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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

Oman : A strong tool for Astrological prediction

शक्तिशाली औजार है ओमेन


एक ज्‍योतिषी (Astrologer) जब किसी कुण्‍डली का विश्‍लेषण करता है तो पूर्व में तय किए गए सिद्धांतों और गणितीय गणनाओं के अतिरिक्‍त उसके पास भविष्‍य में झांकने के लिए एक और महत्‍वपूर्ण औजार होता है। इसे कहते हैं ओमेन (Omen)। किसी भी व्‍यक्ति अथवा व्‍य‍वस्‍था के निकट भविष्‍य की जानकारी देने के लिए प्रकृति लगातार संकेत देती रहती है। इन संकेतों को एक ज्‍योतिषी अपने अंतर्ज्ञान से पकड़ पाता है। 

पूर्व में जहां संकेतों को ज्‍योतिषीय गणनाओं से भी अधिक महत्‍व दिया जाता रहा है, वहीं वर्तमान दौर में हम संकेतों को दरकिनार कर केवल कुण्‍डली से निकाले जाने वाले फलादेशों पर ही निर्भर हो गए हैं। ओमेन को समझाने के लिए दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर के.एस. कृष्‍णामूर्ति (KP Astrology) ने अपनी पुस्‍तक फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍टोलॉजी में एक उदाहरण दिया है। पिछले कई दशकों में ओमेन को समझाने के लिए इसे सबसे शानदार उदाहरण माना गया है। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि ओमेन को समझने के लिए हमें प्रकृति को समझने की अपनी दृष्टि भी विकसित करनी होगी।

‘‘एक ज्‍योतिषी अपने शिष्‍यों को ज्‍योतिष का पाठ पढ़ा रहा था। इसी दौरान उसके पास एक व्‍यक्ति दौड़ता हुआ आता है और बताता है कि उसकी पत्‍नी उसे छोड़कर जा चुकी है। ठीक उसी समय ज्‍योतिषी की पत्‍नी कमरे में आती है और बताती है कि कुएं से पानी निकालने के दौरान रस्‍सी टूट गई और बाल्‍टी कुएं में जा गिरी है। ज्‍योतिषी अपने शिष्‍यों से पूछते हैं कि व्‍यक्ति के सवाल और अभी मिले संकेत से क्‍या अर्थ लगाए जा सकते हैं। इस पर सभी शिष्‍य एक मत थे कि दोनों का संबंध बनाने वाली रस्‍सी के टूट जाने का अर्थ है कि जातक की पत्‍नी लौटकर नहीं आएगी। ज्‍योतिष गुरु मुस्‍कुराए। उन्‍होंने कहा नहीं, ऐसा नहीं है। हकीकत में पानी से पानी को अलग करने वाला तत्‍व (रस्‍सी) समाप्‍त हो गया है। ऐसे में पानी फिर से पानी में जा मिला है। इससे संकेत मिलता है कि जातक की पत्‍नी शीघ्र लौट आएगी। ज्‍योतिषी ने जातक से कहा कि वह घर जाए, उसकी पत्‍नी शीघ्र लौटने वाली है। उसी दिन शाम तक जातक की पत्‍नी लौट आई।’’

हम आम जिंदगी में भी रोजाना ऐसे संकेतों (Signs) से रूबरू होते हैं। घर से निकलते ही मिलने वाले संकेतों से हमारा अवचेतन (Subconscious) स्‍वत: कयास लगाने लगता है कि आज का दिन कैसा जाएगा। बस अंतर यह है कि यहां हमारा अवचेतन काम कर रहा होता है। वह हम अपने तरीके से समझाने की कोशिश करता है कि भविष्‍य के क्‍या संकेत हैं। संकेतों को भी ज्‍योतिषियों ने संकेतों के तौर पर इस्‍तेमाल करना शुरू किया होगा, कालान्‍तर में उन्‍हीं संकेतों को शकुन और अपशकुन के तौर पर विकृत रूप से इस्‍तेमाल किया जाने लगा। जबकि ये महज जातक के भविष्‍य का संकेत मात्र हैं, न कि शकुन अथवा अपशकुन देने वाले तत्‍व की समस्‍या। 

शकुन और अपशकुन (Shakun/apshakun)

पंडित नेमीचंद शास्‍त्री ने भद्रबाहु संहिता (Bhadrabahu Samhita) में ऐसे ही संकेतों का विस्‍तार से वर्णन किया है। हालांकि इस संहिता का अधिकांश भाग मण्‍डेन से संबंधित है। यह प्रकृति के संकेतों से प्रांत, स्‍थान विशेष, राष्‍ट्र अथवा राजा से संबंधित सवालों के जवाब देते हैं, लेकिन इनमें भी कुछ संकेत ऐसे भी बताए गए हैं जिन्‍हें हम आमतौर पर जिंदगी में देखा करते हैं। हर्षचरित में बाण शत्रुओं को मिल रहे खराब संकेतों के बारे में जानकारी देते हैं। 

मसलन, दिन में सियार मुंह उठाकर रोने लगे, जंगली कबूतर घरों में आने लगे, बगीचों में असमय फूल खिलने लगे, घोड़ों ने हरा धान खाना बंद कर दिया, रात में कुत्‍ते मुंह उठाकर रोने लगे, महलों के फर्श से घास निकल आई। ऐसे सभी संकेत वास्‍तव में बाण ने यह बताया कि शत्रुओं को अपनी पराजय संकेतों में दिखाई देने लगी थी। एक सामान्‍य व्‍यक्ति भी घर से निकलते समय दूध का सामने आना, सफाईकर्मी का सामने पड़ना, छींक आना या ऐसे सैकड़ों लक्षण जानता है। पीढि़यों से ये संकेत हमारी मदद करते रहे हैं और आज भी भविष्‍य का सटीक संकेत देने का प्रयास करते हैं।

प्रश्‍न ज्‍योतिष में ओमेन (Omen in Prashna Jyotish)

प्रश्‍न कुण्‍डली से फलादेश देने की विधियों में ओमेन की सहायता प्रमुखता से ली जाती रही है। प्रश्‍नकर्ता के ज्‍योतिषी के पास पहुंचने और उसके उठने बैठने की रीतियों से ही सवाल का अधिकांश जवाब मिल जाता है, बाद में प्रश्‍न कुण्‍डली से अगर संकेतों की सहायता कर रहे योग मिल रहे हों तो सटीक उत्‍तर मिलता है। 

प्रश्‍नकर्ता के बोले गए शब्‍दों में प्रथम शब्‍द, उसका अपने शरीर के किस अंग पर स्‍पर्श है, उसके चेहरे की दिशा किस ओर है, उसकी नासिका का कौनसा स्‍वर चल रहा है, प्रश्‍नकर्ता की शारीरिक और मानसिक चेष्‍टाएं प्रश्‍नकर्ता के प्रश्‍न का सहायक अंग मानी गई हैं। ऐसे में जातकों को सलाह दी जाती है कि प्रश्‍नकर्ता ज्‍योतिषी के पास जाते समय फल, पुष्‍प, मांगलिक पदार्थ और द्रव्‍य हाथ में लेकर ज्‍योतिषी के पास जाएं और पूर्वमुख होकर प्रणाम कर अल्‍प शब्‍दों में अपना प्रश्‍न रखे। 

स्‍वर की भूमिका और इसे बदलना (Significance of Swar)

हम कोई काम शुरू करें, तो उसमें सफलता मिलेगी या नहीं। अगर सफलता मिलेगी तो कितनी। इसका तुरंत जवाब हमारा स्‍वर दे देता है। हमारे नाक की दो नासिकाएं हैं। आमतौर पर एक समय में केवल एक नासिका से ही श्‍वसन किया होती है। बाईं नासिका को बायां स्‍वर या चंद्र अथवा इडा नाड़ी (Ida) और दाईं नासिका को दायां स्‍वर या सूर्य अथवा पिंगला (Pingla) नाड़ी कहा जाता है। आदर्श स्थिति यह है कि सूर्योदय से ढाई-ढाई घड़ी (करीब एक घंटे) में स्‍वर बदलता रहता है। 

परिस्थितिवश बहुत बार ऐसा नहीं होता है। जब कभी दोनों स्‍वर चलते हैं तो उसे सुषुम्‍ना कहा जाता है। प्रकृति के आधार पर इडा नाड़ी तम प्रधान है, पिंगला रज प्रधान और सुषुम्‍ना सत्‍व प्रधान नाड़ी है। बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और सोमवार को इडा नाड़ी सूर्योदय से चलनी चाहिए, रविवार, शनिवार और मंगलवार को पिंगला नाड़ी सूर्योदय से चलनी चाहिए। जो नाड़ी चल रही हो उसे बदलने के लिए भी कई उपाय बताए गए हैं। 

पातंजलयोग प्रदीप में बताया गया है कि जिस स्‍वर को चलाना हो उस पर कुछ समय तक ध्‍यान केन्द्रित करने पर वह स्‍वर चलने लगता है। जो स्‍वर चल रहा हो उसके विपरीत करवट लेकर पसली के नीचे तकिया देकर लेटने से दूसरी नाड़ी चलने लगती है। जो स्‍वर चलाना हो उसके विपरीत नासिका में रूई अथवा कपड़ा दबाने पर स्‍वर बदल जाता है। दौड़ने, परिश्रम करने अथवा प्राणायाम से भी स्‍वर बदलता है।

सोमवार, जुलाई 16, 2012

Astrology : Specification of Jatakas Kundali and limitations

ज्‍योतिष : जातक कुण्‍डली की विशेषताएं (और सीमाएं)

Parasharas Astro Consultancy






जातक (Jatak) के सामने कुण्‍डली लेकर बैठे ज्‍योतिषी (Astrologer) के सामने दो चुनौतियां एक साथ होती हैं। एक तो उसे यह प्रदर्शित करना होता है कि वह दुनिया में सबकुछ जानने वाला बंदा है, दूसरा उसका परमात्‍मा से सीधा संबंध है, ऐसे में वह आपके सभी पुराने कर्मों का लेखा-जोखा “सैट” कर देगा। 

एक अकेला ज्‍योतिषी इतनी बड़ी इमेज नहीं बना सकता। जाहिर सी बात है दुनिया के हजारों ज्‍योतिषियों ने मिलकर इस धारणा का पोषण किया होगा और लाखों जातकों ने सहमति में सिर धुने होंगे, तब कहीं जाकर यह धारणा बैठ पाई होगी कि ज्‍योतिषी जातक के भाग्‍य के साथ जैसे चाहे खेल सकता है। सोते को खड़ा कर सकता है, रोते को हंसा सकता है और भी बहुत कुछ। 

जातक कुण्‍डली से कई प्रकार की गणनाएं संभव हैं। आमतौर पर प्रसिद्ध सवालों का विश्‍लेषण जातक कुण्‍डली से किया जाता है। देवकीनन्‍दन सिंह की पुस्‍तक ज्‍योतिष रत्‍नाकर ने बहुत खूबसूरती के साथ इन सवालों को प्रवाह नाम दिया और जीवन के आठ प्रवाह बनाकर यह तय कर दिया कि कौनसी वय का व्‍यक्ति कौनसे सवाल पूछ सकता है और उनके हल कैसे निकाले जाएंगे। 

जीवन की प्रथम तरंग बाल्‍यावस्‍था (Childhood) है। तब अधिकांश सवाल बालारिष्‍ट यानी बचपन में किसी हादसे से मृत्‍यु अथवा अंग भंग की आशंका तो नहीं है, बालक का स्‍वास्‍थ्‍य कैसा रहेगा। फिर पढ़ाई को लेकर सवाल होते हैं, इसके बाद नौकरी, विवाह, संतान, धन, मकान, संतति का विवाह, वृद्धावस्‍था के रोग और आखिर में मृत्‍यु। 

यकीन मानिए अधिकांश जातकों को जो सवाल निहायत निजी (Personal) लगते हैं, वे सबसे कॉमन (Common) सवाल होते हैं। इन्‍हें देखने के लिए निश्चित सिद्धांत हैं। अगर तरतीब से सिद्धांतों का अनुसरण किया जाए और ज्‍योतिषी की अंत:प्रज्ञा सही काम करे तो जवाब भी सटीक आते हैं।

कई बार सही तरीके से चल रही गाड़ी पटरी से उतर जाती है। आमतौर पर ऐसी स्थिति राहू की दशा, अंतरदशा, सूक्ष्‍म अंतर के दौरान आती है। इसके अलावा केतू, चंद्रमा, शनि और मंगल के योग, दुर्योग और दशा-अंतरदशा का क्रम भी ऐसी स्थितियां पैदा करते हैं। यह स्थिति जीवन की किसी भी तरंग के दौरान हो सकती है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष जिसमें पाराशर से जैमिनी तक के विश्‍लेषण उपलब्‍ध हैं, बताती है कि समस्‍या कहां से शुरू हुई है। 

उपचारों की भूमिका (Role of remedy)

आमजन में यह मान्‍यता बन गई है कि ज्‍योतिषी खराब ग्रहों का उपचार बताने वाला होता है। सही मायनों में देखा जाए तो ज्‍योतिषी भूमिका जातक को उसके अच्‍छे और खराब ग्रहों के बारे में जानकारी देने के साथ ही खत्‍म हो जाती है। पर, जातक इतने भर से संतुष्‍ट नहीं हो सकता। एक बार उसे बता दिया जाए कि अमुक समय से जातक का खराब समय चल रहा है, फलां प्रकार की समस्‍याएं सामने आ रही हैं और आने वाले इतने दिनों तक समस्‍या बनी रहने की आशंका है। 

अब जातक चाहता है कि खराब समय को दुरुस्‍त करने का उपचार ज्‍योतिषी ही बता दे। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष  (Traditional hindu astrology) में जातक के खराब समय को पूर्व जन्‍मों के कर्मों का फल माना गया है। उस काल में जातकों को पूर्व जन्‍मों के कर्मफलों के खराब प्रभाव को कम करने के लिए प्रायश्चित का प्रावधान किया गया। इसके तहत पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन और दान का प्रावधान किया गया। 

ऐसा माना गया कि इससे जातक के पिछले जन्‍मों के बंधन छूटते जाते हैं। आज भी अन्‍य किसी उपचार की तुलना में ये उपचार कहीं अधिक प्रभावी नजर आते हैं। हालांकि उपचार की पद्धतियां और इनके प्रभावों का मूल ज्‍योतिष विश्‍लेषण से सीधा संबंध नहीं है, फिर भी जातक का आग्रह दोनों को एक ही श्रेणी में ला खड़ा करता है। 

किसी ऑर्गेनिक रिएक्‍शन (Organic reaction) की तरह ये उपचार भी धीरे धीरे काम करते हैं और जातक की स्थिति में नियमित सुधार करते हुए उसे जीवन में बेहतरी की ओर ले जाते हैं। कुछ जातक अधिक जल्‍दी में होते हैं, वे चाहते हैं कि जिस दिन उपचार बताया जाए, उसी दिन से अब तक हुई समस्‍याओं का समाधान हो जाए। ऐसे में कालान्‍तर में तांत्रिक और लाल किताब जैसे फौरी उपचार प्रचलन में आए।

शनिवार, अप्रैल 25, 2009

नेता और ज्‍योतिषी- यूं पत्‍थर बन गया भगवान

यह किस्‍सा भी महाराज से जुड़ा है। चुनाव के दिनों में महाराज बहुत बिजी रहते हैं। पिछले आठ महीने से तो उन्‍हें सांस खाने की भी फुरसत नहीं मिल रही है। पहले विधानसभा चुनाव और अब लोकसभा चुनाव।

यह किस्‍सा पिछले विधानसभा चुनाव का है। यानि जब वसुंधरा की सरकार बनी थी तब का। उन दिनों राम की पार्टी वाले कई नेताओं को राहू का भय सता रहा था। सो महाराज को मिला एसी का टिकट। जयपुर की किसी फार्म हाउस में उनके रहने की पुख्‍ता व्‍यवस्‍था कर दी गई थी। महाराज की सेवा सुबह एक नेता आता, दोपहर को दूसरा और रात को तीसरा। कई दिनों से यही क्रम चल रहा था। रिसोर्ट पर महाराज रोजाना नेताओं की शक्‍ल देखकर बोर होने लगे। तो एक दिन अपने कुछ चेलों को वहीं बुला लिया। एक दिन महाराज अपने चेलों के साथ बैठे थे कि एक चेले ने पूछ लिया कि महाराज भगवान कहां है। महाराज तरंग में थे, सवाल पर नाड़ खिंच गई, बोले बेटा वो सामने छोटा सा पत्‍थर पड़ा है ना उसमें भगवान है। चेला हंसा तो महाराज तन गए बोले 'हंस मत, अभी घण्‍टेभर में इसकी पूजा कराके बताउंगा।'

थोड़ी देर में एक नेताजी आए। आते ही उनकी कुण्‍डली देखी और बोले मंगल का भीषण कोप है। आपको एक तांत्रिक क्रिया करनी होगी तभी शांति होगी। आप तुरंत एक पत्‍थर लेकर आओ। नेताजी को पसीना आ गया। उन्‍होंने अपने चेले को बोला पत्‍थर लाओ। चेला लपका कि महाराज ने टोका कि नहीं आप खुद लेकर आओ। इलाज आपका करना है तो पत्‍थर भी आपको ही लाना पड़ेगा। गोल-मटोल नेताजी सोफे पर से मुश्किल से उठे। थोड़ी सहायता महाराज ने कर दी। बोले वो सामने जो पत्‍थर पड़ा है उसे ही ले आओ। नेताजी तुरंत लपके और पत्‍थर उठा लाए। अब महाराज ने उन्‍हें एक लाल रंग का धागा दिया और कहा इसे पत्‍थर के चारों ओर लपेट दो। नेताजी लगे लपेटने। पूरा धागा पत्‍थर पर लपेट दिया तो उसकी आकृति गोल हो गई। महाराज ने पूजन की विधि बता दी और पत्‍थर को पूजाघर में रखने को कह दिया। नेताजी खुशी-खुशी पत्‍थर को लेकर अपने घर चले गए। महाराज ने गर्व से चेले की ओर देखा। चेला नतमस्‍तक, लेकिन सवाल भी दागा कि महाराज नेताजी इस पत्‍थर की पूजा करेंगे क्‍या।

महाराज ने कहा चलकर देख लेंगे। दो दिन बाद महाराज अपने चेलों को लेकर नेताजी के घर पहुंच गए। नेताजी भी प्रसन्‍न हुए सीधे अपने मंदिर में ले गए और बताया कि दो दिन से वे मंत्र जप रहे हैं और अब गोटियां भी ठीक फिट हो रही हैं।

चुनाव के बाद नेताजी जीत गए और शायद अब भी वह पत्‍थर नेताजी के पूजागृह की शोभा बढ़ा रहा होगा। सालों से सुनता और पढ़ता आ रहा हूं कि कण-कण में भगवान है लेकिन महाराज ने इसे सिद्ध करके बता दिया था।

अगली बार चुनाव और पॉलिटिकल बाबा का किस्‍सा।

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो...


अगर कोई बालक अंतरिक्ष में पैदा हो तो उसकी कुण्‍डली क्‍या होगी?

फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकें पढ़कर फलादेश शुरू कर देने वाले ज्‍योतिषियों को एक सवाल पिछले कई दिनों से पूछा जा रहा है। मेरी भी लगभग यही श्रेणी मानी जाती है इसलिए मुझे भी यही सवाल पूछा गया। सवाल सुनते ही मेरे दिमाग में भौतिक का वह सवाल कौंध गया जिसमें पूछा गया है कि धरती से चंद्रमा की ओर जा रहे किसी यान की एक विशेष स्थिति में गतिक और स्‍थैतिक ऊर्जा क्‍या होगी। क्‍या इसे निकाला जा सकता है। इस सवाल में अंतरिक्ष में बालक पैदा हो रहा था, लेकिन कहां इस बारे में स्‍पष्‍ट नहीं था। मेरे दिमाग में अंतरिक्ष यान था जिसमें कि बालक पैदा हो सकता होगा।

प्रेक्टिकली हो सकता है या नहीं यह बात अलग है लेकिन अगर... हो भी तो खुले अंतरिक्ष में तो कतई पैदा नहीं सकता। ऐसे में मेरे दिमाग में पहले पहल यही ख्‍याल आया कि अंतरिक्ष यान में पैदा हो रहा है। इसके साथ ही मैंने यह भी सोच लिया कि वह धरती से चंद्रमा की ओर जा रहा है। जबकि सवाल यह है ही नहीं। बस इतना है कि पृथ्‍वी से अलग दूर अंतरिक्ष में बालक पैदा हो तो उसकी कुण्‍डली क्‍या होगी। इससे मुझे यह समझ में आया कि जिस तरह पृथ्‍वी के कॉर्डिनेट्स हैं वैसे ही अंतरिक्ष के कॉर्डिनेट्स भी होंगे। इन कॉर्डिनेट्स के अनुसार पहले यह तय करना होगा कि बच्‍चा अंतरिक्ष में कहां है। फिर पृथ्‍वी पर मिलने वाले पांचांगों के इतर एक अन्‍य गणना तय करनी होगी जिसमें अंतरिक्ष के उस बिंदू से ग्रहों की विभिन्‍न नक्षत्रों में स्थिति का वर्णन स्‍पष्‍ट हो। यह निकालने योग्‍य होना चाहिए। यानि मेहनत की जाए तो शायद निकाला जा सकता है। इसके बाद जो कुण्‍डली बनेगी उसमें ग्रहों का प्रभाव और नक्षत्रों का फल पृथ्‍वी के किसी जातक से भिन्‍न होना चाहिए। क्‍योंकि अब किरणों का प्रभाव और वातवरण पूर्णतया बदल चुके हैं।


अंतरिक्ष यान से पृथ्‍वी उदय होते हुए का दृश्‍य 

अब कुछ सवाल और पैदा और होते हैं 

गुणी ज्‍योतिषी  बता सकते हैं कि ऐसी स्थिति में बालक के जन्‍म को लेकर कैसे फलादेश निकाले जा सकेंगे।

? क्‍या बालक की कुण्‍डली में एक ग्रह पृथ्‍वी भी जुड़ जाएगा,

? सूर्य और चंद्र के सन्निपात से उत्‍पन होने वाले राहू और केतू का क्‍या होगा,

? चंद्रमा का प्रभाव कितना बचेगा,

? जब गुरूत्‍वाकर्षण नहीं है तो क्‍या फलों में कुछ परिवर्तन होगा

? क्‍या बालक के पृथ्‍वी पर लौटने के समय को लेकर उसकी कुण्‍डली बनाई जाए,

? क्‍या कुछ अति‍रिक्‍त ग्रह भी कुण्‍डली में जुड़ेंगे,

? क्‍या निकटस्‍थ ग्रह की भूमिका बढ़ जाएगी या कम हो जाएगी,

? पृथ्‍वी पर तत्‍व तो पांच ही हैं फिर अंतरिक्ष में कितने तत्‍व शामिल किए जाएंगे,

? किसे लग्‍न मानेंगे और यह किस ओर से उदय होगा ?

कुछ हजार सवाल और पैदा हो रहे हैं इस स्थिति पर, फिलहाल इतने ही,

कुछ आप भी सुझाएं :)


यह तस्‍वीरें NASA Image of the Day से ली गई है

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2009

Mangal dosh ? Astrologically it does not exist :)

मांगलिक होना विशिष्‍टता है, दोष नहीं

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आमतौर पर मांगलिक (Manglik) शब्‍द का स्‍वर घरों में तब सुनाई देता है जब कन्‍याएं शादी के योग्‍य नजर आने लगती हैं। कन्‍या मांगलिक हो तो मांगलिक लड़का ढूंढना पड़ता है और मांगलिक न हो तो भी लड़का तो ढूंढना ही पड़ता है। कई बार कुण्‍डली मिलान पर बात आकर अटक जाती है। कभी लड़की मांगलिक निकलती है तो कभी लड़का। इसके चलते कई अच्‍छे संबंध बनते-बनते रह जाते हैं। 

       जैसा कि लोगों के मुंह से सुनता हूं कि मांगलिक दोष (Dosh) होता है और इसे कन्‍या में तो होना ही नहीं चाहिए। वर में हो तो चल जाता है लेकिन कन्‍या में मांगलिक दोष वैवाहिक जीवन को खराब कर देता है। मैं खुद भी इस थ्‍योरी को मानता हूं। इसलिए नहीं कि मैं पुरातनपंथी हूं बल्कि इसलिए कि मैं कल्‍पना कर सकता हूं कि एक मांगलिक लड़की की एक गैर मांगलिक लड़के साथ शादी कर दी जाए तो कन्‍या, वर पर हर तरह से हावी रहेगी। 

                   अब अगर ऐसा होता है तो वैवाहिक जीवन (Married life) तो खराब होना ही है। इसके विपरीत वर मांगलिक हो और कन्‍या मांगलिक न हो तो वर हावी रहेगा और वैवाहिक जीवन ठीक चलता रहेगा। हो सकता है भारतीय सभ्‍यता की यह पुराने समय में तो ठीक रही होगी लेकिन आज के परिपेक्ष्‍य में देखा जाए तो पति और पत्‍नी (Husband and wife) दोनों ही बराबरी के हकदार हैं। सो या तो दोनों ही मांगलिक हों या दोनों ही गैर मांगलिक। 

                  इसमें अर्थ इतना ही है कि आपस की लय (Harmony) बनी रहे। क्‍या जरूरत है कि रिश्‍ते में एक पक्ष हावी रहे। हो सकता है कुण्‍डली मिलान करने वाले बहुत से ज्‍योतिषियों (Astrologers) को इस हार्मोनी के बारे में जानकारी न हो लेकिन वे इस आधार पर बन रहे बेमेल जोड़े को जाने-अनजाने रोकने की कोशिश करते हैं। गंभीरता के कुण्‍डली मिलान कराने वाले अधिकांश परिवारों में इस कारण तलाक (Divorce) के मामले भी बहुत कम होते हैं। 

अब दूसरा पक्ष यानि मांगलिक होने का अर्थ क्‍या है ? 

कोई जातक चाहे वह स्‍त्री हो या पुरुष उसके मांगलिक होने का अर्थ है कि उसकी कुण्‍डली में मंगल (Mars) अपनी प्रभावी स्थिति में है। शादी के लिए मंगल को जिन स्‍थानों पर देखा जाता है वे लग्‍न, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव हैं। इनमें से केवल आठवां और बारहवां भाव सामान्‍य तौर पर खराब माना जाता है। सामान्‍य तौर का अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में इन स्‍थानों पर बैठा मंगल भी अच्‍छे परिणाम दे सकता है। तो लग्‍न का मंगल व्‍यक्ति की व्‍यक्तित्‍व (Persona) को बहुत अधिक तीक्ष्‍ण बना देता है, चौथे का मंगल जातक को काफी कठिन पारिवारिक पृष्‍ठभूमि देता है।

                  सातवें स्‍थान का मंगल जातक को साथी या सहयोगी के प्रति कठोर बनाता है। आठवें और बारहवें स्‍थान का मंगल आयु और शारीरिक क्षमताओं (Physical capabilities) को प्रभावित करता है। इन स्‍थानों पर बैठा मंगल यदि अच्‍छे प्रभाव में है तो जातक के व्‍यवहार में मंगल के अच्‍छे गुण आएंगे और खराब प्रभाव होने पर खराब गुण आएंगे। जैसे एक आला दर्जे का सर्जन भी मांगलिक हो सकता है और एक डाकू भी। यह बहुत सामान्‍य उदाहरण है। यही स्थिति उच्‍च स्‍तरीय मैनेजर और सेना के अधिकारी में भी देखी जा सकती है जिसे कि कठोर निर्णय लेने हैं। 

               मांगलिक व्‍यक्ति देखने में ललासी वाले मुख का (Reddish), कठोर निर्णय लेने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, लगातार काम करने वाला, विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होने वाला, प्‍लान (Plan) बनाकर काम करने वाला, कठोर अनुशासन बनाने और उसे फॉलो करने वाला, एक बार जिस काम में जुटे उसे अंत तक करने वाला, नए अनजाने कामों को शीघ्रता से हाथ में लेने वाला और लड़ाई से नहीं घबराने वाला (Fearless warrior) होता है। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण गैर मांगलिक व्‍यक्ति अधिक देर तक मांगलिक के सानिध्‍य में नहीं रह पाता। 

                  इन विशेषताओं और इसी के कारण पैदा हुई बाध्‍यताओं के कारण एक मांगलिक व्‍यक्ति की गैर मांगलिक से निभ नहीं पाती है। इस कारण दोनों को अलग-अलग करने की कोशिश की जाती है। सेना में प्रवेश लेने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी कारण से मांगलिक असर वाले होते हैं। आपने भी गौर किया होगा कि सिविलियन्‍स से सेना को अलग रखा जाता है। कमोबेश इसका कारण यह भी होता है कि जिस डिसिप्लिन को सेना फॉलो करती है उसे आम आदमी समझ नहीं सकता और आम आदमी की गतिविधियों को सेना का जवान समझ नहीं पाता। 

तार्किक क्षमताएं (Logiacal approach)

मांगलिक लोगों की यह एक और बड़ी खासियत होती है कि उनकी किसी भी काम के प्रति बहत लॉजिकल एप्रोच होती है। दुनियादारी में या प्रेम में दो और दो पांच हो सकते हैं लेकिन एक मांगलिक व्‍यक्ति के लिए दो और दो चार ही होंगे। प्‍यार (Love) में भी। इसी कारण किसी कुण्‍डली में मंगल और शुक्र (Venus) की युति जातक को गणितज्ञ भी बना देती है। इसमें लॉजिक और लॉजिक के साथ लग्‍जरी का भाव होता है। 

               आपको ऐसे लोगों का समूह सिलिकॉन वैली (Silicon velly) में दिखाई दे सकता है। ऑस्‍ट्रेलियाई चिंतक एलन पीज (Alen pease) की मानूं तो पुरुष स्त्रियों की तुलना में अधिक लॉजिकल होते हैं। मुझे भी यही लगता है। इसी कारण सिलिकॉन वैली में शादियों की औसत आयु चार वर्ष है। सौ प्रतिशत लॉजिकल पुरुषों और लॉजिक के साथ कॉम्‍प्रोमाइज करने वाली स्त्रियों की अधिक दिनों तक बन नही पाती।

और आखिर में हनुमान चालीसा.. मांगलिक लोगों को यह सहज रूप से प्रिय होती है। 


मंगलवार, अप्रैल 07, 2009

कर्म बड़ा या भाग्‍य?

जब से ज्‍योतिष विषय का झण्‍डा उठाया तब से मेरे आस-पास के अधिकांश विचारकों ने यह सवाल हमेशा मेरे सामने खड़ा किया कि क्‍या आवश्‍यकता है ज्‍योतिष की जबकि लॉजिक यह कहता है कि जैसा कर्म करोगे वैसे ही फल मिलेंगे। इसके साथ ही दूसरा सवाल यह कि जब सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो तुम्‍हारा रोल शुरू होने से पहले ही खत्‍म हो जाता है।

दोनों की बातें मेरे इस पेशे को खत्‍म कर देने वाली थीं। लेकिन केवल उन्‍हीं लोगों के समक्ष जो कि इन बातों को इसी अंदाज में समझ चुके थे। बाकी लोगों को अब भी लगता है कि उनकी समस्‍याओं का समाधान मेरे पास है। फिर भी एक विद्यार्थी होने के नाते यह सवाल मेरे सामने बड़ी स्‍पष्‍टता से रहा कि कर्म ही हमारी कुण्‍डली है या भाग्‍य पहले से लिखा जा चुका है। अगर भाग्‍य पहले से तय नहीं है तो क्‍या कर्म से कुण्‍डली को बदला जा सकता है।

इसी क्रम में पिछले दिनों कुरुक्षेत्र के हितेश शर्माजी ने एक बार फिर मुझसे यही सवाल दोहराया कि

'Kya Bhagya vaastav mein he karm se bada hota hai aur kya jyotis se bhagya ko badla ja sakta hai.'

इस सवाल का स्‍पष्‍ट जवाब है पता नहीं।

तो मैं यहां क्‍या कर रहा हूं। इसके जवाब में मैं यह कह सकता हूं कि जो लोग अपने कर्म से भाग्‍य को बदलने की सोच रहे हैं मैं उनकी मदद कर रहा हूं। एक ज्‍योतिषी किसी जातक की क्‍या मदद कर सकता है इसका बहुत सटीक वर्णन दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णामूर्ति अपनी पुस्‍तक फंडामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी में कर चुके हैं। उनके अनुसार नदी में नाव खेते हुए जब एक नाविक किनारा नहीं मिलने पर हारने लगता है तो उसके पास से गुजर रहा एक अन्‍य नाविक उसे बताता है कि आगे इतनी दूरी पर उथला किनारा या जमीन मिल जाएगी। दूसरा नाविक ज्‍योतिषी हो सकता है।

मुझे भी अधिकांश मामलों में अपना रोल ऐसा ही लगता है। जिसे जो भोगना है वह तो भागेगा ही, लेकिन यह भोग कब खत्‍म होगा या कैसे मुक्ति मिल सकती है इस बारे में मैं संकेत मात्र दे सकता हूं। न तो किसी और का दुर्भाग्‍य जी सकता हूं न ही किसी को मोक्ष दिला सकता हूं।

गुरुवार, अप्रैल 02, 2009

घोड़े की नाल और तीन दुर्घटनाएं

यह किस्‍सा अधिक पुराना नहीं है। मेरे मामाजी जो जयपुर में रहते हैं ने एक दिन मुझे फोन किया और बताया कि उन्‍हें आज घोड़े की नाल रास्‍ते में पड़ी मिली है। उन्‍हें उसे अपने पास रखनी चाहिए या नहीं। मैं कहीं रास्‍ते में था सो किनारे रुका और सोचकर बताया कि चूंकि आपकी कुण्‍डली तुला लग्‍न की है और शनि पंचम भाव में अपनी राशि में बैठा है तो आपकी कुण्‍डली का कारक ग्रह भी शनि ही हुआ। रास्‍ते में घोड़े की नाल मिली है तो आपके काम की ही होगी, इसलिए यह आपको रख ही लेनी चाहिए। 

मैं उन्‍हें नाल रखने का सुझाव दिया इसके पीछे दो कारण थे। पहला तो यह कि उनकी कुण्‍डली के कारक ग्रह को यह वस्‍तु मजबूत कर सकती है। कर सकती है यानि जरूरी नहीं कि करे ही लेकिन नुकसान नहीं करेगी यह तय था। दूसरा कारण यह कि नाल मिलने के बाद मुझे पूछा है यानि वे रखने का मूड बना चुके हैं। चूंकि अब नाल उनकी आस्‍था से जुड़ चुकी थी सो मैंने उन्‍हें रखने की सलाह दी। अगर नहीं रखनी होती तो वे उसे सड़क पर पड़ी देखकर ही आगे निकल जाते और उठा भी लेते तो वापस फेंक देते। अब तक वे उसे उठा भी चुके थे और उसके बारे में कुछ सोच भी चुके थे। यानि चेतना का एक हिस्‍सा उस नाल से जुड़ चुका था। अब इसे फेंकने का मतलब था कि चेतना में से कुछ जाया करना। 

जैसे ही मैंने उन्‍हें कहा कि उन्‍हें नाल रख लेनी चाहिए उन्‍होंने कहा कि नाल मिलने के बाद पिछले पंद्रह मिनट में वे तीन दुर्घटनाओं का शिकार होते बचे हैं। एक बार बस से, एक बार कार से और आखिरी बार लहराते आ रहे स्‍कूटर ने उनको टक्‍कर मारी लेकिन वे खुद बच गए। एक के बाद एक तीन झटके लगने के बाद मामाजी कुछ हिल गए थे सो मुझे फोन किया था। 

अब मेरे सामने यह धर्मसंकट था कि मैं उन्‍हें नाल रखने के लिए कह चुका था सो मना नहीं कर सकता था और दुर्घटना की परिस्थितियां बनने की बात सुनकर मैं भी एकबारगी घबरा गया। किसी और के साथ ऐसी घटना हो तो संयत बना रहना आसान होता है लेकिन मेरे मामाजी मेरे आदर्श भी रहे हैं। सो उनके लिए इस तरह सोचना इतना आसान नहीं था। फिर भी मैंने दोबारा सोचा और निर्णय किया कि शनि की चीज तुला लग्‍न के जातक के लिए किसी भी सूरत में खराब नहीं होनी चाहिए। 

मैंने दोबारा वही उत्‍तर दोहराया कि नाल आपके लिए ठीक है आप इसे रख सकते हैं। दुर्घटनाओं की संभावना बनना संयोग हो सकता है। अब मामाजी भी कांफिडेंस में आ चुके थे। उन्‍होंने बताया कि उनके एक सहयोगी उनके साथ ही थे। और वे लगातार नाल को फेंकने के लिए जोर दे रहे थे। मेरे जवाब के बाद मामाजी ने उन्‍हें जवाब दिया कि हो सकता है कि आज होने वाली दुर्घटनाएं पूर्व में ही तय हो और इस नाल से हम बार बार बच रहे हों। ऐसा कम ही हुआ है कि दुर्घटना की जैसी परिस्थितियां से हम गुजरे हैं उनसे लोग बचें हो। ऐसे में नाल तो हमें बचाने वाली सिद्ध हो रही है। 

अब बात उनके सहयोगी को भी समझ में आ गई। पिछले दिनों जयपुर गया तो नाल उनके पूजाघर में रखी हुई दिखाई दी। 


इस घटना से एक सबक पक्‍का हो गया कि परिस्थितियों को देखने का हमारा अंदाज हमारे अच्‍छे और बुरे समय को बुलाता है।  आप भी घटनाओं को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखेंगे तो आप पाएंगे कि जिसे आप खराब समय बता रहे हैं उस दौरान सीखने के अवसर अधिक आ रहे हैं। 

सोमवार, मार्च 30, 2009

दूसरे ज्‍योतिषी हैं बाबू मास्‍टर

महाराज की कथा के बार अब मैं बताना चाह रहा हूं बाबू मास्‍टर के बारे में। चाहता तो था कि साथ ही लिख दूं लेकिन इससे पोस्‍ट बहुत लम्‍बी हो जाती।

अब बात बाबू मास्‍टर की। लम्‍बा चौड़ा शरीर, घोड़े जैसे दांत, सिर मुंडाया हुआ और पीछे मोटी चोटी। और वर्णन करूंगा तो पहचान पुख्‍ता हो जाएगी। हां, तो बाबू मास्‍टर से मिलना कुछ इस तरह हुआ कि वे बीकानेर आए हुए थे। उनके सो कॉल्‍ड गुरूजी बीकानेर के ही हैं। हालांकि उनके गुरू का ज्‍योतिष के बजाय अध्‍यात्‍म में अधिक रुझान है। क्‍या कहूं। बाबू मास्‍टर जिन्‍हें गुरुजी कहता है उनकी छवि इतनी बड़ी है कि लगता है बाबू मास्‍टर ने केवल अपनी छतरी पुख्‍ता करने के लिए उनका नाम इस्‍तेमाल किया। अब उनके गुरू ऐसा क्‍यों करने दे रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं है।

मैं अपने एक रिश्‍तेदार के साथ उनसे मिलने के लिए पहुंचा। हमारी मुलाकात से पहले बाबू मास्‍टर को बताया गया था कि एक ऐसा मरीज आ रहा है जो बिल्‍कुल सुस्‍त है और कुछ काम नहीं करना चाहता। ज्‍योतिष के नाम पर निठल्‍ला बैठा है। कहता है समय खराब है सो कुछ करना बेकार है। वह रोगी साथ ही था।

हम जब उनके आश्रमनुमा स्‍थान पर पहुंचे तो बाबू मास्‍टर ने मुझे देखते ही पहचान लिया और अपनी दमदार आवाज में झिड़कने लगे कि क्‍यों ऐसी क्‍या समस्‍या है कि सब काम छोड़कर बैठे हो। मैं सकपका गया, लेकिन हाथों-हाथ संभल गया। मैंने बताया कि हम इसे दिखाने लाए हैं मैं तो नौकरी करता हूं। बाबू ने पूछा क्‍या नौकरी करता है। मैंने कहा पत्रकार हूं। अब बाबू ने पलटवार किया कहा तेरी नौकरी तो कुछ नहीं करने के बराबर ही है। मैंने खून का घूंट पी लिया। कुछ सीखने की गरज जो थी। अब शुरू हुआ ईलाज का क्रम। बाबू मास्‍टर ने रोगी से नाम पता और डेट ऑफ बर्थ पूछी। रोगी बता रहा था और बाबू के दो असिस्‍टेंट नोट कर रहे थे। रोगी बोल रहा था कि बाबू ने अपने असिस्‍टेंटों से चर्चा करनी शुरू कर दी। बातचीत में लगातार विदेशी शब्‍द आ रहे थे। कुछ देर की चर्चा के बाद बाबू रोगी की ओर मुड़े और बोले कोई समस्‍या नहीं है। यह लड़का कुछ काम नहीं करना चाहता इसलिए ऐसा कहता है। इसका भाग्‍य प्रबल है। हमने उन्‍हें बताया नहीं था कि जिस रोगी को लाया गया है वह स्किजोफ्रीनिया का पेशेंट है। सो उनके इस कथन के बाद मैंने बता दिया। तो बाबू बिफर गए। बोले मुझे सिखाता है क्‍या। मैं सहमकर चुप हो गया।

कुछ देर बाद रोगी को एक मंत्र देकर पीछे भेज दिया और कहा जब तक न कहूं उठना मत। इसके बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ। इतनी देर में बाबू को समझ आया कि मैं ज्‍योतिष में रुचि रखता हूं। सो उन्‍होंने एस्‍ट्रोलॉजिकल टर्म इस्‍तेमाल करनी ही बंद कर दी। अपनी हर बात को थाई अंक पद्धति से शुरू किया और वहीं पर खत्‍म कर दिया। मैं मूर्खों की तरह बस मुंह बांए बैठा रहा।

बातचीत के बीच एक के बाद एक, दो फोन आए। बाबू ने बिना जातक से प्रश्‍न पूछे इलाज बता दिया और फोन रख दिया। बाबू के व्‍यवहार से अब तक मैं पूरी तरह हतोत्‍साहित हो चुका था लेकिन फोन कॉल के बाद तो मैं हैरान था। अपनी रौ में लगातार बोल रहे बाबू को मैंने टोका कि आपने बिना समस्‍या पूछे समाधान कैसे बता दिया। उन्‍होंने कहा कि यह तो मेरा काम है। इसके बाद वे अपने कामों का वर्णन करते रहे। एक इंटरनेश्‍ाल बैंक में एनालिस्‍ट का पद छोड़ चुके थे, इसके बाद एक फाइनेंस कंसल्‍टेंसी फर्म खोली वह भी बंद कर दी। इसके बाद मार्केटिंग का काम किया और वह भी छोड़ दिया। आखिरी बार जिस अंतरराष्‍ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे उसमें थाईलैण्‍ड में पोस्‍टेड थे। वहां थाई अंक ज्‍योतिष सीखी और नौकरी छोड़ पूरी तरह ज्‍योतिष में लग गए। यह सारी बातें उन्‍होंने ने ही बताई है। मैंने आज तक वापस इसकी पुष्टि नहीं की है।

खैर मैंने कहा कि ज्‍योतिष की ऐसी कौनसी विद्या है जिसमें बिना जातक को जाने, बिना उससे सवाल जवाब किए उसके बारे में इतना स्‍पष्‍ट बताया जा सकता है। थोड़ी देर बाद तो मैंने दावा भी कर दिया कि यह ज्‍योतिष ही नहीं है। बाबू हैरान करने पर ही तुले हुए थे। उन्‍होंने कहा हां मैं ज्‍योतिष नहीं करता। मैंने कहा तो क्‍या करते है। बाबू ने कहा मैं लोगों को मूर्ख बनाता हूं। मेरा धंधा मूर्ख बनाने का ही है। यह जवाब मैं पहले सुन चुका था। अब दूसरी बार सुन रहा था। ज्‍योतिष के क्षेत्र में कई साल तक लोगों के सम्‍पर्क में रहने और नौकरी के कारण काफी पॉलिश भी हो चुका था। सो मैं संयत बना रहा। मैंने अध्‍यात्मिक गुरू के आश्रम की आड़ लेकर पूछा कि आपको संतुष्टि मिल जाती है लोगों को ऐसे मूर्ख बनाकर। तो बाबू बोले मैं खुद थोड़े ही जाता हूं मूर्ख बनाने के लिए। वे खुद आते हैं। और सही पूछो तो लोग मूर्ख ही बनना चाहते हैं। आप उन्‍हें समस्‍याओं का ठोस कारण बताओगे तो वे पचा नहीं पाएंगे। एक आम आदमी की समस्‍या है कि वह गलतियां खुद करता है और उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना चाहता है। मैं तो बस उनकी मदद करता हूं। कभी ठीकरा वास्‍तु के सिर फूटता है, कभी ज्‍योतिष पर तो कभी किसी व्‍यक्ति विशेष पर। उन्‍होंने कहा तूं मुझे बस तडि़त चालक समझ सकता है। जो बिजली गिरने की दिशा तय करता है।

अब तक मैं हंसने लगा था। यह ईलाज का दूसरा व्‍यवहारिक तरीका था। पहले तरीके में महाराज प्रायश्चित करा रहे थे तो यहां बाबू मास्‍टर लोगों को लॉलीपॉप पकड़ा रहा था। दोनों ही लोगों ने ग्‍लानि को आवरण दिया और सहारा लिया ज्‍योतिष का। इन दोनों ही लोगों को अपने क्षेत्र का प्रकाण्‍ड विद्वान समझा जाता है। महाराज ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब बड़ा घर और कार ले चुका है और बाबू मास्‍टर अपनी मल्‍टीनेशनल कंपनी की नौकरी में तीस से चालीस हजार रुपए तक की तनख्‍वाह पाता था अब रोज के पांच से सात हजार रुपए कमा रहा है। लोगों के दुख और तकलीफ जितने बढ़ते जाते हैं इन लोगों का रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है। पता नहीं ईलाज किसका हो रहा है लेकिन इन दोनों ने एक बीमारी को कुछ समय के लिए तो खत्‍म कर ही दिया है। और वह बीमारी है खुद की गरीबी। :)

इन दोनों के बाद मैं आपको बताउंगा एक ऐसे ज्‍योतिषी के बारे में जो परम्‍परागत भारतीय पद्धति से कुण्‍डलियां देखता था लेकिन उन्‍हें मैनेज इंग्लिश स्‍टाइल से करता था। उसने इतना तगड़ा नेटवर्क बनाया कि उसकी मृत्‍यु के पांच साल बाद भी उनके पुत्र आराम से अपनी जीविका चला रहे हैं। भले ही वे अपने पिता जितने अच्‍छे ज्‍योतिषी नहीं है लेकिन सिस्‍टम ने उन्‍हें दौड़ में जमा रखा है।

बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है

अब ज्‍योतिष का ब्‍लॉग है और मैं यह बात लिख रहा हूं तो आप सोचेंगे कि आखिर आ ही गया अपनी औकात पर। आप कुछ ऐसा समझ सकते हैं। क्‍योंकि मैंने सीखने में कभी कंजूसी नहीं बरती सो हर ऐसे इंसान से सीखने की कोशिश की जिसके बारे में कहा जाता था कि इसे कुछ आता है। सही कहूं तो आज भी यही स्थिति है। जिस तरह कला के जवान होने तक कलाकार बूढा हो जाता है वैसे ही ज्‍योतिष की समझ आने तक फलादेश करने का महत्‍व भी खो सा जाता है। 
खैर में आता हूं विषय पर: बेसिकली मूर्ख बनाने के धंधे पर। 

दरअसल मेरे दो अलग-अलग गुरूओं ने मुझे यह ज्ञान दिया। सही कहूं तो दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्र के माने हुए ज्‍योतिषी हैं। एक रमल ज्‍योतिषी हैं तो दूसरे थाई अंक ज्‍योतिष के प्रकाण्‍ड ज्ञाता। मैं दोनों का ही नाम और चरित्र का वर्णन नहीं करूंगा। वरना आज नहीं तो कल कोई न कोई उन्‍हें  पहचान लेगा। मुख्‍य बात है कि दोनों ने एक ही बात एक ही अंदाज में क्‍यों कही और उसके लिए क्‍या दलीलें दी यह मेरे और अन्‍य नए साधकों के लिए बहुत जरूरी है। 

पहले ज्‍योतिषी जिन्‍हें मैं महाराज से संबोधित करूंगा। महाराज के बारे में कहा जाता है कि वे किसी से नहीं घबराते। न अपने भविष्‍य से न वर्तमान के भूत से। उन्‍होंने भय को जीत लिया है। इसी कांफिडेंस के साथ महाराज ने बीकानेर, जयपुर, दिल्‍ली, मुम्‍बई, कलकत्‍ता, सूरत और दर्जनों महानगरियों में अच्‍छों अच्‍छों को घुटने टिकाए हैं। महाराज किसी से ढंग से बात नहीं करते थे। मैंने दो तीन बार बात करने की कोशिश की तो उन्‍होंने बुरी तरह झिकड़ कर भगा दिया। उन दिनों टीन एजर था सो भागने में मैं भी जल्‍दी दिखाता था। 
एक दिन अपने गुरूजी (जो मेरे हार्ड कोर गुरू हैं) के साथ शनि महाराज के मंदिर गया था। गुरूजी ने कहा तेरी शनि की दशा आने वाली है चल आज शनि महाराज का हैप्‍पी बर्थ डे है। चलकर उनके दरबार में हाजिरी लगा देते हैं। सो हम पहुचे शनि मंदिर। अभी मंदिर में घुसे ही नहीं थे कि महाराज सामने आते मिल गए। महाअक्‍खड़ महाराज को देखते ही मैंने कहा गुरूजी यह महाराज अभी हम दोनों को हड़काएगा। लेकिन गुरूजी मुस्‍कुराए बोले इसकी कुण्‍डली तो मैं देखता हूं देखना अभी करीब आते ही रोने लगेगा कि गुरूजी मर रहा हूं कुछ करो। मुझे यकीन नहीं हुआ। भीड़ के बीच में महराज संयत बने रहे और थोड़ी देर में किनारे आते ही महाराज गुरूजी के पैरों में। बाकायदा गिड़गिड़ा रहे थे। चंद्रास्‍वामी से सीधे पंगा लेने वाले महाराज गुरुजी के चरणों में थे। मुझे देखकर भी यकीन नहीं हो रहा था। गुरूजी ने संबल दिलाया तो महाराज वापस अपने पैरों पर खड़े हुए। मैंने माजरा पूछा तो गुरूजी ने बताया कि महाराज की सूर्य की दशा बीत गई है अब चंद्रमा की दशा में इनकी हालत खराब हो रही है। सो इलाज के लिए घूम रहे हैं। मैं अड़ गया, मैंने कहा ऐसा कैसे हो सकता है कि रमल पद्धति का प्रकाण्‍ड विद्वान, जो रोजाना दो सौ से अधिक लोगों के दुख दूर कर रहा है खुद कैसे परेशानी में आ सकता है। 
अपनी आदत के अनुसार गुरुजी बस मुस्‍कुराते रहे। 
अब मैंने देख लिया कि महाराज गुरूजी के आगे नतमस्‍तक हैं तो मैंने अपने चोटीकट चेला होने का फायदा उठाया और सीधे सीधे बात करनी शुरू कर दी। महाराज जो अब तक मुझे हड़काते रहे थे गुरूजी के सामने मुझसे प्रेमपूर्वक बातें कर रहे थे। मैंने पूछा महाराज आप अपना इलाज खुद क्‍यों नहीं कर लेते। 
महाराज बोले पगले कभी नाई को अपनी हजामत करते हुए देखा है। 
मेरे दिमाग में बात बैठ गई। 
फिर पूछा कि आप दूसरों का ईलाज कैसे करते हैं 
यहां महाराज अटक गए बोले यह तो ट्रेड सीक्रेट है। तुझे बता दूंगा तो तूं मेरी दुकान ही ठण्‍डी करेगा। 
तो गुरूजी बीच में बोले नहीं महाराज यह परम्‍परागत पद्धति से सीख रहा है। आपकी पद्धति में यह रुचि नहीं लेगा। 
तो महाराज हल्‍के हुए 
बोला बेटा ईलाज दो ही तरीके से होता है या तो जातक पैसे से जाएगा या शरीर से जाएगा 
यह बात मेरी समझ में नहीं आई। 
तो महाराज ने एक्‍सप्‍लेन किया कि देख कुण्‍डली में बारहवां भाव मोक्ष का होता है। हर कोई परमआनन्‍द की अवस्‍था में पहुंचना चाहता है। ऐसे में जातक का बारहवां भाव ऑपरेट कराना जरूरी है। बारहवां भाव ऑपरेट नहीं होता है तो आदमी मैदे में मुठ्ठियां मारने लगता है। यानि बिना बात दुखी होने लगता है। ऐसे जातक का ईलाज भी जल्‍दी होता है। 
मैंने पूछा बारहवां भाव कैसे ऑपरेट कराते हैं। 
महाराज ने कहा या तो उसका पैसा खर्च कराता हूं या फिर शरीर। दोनों स्थितियों में खर्चा होता है। इसे रेचन की तरह समझ सकते हो। दिमाग पड़े पड़े भरने लगता है। अब उसे खाली कैसे किया जाए। जो जातक पैसा खर्च करने को राजी हो जाता है उसका इतना पैसा दान और पूजा में खर्च कराता हूं कि वह कई महीनों के लिए ठण्‍डा हो जाता है। खाली हुए बैंक बैंलेंस को भरने में ध्‍यान बंट जाता है और तात्‍कालिक समस्‍याएं गौण नजर आने लगती है। 
दूसरा तरीका है शरीर खर्च कराने का। कुछ लोग इतने मूंझी यानि कंजूस होते हैं कि दुख सह लेते हैं लेकिन अंटी ढीली नहीं करते। कोई बात नहीं उन लोगों के लिए दर्शन डेरे की व्‍यवस्‍था है। ऐसे मंदिर में दर्शन करने का उपाय बताता हूं जो उसके घर से कम से कम पांच किलोमीटर दूर हो। कईयों को तो दस या पंद्रह किलोमीटर दूर का म‍ंदिर भी बताया है। साथ में शर्त जोड़ देता हूं कि जाना पैदल ही है और रास्‍ते में किसी से बात नहीं करनी। जातक अगर ईमानदारी से उपाय करता है तो इतनी लम्‍बी दूरी तक बिना बोले चलने से समस्‍याओं के समाधान खुद ही ढूंढ लेता है या फिर कुछ दिन में उपाय करना बंद कर देता है। समस्‍या दूर हो जाती है तो ठीक वरना उपाय में कसर रहने का जुमला तो है ही। 
मैंने कहा ऐसे तो लोग आपसे दूर हो जाएंगे। 
महाराज ने कहा ऐसा नहीं होता। रोज दो सौ लोग आते हैं। बीस लोग भी ठीक हो जाते हैं तो वे मेरे भोंपू बन जाते हैं। बाकी के पौने दो सौ लोग वापस बोलते ही नहीं है। सो दिन दूनी रात चौगुनी ख्‍याती बढ़ रही है। 
मैंने पूछा कि फिर आप कांफिडेंस कैसे रख लेते हैं। 
इस पर महाराज खिलखिलाकर हंस पड़े। बोले बेटा मेरे पास खोने के लिए है ही क्‍या जो डरूं। 
मैंने कहा महाराज यह तो ज्‍योतिष ही नहीं है। 
तो महाराज ने कहा हां यह बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है। 


हो सकता है आपको लगे यह बातचीत मैंने अपनी कल्‍पना से बनाई है। जब मैं खुद ही यकीन नहीं कर पा रहा हूं तो आप लोगों का यकीन करना और भी मुश्किल है। लेकिन यकीन मानिए यह वास्‍तविक बातचीत थी। 
अब जब भी महाराज को देखता हूं तो मैं मुस्‍कुराता हूं और महाराज हंसकर जवाब देते हैं। दो एक बार उन्‍होंने अपनी कुण्‍डली देखने के लिए भी कहा लेकिन मैं टाल गया। मैं बोला आप तो गुरूजी के क्‍लाइंट हैं।


अगली पोस्‍ट में बताउंगा थाई अंक ज्‍योतिष से उपचार करने वाले बाबू से बातचीत। 

मंगलवार, मार्च 24, 2009

हर क्षण अपने आप में पूर्ण है

एक बालक जन्‍म लेता है तो अपने साथ उम्‍मीदों के पंख ले आता है। संतान से माता पिता और ‍अन्‍य परिजनों की क्‍या इच्‍छाएं पूरी हो सकती है यह जानने के लिए बच्‍चे की जन्‍म कुण्‍डली बनाई जाती है। वास्‍तव में जन्‍म के समय बनी कुण्‍डली उस समय की तात्‍कालिक गोचर स्थिति की फोटो होती है। यानि जन्‍म कुण्‍डली बताती है कि जब जातक पैदा हुआ तो आसमानी पिण्‍ड फलां कहानी बयां कर रहे थे। 
अब बच्‍चा जैसे जैसे बड़ा होता है माता पिता उसे संस्‍कार देते हैं और उसकी भलाई के लिए कई जतन करते हैं। कभी गण्‍डा ताबीज बांधते हैं तो कभी उसके हाथ से दान कराते हैं। कई बड़े ज्‍योतिषियों ने कमोबेश कहा है कि भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता। मैं खुद भी इसे मानता हूं। लेकिन भाग्‍य का भोग कम या अधिक तीव्र किया जा सकता है। एक व्‍यक्ति जिसे कार चलाने का योग हो वह अपना भाग्‍य मारुति 800 से बढ़ाकर मर्सडीज तक ले जा सकता है। योग तो बड़े वाहन का ही रहा। इस तरह कभी कर्म तो कभी आस्‍था। भाग्‍य को प्रभावित करते रहते हैं। बच्‍चा अब युवा हो गया या युवावस्‍था से अधेड़ हो रहा है। तब तक वह खुद की और आस-पास के लोगों की जिंदगी में कई  प्रभावी परिवर्तन कर चुका होता है। 
प्‍वाइंट यह है कि किसी चालीस साल के आदमी की जन्‍म कुण्‍डली देखकर यह बताया जाए कि आने वाले दिनों में आपके साथ अमुक घटना होने वाली है तो मेरा अनुमान है कि 80 प्रतिशत लफ्फाजी के साथ यह फलादेश दुरुस्‍त निकलेगा। शेष बीस प्रतिशत भाग भी गणित का ही रहेगा। इसी के साथ जातक का जन्‍म समय कौनसा माना जाए इस पर भी अभी विवाद जारी है। ऐसे में किसी प्रश्‍न का सही जवाब लेना हो तो किस प्रकार लग्‍न कुण्‍डली पर निर्भर रहा जा सकता है। 
क्‍या है प्रश्‍न कुण्‍डली
वास्‍तव में तात्‍कालिक गोचर की फोटो प्रश्‍न कुण्‍डली है। अब  इसका उपयोग क्‍या है। ऐसा माना जाता है कि जिस तरह जातक का जन्‍म होने पर उस समय का तात्‍कालिक गोचर जन्‍म लग्‍न कुण्‍डली बनकर उसके भविष्‍य के बारे में बता सकता है वैसे ही किसी भी प्रश्‍न का भविष्‍य पूछे गए समय की गोचर स्थिति से बताया जा सकता है। प्रश्‍न कुण्‍डली वास्‍तव में प्रश्‍न का भविष्‍य कथन है। मेरा मानना है कि यह ऊटपटांग समय लेकर बनी जन्‍म कुण्‍डली से अधिक सटीक होता है। क्‍योंकि आज का समय आज से बीस तीस या पचास साल पहले से अधिक हमारे कंट्रोल में है। 

गुरुवार, मार्च 05, 2009

Exaltation or debilitation of planet : And it's meaning

नीच, नीच नहीं और उच्‍च अच्‍छा हो जरूरी नहीं


मेरे बच्‍चे का गुरू नीच का है तो क्‍या वह पढ़ाई नहीं कर पाएगा। मेरी कुण्‍डली में शुक्र नीच का है इसीलिए मेरी अपनी पत्‍नी से बनती नहीं हैं, मेरा सूर्य नीच का होने के कारण हमेशा बॉस से झगड़ा रहता है। ऐसे ही कई सवाल कई लोग मुझसे कुण्‍डली के विश्‍लेषण के दौरान पूछते हैं। 

           ग्रहों के उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व पर उनका इतना भरोसा होता है कि जब मैं कहता हूं कि आपकी कुण्‍डली तो तुला लग्‍न की है इसमें गुरू अकारक है या आपकी कुण्‍डली धनु लग्‍न की है इसमें शुक्र अकारक है। उच्‍च का हो या नीच का कोई फर्क नहीं पड़ता तो वे मेरी बात पर एक बारगी विश्‍वास ही नहीं कर पाते हैं। क्‍योंकि शब्‍द और शब्‍दों का विश्‍लेषण करने वाले कई ज्‍योतिषी उन्‍हें विश्‍वास दिला चुके होते हैं कि जो कुछ है इन्‍हीं ग्रहों के उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व में है। जबकि मेरा मनाना है कि ग्रहों के उच्‍च-नीच का होने से ग्रहों के प्रभाव के तरीके में नहीं बल्कि उनकी तीव्रता में अन्‍तर आता है।

           ग्रहों के व्‍यवहार को दर्शाने के लिए ज्‍योतिष की जो टर्मिनोलॉजी इस्‍तेमाल की जाती है उससे कई बार यह भ्रम होता है कि फलां ग्रह की दशा या अन्‍तर दशा या कुण्‍डली में स्थिति का भी यही परिणाम होगा। अधिकांश नए ज्‍योतिषी भी इस प्रकार की टर्मिनोलॉजी में उलझ जाते हैं। मुझे यह बात स्‍वीकार करने में कोई झिझक नहीं होती कि शुरूआत में मैं खुद भी इसमें उलझ गया था। अब दूसरे लोगों को उलझे हुए देख रहा हूं। 
तो क्‍या होता है उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व का प्रभाव- 

           सबसे पहली बात हर ग्रह अपनी उच्‍च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्‍डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्‍च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्‍या में, गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्‍च के परिणाम देते हैं। यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं। इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्‍या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं। 

           पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्‍च का ग्रह हमेशा अच्‍छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्‍च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्‍छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्‍य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्‍च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्‍यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्‍यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्‍यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्‍च के ग्रहों को खराब कहा होगा। 

           कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्‍च का परिणाम देते हैं। यह मुख्‍य रूप से लग्‍न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्‍न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है। तुला लग्‍न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक। अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्‍ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्‍न में सूर्य उच्‍च का परिणाम देता है और वास्‍तव में देखा भी यही गया। 

           लग्‍न में उच्‍च का सूर्य गुरू के सा‍थ हो तो जातक अपने संस्‍थान में शीर्ष स्‍थान पर पहुंचता है। यानि ट्रेनी की पोस्‍ट से भी शुरू करे तो एमडी की पोस्‍ट तक जा सकता है। चारों लोगों के साथ ऐसा ही हुआ। अगर वे सीधे एमडी नहीं भी बने तो उसी संस्‍थान का एक विभाग और बना और वे उसके अध्‍यक्ष बन गए। इस तरह योग भी पूरा हुआ और नीच के सूर्य का उच्‍च परिणाम भी दिखाई दिया। मैं अपने जातकों को डिस्‍क्‍लोज नहीं करता सो उनके नाम नहीं दे रहा हूं लेकिन इन चार लोगों में से एक देश के बड़े सरकारी महकमे के अध्‍यक्ष रहे, दूसरे एक निजी संस्‍थान के किसी अनुभाग के प्रमुख हैं। शेष दो लोग निजी कंपनियों के अनुभाग प्रमुख ही हैं।

GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA

मंगलवार, फ़रवरी 24, 2009

संकेतों का ज्‍योतिषीय संदर्भ

पूर्व में अपने दो या तीन लेखों में अलग अलग तरीके से संकेतों की चर्चा कर चुका हूं। इस बार सीधे संकेत पर ही चर्चा करनी पड़ेगी। लेख के शुरू में ही मैं बता देना चाहता हूं कि मैं संकेतों का विशेषज्ञ नहीं हूं। हालांकि मेरी कुण्‍डली के योग और वंशक्रम में पाराशर गोत्र का होने के कारण मुझे विरासत में संकेतों को समझने की नेमत मिली है। इन्‍हें समझ लेना और इनका विशेषज्ञ होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मेरे लेख को पढ़ने वाले गुणीजनों में कोई विशेषज्ञ भी हो तो मेरा आग्रह है कि वे मेरा मार्गदर्शन करें। अब भगवान गणेश को नमन करते हुए मैं अपनी बात रखता हूं।

संकेतों से मेरा परिचय कब का है पता नहीं लेकिन जब ज्‍योतिष सीखी तो इसे समझने का क्रम भी शुरू हुआ। गुरूजी प्रदीप पणियाजी ने मुझे बताया कि मैं अपनी विशेषता का कैसे इस्‍तेमाल कर सकता हूं। इसके लिए पहले जरूरत है ओमेन को समझने की। हमारे चारों ओर का वातावरण हम पर और हम अपने वातावरण पर नियमित रूप से प्रभाव डालते हैं। भले ही हम इसके लिए सक्रिय रूप से सोच रहे हों या नहीं। यह देखने में ऐसी बात लगती है जैसा कि चण्‍डूछाप तांत्रिक कहते हैं या फिर बहुत सिद्ध योगी। ईश्‍वर ने किसी भी एक को विशेषाधिकार देकर नहीं भेजा है। उसकी नजर में सब बराबर हैं। हां कभी कभार लगता है कि वह खुद तक एप्रोच बनाने के रास्‍ते सभी को अलग-अलग देता है। कोई बात नहीं पहुंचेंगे तो वहीं। तो जब ईश्‍वर ने सभी को एक जैसी शक्तियां दी हैं तो हर कोई उसे इस्‍तेमाल भी कर सकता है, निर्भर करता है कि अपनी सोई शक्तियों को जगाने के लिए हमने कितना प्रयास किया।

चाहे हेमवंता नेमासा काटवे हों या के.एस. कृष्‍णामूर्ति सभी यही कहते हैं कि जब हम अपने आस-पास के वातावरण के प्रति संवेदनशीलता खो देते हैं तो आगामी घटनाओं की जानकारी लेने के लिए ज्‍योतिष का सहारा लेना पड़ता है। कई साल ज्‍योतिष के साथ जुड़े रहने के बाद अब यह बात समझ में आने लगी है। कैसे हम घटनाओं और वस्‍तुओं के साथ तारतम्‍य बना लेते हैं और कैसे पूर्व की घटनाएं, वस्‍तुएं और अन्‍य संकेत आने वाले समय की सूचना देने लगते हैं।

एक उदाहरण देना चाहूंगा। यह मेरा सुना हुआ है। हो सकता है इसमें अतिरंजना हो लेकिन समझने के लिए अच्‍छा है। सामान्‍य बातें धीरे-धीरे समझ में आती है और अतिरंजना बड़ी तस्‍वीर का काम करती है।

एक वणिक था। उसे एक पंडित ने कहा कि रोजाना किसी ने किसी भूखे या अतृप्‍त को भोजन कराओगे तो तुम्‍हारा व्‍यवसाय दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। वणिक ने भोजन कराना शुरू भी कर दिया। कुछ दिन में उसका व्‍यवसाय फलने फूलने लगा। एक दिन ऐसा हुआ कि उसे सुबह से दोपहर तक कोई अतृप्‍त नहीं मिला। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है लेकिन नहीं मिला। सो वह ढूंढता हुआ पहाड़ी की ओर निकल गया। वहां एक सांड जैसा आदमी सोया हुआ दिखा। उसके होठों पर भी पपड़ी जमी हुई थी। वणिक ने सोचा यही सही व्‍यक्ति है। उसने पालकी मंगवाई और उस बलिष्‍ठ दिखने वाले व्‍यक्ति को घर ले आया। उसे पानी पिलाकर होश में लाया और भरपेट खाना खिलाया। थोड़ी ही बातचीत में पता चल गया कि वह शरीर से तो तंदुरुस्‍त है लेकिन अकल से गूंगा है। जैसे ही उस आदमी ने खाना खाया उसे जोश आ गया। खाना खिलाने के बाद वणिक ने तो उस आदमी को विदा कर दिया लेकिन रास्‍ते में उस मेंटली रिटार्टेड आदमी ने सड़क पर पड़ा लठ्ठ लेकर एक गाय पर भीषण प्रहार किया। इस प्रहार से गाय की मौत हो गई। उधर गाय मरी और इधर वणिक की हालत खराब होने लगी। एक जहाज विदेश से माल लेकर आ रहा था वह पानी में डूब गया। राजा ने शास्ति लगा दी। व्‍यापार में घाटा आने लगा। अब वणिक भागा वापस ज्‍योतिषी के पास। ज्‍योतिषी से पूछा कि आपके बताए अनुसार उपचार किए लेकिन मेरी तो हालत खराब हो रही है। कहां चूक हुई। ज्‍योतिषी ने पिछले कुछ दिनों का हाल पूछा और पता लगाने की कोशिश की कि कहां गड़बड़ हुई है। काफी देर की कसरत के बाद पता लगा लिया गया कि गाय की मौत का ठीकरा वणिक के सिर फूटा है। इसके दो कारण हैं। गाय को मारते वक्‍त उस आदमी के पेट में वणिक का अन्‍न था। तो उस आदमी के सिर दोष होना चाहिए। हो भी सकता था लेकिन वह आदमी को मेंटली रिटार्टेड था सो उसे इस बात का विवेक ही नहीं था। यानि वह केवल वणिक और गाय की मौत के बीच माध्‍यम भर बना था। इसके बाद ज्‍योतिषी ने गाय की हत्‍या के कुछ उपचार वणिक को बताए। उन्‍हें करने के बाद वणिक की स्थिति वापस सुधरने लगी।

इसमें अतिरंजना तो यह हुई कि उपचारों पर ही पूरा व्‍यापार खड़ा कर दिया गया है, दूसरा यह कि गणना से यह पता लगा लिया गया कि गाय की मौत हुई है। जो भी हो कहानी है...

मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम ऐसे करते हैं जिनका मंतव्‍य अच्‍छा होता है और काम भी अच्‍छे दिखते हैं लेकिन उनके परिणाम कितनी दूरी पर जाकर क्‍या रंग लाते हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। वणिक नहीं चाहता था कि गाय की मौत हो लेकिन हुई और वणिक उसका एक बड़ा कारण बना। न वह उस आदमी को घर लेकर आता और न उसे खाना खिलाता तो गाय की मौत नहीं होती।

तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के कामों का क्‍या परिणाम निकलेगा इसका पता कैसे लगाया जाए। जैसा कि मस्तिष्‍क पर शोध करने वाले लोग कुछ साल पहले तक कहते थे कि हम अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत हिस्‍सा काम में लेते हैं, कुछ दिन पहले तक कहने लगे कि एक प्रतिशत ही काम में लेते हैं और कुछ समय पहले तो सुना कि एक प्रतिशत से भी कम काम में लेते हैं। इसीलिए मुझे विज्ञान और इसमें शोध कर रहे लोगों पर कभी पूरा भरोसा नहीं होता। खैर जो भी है...

शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन का है। वह हमारे लिए गणना करता है कि आपकी गतिविधियों, आपके व्‍यवहार, मौसम, आपके घर का सामान, आपके दोस्‍तों, उनके द्वारा बोली गई बातों, रास्‍ते में बज रहे संगीत, बस में आपकी सीट के पास बैठे व्‍यक्ति की हरकतों, पशु पक्षियों की मुद्राएं और आवाजों और हजारों संकेतों के क्‍या मायने हो सकते हैं। चूंकि हम एक विशिष्‍ट भाषा और शैली से बोलना, चलना और समझना सीखते हैं। जिंदगी के पहले पांच सालों में इसकी जबरदस्‍त ट्रेनिंग होती है। बस वही भाषा हमें आती है। बाकी संकेतों को हम उतने बेहतर तरीके से समझ नहीं पाते। एलन पीज ने अपनी पुस्‍तक बॉडी लैंग्‍वेज में इसी अवचेतन के संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। स्‍टीफन आर कोवे इसी अवचेतन को सक्रिय करने के लिए सात आदतें डालने का आग्रह करते नजर आते हैं।

अब फिर से बात करता हूं कि जिन लोगों ने भविष्‍य देखने या इंट्यूशन की प्रेक्टिस नहीं की है उन्‍हें यह सब कैसे और क्‍यों दिखाई देता है। ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण से कुण्डली का आठवां भाव और बारहवां भाव तथा राहू और कमजोर चंद्रमा हमें ऐसे दृश्‍य देखने और सोचने में सहायता करते हैं। आम चिकित्‍सक के पास जाने पर वह आपको खुद को व्‍यस्‍त रखने की सलाह देता है। अल्‍पनाजी को यह पता है। उन्‍होंने इसके अलावा कोई और उपाय हो तो बताने के लिए कहा है। ठीक है एक सवाल के साथ...

अब यहां एक और गंभीर सवाल है जो आमतौर पर नए ज्‍योतिषीयों के समक्ष आता है वह यह कि इंट्यूशन और कल्‍पना में क्‍या अन्‍तर है। मैंने अपने लेख इंट्यूशन और कल्‍पना में अन्‍तर में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की थी। इसमें मैंने कुछ हद तक स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है कि दोनों में क्‍या अन्‍तर है। कई बार हमारे भय,  चिंताएं, विचारों की शृंखला, भीषण घटनाएं हमारे दिमाग में अनिष्‍ट या ईष्‍ट की इच्‍छा के बुलबुले बनाने लगते हैं। नए ज्‍योतिषियों के साथ तो ऐसा होता है कि वे जातक की आर्थिक स्‍िथति और पर्सनेलिटी तक से प्रभावित हो जाते हैं और उसके सुखद या दुखद भविष्‍य की कल्‍पना कर बैठते हैं। वे इतने जोश में होते हैं कि उसी कल्‍पना को इंट्यूशन समझकर फलादेश भी ठोंक देते हैं। जब जातक लौटकर आता है तो शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है।

इसी दौरान एक और बात आई वह थी एक ही अंक का बार बार दिखना। अखिल तिवारी जी कहते हैं कि पिछले कई सालों से एक विशेष समय को कभी घड़ी, कभी मोबाइल. कभी कंप्यूटर तो कभी कही भी, दीवाल पे, नही तो सामने जाती हुई गाड़ी के नम्बर पर.. एक विशेष combination (12:22) रोज दीखता है.  हम किसी भी दो संयोगों को मिलाकर चार कर सकते हैं। और जब तक दो और दो चार होते रहें तब तक तो ठीक है लेकिन कई बार यही दो और दो पांच दिखने लगे तो कठिनाई आती है। अब इसी उदाहरण की बात की जाए तो मैं सोच सकता हूं कि इस विशेष नम्‍बर से कहीं उनका जुड़ाव होगा। अगर वे देखने की बजाय आब्‍जर्व करने लगें तो पता चलेगा कि केवल ये विशेष संख्‍याएं ही नहीं अनन्‍त संख्‍याएं उनके सामने आती हैं लेकिन जिंदगी में कही न कहीं इन संख्‍याओं से जुड़ी याद होने के कारण ये अधिक तेजी से उनके दिमाग में ब्लिंक करती हैं। अब संख्‍या तो आ रही है लेकिन उसके साथ जुड़ी याद अवचेतन में पीछे कहीं दूर धकेल दी गई है। सो उनका परेशान होना स्‍वाभाविक है। अगर मैं एक न्‍यूमरोलॉजिस्‍ट की तरह बात करूं यानि सिट्टा हाथ में उठा लूं, तो पहले तो इन संख्‍याओं को जोडकर सात बना लूंगा। फिर बताउंगा कि चूंकि ये संख्‍याएं दो भागों में बंटी है इसलिए पहले तीन का और बाद में चार का असर आएगा। यानि तीन की संख्‍या से गुरू और चार की संख्‍या से सूर्य आता है। इससे पता चलता है कि जब आप किसी प्रॉब्‍लम में उलझे होते हैं तो आपको किताबों और ऑथेरिटी की जरूरत होती है। अगर अखिल जी मेरी बात को सीरियस लेते हैं तो वे याद करेंगे और उन्‍हें याद भी आ जाएगा कि उन्‍होंने कई बार प्रॉब्‍लम में होने पर किताबों में जानकारी ली और अपने सीनियर्स की मदद भी। लेकिन एक सिस्‍टम एनालिस्‍ट ऐसे नहीं बनता है। यकीन मानिए। उसे समस्‍याओं को खुद ही हल करना होता है। चाहे किसी की भी सहायता ले लेकिन लगातार सामने आ रही समस्‍या उसकी निजी होती है और उससे लड़ने वाला भी वह खुद ही होता है। अब जिन बातों का जस्टिफिकेशन हमारे पास नहीं होता उन बातों के लिए हम उन लोगों पर निर्भर हो जाते हैं जिन्‍हें वास्‍तव में खुद कुछ नहीं मालूम। जैसा कि मेरे एक दोस्‍त कहते हैं दो अंधे मिलकर एक आंख से देखने लगते हैं। अब (12:22) संकेत तो है लेकिन भविष्‍य का हो जरूरी नहीं।

अब बात पराभौतिक कनेक्‍शन की: यह हर किसी का होता है। चाहे वह उसे प्रदर्शित कर पाए या नहीं। जब हाजिर दिमाग काम करना बंद कर देता है तब यह पराभौतिक कनेक्‍शन अधिक मुखरता से महसूस होने लगते हैं। हम किसी से कोई बात करते हैं, कोई जानकारी लेते या देते हैं, कोई गाना सुनते हैं, कोई समाचार देखते हैं तो दिमाग तत्‍काल जो रिएक्‍शन देता है वह हाजिर दिमाग की होती है। मान लीजिए कि आपने टीवी में एक सड़क दुर्घटना का दृश्‍य देखा। इससे आपके दिमाग में हाथों हाथ यह आएगा कि आजकल सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं, लोग लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं वगैरह वगैरह.. कुल मिलाकर तात्‍कालिक प्रतिक्रियाएं तत्‍काल आती हैं और समाप्‍त भी हो जाती हैं। इसी दौरान आपका अवचेतन गणना करने लगता है। (यह केवल उदाहरण के लिए है सिद्धांत नहीं) वह आपको याद दिला देता है कि आपका छोटा भाई भी लापरवाही से गाड़ी चलाता है। आजकल किसी बड़े शहर में है जहां उसके पास दुपहिया वाहन भी है। हालांकि दुपहिया वाहन कम चलाता है लेकिन चलाता तो है। अब दूसरा विचार कि आपके भाई का शहर और दुर्घटना वाला शहर कितना मिलता जुलता है। इस जैसे हजारों विचार दिमाग के बैकग्राउंड में चलते हैं। इसी दौरान आपके भाई का दोस्‍त भी यही देख रहा होता है और शायद उसका अवचेतन भी ऐसी ही कुछ चाल चलता है। अब आप और आपके दोस्‍त का भाई कहीं रास्‍ते में मिलते हैं। आपका दिमाग बात करता है गाड़ी को सही मेंनटेंन करने और सही तरीके से चलाने के बारे में यही आपके भाई के दोस्‍त के दिमाग में भी चल रहा होता है। दोनों मिलकर बात कर लेते हैं। और निष्‍कर्ष निकाल लेते हैं कि आपका भाई तो ढंग से गाड़ी चलाता है। इसके लिए कहीं भी आपके भाई या दुर्घटना का जिक्र नहीं होता। लेकिन मैसेज कन्‍वे हो गया। अब आपकी चिंता बढ़ रही है और आप अपने भाई को फोन लगाते हैं तो वह वही बातें कर रहा होता है जो आपने अब तक सोची थी। लेकिन वह यह बताना भूल जाता है कि उसके दोस्‍त का भी फोन आया था। आपकी सोच बदल जाती है। आप सोचने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। जबकि तीनों लोगों के अवचेतन इस कांबिनेशन को बना रहे थे। यह एक उदाहरण है। लेकिन इससे स्‍पष्‍ट हो सकता है कि कैसे हम कोई बात सोचते हैं दूसरा उसी बात को बोलता है। इसे मैं दो लोगों के एक ही मानसिक स्‍तर में होना कहता हूं। साइकोलॉजिस्‍ट क्‍या कहते हैं मुझे पता नहीं। अब अल्पना वर्मा जी कहती हैं कि एक व्यक्ति को कभी कभी कोई घटना -अक्सर दुर्घटना - दिमाग में बार बार तब तक दिखायी देती रहे..और कुछ दिन में या कुछ घंटे या मिनटों के अन्तर पर वो सच हो जाए। कभी कोई मिलने आने वाला हो और घर के नज़दीक होने पर उस की तस्वीर दिमाग में स्पष्ट दिखायी दे। यह यकीनन कोई मनोरोग नहीं है। हां यह मनोरोग नहीं है बस आपके अवचेतन का एक ट्रेलर मात्र है। बिल्‍कुल वैसी की वैसी घटना न भी हो तो आपकी कल्‍पना की घटना और वास्‍तविक घटना की एकरूपता को जस्टिफाई आपका दिमाग ही तो करेगा। अगर वह क्रूर विश्‍लेषण करे तो दोनों घटनाओं में हजारों अन्‍तर ढूंढ निकालेगा और मनोविनोद की बात हो तो अंतर ढूंढने का कारण ही नहीं रह जाएगा। हम भविष्‍य तो देख भी लें तो वह वैसा हमारे सामने कभी नहीं आएगा जैसा कि वास्‍तव में है। बस संकेत आते हैं। आप जिनती कुशलता से इन संकेतों को समझ लेते हैं वही भविष्‍य की या दूरदृष्टि है।

शेष शुभम्

शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009

कब तक डरते रहोगे साढ़ेसाती से

बहुत जगहों पर पढ़ता रहा हूं। साढ़ेसाती के बारे में। अब तक सैकड़ों सवाल भी सुन और झेल चुका हूं। हर बार समझाने की कोशिश करता हूं कि साढ़ेसाती से डरने का कोई फायदा नहीं है। इसका कोई उपचार भी नहीं है। तो इतना पुस्‍तकों, मैग्‍जीनों, न्‍यूज चैनलों और पंडितों के यहां साढ़े साती के बारे में सुना है क्‍या सब फिजूल है।

मेरा जवाब है हां जी सबकुछ फिजूल है। मैं स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करता हूं। पहले यह कि साढ़ेसाती होती क्‍या है। आपकी कुण्‍डली में चंद्रमा जिस राशि में जिस डिग्री पर बैठा है उस चंद्रमा से 45 डिग्री के घेरे में जब गोचर का शनि (यानि फिलहाल जो शनि की गति है उसके हिसाब से) आता है तो आपको शनि की साढ़ेसाती लग जाती है। साढ़ेसाती का अर्थ है यह साढ़े सात साल तक चलती है। 45 डिग्री के दायरे में आने के साथ शुरू होती है और चंद्रमा से आगे निकलकर 45 डिग्री दूर चली जाए तब तक चलती है। एक राशि तीस डिग्री की होती है। शनि का एक राशि में भ्रमण ढाई साल का होता है। चंद्रमा के दोनों ओर डेढ़ डेढ़ राशि तक इसका भ्रमण यह स्थिति पैदा करता है। यानि ढाई ढाई साल के तीन हिस्‍से किए जा सकते हैं।

अब सवाल कि यह करती क्‍या है। जैसा कि मैंने किताबों में पढ़ा है और मेरे वरिष्‍ठजनों से राय ली है साढ़े साती हमें अधिक मेहनत करने के लिए विवश करती है। जब हम समय के साथ इसके अनुसार दौड़ नहीं पाते तो निठल्‍ले होकर बैठ जाते हैं। किसी व्‍यक्ति पर साढ़ेसाती का बुरा प्रभाव है या नहीं यह चैक करने के लिए मेरे पास एक बहुत आसान रास्‍ता है। मैं उस व्‍यक्ति से पूछता हूं कि अभी क्‍या समय हुआ है। साढ़ेसाती का पीडि़त अधिकांशत: इसका गलत जवाब देगा। अगर शनि खराब प्रभाव नहीं कर रहा है तो जवाब सही आएगा। इस फार्मूले को निकालने के पीछे ठोस कारण यह है कि खराब शनि हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्‍टम पर आक्रमण करता है और हमारे दैनिक कार्य करने में भी परेशानी आने लगती है। इसी से शुरू होती है टाइमिंग की समस्‍या। यानि गलत समय पर आप सही जगह पर पहुंचते हैं या सही समय पर गलत जगह पर। यह साढ़ेसाती का दूसरा बड़ा साइन है।

यह तो मैंने बताया कि समस्‍या कहां दृष्टिगोचर होती है और कैसे होती है। अब सवाल कि इससे डरा क्‍यों जाए और डरा क्‍यों न जाए। पहले सवाल का जवाब है कि जब पता चल गया कि शनि की साढ़ेसाती टाइमिंग और टाइम सेंस को खराब करती है तो सबसे पहले इसी पर चेक लगाया जाए। यानि इसे दुरुस्‍त करने के जमीनी उपाय शुरू कर दिए जाएं। मसलन घड़ी पहनी जाए और दिनांक और समय के प्रति सचेत रहा जाए। प्‍लान बनाकर काम किए जाएं और जहां जाएं वहां समय नष्‍ट करने के बजाय पूर्व में पूरी जानकारी एवं समय लेकर पहुंचा जाए। इसी तरह के खुद के मैनेजमेंट के हजारों उपाय हैं।

इससे साढ़ेसाती का असर नब्‍बे प्रतिशत तक कम हो जाएगा। दूसरा सवाल कि डरा क्‍यों न जाए। वह इसलिए कि एक आदमी की औसत आयु सत्‍तर साल भी मान ली जाए तो उस व्‍यक्ति की जिंदगी में तीन बसा साढ़ेसाती आएगी। यानि साढे़ बाइस साल तक साढ़ेसाती का काल रहेगा। यही नहीं कुछ योग शनि के कंटक के भी बनेंगे। यानि उस दौरान भी साढ़ेसाती के कुछ असर रहेंगे। इस तरह तो पहले चालीस साल के सक्रिय जीवनकाल में ही पंद्रह साल ऐसे आ जाएंगे जब इस डर के साथ जीना पड़ेगा। अब यह बात कैसे मानी जा सकती है कि किसी व्‍यक्ति के चालीस में से पंद्रह साल तो खराब ही हो गए। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। साढ़े साती पूरी तरह खराब भी नहीं होती। अपने तीन चरणों में वह सिर, पेट और पैर में या इससे ठीक उल्टे क्रम में रहती है। जब सिर में होगी तो सोचने के लिए मजबूर करेगी और जब पांव में होगी तो दौड़ने के लिए और जब पेट में होगी तो ढेर सारा धन दिलाएगी। यानि पेट भर देगी। अगर ऐसी है साढ़ेसाती तो डरने की नहीं बल्कि रोलर कोस्‍टर राइड करने का समय है। तो अब मैं सोच सकता हूं कि इस बार जब कोई आपको बताएगा कि आपकी साढ़ेसाती शुरू होती है अब... और आपको दिमाग में आएगा कि ठीक है चलो चलते हैं राइड पर।

कब चिंता करनी चाहिए...

जब आपके किसी वृद्ध परिजन को साढ़ेसाती लगे तो चिंता करनी चाहिए। आमतौर पर तीसरी साढ़ेसाती जीवन के साथ ही खत्‍म होती है और तीसरी किसी तरह निकल जाए तो चौथी आखिरी होती है। हर कोई जानता है कि वृद्ध लोग रोलरकोस्‍टर राइड नहीं कर पाते हैं। साढेसाती में यही होता है। इसी से बड़े बूढों को दिल और दिमाग की बीमारियां होती है। कुछ लोग शारीरिक रूप से थक कर हार जाते हैं तो कुछ मानसिक लड़ाई में टूटते हैं। लेकिन जवानों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता।

मैंने आपकी जिंदगी के पहले पचास साल सिक्‍योर कर दिए हैं साढ़ेसाती के प्‍वाइंट आफ व्‍यू से। अब आपकी बारी है मुझे नया विचार देने की। :)

मंगलवार, फ़रवरी 17, 2009

वास्‍तु और इसके नियम

पिछली पोस्‍ट में एक बेहतरीन सवाल मेरे पास आया वह यह कि जिन घरों में भूमि पूजन नहीं कराया गया हो वहां कैसे सुख समृद्धि रहेगी। वास्‍तु के हिसाब से वे कैसे अच्‍छे घर सिद्ध हो सकते हैं। यह सवाल किया था अल्‍पना वर्मा जी ने उन्‍हीं के शब्‍दों में

'अगर किसी कारणवश किसी इमारत को बनाने से पहले नींव पूजन न होसके तो क्या करना चाहिये?
भारत के अलावा कई पश्चिमी देशों में भूमि पूजन या नींव पूजन आदि नहीं कराये जाते तब भी वहां सब ठीक रहता है.'

यहां मैं बताना चाहूंगा कि वास्‍तु विषय के मुताबिक पूजन कराना अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि एक सुविधा है। यानि अगर पूजन नहीं भी कराया है तो उस घर में सुखी और समृद्ध बनकर रहा जा सकता है। लेकिन अब भी वास्‍तु के नियम वही रहेंगे।

बात कुछ उलझ रही लग सकती है। ठीक है पहले समझते हैं वास्‍तु आखिर में है क्‍या। किसी भी स्‍थान की अवस्‍था को वास्‍तु कहा जा सकता है। स्‍थान की अवस्‍था का आकलन करने के लिए यह देखा जाएगा कि वह कहां स्थित है, हवा, पानी, रोशनी आदि की कैसी व्‍यवस्‍था है, घर के बाहर के क्‍या हालात हैं आदि। यह तो हुई स्‍थान की इंडिपेंडेंट बात। अब उस स्‍थान के मालिक और स्‍थान में भी एक संबंध होता है। यही संबंध तय स्‍थान पर हुए निर्माण में दृष्टिगोचर होता है। कैसे ?

बहुत सामान्‍य बात है। शनि से प्रभावित लोगों के घरों में आप ट्यूबलाइट अधिक देखेंगे और वह भी धीमी जल रही होगी। बाकी अधिकांश घर ऐसा होगा कि दिन में भी अंधेरा महसूस हो। मंगल और सूर्य से प्रभावित लोग अपने घर के आगे और पीछे इतनी जगह छोड़ते हैं कि देखने वाले को लगता है कि जमीन कुछ ज्‍यादा ही बड़ी ले ली लेकिन घर छोटे भाग में ही बनाया है। हर व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व की छाप उसके आवास पर दिखाई देगी। अब यह तो बात हुई वास्‍तु की उपस्थिति की। अब यह पूजन का क्‍लॉज कब जुड़ गया। मैं तो कहूंगा कि यह भी जरूरी भाग है। प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक भारत से शुरू से ही नहीं समझा। पहले योगियों का भी मजाक उड़ाया जाता था अब योग फैशन बन रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि प्राणायाम के क्‍या क्‍या लाभ हैं इसका निर्णय होना अभी बाकी है। यह न केवल सामान्‍य रोगों को ठीक करता है बल्कि कई प्रकार के जेनेटिक डिसऑर्डर को भी दुरुस्‍त कर देता है। ऐसी ही स्थिति नींव पूजन के साथ भी है। बहुत से लोगों को पता नहीं है कि इसका क्‍या महत्‍व है।

लेकिन जब तक इसका महत्‍व लैबोरेट्रीज में पता चले उससे पहले तो कम से कम इसे जिंदा रखने के लिए हमें भूमि पूजन कराते रहना चाहिए। रही बात पश्चिमी सभ्‍यता के लोगों की जो भूमि पूजन नहीं कराते हैं। वे हमारी तरह ही कभी सुखी कभी दुखी होते रहते हैं। हां हम एक बात में उनसे आगे रहते हैं वह यह कि हमें महसूस होता है कि हां कोई तीसरी शक्ति है जो पर्दे के पीछे रहकर लगातार हमारी सहायता कर रही है। बस यही है भूमि पूजन का वास्‍तविक महत्‍व...

Map picture

मेरा शहर बीकानेर, अगली बार बताउंगा विश्‍व और आपके शहर का वास्‍तु

गुरुवार, फ़रवरी 28, 2008

स्‍त्री की सुंदरता : ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण


तरुणाई से निकलकर यौवन में प्रवेश करते समय हर आदमी के दिमाग में होता है कि कौनसी लडकी उसकी जिंदगी में आएगी और कैसी होगी। कौनसी लडकी आएगी यह तो ब्रह्मा ही निर्धारित करते हैं लेकिन दिखने में कैसी होनी चाहिए इस बारे में ज्‍योतिष ग्रंथों में काफी लिखा गया है। एक पुस्‍तक विवाह ज्‍योतिष में तो बाकायदा वर्णन किया गया है कि एक व्‍यक्ति को अपने पुत्र के लिए कैसी कन्‍या का चुनाव करना चाहिए। इस वर्णन से पूर्व बताया गया है कि पांच सयाने व्‍यक्तियों में एक लडके का पिता, एक कुलगुरु, एक समाज का आदमी, एक परिवार का बुजुर्ग और एक वृद्ध आदमी स्‍त्री को देखने के लिए जाते हैं।

क्‍या देखते हैं स्‍त्री में- कन्‍या को सिर से पांव तक देखा जाता है। पांव के तलुए से लेकर सिर के बालों तक का अलग-अलग भागों में वर्णन किया गया है।

पांव: तलवे बिल्‍कुल चिकने, मुलायम, पूर्ण विकसित और गुलाबी रंग के हों। स्‍वास्तिक, कमल, ध्‍वजा जैसे शुभ निशान औरत को राजयोग दिलाते हैं। पांव के नाखून भी गदराए हुए और सीधे हों। नाखून में गुलाबी रंगत का अहसास होना चाहिए। अंगूठा गोल, चिकना, पूर्ण विकसित होना चाहिए। पांव की अंगुलियों और अंगूठे में स्‍वाभाविक उभार होना चाहिए। अगर कन्‍या चलते समय मिट्टी को ऊपर की ओर उडाती है तो पिता, पति अथवा माता के परिवार को कष्‍ट देने वाली होती है। तलवों के ऊपर का हिस्‍सा सीधा और बिना बालों का होना चाहिए।

ऐडी: ऐडी को मैने पांव से अलग लिखना ठीक समझा क्‍योंकि एडी स्‍त्री के गुप्‍तांग का वर्णन करती है। किसी स्‍त्री की एडी गोल, गदराई हुई और सुंदर हो तो उसके गुप्‍तांग भी बिल्‍कुल सही काम करने वाले होते हैं।

नाभि बिल्‍कुल सीधी और पर्याप्‍त गहराई पर होनी चाहिए। पेट और कमर पर बाल नहीं होने चाहिए। नितंब भारी और गोलाई लिए हों। छाती और स्‍तनों पर बाल नहीं होने चाहिए। कंधे सीधे और ऊपर की ओर उठे हुए हों। अंगुलियों के नाखूनों पर किसी प्रकार का दाग अथवा लहसुन का निशान नहीं होना चाहिए। बाल गहरे काले और लम्‍बे हों। दांत लम्‍बे हों और मसूडे दिखाई नहीं देते हों। मुस्‍कुराने पर मसूडे दिखाई दें तो स्‍त्री भाग्‍यहीन होती है। आंखें काली और उभरी हुई हों। ललाट उभरा हुआ और ऊपर की ओर उठा हुआ होना चाहिए। होंठ लाल हों।

रंगों की चर्चा - इस सबके दौरान भी स्‍त्री के रंग पर कहीं भी चर्चा नहीं की गई है। यह बात गौर करने वाली है। ललासी का तो ध्‍यान रखा गया है लेकिन रंग का नहीं। यानि स्‍त्री किसी भी रंग की हो काली या गोरी वह अच्‍छे लक्षणों से युक्‍त हो सकती है। आवाज के बारे में अलग स्‍थानों पर दिया गया है लेकिन आवाज से केवल व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व और रोग के बारे में जानकारी मिलती है भाग्‍य के बारे में नहीं। यह लक्षण कुंवारी कन्‍याओं में देखे जाते हैं। विवाह होने के बाद स्त्रियों में काफी बदलाव आ जाते हैं।