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मंगलवार, मार्च 29, 2011

तंत्र के जानिब तिब्‍बत की गुफाओं का खौफ

JH1999CC

 

बहुत साल पहले ही बात है, जब हम तीन दोस्‍त मिलकर धर्म, अध्‍यात्‍म और ज्‍योतिष की बातों से आगे आकर तंत्र की बातें करने लगे थे। तब एक ने यह कहानी सुनाई थी

तिब्‍बत में कुछ ऐसी गुफाएं हैं जिन्‍हें लामाओं का जमा किया विशद तंत्र कोष भित्ति चित्रों के रूप में जमा है। इन तांत्रिक मंत्रों को विधियों को लेने के लिए एक व्‍यक्ति उन गुफाओं तक पहुंच गया। संकेतों और नए शब्‍द चित्रों की व्‍याख्‍या करने का प्रशिक्षण ले चुका वह व्‍यक्ति उन तांत्रिक विधियों और तंत्र को समझ नहीं पाया। उसने सोचा कि इन सभी को हूबहू एक कॉपी में बनाकर वह वापस पश्चिम में अपने देश चला जाए। ताकि भविष्‍य वे सुरक्षित रहें और किसी समझने वाले व्‍यक्ति के हाथ में पड़ें तो इस तंत्र की जानकारी पूरी दुनिया को मिल जाए। उस व्‍यक्ति ने मंत्रों और रेखाचित्रों को उतारना शुरू किया। वह एक भी मंत्र या तंत्र के किसा भाग को जानता नहीं था। जैसे जैसे उसने कॉपी करना शुरू किया उस व्‍यक्ति की तबीयत खराब होने लगी। समय बीतने के साथ व‍ह निश्‍तेज होता गया। एक दिन लोगों ने उसे किसी गुफा के निकट मरा हुआ पाया।

इस कहानी का कथ्‍य यह है कि तंत्र में हम जिस विधि को पूरी तरह नहीं जानते हैं उससे दूर ही रहना चाहिए। परा भौतिक प्रयासों के बारे में भी कमोबेश यही कथन है। इसके बावजूद मैं आपसे अपने एक अनजान दोस्‍त की कहानी शेयर करना चाहता हूं।।।

भारत के एक छोटे से शहर में पला और बड़ा हुआ शरीक (यह छद्म नाम है) कम्‍प्‍यूटर टैक्‍नोलॉजी की एडवांस पढ़ाई करने के लिए अमरीका चला गया। बाद में उसकी नौकरी भी वहीं लग गई। कई कंपनियां बदलने के बाद वह एक छोटे शहर में शिफ्ट हो गया। इस शहर की पोश कॉलोनी के बारे में कहा जाता था कि वहां घरों पर प्रेतों का कब्‍जा है। ऐसे में वहां स्‍थानीय लोग तो नहीं के बराबर थे। जो थे उनके भारतीय अथवा एशिया मूल के अधिक थे। ऐसे ही एक घर में शरीक ने अपना छोटा सा आशियाना बसाया। अपनी पत्‍नी और बेटे को लेकर जैसे ही वह इस घर में शिफ्ट हुआ, उसका बेटा बीमार रहने लगा। चिकित्‍सकों को दिखाया तो पता चला कि उसे मस्‍कुलर डिस्‍ट्रॉफी ने जकड़ लिया है। दंपत्ति पर मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। कुछ दिन बाद शरीक की नौकरी भी छूट गई। दूसरी मिली नहीं। पढ़ी लिखी पत्‍नी ने मौके की नजाकत को देखते हुए खुद नौकरी करनी शुरू कर दी। किसी तरह घर खर्च तो चल रहा था, लेकिन घर में शांति बिल्‍कुल नहीं थी। कई सालों तक प्रेम से साथ रहने वाले पति पत्‍नी में रोजाना झगड़े होने लगे। शरीक ने शुरूआती दौर अपनी बुद्धि से समस्‍याओं को हल कर निकालने का प्रयास किया। समय के साथ समस्‍याएं बढ़ती गई। आखिर में एक दौर ऐसा आया कि परिवार में नैराश्‍य बढ़ गया। अब शरीक ने भारत में अपने मित्रों से सम्पर्क साधना शुरू किया। उसे किसी ने दो तीन ज्‍योतिषियों के सम्‍पर्क बताए। शरीक ने उनसे बात की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

आखिर में एक तांत्रिक मिला। उसने वही पुरानी बातें कहीं, इस पर शरीक उखड़ गया। आखिर में एक तांत्रिक से बात करने पर राजी हुआ। महज बाइस साल के तांत्रिक ने शरीक को भरोसा दिलाया कि बेटे (निश्‍चय ही तांत्रिक की उम्र अपने जातक से कहीं कम थी, लेकिन वह बहुत ऊंचे मानसिक स्‍तर से बोल रहा था...) मैं सबकुछ ठीक कर दूंगा। इसके बाद तांत्रिक ने उसे कुछ क्रिया करने के लिए कहा। जो साधन काम में लेने थे, उनमें एक धातु का लोटा भी काम में लेना था, लेकिन अमरीका में वह हाथों-हाथ नहीं मिला। सो कांच का जार लेकर क्रिया कर दी। काम नहीं हुआ। उधर तांत्रिक का दूसरे दिन फोन आया कि क्‍या कुछ बदलाव हुआ। बदलाव नहीं होना था, सो नहीं हुआ। तांत्रिक को बात समझ में नहीं आई। उसने बारीकी से क्रिया का हर स्‍टेप पूछा तो पता चला कि धातु के बजाय कांच का जार काम में लिया गया है। तांत्रिक ने क्रिया धातु के लोटे के साथ दोहराने के लिए कहा। शरीक ने यह कर दिया। तांत्रिक ने शरीक को आगाह किया कि एक रात उसे सोना नहीं है, वरना गड़बड़ हो सकती है। हाईटेक व्‍यवसाय से जुड़े शरीक को यह बात जंची नहीं। उसने इसे हल्‍के में लिया और वह रात को सो गया। उसी रात एक परछाई ने शरीक पर हमला कर दिया। सोते में से जगे शरीक ने अपने ईष्‍ट का नाम लिया तो छाया दूर हो गई। शरीक फिर सो गया। उसी रात दोबारा हमला हुआ। शरीक ने बताया जैसे किसी ने उसका गला कसकर पकड़ लिया है और वह सांस भी नहीं ले पा रहा है। कुछ क्षणों के लिए उसे लगा कि जैसे दिमाग की नसें फट जाएंगी। एक बार फिर उसने अपने ईष्‍ट को याद किया। वह परछाई फिर अलग हो गई।

अगले दिन सुबह होते ही शरीक ने तांत्रिक को फोन किया और बीती रात की सारी घटना बताई। सहज बुद्धि अपनी जगह छोड़ चुकी थी। तांत्रिक ने उसे दिलासा दिया कि जल्‍द ही सब ठीक हो जाएगा। इस बार तांत्रिक ने बुरी आत्‍मा को घर से बाहर भेजने के लिए नुस्‍खा बताया। शरीक ने कर दिया। जब वह उपचार कर घर लौट रहा था, तो उसे लगा कि जैसे सालों बाद घर में शांति आई है।

डेढ़ महीना हो गया। अब घर में पहले से अधिक अच्‍छा वातावरण है और चीजें धीरे-धीरे दुरुस्‍त हो रही हैं। बकौल तांत्रिक अमरीका के उस क्षेत्र में ऐसी और आत्‍माएं घूम रही हैं।

मैं नहीं जानता कि यह क्‍या है और कैसे होता है। परा भौतिक दुनिया का यह असर कब और कितना असर करता है... लेकिन जिस व्‍यक्ति ने मुझे यह जानकारी दी है उसकी बातों पर बिना शक विश्‍वास किया जा सकता है। इस रिपोर्ट को अंधविश्‍वास बढ़ाने की कोशिश के बजाय दूसरी दुनिया को समझने की कोशिश मानें तो बेहतर है। किसी भूत के अनजान किस्‍से के बजाय यह एक व्‍यक्ति के साथ पिछले दो सालों की पीड़ा और महज डेढ़ माह पहले घटी घटनाओं का दस्‍तावेज है...

उस व्‍यक्ति ने मुझे इसलिए बताया ताकि दुनिया भी समझने का प्रयास कर सके कि दूसरी दुनिया होती है और वह हमारे आस-पास ही है...

बुधवार, मार्च 16, 2011

भविष्‍य के संकेत और जापान की सूनामी

आपकी जिन्‍दगी में कल क्‍या होने वाला है, आज क्‍या हो सकता है, आज का दिन कैसा जाएगा, आने वाला साल कैसा होगा और जीवन की आगामी घटनाएं क्‍या हो सकती हैं, इन सभी बातों के बारे में समाचार पत्रों और टेलीवीजन पर धडल्‍ले से जानकारी देने वाले यह नहीं बता पाए कि जापान में भूकम्‍प के कारण सूनामी आने वाला है।

हो सकता है आपको लगे कि मैं अचानक ज्‍योतिष की बुराई क्‍यों करने लगा हूं, लेकिन वास्‍तव में मैं उन ज्‍योतिषियों की बुराई करने का प्रयास कर रहा हूं, जो पूरे समूह का भविष्‍य एक साथ बताते हैं और छह अरब की जनसंख्‍या का भविष्‍य बारह राशियों में समेट देते हैं। ऐसे में उन्‍हें अलग अलग राशियों वाले हजारों जापानियों का ख्‍याल नहीं आया होगा, जो सूनामी की चपेट में आए।

हालांकि यह भी शोध का विषय है कि

क्‍या सूनामी में मरने वाले अधिकांश लोगों की कुण्‍डली में मृत्‍यु का योग बन रहा था

क्‍या किसी व्‍यक्ति को इस प्राकृतिक आपदा का पूर्वाभास हुआ था

क्‍या सम्‍पत्तियों के इतनी बड़ी मात्रा में नष्‍ट होने का योग बन रहा था

क्‍या इसके लिए पहले से कोई योग बना हुआ है या नई व्‍युत्‍पत्ति करनी होगी

क्‍यों ज्‍योतिषियों ने एक महीने या पंद्रह दिन पहले ही इसकी घोषणा नहीं की

जब तक सूनामी की बात हो तो इन सवालों में सीमित रहा जा सकता है, लेकिन बर्ड फ्लू, स्‍वाइन फ्लू, नाभिकीय रिसाव, प्‍लेग और किसी विशेष आबादी में कैंसर और एड्स का प्रकोप बढ़ने के सवाल एक बार फिर मण्‍डेन ज्‍योतिष का रास्‍ता खोलने की मांग करते हैं।

विज्ञान से अलग कर देने के बाद ज्‍योतिष के फलित भाग को जैसे नकार ही दिया गया है। प्राचीन पाराशरी, जैमिनी, नाड़ी और सारावली जैसे ग्रंथों के बाद जैसे ज्‍योतिष के विषय में शोध कार्य बन्‍द ही हो गया है। हेमवंता नेमासा काटवे और के एस कृष्‍णामूर्ति ने अपने स्‍तर पर प्रयास किए। काटवे कोई स्‍कूल स्‍थापित नहीं कर पाए और कृष्‍णामूर्ति नेटल कुण्‍डलियों से बाहर नहीं आए। इसका दुष्‍परिणाम यह है कि आज भी मौसम और सामूहिक घटनाक्रम के अलावा प्राकृतिक आपदाओं के लिए हमें लोक कहावतों और अस्‍पष्‍ट फलादेशों से जूझना पड़ रहा है। कोई स्‍पष्‍ट रूप से यह नहीं बता पाता है कि पंजाब, हरियाणा, विंध्‍याचल, आसाम या उत्‍तराखण्‍ड में आगामी दिनों में क्‍या होने की आशंका या सम्‍भावना है। कुछ पंचांगकर्ता इस बारे में फलादेश भी जारी कर रहे हैं तो वे इतने अस्‍पष्‍ट हैं कि किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता। ऐसे में मेरा मानना है कि जल्‍द ही ज्‍योतिष से जुड़े संस्‍थानों को व्‍यक्तिगत कुण्‍डलियों को छोड़ इस क्षेत्र में अध्‍ययन के गम्‍भीर प्रयास शुरू करने चाहिए। सूचना क्रांति के बाद अब डाटा का संग्रहण और कम्‍प्‍यूटर के चलते गणनाओं का काम भी आसान हो गया है। ऐसे में तेजी से शोध कार्य शुरू किए जाएं और उन्‍हें अंजाम तक पहुंचाया जाए तो मण्‍डेन के क्षेत्र में भी कुछ सार्थक परिणाम हासिल हो सकते हैं।

ज्‍योतिष के जरिए मानव जाति के सामूहिक हित की मण्‍डेन एक सफल पद्धति है।

मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

राफेल की मुण्‍डेन ज्‍योतिष

मुण्‍डेन ज्‍योतिष के बारे में बहुत कम लिखा गया है। वास्‍तव में यह विषय शुरू से ही अछूता रहा है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि अधिकांश ज्‍योतिषी जातक की कुण्‍डली देखने में अधिक सहज महसूस करते हैं। कारण स्‍पष्‍ट है कि पैसा तो वही देगा। ऐसे में समष्टि की बजाय व्‍यक्तिगत काम अधिक हो रहा है। दूसरा कारण है कि बड़े पैमाने पर सोचने और उस पर फलादेश देना अपेक्षाकृत कठिन भी है। इसके लिए कहीं दिशा-निर्देश नहीं मिलते। ऐसे में मुण्‍डेन ज्‍योतिष का उपेक्षित होना स्‍वाभाविक है। मेरे आदरणीय गुरुओं में से एक ने मुझे बताया कि अगर मुण्‍डेन पर काम करना है तो पहले राफेल पढ़ो। मैंने खुब खोजा लेकिन राफेल की किताब कहीं नहीं मिली। स्‍थानीय पुस्‍तक विक्रेता ने भी उसे उपलब्‍ध कराने से मना कर दिया। लेकिन पिछले दिनों वह मुझे ऑनलाइन कहीं मिल गई। अब मैं यहां उसका हिन्‍दी अनुवाद दे रहा हूं। इससे हो सकता है कि ज्‍योतिष के कई विद्यार्थियों को लाभ मिल जाए। मुझे तो खैर दोहरा लाभ पहले से ही हो रहा है। पहला कि इस किताब को और अधिक ध्‍यान से पढ़ पाउंगा और दूसरा कि मेरे ब्‍लॉग के लिए एक और पोस्‍ट मिल जाएगी। अब मैं इसी पोस्‍ट में राफेल की किताब के अंश देना शुरू कर रहा हूं।



राफेल की पुस्‍तक का पहला भाग

क्‍या है मुण्‍डेन ज्‍योतिष
वास्‍तव में यह ज्‍योतिष की एक शाखा है जो देशों, राज्‍यों और शहरों का भाग्‍य बताती है। एक सामान्‍य कुण्‍डली की तरह किसी स्‍थान विशेष की कुण्‍डली बनाई जाती है। किसी राष्‍ट्र के सम्‍बन्‍ध में बात करते समय कारकों का वर्गीकरण निम्‍न अनुसार होगा।
प्रथम भाव - यह आम आदमी से सम्‍बन्धित होगा। जनता का स्‍वास्‍थ्‍य, राष्‍ट्र की सामान्‍य परिस्थितियां और सामान्‍य तौर पर देश की गृह विभाग की स्थिति।
द्वितीय भाव- राष्‍ट्रीय एक्‍सचेंजर, रेवेन्‍यू, स्‍टॉक मार्केट, बैंकें, व्‍यावसायिक मामले और ट्रेडिंग इस भाव से देखी जाएगी।
तृतीय भाव- रेलवे और इससे सम्‍बन्धित अन्‍य मुद्दे, ट्रेफिक, स्‍टॉक एवं शेयर, टेलिग्राफ, टेलिफोन एवं पोस्‍टल मुद्दे, यातायात के साधन, मोटरें, बसें, किताबें, समाचारपत्र और साहित्यिक गतिविधियां इस भाव से देखी जाएंगी।
चतुर्थ भाव- मौसम, कृषि, फसलें और जमीन सम्‍बन्‍धी मुद्दे, खानें, सार्वजनिक इमारतें। इसके अलावा देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी इस भाव से देखेंगे।
पंचम भाव- थियेटर, म्‍युजिक हॉल और मनोरंजन के स्‍थान, बच्‍चे, शिक्षा, जन्‍मदर, स्‍कूलें, नैतिक मूल्‍य और सट्टा प्रवृत्ति इस भाव से देखी जाएगी।
छठा भाव- बीमारी, जनता का स्‍वास्‍थ्‍य, थल और जल  सेना, आराधना के तरीके और सामान्‍य तौर पर कामकाजी जनता को इससे देखा जाएगा।
सातवां भाव- विदेशी मामले और अन्‍य ताकतों के साथ सम्‍बन्‍ध, युद्ध व अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के विवाद, शादियां, तलाक और विदेशी व्‍यापार इससे देखा जाएगा।
आठवां भाव- मृत्‍युदर, आत्‍महत्‍याएं और गुप्‍त समूहों को इससे देखा जाएगा।
नौंवा भाव- अदालतें, जज, पंडित, इमाम, पादरी और हुजूरी के अलावा कॉलोनियल ट्रेड अफेयर, व्‍यावसायिक ताकतें, विज्ञान, शिपिंग और इससे जुड़े अन्‍य मामले इस भाव से देखे जाएंगे।
दसवां भाव- राजा, शाहीपन, सरकारें, सत्‍ताधारी ताकतें, एरिस्‍टोक्रेसी, नोबेलिटी व समाज इस भाव से देखे जाएंगे।
ग्‍यारहवां भाव- संसद, राज्‍यसभा, लेजिस्‍लेशन इस भाव से देखेंगे।
बारहवां भाव- कैदी, वर्कशॉप या गोदियां, अस्‍पताल, दानदाता ट्रस्‍ट, अपराध, हत्‍याएं, अपराधी, जासूस और गुप्‍त शत्रु इस भाव से देखने होंगे।

यह तो हुआ भावों के कारकों का उल्‍लेख। अब इनके इस्‍तेमाल के तरीके आगामी पोस्‍टों में बताने का प्रयास करूंगा। अभी इतना ही यह था भाग एक...

सोमवार, अक्टूबर 25, 2010

ग्रहों से जुड़ी वनस्‍पति

ज्‍योतिष में ईलाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। एक सफल ज्‍योतिषी वही है जो न केवल समस्‍या को पहचान ले बल्कि समस्‍या के निदान के लिए पुख्‍ता उपाय भी बता दे। हर ज्‍योतिषी के पास ईलाज का अपना तरीका है। मैंने अलग-अलग गुरुओं से सीखा, सो मैं कई तरह के उपचार काम में लेने की कोशिश करता हूं। इसका मुझे यह फायदा होता है कि उपचार की लम्‍बी फेहरिस्‍त हमेशा मेरे पास होती है और जातक के पास एक नहीं तो दूसरा उपचार चुनने की स्‍वतंत्रता बची रहती है।

उपचार का एक महत्‍वपूर्ण भाग है वनस्‍पतियां, वेदों और पुराणों में ग्रह शांति का सबसे सशक्‍त माध्‍यम यज्ञ को बताया गया है। बाद के विद्वानों ने स्‍पष्‍ट भी किया है कि कौनसी वनस्‍पति के काष्‍ठ की आहूति देने पर क्‍या उपचार हो सकता है। यज्ञ के बारे में मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन जो पहले दिया जा चुका है उसे यहां शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही वास्‍तु में वनस्‍पति के उपचार भी इस लेख में शामिल करने का प्रयास करता हूं। मुझे यह तैयार माल पिछले दिनों बीकानेर में राष्‍ट्रीय स्‍तर की संगोष्‍ठी में मिला। गुरुकुल कांगड़ी विश्‍वविद्यालय हरिद्वार के प्रोफेसर डी.आर. खन्‍ना ने अपने पत्रवाचन में यह तैयार सामग्री परोसी।

- यज्ञाग्नि प्रज्‍‍वलित रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले काष्‍ठ को समिधा अथवा इध्‍म कहते हैं।

- प्रत्‍येक लकड़ी को समिधा नहीं बनाया जा सकता।

- आह्निक सूत्रावली में ढाक, फल्‍गु, वट, पीपल, विकंकत, गूलर, चन्‍दन, सरल, देवदारू, शाल, खैर का विधान है।

- वायु पुराण में ढाक, काकप्रिय, बड़, पिलखन, पीपल, विकंकत, गूलर, बेल, चन्‍दन, पीतदारू, शाल, खैर को यज्ञ के लिए उपयोगी माना गया है।

- दयानन्‍द सरस्‍वती ने सत्‍यार्थ प्रकाश में यज्ञ के लिए पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आम व विल्‍व को उपयोगी बताया है। उन्‍होंने चन्‍दन, पलाश और आम को सर्वश्रेष्‍ठ बताया है।

- सूर्य के लिए अर्क, चंद्र के लिए ढाक, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग, गुरू के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी और राहू के लिए दूर्वा व केतू के लिए कुश वनस्‍पतियां उपचार में ली जा सकती हैं।

वास्‍तु से जुड़ी वनस्‍पतियां

घर के आगे नवग्रहों के वृक्षों की स्‍थापना के लिए भी सिद्धांत बताए गए हैं। इसके लिए स्‍पष्‍ट किया गया है कि पूर्व में गूलर, पश्चिम में शमी, उत्‍तर में पीपल, दक्षिण में खैर और मध्‍य में आक का वृक्ष लगाना लाभदायी है। इसके अलावा उत्‍तर पूर्व में लटजीरा, उत्‍तर पश्चिम में कुश, दक्षिण पश्चिम में दूब और दक्षिण पूर्व में ढाक का वृक्ष लगाना चाहिए।

यह प्रोफेसर खन्‍ना के पत्रवाचन का ज्‍यों का त्‍यों सार दिया गया है। इसमें मैंने अपनी ओर से कोई विचार नहीं दिया है। आगे किसी लेख में वनस्‍पतियों के उपचार में इस्‍तेमाल के तरीके एवं अन्‍य वनस्‍पतियों के रोल के बारे में स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करूंगा।

यथा...

मंगलवार, अक्टूबर 12, 2010

सबल ग्रह का रत्‍न धारण करें या निर्बल ग्रह का?

आयाम 

यह भी एक टेढ़ा सवाल है। वास्‍तव में ऐसा होता है मुझे इसमें भी शक है। दरअसल, कृष्‍णामूर्ति का तो कथन है कि लग्‍न और नवम भाव तथा इनसे सम्‍बन्धित ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कोई ग्रह निर्बल हो या सबल क्‍या फर्क पड़ता है। इस लेख को पढ़ने से पहले पाठक को चाहिए कि मेरे रत्‍नों पर लिखे कुछ पिछले लेखों को देख लेना चाहिए। ये लेख हैं...

1. मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो... चलेगा

2. लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

3. ईलाज किसका करना है परिस्थितियों का, दूसरों का या खुद का

4. मैं जिज्ञासा बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं... 

इन लेखों में मैंने वर्तमान में रत्‍न को लेकर चल रहे कई सिद्धांतों और उनके कारण पैदा हो रहे व्‍याघात को समझाने का प्रयास किया है। निर्बल और उच्‍च ग्रह का उपचार भी ऐसा ही एक और व्‍याघात है।

कैसे, समझाने का प्रयास करता हूं...

एक उदाहरण की कुण्‍डली लेते हैं। मान लीजिए एक तुला लग्‍न की कुण्‍डली है। उसमें शुक्र लग्‍न का अधिपति हुआ। एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शनि इस कुण्‍डली में कारक ग्रह है। नवम भाव का अधिपति होने के कारण बुध का उपचार भी किया जा सकता है। अब कृष्‍णामूर्ति की माने तो इस कुण्‍डली के शुक्र, शनि और बुध ग्रह का ही इलाज किया जा सकता है। अब इस कुण्‍डली में अगर गुरू, सूर्य या मंगल खराब स्थिति में है तो उनके इलाज की जरूरत ही नहीं है। एक व्‍यक्ति राजमहल में रह रहा हो तो उसे ज्ञान, आधिपत्‍य, और ताकत स्‍वत: मिलती है, और अगर न भी मिले तो उसके लिए प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। ऐसा जातक अगर ज्‍योतिषी से यह मांग करे कि उसे अपने आधिपत्‍य, ताकत और ज्ञान में बढ़ोतरी की जरूरत है तो मान लीजिए कि वह केवल किसी लालसा की वजह से कुछ समय के लिए भटककर यह सवाल कर रहा है। वास्‍तव में उसे जो चाहिए वह ऐश्‍वर्य, विरासत, कंफर्ट, कम्‍युनिकेशन स्किल और अपनी चाही गई चीजों के लिए ईज ऑफ एक्‍सस की जरूरत है। यानि वह अपनी जरूरतों के लिए लम्‍बी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार नहीं है। अगर वह जातक किसी साधन या व्‍यवस्‍था को पाने का प्रयास कर रहा है या रही है तो यह कुछ समय की बात हो सकती है दीर्घकालीन जरूरत नहीं। ऐसे में तुला लग्‍न में बैठे नीच के सूर्य को ताकतवर बनाने के लिए माणिक्‍य भी पहना दिया तो फायदा करने के बजाय नुकसान अधिक करेगा।

यही बात अन्‍य लग्‍नों के लिए भी लागू होती है। तो जातक का इलाज करते समय यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि वास्‍तव में जातक का मूल स्‍वभाव क्‍या है। उसे अपनी मूल स्थिति में लौटाने से अधिक सुविधाजनक कुछ भी नहीं है। भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता, लेकिन मानसिक स्थिति में सुधार कर खराब समय की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। ऐसे में किसी एक जातक की लालसा का पोषण करने के बजाय उसे सही रास्‍ते की ओर भेजना मेरी समझ में सबसे सही उपाय है। ऐसे में मेष से लेकर मीन राशि और लग्‍न वाले जातकों के लिए अलग-अलग उपचार होंगे। आप गौर करेंगे कि कुछ ग्रहों को कारक तो कुछ को अकारक भी बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी कुण्‍डली में कारक ग्रहों का प्रभाव होता है और अकारक का नहीं होता। प्रभाव तो सभी ग्रहों का होगा, लेकिन मूल स्‍वभाव कारक ग्रह के अनुसार ही होगा। ऐसे में  उपचार के समय भी कारक ग्रहों का ही ध्‍यान रखा जाए।

रही बात उच्‍च और नीच की... यह तो रश्मियों का प्रभाव है। नीच ग्रह की कम रश्मियां जातक तक पहुंचती है और उच्‍च ग्रह की अधिक रश्मियां। ऐसे में अगर कारक ग्रह अच्‍छी स्थिति यानि अच्‍छे भाव में बैठकर कम रश्मियां दे रहा है तो उसके लिए उपचार करना चाहिए। और अकारक ग्रह खराब स्थिति में या नीच का भी है तो उसे छेड़ने की जरूरत नहीं है।

यह मेरा अब तक के अध्‍ययन से उपजा विश्‍लेषण है.. जरूरी नहीं है कि सही ही हो, लेकिन अब तक जितने जातकों का इलाज इन तथ्‍यों को ध्‍यान में रखकर किया है, मुझे बेहतर परिणाम मिले हैं। एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। एक जातक तुला लग्‍न का ही था और अपने संगठन में टॉप लेवल पर पहुंचने के लिए प्रयासरत था, मुझे लगा कि वह अपनी ताकत और प्रबंधन गुण की वजह से तो टॉप लेवल पर नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन शनि का नेगेटिव प्रभाव बढ़ाने से बात बन सकती है। पांचवे भाव में स्‍व राशि का होने के बावजूद मैंने जातक को लोहे की अंगूठी गले में पहना दी, और गले में पहना रक्‍त चंदन का सूर्य उतरवा दिया। शनि का असर तेजी से बढ़ा, लग्‍न में बैठे सूर्य और गुरू भी इतना असर नहीं कर पाए जितना शनि ने किया। अब वह अपने संगठन के बहुत महत्‍वपूर्ण ऊंचे पद पर आसीन है।

शनिवार, अगस्त 14, 2010

किस भाव से क्‍या देखेंगे – कारक

कारक विचार फलादेश की सबसे महत्‍वपूर्ण कड़ी है। कई बार जातक जब समस्‍या बताता है तो नए ज्‍योतिषियों को पता ही नहीं चलता है कि इसे किस भाव या ग्रह से देखें। ऐसे में जितने कारक फौरी तौर पर ध्‍यान में होते हैं, उन्‍हीं के अनुसार ज्‍योतिषी निष्‍कर्ष पेश करने की कोशिश करते हैं। कई बार तो यह भी स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता है कि सवाल का जवाब कुण्‍डली में कहां खोजा जाए। शुरूआती दिनों में मेरी भी यही समस्‍या थी, गुरुजी ने जितने कारक बता दिए उतने तो कंठस्‍थ थे, लेकिन हर बार नई समस्‍या आने पर फिर गुरुजी को पूछता। तो एक दिन उन्‍होंने मुझे स्‍पष्‍ट किया कि मुझे पहले कारक पर ही काम करना चाहिए। तब जो पुस्‍तक मुझे सबसे सहायक लगी वह थी हेमवंता नेमासा काटवे। उनकी कारकत्‍व विचार पुस्‍तक में इतने कारक दिए गए हैं कि लगता है कि हर सवाल का जवाब दिया जा सकता है। काटवे के बाद केएस कृष्‍णामूर्ति की सैकण्‍ड रीडर पढ़ने के बाद तो लगा कि हर सवाल का जवाब ज्‍योतिष से दिया जा सकता है, बशर्ते आप कारकत्‍व के बारे में विस्‍तार से जानते हों। यहां मैं भावों के कारकों के बारे में बताने का प्रयास कर रहा हूं।

प्रथम भाव- इस भाव का कारक सूर्य है। यह सबसे प्रमुख भाव है। इसी भाव की राशि, इसमें बैठे ग्रह और इसके अधिपति ग्रह की स्थिति से जातक की स्थिति की प्राथमिक जानकारी मिल जाती है। बाकी भावों की तुलना में जातक की आत्‍मा को जानने का यह सबसे महत्‍वपूर्ण भाव है। जातक की जन्‍मकुण्‍डली अथवा प्रश्‍नकुण्‍डली के किसी सवाल के जवाब में उसके स्‍वास्‍थ्‍य, जीवंतता, सामूहिकता, व्‍यक्तित्‍व, आत्‍मविश्‍वास, आत्‍मसम्‍मान, आत्‍मप्रकाश, आत्‍मा आदि को देखा जाता है। हर सवाल के जवाब में पहले लग्‍न देखना ही होगा...

1st house - Sun. Health, vitality, integrity, personality, integration, confidence, healthy self-esteem, self-expression, soul radiance.

दूसरा भाव – इस भाव का कारक गुरु है। वैदिक ज्‍योतिष में इसे धन भाव कहा जाता है। इससे बैंक एकाउण्‍ट, पारिवारिक पृष्‍ठभूमि, कई मामलों में आंखें देखी जाती है। इसके अलावा यह संसाधन, नैतिक मूल्‍य और गुणों के बारे में बताता है।

2nd house - Jupiter. Abundance of resources, values and virtues.

तीसरा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे सहज भाव भी कहते हैं। कुण्‍डली को ताकत देने वाला भाव यही है। इसे आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन भाग्‍य के ठीक विपरीत अपनी बाजुओं की ताकत से कुछ कर दिखाने वाले लोगों का यह भाव बहुत शक्तिशाली होता है। बौद्धिक विकास, साहसी विचार, दमदार आवाज, प्रभावी भाषण एवं संप्रेषण के अन्‍य तरीके इस भाव से देखे जाएंगे। छोटे भाई के लिए भी इसी भाव को  देखा जाएगा।

3nd house - Mars. Strong development of mind, bold constructive ideas, strong healthy voice, influential oratory and other communication.

चौथा भाव - इसका कारक चंद्रमा है। यह सुख का घर है। किसी के घर में कितनी शांति है इस भाव से पता चलेगा। इसके अलावा माता के स्‍वास्‍थ्‍य और घर कब बनेगा जैसे सवालों में यह भाव प्रबल संकेत देता है। शांति देने वाला घर, सुरक्षा की भावना, भावनात्‍मक शांति, पारिवारिक प्रेम जैसे बिंदुओं के लिए हमें चौथा भाव देखना होगा। 

4th house - Moon. Peaceful home, sense of safety and security, emotional peace of mind, unconditional love in the family.

पांचवां भाव - इसका कारक गुरु है। इसे प्रॉडक्‍शन हाउस भी कह सकते हैं। इंसान क्‍या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्‍य, पुत्र और पेटेंट वाली खोजें तक शामिल हो सकती हैं। ईमानदारी से की गई रिसर्च भी इसी से देखी जाएगी। ईमानदारी से मेरा अर्थ है ऐसी रिसर्च जिससे विद्यार्थी अथवा विषय के लिए कुछ नया निकलकर आ रहा हो। इसके अलावा आनन्‍दपूर्ण सृजन, सुखी बच्‍चे, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्‍द, सत्‍कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखना जरूरी है। 

5th house - Jupiter. Joyful creation, blessed children, successful, investment. Joy in life, grounded in spiritual consciousness and devotion, and good karma naturally flowing from that.

छठा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे रोग का घर भी कहते हैं। प्रेम के सातवें घर से बारहवां यानि खर्च का घर है। शत्रु और शत्रुता भी इसी भाव से देखे जाते हैं। कठोर परिश्रम, सश्रम आजीविका, स्‍वास्‍थ्‍य, घाव, रक्‍तस्राव, दाह, सर्जरी, डिप्रेशन, उम्र चढ़ना, कसरत, नियमित कार्यक्रम के सम्‍बन्‍ध में यह भाव संकेत देता है।

6th house - Mars, Saturn. Hard work, application of self in service to worthy causes. In health, Mars and Saturn are first-class malefics, fostering wounding, bleeding, inflammation, surgery, (Mars) and inertia, depression, losses, and aging (Saturn). Exercise, work, austerities, regular program or lifestyle, taking the long view to do what will maintain health over the lifetime are positive uses of Mars and Saturn in the 6th house.

सातवां भाव - इसका कारक शुक्र है। लग्‍न को देखने वाला यह भाव किसी भी तरह के साथी के बारे में बताता है। राह में साथ जा रहे दो लोगों के लिए, प्रेक्टिकल के लिए टेबल शेयर कर रहे दो विद्यार्थियों के लिए, एक ही समस्‍या में घिरे दो साथ-साथ बने हुए लोगों के लिए यह भाव देखा जाएगा। जीवनसाथी, करीबी दोस्‍त, सुंदरता, लावण्‍य जैसे विषय इसी भाव से जुड़े हुए हैं। सभी विपरीत लिंग वालों के लिए। समलैंगिकों को कैसे देखेंगे यह अभी स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन कभी ऐसी कुण्‍डली आती है तो मैं दोनों का सातवां भाव ही देखने का प्रयास करूंगा। 

7th house - Venus. We desire peaceful relations with all, especially with significant others, a life full of love and affection, sattvic and full of goodness, beauty, graciousness.

आठवां भाव - इसका कारक शनि है। स्‍वाभाविक रूप से गुप्‍त क्रियाओं, अनसुलझे मामलों, आयु, धीमी गति के काम इससे देखे जाएंगे। इसके अलावा दूसरे के संसाधनों का सृजन में इस्‍तेमाल, जिंदगी की जमीनी सच्‍चाइयां, तंत्र-मंत्र के लिए यही भाव है।

8th house - Saturn. Conservative use of other's resources. Serious attitude to plumb the depths of reality. Conservative use of reproductive resources or ojas. Practice of yoga and austerities.

नौंवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। इसे भाग्‍य भाव भी कहते हैं। पिछले जन्‍म में किए गए सत्‍कर्म प्रारब्‍ध के साथ जुड़कर इस जन्‍म में आते हैं। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा से अधिक कब और कितना मिल सकता है। धर्म, अध्‍यात्‍म, समर्पण, आशीर्वाद, बौद्धिक विकास, सच्‍चाई से प्रेम, मार्गदर्शक जैसे गुणों को भी इसमें देखा जाता है। 

9th house - Jupiter. Religious-spiritual experience, realization, and devotion. Love of God as a foundation for life and blessings all around. vision, perspective, increase in wisdom, compassion, love of truth. Spiritual teacher (guru) and spiritual teachings and path shown by the 9th house.

दसवां भाव - इसके कारक ग्रह अधिक हैं। गुरु, सूर्य, बुध और शनि के पास दसवें घर का कारकत्‍व है।  हम जो सोचते हैं वही बनते हैं। यह भाव हमारी सोच को कर्म में बदलने वाला भाव है। हर तरह का कर्म दसवें भाव से प्रेरित होगा। बस बाध्‍यता इतनी है कि एक्‍शन हमारा होना चाहिए। रिएक्‍शन के बारे में यह भाव नहीं बताता। प्रोफेशनल सफलताएं, साख, प्रसिद्धि, नेतृत्‍व, लेखन, भाषण, सफल संगठन, प्रशासन, स्किल बांटना जैसे काम यह भाव बताता है।

10th house - Jupiter, Sun, Mercury, Saturn. Professional success, good reputation based on virtue, fame, leadership (Jupiter, Sun). Success in commerce, writing, speaking (Mercury). Successful organization, administration, teaching essentials, sharing expertise and wisdom of experience (Saturn). Jupiter shows the spiritual basis for worldly success - doing well by doing good.

ग्‍यारहवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। यह ज्‍यादातर उपलब्धि से जुड़ा भाव है। आय, प्रसिद्ध, मान सम्‍मान और शुभकामनाएं तक यह भाव एकत्रित करता है। हम कुछ करेंगे तो उस कर्म का कितना फल मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह भाव अधिक स्‍पष्‍ट करता है। यह कर्म का संग्रह भाव है। उपलब्धि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। धैर्य, विकास और सफलता भी इसी भाव से देखे जाते हैं।

11th house - Jupiter. Success in achieving goals and dreams.  Success in friendships, in groups and community. Broad vision of well-being, tolerance, diversity, generosity for the common good. Jupiter again shows the spiritual basis for life success and flourishing community.

बारहवां भाव - इसका कारक शनि है। यह खर्च का घर है। हर तरह का खर्च, शारीरिक, मानसिक, धन और जो भी खर्च हो सकते हैं सभी इसी से आएंगे। विद्या का खर्च भी इसी भाव से होता है। इस कारण बारहवें भाव में बैठा गुरु बेहतर होता है ग्‍यारहवें भाव की तुलना में क्‍योंकि सरस्‍वती की उल्‍टी चाल होती है, जितना संग्रह करेंगे उतनी कम होगी और जितना खर्च करेंगे उतनी बढ़ेगी। इसके अलावा बाहरी सम्‍बन्‍धों, विदेश यात्रा, धैर्य, ध्‍यान और मोक्ष इस भाव से देखे जाएंगे।

12th house - Saturn. The benefits of solitude and the contemplative life. Esoteric or metaphysical studies. Patience, depth, application of  self over time. Meditation, contemplation, study of scriptures, initiation, effective therapy, excellent listening. Seeking the truth on all levels. Karma from truth or falsity, sincerity or insincerity, application of self or not, depth or lack of it, character or lack of it, justice or injustice - Saturn weighs and sifts all of that. Completions. Moksha or liberation.

हालांकि यह लेख लम्‍बा हो गया है, लेकिन कारकों के बारे में एक ही स्‍थान पर बताने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पाया। विद्यार्थियों को तो इस पोस्‍ट का प्रिंट निकालकर अपने पास रखना चाहिए। वैसे हर भाव के स्‍वभाव और क्षेत्र के बारे में आगे भी विस्‍तार से चर्चा होती रहेगी, लेकिन एक साथ इतना मैटर दोबारा लिख नहीं पाउंगा, सो इस लेख के लिंक बाद में भी आते रहेंगे।

जय गणेश...

शनिवार, जून 05, 2010

क्‍या घर में अंडरग्राउंड होना चाहिए

इस बारे में बताने से पहले मैं बीकानेर की आबोहवा के बारे में बताना चाहूंगा। मैंने अपने विद्यार्थियों को भी यही बताया था। बीकानेर उत्‍तरी पश्चिमी राजस्‍थान का बिल्‍कुल सूखा प्रदेश है। किसी जमाने में यहां पाताल तोड़ कुएं खोदकर पानी निकाला जाता था। तापमान शून्‍य के करीब और पचास डिग्री तक पहुंचता है। ऑफीशियली तो यह शून्‍य से 49.5 डिग्री तक ही गया है, लेकिन बाहर सड़क पर इससे कहीं अधिक होता है। हवा में नमी एक प्रतिशत से पचास प्रतिशत तक होती है। साल में कभी-कभार सत्‍तर या अस्‍सी प्रतिशत तक पहुंचती है। वह भी बारिश के ठीक बाद। बारिश के मौसम में बीकानेर सबसे सुहावना स्‍थान है, क्‍योंकि यहां धोरों में पड़ी बारिश की बूंदें ठण्‍डी हवाएं लेकर आती हैं, उमस नहीं। इसके अलावा खुला स्‍थान। पिछली जनगणना तक तो यहां बहुत से इलाकों में सौ लोग भी प्रति एक किलोमीटर में नहीं थे। शहर के बीचों-बीच की आबादी को छोड़ दें तो कॉलोनियों में अब भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति लगती है।

अब बात करते हैं यहां की पुरानी हवेलियों की। इनकी बात इसलिए कि मॉर्डन साइंस आमतौर पर अनुभव से मिले परम्‍परागत ज्ञान को नकारने की कोशिश करता है। मैं किसी एक आदर्श हवेली के बारे में बात करूं तो इसका अग्र भाग जमीन से करीब चार फीट ऊंचा मिलेगा। पांच-सात सीढि़यां चढ़कर जब आप घर में दाखिल होते हैं उससे पहले आपको बरामदा दिखाई देगा। घर के मुख्‍य द्वार के आगे कुछ स्‍थान को छोड़ दिया जाता है। इसके बाद आती है साळ। इसे आमतौर पर दीवानखाने या ड्राइंगरूम की तरह काम में लेते हैं। अगर पूर्वमुखी हवेली है तो घर में घुसते ही बांयी ओर चौका मिलता है। यह खुला होता है। आंगन एक से डेढ़ फीट तक नीचा और घर के बीचों बीच मिलेगा। आंगन से पहले दीवानखाने के नीचे एक गुंभारिया या अंडरग्राउंड होता है। इसका एक दरवाजा घर के अंदर और एक दरवाजा बाहर गली में खुलता है। दांयी ओर बने दीवानखाने के ठीक पीछे पूजाघर और परिण्‍डा यानि मटकी रखने का स्‍थान मिलेगा। इसके बाद भीतर की ओर तीन कमरे एक कतार में। इनमें से दक्षिणी पश्चिम दिशा में एक ओरा होता है। आमतौर पर इसे मास्‍टर बैडरूम की तरह इस्‍तेमाल किया जाता है। रसोई और मास्‍टर बैडरूम के बीच सीढि़यां मिलेंगी। एक और बात घर में कहीं भी लैट्रिन नहीं मिलेगा। इसके लिए अलग से बाड़ा यानि ऐसा स्‍थान होगा जो घर से बिल्‍कुल जुदा होगा।

बीकानेर में पिछले कुछ सालों में जो नए घर बन रहे हैं उनमें अंडरग्राउंड नहीं बनाया जा रहा है। इसका प्रमुख कारण है सीलन। इंदिरा गांधी नहर के कारण घरों में बेतहाशा पानी आता है। यह पानी नाली और गली में बिखरता है। अंतत: सीलन का कारण बनता है। पहले के जमाने में अंडरग्राउंड में सीलन की समस्‍या कम थी।

गुरुवार, जून 03, 2010

मेरा, उसका सबका वास्‍तु - ऊर्जा का प्रवाह

इस साल एक बार फिर वास्‍तु की कक्षाएं लेने का मौका मिला। पिछली बार जहां पहले से वास्‍तु के जानकार लोगों से लेकर छोटी बालिका तक के विद्यार्थी थे वहीं इस बार सभी युवा या अधेड़ थे, और मेरी लगातार परीक्षा लेने की फिराक में थे। कुछ ने इधर उधर कुछ पढ़ भी रखा था। एक चिकित्‍सक, दो इंजीनियर, एक वास्‍तुप्रेमी और बाकी लोग ऐवेंई कुछ सीखने आ गए थे। डांस क्‍लास और पेंटिंग क्‍लास में एक घंटे के अंतर के कारण।

पहला दिन ऊर्जा का प्रवाह और दूसरा दिन ग्रहों की स्थिति बताने में बीता। इसके साथ ही शुरू हुई बहस कि मंदिर कहां होना चाहिए, किस कोने में किस देवता का वास होता है, किस वास्‍तु में बुरी आत्‍माओं का दोष हो सकता है आदि आदि...

इन ढ़ेर सारे सवालों के जवाब में एक बात मैंने वापस पूछी कि अगर किसी हिन्‍दू का घर देखा जाए तो वहां एक मंदिर होना आवश्‍यक है, लेकिन क्‍या एक ईसाई के घर के वास्‍तु में भी ऐसा ही होगा, या इससे कुछ अलग हो सकता है। एक ने जवाब दिया उत्‍तरी पूर्वी कोने में जीजस की मूर्ति लगा दी जाए, इसी तरह एक मुसलमान उसी कोने में मोहम्‍मद साहब ही मूर्ति लगा देगा। बाकी लोग अपने अपने धर्म की आराधना इसी कोने में कर लें। ऐसे में नई समस्‍या यह कि फिर उत्‍तरी पूर्वी या ईशान कोण में आखिर होगा कि देवता का वास। काफी देर तक बहस चलने के बाद मैंने इस बिंदू पर बहस बढ़ाने से मना कर दिया और अपनी ओर से निर्णय किया कि वास्‍तु की कक्षा के दौरान आगे से केवल ऊर्जा के प्रवाह पर ही चर्चा होगी। अगर ऊर्जा बाधित हो रही है तो उसे ठीक करने का प्रयास किया जाएगा। यकीन मानिए बस इसी एक ट्रिक के जरिए सभी लोगों के दिमाग की खिड़की एक साथ खुल गई।

आइए आपको भी बताता हूं कि ऊर्जा के प्रवाह के बारे में मैंने क्‍या बताया और इसे आप खुद कैसे देख सकते हैं। हालांकि मैं यहां कोई लाइन या डायग्राम नहीं बना पा रहा हूं लेकिन शब्‍दों से ही इसे स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करूंगा।

- किसी घर के वास्‍तु में तीन चीजों का प्रमुखता से ध्‍यान रखा जाए : हवा, पानी और रोशनी

- ऊर्जा के प्रवाह को रोशनी, हवा और पानी के बहाव से देखेंगे।

- ऊर्जा का प्रवाह उत्‍तर और पूर्व से आता है और दक्षिण तथा पश्चिम की ओर जाता है।

- उत्‍तरी पूर्वी कोने में सर्वाधिक ऊर्जा होती है।

- दक्षिणी पश्चिमी कोने में सबसे कम ऊर्जा होती है।

- परिवार के जिस सदस्‍य की जितनी ऊर्जा है उसे उतनी ही ऊर्जा के स्‍थान पर बैठाया जाए।

- उत्‍तरी पूर्वी कोना न केवल साधना बल्कि बच्‍चों के लिए भी बेहतर होगा

- दक्षिणी पश्चिमी कोना भण्‍डार के अलावा धैर्य के लिए परिवार के मुखिया का होगा

- उत्‍तरी पश्चिमी कोना दादा-दादी अथवा जो भी ग्रांड पेरेंट्स हों उनके लिए होगा।

- दक्षिण पूर्व में रसोई होगी।

- आंगन खाली होगा।

- भूमि भी अधिक ऊर्जा प्रवाह वाले स्‍थान पर नीची और कम ऊर्जा प्रवाह वाले स्‍थान पर ऊंची होगी।

- दुकान की वास्‍तु ऊर्जा का प्रवाह घर के ऊर्जा प्रवाह से ठीक उल्‍टा होगा।

- घर के अंदर दुकान होगी तो दोनों का ऊर्जा प्रवाह एक-दूसरे को प्रभावित करेगा।

- तीनों कारकों में से जो कारक प्रभावित हो रहा है उसी का ईलाज किया जाए। बाकी दोनों कारकों को छेड़ने की जरूरत ही नहीं है।

गुरुवार, मार्च 11, 2010

लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल

लाल किताब प्राचीन नहीं है, जैसा कि लाल किताब के बहुत से विज्ञापनों में लिखा गया होता है 'असली प्राचीन लाल किताब।' बल्कि यह मध्‍ययुगीन है। मेरी जानकारी के अनुसार यवनों के भारत में प्रवेश के बाद भारत और पाकिस्‍तान के पंजाब वाले क्षेत्रों में इस ज्‍योतिष का तेजी से विकास हुआ। अनुमान लगा सकता हूं कि कोई छोटा ग्रुप रहा होगा, जिन्‍होंने मिलकर परम्‍परागत भारतीय ज्‍योतिष में शाबरी मंत्रों जैसे प्रयोग किए और ऐसे लोकरंजन के उपाय निकाल लिए जो अपनाने में आसान और कारगर हों।
लाल किताब के प्राचीन नहीं होने से इसकी महत्‍ता कम नहीं हो जाती। वर्तमान दौर में उपायों के लिए अगर कोई पुस्‍तक मदद करती है तो वह है लाल किताब, इसके अलावा पटियाला और चंडीगढ़ के कुछ लोगों ने, अगर सही कहूं तो एक युवा ज्‍योतिषी ने सुनहरी किताब भी प्रकाशित की। वह युवा बहुत कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गया लेकिन जो सुनहरी किताब लिखकर गया है, वह लाल किताब को भी पीछे छोड़ती है,
लेकिन अभी बात उपचारों की
आप किसी भी पुराने ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए। उसमें ग्रहों की गड़बड़ पर शांति के उपचार बताए गए हैं। दान, भेंट, पूजा, यज्ञ अथवा मंत्रोच्‍चार से समस्‍याओं का समाधान  पाया जा सकता है। फौरी तौर पर चंद्र राशियों के आधार पर ग्रहों के रत्‍नों की जानकारी भी कहीं-कहीं मिल जाती है, लेकिन वह भी ग्रह शांति उपचारों से ही संबंधित है।
उपचारों का बिंदू आने के साथ ही मेरे दिमाग में सबसे पहले लाल किताब आती है। इसके दो कारण हैं। पहला कि इस किताब में उपचारों की इतनी लम्‍बी रेंज दी गई है कि एक उपचार नहीं कर सको तो दूसरा कर लो, दूसरा नहीं तो तीसरा, इसी तर्ज पर लिखी गई सुनहरी किताब तो उपचारों की पूरी लिस्‍ट ही थमा देती है। अपनी इच्‍छा के अनुसार उपचार चुनो और कर लो। दूसरा कारण है कि मेरे गुरूजी ने मुझे बताया कि लाल किताब के उपचार तांत्रिक विधियों पर आधारित है। जातक जैनुइन है तो उसे लाल किताब का ही उपचार बताओ, जातक की जितनी अधिक आस्‍था होगी, उपचार उतनी ही तेजी से काम करेगा।
वर्तमान दौर में लोगों को प्रसव पीड़ा भोगने की बजाय लोगों को सिजेरियन ऑपरेशन अधिक सहज लगता है। इसलिए उन्‍हें वही दो, जो वे मांगते हैं। यह बात मुझे शुरूआती दौर में ही महसूस होने लगी थी। किसी को कोई उपचार बताओ और कहो कि पांच साल बाद सब‍कुछ दुरुस्‍त हो जाएगा तो, या तो वह ज्‍योतिषी को दिमागी रूप से दिवालिया समझेगा, वरना अपनी समस्‍याओं की लिस्‍ट बताकर तात्‍कालिक स्थितियों से तत्‍काल छुटकारा दिलाने की गुहार लगाएगा।
रत्‍नों की सीरीज में यह लाल किताब कहां घुस गई
हां, अभी तो रत्‍नों पर लगातार लिख रहा हूं, इस बीच यह लाल किताब कहां से घुस आई। जैसा कि मैंने अपने पुराने लेखों में लिखा है ज्‍योतिष की एक विधा में दूसरी विधा का घालमेल इतनी आसानी से होता है कि दोनों विधाओं के लिंक मिले जुले नजर आने लगते हैं। रत्‍नों से उपचार में एक ओर जहां हस्‍तरेखा शास्‍त्र घुसा हुआ है वहीं दूसरी ओर लाल किताब भी घुस चुकी है। लाल किताब का सूत्र है कि जो ग्रह किसी स्‍थान पर बैठकर खराब फल दे रहा हो उसे वहां से हटाकर दूसरी जगह पहुंचा दो। यह इतना आसान है, गुरू जैसे बड़े ग्रह को बिना उसके बारह चंद्रमा को छेड़े उठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंचा दिया जाता है। यह ऐसे ही नहीं हो जाता है। इसके लिए कुछ नियम हैं। उसकी बात बाद में...


लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह से संबंधित वस्‍तुओं को
- प्रथम भाव में पहुंचाना हो उसे गले में पहनिए
- दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए मंदिर में रखिए
- तीसरे भाव में पहुंचाने के लिए संबंधित वस्‍तु को हाथ में धारण करें
- चौथे भाव में पहुंचाने के लिए पानी में बहाएं
- पांचवे भाव के लिए स्‍कूल में पहुंचाएं,
- छठे भाव में पहुंचाने के लिए कुएं में डालें
- सातवें भाव के लिए धरती में दबाएं
- आठवें भाव के लिए श्‍मशान में दबाएं
- नौंवे भाव के लिए मंदिर में दें
- दसवें भाव के लिए पिता या सरकारी भवन को दें
- ग्‍यारहवें भाव का उपाय नहीं
और बारहवें भाव के लिए ग्रह से संबंधित चीजें छत पर रखें।

हां, तो यह हुआ लाल किताब का हिसाब किताब।
अब बात मेरे एक अनुभव की। मैं एक जातक को परम्‍परागत पंडितजी के पास लेकर गया। उन्‍हें कुण्‍डली दिखाई। जातक कन्‍या लग्‍न का था। पंडितजी ने कहा चंद्रमा खराब है, इसे मोती पहनाना पड़ेगा। मैंने कहा ठीक है मैं अंगूठी बनवाने के लिए बोल देता हूं, तो पंडितजी ने मना कर दिया। कहां कि कन्‍या लग्‍न के जातक को लॉकेट में ही चंद्रमा बनवाकर पहनना होगा। क्‍यों... पंडितजी से पूछा नहीं...
मैं बताता हूं इसका कारण
लाल किताब के अनुसार चंद्रमा की अंगूठी बनाकर पहनने से चंद्रमा चला जाएगा तीसरे घर में, यानि वृश्चिक राशि में, इससे चंद्रमा नीच का हो जाएगा। अब एक तरफ लाल किताब राशियों को मानती ही नहीं है। वह हर कुण्‍डली को मेष लग्‍न की कुण्‍डली मानती है और हर घर को तयशुदा राशियां दे रखी हैं। ऐसे में परम्‍परागत ज्‍योतिष और लाल किताब का घालमेल रत्‍न को पहनने में एक और बाधा बन गया। परम्‍परागत ज्‍योतिष ने तो बस इतना कहा कि चंद्रमा के उपचार के लिए मोती पहनाना चाहिए, लेकिन लाल किताब बता रही है कि हाथ में नहीं गले में पहनो...
अब जिन लोगों ने मेरे पिछले लेख पढ़े हैं वे समझ रहे होंगे कि रत्‍न केवल टच करने या किरणों से ही उपचार नहीं करते बल्कि कैसे पहने हैं इससे भी फर्क पड़ता है। तो इस तरह किसी एक रत्‍न को पहनने के लिए मेरे पास तीन अलग-अलग आधार हो गए, जो कभी भी किसी भी स्थिति में एक-दूसरे का निषेध कर सकते हैं। कब और कैसे करेंगे यह तय नहीं है।
अगली पोस्‍ट में मैं चर्चा करूंगा कि इन सब बाधाओं के बावजूद रत्‍न क्‍यों पहनाया जाता है, क्‍या इसे पहनाए बिना काम नहीं चल सकता...

इंतजार कीजिए अगली कड़ी का...

सोमवार, मार्च 08, 2010

GEM STONE : WHO, WHEN, HOW and many more questions?

रत्‍न : कब, कौनसा और कैसे पहनें

आमतौर पर ज्‍योतिष और ज्‍योतिष से जुड़ी किसी भी विधा को विज्ञान का दर्जा दे दिया जाता है। लेकिन रत्‍न विज्ञान को इस तर्ज पर विज्ञान का दर्जा नहीं मिला है। जैमोलॉजी वास्‍तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्‍छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्‍थरों ने अपना यह स्‍थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्‍लेटिनम की तरह। इसमें ज्‍योतिष का कोई रोल नहीं है। 

            यकीन मानिए भाग्‍य के साथ रत्‍नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्‍या में गोमेद रत्‍न प्राप्‍त हुए हैं। यह सामान्‍य अवस्‍था में पाया जाने वाला रत्‍न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्‍तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्‍ताओं के लिए भी आश्‍चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्‍यों दिखाई, या गोमेद का रत्‍न के रूप में धारण करने के अतिरिक्‍त भी कोई उपयोग होता था, यह स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है। 

            इंटरनेट और किताबों में रत्‍नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके इतर मेरी पोस्‍ट इसकी वास्‍तविक आवश्‍यकता के बारे में है। मैं एक ज्‍योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्‍नों को पहनने का महत्‍व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्‍तविक आवश्‍यकता बताने का प्रयास करूंगा।

दो विधाओं में उलझा रत्‍न विज्ञान

वर्तमान दौर में हस्‍तरेखा और परम्‍परागत ज्‍योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्‍नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्‍तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्‍वामित्‍व दर्शाया है। ऐसे में कुण्‍डली देखकर रत्‍न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्‍तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। 

            जैसे बुध के लिए बताया गया पन्‍ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्‍योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्‍पष्‍ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्‍न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। 

शरीर से टच तो हुआ ही नहीं

शुरूआती दौर में जब मुझे ज्‍योतिष की टांग-पूछ भी पता नहीं थी, तब मैं एक पंडितजी के पास जाया करता था। वहां एक जातक को लेकर गया, उन्‍होंने मोती पहनने की सलाह दी। मैंने जातक के साथ गया और मोती की अंगूठी बनवाकर पहना दी। कई सप्‍ताह गुजर गए। कोई फर्क महसूस नहीं हुआ तो जातक महोदय मेरे पास आए और मुझे लेकर फिर से पंडितजी के पास पहुंचे। 

            पंडितजी ने कहा दिखाओ कहां है अंगूठी। दिखाई तो वे खिलखिलाकर हंस दिए। बोले यह तो शरीर के टच ही नहीं हो रही है तो इसका असर कैसे पड़ेगा। मैंने पूछा तो टच कैसे होगी। तो उन्‍होंने बताया कि बैठकी मोती खरीदो और फलां दुकान से बनवा लो। हम दौड़े-दौड़े गए और बैठकी मोती लेकर बताई गई दुकान पर पहुंच गए। हमने बताया कि टच होने वाली अंगूठी बनानी है। दुकानदार समझ गया कि पंडित जी ने भेजा है। उसने कहा कल ले जाना। 

            और अगले दिन अंगूठी बना दी। वह इस तरह थी कि नीचे का हिस्‍सा खाली था। इससे मोती अंगुली को छूता था। कुछ ही दिनों में मोती पहनाने का असर भी हो गया। मेरे मन में भक्ति भाव जाग गया, और एक बात हमेशा के लिए सीख गया कि जो भी रत्‍न पहनाओ उसे शरीर के टच कराना जरूरी है। 

टच से क्‍या होता है किरणें महत्‍वपूर्ण हैं 

अंग्रेजी में इसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं और हिन्‍दी में मैं कहूंगा दृष्टिकोणीय झटका। एक दूसरे हस्‍तरेखाविज्ञ कई साल बाद मुझसे मिले। मैं किसी को उपचार बता रहा था और साथ में शरीर से टच होने वाली नसीहत भी पेल रहा था, कि हस्‍तरेखाविज्ञ ने टोका कि टच होने से क्‍या होता है, यह कोई आयुर्वेदिक दवा थोड़े ही है। रत्‍नों के जरिए तो किरणों से उपचार होता है। मैंने स्‍पष्‍ट कह दिया समझा नहीं तो उन्‍होंने समझाया कि 

            हम जो रत्‍न पहनते हैं वे ब्रह्माण्‍ड की निश्‍चित किरणों को खींचकर हमारे शरीर की कमी की पूर्ति करते हैं। इससे हमारे कष्‍ट दूर हो जाते हैं। विज्ञान का ठोठा स्‍टूडेंट होने के बावजूद मुझे पता था कि हम जो रंग देखते हैं वास्‍तव में वह उस पदार्थ द्वारा रिफलेक्‍ट किया गया रंग होता है। यानि स्‍पेक्‍ट्रम के एक रंग को छोड़कर बाकी सभी रंग वह पदार्थ निगल लेता है, जो रंग बचता है वही हमें दिखाई देता है। ऐसा ही कुछ रत्‍नों के साथ भी होता होगा। यह सोचकर मुझे उनकी बात में दम लगा।

अब मैं तो कंफ्यूजन में हूं कि 
वास्‍तव में टच करने से असर होगा या 
किरणों से असर होगा।
वास्‍तव में रत्‍नों की जरूरत है भी कि नहीं
रत्‍नों का विकल्‍प क्‍या हो सकता है
रत्‍न किसे पहनाना आवश्‍यक है

            इन सब बातों को लेकर कालान्‍तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए। अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।

GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORNAQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA

शनिवार, मार्च 06, 2010

वक्री अच्‍छा होता है या खराब

पिछले दिनों एक शादी समारोह के दौरान मेरे पुराने गुरुजी पंडित मंगलचंदजी पुरोहित मिल गए। चर्चा चली तो बात आ गई वक्री गहों पर। आमतौर पर ग्रहों के संबोधन को ही उनका असर मान लिया जाता है। जैसे नीच के ग्रह को नीच यानि घटिया और उच्‍च के ग्रह को उच्‍च यानि श्रेष्‍ठ मान लिया जाता है। यही स्थिति कमोबेश वक्री ग्रह के साथ भी होती है। उसे उल्‍टी चाल वाला मान लिया जाता है। यानि वक्री ग्रह की दशा में जो भी परिणाम आएंगे वे उल्‍टे ही आएंगे। ऐसा नहीं है कि केवल नौसिखिए या शौकिया ज्‍योतिषी ही यह गलती करते हैं बल्कि मैंने कई स्‍थापित ज्‍योतिषियों को भी यही गलती करते हुए देखा है।

कैसे होता है वक्री ग्रह

जो लोग एस्‍ट्रोनॉमी जानते हैं उन्‍हें पता है कि सौरमण्‍डल में सारे ग्रह सूर्य की दीर्धवृत्‍ताकार कक्ष में परिक्रमा करते हैं। इस दौरान ग्रह कई बार सूर्य के बिल्‍कुल नजदीक आ जाते हैं तो कई बार अधिकतम दूरी पर चले जाते हैं। भारतीय ज्‍योतिष में सूर्य को भी एक ग्रह मानकर गणनाएं की जाती हैं। ऐसे में पृथ्‍वी पर खड़ा अन्‍वेषक जब देखता है कि सूर्य के बिल्‍कुल पास पहुंच चुका ग्रह गति करते हुए रफ्तार में सूर्य से आगे निकल रहा है तो उसे कहते हैं तीव्रगामी और जब सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तो अन्‍वेषक को ग्रह की गति सूर्य की तुलना में धीमी होती दिखाई देती है। इसे कहते हैं ग्रह का वक्री होना। चूंकि बुध सूर्य के सबसे नजदीक है। ऐसे में सबसे कम अंतराल में बुध वक्री, मार्गी और अतिगामी होता है। वहीं शनि सबसे अधिक दूरी पर होने के कारण बहुत धीमी रफ्तार से अपनी ऐसी गति प्रदर्शित करता है।

कैसा होगा वक्री ग्रह का प्रभाव

अब दूसरा और महत्‍वपूर्ण प्‍वाइंट है कि वक्री ग्रह का परिणाम क्‍या होगा। इसके लिए उदाहरण लेते हैं बुध का। बुध कभी भी सूर्य से तीसरे घर से दूर नहीं जा पाता है। यानि 28 डिग्री को पार नहीं कर पाता है। इसी के साथ दूसरा तथ्‍य यह है कि सूर्य के दस डिग्री से अधिक नजदीक आने वाला ग्रह अस्‍त हो जाता है। अब बुध नजदीक होगा तो अस्‍त हो जाएगा और दूर जाएगा तो वक्री हो जाएगा। ऐसे में बुध का रिजल्‍ट तो हमेशा ही नेगेटिव ही आना चाहिए। शब्‍दों के आधार पर देखें तो ग्रह के अस्‍त होने का मतलब हुआ कि ग्रह की बत्‍ती बुझ गई, और अब वह कोई प्रभाव नहीं देगा और वक्री होने का अर्थ हुआ कि वह नेगेटिव प्रभाव देगा।

वास्‍तव में दोनों ही स्थितियां नहीं होती।

टर्मिनोलॉजी से दूर आकर वास्‍तविक स्थिति में देखें तो सूर्य के बिल्‍कुल पास आया बुध अस्‍त तो हो जाता है लेकिन अपने प्रभाव सूर्य में मिला देता है। यही तो होता है बुधादित्‍य योग। ऐसे जातक सामान्‍य से अधिक बुद्धिमान होते हैं। यानि सूर्य के साथ बुध का प्रभाव मिलने पर बुद्धि अधिक पैनी हो जाती है। दूसरी ओर वक्री ग्रह का प्रभाव। सूर्य से दूर जाने पर बुध अपने मूल स्‍वरूप में लौट आता है। जब वह वक्री होता है तो पृथ्‍वी पर खड़े अन्‍वेषक को अधिक देर तक अपनी रश्मियां देता है। यहां अपनी रश्मियों से अर्थ यह नहीं है कि बुध से कोई रश्मियां निकलती हैं, वरन् बुध के प्रभाव वाली तारों की रश्मियां अधिक देर तक अन्‍वेषक को मिलती है। ऐसे में कह सकते हैं बुध उच्‍च के परिणाम देगा। अब यहां उच्‍च का अर्थ अच्‍छे से नहीं बल्कि अधिक प्रभाव देने से है।

तो बुध कब अच्‍छे या खराब प्रभाव देगा

इसका जवाब बहुत आसान है। जिस कुण्‍डली में बुध कारक हो और अच्‍छी पोजिशन पर बैठा हो वहां अच्‍छे परिणाम देगा और जिस कुण्‍डली में खराब पोजिशन पर बैठा हो वहां खराब परिणाम देगा। इसके अलावा जिन कुण्‍डलियों में बुध अकारक है उनमें बुध कैसी भी स्थिति में हो, उसके अधिक प्रभाव देखने को नहीं मिलेंगे।

कहां है बुध का प्रभाव

वर्तमान में हर जगह बुध का प्रभाव है। जहां भी संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है वहां बुध का प्रभाव है। इसमें हर तरह का मीडिया शामिल है। संचार क्रांति बुध की ही क्रांति है, इंटरनेट बुध का ही स्‍वरूप है, लेखा और बैंकिंग भी बुध के प्रभाव क्षेत्र के हिस्‍से हैं और हां शेयर बाजार में भी बुध का भीषण प्रभाव है। आम आदमी की जिंदगी में भी सूचना का आना, जाना, रुकना और सूचना पैदा करना बुध का ही काम है।

मंगलवार, अक्टूबर 27, 2009

Nostradamus lost pages and untold stories

नास्‍त्रेदमस का प्‍वाइंट


नास्‍त्रेदमस 2012 में बताया गया है कि हाल ही में नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक के कुछ दुर्लभ पन्‍ने हाथ लगे हैं। इन सात पन्‍नों में नास्‍त्रेदमस ने सृष्टि के अंत के बारे में स्‍पष्‍ट किया है। इसका मूल बनाया गया है एक खगोलीय घटना को। पहले इसी खगोलीय घटना को समझने का प्रयास करते हैं। 

            इसके अनुसार सूर्य आकाशगंगा के चारों ओर एक निश्चित रफ्तार से चक्‍कर लगा रहा है। सूर्य की इस गति का परिणाम यह होता है कि कई हजार साल बाद सूर्य इस स्थिति में आ जाता है कि पृथ्‍वी से देखने पर सूर्य के पीछे आकाशगंगा एक रोशनी की रेखा के रूप में आ जाती है। बस यही वह समय होता है जब पृथ्‍वी पर बड़े उत्‍पात होंगे। यह समय तय किया गया है 23 दिसम्‍बर 2012 का। नास्‍त्रेदमस के चित्रों और बुक ऑफ लाइफ को इस तथ्‍य से जोड़ा गया है। इससे दो तरह के निष्‍कर्ष निकाले गए। एक तो यह कि इसी दौरान जलजला आएगा और पृथ्‍वी खत्‍म या यह कि अंत की शुरूआत हो जाएगी। पृथ्‍वी के इतिहास में आइस ऐज में पहले एक बार यह स्थिति बन चुकी है। उसी को भविष्‍य की घटनाओं का कथन करने का आधार बनाया गया है। 

            इसमें बताया गया है कि पिछले सवा सौ सालों में मानवजाति ने जितने आपदाएं झेली हैं उतनी तो पहले की किसी भी सभ्‍यता ने नहीं झेली। प्राकृतिक आपदाओं के अलावा महामारियां, प्रदूषण, आतंकवाद, गृह युद्ध, जातिगत लड़ाइयां, बदलते मौसम चक्र, बढ़ती बेरोजगारी और असंतुष्‍टता, विश्‍व युद्ध, खत्‍म होता तेल, वैश्विक मंदियां, परमाणु हमलों की आशंका जैसे बिंदू संकेत करते हैं कि अब अंत निकट है। नास्‍त्रेदमस ने नई किताब में सात चित्रों की शृंखला है। इसमें पहले चित्र में सूर्य और शेर को साथ दिखाया गया है। इससे वैज्ञानिकों ने निष्‍कर्ष निकाला है कि सूर्य तब सिंह राशि में होगा और हमारा सौरमण्‍डल आकाशगंगा के ऐसे कोण पर होगा जब पूरी आकाशगंगा की ऊर्जा सूर्य की ओर केन्द्रित हो जाएगी। यही बदलाव का कारण बनेगा। इसका आधार यह लिया गया है कि पृथ्‍वी की साढ़े 66 डिग्री के झुकाव के साथ घूर्णन गति के चलते सभी आकाशीय पिण्‍ड एक निश्चित क्रम में चलते हुए दिखाई देते हैं। हर 26000 साल बाद पृथ्‍वी वापस उसी कोण पर पहुंच जाती है जहां से सूर्य आकाशगंगा के बीचों-बीच दिखाई देने लगता है।

            बहुत पहले एक जर्मन वैज्ञानिक ने हर ग्‍यारह साल बाद सूर्य में होने वाले बड़े विस्‍फोटों और उससे दुनिया पर होने वाले प्रभावों के बारे में बताया था। तब उस वैज्ञानिक को चुप करा दिया गया था। अब लगभग उसी सिद्धांत से मेल खाता एक नया सिद्धांत तैयार है कि एक समय ऐसा आता है जब मिल्‍की वे 'हमारी आकाशगंगा' जो एक तश्‍तरी की तरह है के बीचों-बीच सूर्य आ जाता है। यहां बीचों-बीच से मतलब आकाशगंगा के कोर से नहीं बल्कि पृथ्‍वी से दिखाई देने वाली अवस्‍था से है। जब सूर्य ऐसे कोण में आएगा तो पृथ्‍वी पर बहुत बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होंगे। 

            नास्‍त्रेदमस पर किताबें लिख रहे लेखक ही यह पूछते हैं कि क्‍या ये सब संयोग है या किसी अनहोनी का संकेत। वे मानते हैं कि मिश्र सभ्‍यता, प्राचीन कैथोलिक चर्च, दक्षिण अमरीका के होपी और माया सभ्‍यता में भी पृथ्‍वी या सृष्टि के खत्‍म होने का एक समय निश्चिता किया गया है। लेखकों ने उन सभ्‍यताओं की विभिन्‍न प्रणालियों से मिल रहे संकेतों को भी नास्‍त्रेदमस के संकेतों के साथ मिलाया है और सिद्ध किया है कि शीघ्र ही पृथ्‍वी का अंत होने वाला है। 

            इसी क्रम में पहले मैं भी एक सवाल खड़ा कर चुका हूं कि क्‍या मौसम चक्र में हो रहा परिवर्तन, मण्‍डेन में हो रहे बड़े परिवर्तनों का सूचक नहीं है। यह परिवर्तन हमें किस ओर लेकर जाता है। मुझे तो यह व्‍यवस्‍था में परिवर्तन का विरोध मात्र लगता है। प्राकृतिक आपदाएं कब नहीं थी, लेकिन मौसम चक्र में परिवर्तन पहले कभी नहीं रहा होगा। अब चूंकि यह शताब्दियों में घटने वाली घटना है तो इसका सही सही अनुमान नहीं किया जा सकता। 

            इन सबके बावजूद होपी, माया, मिश्र सहित कई सभ्‍यताओं में दुनिया के खत्‍म होने का समय निकाला गया है और यह 2012 में आना वाला है। खास बात यह है कि हर सभ्‍यता ने दुनिया के खत्‍म होने का समय तय किया है। पर भारतीय सभ्‍यता में ऐसा नहीं है। ठीक है उस प्‍वाइंट पर बाद में विचार करेंगे लेकिन यहां संकेत देना जरूरी है कि प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में इस संबंध में बहुत सी बातें बहुत स्‍पष्‍ट तरीके से बताई गई हैं। उन पर बात फिर कभी...
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रविवार, अक्टूबर 18, 2009

आदरणीय स्‍वामी नारायणन् जी

हमारे परम गुरूजी स्‍वामी नारायणन् जी




आज मैं आपका परिचय कराना चाहता हूं एक साधू स्‍वामी नारायणन् जी से। किसी से ऑल इंडिया रेडियो में कुछ समय रहने वाले और बाद में केन्‍द्र सरकार के किसी संस्‍थान में नौकरी करने वाले स्‍वामी नारायणन् जी ने करीब सैंतीस साल पहले सन्‍यास ले लिया। तब से अब तक वे एक साधू ही हैं। साल के छह महीने गंगोत्री में रहते हैं और छह महीने निचले इलाकों में आ जाते हैं। हम कुछ लोगों का सौभाग्‍य है कि हम उन तक पहुंच पाए और अब नियमित संपर्क में है। वेद और विज्ञान का उनका अध्‍ययन एक जैसा है। ब्रह्म और इंटरनेट दोनों की बातें इतनी सहजता से करते हैं कि कोई भी उनके सानिध्‍य में खुद को पूरा होता महसूस करने लगता है। हालांकि कुछ साल पहले मुझे भी उनके सानिध्‍य में तीसरी शक्ति का तगड़ा अनुभव हुआ था लेकिन उसे भी उन्‍होंने मेरी ध्‍यान की अवस्‍था बताकर खारिज कर दिया।
सहजता में विश्‍वास करने वाले स्‍वामीजी किसी की बात टालते नहीं हैं। उनके पास कई तरह की खोपडि़यां आती हैं। लेकिन एक झेन साधू की तरह हर किसी के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं जैसे कि वे उनकी तरह ही हों। वे कब कहां और कितने दिन होते हैं कोई कह नहीं सकता। बस लगातार निगरानी रखो तो पता चल जाता है कि इन दिनों स्‍वामी जी कहां हैं। इसी तरह उनके एक शिष्‍य ने उन्‍हें कुछ दिन पहले दिल्‍ली में ढूंढ निकाला और आग्रहपूर्वक बीकानेर ले आए। अपने चार दिन के छोटे प्रवास काल में उन्‍होंने पता नहीं कितने लोगों को अपने स्‍नेह से सराबोर कर दिया। एक दिन मेरे घर भी चाय पीने के लिए आए। तब मेरे अनुज आनन्‍द ने उनसे जी भरकर बातें की।
मेरे श्‍वसुरजी ने उनके कुछ फोटो अपने मोबाइल से लिए। उनसे मांगकर में स्‍वामीजी के कुछ फोटो यहां डाल रहा हूं। ऐसे हैं हमारे परम गुरूजी...

शनिवार, अक्टूबर 17, 2009

ऐसे तो अमीर अमीर बना रहेगा और गरीब, गरीब

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स्थिर लग्‍न में लक्ष्‍मी पूजन की बात पर मेरे एक गुरूजी पंडित मंगलचंद पुरोहित की बात याद आ गई। मैंने उनसे फोन करके पूछा था कि इस साल दीपावली का श्रेष्‍ठ मुहूर्त क्‍या है। तो उन्‍होंने कहा कैसी पूजा करना चाहते हो। वैसा ही मुहूर्त बता देता हूं। मेरे लिए नया सवाल था और उनके लिए पुराना परिहास।

हालांकि ऐसे टैस्‍ट की आदत हो चुकी है लेकिन चौंकना लाजिमी था। मैंने जवाब दिया कि पूजन की विधि से मुहूर्त का क्‍या लेन-देन। तो उन्‍होंने हंसते हुए मुझे वह समय बता दिया जो मुझे अखबार में छापना था। रात बारह बजे के करीब ऑफिस से फ्री हुआ और सीधा पहुंचा उनके घर। वे शायद मेरा ही इंतजार कर रहे थे। उन्‍हें पता था कि शॉट मारा है तो बॉल पकड़ने के लिए चेला दौड़ेगा ही।

खैर, मैंने वापस सूत्र पकड़ लिया। पूछा कि आपने यह क्‍यों पूछा कि कैसी पूजा करना चाहते हो। तो वे बोले कि अगर जो मुहूत तुमने अखबार में छापा है उसी मुहूर्त में पूजा करोगे तो आगे बढ़ने का सपना देखना छोड़ दो। बात उलझ रही थी लेकिन वे जानबूझकर मुझे सोचने का मौका दे रहे थे।

मैंने अगला दांव रखा कि लक्ष्‍मीजी का पूजन तो करूंगा ही इसलिए कि आज जितना धन मेरे पास है अगले साल उससे कुछ अधिक ही हो।

तो उन्‍होंने कहा कि फिर स्थिर लग्‍न में पूजन क्‍यों चर लग्‍न में पूजन क्‍यों नहीं करते। लक्ष्‍मी तो खुद ही चंचला है उसे स्थिर क्‍यों करते हो।

मैंने वापस तर्क दिया कि लक्ष्‍मी को स्थिर करने के लिए ही तो पूजा करते हैं।

तो उन्‍होंने कहा कौनसी ऐसी लक्ष्‍मी तुम्‍हारे पास पड़ी है कि उसे स्थिर कर रहे हो।

अब कुछ खिड़की खुलने लगी। मैंने कहा कि इसका मतलब हुआ कि अगर लक्ष्‍मी को बढ़ाना है तो चर लग्‍न में लक्ष्‍मी पूजन करना चाहिए।

गुरूजी अब तो हंस रहे थे। उन्‍होंने कहा कि फिर लक्ष्‍मी का पूजन स्थिर लग्‍न में क्‍यों करते हैं।

मैं हतबुद्धि बस देख रहा था उन्‍हें। मैंने पूछा बताइए।

तो बोले लक्ष्‍मी पूजन की परम्‍परा सेठों यानि बहुत अमीर लोगों और राजाओं ने शुरू की। इसे एक तरह की दरबारी संस्‍कृति कह सकते हो। इसमें सेठ चाहता है कि उसके पास जितनी लक्ष्‍मी आ गई है वह अपने चंचल स्‍वभाव से वापस छोड़कर न चली जाए। इसलिए उसे जैसी है वैसी ही बने रहने के लिए स्थिर लग्‍न में पूजा करके मनाया जाता था। तब ज्‍योतिषी भी राजा या सेठों के ही हुआ करते थे। आम आदमी तो कम्‍प्‍यूटर के आविष्‍कार के बाद कुण्‍डली दिखाने लगा है। पहले कहां इतने चोंचले हुआ करते थे। तो मुहूर्त बनाते समय ज्‍योतिषियों ने लिख दिया कि लक्ष्‍मी की पूजा स्थिर लग्‍न में करो। अब जिसके पास अकूत धन है वह स्थिर लग्‍न में पूजा करे तो ठीक लेकिन जिसके पास पैसा है ही नहीं या बहुत कम है वह भी स्थिर लग्‍न में पूजा करेगा तो लक्ष्‍मी के बढ़ने की संभावना कहां रखी। अब कोई सोचता तो है नहीं बस लीक पीट रहे हैं। शास्‍त्रों में लिखा है सो स्थिर लग्‍न में पूजा करो। अब तुम्‍हारे पास धन नहीं है तो आगे भी यही स्थिति बनी रहेगी और है तो भी। बदलाव का तो तुम खुद ही विरोध कर रहे हो।

इसके बाद एक और एपीसोड हुआ।

मैंने अगले दिन अपने रेजिडेंट एडीटर से बात की और मंगलचंदजी के नाम से यह प्रश्‍न खड़ा करते हुए इस पर एक लेख अखबार में दे दिया। तो इसका असर यह हुआ कि छोटी काशी बीकानेर के बाकी के कागजी ज्‍योतिषी आंय-बांय-शांय बकने लगे। मैंने इसका बड़ा आनन्‍द लिया। एक राज ज्‍योतिषी टाइप के पंडितजी के तो मैंने भी मजे लिए। वे अखबारों में बहुत छपते थे, सो उन्‍हें लोगों ने व्‍यंग्‍य में राजज्‍योतिषी की उपाधि दे दी है। वास्‍तव में उनका प्राथमिक ज्ञान भी संदेह के घेरे में है। मैंने एक बंदे से कहा कि उन्‍हें फोन लगाए और पूछे कि अखबार में तो स्थिर लग्‍न में पूजा को खराब बताया है क्‍या किया जाए। तो राज ज्‍योतिषीजी ने कहा कि जब मन आए तब पूजा कर लो। लक्ष्‍मी तो माता है आशीर्वाद देंगी ही।

हम दोनेां हंसते हुए दोहरे हो गए थे...

आपका क्‍या ख्‍याल है...

स्थिर लग्‍न में पूजा करेंगे ताकि जितनी लक्ष्‍मी आपके पास है उतनी ही बनी रहे या

चर लग्‍न में पूजा करेंगे ताकि जितनी लक्ष्‍मी है उससे कम या ज्‍यादा हो, हां कम होने के चांसेज भी हैं। भई उसे चलायमान कर रहे हैं आ भी सकती है और जा भी सकती है या

द्विस्‍वभाव लग्‍न में पूजा करेंगे ताकि कभी आए कभी जाए बस काम चलता रहे :)


स्‍वामी नारायणजी ने बताया:

मेरा सौभाग्‍य है कि हमारे परम गुरूजी स्‍वामीनारायणन् जी इन दिनों बीकानेर में है। मैंने उन्‍हें अपना ब्‍लॉग और पिछले दिन खड़ा किया गया प्रश्‍न बताया। कल सुबह उन्‍होंने पोस्‍ट देखी लेकिन कुछ कहा नहीं लेकिन आज शाम पांच बजे के आस-पास उनका फोन आया और उन्‍होंने कहा कि लक्ष्‍मी पूजन हमेशा स्थिर लग्‍न में ही होगा। इसका कारण यह है कि पूजन दो स्‍तर पर होता है। पहले भाग में लक्ष्‍मी का आह्वान होता है और दूसरे भाग में उनसे घर में ही स्थिर बने रहने की प्रार्थना की जाती है। इसलिए चाहे जातक धनवान हो या निर्धन उसे स्थिर लग्‍न में ही पूजा करनी चाहिए। स्‍वामीजी ने कहा कि निर्धन को इसलिए कि उसे धन की जरूरत है और धनवान को इसलिए क्‍योंकि धन की लालसा कभी खत्‍म न होने वाली है। अब तक जिन जातकों ने मेरे लेख को पढ़ा है और उपापोह की स्थिति में आए हैं उनसे क्षमा मांगते हुए प्रार्थना करता हूं कि वे स्थिर लग्‍न के दौरान ही पूजन करें। अभी रात करीब साढ़े नौ बजे तक पूजन किया जा सकता है और इसके बाद रात को सिंह लग्‍न होगा। वह भी स्थिर लग्‍न है। यानि रात दो से चार बजे के बीच पूजन कर लक्ष्‍मीजी को प्रार्थना की जा सकती है।

स्‍वामीजी ने पंडित डी.के. शर्मा जी के श्री वाले सिद्धांत के बारे में भी स्‍पष्‍ट किया है। उसे मैं बाद में अलग पोस्‍ट में दूंगा।

शनिवार, अक्टूबर 10, 2009

तो चलें समय के उस फलक पर

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आइंस्‍टाइन का एक कोट पढ़ा। अभी कुछ देर पहले तो जैसे दिमाग के हजारों तार एक साथ झनझना गए। उन्‍होंने कहा 'कुछ भी घटित नहीं होता सबकुछ घटित हो चुका है। हम उसे देख सकते हैं अगर टाइम मशीन हो।' यह अंग्रेजी में था, और हो सकता है मूल रूप से जर्मन भाषा में रहा हो, तो इसका हिन्‍दी तक पहुंचते-पहुंचते गलत अर्थ निकल गया हो। लेकिन मुझे यही अर्थ सही लगा। क्‍योंकि वे प्रकाश से तेज रफ्तार होने पर समय से आगे निकल जाने यानि भविष्‍य में पहुंच जाने की बात करते थे। यह भी मैंने सुना ही है।

अब वापस बात करता हूं घटनाओं से पहले ही घटे होने और उनको भविष्‍य में पहुंचकर प्रत्‍यक्ष देखने की। यह तथ्‍य एक ओर भविष्‍य दर्शन की बात करता है तो दूसरी ओर सबकुछ पूर्व नियत होने की। दोनों ही स्थितियां भाग्‍यवाद को बढ़ावा देने वाली दिखाई देती हैं। कई पाठक समझ चुके होंगे फिर भी मैं अपने दिमाग के स्‍तर पर इस बात को और स्‍पष्‍ट करने की कोशिश करता हूं। पहला तथ्‍य कि भविष्‍य दर्शन। जहां हम ज्‍योतिषी भविष्‍य में झांकने की बात करते हैं वहीं आइंस्‍टाइन भविष्‍य को मैटीरियलिस्टिक तरीके से यानि अपने चर्म चक्षुओं से देखने की बात कर रहे हैं। उस भविष्‍य को जिसे हम सामान्‍य तौर पर अज्ञात के रूप में जानते हैं। इसका अर्थ हुआ कि एक निश्‍चत भविष्‍य भी है। और ऐसा कि जिसे देखा और महसूस किया जा सकता है। बस समय से तेज भागने की जरूरत है। हालांकि ज्‍योतिषी भी यही कोशिश करते नजर आते हैं। तरीका भिन्‍न है। ज्‍योतिषी आज के आधार पर गणनाएं करते हैं और भविष्‍य की खिड़की में झांककर देखने का प्रयास करते हैं। यह भी समय से तेज दौड़ने की ही एक प्रक्रिया लगती है। बस अंतर इतना है कि यह काम वर्चुअल होता है।

अब दूसरा पहलू यह कि दोनों ही स्थितियां तभी संभव है कि सबकुछ पूर्व नियत हो। यानि प्री सैट। कब क्‍या और कैसे होना है, किसे क्‍या करना है, किसे क्‍या भोगना है, किसे क्‍या देखना है, किसे क्‍या कहना है, किसे क्‍या काम करना है, किसे खाली बैठे रहना है, किसे घटनाओं का विश्‍लेषण करना है। यहां तक कि किसे खून करना है, किसे खबर बनानी है, किसे मुजरिम को पकड़ना है और किसे सजा देनी है....            सबकुछ।

ऐसे में अगर अपराधी यह कहकर हत्‍या करता है कि न तो मैं मरने वाला हूं न मारने वाला हूं जो करता है वही करता है, सारे सिस्‍टम को उखाड़ देगा। पर एक बंधन यहां फिर भी रह जाता है, वह यह कि गिरफ्तार होना और सजा देना भी पूर्व नियत स्थितियों की श्रेणी में आते हैं। मैं खुद को भी नहीं छोड़ना चाहता, किसी जातक द्वारा प्रश्‍न किया जाना और मेरा जवाब देना, उस जवाब का सही या गलत होना भी पूर्व नियत हो सकता है। ठीक उसी तरह जैसे अपराधी द्वारा अपराध करना और सजा पाना अथवा बचकर निकल जाना :)

ऐसे में मैं यही कह सकता हूं कि कभी चलें समय के उस फलक पर जहां भविष्‍य स्‍पष्‍ट दिखाई देता हो, जहां पता चले कि आज के किए या कराए कर्मों की क्‍या परिणिती हुई साफ दिखाई दे।

क्‍या ख्‍याल है चलें समय के उस फलक पर.... चाहें तो प्रकाश से तेज गति करके या वर्चुअल...

रविवार, अक्टूबर 04, 2009

मानव निर्मित उपग्रहों का असर मानव जीवन पर?

अभी संगीताजी का ब्‍लॉग पढ़ रहा था वहां गिरिजेश रावजी का एक सवाल मिला। मुझे लगा कि मैं जवाब दे सकता हूं सो उठा लिया। हो सकता है इससे संगीता दी नाराज हों लेकिन मैं यह रिस्‍क उठाने को तैयार हूं। अब कुछ तो विषय हो जो मन का हो, तो कुछ लिखें भी...

 

ठीक है सवाल है मान‍व निर्मित उपग्रहों का मानव जीवन पर कोई प्रभाव होता है क्‍या

जवाब है नहीं।

वास्‍तव में तो ग्रहों का भी मानव जीवन पर कोई प्रभाव नहीं होता। क्‍योंकि वे अपनी ओर से कोई ऊर्जा या किरणें उत्‍सर्जित नहीं करते हैं। चंद्रमा के अलावा किसी अन्‍य ग्रह का अगर कोई प्रभाव गुरुत्‍वाकर्षण के कारण होता भी है तो वह इतना कम है कि उसकी वास्‍तविक गणना नहीं की जा सकती।

अब आप कहेंगे कि अब तक तो आप कहते रहे हैं कि इस ग्रह का यह प्रभाव है उस ग्रह का वह प्रभाव है और अब कह रहे हैं कि ग्रह का प्रभाव ही नहीं है।

सही बात है यह समझने की चूक है। जहां ग्रहों की बात कही जा रही है वह वास्‍तव में ग्रहों के अधिकार क्षेत्र की बात है न कि ग्रहों के खुद के प्रभाव की। इसके बारे में पहली बार केएस कृष्‍णामूर्ति ने बहुत अधिक स्‍पष्‍ट किया। हालांकि उनसे सैकड़ों साल पहले महर्षि पाराशर भी बहुत अधिक विस्‍तार से अपनी बात कह गए थे लेकिन बाद के लोगों ने केवल लकीर पीटी।

ध्‍यान दीजिए, कुण्‍डली में बारह खाने होते हैं, हर खाना तीस डिग्री का होता है, ग्रह उन खानों में घूमते रहते हैं, हर खाने की एक निश्चित राशि होती है, हर ग्रह एक निश्चित राशि में निश्चित प्रभाव देता है। यानि भाव और राशियों में घूम रहे ग्रहों का प्रभाव भी बदल जाता है। बारह खाने और बारह राशियों में एक ग्रह के 144 तरह के प्रभाव होते हैं।

तो ग्रह अपना प्रभाव कहां दे रहा है वह तो स्‍थान का प्रभाव समझा रहा है।

बात कुछ स्‍पष्‍ट हुई, नहीं,

ठीक है, इसे इस तरह समझिए कि जो पिण्‍ड ऊर्जा का उत्‍सर्जन करेगा वही हम तक प्रभाव पहुंचाने में सफल होगा। अब प्रभावों की गणना करने के लिए हमें टैग्‍स की भी जरूरत होगी। जैसे इंटरनेट पर सर्च इंजन को किसी टॉपिक को ढूंढने के लिए टैग्‍स की जरूरत पड़ती है, ठीक उसी तरह। तो अध्‍ययन के लिहाज से पूरे आकाश को बारह भागों में बांटा गया और उसमें विचरण कर रहे ग्रहों को (इसमें सूर्य और चंद्रमा को भी ग्रह मान लिया गया, वास्‍तव में इनमें से एक तारा है और दूसरा उपग्रह) प्रभावों के अध्‍ययन का आधार। पूरी गणनाएं इन्‍हीं को आधार मानकर की गई हैं।

अब सवाल यह कि पृथ्‍वी से छोड़े गए उपग्रहों के प्रभावों को इनमें शामिल किया जा सकता है क्‍या।

अपवर्तन और परावर्तन के सिद्धांतों को देखें तो जब तक चालीस या पचास हजार या इससे भी अधिक उपग्रह पृथ्‍वी के चारों ओर फैल नहीं जाते और किरणों की  राह में प्रभावी बाधा नहीं बन जाते, उनका प्रभाव इतना कम ही रहेगा कि गणना नहीं की जा सकती।

हो सकता है 2100 या 2200 के बाद यह नौबत भी आ जाए।

रविवार, सितंबर 06, 2009

'तीस साल बाद लौटा है शनि'

Saturn

ऐसा मैं अभी कल ही एक लेख के हैडिंग में पढ़ चुका हूं। इसमें बताया गया था कि नौ सितम्‍बर को शनि तीस साल बाद कन्‍या राशि में लौटेगा। मुझे किसी ने यह लेख लाकर दिखाया तो हंसी छूट गई। हैडिंग करीब साठ प्‍वाइंट के फोंट में थी। आमतौर पर किसी रहस्‍योद्याटन के समय ऐसे फोंट इस्‍तेमाल किए जाते हैं। जो मुझे दिखा रहा था, उसके चेहरे का नूर गायब था। क्‍योंकि उसकी राशि में शनि के इस परिवर्तन को खराब बताया गया था। स्थिति हद से ज्‍यादा हास्‍यास्‍पद थी। लेकिन क्‍या किया जाए। जिस विधा को परम्‍परागत और बोगस करार देकर किनारे फेंक दिया जाएगा उसके परिणाम ऐसे ही आएंगे। ऐसा क्‍या है, कि ज्‍योतिष की प्राथमिक जानकारियों से भी लोग दूर रहते हैं। इसी कारण चाहे हल्‍के साहित्‍य वाली किताबें, ज्‍योतिष की मैग्‍जीन  हो या भले ही इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया इन प्राथमिक जानकारियों को सनसनीखेज खुलासे के रूप में पेश करते हैं। और लोग जो वास्‍तव में डरना चाहते हैं और अपनी असफलताओं का ठीकरा ग्रहों पर डालना चाहते हैं इनसे जबरदस्‍त प्रभावित होते हैं। हर तरफ यही चर्चा होने लगती है। सोचने की बात है कि क्‍या आम आदमी की जिंदगी को वास्‍तव में शनि इस कदर प्रभावित करेगा कि सारा वातावरण ही बदल जाए। क्‍या शनि पहली बार इस राशि में आया है। क्‍या शनि इतना खतरनाक है। क्‍या हर राशि इससे प्रभावित होगी।

वाह शनि को अल्‍टीमेट विलेन हो गया है ग्रेट इंडियन एस्‍ट्रोलॉजिकल सर्कस में :)

सही कहूं तो आम आदमी जो इस प्रकार के खुलासों और सनसनीखेज से प्रभावित होता है इस सर्कस का कॉमेडियन है।

गोचर के ग्रहों की अपनी नियमित चाल है और दुनिया में छह अरब लोग इन ग्रहों और नक्षत्रों की छांव में आराम से अपनी जिंदगी व्‍यतीत कर रहे हैं। सूर्य के चारों और ग्रहों की गति और पृथ्‍वी से उनका सापेक्ष घूर्णन विभिन्‍न राशियों में ग्रहों की उपस्थिति को बताता है। ऐसे में ग्रहों का गोचर भ्रमण आम जिंदगी को बहत अधिक प्रभावित नहीं कर सकता। दूसरी बात राशियों की। कुछ लोग सूर्य राशि से देखते हैं, कुछ चंद्र राशि से और जिन्‍हें थोड़ा अधिक ज्ञान है वे लग्‍न से देखते हैं। वास्‍तव में कहां से कहां तक मार होगी कहीं स्‍पष्‍ट नहीं है। न ही कोई करना चाहता है। क्‍योंकि ऐसे गोचर का प्रभाव मण्‍डेन पर तो स्‍पष्‍ट हो सकता है लेकिन किसी व्‍यक्ति विशेष पर हो ऐसा मुझे तो नहीं लगता। क्‍योंकि इन ग्रहों की चाल निश्चित है। इतनी अधिक कि दस हजार साल बाद इनकी क्‍या स्थिति होगी, आज बताया जा सकता है। ऐसे में फलादेश निकालते समय ग्रहों के गोचर का परिणाम भी इसमें शामिल हो सकते हैं।

अब देखें कहां से आया शनि और कहां जा रहा है

हर ग्रह की अपनी चाल होती है। सूर्य एक माह में, चंद्रमा ढाई दिन में, मंगल डेढ महीने में, शुक्र सत्‍ताईस दिन में, गुरू तेरह महीने में, बुध तीस दिन में, राहू और केतू डेढ़ साल में और शनि ढाई साल में एक बार अपनी राशि बदलता है। यानि एक साल में सूर्य बारह राशियां बदल लेता है तो इतनी ही राशियां बदलने में शनि को पूरे तीस साल लगते हैं। अब आपको समझ में आ गया होगा कि तीस साल तक शनि कहां था। अरे कहीं नहीं गया था यहीं था अभी कन्‍या में आया है, इससे पहले सिंह में था, उससे पहले कर्क में। हर ढाई साल में एक-एक राशि बदलता हुआ आखिर वापस कन्‍या में आ पहुंचा है। इसमें अटपटा कुछ भी नहीं है।

साढ़ेसाती, कंटक और ढैय्या

इसके बारे में मैं एक लेख में पहले दे चुका हूं। किसी जातक की जिंदगी में कम से कम तीन बार साढ़े साती आती है। यानि जन्‍म राशि के पैंतालीस डिग्री के अन्‍दर शनि का प्रवेश और पैंतालीस डिग्री बाहर निकलने तक। कब तक डरते रहेंगे साढ़े साती से लेख में आप इस बारे में अधिक विस्‍तार से पढ़ सकते हैं।

गुरुवार, अगस्त 27, 2009

नास्‍त्रेदमस की टाइमिंग

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इन दिनों 2012 की चिंता के साथ एक बार फिर नास्‍त्रेदमस लाइम लाइट में आ चुके हैं। बहुत छोटा था तब नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक मेरी माताजी खरीद कर लाई थीं। उन्‍हें पक्‍का विश्‍वास था कि दुनिया जल्‍दी ही खत्‍म हो जाएगी। और नास्‍त्रेदमस भी यही कह रहे थे। मेरी माताजी के इस विश्‍वास के कई कारण थे लेकिन नास्‍त्रेदमस के पास कुछ जुदा कारण हैं। किताब के मुखपृष्‍ठ पर नास्‍त्रेदमस का अपने क्रिस्‍टल के साथ इतना आकर्षक फोटो था कि मैं घण्‍टों तक केवल फोटो को ही देखता रहता था। वह मूल किताब का हिन्‍दी अनुवाद था।

मुझे बहुत अधिक समझ नहीं थी लेकिन इतना उसमें स्‍पष्‍ट था कि नास्‍त्रेदमस ने दुनिया का भविष्‍य बहुत साल पहले ही लिख दिया है। और वह जल्‍द ही खत्‍म भी होने वाली है। अलग अलग सूत्रों का विश्‍लेषण करके बताया गया था कि इतिहास में अब तक जो घटनाएं हुई हैं उन्‍हें नास्‍त्रेदमस ने अपने क्रिस्‍टल बॉल में देख लिया था और उलझी हुई भाषा में लिख दिया था। ताकि उसे तत्‍काल कोई परेशान न करे। उसमें यह भी बताया गया था कि अब वे भविष्‍यवाणियां सच साबित हो रही हैं।

इसके बाद कई साल तक नास्‍त्रेदमस का नाम सुनाई नहीं दिया। जब मैं लाल किताब पढ़ रहा था तो उसकी भाषा और नास्‍त्रेदमस की चौपाइयों में कई समानताएं दिखाई दी। भाषा के दृष्टिकोण से। तब नास्‍त्रदेमस की दोबारा याद आई। ढूंढ-ढांढकर किताब निकाली और उसे फिर पढ़ गया। शेर और चीते की लड़ाई का एक दृश्‍य को अब भी ऐसा जेहन में बैठा है कि लगता है लड़ाई मेरे सामने हुई थी। उन दिनों मैंने कई लोगों के समक्ष नास्‍त्रेदमस की बात की। लेकिन उस दौर में किसी को भी मेरी बातों में इंट्रेस्‍ट नहीं आया। मैं किनारे हो गया।

फिर इराक पर हुए हमले और इराक के पास जैविक हथियारों के जखीरे की खबरों के बाद एक बार फिर नास्‍त्रदेमस का नाम चमका। कई किताबें बाजार में आ गई। घोषणा हुई कि वाईटूके वास्‍तव में एक सिंबल है जो बताता है कि दुनिया इक्‍कीसवीं सदी के दर्शन ही नहीं कर पाएगी। कई लोग बहुत चिंतित थे। बीकानेर में जहां हर समय अलमस्‍त मौसम रहता है कई लोगों के चेहरे पर प्रलय का भय दिखाई देने लगा। लोग पाप और पुण्‍य की बातें करने लगे। हालांकि बैकग्राउंड में जैविक हथियारों के काम करने के तरीके पर भी बहस चल रही होती लेकिन मुद्दा वही था कि दुनिया तो खत्‍म हो जाएगी।

इसके बाद अब तीसरा दौर देख रहा हूं। पिछले साल अमरीका बुरी तरह मंदी की चपेट में आ गया। लोगों के घर बिक गए, नौकरियां छूट गई और धंधे बंद हो गए। पूरी तरह ऑटोमैटिक घरों में रहने वाले लोग कारों में रहने और सोने लगे। यानि सोसायटी से कटने के बाद अब सुविधाओं से भी कट चुके लोगों के पास जीने का कोई कारण नहीं बचा। ऐसे में एक बार फिर नास्‍त्रेदमस आ गए हैं। इस बार आए हैं 2012 की भविष्‍यवाणी लेकर। इसमें दुनिया में आज तक हुए बदलावों और मशीनीकरण पर खुलकर चर्चा की गई है। देश, समाज और उपलब्‍ध संसाधनों के तेजी से हो रहे क्षय पर चर्चा है। और साथ में सवाल खड़ा किया गया है कि क्‍या वास्‍तव में नास्‍त्रदेमस के अनुसार वर्ष 2012 में दुनिया खत्‍म हो जाएगी।

यह भूमिका समझिए अगली पोस्‍ट में चर्चा करूंगा कि क्‍यों ऐसा होता है कि जब दुनिया में संकट आता है तभी नास्‍त्रेदमस याद आते हैं। और मुझे नास्‍त्रेदमस की चौपाइयों में क्‍या दिखता है।

चित्र गूगल सर्च से साभार

रविवार, अगस्त 23, 2009

इक्‍कीसिया गणेशजी : विशेष मांग पर

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ज्‍योतिष का यह ब्‍लॉग शुरू किया तो विषय पर लिखने के दौरान कई बार लगता कि ब्‍लॉग सूना-सूना लगता है। सो इस पर अपने ईष्‍टदेव इक्‍कीसिया गणेशजी का फोटो लगा दिया। शुरूआत में लोगों ने ध्‍यान दिया या नहीं लेकिन बाद में बहुत से लोगों ने पूछा कि ये इक्‍कीसिया गणेशजी कहां है, इनका क्‍या महत्‍व है।

शायद ज्‍योतिष के ब्‍लॉग पर  गणेशजी की तस्‍वीर होने के कारण कौतुहल का कारण बनी होगी। आज गणेश चतुर्थी है। गणेशजी का खास दिन है सो लगा आज ही इक्‍कीसिया गणेशजी के बारे में जानकारी देनी चाहिए। बीकानेर शहर के पश्चिमी कोने में किराडूओं की बगीची में स्थित गणेशजी के इस मंदिर की स्‍थापना का दिन तो मुझे नहीं पता लेकिन इसके साथ एक तथ्‍य जुड़ा है। वह यह कि इसे इक्‍कीस पुष्‍य नक्षत्रों के दिन बनाया गया था। जितनी देर तक पुष्‍य नक्षत्र चलता उतनी देर तक मूर्ति बनाने का काम होता और बाद में अगले नक्षत्र पर फिर से शुरू होता। इक्‍कीस पुष्‍य नक्षत्रों तक यह काम चला और मूर्ति बन गई। इसमें गणेशजी की गोद में सिद्धि भी विराजमान है। आमतौर पर मूर्ति का श्रृंगार इतना अधिक होता है कि पता ही नहीं चलता कि मूर्ति का वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या है। एक दिन हमारा फोटोग्राफर नौशाद अली मंदिर पहुंचा तो उसे बिना श्रृंगार के गणेशजी दिखाई दिए। वह उनकी फोटो ले आया। उसी फोटो को मैंने इस ब्‍लॉग पर लगा रखा है।

मन्‍नतें पूरी होती गई

इस मंदिर की खासियत यह है कि इक्‍कीस दिन तक रोजाना बिना बोले मंदिर जाने और गणेशजी की इक्‍कीस फेरी रोजाना लगाने पर मन की इच्‍छा पूरी हो जाती है। मैं जब पहली बार इस मंदिर में गया था तो यह छोटा सा मंदिर था। गर्भग्रह के पीछे इतनी कम जगह थी कि एक बार में दो जन फेरी नहीं लगा पाते थे। लेकिन गणेशजी का चमत्‍कार ही है कि उन्‍होंने लोगों की इच्‍छाएं इतनी तेजी से पूरी की कि मंदिर बड़ा होता गया। अब यह शहर का सबसे ग्‍लोरियस मंदिर बन गया। जब मैंने जाना शुरू किया था तो मैं डिप्रेशन में था और एकांत की खोज में वहां जाकर बैठता था। मन को बड़ा सुकून मिलता था। तीन साल तक रोज जाता रहा। कभी कुछ मांगा नहीं लेकिन मेरी स्थिति में तेजी से बिना मांगे सुधार होता गया। एकाध बार मैंने मन में इच्‍छा लेकर फेरी निकालनी शुरू की तो बाधा आ गई और फेरियां पूरी नहीं कर पाया। तो फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया। जब भी बिना मांगे जाता था तो नियमित रूप से बिना नागा महीनों तक यह क्रम चलता रहता। मांगने पर ही बाधा आती।  बहुत से लोग  इक्‍कीस दिन फेरियां नहीं निकाल पाते हैं। कुछ लोग जो निकाल लेते हैं उन्‍हें पुत्र संपत्ति जैसी चीजें आसानी से मिल जाती है। कालान्‍तर में दूसरे लोगों की इच्‍छाएं पूरी हुई तो मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। अब तो हालात ये हैं कि बुधवार के दिन गणेशजी की परिक्रमा एक साथ चालीस या पचास लोग करते हैं। कई बार तो दर्शन भी मुश्किल से होते हैं। अब मैंने जाना कम कर दिया है। साल में एकाध बार ही जा पा रहा हूं। लेकिन मन में वही पुरानी वाली छवि है। कभी उपापोह में होता हूं तो गणेशजी को याद करता हूं और समस्‍या का समाधान हो जाता है। यह मेरी आस्‍था से अधिक जुड़ा है सो यही मेरे ईष्‍ट हुए।

बस इतनी सी बात है... :)