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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष कक्षा : 7वां दिन - तुला और वृश्चिक राशि

ज्‍योतिष की कक्षा में आज हम बात करेंगे शुक्र के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि तुला और मंगल के आधिपत्‍य वाली दूसरी राशि वृश्चिक की। इनमें से एक राशि शुक्र के आधिपत्‍य की है तो दूसरी मंगल के आधिपत्‍य की। आइए देखते हैं कैसे होते हैं ये लोग...

वणिक बुद्धि वाले तुला राशि के जातक

तुला राशि के जातकों की मनोदशा का केवल यही वर्णन नहीं है। भारतीय जनतंत्र में आज जिस व्‍यक्ति की छाप सबसे बड़ी है वह तुला राशि का ही जातक था। मैं बात कर रहा हूं राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी की। बाजार में अपनी तुला लिए खड़े व्‍यक्ति के रूप में तुला राशि को दिखाया गया है। विचारों से सम और हर बात को पूरी तरह तौलकर देखने वाला जातक तुला राशि का होगा। हालांकि इस राशि पर शुक्र का आधिपत्‍य है, इस कारण तुला राशि के जातकों को बनने संवरने, संगीत, चित्रकारी और बागवानी जैसे शौक होते हैं। इसके बावजूद रचनात्‍मक आलोचना और राजनैतिक चातुर्य इन जातकों का ऐसा कौशल होता है कि दूसरे लोग इनसे चकित रहते हैं। वणिक बुद्धि के कारण वाद विवाद में पड़ने के बजाय समझौता करने में अधिक यकीन रखते हैं। इन जातकों का शरीर दुबला पतला और अच्‍छे गठन वाला होता है। चेहरा सुंदर भी न हो तो मुस्‍कान मोहक होती है। इन जातकों को विपरीत योनि वाले सहज आकर्षित करते हैं। हालांकि इन जातकों की शारीरिक संरचना सुदृढ़ होती है, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण बीमारियों की पकड़ में जल्‍दी आते हैं। साझीदार के साथ व्‍यापार करना इनके लिए ठीक रहता है। जातक उचित समय पर सही सलाह देता है। ऐसे में साझेदार भी ज्‍यादातर फायदे में रहते हैं। एक बार मित्र बना लें तो हमेशा के लिए अच्‍छे मित्र सिद्ध होते हैं। इन जातकों का पंचमेश शनि होता है। इस कारण तुला लग्‍न के जातकों के अव्‍वल तो संतान कम होती है और अधिक हो भी जाए तो संतान का सुख कम ही मिलता है। इनके लिए शुभ दिन रविवार और सोमवार बताए गए हैं। शुभ रंग नारंगी, श्‍वेत और लाल तथा शुभ अंक एक व दस हैं।

हताश होना नहीं सीखा वृश्चिक ने

वृश्चिक राशि के जातकों की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वे कभी हार नहीं मानते। एक बार जिस काम में जुट गए उससे जल्‍दी से उकताते नहीं है और आखिरी दम तक उस काम को पूरा करने में जुटे रहते हैं। वृश्चिक राशि के लोग दो तरह के होते हैं। एक जो अपनी इंद्रियों को जीतकर जितेन्द्रिय बन जाते हैं। और दूसरे निम्‍न कोटि के जो ईर्ष्‍यालु और असभ्‍य होते हैं। इस राशि पर मंगल का आधिपत्‍य है सो अच्‍छा खासा डील डौल और चौड़ा माथा होता है। बालों में स्‍वाभाविक रुप से घुंघरालापन होता है। दवाओं से जुड़े कामों में अच्‍छा लाभ कमा सकते हैं। जलतत्‍वीय राशि होने के कारण इन लोगों का अंतर्ज्ञान भी ठीक होता है। बात दैहिक सुख की हो या गुप्‍त साहसिक कार्यों की, ये लोग पूर्ण संतुष्टि के साथ जिंदगी जीना पसंद करते हैं। मंगल के कारण आई उत्‍तेजना, अधिकार, उग्रता और द्ढृता इन लोगों को जिंदगी के कई क्षेत्रों में सफल बनाती है। ये अच्‍छे नौकर सिद्ध होते हैं, जब तक कि मालिक इनके साथ ईमानदार रहे। एक बार इन्‍हें नीचा दिखा दिया जाए या धोखा दे दिया जाए तो क्रूरता की हद तक जाकर बदला लेते हैं। कठोर वाणी से शत्रु बनाते हैं। अगर वृश्चिक राशि वाले लोग बोलना सीख लें तो अपने पीछे फॉलोअर्स की अच्‍छी संख्‍या एकत्रित कर सकते हैं। अधिकार की अति भावना के कारण ये चाहते हैं कि परिवार में भी बिना किसी लॉजिक या सवाल जवाब के इनकी बात सुन ली जाए और उस पर अमल हो। घर में कलह का यह सबसे बड़ा कारण बनता है, वरना इन लोगों को शांत और सहज पारिवारिक वातावरण पसंद है। स्त्रियों में वृश्चिक लग्‍न के मामले में तो केएस कृष्‍णामूर्ति ने यहां तक कहा है कि वृश्चिक लग्‍न की स्‍त्री हो और लग्‍न व मंगल अशुभ पीडि़त हो तो ऐसी औरत से विवाह करना अभिशाप है। वृश्चिक लग्‍न के जातकों के लिए रविवार, सोमवार, मंगलवार और गुरुवार सफलता देने वाले हैं। पीला, लाल, नारंगी और क्रीम रंग शुभ है।

अगली कक्षा में हम बात करेंगे धनु और मकर राशियों की...

गुरुवार, अगस्त 27, 2009

नास्‍त्रेदमस की टाइमिंग

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इन दिनों 2012 की चिंता के साथ एक बार फिर नास्‍त्रेदमस लाइम लाइट में आ चुके हैं। बहुत छोटा था तब नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक मेरी माताजी खरीद कर लाई थीं। उन्‍हें पक्‍का विश्‍वास था कि दुनिया जल्‍दी ही खत्‍म हो जाएगी। और नास्‍त्रेदमस भी यही कह रहे थे। मेरी माताजी के इस विश्‍वास के कई कारण थे लेकिन नास्‍त्रेदमस के पास कुछ जुदा कारण हैं। किताब के मुखपृष्‍ठ पर नास्‍त्रेदमस का अपने क्रिस्‍टल के साथ इतना आकर्षक फोटो था कि मैं घण्‍टों तक केवल फोटो को ही देखता रहता था। वह मूल किताब का हिन्‍दी अनुवाद था।

मुझे बहुत अधिक समझ नहीं थी लेकिन इतना उसमें स्‍पष्‍ट था कि नास्‍त्रेदमस ने दुनिया का भविष्‍य बहुत साल पहले ही लिख दिया है। और वह जल्‍द ही खत्‍म भी होने वाली है। अलग अलग सूत्रों का विश्‍लेषण करके बताया गया था कि इतिहास में अब तक जो घटनाएं हुई हैं उन्‍हें नास्‍त्रेदमस ने अपने क्रिस्‍टल बॉल में देख लिया था और उलझी हुई भाषा में लिख दिया था। ताकि उसे तत्‍काल कोई परेशान न करे। उसमें यह भी बताया गया था कि अब वे भविष्‍यवाणियां सच साबित हो रही हैं।

इसके बाद कई साल तक नास्‍त्रेदमस का नाम सुनाई नहीं दिया। जब मैं लाल किताब पढ़ रहा था तो उसकी भाषा और नास्‍त्रेदमस की चौपाइयों में कई समानताएं दिखाई दी। भाषा के दृष्टिकोण से। तब नास्‍त्रदेमस की दोबारा याद आई। ढूंढ-ढांढकर किताब निकाली और उसे फिर पढ़ गया। शेर और चीते की लड़ाई का एक दृश्‍य को अब भी ऐसा जेहन में बैठा है कि लगता है लड़ाई मेरे सामने हुई थी। उन दिनों मैंने कई लोगों के समक्ष नास्‍त्रेदमस की बात की। लेकिन उस दौर में किसी को भी मेरी बातों में इंट्रेस्‍ट नहीं आया। मैं किनारे हो गया।

फिर इराक पर हुए हमले और इराक के पास जैविक हथियारों के जखीरे की खबरों के बाद एक बार फिर नास्‍त्रदेमस का नाम चमका। कई किताबें बाजार में आ गई। घोषणा हुई कि वाईटूके वास्‍तव में एक सिंबल है जो बताता है कि दुनिया इक्‍कीसवीं सदी के दर्शन ही नहीं कर पाएगी। कई लोग बहुत चिंतित थे। बीकानेर में जहां हर समय अलमस्‍त मौसम रहता है कई लोगों के चेहरे पर प्रलय का भय दिखाई देने लगा। लोग पाप और पुण्‍य की बातें करने लगे। हालांकि बैकग्राउंड में जैविक हथियारों के काम करने के तरीके पर भी बहस चल रही होती लेकिन मुद्दा वही था कि दुनिया तो खत्‍म हो जाएगी।

इसके बाद अब तीसरा दौर देख रहा हूं। पिछले साल अमरीका बुरी तरह मंदी की चपेट में आ गया। लोगों के घर बिक गए, नौकरियां छूट गई और धंधे बंद हो गए। पूरी तरह ऑटोमैटिक घरों में रहने वाले लोग कारों में रहने और सोने लगे। यानि सोसायटी से कटने के बाद अब सुविधाओं से भी कट चुके लोगों के पास जीने का कोई कारण नहीं बचा। ऐसे में एक बार फिर नास्‍त्रेदमस आ गए हैं। इस बार आए हैं 2012 की भविष्‍यवाणी लेकर। इसमें दुनिया में आज तक हुए बदलावों और मशीनीकरण पर खुलकर चर्चा की गई है। देश, समाज और उपलब्‍ध संसाधनों के तेजी से हो रहे क्षय पर चर्चा है। और साथ में सवाल खड़ा किया गया है कि क्‍या वास्‍तव में नास्‍त्रदेमस के अनुसार वर्ष 2012 में दुनिया खत्‍म हो जाएगी।

यह भूमिका समझिए अगली पोस्‍ट में चर्चा करूंगा कि क्‍यों ऐसा होता है कि जब दुनिया में संकट आता है तभी नास्‍त्रेदमस याद आते हैं। और मुझे नास्‍त्रेदमस की चौपाइयों में क्‍या दिखता है।

चित्र गूगल सर्च से साभार

रविवार, अगस्त 23, 2009

इक्‍कीसिया गणेशजी : विशेष मांग पर

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ज्‍योतिष का यह ब्‍लॉग शुरू किया तो विषय पर लिखने के दौरान कई बार लगता कि ब्‍लॉग सूना-सूना लगता है। सो इस पर अपने ईष्‍टदेव इक्‍कीसिया गणेशजी का फोटो लगा दिया। शुरूआत में लोगों ने ध्‍यान दिया या नहीं लेकिन बाद में बहुत से लोगों ने पूछा कि ये इक्‍कीसिया गणेशजी कहां है, इनका क्‍या महत्‍व है।

शायद ज्‍योतिष के ब्‍लॉग पर  गणेशजी की तस्‍वीर होने के कारण कौतुहल का कारण बनी होगी। आज गणेश चतुर्थी है। गणेशजी का खास दिन है सो लगा आज ही इक्‍कीसिया गणेशजी के बारे में जानकारी देनी चाहिए। बीकानेर शहर के पश्चिमी कोने में किराडूओं की बगीची में स्थित गणेशजी के इस मंदिर की स्‍थापना का दिन तो मुझे नहीं पता लेकिन इसके साथ एक तथ्‍य जुड़ा है। वह यह कि इसे इक्‍कीस पुष्‍य नक्षत्रों के दिन बनाया गया था। जितनी देर तक पुष्‍य नक्षत्र चलता उतनी देर तक मूर्ति बनाने का काम होता और बाद में अगले नक्षत्र पर फिर से शुरू होता। इक्‍कीस पुष्‍य नक्षत्रों तक यह काम चला और मूर्ति बन गई। इसमें गणेशजी की गोद में सिद्धि भी विराजमान है। आमतौर पर मूर्ति का श्रृंगार इतना अधिक होता है कि पता ही नहीं चलता कि मूर्ति का वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या है। एक दिन हमारा फोटोग्राफर नौशाद अली मंदिर पहुंचा तो उसे बिना श्रृंगार के गणेशजी दिखाई दिए। वह उनकी फोटो ले आया। उसी फोटो को मैंने इस ब्‍लॉग पर लगा रखा है।

मन्‍नतें पूरी होती गई

इस मंदिर की खासियत यह है कि इक्‍कीस दिन तक रोजाना बिना बोले मंदिर जाने और गणेशजी की इक्‍कीस फेरी रोजाना लगाने पर मन की इच्‍छा पूरी हो जाती है। मैं जब पहली बार इस मंदिर में गया था तो यह छोटा सा मंदिर था। गर्भग्रह के पीछे इतनी कम जगह थी कि एक बार में दो जन फेरी नहीं लगा पाते थे। लेकिन गणेशजी का चमत्‍कार ही है कि उन्‍होंने लोगों की इच्‍छाएं इतनी तेजी से पूरी की कि मंदिर बड़ा होता गया। अब यह शहर का सबसे ग्‍लोरियस मंदिर बन गया। जब मैंने जाना शुरू किया था तो मैं डिप्रेशन में था और एकांत की खोज में वहां जाकर बैठता था। मन को बड़ा सुकून मिलता था। तीन साल तक रोज जाता रहा। कभी कुछ मांगा नहीं लेकिन मेरी स्थिति में तेजी से बिना मांगे सुधार होता गया। एकाध बार मैंने मन में इच्‍छा लेकर फेरी निकालनी शुरू की तो बाधा आ गई और फेरियां पूरी नहीं कर पाया। तो फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया। जब भी बिना मांगे जाता था तो नियमित रूप से बिना नागा महीनों तक यह क्रम चलता रहता। मांगने पर ही बाधा आती।  बहुत से लोग  इक्‍कीस दिन फेरियां नहीं निकाल पाते हैं। कुछ लोग जो निकाल लेते हैं उन्‍हें पुत्र संपत्ति जैसी चीजें आसानी से मिल जाती है। कालान्‍तर में दूसरे लोगों की इच्‍छाएं पूरी हुई तो मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। अब तो हालात ये हैं कि बुधवार के दिन गणेशजी की परिक्रमा एक साथ चालीस या पचास लोग करते हैं। कई बार तो दर्शन भी मुश्किल से होते हैं। अब मैंने जाना कम कर दिया है। साल में एकाध बार ही जा पा रहा हूं। लेकिन मन में वही पुरानी वाली छवि है। कभी उपापोह में होता हूं तो गणेशजी को याद करता हूं और समस्‍या का समाधान हो जाता है। यह मेरी आस्‍था से अधिक जुड़ा है सो यही मेरे ईष्‍ट हुए।

बस इतनी सी बात है... :)