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सोमवार, जुलाई 09, 2012

प्रिय शिव, भोले हो पर गजब के हो...

yoga-shiva
श्रावण मास में शिव खुद ब खुद याद आने लगते हैं। स्‍वभाव से भोले, गायों (संपदा) की रक्षा करने वाले और शीघ्र प्रसन्‍न होने वाले प्रिय शिव भक्‍तों की पुकार पर दौड़कर आते हैं। मैंने-आपने उन्‍हें देखा नहीं है, महसूस तो किया ही होगा। मैंने महसूस किया है, इतना करीब कि बता सकता हूं।
करीब पंद्रह साल पहले हमें योगीराज (उनका मूल नाम सुनील शर्मा था, जो मुझे बाद में पता चला) के पास भेजा गया। वे हमें हठ योग सिखाते थे। 5 फीट 9 इंच ऊंचाई के साथ मेरा वजन बिना वर्जिश किए 84 किलोग्राम तक पहुंच गया था। पेट पर हाथ मारते तो कई देर तक हिलता रहता था। मैंने योगीराज से कहा कि मुझे वजन कम करना है। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए पूछा वजन कम करना है या पतला होना है। मैंने कहा 84 किलोग्राम वजन है। उन्‍होंने कहा अभी एक किलोग्राम और बढ़ाना पड़ेगा। मेरी आंखे दीवार की दरार की तरह थीं। हंसने पर तो दिखाई देना भी बंद जाता था। मुझे दिखाई नहीं दिया कि योगीराज भी हंस रहे हैं या नहीं...
उन दिनों बाबा रामदेव का कहीं नामो निशान भी नहीं था। ऐसे में केवल एक ही प्राणायाम था जिसे विवेकानन्‍द ने अपने राजयोग में बताया था। वह था अनुलोम विलोम। सुबह पहले सूक्ष्‍म व्‍यायाम होते थे। इसमें शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में हिलाया जाता। सूक्ष्‍म व्‍यायाम के बाद सूर्य नमस्‍कार। शरीर की इन मामूली हरकतों से भी सर्दियों की सुबह सवा पांच बजे पसीना निकल आता था। इसके बाद आसन और आखिर में प्राणायाम।
सूक्ष्‍म व्‍यायाम और प्रणायाम कोई भी कर सकता है, लेकिन आसन, वे तो तोड़कर रख देते हैं। हर आसन मेरे लिए नई चुनौती लेकर आता। कुछ दिन में जब आसन लगने लगता तो योगीराज अगला आसन बता देते। पद्मासन, मत्‍स्‍यासन, अर्द्धमत्‍यासन, भुजंगासन, पर्वतासन तो मैंने किसी तरह आगे पीछे करके कर लिए। इसके बाद आया एक बहुत ही आसान आसन। वह था वज्रासन। मैंने समझा यह आसन कराना तो फिजूल है। सभी आराम से बैठ गए हैं। इसी आसन की अगली कड़ी था सुप्‍त वज्रासन।
10b-Supta-Vajrasana
(इस चित्र में वज्रासन की एक्‍सट्रीम स्थिति दिखाई गई है। इससे पूर्व कुछ आसान प्रकार भी होते हैं। जैसे ये नीचे वाला)
Supta-Vajrasana
देखने में यह ऊपर वाली स्थिति से आसान दिखाई दे रहा होगा, लेकिन कल्‍पना कीजिए एक मोटे व्‍यक्ति की, जिसकी जांघे उसके शरीर के कुल भार के बराबर हों। ऐसी स्थिति में वज्रासन में सीधा बैठना आसान है। पीछे तरफ झुकने की भी कल्‍पना नहीं की जा सकती। योगीराज पास में आए। उन्‍होंने एक-दो बार पीठ के पीछे हाथ रखकर मुझे सहारे से लिटाने का प्रयास किया, फिर छोड़ दिया। कहा क्‍लास के बाद मुझसे मिलकर जाना। उन्‍होंने मुझे एक कागज पेन दिया और कहा कि लिखो। उन्‍होंने शंख प्रक्षालन की विधि बताई। कहा दो दिन यहां आना मत। शंख प्रक्षालन करो और एक दिन का आराम करो, फिर लौटकर आना। घर आया और शंख प्रक्षालन में जुट गया। इसमें नमक मिला पानी पीना होता है और भुजंग आसन सहित चार आसान आसन बार बार करने होते हैं। हर बार एक गिलास पानी पीने के बाद चारों आसन। छह गिलास पीने तक तो कुछ महसूस नहीं हुआ, लेकिन जब सातवीं गिलास पानी पी रहा था, तो अचानक तेज प्रेशर महसूस हुआ। लैट्रीन की ओर भागा। मुझे बीस गिलास तक यह क्रिया दोहरानी थी। हर बार एक गिलास पानी पीने के बाद दौड़ना पड़ रहा था। बस राहत की बात इतनी ही थी कि घर में इटैलियन कमोड था। अगर नीचे बैठने की प्रक्रिया दोहरानी पड़ती तो शंख प्रक्षालन से पहले उठक बैठक से ढेर हो चुका होता। आखिर बीसवें गिलास तक यह स्थिति हो गई कि जैसा पानी पी रहा था, साफ सुथरा, वैसा ही निकाल रहा था। (इसे कहते हैं शंख प्रक्षालन, मेरी आंतों को नमक मिले पानी ने धो दिया था) अब मैं काफी हल्‍का और थका हुआ महसूस कर रहा था। अगले दिन आराम किया और तीसरे दिन पहुंचा तो फिर वही सुप्‍त वज्रासन। दूसरे पुराने विद्यार्थी आसानी से आसन कर रहे थे और मैं उन्‍हें देख भर रहा था। आंतें साफ हो चुकने के बाद पीछे की ओर झुकने की स्थिति नहीं बन पा रही थी। 19 साल तक जिस कमर को ठोस बनाया था, वह मुड़ने को तैयार नहीं हो रही थी। सभी को आसन की मुद्रा से हटने को कहा गया और योगीराज ने सभी को एक बात बताई कि :-
“शिव का योगीराज कहा जाता है। जानते हो इसका कारण क्‍या है। किसी को नहीं पता था। योग गुरु ने बताया कि
शिव ने विश्‍व में पाई जाने वाली कुल जमा 84 लाख योनियों के अनुरूप 84 लाख आसनों को सिद्ध किया है। इसलिए वे योगीराज हैं।”
(किसी भी हठ योगी को एक आसन सिद्ध करने में कई बार सालों लग जाते हैं। आसन सिद्ध होने का अर्थ होता है करीब साढ़े तीन घंटे उसी एक आसन में बैठे रहना। आसन सिद्ध तभी समझा जाता है जबकि योगी को उस आसन में बैठने में किसी प्रकार की कठिनाई महसूस न हो)
मैं रोमांचित था इस बात को सुनकर। सभी विद्यार्थी फिर सुप्‍त वज्रासन में जुट गए। मैं अब भी सुप्‍त वज्रासन नहीं कर पा रहा था। इस बार योगीराज ने मेरी सहायता नहीं की। बस इतना भर कहा कि शिव का ध्‍यान करो। मैंने आंखें बंद की और खिलंदड़ शिव दिखाई दिए। सुप्‍त वज्रासन करते हुए। मेरे चेहरे पर मुस्‍कुराहट आई और मैं पीछे की ओर लेट गया। लेटे लेटे मैंने आंखे खोली तो देखा कि सिर की ओर योगीराज (योग गुरु) खड़े हैं और मुस्‍कुरा रहे हैं। धीरे से बोले, जितना असर तुममें दिखाई दिया है किसी और में नहीं दिखा।
उस दिन से आज भी मेरे दिमाग में शिव की वही छवि है। कोई दूसरी छवि बैठ भी नहीं पाई। अब भी ध्‍यान करने बैठता हूं तो अनुलोम विलोम के पूरक, कुंभक और रेचन में एक, चार और दो के अनुपात को बनाए रखने के लिए ऊं नम: शिवाय का मंत्र बोलता हूं। एक बार के लिए एक, चार बार के लिए चार बार और दो बार के लिए दो बार मंत्र का जाप। इससे ध्‍यान भी जल्‍दी लगता है।
आष्‍टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि ये आठ भाग हैं। ये मन को स्थिर करते हैं। चूंकि शिव इन सभी के लिए कृपा करते हैं, इसलिए कहते हैं शिव की उपासना करने से मन को मजबूती मिलती है...

गुरुवार, मार्च 05, 2009

Exaltation or debilitation of planet : And it's meaning

नीच, नीच नहीं और उच्‍च अच्‍छा हो जरूरी नहीं


मेरे बच्‍चे का गुरू नीच का है तो क्‍या वह पढ़ाई नहीं कर पाएगा। मेरी कुण्‍डली में शुक्र नीच का है इसीलिए मेरी अपनी पत्‍नी से बनती नहीं हैं, मेरा सूर्य नीच का होने के कारण हमेशा बॉस से झगड़ा रहता है। ऐसे ही कई सवाल कई लोग मुझसे कुण्‍डली के विश्‍लेषण के दौरान पूछते हैं। 

           ग्रहों के उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व पर उनका इतना भरोसा होता है कि जब मैं कहता हूं कि आपकी कुण्‍डली तो तुला लग्‍न की है इसमें गुरू अकारक है या आपकी कुण्‍डली धनु लग्‍न की है इसमें शुक्र अकारक है। उच्‍च का हो या नीच का कोई फर्क नहीं पड़ता तो वे मेरी बात पर एक बारगी विश्‍वास ही नहीं कर पाते हैं। क्‍योंकि शब्‍द और शब्‍दों का विश्‍लेषण करने वाले कई ज्‍योतिषी उन्‍हें विश्‍वास दिला चुके होते हैं कि जो कुछ है इन्‍हीं ग्रहों के उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व में है। जबकि मेरा मनाना है कि ग्रहों के उच्‍च-नीच का होने से ग्रहों के प्रभाव के तरीके में नहीं बल्कि उनकी तीव्रता में अन्‍तर आता है।

           ग्रहों के व्‍यवहार को दर्शाने के लिए ज्‍योतिष की जो टर्मिनोलॉजी इस्‍तेमाल की जाती है उससे कई बार यह भ्रम होता है कि फलां ग्रह की दशा या अन्‍तर दशा या कुण्‍डली में स्थिति का भी यही परिणाम होगा। अधिकांश नए ज्‍योतिषी भी इस प्रकार की टर्मिनोलॉजी में उलझ जाते हैं। मुझे यह बात स्‍वीकार करने में कोई झिझक नहीं होती कि शुरूआत में मैं खुद भी इसमें उलझ गया था। अब दूसरे लोगों को उलझे हुए देख रहा हूं। 
तो क्‍या होता है उच्‍चत्‍व और नीचत्‍व का प्रभाव- 

           सबसे पहली बात हर ग्रह अपनी उच्‍च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्‍डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्‍च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्‍या में, गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्‍च के परिणाम देते हैं। यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं। इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्‍या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं। 

           पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्‍च का ग्रह हमेशा अच्‍छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्‍च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्‍छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्‍य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्‍च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्‍यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्‍यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्‍यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्‍च के ग्रहों को खराब कहा होगा। 

           कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्‍च का परिणाम देते हैं। यह मुख्‍य रूप से लग्‍न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्‍न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है। तुला लग्‍न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक। अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्‍ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्‍न में सूर्य उच्‍च का परिणाम देता है और वास्‍तव में देखा भी यही गया। 

           लग्‍न में उच्‍च का सूर्य गुरू के सा‍थ हो तो जातक अपने संस्‍थान में शीर्ष स्‍थान पर पहुंचता है। यानि ट्रेनी की पोस्‍ट से भी शुरू करे तो एमडी की पोस्‍ट तक जा सकता है। चारों लोगों के साथ ऐसा ही हुआ। अगर वे सीधे एमडी नहीं भी बने तो उसी संस्‍थान का एक विभाग और बना और वे उसके अध्‍यक्ष बन गए। इस तरह योग भी पूरा हुआ और नीच के सूर्य का उच्‍च परिणाम भी दिखाई दिया। मैं अपने जातकों को डिस्‍क्‍लोज नहीं करता सो उनके नाम नहीं दे रहा हूं लेकिन इन चार लोगों में से एक देश के बड़े सरकारी महकमे के अध्‍यक्ष रहे, दूसरे एक निजी संस्‍थान के किसी अनुभाग के प्रमुख हैं। शेष दो लोग निजी कंपनियों के अनुभाग प्रमुख ही हैं।

GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA

मंगलवार, फ़रवरी 17, 2009

वास्‍तु और इसके नियम

पिछली पोस्‍ट में एक बेहतरीन सवाल मेरे पास आया वह यह कि जिन घरों में भूमि पूजन नहीं कराया गया हो वहां कैसे सुख समृद्धि रहेगी। वास्‍तु के हिसाब से वे कैसे अच्‍छे घर सिद्ध हो सकते हैं। यह सवाल किया था अल्‍पना वर्मा जी ने उन्‍हीं के शब्‍दों में

'अगर किसी कारणवश किसी इमारत को बनाने से पहले नींव पूजन न होसके तो क्या करना चाहिये?
भारत के अलावा कई पश्चिमी देशों में भूमि पूजन या नींव पूजन आदि नहीं कराये जाते तब भी वहां सब ठीक रहता है.'

यहां मैं बताना चाहूंगा कि वास्‍तु विषय के मुताबिक पूजन कराना अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि एक सुविधा है। यानि अगर पूजन नहीं भी कराया है तो उस घर में सुखी और समृद्ध बनकर रहा जा सकता है। लेकिन अब भी वास्‍तु के नियम वही रहेंगे।

बात कुछ उलझ रही लग सकती है। ठीक है पहले समझते हैं वास्‍तु आखिर में है क्‍या। किसी भी स्‍थान की अवस्‍था को वास्‍तु कहा जा सकता है। स्‍थान की अवस्‍था का आकलन करने के लिए यह देखा जाएगा कि वह कहां स्थित है, हवा, पानी, रोशनी आदि की कैसी व्‍यवस्‍था है, घर के बाहर के क्‍या हालात हैं आदि। यह तो हुई स्‍थान की इंडिपेंडेंट बात। अब उस स्‍थान के मालिक और स्‍थान में भी एक संबंध होता है। यही संबंध तय स्‍थान पर हुए निर्माण में दृष्टिगोचर होता है। कैसे ?

बहुत सामान्‍य बात है। शनि से प्रभावित लोगों के घरों में आप ट्यूबलाइट अधिक देखेंगे और वह भी धीमी जल रही होगी। बाकी अधिकांश घर ऐसा होगा कि दिन में भी अंधेरा महसूस हो। मंगल और सूर्य से प्रभावित लोग अपने घर के आगे और पीछे इतनी जगह छोड़ते हैं कि देखने वाले को लगता है कि जमीन कुछ ज्‍यादा ही बड़ी ले ली लेकिन घर छोटे भाग में ही बनाया है। हर व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व की छाप उसके आवास पर दिखाई देगी। अब यह तो बात हुई वास्‍तु की उपस्थिति की। अब यह पूजन का क्‍लॉज कब जुड़ गया। मैं तो कहूंगा कि यह भी जरूरी भाग है। प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक भारत से शुरू से ही नहीं समझा। पहले योगियों का भी मजाक उड़ाया जाता था अब योग फैशन बन रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि प्राणायाम के क्‍या क्‍या लाभ हैं इसका निर्णय होना अभी बाकी है। यह न केवल सामान्‍य रोगों को ठीक करता है बल्कि कई प्रकार के जेनेटिक डिसऑर्डर को भी दुरुस्‍त कर देता है। ऐसी ही स्थिति नींव पूजन के साथ भी है। बहुत से लोगों को पता नहीं है कि इसका क्‍या महत्‍व है।

लेकिन जब तक इसका महत्‍व लैबोरेट्रीज में पता चले उससे पहले तो कम से कम इसे जिंदा रखने के लिए हमें भूमि पूजन कराते रहना चाहिए। रही बात पश्चिमी सभ्‍यता के लोगों की जो भूमि पूजन नहीं कराते हैं। वे हमारी तरह ही कभी सुखी कभी दुखी होते रहते हैं। हां हम एक बात में उनसे आगे रहते हैं वह यह कि हमें महसूस होता है कि हां कोई तीसरी शक्ति है जो पर्दे के पीछे रहकर लगातार हमारी सहायता कर रही है। बस यही है भूमि पूजन का वास्‍तविक महत्‍व...

Map picture

मेरा शहर बीकानेर, अगली बार बताउंगा विश्‍व और आपके शहर का वास्‍तु