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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

आधुनिक प्रबन्‍धन के आदि गुरु

गुण पूजक भारतीय मान्‍यता में हर देवता की एक विशिष्‍ट छवि है। हनुमान की भी अपने प्रबन्‍धन गुणों के साथ ऐसी छवि है जिसे हर युवा अपनाना चाहता है। आज देश के हर कोने में हनुमान का मंदिर मिल जाएगा। हनुमान ही हैं जो हमें सिखाते हैं कि आम बने रहकर भी कैसे व्‍यवहार करें, कैसे बोलें, तैयारी करें, काम करें और जीएं। हनुमान कपि होने के बावजूद सुग्रीव की वानर सेना का भाग नहीं थे। उनका समर्पण राम के प्रति था और उन्‍होंने वानर सेना के साथ और उससे अलग रहकर भी राम की जो सेवा की वह आज तक अनुकरणीय है।

रामायण में हनुमान का प्रबन्‍धन राम के वनवास के दौरान दिखाई देना शुरू होता है। वन में राम के मिलने के साथ ही हनुमान को लगता है कि उन्‍हें जो लक्ष्‍य था वह मिल गया है। इसके बाद उन्‍होंने खुद को सर्वस्‍व राम को ही समर्पित कर दिया। वर्तमान मैनेजमेंट में भी यही बात है कि मैनेजमेंट फील्‍ड में एक बार आप जिस कंपनी या प्रोफाइल पर जाते हैं, वहां अपना सौ प्रतिशत देना होता है। मैनेजमेंट का दूसरा सबसे महत्‍वपूर्ण काम है कंपनी के लिए आवश्‍यक निर्णयों में उचित सलाह देना। हालांकि सीता की खोज और लंका पर विजय की यात्रा राम की थी, लेकिन सुग्रीव से दोस्‍ती करने, बाली का वध करने, सीता की खोज के लिए वानरों का प्रबन्‍धन करने, रावण की सभा में दूत बनकर पहुंचने में उनका कौशल दिखाई देता है। इस काम के दौरान ही हनुमान अपनी खोई हुई शक्तियों को भी हासिल करते हैं।

राह को आसान बनाना

हो सकता है राम और लक्ष्मण अपने तरीके से सीता को खोज लेते अथवा रावण और उसकी सेना का वध कर देते, लेकिन हनुमान के प्रबंधन गुणों ने राम की राह को आसान बना दिया। जंगल में राम से मिलने के बाद उन्‍होंने बाली और सुग्रीव की लड़ाई के बारे में श्रीराम को जानकारी दी। बाली को मारने का तरीका बताया और सुग्रीव का राज्‍याभिषेक कराकर वानर सेना को साथ में लिया। इसके बाद शुरू हुआ सीता को खोजने का काम। इसके लिए दलों का गठन किया गया और हर किसी को निश्चित क्षेत्र और जिम्‍मेदारियां दे दी गई। एक स्‍मार्ट मैनेजर की तरह हनुमान ने खुद सबसे कठिन रास्‍ते का चुनाव किया और साथियों को अपेक्षाकृत सुगम रास्‍तों पर भेजा। काम में आई बाधा ने हनुमान की खोई शक्तियों को लौटा दिया। भले ही इस काम में जामवंत माध्‍यम बने, लेकिन अंतत: हनुमान ने अपनी शक्तियों को वापस पा लिया। आधुनिक प्रबंधन में भी कमोबेश यही हालात होते हैं। कठिन परिस्थिति न केवल अम्‍ल परीक्षण करती हैं, बल्कि प्रबंधक के गुणों में बढ़ोतरी भी करती हैं।

पूर्व तैयारी और त्‍वरित निर्णय

सीता की खोज के लिए रवाना होने से पूर्व हनुमान ने पूर्ण विश्‍वास किया कि उन्‍हें सीता मिल ही जाएगी। ऐसे में उन्‍होंने राम से उनकी निशानी मांगी, ताकि वे सीता को भरोसा दिला सकें कि वे राम के ही दूत हैं। बाद में अशोक वाटिका में सीता के उहापोह को उसी अंगूठी को दिखाकर हनुमान ने खत्‍म किया था। आधुनिक मैनेजमेंट में भी कमोबेश ऐसे ही विश्‍वास और पूर्व तैयारियों की जरूरत है। प्रोजेक्‍ट की शुरूआत में ही भविष्‍य में आने वाली समस्‍याओं के हल साथ लेकर चला जाए तो फंसने की आशंका कम रहती है। सीता द्वारा पर पुरुष को नहीं छूने की स्थिति को हम प्रबंधन सीमा कह सकते हैं। हनुमान चाहते तो सीता को ज्‍यों का त्‍यों उठाकर ला सकते थे, लेकिन सीता उन्‍हें छू नहीं सकती थी। ऐसे में हनुमान ने सीमाओं को माना और राम व उनकी सेना के साथ लौटने का निर्णय किया। यह हनुमान का विपरीत परिस्थिति में त्‍वरित निर्णय था।

गजब का आत्‍मविश्‍वास

अपने स्‍वामी में अगाध आस्‍था और उनके लिए कुछ भी कर गुजरने की सोच को आज भी अपनाया जा सकता है। रावण के सैनिकों द्वारा पकड़े जाने पर हनुमान ने अपना आत्‍मविश्‍वास नहीं खोया। उन्‍होंने राम के दूत के तौर पर रावण से बात की। जब रावण नहीं माना और उनकी पूंछ में आग लगा दी तो उन्‍होंने बिना शीर्ष नेतृत्‍व के संकेत का इंतजार किए अपने स्‍तर पर निर्णय किया और पूरी लंका में आग लगा दी।

दुश्‍मन के खेमे में सेंध

लंका में अपने पहले ही भ्रमण में हनुमान ने विभीषण की खोज भी की। उन्‍हें पता था कि दुश्‍मन की नगरी में श्रीराम के पक्ष का एक भी व्‍यक्ति हुआ तो युद्ध में बहुत काम आ सकता है। विभीषण ने हनुमान को अपना दुख बताया कि वे दांतों के बीच जिह्वा की तरह लंका में रह रहे हैं। यानि चारों ओर अलग विचारों और क्षमताओं वाले लोग हैं और वे खुद को वहां फंसा हुआ सा महसूस करते हैं। हनुमान ने इस स्थिति को समझा कि दुश्‍मन की नगरी में एक व्‍यक्ति को अपने पक्ष में किया जा सकता है। भले ही विभीषण पहले से श्रीराम के भक्‍त रहें हो, लेकिन लंका की अपनी पहली ही यात्रा में हनुमान ने उन्‍हें श्रीराम की सेना का हिस्‍सा बना दिया था। बाद में विभीषण ने ही राम को बताया कि रावण की नाभि में जमा अमृत कलश को नष्‍ट किए बिना रावण नहीं मर सकता।

सूक्ष्‍म और विराट रूप

हमेशा ताकत ही काम नहीं करती बल्कि समय और मांग के अनुसार अपने रूप में भी परिवर्तन करना पड़ता है। हनुमान ने ही सिखाया कि जब अपने स्‍वामी को कांफिडेंस दिलाना हो तो अपना विराट रुप दिखाना होता है और जब लंका में घुसना हो तो सूक्ष्‍म रूप भी अपनाना पड़ता है। जब जरूरत हो तो संजीवनी बूटी के लिए पूरा पहाड़ भी उठाकर लाया जा सकता है। मानव संसाधन के बदलते रूप में आज भी ऐसे कार्मिकों की जरूरत बताई जा रही है, जो संस्‍थान में हर तरह का काम कर सके। उन्‍हें अपने मूल काम के अलावा कंपनी के अन्‍य विभागों के काम की जानकारी भी होनी चाहिए। आवश्‍यकता होने पर वे संदेशवाहक अथवा मालिक के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर सकें। इसमें भी मानव संसाधन विभाग की भूमिका जामवंत की तरह महत्‍वपूर्ण हो जाती है जो हनुमान जैसे कार्मिकों को उनकी क्षमताएं याद दिलाएं।

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2009

Mangal dosh ? Astrologically it does not exist :)

मांगलिक होना विशिष्‍टता है, दोष नहीं

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आमतौर पर मांगलिक (Manglik) शब्‍द का स्‍वर घरों में तब सुनाई देता है जब कन्‍याएं शादी के योग्‍य नजर आने लगती हैं। कन्‍या मांगलिक हो तो मांगलिक लड़का ढूंढना पड़ता है और मांगलिक न हो तो भी लड़का तो ढूंढना ही पड़ता है। कई बार कुण्‍डली मिलान पर बात आकर अटक जाती है। कभी लड़की मांगलिक निकलती है तो कभी लड़का। इसके चलते कई अच्‍छे संबंध बनते-बनते रह जाते हैं। 

       जैसा कि लोगों के मुंह से सुनता हूं कि मांगलिक दोष (Dosh) होता है और इसे कन्‍या में तो होना ही नहीं चाहिए। वर में हो तो चल जाता है लेकिन कन्‍या में मांगलिक दोष वैवाहिक जीवन को खराब कर देता है। मैं खुद भी इस थ्‍योरी को मानता हूं। इसलिए नहीं कि मैं पुरातनपंथी हूं बल्कि इसलिए कि मैं कल्‍पना कर सकता हूं कि एक मांगलिक लड़की की एक गैर मांगलिक लड़के साथ शादी कर दी जाए तो कन्‍या, वर पर हर तरह से हावी रहेगी। 

                   अब अगर ऐसा होता है तो वैवाहिक जीवन (Married life) तो खराब होना ही है। इसके विपरीत वर मांगलिक हो और कन्‍या मांगलिक न हो तो वर हावी रहेगा और वैवाहिक जीवन ठीक चलता रहेगा। हो सकता है भारतीय सभ्‍यता की यह पुराने समय में तो ठीक रही होगी लेकिन आज के परिपेक्ष्‍य में देखा जाए तो पति और पत्‍नी (Husband and wife) दोनों ही बराबरी के हकदार हैं। सो या तो दोनों ही मांगलिक हों या दोनों ही गैर मांगलिक। 

                  इसमें अर्थ इतना ही है कि आपस की लय (Harmony) बनी रहे। क्‍या जरूरत है कि रिश्‍ते में एक पक्ष हावी रहे। हो सकता है कुण्‍डली मिलान करने वाले बहुत से ज्‍योतिषियों (Astrologers) को इस हार्मोनी के बारे में जानकारी न हो लेकिन वे इस आधार पर बन रहे बेमेल जोड़े को जाने-अनजाने रोकने की कोशिश करते हैं। गंभीरता के कुण्‍डली मिलान कराने वाले अधिकांश परिवारों में इस कारण तलाक (Divorce) के मामले भी बहुत कम होते हैं। 

अब दूसरा पक्ष यानि मांगलिक होने का अर्थ क्‍या है ? 

कोई जातक चाहे वह स्‍त्री हो या पुरुष उसके मांगलिक होने का अर्थ है कि उसकी कुण्‍डली में मंगल (Mars) अपनी प्रभावी स्थिति में है। शादी के लिए मंगल को जिन स्‍थानों पर देखा जाता है वे लग्‍न, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव हैं। इनमें से केवल आठवां और बारहवां भाव सामान्‍य तौर पर खराब माना जाता है। सामान्‍य तौर का अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में इन स्‍थानों पर बैठा मंगल भी अच्‍छे परिणाम दे सकता है। तो लग्‍न का मंगल व्‍यक्ति की व्‍यक्तित्‍व (Persona) को बहुत अधिक तीक्ष्‍ण बना देता है, चौथे का मंगल जातक को काफी कठिन पारिवारिक पृष्‍ठभूमि देता है।

                  सातवें स्‍थान का मंगल जातक को साथी या सहयोगी के प्रति कठोर बनाता है। आठवें और बारहवें स्‍थान का मंगल आयु और शारीरिक क्षमताओं (Physical capabilities) को प्रभावित करता है। इन स्‍थानों पर बैठा मंगल यदि अच्‍छे प्रभाव में है तो जातक के व्‍यवहार में मंगल के अच्‍छे गुण आएंगे और खराब प्रभाव होने पर खराब गुण आएंगे। जैसे एक आला दर्जे का सर्जन भी मांगलिक हो सकता है और एक डाकू भी। यह बहुत सामान्‍य उदाहरण है। यही स्थिति उच्‍च स्‍तरीय मैनेजर और सेना के अधिकारी में भी देखी जा सकती है जिसे कि कठोर निर्णय लेने हैं। 

               मांगलिक व्‍यक्ति देखने में ललासी वाले मुख का (Reddish), कठोर निर्णय लेने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, लगातार काम करने वाला, विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होने वाला, प्‍लान (Plan) बनाकर काम करने वाला, कठोर अनुशासन बनाने और उसे फॉलो करने वाला, एक बार जिस काम में जुटे उसे अंत तक करने वाला, नए अनजाने कामों को शीघ्रता से हाथ में लेने वाला और लड़ाई से नहीं घबराने वाला (Fearless warrior) होता है। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण गैर मांगलिक व्‍यक्ति अधिक देर तक मांगलिक के सानिध्‍य में नहीं रह पाता। 

                  इन विशेषताओं और इसी के कारण पैदा हुई बाध्‍यताओं के कारण एक मांगलिक व्‍यक्ति की गैर मांगलिक से निभ नहीं पाती है। इस कारण दोनों को अलग-अलग करने की कोशिश की जाती है। सेना में प्रवेश लेने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी कारण से मांगलिक असर वाले होते हैं। आपने भी गौर किया होगा कि सिविलियन्‍स से सेना को अलग रखा जाता है। कमोबेश इसका कारण यह भी होता है कि जिस डिसिप्लिन को सेना फॉलो करती है उसे आम आदमी समझ नहीं सकता और आम आदमी की गतिविधियों को सेना का जवान समझ नहीं पाता। 

तार्किक क्षमताएं (Logiacal approach)

मांगलिक लोगों की यह एक और बड़ी खासियत होती है कि उनकी किसी भी काम के प्रति बहत लॉजिकल एप्रोच होती है। दुनियादारी में या प्रेम में दो और दो पांच हो सकते हैं लेकिन एक मांगलिक व्‍यक्ति के लिए दो और दो चार ही होंगे। प्‍यार (Love) में भी। इसी कारण किसी कुण्‍डली में मंगल और शुक्र (Venus) की युति जातक को गणितज्ञ भी बना देती है। इसमें लॉजिक और लॉजिक के साथ लग्‍जरी का भाव होता है। 

               आपको ऐसे लोगों का समूह सिलिकॉन वैली (Silicon velly) में दिखाई दे सकता है। ऑस्‍ट्रेलियाई चिंतक एलन पीज (Alen pease) की मानूं तो पुरुष स्त्रियों की तुलना में अधिक लॉजिकल होते हैं। मुझे भी यही लगता है। इसी कारण सिलिकॉन वैली में शादियों की औसत आयु चार वर्ष है। सौ प्रतिशत लॉजिकल पुरुषों और लॉजिक के साथ कॉम्‍प्रोमाइज करने वाली स्त्रियों की अधिक दिनों तक बन नही पाती।

और आखिर में हनुमान चालीसा.. मांगलिक लोगों को यह सहज रूप से प्रिय होती है।