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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिषीय उपचार में रत्‍नों की भूमिका

किसी के भाग्‍य में सुधार या दुर्भाग्‍य से बचाने में रत्‍नों की भूमिका को विशेष महत्‍व दिया गया है। इतिहास की पुस्‍तकों में बताया गया है कि मोहनजोदड़ो और कालीबंगा की खुदाई के दौरान वहां भारी संख्‍या में गोमेद पाए गए। किसी प्राचीन सभ्‍यता में इस प्रकार के रत्‍नों की उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्ताओं के लिए भी कम आश्‍चर्य का कारण नहीं रही होगी। अपने समय के महानगर रहे इन दो प्राचीन शहरों में इस प्रकार के रत्‍न मिलने का अब तक कोई ऐतिहासिक कारण स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है, लेकिन वर्तमान में उपलब्‍ध अधिकांश ज्‍योतिष संबंधी पुस्‍तकें यह बताती हैं कि गोमेद राहू के उपचार के लिए है।

प्राचीन काल के इस सूत्र से आगे बढ़ें तो देखते हैं कि एक तरफ रंगों के रूप में मुगलकाल में रंगीन कांचों का उपयोग हुआ तो दूसरी ओर गणित से फलित की ओर झुक रही ज्‍योतिष में रत्‍नों की भूमिका बढ़ती गई। प्राचीन शास्‍त्रों में ग्रहों के रुष्‍ट हो जाने अथवा विपरीत प्रभाव देने की स्थिति में दान और शांति के उपायों का वर्णन है, बाद में रत्‍नों के जरिए उपाय किए जाने लगे। इन रत्‍नों का इस्‍तेमाल कब और कैसे किए जाए, इस बारे में कई तरह की अवधारणाएं हैं।

अपेक्षाकृत पुरानी पद्धतियां जहां लग्‍नेश और भाग्‍येश से संबंधित रत्‍नों को पहनाने और मारक व बाधकास्‍थानाधिकपति से संबंधित रत्‍नों से परहेज रखने की सलाह देती है, वहीं लाल किताब और सुनहरी किताब जैसी पद्धतियां वर्षफल कुण्‍डली और ग्रहों के शुभत्‍व के लाभ को ध्‍यान में रखते हुए रत्‍न पहनने की सलाह देने लगी। इसी के साथ के शरीर के छूने, उनके पहनने के स्‍थान, वि‍शिष्‍ट अंगुलियों और वजन तक को लेकर कई तरह के विश्‍लेषण आए हैं। दूसरी ओर रत्‍न परीक्षण का काम भी तेजी से बढ़ा है।

हर ग्रह से विशेष तरह का रत्‍न जुड़ा हुआ है। केतू से लहसुनिया, शुक्र से हीरा, सूर्य से माणिक्‍य, चंद्रमा से मोती, मंगल से मूंगा, राहू से गोमेद, गुरु से पुखराज, शनि से नीलम और बुध से पन्‍ना। यह प्रमुख रत्‍न हैं। इसके बाद इनके उपरत्‍न भी बाजार में आए हैं जो मूल रत्‍नों की तुलना में बहुत सस्‍ते हैं। सभी धारणाओं के इतर यह स्‍पष्‍ट है कि रत्‍न हमारे जीवन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। आप जानिए पाराशर से अपने शुभ रत्‍न के बारे में... इसके लिए अगस्‍त माह में केवल 500 रुपए फीस लगेगी। पाराशर समूह रत्‍न बेचने के काम से नहीं जुड़ा है, यहां केवल आपके लिए शुभ रत्‍न के बारे में जानकारी दी जाएगी और उसका आपके जीवन में प्रभाव बताया जाएगा।

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उपायों का असर

ज्‍योतिष में उपायों के असर पर सालों से मंथन चल रहा है। एक ओर जहां भाग्‍य को पूर्व नियत मानकर बहुत से ज्‍योतिषियों ने उपायों को सिरे से खारिज कर दिया है, वहीं वैदिक ज्‍योतिष से लाल किताब तक हर स्‍तर पर उपायों की चर्चा की गई है। अगर तंत्र वाले हिस्‍से को छोड़ दिया जाए तो हम देखते हैं कि उपाय को फलित ज्‍योतिष के एक भाग के रूप में स्‍वीकार किया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि क्‍या उपायों का असर होता है। अब तक के मेरे अभ्‍यास में मैंने देखा है कि उपायों का असर होता है। अब भले ही यह प्रारब्ध में ही क्‍यों न बंधा हो। जातक का ज्‍योतिषी के पास आना, ज्‍योतिषी का उपाय बताना और उस उपाय का लागू होना तक प्रारब्‍ध का हिस्‍सा हो सकता है। मैं उपचार बताता हूं और जातक को इसका लाभ दिखाई देता है, मैं इसका अर्थ लगाता हूं कि उपचार प्रभावी होते हैं। ज्‍योतिष सीखने के शुरूआती दौर में मैंने खुद ने कई रत्‍नों और लाल किताब के उपचारों को अपनाया। भले ही अपेक्षित परिणाम नहीं आया, लेकिन अवस्‍था और मानसिकता में भारी अंतर महसूस किया।

पहला असर मानसिकता पर

उपायों का पहला असर मैं जातक की मानसिकता पर देखता हूं। इसका एक कारण यह भी है कि जिन जातकों ने एक ज्‍योतिषी के तौर पर मुझे मान्‍यता दी और मेरे बताए उपचारों को पूरी श्रद्धा के साथ किया उन्‍हें तुरंत और अच्‍छे परिणाम हासिल हुए। कई बार तो इतने जल्‍दी कि मुझे खुद भी आश्‍चर्य हुआ। मैं किसी भी जातक को उपचार बताने के साथ एक तय अवधि भी देता हूं, जिसमें उस उपचार का लाभ न होने पर उपचार बंद करने की नसीहत शामिल होती है। तय तिथि से पहले उपचार का असर मिलना हर बार मेरे लिए सुखद अनुभूति होती है। अगर ज्‍योतिष यह कहती है कि जो भाग्‍य में लिखा है वह होकर रहेगा, तो इसी विषय ने यह भी सिखाया है कि जो कुछ पहले से बदा है उसके प्रभाव में कमी या बढ़ोतरी करना संभव है। अब यह कमी या बढ़ोतरी कितनी और कैसे होती है, इस बारे में कहीं स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है। संभवत: यह जातक की श्रद्धा और प्रयासों पर भी निर्भर करता है। ऐसे में ज्‍योतिषी की भूमिका कुछ कम हो जाती है।

उपचार ही नहीं कर पाते

ऐसा नहीं है कि एक जातक ज्‍योतिषी के पास जाए, उससे उपचार के बारे में जानकारी ले और वापस आकर उपचार कर ले और आगत समस्‍याओं से बच जाए। कई बार उपचार बता देने के बाद भी जातक उपचार नहीं कर पाते हैं। ऐसा नहीं है कि जातक के मन में श्रद्धा नहीं है अथवा जातक उपचार करना नहीं चाहता, लेकिन उपचार करने में विफल रहने वाले अधिकांश जातक लौटकर बताते हैं कि घटनाओं का चक्र कुछ इस तरह चला कि वे उपचार कर नहीं पाए। वैदिक ज्‍योतिष में जहां केवल दान, पूजा और जप वाले ही उपचार थे, वहीं लाल किताब और सुनहरी किताबों में ऐसे सरल और वैकल्पिक उपाय बताए गए हैं जो हर कोई आसानी से कर सकता है। इसके लिए अधिक प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। इसके बावजूद जातक उपाय नहीं कर पाते हैं।

कहां से क्‍या उपचार

वैदिक ज्‍योतिष में उपचार के लिए दान और जप के उपचार बताए गए हैं। सूर्य के लिए सूर्य, बुध के गणेश, गुरु के लिए सरस्‍वती, शुक्र के लिए देवी उपासना, शनि के लिए शनि महाराज, मंगल के लिए हनुमानजी और चंद्रमा के लिए शिव आराधना के उपचार बताए गए हैं। इससे खराब ग्रहों का प्रभाव कम होता है और अच्‍छे ग्रहों का प्रभाव बढ़ता है। दूसरी ओर दान के लिए ग्रहों से संबंधित वस्‍तुओं का दान करने से खराब प्रभाव का असर कम हो जाता है। अच्‍छे ग्रहों से संबंधित रत्‍नों और वस्‍तुओं को धारण करने की सलाह दी जाती है। जप के संबंध में ग्रहों की युति को लेकर भी देवताओं और अराधना के नियम तय किए गए हैं। इन्‍हें करने से शीघ्र लाभ होता है।

 

अगले लेख में हम उपचारों के संबंध में लाल किताब की भूमिका पर बात करेंगे। हालांकि लाल किताब को ज्‍योतिष की मुख्‍य ध्‍यारा से अलग माना गया है, लेकिन फिर भी उपचारों के मामले में लाल किताब की कोई तुलना नहीं है।

बुधवार, अक्टूबर 19, 2011

आपका खुद का विजयोत्‍सव

गुणपूजक भारतीय मान्‍यता में गुणों की ही विजय हुई है और अवगुणों का नाश हुआ है। राम द्वारा रावण का वध और कृष्‍ण द्वारा कंस का वध जैसे उदाहरण भी भारतीय मान्‍यता में मिलते हैं, लेकिन तब भी हमें केवल यही संकेत दिया जाता है कि धर्म की अधर्म पर या असत्‍य पर सत्‍य की विजय हुई है, न कि किसी एक व्‍यक्ति की दूसरे व्‍यक्ति पर। बुराई को खत्‍म करने का प्रयास किया जाता है न कि बुरे व्‍यक्ति को। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में कृष्‍ण ने जब अर्जुन को मित्रों और शत्रुओं का ज्ञान दिया तो उसकी एक टीका यह भी है कि कौरव और पाण्‍डव हमारे भीतर के अच्‍छाई और बुराई के प्रतीक हैं और हम अपनी इच्‍छाशक्ति से ही अच्‍छाई का पोषण कर बुराई को खत्‍म कर सकते हैं। इसके लिए किसी प्रकार की आसक्ति या विरक्ति के भाव को आड़े नहीं आने देना चाहिए।

ज्‍योतिष के दृष्टिकोण से विजय को लाभ और आत्‍मोन्‍नति से जोड़कर देखा जाता है। कुण्‍डली का छठा भाव शत्रुओं का और बारहवां भाव हानि का बताया गया है। किसी कार्य में विजय के लिए हमारे भीतर की ताकत पर्याप्‍त होनी चाहिए, यह लग्‍न से देखी जाएगी। हमारे भीतर का साहस तीसरे भाव से देखा जाएगा और हमारी प्राप्‍त करने की इच्‍छाशक्ति ग्‍यारहवें भाव से देखी जाएगी। इसके साथ ही कुण्‍डली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होनी चाहिए। किसी कार्य को शुरू करने में हमें पहले उसका सपना देखना होगा। इसके लिए चंद्रमा हमारा सहयोग करता है। इसके बाद कार्य को शुरू करने का निश्‍चय करने के लिए लग्‍न हमारी मदद करता है। तीसरा भाव में हमें आगे बढ़ने का साहस देता है और ग्‍यारहवां भाव हमारे इच्छित साधन की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्‍त करता है। ये सभी कार्यों में सफलता या विफलता हमारे दसवें भाव यानी कर्म पर आधारित होती है। इनमें से किसी भी एक भाव के पर्याप्‍त सुदृढ़ नहीं होने की स्थिति में हमें कई बार विफलता भी झेलनी पड़ती है। चंद्रमा कमजोर होने पर हमारी कल्‍पना और सोचने की शक्ति हमारा साथ नहीं देती, लग्‍न कमजोर होने पर कार्य शुरू करने का निर्णय नहीं जुटा पाते, तीसरा भाव कमजोर होने पर हम निर्णय लेने के बाद भी कार्य संपादन शुरू नहीं कर पाते, दसवां भाव कमजोर होने पर हमारे प्रयासों में कमी रहती है और ग्‍यारहवां भाव कमजोर होने पर हम इच्छित फल प्राप्‍त करने से वंचित रह सकते हैं। हालांकि लाभ-हानि, यश-अपयश और जय-पराजय छह ऐसे विषय हैं जिनका अंतिम निर्णय ईश्‍वर ने अपने पास सुरक्षित रखा है, लेकिन लग्‍न से दसवें भाव तक के कार्य हमारे हाथ में है। इस बीच हमारी समस्‍याएं, चिंताएं और शत्रु हमारे कार्य में बाधा उत्‍पन्‍न करते हैं।

छठे भाव से आती है समस्‍याएं

कार्य को संपादित करने के दौरान हमारे समक्ष कई बार समस्‍याएं भी आती हैं। इन समस्‍याओं को कुण्‍डली के छठे भाव से देखा जाता है। कुंडली के छठे घर के बलवान होने से तथा किसी विशेष शुभ ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में अधिकतर समय अपने शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है। उसके शत्रु अथवा प्रतिद्वंदी उसे कोई विशेष नुकसान पहुंचाने में आम तौर पर सक्षम नहीं होते। कुंडली के छठे घर के बलहीन होने से अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में बार-बार शत्रुओं तथा प्रतिद्वंदियों के द्वारा नुकसान उठाता है तथा ऐसे व्यक्ति के शत्रु आम तौर पर बहुत ताकतवर होते हैं। कुल मिलाकर हमारी जो कमजोरियां हैं, वे सभी छठे भाव से देखी जाएंगी और इसी घर से आठवें भाव यानी लग्‍न से हम अपनी क्षमताओं, विशेषताओं, अंदरूनी ताकत के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। अगर किसी जातक का लग्‍न बहुत अधिक शक्तिशाली हो तो हम किसी भी स्‍तर के शत्रुओं से मुकाबला कर सकते हैं।

लग्‍न के अनुसार शत्रु

हर लग्‍न की अपनी खासियत और कमियां होती हैं। मेष लग्‍न के जातक उग्र होते हैं और एक ही बार में कार्य का संपादन पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। एक ही कार्य को बार बार नहीं कर पाने की बाध्‍यता उनकी कमजोरी है। इसे हम कुण्‍डली में भी देख सकते हैं कि मेष लग्‍न में रिपु भाव का अधिपति बुध है। इसी प्रकार वृष लग्‍न के जातक कुछ विलासी और आरामपसंद होते हैं। यही उनके लग्‍न की विशेषता है और यही उनकी कमजोरी भी। हम देखते हैं कि वृष लग्‍न में शुक्र ही शत्रु भाव का अधिपति है। मिथुन लग्‍न के जातकों की खासियत समस्‍या को हल्‍के में लेने और जिंदगी को सामान्‍य ढंग से लेने में है। मेष लग्‍न में कठिन परिस्थितियों से लड़ना सिखाने वाला मंगल शत्रु भाव का अधिपति है। कर्क राशि जलतत्‍वीय राशि है और एक विचार पर अधिक देर तक काम नहीं कर सकने वालों की है। कर्क लग्‍न के लिए गुरु जो कतिपय अधिक स्थिर और दुनिया को साथ लेकर चलने वाला ग्रह है शत्रु भाव का अधिपति बनता है। सिंह राशि के जातक स्‍वभाव से तेज और गर्वीले होते हैं। सिंह के शत्रु भाव का अधिपति शनि है जो धीमा चलता है और बहुत अधिक सोच विचार कर अपना निर्णय करता है। कन्‍या राशि के लोग बहुत अधिक बोलने वाले और आवश्‍यकता से अधिक विश्‍लेषण करने वाले होते हैं। इस लग्‍न के अधिपति को भी शनि जैसा न्‍यायप्रिय शत्रु मिलता है। धनु लग्‍न के जातक सौम्‍य और पढ़े लिखे दिखाई देते हैं और सादगी से जिंदगी जीने का प्रयास करते हैं। इनके शत्रुओं के रूप में हम शुक्र से चलित लोगों को देख सकते हैं। मकर राशि के लोग अपेक्षाकृत दढ़ और धीमे होते हैं। अपनी जबान पर कायम नहीं रह सकने वाले बुध के लोग इस लग्‍न के शत्रु होते हैं। कुंभ राशि के जातक एक ही काम में दीर्ध अवधि तक लगे रहने वाले और दृढ़ होते हैं, इनका शत्रु चंद्रमा होता है जो किसी एक काम में अधिक लंबे समय तक नहीं टिकता। मीन राशि को जातक अपेक्षाकृत सादी जिंदगी जीने वाले होते हैं, इनके शत्रु भाव का स्‍वामी सूर्य है। इस तरह हम देखते हैं कि हर लग्‍न की अपनी खासियत होती है, इसी के संदर्भ में उनके शत्रुओं की भी अपनी प्रकृति होती है। अगर एक जातक अपनी नैसर्गिक प्रकृति को मजबूत करता रहे तो शत्रु की प्रकृति अपने आप कमजोर होती जाएगी।

मंगलवार, अप्रैल 07, 2009

कर्म बड़ा या भाग्‍य?

जब से ज्‍योतिष विषय का झण्‍डा उठाया तब से मेरे आस-पास के अधिकांश विचारकों ने यह सवाल हमेशा मेरे सामने खड़ा किया कि क्‍या आवश्‍यकता है ज्‍योतिष की जबकि लॉजिक यह कहता है कि जैसा कर्म करोगे वैसे ही फल मिलेंगे। इसके साथ ही दूसरा सवाल यह कि जब सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो तुम्‍हारा रोल शुरू होने से पहले ही खत्‍म हो जाता है।

दोनों की बातें मेरे इस पेशे को खत्‍म कर देने वाली थीं। लेकिन केवल उन्‍हीं लोगों के समक्ष जो कि इन बातों को इसी अंदाज में समझ चुके थे। बाकी लोगों को अब भी लगता है कि उनकी समस्‍याओं का समाधान मेरे पास है। फिर भी एक विद्यार्थी होने के नाते यह सवाल मेरे सामने बड़ी स्‍पष्‍टता से रहा कि कर्म ही हमारी कुण्‍डली है या भाग्‍य पहले से लिखा जा चुका है। अगर भाग्‍य पहले से तय नहीं है तो क्‍या कर्म से कुण्‍डली को बदला जा सकता है।

इसी क्रम में पिछले दिनों कुरुक्षेत्र के हितेश शर्माजी ने एक बार फिर मुझसे यही सवाल दोहराया कि

'Kya Bhagya vaastav mein he karm se bada hota hai aur kya jyotis se bhagya ko badla ja sakta hai.'

इस सवाल का स्‍पष्‍ट जवाब है पता नहीं।

तो मैं यहां क्‍या कर रहा हूं। इसके जवाब में मैं यह कह सकता हूं कि जो लोग अपने कर्म से भाग्‍य को बदलने की सोच रहे हैं मैं उनकी मदद कर रहा हूं। एक ज्‍योतिषी किसी जातक की क्‍या मदद कर सकता है इसका बहुत सटीक वर्णन दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णामूर्ति अपनी पुस्‍तक फंडामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी में कर चुके हैं। उनके अनुसार नदी में नाव खेते हुए जब एक नाविक किनारा नहीं मिलने पर हारने लगता है तो उसके पास से गुजर रहा एक अन्‍य नाविक उसे बताता है कि आगे इतनी दूरी पर उथला किनारा या जमीन मिल जाएगी। दूसरा नाविक ज्‍योतिषी हो सकता है।

मुझे भी अधिकांश मामलों में अपना रोल ऐसा ही लगता है। जिसे जो भोगना है वह तो भागेगा ही, लेकिन यह भोग कब खत्‍म होगा या कैसे मुक्ति मिल सकती है इस बारे में मैं संकेत मात्र दे सकता हूं। न तो किसी और का दुर्भाग्‍य जी सकता हूं न ही किसी को मोक्ष दिला सकता हूं।

गुरुवार, अप्रैल 02, 2009

घोड़े की नाल और तीन दुर्घटनाएं

यह किस्‍सा अधिक पुराना नहीं है। मेरे मामाजी जो जयपुर में रहते हैं ने एक दिन मुझे फोन किया और बताया कि उन्‍हें आज घोड़े की नाल रास्‍ते में पड़ी मिली है। उन्‍हें उसे अपने पास रखनी चाहिए या नहीं। मैं कहीं रास्‍ते में था सो किनारे रुका और सोचकर बताया कि चूंकि आपकी कुण्‍डली तुला लग्‍न की है और शनि पंचम भाव में अपनी राशि में बैठा है तो आपकी कुण्‍डली का कारक ग्रह भी शनि ही हुआ। रास्‍ते में घोड़े की नाल मिली है तो आपके काम की ही होगी, इसलिए यह आपको रख ही लेनी चाहिए। 

मैं उन्‍हें नाल रखने का सुझाव दिया इसके पीछे दो कारण थे। पहला तो यह कि उनकी कुण्‍डली के कारक ग्रह को यह वस्‍तु मजबूत कर सकती है। कर सकती है यानि जरूरी नहीं कि करे ही लेकिन नुकसान नहीं करेगी यह तय था। दूसरा कारण यह कि नाल मिलने के बाद मुझे पूछा है यानि वे रखने का मूड बना चुके हैं। चूंकि अब नाल उनकी आस्‍था से जुड़ चुकी थी सो मैंने उन्‍हें रखने की सलाह दी। अगर नहीं रखनी होती तो वे उसे सड़क पर पड़ी देखकर ही आगे निकल जाते और उठा भी लेते तो वापस फेंक देते। अब तक वे उसे उठा भी चुके थे और उसके बारे में कुछ सोच भी चुके थे। यानि चेतना का एक हिस्‍सा उस नाल से जुड़ चुका था। अब इसे फेंकने का मतलब था कि चेतना में से कुछ जाया करना। 

जैसे ही मैंने उन्‍हें कहा कि उन्‍हें नाल रख लेनी चाहिए उन्‍होंने कहा कि नाल मिलने के बाद पिछले पंद्रह मिनट में वे तीन दुर्घटनाओं का शिकार होते बचे हैं। एक बार बस से, एक बार कार से और आखिरी बार लहराते आ रहे स्‍कूटर ने उनको टक्‍कर मारी लेकिन वे खुद बच गए। एक के बाद एक तीन झटके लगने के बाद मामाजी कुछ हिल गए थे सो मुझे फोन किया था। 

अब मेरे सामने यह धर्मसंकट था कि मैं उन्‍हें नाल रखने के लिए कह चुका था सो मना नहीं कर सकता था और दुर्घटना की परिस्थितियां बनने की बात सुनकर मैं भी एकबारगी घबरा गया। किसी और के साथ ऐसी घटना हो तो संयत बना रहना आसान होता है लेकिन मेरे मामाजी मेरे आदर्श भी रहे हैं। सो उनके लिए इस तरह सोचना इतना आसान नहीं था। फिर भी मैंने दोबारा सोचा और निर्णय किया कि शनि की चीज तुला लग्‍न के जातक के लिए किसी भी सूरत में खराब नहीं होनी चाहिए। 

मैंने दोबारा वही उत्‍तर दोहराया कि नाल आपके लिए ठीक है आप इसे रख सकते हैं। दुर्घटनाओं की संभावना बनना संयोग हो सकता है। अब मामाजी भी कांफिडेंस में आ चुके थे। उन्‍होंने बताया कि उनके एक सहयोगी उनके साथ ही थे। और वे लगातार नाल को फेंकने के लिए जोर दे रहे थे। मेरे जवाब के बाद मामाजी ने उन्‍हें जवाब दिया कि हो सकता है कि आज होने वाली दुर्घटनाएं पूर्व में ही तय हो और इस नाल से हम बार बार बच रहे हों। ऐसा कम ही हुआ है कि दुर्घटना की जैसी परिस्थितियां से हम गुजरे हैं उनसे लोग बचें हो। ऐसे में नाल तो हमें बचाने वाली सिद्ध हो रही है। 

अब बात उनके सहयोगी को भी समझ में आ गई। पिछले दिनों जयपुर गया तो नाल उनके पूजाघर में रखी हुई दिखाई दी। 


इस घटना से एक सबक पक्‍का हो गया कि परिस्थितियों को देखने का हमारा अंदाज हमारे अच्‍छे और बुरे समय को बुलाता है।  आप भी घटनाओं को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखेंगे तो आप पाएंगे कि जिसे आप खराब समय बता रहे हैं उस दौरान सीखने के अवसर अधिक आ रहे हैं। 

मंगलवार, मार्च 24, 2009

हर क्षण अपने आप में पूर्ण है

एक बालक जन्‍म लेता है तो अपने साथ उम्‍मीदों के पंख ले आता है। संतान से माता पिता और ‍अन्‍य परिजनों की क्‍या इच्‍छाएं पूरी हो सकती है यह जानने के लिए बच्‍चे की जन्‍म कुण्‍डली बनाई जाती है। वास्‍तव में जन्‍म के समय बनी कुण्‍डली उस समय की तात्‍कालिक गोचर स्थिति की फोटो होती है। यानि जन्‍म कुण्‍डली बताती है कि जब जातक पैदा हुआ तो आसमानी पिण्‍ड फलां कहानी बयां कर रहे थे। 
अब बच्‍चा जैसे जैसे बड़ा होता है माता पिता उसे संस्‍कार देते हैं और उसकी भलाई के लिए कई जतन करते हैं। कभी गण्‍डा ताबीज बांधते हैं तो कभी उसके हाथ से दान कराते हैं। कई बड़े ज्‍योतिषियों ने कमोबेश कहा है कि भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता। मैं खुद भी इसे मानता हूं। लेकिन भाग्‍य का भोग कम या अधिक तीव्र किया जा सकता है। एक व्‍यक्ति जिसे कार चलाने का योग हो वह अपना भाग्‍य मारुति 800 से बढ़ाकर मर्सडीज तक ले जा सकता है। योग तो बड़े वाहन का ही रहा। इस तरह कभी कर्म तो कभी आस्‍था। भाग्‍य को प्रभावित करते रहते हैं। बच्‍चा अब युवा हो गया या युवावस्‍था से अधेड़ हो रहा है। तब तक वह खुद की और आस-पास के लोगों की जिंदगी में कई  प्रभावी परिवर्तन कर चुका होता है। 
प्‍वाइंट यह है कि किसी चालीस साल के आदमी की जन्‍म कुण्‍डली देखकर यह बताया जाए कि आने वाले दिनों में आपके साथ अमुक घटना होने वाली है तो मेरा अनुमान है कि 80 प्रतिशत लफ्फाजी के साथ यह फलादेश दुरुस्‍त निकलेगा। शेष बीस प्रतिशत भाग भी गणित का ही रहेगा। इसी के साथ जातक का जन्‍म समय कौनसा माना जाए इस पर भी अभी विवाद जारी है। ऐसे में किसी प्रश्‍न का सही जवाब लेना हो तो किस प्रकार लग्‍न कुण्‍डली पर निर्भर रहा जा सकता है। 
क्‍या है प्रश्‍न कुण्‍डली
वास्‍तव में तात्‍कालिक गोचर की फोटो प्रश्‍न कुण्‍डली है। अब  इसका उपयोग क्‍या है। ऐसा माना जाता है कि जिस तरह जातक का जन्‍म होने पर उस समय का तात्‍कालिक गोचर जन्‍म लग्‍न कुण्‍डली बनकर उसके भविष्‍य के बारे में बता सकता है वैसे ही किसी भी प्रश्‍न का भविष्‍य पूछे गए समय की गोचर स्थिति से बताया जा सकता है। प्रश्‍न कुण्‍डली वास्‍तव में प्रश्‍न का भविष्‍य कथन है। मेरा मानना है कि यह ऊटपटांग समय लेकर बनी जन्‍म कुण्‍डली से अधिक सटीक होता है। क्‍योंकि आज का समय आज से बीस तीस या पचास साल पहले से अधिक हमारे कंट्रोल में है। 

मंगलवार, फ़रवरी 24, 2009

संकेतों का ज्‍योतिषीय संदर्भ

पूर्व में अपने दो या तीन लेखों में अलग अलग तरीके से संकेतों की चर्चा कर चुका हूं। इस बार सीधे संकेत पर ही चर्चा करनी पड़ेगी। लेख के शुरू में ही मैं बता देना चाहता हूं कि मैं संकेतों का विशेषज्ञ नहीं हूं। हालांकि मेरी कुण्‍डली के योग और वंशक्रम में पाराशर गोत्र का होने के कारण मुझे विरासत में संकेतों को समझने की नेमत मिली है। इन्‍हें समझ लेना और इनका विशेषज्ञ होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मेरे लेख को पढ़ने वाले गुणीजनों में कोई विशेषज्ञ भी हो तो मेरा आग्रह है कि वे मेरा मार्गदर्शन करें। अब भगवान गणेश को नमन करते हुए मैं अपनी बात रखता हूं।

संकेतों से मेरा परिचय कब का है पता नहीं लेकिन जब ज्‍योतिष सीखी तो इसे समझने का क्रम भी शुरू हुआ। गुरूजी प्रदीप पणियाजी ने मुझे बताया कि मैं अपनी विशेषता का कैसे इस्‍तेमाल कर सकता हूं। इसके लिए पहले जरूरत है ओमेन को समझने की। हमारे चारों ओर का वातावरण हम पर और हम अपने वातावरण पर नियमित रूप से प्रभाव डालते हैं। भले ही हम इसके लिए सक्रिय रूप से सोच रहे हों या नहीं। यह देखने में ऐसी बात लगती है जैसा कि चण्‍डूछाप तांत्रिक कहते हैं या फिर बहुत सिद्ध योगी। ईश्‍वर ने किसी भी एक को विशेषाधिकार देकर नहीं भेजा है। उसकी नजर में सब बराबर हैं। हां कभी कभार लगता है कि वह खुद तक एप्रोच बनाने के रास्‍ते सभी को अलग-अलग देता है। कोई बात नहीं पहुंचेंगे तो वहीं। तो जब ईश्‍वर ने सभी को एक जैसी शक्तियां दी हैं तो हर कोई उसे इस्‍तेमाल भी कर सकता है, निर्भर करता है कि अपनी सोई शक्तियों को जगाने के लिए हमने कितना प्रयास किया।

चाहे हेमवंता नेमासा काटवे हों या के.एस. कृष्‍णामूर्ति सभी यही कहते हैं कि जब हम अपने आस-पास के वातावरण के प्रति संवेदनशीलता खो देते हैं तो आगामी घटनाओं की जानकारी लेने के लिए ज्‍योतिष का सहारा लेना पड़ता है। कई साल ज्‍योतिष के साथ जुड़े रहने के बाद अब यह बात समझ में आने लगी है। कैसे हम घटनाओं और वस्‍तुओं के साथ तारतम्‍य बना लेते हैं और कैसे पूर्व की घटनाएं, वस्‍तुएं और अन्‍य संकेत आने वाले समय की सूचना देने लगते हैं।

एक उदाहरण देना चाहूंगा। यह मेरा सुना हुआ है। हो सकता है इसमें अतिरंजना हो लेकिन समझने के लिए अच्‍छा है। सामान्‍य बातें धीरे-धीरे समझ में आती है और अतिरंजना बड़ी तस्‍वीर का काम करती है।

एक वणिक था। उसे एक पंडित ने कहा कि रोजाना किसी ने किसी भूखे या अतृप्‍त को भोजन कराओगे तो तुम्‍हारा व्‍यवसाय दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। वणिक ने भोजन कराना शुरू भी कर दिया। कुछ दिन में उसका व्‍यवसाय फलने फूलने लगा। एक दिन ऐसा हुआ कि उसे सुबह से दोपहर तक कोई अतृप्‍त नहीं मिला। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है लेकिन नहीं मिला। सो वह ढूंढता हुआ पहाड़ी की ओर निकल गया। वहां एक सांड जैसा आदमी सोया हुआ दिखा। उसके होठों पर भी पपड़ी जमी हुई थी। वणिक ने सोचा यही सही व्‍यक्ति है। उसने पालकी मंगवाई और उस बलिष्‍ठ दिखने वाले व्‍यक्ति को घर ले आया। उसे पानी पिलाकर होश में लाया और भरपेट खाना खिलाया। थोड़ी ही बातचीत में पता चल गया कि वह शरीर से तो तंदुरुस्‍त है लेकिन अकल से गूंगा है। जैसे ही उस आदमी ने खाना खाया उसे जोश आ गया। खाना खिलाने के बाद वणिक ने तो उस आदमी को विदा कर दिया लेकिन रास्‍ते में उस मेंटली रिटार्टेड आदमी ने सड़क पर पड़ा लठ्ठ लेकर एक गाय पर भीषण प्रहार किया। इस प्रहार से गाय की मौत हो गई। उधर गाय मरी और इधर वणिक की हालत खराब होने लगी। एक जहाज विदेश से माल लेकर आ रहा था वह पानी में डूब गया। राजा ने शास्ति लगा दी। व्‍यापार में घाटा आने लगा। अब वणिक भागा वापस ज्‍योतिषी के पास। ज्‍योतिषी से पूछा कि आपके बताए अनुसार उपचार किए लेकिन मेरी तो हालत खराब हो रही है। कहां चूक हुई। ज्‍योतिषी ने पिछले कुछ दिनों का हाल पूछा और पता लगाने की कोशिश की कि कहां गड़बड़ हुई है। काफी देर की कसरत के बाद पता लगा लिया गया कि गाय की मौत का ठीकरा वणिक के सिर फूटा है। इसके दो कारण हैं। गाय को मारते वक्‍त उस आदमी के पेट में वणिक का अन्‍न था। तो उस आदमी के सिर दोष होना चाहिए। हो भी सकता था लेकिन वह आदमी को मेंटली रिटार्टेड था सो उसे इस बात का विवेक ही नहीं था। यानि वह केवल वणिक और गाय की मौत के बीच माध्‍यम भर बना था। इसके बाद ज्‍योतिषी ने गाय की हत्‍या के कुछ उपचार वणिक को बताए। उन्‍हें करने के बाद वणिक की स्थिति वापस सुधरने लगी।

इसमें अतिरंजना तो यह हुई कि उपचारों पर ही पूरा व्‍यापार खड़ा कर दिया गया है, दूसरा यह कि गणना से यह पता लगा लिया गया कि गाय की मौत हुई है। जो भी हो कहानी है...

मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम ऐसे करते हैं जिनका मंतव्‍य अच्‍छा होता है और काम भी अच्‍छे दिखते हैं लेकिन उनके परिणाम कितनी दूरी पर जाकर क्‍या रंग लाते हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। वणिक नहीं चाहता था कि गाय की मौत हो लेकिन हुई और वणिक उसका एक बड़ा कारण बना। न वह उस आदमी को घर लेकर आता और न उसे खाना खिलाता तो गाय की मौत नहीं होती।

तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के कामों का क्‍या परिणाम निकलेगा इसका पता कैसे लगाया जाए। जैसा कि मस्तिष्‍क पर शोध करने वाले लोग कुछ साल पहले तक कहते थे कि हम अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत हिस्‍सा काम में लेते हैं, कुछ दिन पहले तक कहने लगे कि एक प्रतिशत ही काम में लेते हैं और कुछ समय पहले तो सुना कि एक प्रतिशत से भी कम काम में लेते हैं। इसीलिए मुझे विज्ञान और इसमें शोध कर रहे लोगों पर कभी पूरा भरोसा नहीं होता। खैर जो भी है...

शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन का है। वह हमारे लिए गणना करता है कि आपकी गतिविधियों, आपके व्‍यवहार, मौसम, आपके घर का सामान, आपके दोस्‍तों, उनके द्वारा बोली गई बातों, रास्‍ते में बज रहे संगीत, बस में आपकी सीट के पास बैठे व्‍यक्ति की हरकतों, पशु पक्षियों की मुद्राएं और आवाजों और हजारों संकेतों के क्‍या मायने हो सकते हैं। चूंकि हम एक विशिष्‍ट भाषा और शैली से बोलना, चलना और समझना सीखते हैं। जिंदगी के पहले पांच सालों में इसकी जबरदस्‍त ट्रेनिंग होती है। बस वही भाषा हमें आती है। बाकी संकेतों को हम उतने बेहतर तरीके से समझ नहीं पाते। एलन पीज ने अपनी पुस्‍तक बॉडी लैंग्‍वेज में इसी अवचेतन के संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। स्‍टीफन आर कोवे इसी अवचेतन को सक्रिय करने के लिए सात आदतें डालने का आग्रह करते नजर आते हैं।

अब फिर से बात करता हूं कि जिन लोगों ने भविष्‍य देखने या इंट्यूशन की प्रेक्टिस नहीं की है उन्‍हें यह सब कैसे और क्‍यों दिखाई देता है। ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण से कुण्डली का आठवां भाव और बारहवां भाव तथा राहू और कमजोर चंद्रमा हमें ऐसे दृश्‍य देखने और सोचने में सहायता करते हैं। आम चिकित्‍सक के पास जाने पर वह आपको खुद को व्‍यस्‍त रखने की सलाह देता है। अल्‍पनाजी को यह पता है। उन्‍होंने इसके अलावा कोई और उपाय हो तो बताने के लिए कहा है। ठीक है एक सवाल के साथ...

अब यहां एक और गंभीर सवाल है जो आमतौर पर नए ज्‍योतिषीयों के समक्ष आता है वह यह कि इंट्यूशन और कल्‍पना में क्‍या अन्‍तर है। मैंने अपने लेख इंट्यूशन और कल्‍पना में अन्‍तर में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की थी। इसमें मैंने कुछ हद तक स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है कि दोनों में क्‍या अन्‍तर है। कई बार हमारे भय,  चिंताएं, विचारों की शृंखला, भीषण घटनाएं हमारे दिमाग में अनिष्‍ट या ईष्‍ट की इच्‍छा के बुलबुले बनाने लगते हैं। नए ज्‍योतिषियों के साथ तो ऐसा होता है कि वे जातक की आर्थिक स्‍िथति और पर्सनेलिटी तक से प्रभावित हो जाते हैं और उसके सुखद या दुखद भविष्‍य की कल्‍पना कर बैठते हैं। वे इतने जोश में होते हैं कि उसी कल्‍पना को इंट्यूशन समझकर फलादेश भी ठोंक देते हैं। जब जातक लौटकर आता है तो शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है।

इसी दौरान एक और बात आई वह थी एक ही अंक का बार बार दिखना। अखिल तिवारी जी कहते हैं कि पिछले कई सालों से एक विशेष समय को कभी घड़ी, कभी मोबाइल. कभी कंप्यूटर तो कभी कही भी, दीवाल पे, नही तो सामने जाती हुई गाड़ी के नम्बर पर.. एक विशेष combination (12:22) रोज दीखता है.  हम किसी भी दो संयोगों को मिलाकर चार कर सकते हैं। और जब तक दो और दो चार होते रहें तब तक तो ठीक है लेकिन कई बार यही दो और दो पांच दिखने लगे तो कठिनाई आती है। अब इसी उदाहरण की बात की जाए तो मैं सोच सकता हूं कि इस विशेष नम्‍बर से कहीं उनका जुड़ाव होगा। अगर वे देखने की बजाय आब्‍जर्व करने लगें तो पता चलेगा कि केवल ये विशेष संख्‍याएं ही नहीं अनन्‍त संख्‍याएं उनके सामने आती हैं लेकिन जिंदगी में कही न कहीं इन संख्‍याओं से जुड़ी याद होने के कारण ये अधिक तेजी से उनके दिमाग में ब्लिंक करती हैं। अब संख्‍या तो आ रही है लेकिन उसके साथ जुड़ी याद अवचेतन में पीछे कहीं दूर धकेल दी गई है। सो उनका परेशान होना स्‍वाभाविक है। अगर मैं एक न्‍यूमरोलॉजिस्‍ट की तरह बात करूं यानि सिट्टा हाथ में उठा लूं, तो पहले तो इन संख्‍याओं को जोडकर सात बना लूंगा। फिर बताउंगा कि चूंकि ये संख्‍याएं दो भागों में बंटी है इसलिए पहले तीन का और बाद में चार का असर आएगा। यानि तीन की संख्‍या से गुरू और चार की संख्‍या से सूर्य आता है। इससे पता चलता है कि जब आप किसी प्रॉब्‍लम में उलझे होते हैं तो आपको किताबों और ऑथेरिटी की जरूरत होती है। अगर अखिल जी मेरी बात को सीरियस लेते हैं तो वे याद करेंगे और उन्‍हें याद भी आ जाएगा कि उन्‍होंने कई बार प्रॉब्‍लम में होने पर किताबों में जानकारी ली और अपने सीनियर्स की मदद भी। लेकिन एक सिस्‍टम एनालिस्‍ट ऐसे नहीं बनता है। यकीन मानिए। उसे समस्‍याओं को खुद ही हल करना होता है। चाहे किसी की भी सहायता ले लेकिन लगातार सामने आ रही समस्‍या उसकी निजी होती है और उससे लड़ने वाला भी वह खुद ही होता है। अब जिन बातों का जस्टिफिकेशन हमारे पास नहीं होता उन बातों के लिए हम उन लोगों पर निर्भर हो जाते हैं जिन्‍हें वास्‍तव में खुद कुछ नहीं मालूम। जैसा कि मेरे एक दोस्‍त कहते हैं दो अंधे मिलकर एक आंख से देखने लगते हैं। अब (12:22) संकेत तो है लेकिन भविष्‍य का हो जरूरी नहीं।

अब बात पराभौतिक कनेक्‍शन की: यह हर किसी का होता है। चाहे वह उसे प्रदर्शित कर पाए या नहीं। जब हाजिर दिमाग काम करना बंद कर देता है तब यह पराभौतिक कनेक्‍शन अधिक मुखरता से महसूस होने लगते हैं। हम किसी से कोई बात करते हैं, कोई जानकारी लेते या देते हैं, कोई गाना सुनते हैं, कोई समाचार देखते हैं तो दिमाग तत्‍काल जो रिएक्‍शन देता है वह हाजिर दिमाग की होती है। मान लीजिए कि आपने टीवी में एक सड़क दुर्घटना का दृश्‍य देखा। इससे आपके दिमाग में हाथों हाथ यह आएगा कि आजकल सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं, लोग लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं वगैरह वगैरह.. कुल मिलाकर तात्‍कालिक प्रतिक्रियाएं तत्‍काल आती हैं और समाप्‍त भी हो जाती हैं। इसी दौरान आपका अवचेतन गणना करने लगता है। (यह केवल उदाहरण के लिए है सिद्धांत नहीं) वह आपको याद दिला देता है कि आपका छोटा भाई भी लापरवाही से गाड़ी चलाता है। आजकल किसी बड़े शहर में है जहां उसके पास दुपहिया वाहन भी है। हालांकि दुपहिया वाहन कम चलाता है लेकिन चलाता तो है। अब दूसरा विचार कि आपके भाई का शहर और दुर्घटना वाला शहर कितना मिलता जुलता है। इस जैसे हजारों विचार दिमाग के बैकग्राउंड में चलते हैं। इसी दौरान आपके भाई का दोस्‍त भी यही देख रहा होता है और शायद उसका अवचेतन भी ऐसी ही कुछ चाल चलता है। अब आप और आपके दोस्‍त का भाई कहीं रास्‍ते में मिलते हैं। आपका दिमाग बात करता है गाड़ी को सही मेंनटेंन करने और सही तरीके से चलाने के बारे में यही आपके भाई के दोस्‍त के दिमाग में भी चल रहा होता है। दोनों मिलकर बात कर लेते हैं। और निष्‍कर्ष निकाल लेते हैं कि आपका भाई तो ढंग से गाड़ी चलाता है। इसके लिए कहीं भी आपके भाई या दुर्घटना का जिक्र नहीं होता। लेकिन मैसेज कन्‍वे हो गया। अब आपकी चिंता बढ़ रही है और आप अपने भाई को फोन लगाते हैं तो वह वही बातें कर रहा होता है जो आपने अब तक सोची थी। लेकिन वह यह बताना भूल जाता है कि उसके दोस्‍त का भी फोन आया था। आपकी सोच बदल जाती है। आप सोचने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। जबकि तीनों लोगों के अवचेतन इस कांबिनेशन को बना रहे थे। यह एक उदाहरण है। लेकिन इससे स्‍पष्‍ट हो सकता है कि कैसे हम कोई बात सोचते हैं दूसरा उसी बात को बोलता है। इसे मैं दो लोगों के एक ही मानसिक स्‍तर में होना कहता हूं। साइकोलॉजिस्‍ट क्‍या कहते हैं मुझे पता नहीं। अब अल्पना वर्मा जी कहती हैं कि एक व्यक्ति को कभी कभी कोई घटना -अक्सर दुर्घटना - दिमाग में बार बार तब तक दिखायी देती रहे..और कुछ दिन में या कुछ घंटे या मिनटों के अन्तर पर वो सच हो जाए। कभी कोई मिलने आने वाला हो और घर के नज़दीक होने पर उस की तस्वीर दिमाग में स्पष्ट दिखायी दे। यह यकीनन कोई मनोरोग नहीं है। हां यह मनोरोग नहीं है बस आपके अवचेतन का एक ट्रेलर मात्र है। बिल्‍कुल वैसी की वैसी घटना न भी हो तो आपकी कल्‍पना की घटना और वास्‍तविक घटना की एकरूपता को जस्टिफाई आपका दिमाग ही तो करेगा। अगर वह क्रूर विश्‍लेषण करे तो दोनों घटनाओं में हजारों अन्‍तर ढूंढ निकालेगा और मनोविनोद की बात हो तो अंतर ढूंढने का कारण ही नहीं रह जाएगा। हम भविष्‍य तो देख भी लें तो वह वैसा हमारे सामने कभी नहीं आएगा जैसा कि वास्‍तव में है। बस संकेत आते हैं। आप जिनती कुशलता से इन संकेतों को समझ लेते हैं वही भविष्‍य की या दूरदृष्टि है।

शेष शुभम्