा भाव देखना होगा। 

4th house - Moon. Peaceful home, sense of safety and security, emotional peace of mind, unconditional love in the family.

पांचवां भाव - इसका कारक गुरु है। इसे प्रॉडक्‍शन हाउस भी कह सकते हैं। इंसान क्‍या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्‍य, पुत्र और पेटेंट वाली खोजें तक शामिल हो सकती हैं। ईमानदारी से की गई रिसर्च भी इसी से देखी जाएगी। ईमानदारी से मेरा अर्थ है ऐसी रिसर्च जिससे विद्यार्थी अथवा विषय के लिए कुछ नया निकलकर आ रहा हो। इसके अलावा आनन्‍दपूर्ण सृजन, सुखी बच्‍चे, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्‍द, सत्‍कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखना जरूरी है। 

5th house - Jupiter. Joyful creation, blessed children, successful, investment. Joy in life, grounded in spiritual consciousness and devotion, and good karma naturally flowing from that.

छठा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे रोग का घर भी कहते हैं। प्रेम के सातवें घर से बारहवां यानि खर्च का घर है। शत्रु और शत्रुता भी इसी भाव से देखे जाते हैं। कठोर परिश्रम, सश्रम आजीविका, स्‍वास्‍थ्‍य, घाव, रक्‍तस्राव, दाह, सर्जरी, डिप्रेशन, उम्र चढ़ना, कसरत, नियमित कार्यक्रम के सम्‍बन्‍ध में यह भाव संकेत देता है।

6th house - Mars, Saturn. Hard work, application of self in service to worthy causes. In health, Mars and Saturn are first-class malefics, fostering wounding, bleeding, inflammation, surgery, (Mars) and inertia, depression, losses, and aging (Saturn). Exercise, work, austerities, regular program or lifestyle, taking the long view to do what will maintain health over the lifetime are positive uses of Mars and Saturn in the 6th house.

सातवां भाव - इसका कारक शुक्र है। लग्‍न को देखने वाला यह भाव किसी भी तरह के साथी के बारे में बताता है। राह में साथ जा रहे दो लोगों के लिए, प्रेक्टिकल के लिए टेबल शेयर कर रहे दो विद्यार्थियों के लिए, एक ही समस्‍या में घिरे दो साथ-साथ बने हुए लोगों के लिए यह भाव देखा जाएगा। जीवनसाथी, करीबी दोस्‍त, सुंदरता, लावण्‍य जैसे विषय इसी भाव से जुड़े हुए हैं। सभी विपरीत लिंग वालों के लिए। समलैंगिकों को कैसे देखेंगे यह अभी स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन कभी ऐसी कुण्‍डली आती है तो मैं दोनों का सातवां भाव ही देखने का प्रयास करूंगा। 

7th house - Venus. We desire peaceful relations with all, especially with significant others, a life full of love and affection, sattvic and full of goodness, beauty, graciousness.

आठवां भाव - इसका कारक शनि है। स्‍वाभाविक रूप से गुप्‍त क्रियाओं, अनसुलझे मामलों, आयु, धीमी गति के काम इससे देखे जाएंगे। इसके अलावा दूसरे के संसाधनों का सृजन में इस्‍तेमाल, जिंदगी की जमीनी सच्‍चाइयां, तंत्र-मंत्र के लिए यही भाव है।

8th house - Saturn. Conservative use of other's resources. Serious attitude to plumb the depths of reality. Conservative use of reproductive resources or ojas. Practice of yoga and austerities.

नौंवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। इसे भाग्‍य भाव भी कहते हैं। पिछले जन्‍म में किए गए सत्‍कर्म प्रारब्‍ध के साथ जुड़कर इस जन्‍म में आते हैं। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा से अधिक कब और कितना मिल सकता है। धर्म, अध्‍यात्‍म, समर्पण, आशीर्वाद, बौद्धिक विकास, सच्‍चाई से प्रेम, मार्गदर्शक जैसे गुणों को भी इसमें देखा जाता है। 

9th house - Jupiter. Religious-spiritual experience, realization, and devotion. Love of God as a foundation for life and blessings all around. vision, perspective, increase in wisdom, compassion, love of truth. Spiritual teacher (guru) and spiritual teachings and path shown by the 9th house.

दसवां भाव - इसके कारक ग्रह अधिक हैं। गुरु, सूर्य, बुध और शनि के पास दसवें घर का कारकत्‍व है।  हम जो सोचते हैं वही बनते हैं। यह भाव हमारी सोच को कर्म में बदलने वाला भाव है। हर तरह का कर्म दसवें भाव से प्रेरित होगा। बस बाध्‍यता इतनी है कि एक्‍शन हमारा होना चाहिए। रिएक्‍शन के बारे में यह भाव नहीं बताता। प्रोफेशनल सफलताएं, साख, प्रसिद्धि, नेतृत्‍व, लेखन, भाषण, सफल संगठन, प्रशासन, स्किल बांटना जैसे काम यह भाव बताता है।

10th house - Jupiter, Sun, Mercury, Saturn. Professional success, good reputation based on virtue, fame, leadership (Jupiter, Sun). Success in commerce, writing, speaking (Mercury). Successful organization, administration, teaching essentials, sharing expertise and wisdom of experience (Saturn). Jupiter shows the spiritual basis for worldly success - doing well by doing good.

ग्‍यारहवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। यह ज्‍यादातर उपलब्धि से जुड़ा भाव है। आय, प्रसिद्ध, मान सम्‍मान और शुभकामनाएं तक यह भाव एकत्रित करता है। हम कुछ करेंगे तो उस कर्म का कितना फल मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह भाव अधिक स्‍पष्‍ट करता है। यह कर्म का संग्रह भाव है। उपलब्धि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। धैर्य, विकास और सफलता भी इसी भाव से देखे जाते हैं।

11th house - Jupiter. Success in achieving goals and dreams.  Success in friendships, in groups and community. Broad vision of well-being, tolerance, diversity, generosity for the common good. Jupiter again shows the spiritual basis for life success and flourishing community.

बारहवां भाव - इसका कारक शनि है। यह खर्च का घर है। हर तरह का खर्च, शारीरिक, मानसिक, धन और जो भी खर्च हो सकते हैं सभी इसी से आएंगे। विद्या का खर्च भी इसी भाव से होता है। इस कारण बारहवें भाव में बैठा गुरु बेहतर होता है ग्‍यारहवें भाव की तुलना में क्‍योंकि सरस्‍वती की उल्‍टी चाल होती है, जितना संग्रह करेंगे उतनी कम होगी और जितना खर्च करेंगे उतनी बढ़ेगी। इसके अलावा बाहरी सम्‍बन्‍धों, विदेश यात्रा, धैर्य, ध्‍यान और मोक्ष इस भाव से देखे जाएंगे।

12th house - Saturn. The benefits of solitude and the contemplative life. Esoteric or metaphysical studies. Patience, depth, application of  self over time. Meditation, contemplation, study of scriptures, initiation, effective therapy, excellent listening. Seeking the truth on all levels. Karma from truth or falsity, sincerity or insincerity, application of self or not, depth or lack of it, character or lack of it, justice or injustice - Saturn weighs and sifts all of that. Completions. Moksha or liberation.

हालांकि यह लेख लम्‍बा हो गया है, लेकिन कारकों के बारे में एक ही स्‍थान पर बताने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पाया। विद्यार्थियों को तो इस पोस्‍ट का प्रिंट निकालकर अपने पास रखना चाहिए। वैसे हर भाव के स्‍वभाव और क्षेत्र के बारे में आगे भी विस्‍तार से चर्चा होती रहेगी, लेकिन एक साथ इतना मैटर दोबारा लिख नहीं पाउंगा, सो इस लेख के लिंक बाद में भी आते रहेंगे।

जय गणेश...

शनिवार, जून 05, 2010

क्‍या घर में अंडरग्राउंड होना चाहिए

इस बारे में बताने से पहले मैं बीकानेर की आबोहवा के बारे में बताना चाहूंगा। मैंने अपने विद्यार्थियों को भी यही बताया था। बीकानेर उत्‍तरी पश्चिमी राजस्‍थान का बिल्‍कुल सूखा प्रदेश है। किसी जमाने में यहां पाताल तोड़ कुएं खोदकर पानी निकाला जाता था। तापमान शून्‍य के करीब और पचास डिग्री तक पहुंचता है। ऑफीशियली तो यह शून्‍य से 49.5 डिग्री तक ही गया है, लेकिन बाहर सड़क पर इससे कहीं अधिक होता है। हवा में नमी एक प्रतिशत से पचास प्रतिशत तक होती है। साल में कभी-कभार सत्‍तर या अस्‍सी प्रतिशत तक पहुंचती है। वह भी बारिश के ठीक बाद। बारिश के मौसम में बीकानेर सबसे सुहावना स्‍थान है, क्‍योंकि यहां धोरों में पड़ी बारिश की बूंदें ठण्‍डी हवाएं लेकर आती हैं, उमस नहीं। इसके अलावा खुला स्‍थान। पिछली जनगणना तक तो यहां बहुत से इलाकों में सौ लोग भी प्रति एक किलोमीटर में नहीं थे। शहर के बीचों-बीच की आबादी को छोड़ दें तो कॉलोनियों में अब भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति लगती है।

अब बात करते हैं यहां की पुरानी हवेलियों की। इनकी बात इसलिए कि मॉर्डन साइंस आमतौर पर अनुभव से मिले परम्‍परागत ज्ञान को नकारने की कोशिश करता है। मैं किसी एक आदर्श हवेली के बारे में बात करूं तो इसका अग्र भाग जमीन से करीब चार फीट ऊंचा मिलेगा। पांच-सात सीढि़यां चढ़कर जब आप घर में दाखिल होते हैं उससे पहले आपको बरामदा दिखाई देगा। घर के मुख्‍य द्वार के आगे कुछ स्‍थान को छोड़ दिया जाता है। इसके बाद आती है साळ। इसे आमतौर पर दीवानखाने या ड्राइंगरूम की तरह काम में लेते हैं। अगर पूर्वमुखी हवेली है तो घर में घुसते ही बांयी ओर चौका मिलता है। यह खुला होता है। आंगन एक से डेढ़ फीट तक नीचा और घर के बीचों बीच मिलेगा। आंगन से पहले दीवानखाने के नीचे एक गुंभारिया या अंडरग्राउंड होता है। इसका एक दरवाजा घर के अंदर और एक दरवाजा बाहर गली में खुलता है। दांयी ओर बने दीवानखाने के ठीक पीछे पूजाघर और परिण्‍डा यानि मटकी रखने का स्‍थान मिलेगा। इसके बाद भीतर की ओर तीन कमरे एक कतार में। इनमें से दक्षिणी पश्चिम दिशा में एक ओरा होता है। आमतौर पर इसे मास्‍टर बैडरूम की तरह इस्‍तेमाल किया जाता है। रसोई और मास्‍टर बैडरूम के बीच सीढि़यां मिलेंगी। एक और बात घर में कहीं भी लैट्रिन नहीं मिलेगा। इसके लिए अलग से बाड़ा यानि ऐसा स्‍थान होगा जो घर से बिल्‍कुल जुदा होगा।

बीकानेर में पिछले कुछ सालों में जो नए घर बन रहे हैं उनमें अंडरग्राउंड नहीं बनाया जा रहा है। इसका प्रमुख कारण है सीलन। इंदिरा गांधी नहर के कारण घरों में बेतहाशा पानी आता है। यह पानी नाली और गली में बिखरता है। अंतत: सीलन का कारण बनता है। पहले के जमाने में अंडरग्राउंड में सीलन की समस्‍या कम थी।

गुरुवार, जून 03, 2010

मेरा, उसका सबका वास्‍तु - ऊर्जा का प्रवाह

इस साल एक बार फिर वास्‍तु की कक्षाएं लेने का मौका मिला। पिछली बार जहां पहले से वास्‍तु के जानकार लोगों से लेकर छोटी बालिका तक के विद्यार्थी थे वहीं इस बार सभी युवा या अधेड़ थे, और मेरी लगातार परीक्षा लेने की फिराक में थे। कुछ ने इधर उधर कुछ पढ़ भी रखा था। एक चिकित्‍सक, दो इंजीनियर, एक वास्‍तुप्रेमी और बाकी लोग ऐवेंई कुछ सीखने आ गए थे। डांस क्‍लास और पेंटिंग क्‍लास में एक घंटे के अंतर के कारण।

पहला दिन ऊर्जा का प्रवाह और दूसरा दिन ग्रहों की स्थिति बताने में बीता। इसके साथ ही शुरू हुई बहस कि मंदिर कहां होना चाहिए, किस कोने में किस देवता का वास होता है, किस वास्‍तु में बुरी आत्‍माओं का दोष हो सकता है आदि आदि...

इन ढ़ेर सारे सवालों के जवाब में एक बात मैंने वापस पूछी कि अगर किसी हिन्‍दू का घर देखा जाए तो वहां एक मंदिर होना आवश्‍यक है, लेकिन क्‍या एक ईसाई के घर के वास्‍तु में भी ऐसा ही होगा, या इससे कुछ अलग हो सकता है। एक ने जवाब दिया उत्‍तरी पूर्वी कोने में जीजस की मूर्ति लगा दी जाए, इसी तरह एक मुसलमान उसी कोने में मोहम्‍मद साहब ही मूर्ति लगा देगा। बाकी लोग अपने अपने धर्म की आराधना इसी कोने में कर लें। ऐसे में नई समस्‍या यह कि फिर उत्‍तरी पूर्वी या ईशान कोण में आखिर होगा कि देवता का वास। काफी देर तक बहस चलने के बाद मैंने इस बिंदू पर बहस बढ़ाने से मना कर दिया और अपनी ओर से निर्णय किया कि वास्‍तु की कक्षा के दौरान आगे से केवल ऊर्जा के प्रवाह पर ही चर्चा होगी। अगर ऊर्जा बाधित हो रही है तो उसे ठीक करने का प्रयास किया जाएगा। यकीन मानिए बस इसी एक ट्रिक के जरिए सभी लोगों के दिमाग की खिड़की एक साथ खुल गई।

आइए आपको भी बताता हूं कि ऊर्जा के प्रवाह के बारे में मैंने क्‍या बताया और इसे आप खुद कैसे देख सकते हैं। हालांकि मैं यहां कोई लाइन या डायग्राम नहीं बना पा रहा हूं लेकिन शब्‍दों से ही इसे स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करूंगा।

- किसी घर के वास्‍तु में तीन चीजों का प्रमुखता से ध्‍यान रखा जाए : हवा, पानी और रोशनी

- ऊर्जा के प्रवाह को रोशनी, हवा और पानी के बहाव से देखेंगे।

- ऊर्जा का प्रवाह उत्‍तर और पूर्व से आता है और दक्षिण तथा पश्चिम की ओर जाता है।

- उत्‍तरी पूर्वी कोने में सर्वाधिक ऊर्जा होती है।

- दक्षिणी पश्चिमी कोने में सबसे कम ऊर्जा होती है।

- परिवार के जिस सदस्‍य की जितनी ऊर्जा है उसे उतनी ही ऊर्जा के स्‍थान पर बैठाया जाए।

- उत्‍तरी पूर्वी कोना न केवल साधना बल्कि बच्‍चों के लिए भी बेहतर होगा

- दक्षिणी पश्चिमी कोना भण्‍डार के अलावा धैर्य के लिए परिवार के मुखिया का होगा

- उत्‍तरी पश्चिमी कोना दादा-दादी अथवा जो भी ग्रांड पेरेंट्स हों उनके लिए होगा।

- दक्षिण पूर्व में रसोई होगी।

- आंगन खाली होगा।

- भूमि भी अधिक ऊर्जा प्रवाह वाले स्‍थान पर नीची और कम ऊर्जा प्रवाह वाले स्‍थान पर ऊंची होगी।

- दुकान की वास्‍तु ऊर्जा का प्रवाह घर के ऊर्जा प्रवाह से ठीक उल्‍टा होगा।

- घर के अंदर दुकान होगी तो दोनों का ऊर्जा प्रवाह एक-दूसरे को प्रभावित करेगा।

- तीनों कारकों में से जो कारक प्रभावित हो रहा है उसी का ईलाज किया जाए। बाकी दोनों कारकों को छेड़ने की जरूरत ही नहीं है।

गुरुवार, मार्च 11, 2010

लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

लाल किताब प्राचीन नहीं है, जैसा कि लाल किताब के बहुत से विज्ञापनों में लिखा गया होता है 'असली प्राचीन लाल किताब।' बल्कि यह मध्‍ययुगीन है। मेरी जानकारी के अनुसार यवनों के भारत में प्रवेश के बाद भारत और पाकिस्‍तान के पंजाब वाले क्षेत्रों में इस ज्‍योतिष का तेजी से विकास हुआ। अनुमान लगा सकता हूं कि कोई छोटा ग्रुप रहा होगा, जिन्‍होंने मिलकर परम्‍परागत भारतीय ज्‍योतिष में शाबरी मंत्रों जैसे प्रयोग किए और ऐसे लोकरंजन के उपाय निकाल लिए जो अपनाने में आसान और कारगर हों।
लाल किताब के प्राचीन नहीं होने से इसकी महत्‍ता कम नहीं हो जाती। वर्तमान दौर में उपायों के लिए अगर कोई पुस्‍तक मदद करती है तो वह है लाल किताब, इसके अलावा पटियाला और चंडीगढ़ के कुछ लोगों ने, अगर सही कहूं तो एक युवा ज्‍योतिषी ने सुनहरी किताब भी प्रकाशित की। वह युवा बहुत कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गया लेकिन जो सुनहरी किताब लिखकर गया है, वह लाल किताब को भी पीछे छोड़ती है,
लेकिन अभी बात उपचारों की
आप किसी भी पुराने ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए। उसमें ग्रहों की गड़बड़ पर शांति के उपचार बताए गए हैं। दान, भेंट, पूजा, यज्ञ अथवा मंत्रोच्‍चार से समस्‍याओं का समाधान  पाया जा सकता है। फौरी तौर पर चंद्र राशियों के आधार पर ग्रहों के रत्‍नों की जानकारी भी कहीं-कहीं मिल जाती है, लेकिन वह भी ग्रह शांति उपचारों से ही संबंधित है।
उपचारों का बिंदू आने के साथ ही मेरे दिमाग में सबसे पहले लाल किताब आती है। इसके दो कारण हैं। पहला कि इस किताब में उपचारों की इतनी लम्‍बी रेंज दी गई है कि एक उपचार नहीं कर सको तो दूसरा कर लो, दूसरा नहीं तो तीसरा, इसी तर्ज पर लिखी गई सुनहरी किताब तो उपचारों की पूरी लिस्‍ट ही थमा देती है। अपनी इच्‍छा के अनुसार उपचार चुनो और कर लो। दूसरा कारण है कि मेरे गुरूजी ने मुझे बताया कि लाल किताब के उपचार तांत्रिक विधियों पर आधारित है। जातक जैनुइन है तो उसे लाल किताब का ही उपचार बताओ, जातक की जितनी अधिक आस्‍था होगी, उपचार उतनी ही तेजी से काम करेगा।
वर्तमान दौर में लोगों को प्रसव पीड़ा भोगने की बजाय लोगों को सिजेरियन ऑपरेशन अधिक सहज लगता है। इसलिए उन्‍हें वही दो, जो वे मांगते हैं। यह बात मुझे शुरूआती दौर में ही महसूस होने लगी थी। किसी को कोई उपचार बताओ और कहो कि पांच साल बाद सब‍कुछ दुरुस्‍त हो जाएगा तो, या तो वह ज्‍योतिषी को दिमागी रूप से दिवालिया समझेगा, वरना अपनी समस्‍याओं की लिस्‍ट बताकर तात्‍कालिक स्थितियों से तत्‍काल छुटकारा दिलाने की गुहार लगाएगा।
रत्‍नों की सीरीज में यह लाल किताब कहां घुस गई
हां, अभी तो रत्‍नों पर लगातार लिख रहा हूं, इस बीच यह लाल किताब कहां से घुस आई। जैसा कि मैंने अपने पुराने लेखों में लिखा है ज्‍योतिष की एक विधा में दूसरी विधा का घालमेल इतनी आसानी से होता है कि दोनों विधाओं के लिंक मिले जुले नजर आने लगते हैं। रत्‍नों से उपचार में एक ओर जहां हस्‍तरेखा शास्‍त्र घुसा हुआ है वहीं दूसरी ओर लाल किताब भी घुस चुकी है। लाल किताब का सूत्र है कि जो ग्रह किसी स्‍थान पर बैठकर खराब फल दे रहा हो उसे वहां से हटाकर दूसरी जगह पहुंचा दो। यह इतना आसान है, गुरू जैसे बड़े ग्रह को बिना उसके बारह चंद्रमा को छेड़े उठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंचा दिया जाता है। यह ऐसे ही नहीं हो जाता है। इसके लिए कुछ नियम हैं। उसकी बात बाद में...


लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह से संबंधित वस्‍तुओं को
- प्रथम भाव में पहुंचाना हो उसे गले में पहनिए
- दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए मंदिर में रखिए
- तीसरे भाव में पहुंचाने के लिए संबंधित वस्‍तु को हाथ में धारण करें
- चौथे भाव में पहुंचाने के लिए पानी में बहाएं
- पांचवे भाव के लिए स्‍कूल में पहुंचाएं,
- छठे भाव में पहुंचाने के लिए कुएं में डालें
- सातवें भाव के लिए धरती में दबाएं
- आठवें भाव के लिए श्‍मशान में दबाएं
- नौंवे भाव के लिए मंदिर में दें
- दसवें भाव के लिए पिता या सरकारी भवन को दें
- ग्‍यारहवें भाव का उपाय नहीं
और बारहवें भाव के लिए ग्रह से संबंधित चीजें छत पर रखें।

हां, तो यह हुआ लाल किताब का हिसाब किताब।
अब बात मेरे एक अनुभव की। मैं एक जातक को परम्‍परागत पंडितजी के पास लेकर गया। उन्‍हें कुण्‍डली दिखाई। जातक कन्‍या लग्‍न का था। पंडितजी ने कहा चंद्रमा खराब है, इसे मोती पहनाना पड़ेगा। मैंने कहा ठीक है मैं अंगूठी बनवाने के लिए बोल देता हूं, तो पंडितजी ने मना कर दिया। कहां कि कन्‍या लग्‍न के जातक को लॉकेट में ही चंद्रमा बनवाकर पहनना होगा। क्‍यों... पंडितजी से पूछा नहीं...
मैं बताता हूं इसका कारण
लाल किताब के अनुसार चंद्रमा की अंगूठी बनाकर पहनने से चंद्रमा चला जाएगा तीसरे घर में, यानि वृश्चिक राशि में, इससे चंद्रमा नीच का हो जाएगा। अब एक तरफ लाल किताब राशियों को मानती ही नहीं है। वह हर कुण्‍डली को मेष लग्‍न की कुण्‍डली मानती है और हर घर को तयशुदा राशियां दे रखी हैं। ऐसे में परम्‍परागत ज्‍योतिष और लाल किताब का घालमेल रत्‍न को पहनने में एक और बाधा बन गया। परम्‍परागत ज्‍योतिष ने तो बस इतना कहा कि चंद्रमा के उपचार के लिए मोती पहनाना चाहिए, लेकिन लाल किताब बता रही है कि हाथ में नहीं गले में पहनो...
अब जिन लोगों ने मेरे पिछले लेख पढ़े हैं वे समझ रहे होंगे कि रत्‍न केवल टच करने या किरणों से ही उपचार नहीं करते बल्कि कैसे पहने हैं इससे भी फर्क पड़ता है। तो इस तरह किसी एक रत्‍न को पहनने के लिए मेरे पास तीन अलग-अलग आधार हो गए, जो कभी भी किसी भी स्थिति में एक-दूसरे का निषेध कर सकते हैं। कब और कैसे करेंगे यह तय नहीं है।
अगली पोस्‍ट में मैं चर्चा करूंगा कि इन सब बाधाओं के बावजूद रत्‍न क्‍यों पहनाया जाता है, क्‍या इसे पहनाए बिना काम नहीं चल सकता...

इंतजार कीजिए अगली कड़ी का...

शनिवार, मार्च 06, 2010

वक्री अच्‍छा होता है या खराब

पिछले दिनों एक शादी समारोह के दौरान मेरे पुराने गुरुजी पंडित मंगलचंदजी पुरोहित मिल गए। चर्चा चली तो बात आ गई वक्री गहों पर। आमतौर पर ग्रहों के संबोधन को ही उनका असर मान लिया जाता है। जैसे नीच के ग्रह को नीच यानि घटिया और उच्‍च के ग्रह को उच्‍च यानि श्रेष्‍ठ मान लिया जाता है। यही स्थिति कमोबेश वक्री ग्रह के साथ भी होती है। उसे उल्‍टी चाल वाला मान लिया जाता है। यानि वक्री ग्रह की दशा में जो भी परिणाम आएंगे वे उल्‍टे ही आएंगे। ऐसा नहीं है कि केवल नौसिखिए या शौकिया ज्‍योतिषी ही यह गलती करते हैं बल्कि मैंने कई स्‍थापित ज्‍योतिषियों को भी यही गलती करते हुए देखा है।

कैसे होता है वक्री ग्रह

जो लोग एस्‍ट्रोनॉमी जानते हैं उन्‍हें पता है कि सौरमण्‍डल में सारे ग्रह सूर्य की दीर्धवृत्‍ताकार कक्ष में परिक्रमा करते हैं। इस दौरान ग्रह कई बार सूर्य के बिल्‍कुल नजदीक आ जाते हैं तो कई बार अधिकतम दूरी पर चले जाते हैं। भारतीय ज्‍योतिष में सूर्य को भी एक ग्रह मानकर गणनाएं की जाती हैं। ऐसे में पृथ्‍वी पर खड़ा अन्‍वेषक जब देखता है कि सूर्य के बिल्‍कुल पास पहुंच चुका ग्रह गति करते हुए रफ्तार में सूर्य से आगे निकल रहा है तो उसे कहते हैं तीव्रगामी और जब सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तो अन्‍वेषक को ग्रह की गति सूर्य की तुलना में धीमी होती दिखाई देती है। इसे कहते हैं ग्रह का वक्री होना। चूंकि बुध सूर्य के सबसे नजदीक है। ऐसे में सबसे कम अंतराल में बुध वक्री, मार्गी और अतिगामी होता है। वहीं शनि सबसे अधिक दूरी पर होने के कारण बहुत धीमी रफ्तार से अपनी ऐसी गति प्रदर्शित करता है।

कैसा होगा वक्री ग्रह का प्रभाव

अब दूसरा और महत्‍वपूर्ण प्‍वाइंट है कि वक्री ग्रह का परिणाम क्‍या होगा। इसके लिए उदाहरण लेते हैं बुध का। बुध कभी भी सूर्य से तीसरे घर से दूर नहीं जा पाता है। यानि 28 डिग्री को पार नहीं कर पाता है। इसी के साथ दूसरा तथ्‍य यह है कि सूर्य के दस डिग्री से अधिक नजदीक आने वाला ग्रह अस्‍त हो जाता है। अब बुध नजदीक होगा तो अस्‍त हो जाएगा और दूर जाएगा तो वक्री हो जाएगा। ऐसे में बुध का रिजल्‍ट तो हमेशा ही नेगेटिव ही आना चाहिए। शब्‍दों के आधार पर देखें तो ग्रह के अस्‍त होने का मतलब हुआ कि ग्रह की बत्‍ती बुझ गई, और अब वह कोई प्रभाव नहीं देगा और वक्री होने का अर्थ हुआ कि वह नेगेटिव प्रभाव देगा।

वास्‍तव में दोनों ही स्थितियां नहीं होती।

टर्मिनोलॉजी से दूर आकर वास्‍तविक स्थिति में देखें तो सूर्य के बिल्‍कुल पास आया बुध अस्‍त तो हो जाता है लेकिन अपने प्रभाव सूर्य में मिला देता है। यही तो होता है बुधादित्‍य योग। ऐसे जातक सामान्‍य से अधिक बुद्धिमान होते हैं। यानि सूर्य के साथ बुध का प्रभाव मिलने पर बुद्धि अधिक पैनी हो जाती है। दूसरी ओर वक्री ग्रह का प्रभाव। सूर्य से दूर जाने पर बुध अपने मूल स्‍वरूप में लौट आता है। जब वह वक्री होता है तो पृथ्‍वी पर खड़े अन्‍वेषक को अधिक देर तक अपनी रश्मियां देता है। यहां अपनी रश्मियों से अर्थ यह नहीं है कि बुध से कोई रश्मियां निकलती हैं, वरन् बुध के प्रभाव वाली तारों की रश्मियां अधिक देर तक अन्‍वेषक को मिलती है। ऐसे में कह सकते हैं बुध उच्‍च के परिणाम देगा। अब यहां उच्‍च का अर्थ अच्‍छे से नहीं बल्कि अधिक प्रभाव देने से है।

तो बुध कब अच्‍छे या खराब प्रभाव देगा

इसका जवाब बहुत आसान है। जिस कुण्‍डली में बुध कारक हो और अच्‍छी पोजिशन पर बैठा हो वहां अच्‍छे परिणाम देगा और जिस कुण्‍डली में खराब पोजिशन पर बैठा हो वहां खराब परिणाम देगा। इसके अलावा जिन कुण्‍डलियों में बुध अकारक है उनमें बुध कैसी भी स्थिति में हो, उसके अधिक प्रभाव देखने को नहीं मिलेंगे।

कहां है बुध का प्रभाव

वर्तमान में हर जगह बुध का प्रभाव है। जहां भी संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है वहां बुध का प्रभाव है। इसमें हर तरह का मीडिया शामिल है। संचार क्रांति बुध की ही क्रांति है, इंटरनेट बुध का ही स्‍वरूप है, लेखा और बैंकिंग भी बुध के प्रभाव क्षेत्र के हिस्‍से हैं और हां शेयर बाजार में भी बुध का भीषण प्रभाव है। आम आदमी की जिंदगी में भी सूचना का आना, जाना, रुकना और सूचना पैदा करना बुध का ही काम है।

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

क्‍या हो ज्‍योतिषी की भूमिका ?

यह सवाल कमोबेश हर ज्‍योतिष सीखने वाले विद्यार्थी के समक्ष आती है। कभी अध्‍ययन की शुरूआत में तो कभी अध्‍ययन के दौरान तो कभी ज्‍योतिष से उकता जाने के बाद। बहुत से लोग ज्‍योतिष सीखना शुरू करते हैं। कुछेक फलादेश देते हैं और इसके बाद इस विषय को इसी कारण छोड़ देते हैं कि वे अपनी भूमिका तय नहीं कर पाते हैं। हालांकि बाजार में कुछ ऐसे ज्‍योतिषी भी हैं जो कमोबेश तांत्रिक की भूमिका निबाहते हैं। मैंने उनके मुंह से अपने जातक को यह तक कहते सुना है आप कहें तो आपके विरोधी का पेशाब बंद कर दूं। आप कहें तो सोते को खड़ा कर दूं। कुछ इसी तरह के जोश दिला देने वाले वाक्‍य सुनकर जातक हैरान रह जाता है। विरोधी का कुछ हो न हो जातक का पेशाब तो बंद हो ही जाता है। वह उपचार करने और फीस देने के लिए तैयार नजर आने लगता है। कई चक्‍कर निकालने के बाद भले ही जातक का मोहभंग हो जाए लेकिन एक समय के लिए तो वह जैसे ज्‍योतिषी का अनुयायी बन जाता है। ज्‍योतिषी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक जातक छूटे या बंधा रहे, क्‍योंकि उसके पास तो पूरी कतार होती है मूर्ख बनने वालों की। प्रोफेशनली ज्‍योतिष का व्‍यवसाय करने के दौरान मेरे सामने यह सवाल आया था कि क्‍या है ज्‍योतिषी की भूमिका और कहां तक वह जातक की जिन्‍दगी में दखल कर सकता है। वह कैसे उपचार बता सकता है जो उसकी जिन्‍दगी में सुधार लाए या सोते को खड़ा कर दे। मैंने कालान्‍तर में कई वरिष्‍ठ ज्‍योतिषियों और अपने साथियों से बात भी की। कुछ लोगों के दिमाग में स्‍पष्‍ट धारणा थी तो कई ने वैसे ही जवाब दिए जो वे अपने जातकों को देते थे। वास्‍तव में अधिकांश ज्‍योतिषी यह नहीं जानते कि उनकी भूमिका क्‍या है। जैसे एक चिकित्‍सक के पास जाते हैं और उसे रोग बताते हैं तो वह उपचार लिखकर दे देता है। अब रोगी पर निर्भर करता है कि वह कितनी गंभीरता से दवाएं लेता है, परहेज रखता है और बीमार करने वाली परिस्थितियों से दूर रहता है। चिकित्‍सक रोगी का रोग खुद नहीं ले सकता है। इसके उलट जो ज्‍योतिषी एक तरह से दावा करते हैं कि वे जातक का दुख दूर कर देंगे हो सका तो उनका दुख भी खुद ले लेंगे। यह मुझे इस परा विद्या के मामले में अतिरेक लगता है। हालांकि कई ज्‍योतिषियों ने यह तो बताया है कि एक आदर्श ज्‍योतिषी कैसा होना चाहिए, उसकी कुण्‍डली में क्‍या योग होने चाहिए या साइकोलॉजिकली वह कितना स्‍ट्रांग होना चाहिए। लेकिन ज्‍योतिषी और जातक के इंटरएक्‍शन में ज्‍योतिषी की क्‍या भूमिका होनी चाहिए इस पर अधिक नहीं दिया गया है। जैसा कि मुझे लगता है प्राचीन भारतीय मान्‍यता की तुलना में फलित ज्‍योतिष अपेक्षाकृत नया विषय है। ऐसे में ज्‍योतिषी की भूमिका के लिए नया प्रोटोकॉल ज्‍योतिषियों को ही बनाना पड़ेगा। वैसे एक जगह दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णा‍मूर्ति ने एक जगह स्‍पष्‍ट किया है कि ज्‍योतिषी की क्‍या भ‍ूमिका हो सकती है। वे बताते हैं कि गहरी झील में नाव खे रहा जातक जब थक जाता है तो पास से गुजरता हुआ ज्‍योतिषी उसे यह संकेत दे सकता है कि कहां पानी उथला है और कितनी देर तक और उसे नाव खेनी पड़ेगी। यह बहुत स्‍थूल उदाहरण हुआ लेकिन इससे बहुत कुछ संकेत मिल जाते हैं। मेरा प्रबुद्ध ज्‍योतिषियों से आग्रह है कि वे इस विषय पर अपने विचार पेश करें…… यथा

संगीता पुरी जी ने कहा ….

…जहां तक मेरा मानना है कि एक ज्योतिषी को मानवतावादी होना चाहिए….कोई व्यक्ति उसके पास खुद की परेशानी लेकर आता है…..उसे मनोवैज्ञानिक तौर पर सम्बल प्रदान करना एक ज्योतिषी का काम है…..पर वह ऐसा न करे कि उसके विरोधियों की तकलीफ बढ जाए….वैसे तो एक ज्योतिषी के हाथ में यह सब होता ही नही ….हम जातको के सम्मुख सिर्फ लाल और हरी बत्ती दिखा सकते हैं…..हमारा काम लोगों को यह समझाना है कि उसे अपने कर्तब्यों का फल पूर्ण तौर पर कब से मिलने लगेगा।