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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष कक्षा : 7वां दिन - तुला और वृश्चिक राशि

ज्‍योतिष की कक्षा में आज हम बात करेंगे शुक्र के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि तुला और मंगल के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि वृश्चिक की। इनमें से एक राशि शुक्र के आधिपत्‍य की है तो दूसरी मंगल के आधिपत्‍य की। आइए देखते हैं कैसे होते हैं ये लोग...

वणिक बुद्धि वाले तुला राशि के जातक

तुला राशि के जातकों की मनोदशा का केवल यही वर्णन नहीं है। भारतीय जनतंत्र में आज जिस व्‍यक्ति की छाप सबसे बड़ी है वह तुला राशि का ही जातक था। मैं बात कर रहा हूं राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी की। बाजार में अपनी तुला लिए खड़े व्‍यक्ति के रूप में तुला राशि को दिखाया गया है। विचारों से सम और हर बात को पूरी तरह तौलकर देखने वाला जातक तुला राशि का होगा। हालांकि इस राशि पर शुक्र का आधिपत्‍य है, इस कारण तुला राशि के जातकों को बनने संवरने, संगीत, चित्रकारी और बागवानी जैसे शौक होते हैं। इसके बावजूद रचनात्‍मक आलोचना और राजनैतिक चातुर्य इन जातकों का ऐसा कौशल होता है कि दूसरे लोग इनसे चकित रहते हैं। वणिक बुद्धि के कारण वाद विवाद में पड़ने के बजाय समझौता करने में अधिक यकीन रखते हैं। इन जातकों का शरीर दुबला पतला और अच्‍छे गठन वाला होता है। चेहरा सुंदर भी न हो तो मुस्‍कान मोहक होती है। इन जातकों को विपरीत योनि वाले सहज आकर्षित करते हैं। हालांकि इन जातकों की शारीरिक संरचना सुदृढ़ होती है, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण बीमारियों की पकड़ में जल्‍दी आते हैं। साझीदार के साथ व्‍यापार करना इनके लिए ठीक रहता है। जातक उचित समय पर सही सलाह देता है। ऐसे में साझेदार भी ज्‍यादातर फायदे में रहते हैं। एक बार मित्र बना लें तो हमेशा के लिए अच्‍छे मित्र सिद्ध होते हैं। इन जातकों का पंचमेश शनि होता है। इस कारण तुला लग्‍न के जातकों के अव्‍वल तो संतान कम होती है और अधिक हो भी जाए तो संतान का सुख कम ही मिलता है। इनके लिए शुभ दिन रविवार और सोमवार बताए गए हैं। शुभ रंग नारंगी, श्‍वेत और लाल तथा शुभ अंक एक व दस हैं।

हताश होना नहीं सीखा वृश्चिक ने

वृश्चिक राशि के जातकों की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वे कभी हार नहीं मानते। एक बार जिस काम में जुट गए उससे जल्‍दी से उकताते नहीं है और आखिरी दम तक उस काम को पूरा करने में जुटे रहते हैं। वृश्चिक राशि के लोग दो तरह के होते हैं। एक जो अपनी इंद्रियों को जीतकर जितेन्द्रिय बन जाते हैं। और दूसरे निम्‍न कोटि के जो ईर्ष्‍यालु और असभ्‍य होते हैं। इस राशि पर मंगल का आधिपत्‍य है सो अच्‍छा खासा डील डौल और चौड़ा माथा होता है। बालों में स्‍वाभाविक रुप से घुंघरालापन होता है। दवाओं से जुड़े कामों में अच्‍छा लाभ कमा सकते हैं। जलतत्‍वीय राशि होने के कारण इन लोगों का अंतर्ज्ञान भी ठीक होता है। बात दैहिक सुख की हो या गुप्‍त साहसिक कार्यों की, ये लोग पूर्ण संतुष्टि के साथ जिंदगी जीना पसंद करते हैं। मंगल के कारण आई उत्‍तेजना, अधिकार, उग्रता और द्ढृता इन लोगों को जिंदगी के कई क्षेत्रों में सफल बनाती है। ये अच्‍छे नौकर सिद्ध होते हैं, जब तक कि मालिक इनके साथ ईमानदार रहे। एक बार इन्‍हें नीचा दिखा दिया जाए या धोखा दे दिया जाए तो क्रूरता की हद तक जाकर बदला लेते हैं। कठोर वाणी से शत्रु बनाते हैं। अगर वृश्चिक राशि वाले लोग बोलना सीख लें तो अपने पीछे फॉलोअर्स की अच्‍छी संख्‍या एकत्रित कर सकते हैं। अधिकार की अति भावना के कारण ये चाहते हैं कि परिवार में भी बिना किसी लॉजिक या सवाल जवाब के इनकी बात सुन ली जाए और उस पर अमल हो। घर में कलह का यह सबसे बड़ा कारण बनता है, वरना इन लोगों को शांत और सहज पारिवारिक वातावरण पसंद है। स्त्रियों में वृश्चिक लग्‍न के मामले में तो केएस कृष्‍णामूर्ति ने यहां तक कहा है कि वृश्चिक लग्‍न की स्‍त्री हो और लग्‍न व मंगल अशुभ पीडि़त हो तो ऐसी औरत से विवाह करना अभिशाप है। वृश्चिक लग्‍न के जातकों के लिए रविवार, सोमवार, मंगलवार और गुरुवार सफलता देने वाले हैं। पीला, लाल, नारंगी और क्रीम रंग शुभ है।

अगली कक्षा में हम बात करेंगे धनु और मकर राशियों की...

मन के उपचार का महीना - श्रावण

श्रावण मास में हम मन का उपचार अच्‍छी तरह कर सकते हैं। श्रावण मास का मन, चंद्रमा और शिव से क्‍या संबंध है। बेहतरी के लिए श्रावण मास में क्‍या किया जा सकता है आइए देखते हैं...

          मन की गति को कोई नहीं पकड़ सकता। यह मन ही है जो हमें सपने दिखाता है और उन्‍हें पूरे करने की ताकत भी देता है। मन में पैदा हो रहे विचार की शक्ति ही हमें पशुओं से अलग करती है। ये विचार ही हैं जो हमें सपनों के रूप में मिलते हैं और विचार ही हमें सपने पूरे करने की ताकत देते हैं। मन की इसी ताकत के कारण हम दूसरों से कुछ अलग होते हैं।

          ज्‍योतिष में मन का कारक चंद्रमा को बताया गया है। जिस तरह राशियों, नक्षत्रों और तारों के बीच चंद्रमा सबसे तेज रफ्तार का ग्रह है, ठीक उसी तरह मन की भी गति है। चंद्रमा पर शिव का अधिकार है। शिव की आराधना हमारे चंद्रमा को मजबूती देती है, इसी से हम अपने मन पर नियंत्रण करने में अधिक सक्षम हो पाते हैं।

         चंद्रमा की गति बहुत तेज है। हमारे विचार भी उसी गति से बदलते हैं। एक पत्र या ईमेल या फोन कॉल सुनते समय किसी व्‍यक्ति के दिमाग में कितने विचार आते-जाते हैं। पत्र, मेल या फोन आने पर व्‍यक्ति खुश होता है, उसी संदेश में दुख की बात होने पर दुखी होता है, उससे असंतोष भी उपजा लेता है और वार्तालाप आगे बढ़ने पर संतुष्‍ट भी होता चला जाता है। चंद्रमा का उपचार कर लिया जाए तो हम अपने मन पर भी नियंत्रण कर सकते हैं।

          मन पर नियंत्रण हमें क्रोध पर नियंत्रण, अवसाद से मुक्‍त रहने, उत्‍साहित बने रहने, लम्‍बी सोच की ताकत देने, नकारात्‍मकता को नियंत्रित करने, स्‍फुरित विचारों पर नियंत्रण, निर्णय लेने की क्षमता में बढ़ोतरी और परिस्थितियों से सामना करने की ताकत देता है। मन पर नियंत्रण हमें चिंता से मुक्‍त रख सकता है। तेजी से दौड़ रही इस दुनिया में अधिकांश बीमारियों का कारण चिंता है। अगर चिंता न हो तो हम काम करने के लिए प्रेरित नहीं होंगे और चिंता अधिक हो तो किसी काम को करने लायक नहीं रहेंगे। ऐेसे में मजबूत मन या मानसिकता हमें चिंता पर नियंत्रण का अधिकार देती है।

             चंद्रमा पर शिव का अधिकार है। पौराणिक दृश्‍यों में भी चंद्रमा को शिव के मस्‍तक पर शोभायमान बताया गया है। शिव की आराधना करने से हमारा चंद्रमा मजबूत होता है। इसीलिए श्रावण मास में ब्राह्मण रुद्र अष्‍टाध्‍यायी का पाठ कर शिव का प्रसन्‍न करने का प्रयास करते हैं। हर व्‍यक्ति रुद्री नहीं कर सकता। ऐसे में आम लोगों को शिव के महामंत्र का जाप करना चाहिए। यह मंत्र है “ऊं नम:‍ शिवाय”। हम अपनी आम जिंदगी में इसे इतनी बार और इतने स्‍थानों पर सुनते हैं कि लगता है कि सामान्‍य मंत्र है, लेकिन कर्मकाण्‍ड के प्रकाण्‍ड ज्ञाताओं से लेकर तांत्रिकों तक का मत है कि यह सर्वश्रेष्‍ठ और महान मंत्र है। किसी के मन को शांति देने के लिए इस मंत्र की एक माला का जप पर्याप्‍त है। जो जातक मन पर नियंत्रण चाहते हैं वे इस श्रावण मास में रोजाना सुबह अथवा शाम के समय शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर जल अथवा दूध की धारा प्रवाहित करते हुए इस मंत्र का जाप करते रहें। कहने की जरूरत नहीं है कि रिजल्‍ट अपने आप मिलेगा।

          श्रावण मास ही क्‍यों?

मानसूनी हवाएं भारत में उन ऋतुओं को बनाती हैं जिससे भारत देश विशिष्‍ट बना है। यही मानसून श्रावण मास में पूरे देश को बादलों से आच्‍छादित कर देता है। बादलों की उपस्थिति आम इंसान को सकारात्‍मक और नकारात्‍मक दोनों तरह से प्रभावित करती है। एक ओर जहां रिमझिम बारिश हमें ऊर्जा से सराबोर कर देती है तो दूसरी ओर अवसाद भी पैदा कर सकती है। बादलों का जमावड़ा गर्मी कम करता है, लेकिन महिलाओं में साइको-सोमेटिक अवसाद पैदा करता है। इसे वातावरण जनित अवसाद कहते हैं। यानि मौसम में आए बदलाव का मानसिकता पर जबरदस्‍त प्रभाव पड़ता है। इसी प्रभाव को न्‍यून करने के लिए श्रावण मास में व्रत करने, पूजा पाठ करने, विशेष तौर पर शिव आराधना करने और सादा भोजन करने की सलाह दी गई है।

          हर राशि और हर नक्षत्र का जातक किसी भी लग्‍न में पैदा हुआ हो, वह शिव आराधना कर सकता है। चंद्रमा मजबूत होने से किसी भी जातक को कोई नुकसान नहीं होता। यहां तक कि चंद्रमा को अष्‍टमेष का दोष भी नहीं लगता। ऐसे में हर व्‍यक्ति को श्रावण मास में शिव आराधना कर अपने मन को मजबूत करने का उपाय उत्‍साह से करना चाहिए।

Encyclopedia of astrological remedies : LALA KITAB

उपायों का विश्‍वकोष : लाल किताब

ज्‍योतिष के मूल रूप से दो भाग हैं। इनमें से एक है सिद्धांत और दूसरा है फलित। सिद्धांत पक्ष में ज्‍योतिष का वह भाग है जो खगोलीय गणनाओं से संबंधित है और इन गणनाओं में से ज्‍योतिष के उपयोग में आने वाली गणनाओं का इस्‍तेमाल किया गया है। जैसे कि आकाश को 360 डिग्री में बांटकर उसका 12 बराबर भागों में विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की गति और ग्रहण जैसी घटनाएं। आकशीय घटनाओं की पुख्‍ता जानकारी मिलने के बाद उनका मानव जीवन पर असर के बारे में अध्‍ययन ज्‍योतिष का फलित हिस्‍सा है। 

             फलित ज्‍योतिष में आकाशीय घटनाओं का मानव जीवन से संबंध जोड़ा गया है। जब ज्‍योतिषी ग्रहों की चाल के आधार पर जातक को भविष्‍य बता देता है तो जातक का अगला सवाल होता है कि ग्रहों की चाल के कारण बन रही खराब स्थितियों से कैसे बचा जाए। इसके लिए फलित ज्‍योतिष में उपायों का विकास हुआ। 

             प्राचीन या वैदिक कही जाने वाली भारतीय फलित ज्‍योतिष में उपचारों के लिए दान, जप और पूजन का प्रावधान दिया गया था। यह कमोबेश ग्रहों की स्थिति के कारण बन रही खराब स्थितियों के लिए प्रायश्चित की तरह था, लेकिन लाल किताब ने उपायों की एक नई सीरीज शुरू की। हालांकि यह पारंपरिक ज्‍योतिष से कुछ हटकर गणनाएं करती है, लेकिन उसके आधार पर बताए गए उपचार इतने अधिक और सटीक हैं कि हमें ग्रहों के कारण बन रही खराब स्थितियों से निपटने के लिए बहुत अधिक संभावनाएं मिल जाती हैं। 

             लाल किताब ज्‍योतिष की ऐसी पुस्‍तक है जो पारंपरिक ज्‍योतिष की तरह कुण्‍डलियों के विश्‍लेषण को दरकिनार कर अपनी पद्धति पेश करती है। इसके अनुसार राशियों की चाल का कोई महत्‍व नहीं है। लग्‍न हमेशा मेष राशि होगी और इसी तरह बारह भावों में बारह राशियां स्थिर कर दी गई हैं। 

             उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न के जातक की कुण्‍डली भी बनाई जाए तो भी लग्‍न मेष ही रहेगा। शेष ग्रह जिस भाव में बैठे हैं उन्‍हीं का इस्‍तेमाल किया जाएगा। ऐसे में कोई ग्रह उच्‍च या नीच का होगा तो भावों में स्थिति की वजह से होगा। इसकी भाषा मूल रूप से उर्दू और हिन्‍दी का मिला जुला रूप है। जो ग्रह खराब प्रभाव वाले हैं उन्‍हें अपने स्‍थान से हटाकर दूसरे स्‍थानों पर ले जाया जा सकता है। 

             अगर सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हकीकत में खगोलीय पिण्‍डों को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर खिसकाना असंभव है, लेकिन लाल किताब कहती है कि ग्रहों को भले ही न खिसकाया जा सकता हो, लेकिन जातक की कुण्‍डली में उसके प्रभाव को बदला जा सकता है। हर ग्रह के प्रभाव को बदलने के लिए लाल किताब ने तय सिद्धांत भी बनाए हैं। मसलन किसी ग्रह को लग्‍न में लाने के लिए उससे संबंधित रत्‍न, धातु अथवा वस्‍तु को गले में पहनना होगा। इससे ग्रह का असर ऐसा होगा कि वह लग्‍न में बैठा है। 

             इसी तरह दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए घर में वस्‍तु स्‍थापित करें, तीसरे भाव के लिए हाथ में, चौथे के लिए बहते पानी में, पांचवे के लिए स्‍कूल में, छठे के लिए कुएं में, सातवें के लिए जमीन में, आठवें के लिए श्‍मशान में, नौंवे के लिए धर्मस्‍थान में, दसवें के लिए सरकारी प्‍लाट या भवन में और बारहवें भाव में किसी वस्‍तु तो पहुंचाने के लिए छत पर संबंधित वस्‍तुओं को रखना होगा। लाल किताब कहती है कि ग्‍यारहवां भाव आय या लाभ का होता है, इस भाव के लिए कोई उपचार नहीं है। उपायों से ग्रहों को अपने पक्‍के या बेहतर लाभ देने वाले भावों में पहुंचाने और खराब प्रभाव देने वाले ग्रहों को हटाने का प्रयास किया जाता है।

मसनुई ग्रह

पारंपरिक ज्‍योतिष के इतर लाल किताब ग्रहों की युति यानी दो या अधिक ग्रहों के एक ही भाव में बैठने को मसनुई ग्रह की उपाधि देती है। इसके अनुसार अगर किसी भाव में दो या इससे अधिक ग्रह बैठे हैं तो उन सभी का प्रभाव किसी अन्‍य ग्रह की तरह होने लगेगा। ग्रहों की युति किसी अन्‍य ग्रह को सहायता भी कर सकती है और उसके प्रभाव को खराब भी कर सकती है। उदाहरण के तौर पर गुरु और सूर्य एक भाव में बैठकर चंद्रमा का प्रभाव पैदा करते हैं, इसी तरह बुध और शुक्र से सूर्य, सूर्य और बुध से मंगल, शुक्र और गुरु से शनि का प्रभाव पैदा होता है। इसी के आधार पर संबंधित ग्रह का उपचार कर दिया जाता है। 

विशिष्‍ट शब्‍दावली

लाल किताब ने न केवल उपायों का पूरा शास्‍त्र रच दिया, बल्कि अपनी विशिष्‍ट शब्‍दावली भी पेश की है। जैसे पक्‍का घर। हर ग्रह का अपना पक्‍का घर होता है। यह वह भाव होता है जहां ग्रह अपने सबसे अच्‍छे प्रभाव के साथ होता है। शक्‍की हालत का ग्रह उसे कहते हैं जो अपने निश्चित भाव को छोड़कर किसी और भाव में बैठा हो। सोया हुआ ग्रह उसे कहते हैं जब कोई ग्रह ऐसे भाव में बैठा हो जिससे सातवें भाव में कोई ग्रह न हो। इसके साथ ही ग्रहों के बलिदान के बारे में भी बताया गया है। 
             इसके अनुसार किसी ग्रह की स्थिति खराब होने पर उससे संबंधित दूसरे ग्रहों का प्रभाव खराब हो जाता है। इस हालत में लाल किताब के अनुसार बलिदान दे रहे ग्रहों का उपचार किए जाने की जरूरत होती है। 

             लाल किताब की भाषा मूलत: उर्दू है और भाषा प्रभाव से लगता है कि सौ या डेढ़ सौ साल पहले इसे पंजाब के किसी प्रांत में विकसित किया गया था। कुछ लोग इसे अरुण संहिता का नाम भी देते हैं, लेकिन इसके वास्‍तविक लेखक का कहीं जिक्र नहीं आता है। इसकी सामान्‍य से अलग भाषा के कारण कई बार लोग इसके कथ्‍य को समझ नहीं पाते हैं और कई गलत अर्थ निकाल लिए जाते हैं। 
             इस कारण लाल किताब के उपचार जहां मूल रूप से लोगों की जिंदगी को आसान बनाने का प्रयास करते नजर आते हैं, वहीं इसकी भाषा से उपजे समान अर्थ लोगों में भय भी पैदा कर देते हैं। इसके बावजूद वर्तमान दौर में उपायों के मामले में लाल किताब का कोई विकल्‍प नहीं है। दान, पूजन और साधना के जरिए दीर्धकाल में मिलने वाले लाभ की तुलना में लोग लाल किताब के तुरत फुरत उपचार करने में अधिक सहज महसूस करते हैं।
STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA

प्रश्‍न कुण्‍डली और फलादेश

कई बार लोगों की उलझन होती है कि हमारा जन्‍म समय या तिथि सही ज्ञात नहीं है। ऐसे में ज्‍योतिष संबंधी फलादेश कैसे किए जाएं। ज्‍योतिष में इसका सटीक जवाब प्रश्‍न कुण्‍डली है। प्रश्न कुण्डली में कार्य भाव और कार्येश की भूमिका अहम होती है। कार्य से यहां अर्थ उस विचार या इच्छा से है जिसके लिये प्रश्न कुण्डली का निर्माण किया गया है। जैसे अगर कोई व्यक्ति यह जानना चाहता है कि क्या वह यात्रा करेगा, तो इस स्थिति में कार्यभाव तृतीय भाव हो गया। कार्येश से अभिप्राय कुण्डली के उस भाव से है, जिससे संबन्धित प्रश्न किया गया है। इस प्रश्न में यात्रा के विषय में कहा गया है तो तृ्तीय भाव का स्वामी कार्येश हो गया। इस प्रकार प्रश्न कुण्डली में कार्य भाव और कार्येश का संबन्ध प्रश्न की सफलता दर्शाता है। सप्तम भाव वह व्यक्ति या विषय वस्तु है, जिससे संबन्धित प्रश्न किया गया है। उस व्यक्ति की स्थिति को समझने के लिये सांतवें घर का विश्लेषण किया जाता है.

प्रश्‍न कुण्‍डली वास्‍तव में समय विशेष की एक कुण्‍डली है जो उस समय बनाई जाती है, जिस समय जातक प्रश्‍न पूछता है। इस कुण्‍डली से जातक के प्रश्‍न का ही भविष्‍य देखने का प्रयास किया जाता है। इस विधि में सवाल कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर तात्‍कालिक समस्‍या ही सवाल होती है। ऐसे में समस्‍या समाधान का जवाब देने के लिए प्रश्‍न कुण्‍डली सर्वाधिक उपयुक्‍त तरीका है। ध्‍यान रखने की बात यह है, कि प्रश्‍न के सामने आते ही उसकी कुण्‍डली बना ली जाए। इससे समय के फेर की समस्‍या नहीं रहती। इसके साथ ही जातक की मूल कुण्‍डली भी मिल जाए और वह प्रश्‍न कुण्‍डली को इको करती हो तो समस्‍या का हल ढूंढना और भी आसान हो जाता है। कई बार जातक जो मूल कुण्‍डली लेकर आता है, वह भी संदेह के घेरे में होती है। ओमेन (संकेतों का विज्ञान) बताता है कि जातक का ज्‍योतिषी के पास आने का समय और जातक की कुण्‍डली दोनों आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली बना लेना फलादेश के सही होने की गारंटी को बढ़ा देता है। पूर्व में जब हाथ से कुण्‍डली बनाई जाती थी, तब हाथों हाथ प्रश्‍न कुण्‍डली बनाना संभव नहीं था, लेकिन वर्तमान दौर में कंम्‍प्‍यूटर और सक्षम सॉफ्टवेयर की मदद से जब हाथों हाथ कुण्‍डलियां बनाई जा रही है, तब ज्‍योतिषी जातक की मूल कुण्‍डली के साथ ही प्रश्‍न कुण्‍डली बना लेते हैं। यह फलादेश के काम को आसान बना देता है।

छद्म प्रश्‍नों की समस्‍या

प्रश्‍न कुण्‍डली के साथ बड़ी समस्‍या है जातक के सवाल का सही नहीं होना। ज्‍योतिष की जिन पुस्‍तकों में प्रश्‍नों के सवाल देने की विधियां दी गई हैं उन्‍हीं में छद्म प्रश्‍नों से बचने के तरीके भी बताए गए हैं। इसका पहला नियम यह है कि ज्‍योतिषी को टैस्‍ट करने के लिए पूछे गए सवालों का जवाब कभी मत दो। ऐसा इसलिए कि ओमेने के सिद्धांत के अनुसार छद्म सवाल का कोई उत्‍तर नहीं होता। जातक का सवाल सही नहीं होने पर प्रश्‍न और कुण्‍डली एक-दूसरे के पूरक नहीं बन पाते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली बनाने के साथ ही ज्‍योतिषी को प्रश्‍न के स्‍वभाव का प्रारंभिक अनुमान भी कर लेना चाहिए। इससे प्रश्‍न में बदलाव की संभावना कम होती है।

कमोबेश एक जैसे सवाल

ज्‍योतिष कार्यालय चलाने वाले लोग जानते हैं कि एक दिन में एक ही प्रकार की समस्‍याओं वाले लोग अधिक आते हैं। इसका कारण यह है कि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति होती है उससे पीडि़त होने वाले लोगों का स्‍वभाव भी एक जैसा ही होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि समान राशि या कुण्‍डली वाले लोगों को एक जैसी समस्‍याएं होगी बल्कि ग्रह योगों की समान स्थिति से समान स्‍वभाव की समस्‍याएं सामने आएंगी। मेरा अनुभव बताता है कि जिस दिन गोचर में चंद्रमा और शनि की युति होगी, तो उस दिन मानसिक समस्‍याओं से घिरे लोग अधिक आएंगे। हां, मानसिक समस्‍याओं का प्रकार लग्‍न और अन्‍य ग्रहों के कारण बदल जाता। कोई सिजोफ्रीनिया से पीडि़त हो सकता है तो कोई क्रोनिक डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। किसी को दिमागी सुस्‍ती की समस्‍या हो सकती है तो कोई साइको-सोमेटिक डिजीज से ग्रस्‍त हो सकता है। इस तरह प्रश्‍न कुण्‍डली से एक ओर जातक का विश्‍लेषण आसान हो जाता है तो दूसरी ओर भूतकाल स्‍पष्‍ट करने के बजाय भविष्‍य कथन में अधिक ध्‍यान लगाया जा सकता है।

जन्म समय की समस्‍या का समाधान

पिछले कुछ सालों में अस्‍पतालों में शिशु जन्‍म की स्थितियां बढ़ने के कारण जन्‍म समय कमोबेश सही मिलने लगे हैं। पर अब भी जन्‍म समय को लेकर कई तरह की उलझनें बनी हुई है। आमतौर पर शिशु के गर्भ से बाहर आने को ही जन्‍म समय माना जाता है। इसके अलावा माता से नाल के कटने या पहली सांस लेने का भी जन्‍म समय लेने के मत ज्‍योतिष में देखने को मिलते हैं। सही जन्‍म समय को लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली ऐसा जवाब है जिससे जन्‍म तिथि और जन्‍म समय के बिना फलादेश किया जा सकता है। सामान्यता: प्रश्न कुण्डली की आयु वार्षिक मानी गई है। प्रश्न कुण्डली में लग्न समय निश्चित होता है। प्रश्न कर्ता की चिन्ताओं की जानकारी चन्द्रमा से देखी जा सकती है। प्रश्न कुण्डली में लग्न भाव में बली चन्द्र की स्थिति निवास चिन्ता, दूसरे भाव में धन, तीसरे भाव में घर से दूर रहने की चिन्ता, चौथे भाव में मकान/ पानी से संबधित परेशानी, पांचवे भाव में संतान, छठे भाव में ऋण, सांतवेंभाव में विवाह या साझेदारी, आंठवें भाव में पैतृक संम्पति में या अप्रयाशित लाभ, नवम भाव में चन्द्र लम्बी दूरी की यात्रा, दशम भाव में आजीविका, एकादश भाव में आय वृ्द्धि / पदोन्नति, द्वादश भाव में बली चन्द्र विदेश यात्रा से जुडी चिन्ताएं होने का संकेत देता है.

प्रश्‍न कुण्‍डली के फायदे

- जन्‍म समय का फेर नहीं होता

- अगर आपको पास सॉफ्टवेयर है तो यह हाथों-हाथ तैयार हो जाती है

- सही सवालों के जवाब स्‍पष्‍ट मिलते सकते हैं

- हर तरह के सवाल का जवाब दिया जा सकता है, बशर्ते सवाल सही हो।

- जिन लोगों को जन्‍म समय नहीं हैं, उनके अलावा जिन लोगों की गलत कुण्‍डली बनी हुई है वे भी अपनी चिंताओं का सही जवाब ले सकते हैं।

- भविष्‍य कथन के बजाय मौजूदा समस्‍याओं से संबंधित कई सवालों के सटीक जवाब मिलते हैं

- पूर्ण भविष्‍य कथन के बजाय ऐसे सवाल जिनके हां या ना में उत्‍तर होते हैं उनके अपेक्षाकृत सटीक जवाब मिलते हैं।

बुधवार, अक्टूबर 19, 2011

आपका खुद का विजयोत्‍सव

गुणपूजक भारतीय मान्‍यता में गुणों की ही विजय हुई है और अवगुणों का नाश हुआ है। राम द्वारा रावण का वध और कृष्‍ण द्वारा कंस का वध जैसे उदाहरण भी भारतीय मान्‍यता में मिलते हैं, लेकिन तब भी हमें केवल यही संकेत दिया जाता है कि धर्म की अधर्म पर या असत्‍य पर सत्‍य की विजय हुई है, न कि किसी एक व्‍यक्ति की दूसरे व्‍यक्ति पर। बुराई को खत्‍म करने का प्रयास किया जाता है न कि बुरे व्‍यक्ति को। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में कृष्‍ण ने जब अर्जुन को मित्रों और शत्रुओं का ज्ञान दिया तो उसकी एक टीका यह भी है कि कौरव और पाण्‍डव हमारे भीतर के अच्‍छाई और बुराई के प्रतीक हैं और हम अपनी इच्‍छाशक्ति से ही अच्‍छाई का पोषण कर बुराई को खत्‍म कर सकते हैं। इसके लिए किसी प्रकार की आसक्ति या विरक्ति के भाव को आड़े नहीं आने देना चाहिए।

ज्‍योतिष के दृष्टिकोण से विजय को लाभ और आत्‍मोन्‍नति से जोड़कर देखा जाता है। कुण्‍डली का छठा भाव शत्रुओं का और बारहवां भाव हानि का बताया गया है। किसी कार्य में विजय के लिए हमारे भीतर की ताकत पर्याप्‍त होनी चाहिए, यह लग्‍न से देखी जाएगी। हमारे भीतर का साहस तीसरे भाव से देखा जाएगा और हमारी प्राप्‍त करने की इच्‍छाशक्ति ग्‍यारहवें भाव से देखी जाएगी। इसके साथ ही कुण्‍डली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होनी चाहिए। किसी कार्य को शुरू करने में हमें पहले उसका सपना देखना होगा। इसके लिए चंद्रमा हमारा सहयोग करता है। इसके बाद कार्य को शुरू करने का निश्‍चय करने के लिए लग्‍न हमारी मदद करता है। तीसरा भाव में हमें आगे बढ़ने का साहस देता है और ग्‍यारहवां भाव हमारे इच्छित साधन की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्‍त करता है। ये सभी कार्यों में सफलता या विफलता हमारे दसवें भाव यानी कर्म पर आधारित होती है। इनमें से किसी भी एक भाव के पर्याप्‍त सुदृढ़ नहीं होने की स्थिति में हमें कई बार विफलता भी झेलनी पड़ती है। चंद्रमा कमजोर होने पर हमारी कल्‍पना और सोचने की शक्ति हमारा साथ नहीं देती, लग्‍न कमजोर होने पर कार्य शुरू करने का निर्णय नहीं जुटा पाते, तीसरा भाव कमजोर होने पर हम निर्णय लेने के बाद भी कार्य संपादन शुरू नहीं कर पाते, दसवां भाव कमजोर होने पर हमारे प्रयासों में कमी रहती है और ग्‍यारहवां भाव कमजोर होने पर हम इच्छित फल प्राप्‍त करने से वंचित रह सकते हैं। हालांकि लाभ-हानि, यश-अपयश और जय-पराजय छह ऐसे विषय हैं जिनका अंतिम निर्णय ईश्‍वर ने अपने पास सुरक्षित रखा है, लेकिन लग्‍न से दसवें भाव तक के कार्य हमारे हाथ में है। इस बीच हमारी समस्‍याएं, चिंताएं और शत्रु हमारे कार्य में बाधा उत्‍पन्‍न करते हैं।

छठे भाव से आती है समस्‍याएं

कार्य को संपादित करने के दौरान हमारे समक्ष कई बार समस्‍याएं भी आती हैं। इन समस्‍याओं को कुण्‍डली के छठे भाव से देखा जाता है। कुंडली के छठे घर के बलवान होने से तथा किसी विशेष शुभ ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में अधिकतर समय अपने शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है। उसके शत्रु अथवा प्रतिद्वंदी उसे कोई विशेष नुकसान पहुंचाने में आम तौर पर सक्षम नहीं होते। कुंडली के छठे घर के बलहीन होने से अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में बार-बार शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों के द्वारा नुकसान उठाता है तथा ऐसे व्यक्ति के शत्रु आम तौर पर बहुत ताकतवर होते हैं। कुल मिलाकर हमारी जो कमजोरियां हैं, वे सभी छठे भाव से देखी जाएंगी और इसी घर से आठवें भाव यानी लग्‍न से हम अपनी क्षमताओं, विशेषताओं, अंदरूनी ताकत के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। अगर किसी जातक का लग्‍न बहुत अधिक शक्तिशाली हो तो हम किसी भी स्‍तर के शत्रुओं से मुकाबला कर सकते हैं।

लग्‍न के अनुसार शत्रु

हर लग्‍न की अपनी खासियत और कमियां होती हैं। मेष लग्‍न के जातक उग्र होते हैं और एक ही बार में कार्य का संपादन पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। एक ही कार्य को बार बार नहीं कर पाने की बाध्‍यता उनकी कमजोरी है। इसे हम कुण्‍डली में भी देख सकते हैं कि मेष लग्‍न में रिपु भाव का अधिपति बुध है। इसी प्रकार वृष लग्‍न के जातक कुछ विलासी और आरामपसंद होते हैं। यही उनके लग्‍न की विशेषता है और यही उनकी कमजोरी भी। हम देखते हैं कि वृष लग्‍न में शुक्र ही शत्रु भाव का अधिपति है। मिथुन लग्‍न के जातकों की खासियत समस्‍या को हल्‍के में लेने और जिंदगी को सामान्‍य ढंग से लेने में है। मेष लग्‍न में कठिन परिस्थितियों से लड़ना सिखाने वाला मंगल शत्रु भाव का अधिपति है। कर्क राशि जलतत्‍वीय राशि है और एक विचार पर अधिक देर तक काम नहीं कर सकने वालों की है। कर्क लग्‍न के लिए गुरु जो कतिपय अधिक स्थिर और दुनिया को साथ लेकर चलने वाला ग्रह है शत्रु भाव का अधिपति बनता है। सिंह राशि के जातक स्‍वभाव से तेज और गर्वीले होते हैं। सिंह के शत्रु भाव का अधिपति शनि है जो धीमा चलता है और बहुत अधिक सोच विचार कर अपना निर्णय करता है। कन्‍या राशि के लोग बहुत अधिक बोलने वाले और आवश्‍यकता से अधिक विश्‍लेषण करने वाले होते हैं। इस लग्‍न के अधिपति को भी शनि जैसा न्‍यायप्रिय शत्रु मिलता है। धनु लग्‍न के जातक सौम्‍य और पढ़े लिखे दिखाई देते हैं और सादगी से जिंदगी जीने का प्रयास करते हैं। इनके शत्रुओं के रूप में हम शुक्र से चलित लोगों को देख सकते हैं। मकर राशि के लोग अपेक्षाकृत दढ़ और धीमे होते हैं। अपनी जबान पर कायम नहीं रह सकने वाले बुध के लोग इस लग्‍न के शत्रु होते हैं। कुंभ राशि के जातक एक ही काम में दीर्ध अवधि तक लगे रहने वाले और दृढ़ होते हैं, इनका शत्रु चंद्रमा होता है जो किसी एक काम में अधिक लंबे समय तक नहीं टिकता। मीन राशि को जातक अपेक्षाकृत सादी जिंदगी जीने वाले होते हैं, इनके शत्रु भाव का स्‍वामी सूर्य है। इस तरह हम देखते हैं कि हर लग्‍न की अपनी खासियत होती है, इसी के संदर्भ में उनके शत्रुओं की भी अपनी प्रकृति होती है। अगर एक जातक अपनी नैसर्गिक प्रकृति को मजबूत करता रहे तो शत्रु की प्रकृति अपने आप कमजोर होती जाएगी।

सोमवार, अक्टूबर 25, 2010

ग्रहों से जुड़ी वनस्‍पति

ज्‍योतिष में ईलाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। एक सफल ज्‍योतिषी वही है जो न केवल समस्‍या को पहचान ले बल्कि समस्‍या के निदान के लिए पुख्‍ता उपाय भी बता दे। हर ज्‍योतिषी के पास ईलाज का अपना तरीका है। मैंने अलग-अलग गुरुओं से सीखा, सो मैं कई तरह के उपचार काम में लेने की कोशिश करता हूं। इसका मुझे यह फायदा होता है कि उपचार की लम्‍बी फेहरिस्‍त हमेशा मेरे पास होती है और जातक के पास एक नहीं तो दूसरा उपचार चुनने की स्‍वतंत्रता बची रहती है।

उपचार का एक महत्‍वपूर्ण भाग है वनस्‍पतियां, वेदों और पुराणों में ग्रह शांति का सबसे सशक्‍त माध्‍यम यज्ञ को बताया गया है। बाद के विद्वानों ने स्‍पष्‍ट भी किया है कि कौनसी वनस्‍पति के काष्‍ठ की आहूति देने पर क्‍या उपचार हो सकता है। यज्ञ के बारे में मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन जो पहले दिया जा चुका है उसे यहां शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही वास्‍तु में वनस्‍पति के उपचार भी इस लेख में शामिल करने का प्रयास करता हूं। मुझे यह तैयार माल पिछले दिनों बीकानेर में राष्‍ट्रीय स्‍तर की संगोष्‍ठी में मिला। गुरुकुल कांगड़ी विश्‍वविद्यालय हरिद्वार के प्रोफेसर डी.आर. खन्‍ना ने अपने पत्रवाचन में यह तैयार सामग्री परोसी।

- यज्ञाग्नि प्रज्‍‍वलित रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले काष्‍ठ को समिधा अथवा इध्‍म कहते हैं।

- प्रत्‍येक लकड़ी को समिधा नहीं बनाया जा सकता।

- आह्निक सूत्रावली में ढाक, फल्‍गु, वट, पीपल, विकंकत, गूलर, चन्‍दन, सरल, देवदारू, शाल, खैर का विधान है।

- वायु पुराण में ढाक, काकप्रिय, बड़, पिलखन, पीपल, विकंकत, गूलर, बेल, चन्‍दन, पीतदारू, शाल, खैर को यज्ञ के लिए उपयोगी माना गया है।

- दयानन्‍द सरस्‍वती ने सत्‍यार्थ प्रकाश में यज्ञ के लिए पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आम व विल्‍व को उपयोगी बताया है। उन्‍होंने चन्‍दन, पलाश और आम को सर्वश्रेष्‍ठ बताया है।

- सूर्य के लिए अर्क, चंद्र के लिए ढाक, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग, गुरू के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी और राहू के लिए दूर्वा व केतू के लिए कुश वनस्‍पतियां उपचार में ली जा सकती हैं।

वास्‍तु से जुड़ी वनस्‍पतियां

घर के आगे नवग्रहों के वृक्षों की स्‍थापना के लिए भी सिद्धांत बताए गए हैं। इसके लिए स्‍पष्‍ट किया गया है कि पूर्व में गूलर, पश्चिम में शमी, उत्‍तर में पीपल, दक्षिण में खैर और मध्‍य में आक का वृक्ष लगाना लाभदायी है। इसके अलावा उत्‍तर पूर्व में लटजीरा, उत्‍तर पश्चिम में कुश, दक्षिण पश्चिम में दूब और दक्षिण पूर्व में ढाक का वृक्ष लगाना चाहिए।

यह प्रोफेसर खन्‍ना के पत्रवाचन का ज्‍यों का त्‍यों सार दिया गया है। इसमें मैंने अपनी ओर से कोई विचार नहीं दिया है। आगे किसी लेख में वनस्‍पतियों के उपचार में इस्‍तेमाल के तरीके एवं अन्‍य वनस्‍पतियों के रोल के बारे में स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करूंगा।

यथा...

मंगलवार, अक्टूबर 12, 2010

सबल ग्रह का रत्‍न धारण करें या निर्बल ग्रह का?

आयाम 

यह भी एक टेढ़ा सवाल है। वास्‍तव में ऐसा होता है मुझे इसमें भी शक है। दरअसल, कृष्‍णामूर्ति का तो कथन है कि लग्‍न और नवम भाव तथा इनसे सम्‍बन्धित ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कोई ग्रह निर्बल हो या सबल क्‍या फर्क पड़ता है। इस लेख को पढ़ने से पहले पाठक को चाहिए कि मेरे रत्‍नों पर लिखे कुछ पिछले लेखों को देख लेना चाहिए। ये लेख हैं...

1. मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो... चलेगा

2. लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

3. ईलाज किसका करना है परिस्थितियों का, दूसरों का या खुद का

4. मैं जिज्ञासा बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं... 

इन लेखों में मैंने वर्तमान में रत्‍न को लेकर चल रहे कई सिद्धांतों और उनके कारण पैदा हो रहे व्‍याघात को समझाने का प्रयास किया है। निर्बल और उच्‍च ग्रह का उपचार भी ऐसा ही एक और व्‍याघात है।

कैसे, समझाने का प्रयास करता हूं...

एक उदाहरण की कुण्‍डली लेते हैं। मान लीजिए एक तुला लग्‍न की कुण्‍डली है। उसमें शुक्र लग्‍न का अधिपति हुआ। एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शनि इस कुण्‍डली में कारक ग्रह है। नवम भाव का अधिपति होने के कारण बुध का उपचार भी किया जा सकता है। अब कृष्‍णामूर्ति की माने तो इस कुण्‍डली के शुक्र, शनि और बुध ग्रह का ही इलाज किया जा सकता है। अब इस कुण्‍डली में अगर गुरू, सूर्य या मंगल खराब स्थिति में है तो उनके इलाज की जरूरत ही नहीं है। एक व्‍यक्ति राजमहल में रह रहा हो तो उसे ज्ञान, आधिपत्‍य, और ताकत स्‍वत: मिलती है, और अगर न भी मिले तो उसके लिए प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। ऐसा जातक अगर ज्‍योतिषी से यह मांग करे कि उसे अपने आधिपत्‍य, ताकत और ज्ञान में बढ़ोतरी की जरूरत है तो मान लीजिए कि वह केवल किसी लालसा की वजह से कुछ समय के लिए भटककर यह सवाल कर रहा है। वास्‍तव में उसे जो चाहिए वह ऐश्‍वर्य, विरासत, कंफर्ट, कम्‍युनिकेशन स्किल और अपनी चाही गई चीजों के लिए ईज ऑफ एक्‍सस की जरूरत है। यानि वह अपनी जरूरतों के लिए लम्‍बी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार नहीं है। अगर वह जातक किसी साधन या व्‍यवस्‍था को पाने का प्रयास कर रहा है या रही है तो यह कुछ समय की बात हो सकती है दीर्घकालीन जरूरत नहीं। ऐसे में तुला लग्‍न में बैठे नीच के सूर्य को ताकतवर बनाने के लिए माणिक्‍य भी पहना दिया तो फायदा करने के बजाय नुकसान अधिक करेगा।

यही बात अन्‍य लग्‍नों के लिए भी लागू होती है। तो जातक का इलाज करते समय यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि वास्‍तव में जातक का मूल स्‍वभाव क्‍या है। उसे अपनी मूल स्थिति में लौटाने से अधिक सुविधाजनक कुछ भी नहीं है। भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता, लेकिन मानसिक स्थिति में सुधार कर खराब समय की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। ऐसे में किसी एक जातक की लालसा का पोषण करने के बजाय उसे सही रास्‍ते की ओर भेजना मेरी समझ में सबसे सही उपाय है। ऐसे में मेष से लेकर मीन राशि और लग्‍न वाले जातकों के लिए अलग-अलग उपचार होंगे। आप गौर करेंगे कि कुछ ग्रहों को कारक तो कुछ को अकारक भी बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी कुण्‍डली में कारक ग्रहों का प्रभाव होता है और अकारक का नहीं होता। प्रभाव तो सभी ग्रहों का होगा, लेकिन मूल स्‍वभाव कारक ग्रह के अनुसार ही होगा। ऐसे में  उपचार के समय भी कारक ग्रहों का ही ध्‍यान रखा जाए।

रही बात उच्‍च और नीच की... यह तो रश्मियों का प्रभाव है। नीच ग्रह की कम रश्मियां जातक तक पहुंचती है और उच्‍च ग्रह की अधिक रश्मियां। ऐसे में अगर कारक ग्रह अच्‍छी स्थिति यानि अच्‍छे भाव में बैठकर कम रश्मियां दे रहा है तो उसके लिए उपचार करना चाहिए। और अकारक ग्रह खराब स्थिति में या नीच का भी है तो उसे छेड़ने की जरूरत नहीं है।

यह मेरा अब तक के अध्‍ययन से उपजा विश्‍लेषण है.. जरूरी नहीं है कि सही ही हो, लेकिन अब तक जितने जातकों का इलाज इन तथ्‍यों को ध्‍यान में रखकर किया है, मुझे बेहतर परिणाम मिले हैं। एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। एक जातक तुला लग्‍न का ही था और अपने संगठन में टॉप लेवल पर पहुंचने के लिए प्रयासरत था, मुझे लगा कि वह अपनी ताकत और प्रबंधन गुण की वजह से तो टॉप लेवल पर नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन शनि का नेगेटिव प्रभाव बढ़ाने से बात बन सकती है। पांचवे भाव में स्‍व राशि का होने के बावजूद मैंने जातक को लोहे की अंगूठी गले में पहना दी, और गले में पहना रक्‍त चंदन का सूर्य उतरवा दिया। शनि का असर तेजी से बढ़ा, लग्‍न में बैठे सूर्य और गुरू भी इतना असर नहीं कर पाए जितना शनि ने किया। अब वह अपने संगठन के बहुत महत्‍वपूर्ण ऊंचे पद पर आसीन है।

गुरुवार, मार्च 11, 2010

लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

लाल किताब प्राचीन नहीं है, जैसा कि लाल किताब के बहुत से विज्ञापनों में लिखा गया होता है 'असली प्राचीन लाल किताब।' बल्कि यह मध्‍ययुगीन है। मेरी जानकारी के अनुसार यवनों के भारत में प्रवेश के बाद भारत और पाकिस्‍तान के पंजाब वाले क्षेत्रों में इस ज्‍योतिष का तेजी से विकास हुआ। अनुमान लगा सकता हूं कि कोई छोटा ग्रुप रहा होगा, जिन्‍होंने मिलकर परम्‍परागत भारतीय ज्‍योतिष में शाबरी मंत्रों जैसे प्रयोग किए और ऐसे लोकरंजन के उपाय निकाल लिए जो अपनाने में आसान और कारगर हों।
लाल किताब के प्राचीन नहीं होने से इसकी महत्‍ता कम नहीं हो जाती। वर्तमान दौर में उपायों के लिए अगर कोई पुस्‍तक मदद करती है तो वह है लाल किताब, इसके अलावा पटियाला और चंडीगढ़ के कुछ लोगों ने, अगर सही कहूं तो एक युवा ज्‍योतिषी ने सुनहरी किताब भी प्रकाशित की। वह युवा बहुत कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गया लेकिन जो सुनहरी किताब लिखकर गया है, वह लाल किताब को भी पीछे छोड़ती है,
लेकिन अभी बात उपचारों की
आप किसी भी पुराने ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए। उसमें ग्रहों की गड़बड़ पर शांति के उपचार बताए गए हैं। दान, भेंट, पूजा, यज्ञ अथवा मंत्रोच्‍चार से समस्‍याओं का समाधान  पाया जा सकता है। फौरी तौर पर चंद्र राशियों के आधार पर ग्रहों के रत्‍नों की जानकारी भी कहीं-कहीं मिल जाती है, लेकिन वह भी ग्रह शांति उपचारों से ही संबंधित है।
उपचारों का बिंदू आने के साथ ही मेरे दिमाग में सबसे पहले लाल किताब आती है। इसके दो कारण हैं। पहला कि इस किताब में उपचारों की इतनी लम्‍बी रेंज दी गई है कि एक उपचार नहीं कर सको तो दूसरा कर लो, दूसरा नहीं तो तीसरा, इसी तर्ज पर लिखी गई सुनहरी किताब तो उपचारों की पूरी लिस्‍ट ही थमा देती है। अपनी इच्‍छा के अनुसार उपचार चुनो और कर लो। दूसरा कारण है कि मेरे गुरूजी ने मुझे बताया कि लाल किताब के उपचार तांत्रिक विधियों पर आधारित है। जातक जैनुइन है तो उसे लाल किताब का ही उपचार बताओ, जातक की जितनी अधिक आस्‍था होगी, उपचार उतनी ही तेजी से काम करेगा।
वर्तमान दौर में लोगों को प्रसव पीड़ा भोगने की बजाय लोगों को सिजेरियन ऑपरेशन अधिक सहज लगता है। इसलिए उन्‍हें वही दो, जो वे मांगते हैं। यह बात मुझे शुरूआती दौर में ही महसूस होने लगी थी। किसी को कोई उपचार बताओ और कहो कि पांच साल बाद सब‍कुछ दुरुस्‍त हो जाएगा तो, या तो वह ज्‍योतिषी को दिमागी रूप से दिवालिया समझेगा, वरना अपनी समस्‍याओं की लिस्‍ट बताकर तात्‍कालिक स्थितियों से तत्‍काल छुटकारा दिलाने की गुहार लगाएगा।
रत्‍नों की सीरीज में यह लाल किताब कहां घुस गई
हां, अभी तो रत्‍नों पर लगातार लिख रहा हूं, इस बीच यह लाल किताब कहां से घुस आई। जैसा कि मैंने अपने पुराने लेखों में लिखा है ज्‍योतिष की एक विधा में दूसरी विधा का घालमेल इतनी आसानी से होता है कि दोनों विधाओं के लिंक मिले जुले नजर आने लगते हैं। रत्‍नों से उपचार में एक ओर जहां हस्‍तरेखा शास्‍त्र घुसा हुआ है वहीं दूसरी ओर लाल किताब भी घुस चुकी है। लाल किताब का सूत्र है कि जो ग्रह किसी स्‍थान पर बैठकर खराब फल दे रहा हो उसे वहां से हटाकर दूसरी जगह पहुंचा दो। यह इतना आसान है, गुरू जैसे बड़े ग्रह को बिना उसके बारह चंद्रमा को छेड़े उठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंचा दिया जाता है। यह ऐसे ही नहीं हो जाता है। इसके लिए कुछ नियम हैं। उसकी बात बाद में...


लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह से संबंधित वस्‍तुओं को
- प्रथम भाव में पहुंचाना हो उसे गले में पहनिए
- दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए मंदिर में रखिए
- तीसरे भाव में पहुंचाने के लिए संबंधित वस्‍तु को हाथ में धारण करें
- चौथे भाव में पहुंचाने के लिए पानी में बहाएं
- पांचवे भाव के लिए स्‍कूल में पहुंचाएं,
- छठे भाव में पहुंचाने के लिए कुएं में डालें
- सातवें भाव के लिए धरती में दबाएं
- आठवें भाव के लिए श्‍मशान में दबाएं
- नौंवे भाव के लिए मंदिर में दें
- दसवें भाव के लिए पिता या सरकारी भवन को दें
- ग्‍यारहवें भाव का उपाय नहीं
और बारहवें भाव के लिए ग्रह से संबंधित चीजें छत पर रखें।

हां, तो यह हुआ लाल किताब का हिसाब किताब।
अब बात मेरे एक अनुभव की। मैं एक जातक को परम्‍परागत पंडितजी के पास लेकर गया। उन्‍हें कुण्‍डली दिखाई। जातक कन्‍या लग्‍न का था। पंडितजी ने कहा चंद्रमा खराब है, इसे मोती पहनाना पड़ेगा। मैंने कहा ठीक है मैं अंगूठी बनवाने के लिए बोल देता हूं, तो पंडितजी ने मना कर दिया। कहां कि कन्‍या लग्‍न के जातक को लॉकेट में ही चंद्रमा बनवाकर पहनना होगा। क्‍यों... पंडितजी से पूछा नहीं...
मैं बताता हूं इसका कारण
लाल किताब के अनुसार चंद्रमा की अंगूठी बनाकर पहनने से चंद्रमा चला जाएगा तीसरे घर में, यानि वृश्चिक राशि में, इससे चंद्रमा नीच का हो जाएगा। अब एक तरफ लाल किताब राशियों को मानती ही नहीं है। वह हर कुण्‍डली को मेष लग्‍न की कुण्‍डली मानती है और हर घर को तयशुदा राशियां दे रखी हैं। ऐसे में परम्‍परागत ज्‍योतिष और लाल किताब का घालमेल रत्‍न को पहनने में एक और बाधा बन गया। परम्‍परागत ज्‍योतिष ने तो बस इतना कहा कि चंद्रमा के उपचार के लिए मोती पहनाना चाहिए, लेकिन लाल किताब बता रही है कि हाथ में नहीं गले में पहनो...
अब जिन लोगों ने मेरे पिछले लेख पढ़े हैं वे समझ रहे होंगे कि रत्‍न केवल टच करने या किरणों से ही उपचार नहीं करते बल्कि कैसे पहने हैं इससे भी फर्क पड़ता है। तो इस तरह किसी एक रत्‍न को पहनने के लिए मेरे पास तीन अलग-अलग आधार हो गए, जो कभी भी किसी भी स्थिति में एक-दूसरे का निषेध कर सकते हैं। कब और कैसे करेंगे यह तय नहीं है।
अगली पोस्‍ट में मैं चर्चा करूंगा कि इन सब बाधाओं के बावजूद रत्‍न क्‍यों पहनाया जाता है, क्‍या इसे पहनाए बिना काम नहीं चल सकता...

इंतजार कीजिए अगली कड़ी का...

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

क्‍या हो ज्‍योतिषी की भूमिका ?

यह सवाल कमोबेश हर ज्‍योतिष सीखने वाले विद्यार्थी के समक्ष आती है। कभी अध्‍ययन की शुरूआत में तो कभी अध्‍ययन के दौरान तो कभी ज्‍योतिष से उकता जाने के बाद। बहुत से लोग ज्‍योतिष सीखना शुरू करते हैं। कुछेक फलादेश देते हैं और इसके बाद इस विषय को इसी कारण छोड़ देते हैं कि वे अपनी भूमिका तय नहीं कर पाते हैं। हालांकि बाजार में कुछ ऐसे ज्‍योतिषी भी हैं जो कमोबेश तांत्रिक की भूमिका निबाहते हैं। मैंने उनके मुंह से अपने जातक को यह तक कहते सुना है आप कहें तो आपके विरोधी का पेशाब बंद कर दूं। आप कहें तो सोते को खड़ा कर दूं। कुछ इसी तरह के जोश दिला देने वाले वाक्‍य सुनकर जातक हैरान रह जाता है। विरोधी का कुछ हो न हो जातक का पेशाब तो बंद हो ही जाता है। वह उपचार करने और फीस देने के लिए तैयार नजर आने लगता है। कई चक्‍कर निकालने के बाद भले ही जातक का मोहभंग हो जाए लेकिन एक समय के लिए तो वह जैसे ज्‍योतिषी का अनुयायी बन जाता है। ज्‍योतिषी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक जातक छूटे या बंधा रहे, क्‍योंकि उसके पास तो पूरी कतार होती है मूर्ख बनने वालों की। प्रोफेशनली ज्‍योतिष का व्‍यवसाय करने के दौरान मेरे सामने यह सवाल आया था कि क्‍या है ज्‍योतिषी की भूमिका और कहां तक वह जातक की जिन्‍दगी में दखल कर सकता है। वह कैसे उपचार बता सकता है जो उसकी जिन्‍दगी में सुधार लाए या सोते को खड़ा कर दे। मैंने कालान्‍तर में कई वरिष्‍ठ ज्‍योतिषियों और अपने साथियों से बात भी की। कुछ लोगों के दिमाग में स्‍पष्‍ट धारणा थी तो कई ने वैसे ही जवाब दिए जो वे अपने जातकों को देते थे। वास्‍तव में अधिकांश ज्‍योतिषी यह नहीं जानते कि उनकी भूमिका क्‍या है। जैसे एक चिकित्‍सक के पास जाते हैं और उसे रोग बताते हैं तो वह उपचार लिखकर दे देता है। अब रोगी पर निर्भर करता है कि वह कितनी गंभीरता से दवाएं लेता है, परहेज रखता है और बीमार करने वाली परिस्थितियों से दूर रहता है। चिकित्‍सक रोगी का रोग खुद नहीं ले सकता है। इसके उलट जो ज्‍योतिषी एक तरह से दावा करते हैं कि वे जातक का दुख दूर कर देंगे हो सका तो उनका दुख भी खुद ले लेंगे। यह मुझे इस परा विद्या के मामले में अतिरेक लगता है। हालांकि कई ज्‍योतिषियों ने यह तो बताया है कि एक आदर्श ज्‍योतिषी कैसा होना चाहिए, उसकी कुण्‍डली में क्‍या योग होने चाहिए या साइकोलॉजिकली वह कितना स्‍ट्रांग होना चाहिए। लेकिन ज्‍योतिषी और जातक के इंटरएक्‍शन में ज्‍योतिषी की क्‍या भूमिका होनी चाहिए इस पर अधिक नहीं दिया गया है। जैसा कि मुझे लगता है प्राचीन भारतीय मान्‍यता की तुलना में फलित ज्‍योतिष अपेक्षाकृत नया विषय है। ऐसे में ज्‍योतिषी की भूमिका के लिए नया प्रोटोकॉल ज्‍योतिषियों को ही बनाना पड़ेगा। वैसे एक जगह दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णा‍मूर्ति ने एक जगह स्‍पष्‍ट किया है कि ज्‍योतिषी की क्‍या भ‍ूमिका हो सकती है। वे बताते हैं कि गहरी झील में नाव खे रहा जातक जब थक जाता है तो पास से गुजरता हुआ ज्‍योतिषी उसे यह संकेत दे सकता है कि कहां पानी उथला है और कितनी देर तक और उसे नाव खेनी पड़ेगी। यह बहुत स्‍थूल उदाहरण हुआ लेकिन इससे बहुत कुछ संकेत मिल जाते हैं। मेरा प्रबुद्ध ज्‍योतिषियों से आग्रह है कि वे इस विषय पर अपने विचार पेश करें…… यथा

संगीता पुरी जी ने कहा ….

…जहां तक मेरा मानना है कि एक ज्योतिषी को मानवतावादी होना चाहिए….कोई व्यक्ति उसके पास खुद की परेशानी लेकर आता है…..उसे मनोवैज्ञानिक तौर पर सम्बल प्रदान करना एक ज्योतिषी का काम है…..पर वह ऐसा न करे कि उसके विरोधियों की तकलीफ बढ जाए….वैसे तो एक ज्योतिषी के हाथ में यह सब होता ही नही ….हम जातको के सम्मुख सिर्फ लाल और हरी बत्ती दिखा सकते हैं…..हमारा काम लोगों को यह समझाना है कि उसे अपने कर्तब्यों का फल पूर्ण तौर पर कब से मिलने लगेगा।