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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

अनजान हैं हम नक्षत्रों के नैसर्गिक गुणों से

ज्‍योतिष की किताबों में आपको ग्रहों, राशियों और भावों के बारे में विस्‍तार से जानकारी मिल जाएगी। इससे अधिक देखने पर हम पाते हैं कि राशियों को नक्षत्रों के अनुसार विशिष्‍टता दी गई है। चंद्रमा भी नक्षत्रों पर से गुजरते हुए हमें रोज के बदलावों की जानकारी देता है। ज्‍योतिष की प्राचीन और नई पुस्‍तकों में यह तो दिया गया है कि अमुक नक्षत्र में चंद्रमा के विचरण का फलां फल है, लेकिन कहीं यह नहीं बताया गया है कि नक्षत्र का नैसर्गिक स्‍वभाव क्‍या है या उस पर किसी ग्रह के स्‍वामित्‍व का वास्‍तविक अर्थ क्‍या है।

पाराशर ऋषि ने नक्षत्र चार के आधार पर ही दशाओं का विभाजन किया लेकिन नक्षत्रों के बारे में विस्‍तार से जानकारी नहीं दी। इसी तरह प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति ने केवल चंद्रमा के नक्षत्र चार से बाहर आकर हर भाव और ग्रह के नक्षत्रों तक उतरकर विशद् विश्‍लेषण पेश किया, लेकिन उन्‍होंने ने भी कहीं नक्षत्रों की निजी विशिष्‍टताओं के बारे में स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है। जबकि वृहत्त संहिता और दूसरी एकाध प्राचीन पुस्‍तक में नक्षत्रों के स्‍वरूप का वर्णन तक मिलता है। इन नक्षत्रों के स्‍वरूप के आधार पर ही उनके गुण भी बताए गए हैं।

जब नक्षत्र के बारे में इतनी सटीक जानकारी उपलब्‍ध है तो उनके निजी या एकांगिक गुणों के बारे में कहीं स्‍पष्‍ट नहीं किया जाना कुछ खल जाता है। नक्षत्रों में विचरण को दौरान अगर चंद्रमा के स्‍वभाव में नियमित रूप से परिवर्तन आता है तो क्‍या अन्‍य ग्रहों पर भी ऐसे प्रभाव का अध्‍ययन जरूरी नहीं है।

पहले पता करते हैं कि नक्षत्र हैं क्‍या?

पहले हमने देखा कि बारह राशियां भचक्र के 360 डिग्री को बराबर भागों में बांटती हैं। इस तरह आकाश के हमने बारह बराबर टुकड़े कर दिए। तारों का एक समूह मिलकर नक्षत्र बनाता है। ऐसे सत्‍ताईस नक्षत्रों की पहचान की गई है। इससे आकाश को बराबर भागों में बांटा गया है। हर नक्षत्र के हिस्‍से में आकाश का 13 डिग्री 20 मिनट भाग आता है। जब हम चंद्रमा के दैनिक गति की बात करते हैं कि इसमें नक्षत्रों की विशेष भूमिका होती है। राशि वही हो और नक्षत्र बदल जाए तो चंद्रमा का स्‍वभाव भी बदल जाता है। इसी तरह हर ग्रह के स्‍वभाव में भी नक्षत्र चार के दौरान बदलाव आता है। चूंकि नक्षत्रों का स्‍वामित्‍व ग्रहों को ही दिया गया है। ऐसे में स्‍वभाव में परिवर्तन भी ग्रहों के अनुसार ही मान लिया जाता है। जबकि हकीकत में यह नक्षत्र की नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुसार होना चाहिए।

सत्‍ताईस नक्षत्र और उनका विभाजन

अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्‍य, आश्‍लेषा, मघा, पूर्वा फाल्‍गुनी, उत्तराफाल्‍गुनी, हस्‍त, चित्रा, स्‍वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्‍येष्‍ठा, मूला, पूर्वषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्‍ठा, शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र बताए गए हैं। ये इसी क्रम में रहते हैं।

इन नक्षत्रों का स्‍वामित्‍व कुछ इस तरह दिया गया है कि केतू, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहू, गुरु, शनि और बुध क्रमश: पहले से नौंवे नक्षत्र के अधिपति है। इसके बाद दसवें नक्षत्र का अधिपति फिर से केतू हो जाता है। नौ ग्रहों में से हर एक के हिस्‍से में तीन-तीन नक्षत्र आते हैं। राशियों ने नक्षत्रों के टुकड़ों को बांटा है। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं। इस तरह 27 नक्षत्र हर चरण के आधार पर आकाश के टुकड़े करे तो कुल 108 टुकड़े होंगे। एक राशि के तहत सवा दो नक्षत्र आते हैं। यानि नक्षत्र के नौ चरण।

नक्षत्रों का वर्गीकरण (वृहत्त संहिता के अनुसार)

ध्रुव नक्षत्र – उत्‍तराषाढ़ा, उत्‍तरा फाल्‍गुनी और उत्‍तरा भाद्रपद व रोहिणी

तीक्षण – मूल, आर्द्रा, ज्‍येष्‍ठा और आश्‍लेषा

उग्र – पूर्व फाल्‍गुनी, पूर्वषाढ़ा, पूर्वभाद्रपद, भरणी और मघा

क्षिप्र - हस्‍त, अश्विनी और पुष्‍य

मृदु - अनुराधा, चित्रा, रेवती और मृगशिरा

मृदु तीक्ष्‍ण – कृतिका और विशाखा

कारा - श्रवण, धनिष्‍ठा, शतभिषा, पुनर्वसु और स्‍वाति

Encyclopedia of astrological remedies : LALA KITAB

उपायों का विश्‍वकोष : लाल किताब

ज्‍योतिष के मूल रूप से दो भाग हैं। इनमें से एक है सिद्धांत और दूसरा है फलित। सिद्धांत पक्ष में ज्‍योतिष का वह भाग है जो खगोलीय गणनाओं से संबंधित है और इन गणनाओं में से ज्‍योतिष के उपयोग में आने वाली गणनाओं का इस्‍तेमाल किया गया है। जैसे कि आकाश को 360 डिग्री में बांटकर उसका 12 बराबर भागों में विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की गति और ग्रहण जैसी घटनाएं। आकशीय घटनाओं की पुख्‍ता जानकारी मिलने के बाद उनका मानव जीवन पर असर के बारे में अध्‍ययन ज्‍योतिष का फलित हिस्‍सा है। 

             फलित ज्‍योतिष में आकाशीय घटनाओं का मानव जीवन से संबंध जोड़ा गया है। जब ज्‍योतिषी ग्रहों की चाल के आधार पर जातक को भविष्‍य बता देता है तो जातक का अगला सवाल होता है कि ग्रहों की चाल के कारण बन रही खराब स्थितियों से कैसे बचा जाए। इसके लिए फलित ज्‍योतिष में उपायों का विकास हुआ। 

             प्राचीन या वैदिक कही जाने वाली भारतीय फलित ज्‍योतिष में उपचारों के लिए दान, जप और पूजन का प्रावधान दिया गया था। यह कमोबेश ग्रहों की स्थिति के कारण बन रही खराब स्थितियों के लिए प्रायश्चित की तरह था, लेकिन लाल किताब ने उपायों की एक नई सीरीज शुरू की। हालांकि यह पारंपरिक ज्‍योतिष से कुछ हटकर गणनाएं करती है, लेकिन उसके आधार पर बताए गए उपचार इतने अधिक और सटीक हैं कि हमें ग्रहों के कारण बन रही खराब स्थितियों से निपटने के लिए बहुत अधिक संभावनाएं मिल जाती हैं। 

             लाल किताब ज्‍योतिष की ऐसी पुस्‍तक है जो पारंपरिक ज्‍योतिष की तरह कुण्‍डलियों के विश्‍लेषण को दरकिनार कर अपनी पद्धति पेश करती है। इसके अनुसार राशियों की चाल का कोई महत्‍व नहीं है। लग्‍न हमेशा मेष राशि होगी और इसी तरह बारह भावों में बारह राशियां स्थिर कर दी गई हैं। 

             उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न के जातक की कुण्‍डली भी बनाई जाए तो भी लग्‍न मेष ही रहेगा। शेष ग्रह जिस भाव में बैठे हैं उन्‍हीं का इस्‍तेमाल किया जाएगा। ऐसे में कोई ग्रह उच्‍च या नीच का होगा तो भावों में स्थिति की वजह से होगा। इसकी भाषा मूल रूप से उर्दू और हिन्‍दी का मिला जुला रूप है। जो ग्रह खराब प्रभाव वाले हैं उन्‍हें अपने स्‍थान से हटाकर दूसरे स्‍थानों पर ले जाया जा सकता है। 

             अगर सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हकीकत में खगोलीय पिण्‍डों को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर खिसकाना असंभव है, लेकिन लाल किताब कहती है कि ग्रहों को भले ही न खिसकाया जा सकता हो, लेकिन जातक की कुण्‍डली में उसके प्रभाव को बदला जा सकता है। हर ग्रह के प्रभाव को बदलने के लिए लाल किताब ने तय सिद्धांत भी बनाए हैं। मसलन किसी ग्रह को लग्‍न में लाने के लिए उससे संबंधित रत्‍न, धातु अथवा वस्‍तु को गले में पहनना होगा। इससे ग्रह का असर ऐसा होगा कि वह लग्‍न में बैठा है। 

             इसी तरह दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए घर में वस्‍तु स्‍थापित करें, तीसरे भाव के लिए हाथ में, चौथे के लिए बहते पानी में, पांचवे के लिए स्‍कूल में, छठे के लिए कुएं में, सातवें के लिए जमीन में, आठवें के लिए श्‍मशान में, नौंवे के लिए धर्मस्‍थान में, दसवें के लिए सरकारी प्‍लाट या भवन में और बारहवें भाव में किसी वस्‍तु तो पहुंचाने के लिए छत पर संबंधित वस्‍तुओं को रखना होगा। लाल किताब कहती है कि ग्‍यारहवां भाव आय या लाभ का होता है, इस भाव के लिए कोई उपचार नहीं है। उपायों से ग्रहों को अपने पक्‍के या बेहतर लाभ देने वाले भावों में पहुंचाने और खराब प्रभाव देने वाले ग्रहों को हटाने का प्रयास किया जाता है।

मसनुई ग्रह

पारंपरिक ज्‍योतिष के इतर लाल किताब ग्रहों की युति यानी दो या अधिक ग्रहों के एक ही भाव में बैठने को मसनुई ग्रह की उपाधि देती है। इसके अनुसार अगर किसी भाव में दो या इससे अधिक ग्रह बैठे हैं तो उन सभी का प्रभाव किसी अन्‍य ग्रह की तरह होने लगेगा। ग्रहों की युति किसी अन्‍य ग्रह को सहायता भी कर सकती है और उसके प्रभाव को खराब भी कर सकती है। उदाहरण के तौर पर गुरु और सूर्य एक भाव में बैठकर चंद्रमा का प्रभाव पैदा करते हैं, इसी तरह बुध और शुक्र से सूर्य, सूर्य और बुध से मंगल, शुक्र और गुरु से शनि का प्रभाव पैदा होता है। इसी के आधार पर संबंधित ग्रह का उपचार कर दिया जाता है। 

विशिष्‍ट शब्‍दावली

लाल किताब ने न केवल उपायों का पूरा शास्‍त्र रच दिया, बल्कि अपनी विशिष्‍ट शब्‍दावली भी पेश की है। जैसे पक्‍का घर। हर ग्रह का अपना पक्‍का घर होता है। यह वह भाव होता है जहां ग्रह अपने सबसे अच्‍छे प्रभाव के साथ होता है। शक्‍की हालत का ग्रह उसे कहते हैं जो अपने निश्चित भाव को छोड़कर किसी और भाव में बैठा हो। सोया हुआ ग्रह उसे कहते हैं जब कोई ग्रह ऐसे भाव में बैठा हो जिससे सातवें भाव में कोई ग्रह न हो। इसके साथ ही ग्रहों के बलिदान के बारे में भी बताया गया है। 
             इसके अनुसार किसी ग्रह की स्थिति खराब होने पर उससे संबंधित दूसरे ग्रहों का प्रभाव खराब हो जाता है। इस हालत में लाल किताब के अनुसार बलिदान दे रहे ग्रहों का उपचार किए जाने की जरूरत होती है। 

             लाल किताब की भाषा मूलत: उर्दू है और भाषा प्रभाव से लगता है कि सौ या डेढ़ सौ साल पहले इसे पंजाब के किसी प्रांत में विकसित किया गया था। कुछ लोग इसे अरुण संहिता का नाम भी देते हैं, लेकिन इसके वास्‍तविक लेखक का कहीं जिक्र नहीं आता है। इसकी सामान्‍य से अलग भाषा के कारण कई बार लोग इसके कथ्‍य को समझ नहीं पाते हैं और कई गलत अर्थ निकाल लिए जाते हैं। 
             इस कारण लाल किताब के उपचार जहां मूल रूप से लोगों की जिंदगी को आसान बनाने का प्रयास करते नजर आते हैं, वहीं इसकी भाषा से उपजे समान अर्थ लोगों में भय भी पैदा कर देते हैं। इसके बावजूद वर्तमान दौर में उपायों के मामले में लाल किताब का कोई विकल्‍प नहीं है। दान, पूजन और साधना के जरिए दीर्धकाल में मिलने वाले लाभ की तुलना में लोग लाल किताब के तुरत फुरत उपचार करने में अधिक सहज महसूस करते हैं।
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Oman : A strong tool for Astrological prediction

शक्तिशाली औजार है ओमेन


एक ज्‍योतिषी (Astrologer) जब किसी कुण्‍डली का विश्‍लेषण करता है तो पूर्व में तय किए गए सिद्धांतों और गणितीय गणनाओं के अतिरिक्‍त उसके पास भविष्‍य में झांकने के लिए एक और महत्‍वपूर्ण औजार होता है। इसे कहते हैं ओमेन (Omen)। किसी भी व्‍यक्ति अथवा व्‍य‍वस्‍था के निकट भविष्‍य की जानकारी देने के लिए प्रकृति लगातार संकेत देती रहती है। इन संकेतों को एक ज्‍योतिषी अपने अंतर्ज्ञान से पकड़ पाता है। 

पूर्व में जहां संकेतों को ज्‍योतिषीय गणनाओं से भी अधिक महत्‍व दिया जाता रहा है, वहीं वर्तमान दौर में हम संकेतों को दरकिनार कर केवल कुण्‍डली से निकाले जाने वाले फलादेशों पर ही निर्भर हो गए हैं। ओमेन को समझाने के लिए दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर के.एस. कृष्‍णामूर्ति (KP Astrology) ने अपनी पुस्‍तक फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍टोलॉजी में एक उदाहरण दिया है। पिछले कई दशकों में ओमेन को समझाने के लिए इसे सबसे शानदार उदाहरण माना गया है। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि ओमेन को समझने के लिए हमें प्रकृति को समझने की अपनी दृष्टि भी विकसित करनी होगी।

‘‘एक ज्‍योतिषी अपने शिष्‍यों को ज्‍योतिष का पाठ पढ़ा रहा था। इसी दौरान उसके पास एक व्‍यक्ति दौड़ता हुआ आता है और बताता है कि उसकी पत्‍नी उसे छोड़कर जा चुकी है। ठीक उसी समय ज्‍योतिषी की पत्‍नी कमरे में आती है और बताती है कि कुएं से पानी निकालने के दौरान रस्‍सी टूट गई और बाल्‍टी कुएं में जा गिरी है। ज्‍योतिषी अपने शिष्‍यों से पूछते हैं कि व्‍यक्ति के सवाल और अभी मिले संकेत से क्‍या अर्थ लगाए जा सकते हैं। इस पर सभी शिष्‍य एक मत थे कि दोनों का संबंध बनाने वाली रस्‍सी के टूट जाने का अर्थ है कि जातक की पत्‍नी लौटकर नहीं आएगी। ज्‍योतिष गुरु मुस्‍कुराए। उन्‍होंने कहा नहीं, ऐसा नहीं है। हकीकत में पानी से पानी को अलग करने वाला तत्‍व (रस्‍सी) समाप्‍त हो गया है। ऐसे में पानी फिर से पानी में जा मिला है। इससे संकेत मिलता है कि जातक की पत्‍नी शीघ्र लौट आएगी। ज्‍योतिषी ने जातक से कहा कि वह घर जाए, उसकी पत्‍नी शीघ्र लौटने वाली है। उसी दिन शाम तक जातक की पत्‍नी लौट आई।’’

हम आम जिंदगी में भी रोजाना ऐसे संकेतों (Signs) से रूबरू होते हैं। घर से निकलते ही मिलने वाले संकेतों से हमारा अवचेतन (Subconscious) स्‍वत: कयास लगाने लगता है कि आज का दिन कैसा जाएगा। बस अंतर यह है कि यहां हमारा अवचेतन काम कर रहा होता है। वह हम अपने तरीके से समझाने की कोशिश करता है कि भविष्‍य के क्‍या संकेत हैं। संकेतों को भी ज्‍योतिषियों ने संकेतों के तौर पर इस्‍तेमाल करना शुरू किया होगा, कालान्‍तर में उन्‍हीं संकेतों को शकुन और अपशकुन के तौर पर विकृत रूप से इस्‍तेमाल किया जाने लगा। जबकि ये महज जातक के भविष्‍य का संकेत मात्र हैं, न कि शकुन अथवा अपशकुन देने वाले तत्‍व की समस्‍या। 

शकुन और अपशकुन (Shakun/apshakun)

पंडित नेमीचंद शास्‍त्री ने भद्रबाहु संहिता (Bhadrabahu Samhita) में ऐसे ही संकेतों का विस्‍तार से वर्णन किया है। हालांकि इस संहिता का अधिकांश भाग मण्‍डेन से संबंधित है। यह प्रकृति के संकेतों से प्रांत, स्‍थान विशेष, राष्‍ट्र अथवा राजा से संबंधित सवालों के जवाब देते हैं, लेकिन इनमें भी कुछ संकेत ऐसे भी बताए गए हैं जिन्‍हें हम आमतौर पर जिंदगी में देखा करते हैं। हर्षचरित में बाण शत्रुओं को मिल रहे खराब संकेतों के बारे में जानकारी देते हैं। 

मसलन, दिन में सियार मुंह उठाकर रोने लगे, जंगली कबूतर घरों में आने लगे, बगीचों में असमय फूल खिलने लगे, घोड़ों ने हरा धान खाना बंद कर दिया, रात में कुत्‍ते मुंह उठाकर रोने लगे, महलों के फर्श से घास निकल आई। ऐसे सभी संकेत वास्‍तव में बाण ने यह बताया कि शत्रुओं को अपनी पराजय संकेतों में दिखाई देने लगी थी। एक सामान्‍य व्‍यक्ति भी घर से निकलते समय दूध का सामने आना, सफाईकर्मी का सामने पड़ना, छींक आना या ऐसे सैकड़ों लक्षण जानता है। पीढि़यों से ये संकेत हमारी मदद करते रहे हैं और आज भी भविष्‍य का सटीक संकेत देने का प्रयास करते हैं।

प्रश्‍न ज्‍योतिष में ओमेन (Omen in Prashna Jyotish)

प्रश्‍न कुण्‍डली से फलादेश देने की विधियों में ओमेन की सहायता प्रमुखता से ली जाती रही है। प्रश्‍नकर्ता के ज्‍योतिषी के पास पहुंचने और उसके उठने बैठने की रीतियों से ही सवाल का अधिकांश जवाब मिल जाता है, बाद में प्रश्‍न कुण्‍डली से अगर संकेतों की सहायता कर रहे योग मिल रहे हों तो सटीक उत्‍तर मिलता है। 

प्रश्‍नकर्ता के बोले गए शब्‍दों में प्रथम शब्‍द, उसका अपने शरीर के किस अंग पर स्‍पर्श है, उसके चेहरे की दिशा किस ओर है, उसकी नासिका का कौनसा स्‍वर चल रहा है, प्रश्‍नकर्ता की शारीरिक और मानसिक चेष्‍टाएं प्रश्‍नकर्ता के प्रश्‍न का सहायक अंग मानी गई हैं। ऐसे में जातकों को सलाह दी जाती है कि प्रश्‍नकर्ता ज्‍योतिषी के पास जाते समय फल, पुष्‍प, मांगलिक पदार्थ और द्रव्‍य हाथ में लेकर ज्‍योतिषी के पास जाएं और पूर्वमुख होकर प्रणाम कर अल्‍प शब्‍दों में अपना प्रश्‍न रखे। 

स्‍वर की भूमिका और इसे बदलना (Significance of Swar)

हम कोई काम शुरू करें, तो उसमें सफलता मिलेगी या नहीं। अगर सफलता मिलेगी तो कितनी। इसका तुरंत जवाब हमारा स्‍वर दे देता है। हमारे नाक की दो नासिकाएं हैं। आमतौर पर एक समय में केवल एक नासिका से ही श्‍वसन किया होती है। बाईं नासिका को बायां स्‍वर या चंद्र अथवा इडा नाड़ी (Ida) और दाईं नासिका को दायां स्‍वर या सूर्य अथवा पिंगला (Pingla) नाड़ी कहा जाता है। आदर्श स्थिति यह है कि सूर्योदय से ढाई-ढाई घड़ी (करीब एक घंटे) में स्‍वर बदलता रहता है। 

परिस्थितिवश बहुत बार ऐसा नहीं होता है। जब कभी दोनों स्‍वर चलते हैं तो उसे सुषुम्‍ना कहा जाता है। प्रकृति के आधार पर इडा नाड़ी तम प्रधान है, पिंगला रज प्रधान और सुषुम्‍ना सत्‍व प्रधान नाड़ी है। बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और सोमवार को इडा नाड़ी सूर्योदय से चलनी चाहिए, रविवार, शनिवार और मंगलवार को पिंगला नाड़ी सूर्योदय से चलनी चाहिए। जो नाड़ी चल रही हो उसे बदलने के लिए भी कई उपाय बताए गए हैं। 

पातंजलयोग प्रदीप में बताया गया है कि जिस स्‍वर को चलाना हो उस पर कुछ समय तक ध्‍यान केन्द्रित करने पर वह स्‍वर चलने लगता है। जो स्‍वर चल रहा हो उसके विपरीत करवट लेकर पसली के नीचे तकिया देकर लेटने से दूसरी नाड़ी चलने लगती है। जो स्‍वर चलाना हो उसके विपरीत नासिका में रूई अथवा कपड़ा दबाने पर स्‍वर बदल जाता है। दौड़ने, परिश्रम करने अथवा प्राणायाम से भी स्‍वर बदलता है।

बुधवार, जुलाई 18, 2012

Astrology : Specification of Jatakas Kundali and limitations - 2


ज्‍योतिष : जातक कुण्‍डली और फलादेश, 
भविष्‍य में झांकने की संभावनाएं और सीमाएं



ganeshज्‍योतिष की विभिन्‍न शाखाओं के बारे में विचार के तहत हम बात कर रहे थे जातक कुण्‍डली (Jatak Kundali) की।  जातक कुण्‍डली को देखना शुरू करने से पहले ही कई तरह की समस्‍याएं सामने आती हैं। इनमें प्रमुख है जन्‍म समय का सही होना। जो भी जातक कुण्‍डली लेकर ज्‍योतिषी के पास आता है, वह सटीक फलादेश चाहता है, लेकिन इस बात की गारंटी देने के लिए तैयार नहीं होता है कि उसका जो जन्‍म समय बताया गया है वह मिनटों तक सही है। 

मैंने तो यह तक देखा है कि जो अधिक दावा करते हैं, आमतौर पर उनकी कुण्‍डली गलत ही निकलती है, केवल अपनी जिद को प्रदर्शित करने के लिए वे ज्‍योतिषी (Astrologer) पर दबाव डालते हैं कि वह जो समय बता रहा है वह सौ प्रतिशत सही है। ऐसे में स्‍थूल फलादेश (General prediction) फिर भी सही मिल जाते हैं, लेकिन घटनाओं की समय अवधि और सूक्ष्‍म वर्णन आमतौर पर सही नहीं मिल पाते हैं। उनमें कई बार तो महीनों तक का अंतर आ जाता है। एक लग्‍न तीस अंशों का होता है। अगर जन्‍म समय शुरूआती अंशों या आखिरी अंशों में हो तो लग्‍न बदलनें की आशंका प्रबल हो जाती है। ऐसे में जन्‍म समय को लेकर अधिक सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है। अगर लग्‍न मध्‍य में हो यानी 7-8 डिग्री से 25-26 डिग्री तक, तो एक निश्चिंतता रहती है।

शुरूआती दौर में गलत कुण्‍डलियों (Kundali) की ऐसी समस्‍या हर दूसरे तीसरे जातक के साथ आती थी। ऐसे में गुरुजी ने एक सरल पद्धति बताई जिससे इस समस्‍या का फौरी समाधान निकाला जा सकता है। वह यह कि जब भी जातक कुण्‍डली लेकर आए, उसी समय प्रश्‍न कुण्‍डली भी बना लो। अगर प्रश्‍न कुण्‍डली और जातक का प्रश्‍न उसकी जन्‍म कुण्‍डली के अनुसार मैच होता है तो जातक की लग्‍न कुण्‍डली को सही मान लिया जाए। इस फौरी समाधान से अस्‍सी प्रतिशत तक कुण्‍डलियों को जांचने का काम निपट जाता है। (प्रश्‍न कुण्‍डली पर पूर्व में लिख चुका हूं, इस सीरीज के आगे के लेखों में एक बार फिर कुछ बताने का प्रयास करूंगा)

जन्‍म समय सही मिल जाने और कुण्‍डली की जांच के बाद उसके फलादेश का काम शुरू होता है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष (Traditional vedic astrology) में लग्‍न कुण्‍डली (जो कुण्‍डली पहले पन्‍ने पर बनी हुई होती है) के सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए उसके टुकड़े राशियों के आधार पर किए गए हैं। इसी को नवमांश, (Navmansha) दशमांश या द्वादशांश कहते हैं। इसमें लग्‍न की राशि के अंशों के आधार पर विभाग कर बाकी की कुण्‍डली तैयार कर ली जाती है। 

बैंगलोर के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति (KP) ने राशि के आधार पर अंशों में विभाजन की पद्धति को पूर्णतया नकार दिया और सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए एक नई पद्धति ईजाद की, जो पाराशरीय सिद्धांत पर आधारित थी। ऋषि पाराशर ने विंशोतरी दशा पद्धति (जिसे आप दशा (Dasha) के नाम से जानते हैं) बनाई। इसमें चंद्रमा के नक्षत्र चार के आधार पर एक व्‍यक्ति के जीवनकाल को 120 साल मानकर हर ग्रह को एक निश्चित दशा का आधार दिया। दशाओं के टुकड़े भी उसी अनुपात में किए गए। इसे अंतरदशा कहा गया। अष्‍टोत्‍तरी एवं अन्‍य दशा सिस्‍टम की तुलना में विंशोत्‍तरी दशा पद्धति (Vimshottari dasha system) अधिक सटीक और वैज्ञानिक लगता है। 

केएस कृष्‍णामूर्ति ने पाराशरीय सिद्धांत की पालना करते हुए हर राशि और भाव के उसी के अनुसार टुकड़े कर दिए। ऐसे में 27 नक्षत्रों के 9-9 टुकड़े हुए। पूरी कुण्‍डली के 360 डिग्री को 249 भागों में बांट दिया गया। पारम्‍परिक पद्धति की तुलना में यह पद्धति अधिक सटीक लगती है। इसमें लग्‍न कुण्‍डली का ही विश्‍लेषण पर्याप्‍त है। नवमांश, त्रिशांश, दशमांश आदि का विश्‍लेषण अलग से करने और उनके सिद्धांत याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे में वर्तमान दौर में पारम्‍परिक की तुलना में केपी सिस्‍टम के ज्‍योतिषियों की संख्‍या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।

अगर आप केपी सिस्‍टम को जानना चाहते हैं तो कृष्‍णामूर्ति पद्धति की कुल जमा छह पुस्‍तकों में से प्रथम पुस्‍तक “कास्टिंग द होरोस्‍कोप” (Casting the horoscope) ले आएं। इसमें कुण्‍डली बनाने, दशाओं को निकालने और सूक्ष्‍म टुकड़े किए जाने की पद्धति विस्‍तार से दी गई है। 

सोमवार, जुलाई 16, 2012

Astrology : Specification of Jatakas Kundali and limitations

ज्‍योतिष : जातक कुण्‍डली की विशेषताएं (और सीमाएं)

Parasharas Astro Consultancy






जातक (Jatak) के सामने कुण्‍डली लेकर बैठे ज्‍योतिषी (Astrologer) के सामने दो चुनौतियां एक साथ होती हैं। एक तो उसे यह प्रदर्शित करना होता है कि वह दुनिया में सबकुछ जानने वाला बंदा है, दूसरा उसका परमात्‍मा से सीधा संबंध है, ऐसे में वह आपके सभी पुराने कर्मों का लेखा-जोखा “सैट” कर देगा। 

एक अकेला ज्‍योतिषी इतनी बड़ी इमेज नहीं बना सकता। जाहिर सी बात है दुनिया के हजारों ज्‍योतिषियों ने मिलकर इस धारणा का पोषण किया होगा और लाखों जातकों ने सहमति में सिर धुने होंगे, तब कहीं जाकर यह धारणा बैठ पाई होगी कि ज्‍योतिषी जातक के भाग्‍य के साथ जैसे चाहे खेल सकता है। सोते को खड़ा कर सकता है, रोते को हंसा सकता है और भी बहुत कुछ। 

जातक कुण्‍डली से कई प्रकार की गणनाएं संभव हैं। आमतौर पर प्रसिद्ध सवालों का विश्‍लेषण जातक कुण्‍डली से किया जाता है। देवकीनन्‍दन सिंह की पुस्‍तक ज्‍योतिष रत्‍नाकर ने बहुत खूबसूरती के साथ इन सवालों को प्रवाह नाम दिया और जीवन के आठ प्रवाह बनाकर यह तय कर दिया कि कौनसी वय का व्‍यक्ति कौनसे सवाल पूछ सकता है और उनके हल कैसे निकाले जाएंगे। 

जीवन की प्रथम तरंग बाल्‍यावस्‍था (Childhood) है। तब अधिकांश सवाल बालारिष्‍ट यानी बचपन में किसी हादसे से मृत्‍यु अथवा अंग भंग की आशंका तो नहीं है, बालक का स्‍वास्‍थ्‍य कैसा रहेगा। फिर पढ़ाई को लेकर सवाल होते हैं, इसके बाद नौकरी, विवाह, संतान, धन, मकान, संतति का विवाह, वृद्धावस्‍था के रोग और आखिर में मृत्‍यु। 

यकीन मानिए अधिकांश जातकों को जो सवाल निहायत निजी (Personal) लगते हैं, वे सबसे कॉमन (Common) सवाल होते हैं। इन्‍हें देखने के लिए निश्चित सिद्धांत हैं। अगर तरतीब से सिद्धांतों का अनुसरण किया जाए और ज्‍योतिषी की अंत:प्रज्ञा सही काम करे तो जवाब भी सटीक आते हैं।

कई बार सही तरीके से चल रही गाड़ी पटरी से उतर जाती है। आमतौर पर ऐसी स्थिति राहू की दशा, अंतरदशा, सूक्ष्‍म अंतर के दौरान आती है। इसके अलावा केतू, चंद्रमा, शनि और मंगल के योग, दुर्योग और दशा-अंतरदशा का क्रम भी ऐसी स्थितियां पैदा करते हैं। यह स्थिति जीवन की किसी भी तरंग के दौरान हो सकती है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष जिसमें पाराशर से जैमिनी तक के विश्‍लेषण उपलब्‍ध हैं, बताती है कि समस्‍या कहां से शुरू हुई है। 

उपचारों की भूमिका (Role of remedy)

आमजन में यह मान्‍यता बन गई है कि ज्‍योतिषी खराब ग्रहों का उपचार बताने वाला होता है। सही मायनों में देखा जाए तो ज्‍योतिषी भूमिका जातक को उसके अच्‍छे और खराब ग्रहों के बारे में जानकारी देने के साथ ही खत्‍म हो जाती है। पर, जातक इतने भर से संतुष्‍ट नहीं हो सकता। एक बार उसे बता दिया जाए कि अमुक समय से जातक का खराब समय चल रहा है, फलां प्रकार की समस्‍याएं सामने आ रही हैं और आने वाले इतने दिनों तक समस्‍या बनी रहने की आशंका है। 

अब जातक चाहता है कि खराब समय को दुरुस्‍त करने का उपचार ज्‍योतिषी ही बता दे। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष  (Traditional hindu astrology) में जातक के खराब समय को पूर्व जन्‍मों के कर्मों का फल माना गया है। उस काल में जातकों को पूर्व जन्‍मों के कर्मफलों के खराब प्रभाव को कम करने के लिए प्रायश्चित का प्रावधान किया गया। इसके तहत पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन और दान का प्रावधान किया गया। 

ऐसा माना गया कि इससे जातक के पिछले जन्‍मों के बंधन छूटते जाते हैं। आज भी अन्‍य किसी उपचार की तुलना में ये उपचार कहीं अधिक प्रभावी नजर आते हैं। हालांकि उपचार की पद्धतियां और इनके प्रभावों का मूल ज्‍योतिष विश्‍लेषण से सीधा संबंध नहीं है, फिर भी जातक का आग्रह दोनों को एक ही श्रेणी में ला खड़ा करता है। 

किसी ऑर्गेनिक रिएक्‍शन (Organic reaction) की तरह ये उपचार भी धीरे धीरे काम करते हैं और जातक की स्थिति में नियमित सुधार करते हुए उसे जीवन में बेहतरी की ओर ले जाते हैं। कुछ जातक अधिक जल्‍दी में होते हैं, वे चाहते हैं कि जिस दिन उपचार बताया जाए, उसी दिन से अब तक हुई समस्‍याओं का समाधान हो जाए। ऐसे में कालान्‍तर में तांत्रिक और लाल किताब जैसे फौरी उपचार प्रचलन में आए।

शुक्रवार, जुलाई 06, 2012

Astrological favorable day to wear a new cloth

सौभाग्‍यशाली बनने के लिए 
अनुकूल नक्षत्रों में पहने नए कपड़े

Astrology Today by Sidharth Joshi

Astrology Today by Sidharth Joshiमेरा एक ममेरा भाई है। उसके सिर पर हमेशा से सलमान खान जैसा बनने का भूत सवार रहता है। उसके नेत्र कुछ बड़े आकार के हैं। कुछ कुछ सलमान खान की तरह। सिर और मुंह लंबोतरा है, लेकिन दूर से (करीब एक डेढ़ किलोमीटर दूर से) देखें तो वह लगभग सलमान खान जैसा दिखता है। हाइट अच्‍छी है और शरीर पतला। यह दोनों कारण किसी आम इंसान के लिए खुश होने का सबब हो सकते हैं, लेकिन इन दोनों “विशेषताओं” को लेकर वह हमेशा दुखी रहा। 

एक दिन उसने निश्‍चय कर लिया कि अब बॉडी को बिल्‍कुल सलमान खान की तरह बनाना है। जिम जाकर फीस पूछी तो पता चला कि पहले पांच हजार रुपए लेंगे फिर हर महीने डेढ़ हजार। उसे जंचा नहीं। यह तो महंगा शौक हो गया। उसने पहलवानी अखाड़े में पता किया, जिसमें ट्रेड मिल और मल्‍टीजिम जैसी कुछ आधुनिक मशीनें भी लगी हुई थी। पहलवान गुरुजी ने कह दिया, पहले तीन किलोमीटर की दौड़ और बाद में अखाड़े पहुंचकर सौ उठक-बैठक और सौ दण्‍ड निकालने के बाद मशीन के पास जाने देंगे। 

Astrology Today by Sidharth Joshiभाई तैयार हो गया। दौड़-दाड़ कर पहुंच गया अखाड़े। वहां पहुंचते ही देखा कि सभी पहलवानों ने लंगोट धारण कर रखे हैं। गुरुजी ने फरमान जारी किया, भईये खोल निकर और आ जा लंगोट में। भाई ने लंगोट सिला ही नहीं रखा था, अब क्‍या किया जाए, पहले दिन किसी तरह गुरुजी से माफी मांगी और लौटकर घर आया। कुछ पैसे अपनी मां से लिए और बाजार जाकर लंगोट सिलाने के लिए इधर-उधर घूमने लगा। 

किसी ने एक दुकान बताई वहीं सिले सिलाए लाल रंग के लंगोट पड़े थे। उसने अखाड़े में भी देखा कि सभी लाल रंग के लंगोट पहने हुए थे। अब सलमान खान तो बाकी क्रू से अलग दिखेगा। ऐसे में उसने बने बनाए लंगोट लेने से मना कर दिया। बाजार से कपड़ा लिया और दर्जी के पास जाकर लंगोट सिलवा लिया। बस एक गड़बड़ हो गई, उसने लंगोट हरे रंग का सिलवाया। ठीक है अखाड़े पहुंचकर अगले दिन प्रेक्टिस शुरू हुई। भाई को लगा अखाड़े में आलसी पहलवान हैं। सो अखाड़े के बाद शाम को घर आकर फिर डम्‍बल और पुशअप और किए। रात तक दस्‍त छूट गए। 

Astrology Today by Sidharth Joshiअगले दिन से अखाड़ा और बंद हो गया। कई दिन लंगोट पहने जाने का इंतजार करता रहा। करीब सप्‍ताहभर में स्थिति काबू में आई। भाई ने हरा लंगोट पहना और अखाड़े पहुंचा, वहां पेट एक बार फिर जवाब दे गया। दौड़कर घर आया और लैट्रिन में ही अपसेट हो गया। 

मैं उसी समय उनके घर पहुंचा था। सारी कथा आदि से अंत तक सुनी। मुझे एक ही बात समझ में आई कि लाल लंगोट रेड सिग्‍नल की तरह काम करता होगा और हरा लंगोट पेट की हवा खराब करता होगा। मेरी बात को भाई ने अनसुना कर दिया। कई दिन पेट की यही स्थिति रही। बाद में तो पानी की तरह धार निकलने लगी। 

आखिर भाई बाजार से रेडीमेड लंगोट (लाल रंग का) लेकर आया। उसके बाद अखाड़े गया, तो पेट भी स्थिर रहा। मैंने अपनी डायरी में अंकित कर लिया कि लंगोट का रंग लाल ही होना चाहिए, कम से कम पहलवानों के लिए...

हो सकता है यह बात आपको मजाक लगे, लेकिन बड़ों से हमने भी सुन रखा है कि बुध पहने बागा, कभी न रहे नागा। यानी बुधवार को नए कपड़े पहनने वालों को हमेशा नए नए कपड़े मिलते रहेंगे। मंगलवार और शनिवार को नए कपड़े पहनने वालों के कपड़े जल्‍दी नष्‍ट होते हैं। 

रविवार को नए कपड़े पहनने पर वे जल्‍दी फटते हैं। कपड़ों के साथ कटने, फटने, खोने या दाग लगने की घटनाएं इतनी आम हैं कि हम इस पर कभी ध्‍यान नहीं देते। पर, जो लोग वार आदि का ध्‍यान रखते हैं उन्‍हें हम हमेशा टिप टॉप कपड़ों में देख सकते हैं। 

परिधानों की नक्षत्र कुण्‍डली

एक विशिष्‍ट अध्‍ययन में पाया गया है कि विशेष नक्षत्र में पहने गए कपड़े शानदार परिणाम देते हैं। मैंने तो नहीं, लेकिन मेरे गुरुजी ने यह प्रयोग कर रखा है और उसका शानदार परिणाम भी उन्‍हें हासिल हुआ। इसी तरह एक जातक को विवाह के नौ साल बाद भी कोई संतान नहीं हुई। उसे आगामी दो साल तक की तिथियां दी गई। ये तिथियां एक नक्षत्र विशेष की थी। इन नक्षत्रों में नियमित रूप से कपड़े पहनने के बाद महज डेढ़ साल में ही जातक को पुत्र की प्राप्ति हुई। 

ये दोनों उदाहरण मुझे यकीन दिलाने के लिए पर्याप्‍त हैं कि विशेष नक्षत्र में कपड़े पहनने से लाभ होता है। मनचाहा परिणाम हासिल किया जा सकता है। मैं चाहता तो था कि यहां सभी नक्षत्रों के बारे में जानकारी दूं, लेकिन गुरुजी ने ऐसा करने से मना कर दिया है। फिर भी इतनी छूट है कि मैं यह बता दूं कि बेहतर नक्षत्र कौन कौनसे हैं... 

अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्‍य, उत्‍तराफाल्‍गुनी, हस्‍त, चित्रा, स्‍वाति, विशाखा, अनुराधा, धनिष्‍ठा, उत्‍तराभाद्रपद और रेवती

इन नक्षत्रों में नए कपड़े पहनने के लिए अनुकूल नक्षत्र बताए गए हैं। शेष नक्षत्रों वाले दिनों में कपड़े पहनने से बचना चाहिए। कुल 27 नक्षत्रों में से इन तेरह नक्षत्रों को शुभ बताया गया है। हालांकि हर एक नक्षत्र का अपना महत्‍व है और फलादेश है। अगर आपको इनमें से हर एक नक्षत्र के बारे में विस्‍तार से जानकारी न भी हो तो आप मजे से इन नक्षत्रों में नए कपड़े पहनिए। अच्‍छा क्‍या होगा यह तय न भी हो तो होगा अच्‍छा, यह तय है। 


 और आखिर में भारतीय साड़ी पहनने की विधि भी...
Astrology Today by Sidharth Joshi

Astrology today by sidharth Joshi

शुक्रवार, जून 29, 2012

A latter from Astrologer to his Jataka

एक ज्‍योतिषी का जातक के नाम पत्र

प्रिय जातक,
patra

एक ज्‍योतिषी के रूप में जब मैं तुम्‍हारे सामने आता हूं तब दैहिक दृष्टिकोण से यह हमारी पहली ही मुलाकात होती है। तुम्‍हें ऐसा लगता होगा कि तुम मुझसे पहली बार मिल रहे हो। मुझे भी कमोबेश पहली मुलाकात में ऐसा ही लगता है। हकीकत इससे कुछ जुदा होती है। हमारे मिलने से कई क्षणों, मिनटों, घंटों, दिनों, हफ्तों, महीनों या कभी कभार सालों पहले तुमसे मिलने की तैयारी शुरू हो चुकी होती है। तुम्‍हारे साथ बिताए पल कुछ इस तरह होते हैं कि तुम मेरे चेहरे और कुण्‍डली के निर्जीव से खानों पर नजर गड़ाए देखते रहते हो और मैं समय के विस्‍तार में खो जाता हूं। जहां सितारों के संकेत पूरी शिद्दत से तुम्‍हारी कहानी कह रहे होते हैं। 

समय के फलक पर उन क्षणों में मैं तुम्‍हारे साथ विचरण करता हूं। हां, मैं यह दावा करता हूं कि भूत, वर्तमान और भविष्‍य के बीच समय ने जो पर्दा डाल रखा है, मैं उसके पार देखने जुर्रत करता हूं। मेरे गुरुओं ने मुझे सिखाया कि संकेतों को समझो और खुद को इतना पारदर्शी बनाओ कि जो जातक अपनी समस्‍याएं लेकर आए वह चाहे तो भी तुमसे अपने अतीत को छिपा न सके, ताकि तुम जातक की वर्तमान सुदशा या दुर्दशा का सही आकलन कर सको। हां, मैंने अभ्‍यास किया है, समय के पार झांकने का। मुझे खुद नहीं पता कि संकेत कहां से और कितनी मात्रा में आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो इतने स्‍पष्‍ट होते हैं कि मैं खुद आश्‍चर्यचकित रह जाता हूं। मैं उन्‍हें देखकर बोलता हूं और जातक को लगता है जैसे मैं कहीं नेपथ्‍य में लिखे उसके भूतकाल को पढ़कर सुना रहा हूं। संकेतों का विश्‍लेषण और जातक के जीवन की घटनाओं का तारतम्‍य इतना रोचक होता है कि मैं खुद भी मुग्‍ध हो जाता हूं और तुम्‍हें तो मैं आश्‍चर्यचकित होता हुआ देखता हूं। 

डरता हूं कि कहीं प्रकृति के ये संकेत खो गए तो। हां, संकेत खो भी जाते हैं। निराशा में हाथ-पैर मारता हूं। मुझे लगता है कि जातक आया है तो कुछ न कुछ जवाब लेकर जाए। सब व्‍यर्थ, कुछ हाथ नहीं आता। लगता है जातक एक बंद किताब की तरह है। इसके कई कारण होते हैं। कभी कुण्‍डली गलत होती है तो कभी जातक झूठ बोल रहा होता है तो कभी कभार गोचर भी साथ देने से मना कर देता है। मैं भी थक हारकर मान लेता हूं कि ग्रह ज्‍योतिषी पर भी कुछ असर तो करते होंगे। अपनी ईमानदारी बचाए रखने के लिए स्‍पष्‍टत: हार मान लेता हूं। दूसरे जातकों से मेरे बारे में सुनकर आए जातक को भी निराशा होती है। ऐसे में कुछ न कर पाने को ईश्‍वर की शक्ति का एक रूप मानता हूं और उसके सामने श्रद्धा से झुक जाता हूं। 

हमें ब्रह्मा के पुत्र होने का गौरव प्राप्‍त है। एक ओर जहां मेरे मन में इस लोक में प्रसिद्धि पाने का ख्‍याल होता है वहीं दूसरी ओर ब्रह्मा से मिले इस गुण की रक्षा करने की जिम्‍मेदारी सिर पर होती है। कई बार ऐसा होता है कि तुम अपनी अपेक्षाएं लेकर मेरे पास आते हो, लेकिन मुझे निकट और सुदूर भविष्‍य में कुछ और ही दिखाई दे रहा होता है। ऐसे में मुझे हिम्‍मत जुटानी होती है कि तुम्‍हारी अपेक्षाओं को दरकिनार कर तुम्‍हें स्‍पष्‍ट वह बताउं जो आसन्‍न दिखाई दे रहा है। कभी तुम सहमत हो जाते हो तो कई बार ऐसा भी होता है कि तुम निराश होकर मेरे सामने से उठ जाते हो। मेरे लिए मेरी विद्या अधिक महत्‍वपूर्ण है। उससे किसी भी सूरत में समझौता नहीं कर सकता। तुम्‍हारी कुछ काल की निराशा मेरे लिए उस समय उल्‍लास का कारण बनती है, जब तुम कई महीनों और कभी कभार तो सालों बाद लौटकर आते हो और कहते हो कि मैं सही था। आगाह किए जाने के बावजूद तुम नहीं संभलते। कहीं तुम्‍हारे पूर्व जन्‍मों के कर्म भी तो आड़े आते हैं। बताए गए उपचार भी तुम नहीं कर पाते। मैं सोचता रह जाता हूं कि जब पता था कि समय खराब है और अमुक उपचार किए जाने की जरूरत थी, इसके बावजूद जातक ने प्रायश्चित के रूप में उन उपचारों को क्‍यों नहीं किया। यही जवाब सामने आता है कि जातक को जो भोगना लिखा है वह तो भोगेगा ही। भाग्‍य को धोखा तो नहीं दिया जा सकता। 

- तुम्‍हारा ज्‍योतिषी
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
09413156400





गुरुवार, मार्च 01, 2012

Who will get success in foreign land

विदेश में सफल होने की संभावना

अपने घर में रहकर सफल और संपन्‍न होने से बेहतर सपना और क्‍या हो सकता है, लेकिन कुछ लोग विदेश (Foreign) में जाकर सफल होना चाहते हैं। विदेश में भी किसी एक देश या राज्‍य नहीं बल्कि पूरे देश या विदेशों में भी न केवल अपनी सफलता (Success) के झण्‍डे गाड़ना चाहते हैं। कुछ लोगों की इच्‍छा घूमने के लिए विदेश जाने की रहती है। कुछ लोग ऐसी परदेस की यात्राओं में सुखी रहते हैं तो कईयों को बहुत दुख उठाने पड़ते हैं और विफल और निराश हो घर लौटते हैं। इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि कौनसे योग हमें विदेश में बेहतर भविष्‍य का वादा करते हैं और कौनसे ग्रह हमारी यात्राओं में बाधा बनते हैं। 

Astrology today by sidharth Joshi

यात्रा के सामान्‍य योग तीसरे भाव (Third House) से बनते हैं। कुण्‍डली का तीसरा भाव उन यात्राओं के लिए देखा जाता है जो आमतौर पर छोटे समय की यात्रा होती है। मूल रूप से यह भाव साहस और सहजता का है। अगर लग्‍न से तीसरा भाव मजबूत हो तो ही व्‍यक्ति सफल यात्राएं कर पाता है। इसके साथ ही बारहवां भाव घर छोड़ने में मदद करता है। विदेशी संबंधों को भी बारहवें भाव से ही देखा जाता है। 

यह भाव मूल रूप से क्षरण (Decay) का भाव है। यह क्षरण पैसा खर्च होने के रूप में भी हो सकता है और शारीरिक क्षरण के रूप में भी। किसी लग्‍न विशेष में तीसरे भाव के अधिपति और बारहवें भाव के अधिपति की दशा अथवा अंतरदशा आने पर जातक को घर से बाहर निकलना पड़ता है। जब तक यह दशा रहती है, जातक घर से दूर रहता है। अधिकतर मामलों में दशा बीत जाने के बाद जातक फिर से घर लौट आता है। जिस व्‍यक्ति की कुण्‍डली में लग्‍न और बारहवें भाव के अधिपतियों का अंतर्संबंध होता है वे न केवल घर से दूर जाकर सफल होते हैं, बल्कि परदेस में ही बस भी जाते हैं। 

पारंपरिक भारतीय ज्‍योतिष के अनुसार तीसरे भाव और बारहवें के अधिपति की दशा अथवा अंतरदशा में जातक छोटी यात्राएं (Short journeys) करता है। वहीं नौंवे और बारहवें भाव के अधिपति की दशा अथवा अंतरदशा में लंबी यात्राओं (Long distance on long time spend at foreign) के योग बनते हैं। छोटी और लंबी यात्रा का पैमाना सापेक्ष है। छोटी यात्रा कुछ सप्‍ताह से लेकर कुछ महीनों तक की हो सकती है तो लंबी यात्रा कुछ महीनों से सालों तक की। इसी के साथ छोटी यात्रा जन्‍म अथवा पैतृक निवास (Paternal land) से कम दूरी के स्‍थानों के लिए हो सकती है तो लंबी यात्राएं घर से बहुत अधिक दूरी की यात्राएं भी मानी जा सकती हैं। 

दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिष के.एस. कृष्‍णामूर्ति (K S Krishnamurthy) द्वारा बनाई गई केपी पद्धति (KP Method) के अनुसार जब तीसरे, नौंवे और बारहवें भाव के कारक ग्रहों (Significant) की दशा अथवा अंतरदशा आती है, तब जातक यात्राएं करता है। कारक ग्रह का निर्धारण तीसरे, नौंवे तथा बारहवें भाव में मौजूद राशि के अधिपति यानी तृतीयेश, नवमेश अथवा द्वादशेश जिन नक्षत्रों में बैठे हों उनके अधिपति के अनुसार होता है। 

किसे कहेंगे विदेश 

कोई व्‍यक्ति विदेश कब जाएगा, यह सवाल आधी सदी पहले तक एक महत्‍वपूर्ण सवाल हुआ करता था। घर को छोड़कर दूसरे देशों की लंबी यात्राओं पर गए परिवार के सदस्‍य की खोज खबर भी केवल चिठ्ठी पत्री से हो पाती थी। समय के साथ परिवहन के साधनों (Transportation) और संचार माध्‍यमों (Communication) का जाल बढ़ा है। ऐसे में किसी जातक के लिए हवाई यात्रा, ट्रेन अथवा बस से यात्रा करने के अलावा विदेश यात्रा के बारे में ना नहीं कहा जा सकता। इसके इतर विदेश यात्रा से अर्थ यह लगाया जाने लगा है कि जातक घर से दूर और लाभ अथवा हानि वाला समय। अगर केवल यात्री की भांति पांच या सात दिन में दूरस्‍थ देशों में घूमकर लौट आए, तो उसे विदेश यात्रा में शामिल करना मुश्किल है। 

लग्‍न के अनुसार प्रकृति 

अपनी गति के अनुसार राशियां तीन प्रकृति की बताई गई हैं। चर, स्थिर और द्विस्‍वभाव। चर (Movable) राशि वाले जातकों को नियमित रूप से चलना अथवा गतिमान रहना उचित लगता है। स्थिर (Static) राशि वाले जातक एक ही स्‍थान पर जमे रहकर काम करने में सुकून का अनुभव करते हैं। द्विस्‍वभाव (Dual) राशि वाले जातकों के घूमने और बैठकर या टिककर काम करने का समय अलग अलग होता है। ऐसे में किसी जातक की कुण्‍डली में लग्‍न, तीसरे, नौंवे और बारहवें भाव से संबंधित ग्रह चर राशियों में बैठे हों तो वह जातक अधिक यात्राएं करता है। 

विदेश में अवसर 

मेष (Mesha) लग्‍न के जातकों के लिए बुध या गुरु की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश जाने के योग बनते हैं। ऐसे जातकों की कुण्‍डली में अगर शनि बेहतर स्थिति में हो तो विदेश में अच्‍छी सफलताएं भी अर्जित कर पाते हैं। शनि भगवान की आराधना विदेश में अच्‍छा लाभ अर्जित करा सकती है। बुध की दशा में जहां छोटी यात्राएं होती हैं वहीं गुरु की दशा में लंबी विदेश यात्राओं के योग भी बनते हैं। 

वृष (Vrishubha) लग्‍न के जातकों के लिए चंद्रमा या मंगल की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश जाने के योग बनते हैं। इन जातकों की कुण्‍डली में गुरु बेहतर स्थिति में होने पर विदेश में सफलताएं अर्जित करना आसान हो जाता है। गुरु का लाभ लेने के लिए विदेश में जातक को नियमित रूप से मंदिर जाना चाहिए। इस राशि में शनि की बेहतर स्थिति धार्मिक यात्राएं कराती हैं। 

मिथुन (Mithuna) लग्‍न के जातक सूर्य की दशा या अंतरदशा में छोटी यात्राएं करते हैं और शुक्र की दशा या अंतरदशा में लंबी दूरी या अधिक समय तक घर से दूर रहने वाली यात्राएं करते हैं। इन जातकों को शनि की शुभ स्थिति धार्मिक यात्राएं कराती हैं। विदेश में अच्‍छा लाभ अर्जित करने के लिए इन जातकों को हनुमान अथवा मुरुगन देवता की आराधना करनी चाहिए। 

कर्क (Karka) लग्‍न के जातक बुध की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश यात्रा का सुख लेते हैं। कुण्‍डली में शुक्र मजबूत स्थिति में होने पर ये जातक यात्रा भी विलासितापूर्ण अंदाज में करते हैं। ऐसे जातकों को यात्रा के दौरान थोड़ी भी असुविधा परेशान कर देती है। आमतौर पर ये लोग यात्राओं को तब तक टालने का प्रयास करते हैं जब तक कि इन्‍हें पूरा भरोसा न हो जाए कि यात्रा की सभी व्‍यवस्‍थाएं पूर्ण हो चुकी हैं। 

सिंह (Simha) लग्‍न के जातक शुक्र की दशा अथवा अंतरदशा में छोटी यात्राएं करते हैं और चंद्रमा की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश प्रस्‍थान करते हैं। परदेस की इनकी सफलता का आधार बुध की स्थिति है। अगर इनकी कुण्‍डली में बुध बेहतर स्थिति में भी है तो बुध के वक्री, मार्गी, अस्‍त और उदय होने से इनका लाभ या आय प्रभावित होते रहते हैं। 

कन्‍या (Kanya) लग्‍न के जातकों को मंगल की दशा अथवा अंतरदशा में घर से कुछ समय के लिए बाहर रहने का मौका मिलता है। सूर्य की दशा में ये लोग विदेश यात्राएं भी कर पाते हैं। शुक्र की बेहतर स्थिति इन जातकों को धार्मिक यात्राएं कराती हैं। विदेश में कितने सफल होंगे, यह इन जातकों की चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है। शिव आराधना इन जातकों को विदेश में भी बेहतर सफलता दिला सकती है। 

तुला (Tula) लग्‍न के जातकों को गुरु की दशा अथवा अंतरदशा में यात्रा करने का मौका मिलता है। बुध की अंतरदशा में ये जातक घर से अधिक दूरी की यात्राएं कर पाते हैं। विदेश में अच्‍छा लाभ हासिल करने के लिए ऐसे जातकों की कुण्‍डली में सूर्य बेहतर स्थिति में होना चाहिए। 

वृश्चिक (Vrishchik) लग्‍न के जातकों को शनि की दशा या अंतरदशा में छोटी यात्राएं करनी पड़ती हैं। शनि की दशा में ये जातक कई बार यात्राएं कर वापस घर लौटते हैं। शुक्र की दशा या अंतरदशा में इन्‍हें घर से दूर रहने का मौका मिलता है। ऐसे जातकों की कुण्‍डली में बुध की स्थिति बेहतर होने पर विदेश में सफल होने की स्थिति बनती है। 

धनु (Dhanu) लग्‍न के जातक शनि की दशा या अंतरदशा में घर से बाहर निकलते हैं। इस दशा में जातक छोटी यात्राएं करता है और लंबी यात्राएं करने अथवा अधिक समय तक विदेश में टिकने के लिए इन जातकों को मंगल का सहयोग लेना पड़ता है। अगर कुण्‍डली में शुक्र बेहतर स्थिति में हो तो जातक विदेश जाकर अच्‍छा धन कमा पाता है और सफलताएं अर्जित करता है। 

मकर (Makar) लग्‍न के जातक गुरु की दशा में विदेश यात्रा करते हैं। गुरु की दशा या अंतरदशा में ये जातक छोटी अथवा लंबी दूरी दोनों तरह की यात्राएं कर पाते हैं। ऐसे जातकों की कुण्‍डली में मंगल की बेहतर स्थिति विदेश में लाभ का वादा करती है। हनुमानजी की आराधना करना इन जातकों के लिए विदेश में सफलता दिलाने वाली सिद्ध हो सकती है। 

कुंभ (Kumbh) लग्‍न के जातक मंगल की दशा अथवा अंतरदशा आने पर छोटी यात्राएं करते हैं। वहीं शनि की दशा या अंतरदशा इन जातकों को लंबी दूरी की यात्राएं कराती है। विदेश में इन जातकों को कितना लाभ होगा, यह गुरु की स्थिति पर निर्भर करता है। विष्‍णु की आराधना इन जातकों को विदेश में अच्‍छा लाभ दिला सकती है। 

मीन (Meena) लग्‍न के जातक शुक्र की दशा अथवा अंतरदशा में छोटी यात्राएं करते हैं और शनि की दशा या अंतरदशा में विदेश यात्रा करते हैं। अगर शनि बेहतर स्थिति में बैठा हो और शुभ हो तो जातक न केवल लंबी विदेश यात्रा करता है बल्कि अच्‍छी सफलताएं भी अर्जित करता है।

शुक्रवार, जून 24, 2011

ज्‍योतिष की कक्षा : छठा दिन

ज्‍योतिष की कक्षा में हम राशियों का परिचय प्राप्‍त कर रहे हैं। पूर्व के लेखों में हम मेष, वृष, मिथुन और कर्क राशियों पर चर्चा कर चुके हैं। इस कक्षा में हम बात करेंगे सिंह और कन्‍या राशि की। अब तक जिन पाठकों ने फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी पुस्‍तक का हिन्‍दी अनुवाद ज्‍योतिष के आधारभूत सिद्धांत खरीद ली है, वे मेरे इन लेखों के साथ तेजी से आगे बढ़ सकते हैं और जो पाठक केवल इन लेखों के भरोसे हैं, उन्‍हें केवल राशियों का फौरी परिचय ही मिल सकेगा। सालने वाली बात यह है कि हर लेख में इक्‍का दुक्‍का कमेंट और पांच सात मेल के अलावा पाठकों का रुझान नहीं मिल पा रहा है। एक ओर जहां ज्‍योतिष से संबंधित भ्रांतियों को दूर करने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जाती है वहीं इस विषय को विषय के तौर पर पढ़ने और समझने वाले लोगों की कमी खलती है। मैं अब देरी से आए पाठकों से भी आग्रह करूंगा कि वे पूर्व में बताई गई पुस्‍तकों को शीघ्र खरीदें और अठारह लेखों की इस शृंखला के दौरान अधिक से अधिक सवाल जवाब तक सीखने का प्रयत्‍न करें। एक बात और पिछले लेखों में एक दो लोगों ने जिसासा प्रकट की थी कि राशियों का प्रभाव लग्‍न से देखा जाए या चंद्रमा से। इस बारे में मैं बहुत पहले बता चुका हूं, यहां पुनरावृत्ति कर देता हूं कि लग्‍न और राशि में से जो अधिक प्रबल होगा उसी राशि का प्रभाव जातक पर अधिक दिखाई देगा।

जंगलों और वीराने में घूमते ‘सिंह’

Animals-0010सिंह राशि से प्रभावित जातकों की यह सबसे बड़ी विशेषता होती है। इस राशि पर सूर्य का प्रभाव है। अग्नि तत्‍व की यह राशि शुष्‍क, पुरुष, धनात्‍मक और स्थिर है। चंद्र, मंगल और गुरु सूर्य के मित्र होने के नाते सिंह में आने पर मित्रक्षेत्री होते हैं और शनि, शुक्र और बुध शत्रुक्षेत्री। सिंह राशि के जातकों की हड्डियां उन्‍नत होती हैं, कंधे और माथा चौड़े होते हैं। ये जातक बैठे हुए ठिगने दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि इनका धड़ छोटा और टांगें लम्‍बी होती हैं। जब ये उठकर खड़े होते हैं और औसत से अधिक कद के होते हैं। जिन जातकों की कुण्‍डली में सूर्य और गुरु की अच्‍छी युति होती है वे परपीड़ा को समझने में कामयाब होते हैं। चिकित्‍सकों और बेहतर प्रशासकों की कुण्‍डली में यह योग प्रमुखता से दिखाई देता है। सूर्य का प्रभाव होने से जातक अपने आध्‍यात्मिक उत्‍थान का अपने स्‍तर पर प्रयास करते हैं। इसी कारण सिंह राशि वाले जातक जंगलों या वीराने अथवा पहाड़ों में अकेले घूमते हुए देखे जा सकते हैं। इनका संगीत, नाटक और खेल से लगाव होता है। ये स्‍पष्‍ट वक्‍ता, उन्‍मुक्‍त और निष्‍पक्ष होते हैं। न क्षुद्र व्‍यवहार करते हैं और न दूसरों का ऐसा व्‍यवहार बर्दाश्‍त कर पाते हैं। इसी कारण समूह में इनकी भूमिका सदैव नेतृत्‍व की ही रहती है। ये सामान्‍यता उच्‍च पद अथवा समाज में ऊंचा दर्जा पाने का प्रयास करते नजर आते हैं। इनके लिए साख ही सबकुछ है इसलिए साख बढ़ाने के लिए निरन्‍तर प्रयत्‍नशील रहते हैं। इनके लिए रविवार का दिन शुभ है, सोमवार को धन का व्‍यय होता है और मंगलवार को बड़ी सफलताएं प्राप्‍त करते हैं। बुधवार को भाग्‍य साथ देता है। शनिवार को धोखा खाते हैं। शुभ रंग नारंगी है और शुभ अंक एक। माणिक और पन्‍ना पहनने से भाग्‍य में बढ़ोतरी होती है।

अत्‍यधिक विश्‍लेषण से परेशान करने वाले कन्‍या जातक

ganesh jiआपको भी कभी न कभी ऐसे व्‍यक्ति मिले होंगे जो छोटी सी बात को बहुत अधिक विस्‍तार से समझते और समझाते हैं। एक बार गलती से भी इन लोगों को सामान्‍य बात का विश्‍लेषण पूछ लिया जाए तो घंटों तक उस तथ्‍य की चीरफाड़ करते रहते हैं। ये कन्‍या जातक के लोग हैं। कन्‍या राशि का स्‍वामित्‍व बुध के पास है। यहीं पर बुध उच्‍च का भी होता है। सो ये लोग किसी न किसी रूप में फायनेंस, पब्लिकेशन या अन्‍य पढ़ने लिखने के काम से जुड़े हुए होते हैं। अपने प्रोफेशन में भले ही अपनी विश्‍लेषण क्षमता के कारण ये लोग पूछे जाते हों, लेकिन सामाजिक तौर पर इनकी स्थिति एक समय बाद यह हो जाती है कि लोग बात करने से कतराने लगते हैं। अगर कन्‍या जातक खुद पर कंट्रोल रखना सीख लें तो इनके आकर्षक और सम्‍मोहित करने वाला जातक ढूंढना मुश्किल है। ये लोग दिमाग अधिक काम में लेते हैं सो शरीर का इस्‍तेमाल कम से कम करने का प्रयास करते हैं। इन्‍हें आराम की अवस्‍था पसंद है। बुध के पूरे प्रभाव के चलते ये  लोग नए कपड़े भी पहने तो वे मैले जैसे दिखाई देंगे। बुध का प्रभाव लग्‍न पर अधिक हुआ तो दांत भी गंदे दिखाई देंगे। यहां बुध उच्‍च और शुक्र नीच होता है। यानि सांसारिक साधनों से अधिक इन लोगों को ज्ञान की परवाह होती है। जातक लम्‍बा, पतला, आंखें काली, भौंहें झुकी हुई, आवाज पतली और कर्कश होती है। हमेशा तेज चलते हैं और अपनी उम्र से कम के दिखाई देते हैं। ये लोग लेखा कार्यों में होशियार होते हैं और अपनी नौकरी लाभ के अवसर के अनुसार लगातार बदलते रहते हैं। कार्यों को इतनी अधिक सावधानी से करते हैं कि हर काम में पुनरावृत्ति तक करने को तैयार रहते हैं। ताला बंद करेंगे तो  दो बार चेक करेंगे। पत्र लिखेंगे तो गीले गोंद लगे पत्र को फिर से खोलकर पढ़ेंगे। इन लोगों को अपने स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर वार्तालाप करना पसंद होता है। इतना अधिक कि छोटी सी बीमारी को लेकर घंटों और दिनों तक बातें कर सकते हैं। उसके हर एक पहलु पर इतना विस्‍तार से वर्णन करते हैं कि सुनने वाला ही भाग खड़ा हो। व्‍यावसायिक प्रवृत्ति के कारण धन के प्रति सावधान होते हैं। इन लोगों को किसी भी ट्रस्‍ट या संस्‍थान में कोषाध्‍यक्ष बनाया जा सकता है। इनके लिए शुभ रंग हरा और शुभ दिन बुधवार होता है। भाग्‍य को बढ़ाने के लिए इन लोगों को पन्‍ना, मोती और हीरा पहनना चाहिए।

राशियों का मूल स्‍वभाव है यह

मैंने राशि के जो गुण बताए हैं वे लग्‍न अथवा चंद्रमा होने पर प्रकट होते दिखाई देते हैं। अन्‍यथा राशि जिस भाव में होगी वैसे ही भाव के गुणों में परिवर्तन आएगा। यहां राशि के मूल स्‍वभाव दिए जा रहे हैं। क्रूर अथवा सौम्‍य राशियों का प्रभाव होने अथवा केन्‍द्र व त्रिकोण जैसे भावों में होने पर इनमें कुछ अंतर भी आता है। उनकी गणना अलग से की जाएगी। पहले राशि से परिचय हो जाए। फिर ग्रहों और भावों के परिचय होने के बाद सम्‍पूर्ण कुण्‍डली का समग्र विश्‍लेषण किया जाएगा। तब तक पाठक राशियों के मूल स्‍वभाव से ही परिचित हों। कहीं-कहीं हो सकता है कि पाठकों को अपने गुण मिलते हुए लगें, लेकिन ये अपना पूरा प्रभाव अपनी दशा अथवा अंतरदशा में देते हैं, भले ही मूल स्‍वभाव इससे इतर हो।

अगली कक्षा में हम बात करेंगे तुला और वृश्चिक राशियों की...

शनिवार, अप्रैल 30, 2011

ज्ञान है, अंतर्ज्ञान है, पर अनुभव की परिपक्‍वता?

ठीक है मैंने भुजिया चखने वाले जातकों के बारे में बताया। यह मेरे काम से जुड़े लोगों का एक पक्ष था अब दूसरा पक्ष लीजिए नौसिखिए ज्‍योतिषियों का। और हां, स्‍पष्‍ट कर दूं कि अपने नौसिखिए काल में मैं भी ऐसा ही रहा हूं। इसलिए लेख के दौरान जो व्‍यंग्‍य बाण आएंगे उन्‍हें मेरे ऊपर ही चला हुआ समझा जाए मुस्‍कानएक सामान्‍य इंसान और ज्‍योतिषी में कई मूलभूत अंतर होते हैं। हालांकि मैं खुद अभी विद्यार्थी हूं सो पक्‍का नहीं कह सकता कि जितने अंतर मुझे पता है उतने ही अंतर होते हैं या उससे अधिक, लेकिन जो जानता हूं वह बता देता हूं।
इसमें पहला तो है विषय का पुख्‍ता ज्ञान। एक नैसर्गिक ज्‍योतिषी जब ग्रहों, राशियों, भावों, इनके संबंधों और इनके जातक की जिंदगी के प्रभाव के बारे में पढ़ता है तो वह स्‍पष्‍ट रूप से इन्‍हें अलग-अलग समझ पाता है कि इनके जातक की जीवन और आपस में क्‍या संबंध हैं और परिणाम कैसे आ रहे हैं। शुरूआती दौर में कुण्‍डलियों का विश्‍लेषण उपलब्‍ध किताबी या श्रव्‍य ज्ञान को और धार देता है। बाद में हर ज्‍योतिषी अपने स्‍तर पर पुख्‍ता नियम बना लेता है। बाद में यही नियम फलादेश करने में उसकी सहायता करते हैं। जो लोग पैदाइशी या ईश्‍वरीय कृपा के साथ ज्‍योतिषी नहीं होते हैं उन्‍हें ग्रहों, राशियों और भावों का चक्‍कर उलझन में डाल देता है। मैंने ऐसे सैकड़ों उदाहरण देखे हैं।
दूसरा है ईश्‍वर प्रदत्त अंतर्ज्ञान - यह किसी भी ज्‍योतिषी के लिए सबसे महत्‍वपूर्ण बिन्‍दू है। एक ज्‍योतिषी केवल अपने चेतन मस्तिष्‍क की गणनाओं से फलादेश नहीं कर सकता। इसके दो कारण है। पहला गणनाओं का विशाल होना और दूसरा देश-काल और परिस्थितियों के लगातार बदलते रहने से इंटरप्रटेशन में बदलाव आना। इसके चलते ज्‍योतिषी केवल फौरी गणनाओं के भरोसे ही फलादेश नहीं कर पाता है। यहां अंतर्ज्ञान ज्‍योतिषी की मदद करता है। कई लोग अनुमान, कल्‍पना और अंतर्ज्ञान में भेद नहीं कर पाते हैं। ऐसे में वे ऊट-पटांग फलादेश करते जाते हैं। बाद में पता चलता है कि कोई भी फलादेश सटीक नहीं पड़ रहा है। ऐसे कुछ नौसिखिए ज्‍योतिषी ज्‍योतिष की पुस्‍तकों तो कुछ अपने गुरुओं को गालियां निकालकर बरी हो जाते हैं।
तीसरा है अनुभव - जैसा कि मैं ऊपर स्‍पष्‍ट कर चुका हूं कि ज्‍योतिष में इंटरप्रटेशन का बहुत महत्‍व है। ऐसे में काउंसलिंग के दौरान ज्‍योतिषी का अनुभव बहुत मायने रखता है। मेरा मानना है कि आधुनिक ज्‍योतिषियों को वर्तमान में उपलब्‍ध अधिकांश प्रचलित ज्ञान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। अब संचार माध्‍यमों से यह सहज सुलभ भी है और भारत जैसे स्‍वतंत्र राष्‍ट्र में हर तरह की पुस्‍तक हर जगह उपलब्‍ध है। ऐसे में अपने ज्ञान के दायरे को बढ़ाते जाने से ज्‍योतिषी की धार भी मजबूत होती जाएगी। इसके बावजूद भी जीवन जीने से आ रहा अनुभव भी मायने रखता है। जिस ज्‍योतिषी की शादी नहीं हुई है वह किसी जातक के विवाह संबंध में आधारित प्रश्‍नों के किताबों में लिखे जवाब तो दे देगा, लेकिन उसका इंटरप्रटेशन इतना कमजोर होगा कि जातक तक सही संदेश पहुंचना संदेह के दायरे में ही रहेगा।
चौथा है खुद ज्‍योतिषी के योग - इस बारे में केएस कृष्‍णामूर्ति ने लिखा है कि ज्‍योतिषी दो तरह के होते हैं। एक गणित में होशियार तो दूसरे फलादेश में होशियार। भले ही गणित में होशियार ज्‍योतिषी को अधिक ज्ञान हो, लेकिन प्रसिद्धि फलादेश करने वाले ज्‍योतिषी को ही मिलेगी। ऐसे में किसी ज्‍योतिषी की कुण्‍डली में यह भी देखने की जरूरत है कि उसके भाग्‍य में प्रसिद्ध होना लिखा है कि नहीं। अगर प्रसिद्धि नहीं लिखी है तो लाख बेहतर फलादेश करने के बाद भी दुनिया उसे जानेगी नहीं।
नौसिखिए ज्‍योतिषियों के चुटकुलेबन्‍दर के हाथ उस्‍तरा
- एक जातक ने ज्‍योतिषी को कुण्‍डली दिखाई। उस समय वह 22 साल का था। ज्‍योतिषी ने कुण्‍डली देखते ही कहा कि तुम्‍हारी कुण्‍डली का कारक ग्रह तो गुरु है। और गुरु की दशा से पहले तुम्‍हारे 55 साल की उम्र में मारक योग बन रहा है। ऐसे में तुम्‍हारी जिंदगी में भी अच्‍छा समय आएगा ही नहीं। तुम्‍हारी तो जिंदगी ही व्‍यर्थ है। अच्‍छे चेहरे-मोहरे और दोस्‍तों से घिरा रहने वाला वह जातक इतना डिप्रेशन में आ गया कि अगले दो महीने तक अपने कमरे से भी बाहर नहीं निकला।
- एक जातक को ज्‍योतिषी ने उपचार बताया कि आप तो शनि मंदिर में तेल का दीया जलाओ। हालांकि जातक के नाम से ही स्‍पष्‍ट था कि वह मुसलमान था, लेकिन ज्‍योतिषी ने तो जैसे फाइनल घोषणा ही कर दी कि शनि मंदिर में दीया जलाने से ही उपचार होगा, नहीं तो नहीं होगा। अब एक मुसलमान की आस्‍था उस मंदिर से जुड़ी ही नहीं है तो उपचार नहीं होना भी तय है, लेकिन किताब में ऐसा ही लिखा था, सो जातक को बता दिया गया मुस्‍कान 
- बच्‍चा गुम होने के सवाल का जवाब खोज रहे ज्‍योतिषी ने किताब में पढ़कर बताया कि बच्‍चा अभी पांच फर्लांग की दूरी पर है। सवाल पूछने आए सज्‍जन ने पूछा कि पांच फर्लांग कितना होता है, तो ज्‍योतिषी ने स्‍पष्‍ट कह दिया कि किसी गणित के मास्‍टर से पूछ लेना। खैर, बाद में बच्‍चा करीब पैंतीस किलोमीटर दूर एक गांव में पकड़ा गया। ज्‍योतिषी ने यह नहीं समझा कि करीब अस्‍सी साल पहले लिखी गई किताब में पांच फर्लांग की दूरी तय करने में लगने वाला समय उतना ही हो सकता है जितना आज के दौर में बस में बैठकर पैंतीस किलोमीटर दूर पहुंचना। आखिर ज्‍योतिष गणना है तो समय की ही गणना।
- एक जातक से ज्‍योतिषी ने कहा कि तुम्‍हारी पत्‍नी का जन्‍म गण्‍डमूल नक्षत्र में हुआ है। ऐसे में पति और पत्‍नी की हमेशा लड़ाई रहेगी। जातक ने कहा लड़ाई तो नहीं होती। ज्‍योतिषी को प्‍वाइंट जीतना था, तो उसने कहा कि सास-बहू की खिच-खिच से घर में तनाव रहता होगा। अब जातक पकड़ में आ गया। वह ज्‍योतिषी की बात को लेकर इतना सीरियस हुआ कि कुछ दिन में घर में सचमुच लड़ाई रहने लगी और बाद में तो जातक के तलाक की खबर भी सुनी।
- एक जातक की कुण्‍डली के विश्‍लेषण से ज्‍योतिषी को पता चला कि अगर जातक ने हाथी की सवारी की तो उसे नुकसान हो सकता है। आव देखा न ताव ज्‍योतिषी ने निर्णय सुनाया कि आप कभी हाथी की सवारी मत करना, वरना दुर्घटना का शिकार हो सकते हो। गरीब जातक हंसा और कुण्‍डली लेकर चला गया।
- एक नए ज्‍योतिषी ने अपनी कुण्‍डली 'बड़े' ज्‍योतिषी को दिखाई। उन्‍होंने शनि मुद्रिका पहनने की सलाह दी। एक महीने में नए ज्‍योतिषी का समय सुधर गया और वह काम धंधे पर लग गया। नया ज्‍योतिषी इतना उत्‍साहित हुआ कि अपने साथ काम कर रहे अधिकांश लोगों की कुण्‍डली देखकर शनि मुद्रिका ही पहना दी। यह सोचकर कि मेरा भला हुआ है तो दूसरों का भी हो जाएगा। मुस्‍कान 

इसके अलावा चांदी की अंगूठी में या गले के लॉकेट में मोती पहनाना, गायों को गुड़ डालना, बच्‍चें का लिंग निर्धारण, मृत्‍यु की तारीख बताना, भाग्‍योदय की दिशा (?) बताना, लॉटरी या मटके में निकलने वाला नम्‍बर बताना, नाम में बदलाव के सुझाव, जातक के परिवार के अन्‍य लोगों के लिए उपाय बताकर जातक को फायदा पहुंचाने जैसे उपचार भी नौसिखिए ज्‍योतिषी बताते रहते हैं। यहां तक कि सुने सुनाए किस्‍सों के आधार पर ज्‍योतिष के उपायों में तांत्रिक उपचारों का समावेश भी इन सालों में बहुत बढ़ गया है। इसमें लाल और काली किताब का बड़ा रोल है। इन ऊट-पटांग निर्णयों और क्रियान्‍वयन का पता भी बहुत बाद में लगता है, तब तक पुल के नीचे से बहुत सा पानी बह चुका होता है....


GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORN 
AQUARIUS PISCES SUN MOON MARS MERCURY JUPITER VENUS SATURN DRAGON HEAD TAIL SURYA CHANDRA MANGAL BUDH GURU BRIHASPATI SHUKRA SHANI RAHU KETU LAGNA DWITIYA TRITIYA CHATURTHA PANCHAM SHASHTHAM SAPTAM ASHTAM NAVAM DASHAM EKADASH DWADASH HOUSE HOROSCOPE ASTROLOGER SUNHARI KITAB VADIC MANTRA TANTRA UPAAY FAMILY CHILD CHILDREN ASTRO HEALTH WEALTH MAKAAN HOUSE STUDY GROUP BUSINESS CAREER VAAHAN CAR ONLINE CONSULTANCY ASTRO SALAAH PANDIT JANM PATRIKA 

मंगलवार, मार्च 09, 2010

Any Jatak can wear topaz or pearl As his/her lucky gemstone

मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो... चलेगा

मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो चलेगा, दोनों ही निर्मल और शुद्ध ग्रह हैं। नुकसान तो करेंगे नहीं। यह ज्ञान दिया मेरे एक साथी ज्‍योतिषी ने। वह मोती तो हर किसी को पहना देता है। कहता है मन का कारक है, मोती पहनेगा तो मानसिकता मजबूत होगी। नहीं भी होगी तो नुकसान नहीं करेगा। सामान्‍य बात है, समझ में भी आ गई। 

वास्‍तव में जैम स्‍टोन से किस ग्रह का उपचार कैसे किया जाए इस बारे में कई तरह के मत हैं। कोई ग्रह के कमजोर होने पर रत्‍न पहनाने की सलाह देता है तो कोई केवल कारक ग्रह अथवा लग्‍नेश संबंधी ग्रह का रत्‍न पहनने की सलाह देता है। ऐसे में किसे क्‍या पहनाया जाए, यह बताना टेढ़ी खीर है। यहां के.एस. कृष्‍णामूर्ति को कोट करूं तो स्‍पष्‍ट है कि लग्‍नेश या नवमेश अथवा इनसे जुड़े ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कई दूसरे ग्रह जो फौरी तौर पर कुण्‍डली में बहुत स्‍ट्रांग पोजिशन में दिखाई भी दें तो उनसे संबंधित उपचार नहीं कराए जा सकते। 

मैं उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। तुला लग्‍न के जातक की कुण्‍डली में लग्‍न का अधिपति हुआ शुक्र, कारक ग्रह हुआ शनि और नवमेश हुआ बुध। अब कृष्‍णामूर्ति के अनुसार जब तक शनि का संबंध शुक्र या बुध से न हो तो उससे संबंधित उपचार नहीं किए जा सकते, यानि उपचार प्रभावी नहीं होगा, लेकिन परम्‍परागत ज्‍योतिष के अनुसार तुला लग्‍न के जातक को शनि संबंधी रत्‍न प्रमुखता से पहनाया जा सकता है। यहां गाड़ी अटक जाती है।

बिना ठोस वजह के मूंगा और नीलम पहनाने से हुए नुकसानों के हजारों उदाहरण हैं। नीलम के संबंध में कई कहानियां आपने भी सुनी होगी, लेकिन मूंगे और हीरे को लेकर मेरे पास भी दो कहानियां हैं। दोनों ही मेरे अपने अनुभव हैं। हमारे एक जानकार का तबादला बीकानेर से बाहर हो गया। उन्‍होंने सालभर तक कोशिश की और तकरीबन हर ज्‍योतिषी को दिखा दिया। कई ज्‍योतिषियों ने लग्‍नेश होने के कारण उन सज्‍जन को मूंगा पहनने की सलाह दे डाली। जातक ने सोने की अंगूठी में सवा छह रत्‍ती का मूंगा बनवाकर पहन भी लिया। कुछ ही दिनों में उनका गुस्‍सा परवान चढ़ने लगा। जब वे मेरे पास आए तब उनकी कुण्‍डली में राहू में मंगल का ही अंतर चल रहा था। चंद्रमा इतना कमजोर था कि मैंने कार्ड खेल दिया, मैंने पूछा आप आत्‍महत्‍या का प्रयास तो नहीं कर चुके हैं। जातक ढेर हो गया, उसने कहा दो बार पंखे में रस्‍सी डाल चुका हूं लेकिन परिवार का चेहरा सामने आ गया सो, इरादा टाल दिया। मैंने कहा यह मूंगे के कारण हो रहा है। आप इसे अभी खोल दीजिए। उन्‍होंने मेरी बात मान ली और मूंगा तुरंत उतार दिया। फिर मैंने उन्‍हें राहू के उपचार बताए और तबादला वापस बीकानेर होने की तिथि बता दी। करीब तीन महीने बाद उनका तबादला वापस बीकानेर हो गया। रास्‍ते में मुझे मिले तो बड़े खुश नजर आ रहे थे। उनकी पत्‍नी साथ थीं, उनकी पत्‍नी ने मुझे देखते ही धन्‍यवाद दिया और बताया कि जिन दिनों में मूंगा पहन रखा था, उन दिनों छोटी-छोटी बात पर जोरदार तैश में आ जाते। अपने बच्‍चों को टीन एजर होने से पहले तक भी हाथ नहीं लगाया उनकी भी पिटाई कर देते थे। अब सहज हो गए हैं।

एक दूसरी घटना शुक्र से जुड़ी है। लाल किताब बताती है कि हम किसी ग्रह से संबंधित वस्‍तु हाथ में धारण करते हैं तो वह ग्रह कुण्‍डली के तीसरे भाव का फल देने लगता है। इसे मैंने चैक किया मेरे एक मित्र पर। मैंने उसे बता दिया था कि यह एक प्रयोग ही है, क्‍योंकि इस बारे में मैं अधिक नहीं जानता। उसे शुक्र के हीरे के रूप में अमरीकन डायमंड की अंगूठी पहनाई। उसका गुरु पहले से ही नौंवे भाव में था। अब अंगूठी पहनाने के बाद लाल किताब के अनुसार शुक्र और गुरू आमने-सामने हो गए थे। यानि एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि देने वाले। मेरा कुंवारा दोस्‍त पड़ोसन के चक्‍कर में पड़ गया। जो लड़का कभी लड़कियों की तरफ आंख उठाकर नहीं देखता था, वह इतनी लंपटता करने लगा कि एक दिन जब मैं उसके घर गया तो उसने पड़ोसन को दिखाकर उससे अपने संबंध बताए। मैंने उसे हीरा खोल देने की सलाह दी, लेकिन वह अपनी नई स्थिति से खुश था, सो हीरा नहीं खोला। मेरा ख्‍याल है बाद में उसी रत्‍न के चलते उसने सरकारी नौकरी की आस छोड़कर प्राइवेट कंपनी में एप्‍लाई किया और नौकरी लग गया। बाद में कुछ साल बाहर भी रहा। इन दिनों निजी कंपनी में मैनेजर के पद पर पहुंच चुका है। मैला-कुचैला रहने वाला मेरा दोस्‍त अब टिप-टॉप रहता है और शुक्र के जातक की तरह व्‍यवहार करता है। अब उसे देखता हूं तो लगता है कि उसकी स्थिति तो ठीक हो गई लेकिन वह अपने मूल स्‍वरूप में नहीं रहा। 

GAM STONE LAL KITAB SIDHARTH JOSHI FALADESH JYOTISH KUNDALI JYOTISH DARSHAN ASTROLOGY SIGNS MESHA VRISHUBHA MITHUNA KARKA SIMHA KANYA TULA VRISHCHIKA DHANU MAKAR KUMBHA MEENA ARIES TAURUS GEMINI CANCER LEO VIRGO LIBRA SCORPIO SAGITTARIUS CAPRICORN
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सोमवार, मार्च 08, 2010

GEM STONE : WHO, WHEN, HOW and many more questions?

रत्‍न : कब, कौनसा और कैसे पहनें

आमतौर पर ज्‍योतिष और ज्‍योतिष से जुड़ी किसी भी विधा को विज्ञान का दर्जा दे दिया जाता है। लेकिन रत्‍न विज्ञान को इस तर्ज पर विज्ञान का दर्जा नहीं मिला है। जैमोलॉजी वास्‍तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्‍छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्‍थरों ने अपना यह स्‍थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्‍लेटिनम की तरह। इसमें ज्‍योतिष का कोई रोल नहीं है। 

            यकीन मानिए भाग्‍य के साथ रत्‍नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्‍या में गोमेद रत्‍न प्राप्‍त हुए हैं। यह सामान्‍य अवस्‍था में पाया जाने वाला रत्‍न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्‍तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्‍ताओं के लिए भी आश्‍चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्‍यों दिखाई, या गोमेद का रत्‍न के रूप में धारण करने के अतिरिक्‍त भी कोई उपयोग होता था, यह स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है। 

            इंटरनेट और किताबों में रत्‍नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके इतर मेरी पोस्‍ट इसकी वास्‍तविक आवश्‍यकता के बारे में है। मैं एक ज्‍योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्‍नों को पहनने का महत्‍व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्‍तविक आवश्‍यकता बताने का प्रयास करूंगा।

दो विधाओं में उलझा रत्‍न विज्ञान

वर्तमान दौर में हस्‍तरेखा और परम्‍परागत ज्‍योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्‍नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्‍तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्‍वामित्‍व दर्शाया है। ऐसे में कुण्‍डली देखकर रत्‍न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्‍तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। 

            जैसे बुध के लिए बताया गया पन्‍ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्‍योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्‍पष्‍ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्‍न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। 

शरीर से टच तो हुआ ही नहीं

शुरूआती दौर में जब मुझे ज्‍योतिष की टांग-पूछ भी पता नहीं थी, तब मैं एक पंडितजी के पास जाया करता था। वहां एक जातक को लेकर गया, उन्‍होंने मोती पहनने की सलाह दी। मैंने जातक के साथ गया और मोती की अंगूठी बनवाकर पहना दी। कई सप्‍ताह गुजर गए। कोई फर्क महसूस नहीं हुआ तो जातक महोदय मेरे पास आए और मुझे लेकर फिर से पंडितजी के पास पहुंचे। 

            पंडितजी ने कहा दिखाओ कहां है अंगूठी। दिखाई तो वे खिलखिलाकर हंस दिए। बोले यह तो शरीर के टच ही नहीं हो रही है तो इसका असर कैसे पड़ेगा। मैंने पूछा तो टच कैसे होगी। तो उन्‍होंने बताया कि बैठकी मोती खरीदो और फलां दुकान से बनवा लो। हम दौड़े-दौड़े गए और बैठकी मोती लेकर बताई गई दुकान पर पहुंच गए। हमने बताया कि टच होने वाली अंगूठी बनानी है। दुकानदार समझ गया कि पंडित जी ने भेजा है। उसने कहा कल ले जाना। 

            और अगले दिन अंगूठी बना दी। वह इस तरह थी कि नीचे का हिस्‍सा खाली था। इससे मोती अंगुली को छूता था। कुछ ही दिनों में मोती पहनाने का असर भी हो गया। मेरे मन में भक्ति भाव जाग गया, और एक बात हमेशा के लिए सीख गया कि जो भी रत्‍न पहनाओ उसे शरीर के टच कराना जरूरी है। 

टच से क्‍या होता है किरणें महत्‍वपूर्ण हैं 

अंग्रेजी में इसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं और हिन्‍दी में मैं कहूंगा दृष्टिकोणीय झटका। एक दूसरे हस्‍तरेखाविज्ञ कई साल बाद मुझसे मिले। मैं किसी को उपचार बता रहा था और साथ में शरीर से टच होने वाली नसीहत भी पेल रहा था, कि हस्‍तरेखाविज्ञ ने टोका कि टच होने से क्‍या होता है, यह कोई आयुर्वेदिक दवा थोड़े ही है। रत्‍नों के जरिए तो किरणों से उपचार होता है। मैंने स्‍पष्‍ट कह दिया समझा नहीं तो उन्‍होंने समझाया कि 

            हम जो रत्‍न पहनते हैं वे ब्रह्माण्‍ड की निश्‍चित किरणों को खींचकर हमारे शरीर की कमी की पूर्ति करते हैं। इससे हमारे कष्‍ट दूर हो जाते हैं। विज्ञान का ठोठा स्‍टूडेंट होने के बावजूद मुझे पता था कि हम जो रंग देखते हैं वास्‍तव में वह उस पदार्थ द्वारा रिफलेक्‍ट किया गया रंग होता है। यानि स्‍पेक्‍ट्रम के एक रंग को छोड़कर बाकी सभी रंग वह पदार्थ निगल लेता है, जो रंग बचता है वही हमें दिखाई देता है। ऐसा ही कुछ रत्‍नों के साथ भी होता होगा। यह सोचकर मुझे उनकी बात में दम लगा।

अब मैं तो कंफ्यूजन में हूं कि 
वास्‍तव में टच करने से असर होगा या 
किरणों से असर होगा।
वास्‍तव में रत्‍नों की जरूरत है भी कि नहीं
रत्‍नों का विकल्‍प क्‍या हो सकता है
रत्‍न किसे पहनाना आवश्‍यक है

            इन सब बातों को लेकर कालान्‍तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए। अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।

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मंगलवार, अक्टूबर 27, 2009

Nostradamus lost pages and untold stories

नास्‍त्रेदमस का प्‍वाइंट


नास्‍त्रेदमस 2012 में बताया गया है कि हाल ही में नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक के कुछ दुर्लभ पन्‍ने हाथ लगे हैं। इन सात पन्‍नों में नास्‍त्रेदमस ने सृष्टि के अंत के बारे में स्‍पष्‍ट किया है। इसका मूल बनाया गया है एक खगोलीय घटना को। पहले इसी खगोलीय घटना को समझने का प्रयास करते हैं। 

            इसके अनुसार सूर्य आकाशगंगा के चारों ओर एक निश्चित रफ्तार से चक्‍कर लगा रहा है। सूर्य की इस गति का परिणाम यह होता है कि कई हजार साल बाद सूर्य इस स्थिति में आ जाता है कि पृथ्‍वी से देखने पर सूर्य के पीछे आकाशगंगा एक रोशनी की रेखा के रूप में आ जाती है। बस यही वह समय होता है जब पृथ्‍वी पर बड़े उत्‍पात होंगे। यह समय तय किया गया है 23 दिसम्‍बर 2012 का। नास्‍त्रेदमस के चित्रों और बुक ऑफ लाइफ को इस तथ्‍य से जोड़ा गया है। इससे दो तरह के निष्‍कर्ष निकाले गए। एक तो यह कि इसी दौरान जलजला आएगा और पृथ्‍वी खत्‍म या यह कि अंत की शुरूआत हो जाएगी। पृथ्‍वी के इतिहास में आइस ऐज में पहले एक बार यह स्थिति बन चुकी है। उसी को भविष्‍य की घटनाओं का कथन करने का आधार बनाया गया है। 

            इसमें बताया गया है कि पिछले सवा सौ सालों में मानवजाति ने जितने आपदाएं झेली हैं उतनी तो पहले की किसी भी सभ्‍यता ने नहीं झेली। प्राकृतिक आपदाओं के अलावा महामारियां, प्रदूषण, आतंकवाद, गृह युद्ध, जातिगत लड़ाइयां, बदलते मौसम चक्र, बढ़ती बेरोजगारी और असंतुष्‍टता, विश्‍व युद्ध, खत्‍म होता तेल, वैश्विक मंदियां, परमाणु हमलों की आशंका जैसे बिंदू संकेत करते हैं कि अब अंत निकट है। नास्‍त्रेदमस ने नई किताब में सात चित्रों की शृंखला है। इसमें पहले चित्र में सूर्य और शेर को साथ दिखाया गया है। इससे वैज्ञानिकों ने निष्‍कर्ष निकाला है कि सूर्य तब सिंह राशि में होगा और हमारा सौरमण्‍डल आकाशगंगा के ऐसे कोण पर होगा जब पूरी आकाशगंगा की ऊर्जा सूर्य की ओर केन्द्रित हो जाएगी। यही बदलाव का कारण बनेगा। इसका आधार यह लिया गया है कि पृथ्‍वी की साढ़े 66 डिग्री के झुकाव के साथ घूर्णन गति के चलते सभी आकाशीय पिण्‍ड एक निश्चित क्रम में चलते हुए दिखाई देते हैं। हर 26000 साल बाद पृथ्‍वी वापस उसी कोण पर पहुंच जाती है जहां से सूर्य आकाशगंगा के बीचों-बीच दिखाई देने लगता है।

            बहुत पहले एक जर्मन वैज्ञानिक ने हर ग्‍यारह साल बाद सूर्य में होने वाले बड़े विस्‍फोटों और उससे दुनिया पर होने वाले प्रभावों के बारे में बताया था। तब उस वैज्ञानिक को चुप करा दिया गया था। अब लगभग उसी सिद्धांत से मेल खाता एक नया सिद्धांत तैयार है कि एक समय ऐसा आता है जब मिल्‍की वे 'हमारी आकाशगंगा' जो एक तश्‍तरी की तरह है के बीचों-बीच सूर्य आ जाता है। यहां बीचों-बीच से मतलब आकाशगंगा के कोर से नहीं बल्कि पृथ्‍वी से दिखाई देने वाली अवस्‍था से है। जब सूर्य ऐसे कोण में आएगा तो पृथ्‍वी पर बहुत बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होंगे। 

            नास्‍त्रेदमस पर किताबें लिख रहे लेखक ही यह पूछते हैं कि क्‍या ये सब संयोग है या किसी अनहोनी का संकेत। वे मानते हैं कि मिश्र सभ्‍यता, प्राचीन कैथोलिक चर्च, दक्षिण अमरीका के होपी और माया सभ्‍यता में भी पृथ्‍वी या सृष्टि के खत्‍म होने का एक समय निश्चिता किया गया है। लेखकों ने उन सभ्‍यताओं की विभिन्‍न प्रणालियों से मिल रहे संकेतों को भी नास्‍त्रेदमस के संकेतों के साथ मिलाया है और सिद्ध किया है कि शीघ्र ही पृथ्‍वी का अंत होने वाला है। 

            इसी क्रम में पहले मैं भी एक सवाल खड़ा कर चुका हूं कि क्‍या मौसम चक्र में हो रहा परिवर्तन, मण्‍डेन में हो रहे बड़े परिवर्तनों का सूचक नहीं है। यह परिवर्तन हमें किस ओर लेकर जाता है। मुझे तो यह व्‍यवस्‍था में परिवर्तन का विरोध मात्र लगता है। प्राकृतिक आपदाएं कब नहीं थी, लेकिन मौसम चक्र में परिवर्तन पहले कभी नहीं रहा होगा। अब चूंकि यह शताब्दियों में घटने वाली घटना है तो इसका सही सही अनुमान नहीं किया जा सकता। 

            इन सबके बावजूद होपी, माया, मिश्र सहित कई सभ्‍यताओं में दुनिया के खत्‍म होने का समय निकाला गया है और यह 2012 में आना वाला है। खास बात यह है कि हर सभ्‍यता ने दुनिया के खत्‍म होने का समय तय किया है। पर भारतीय सभ्‍यता में ऐसा नहीं है। ठीक है उस प्‍वाइंट पर बाद में विचार करेंगे लेकिन यहां संकेत देना जरूरी है कि प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में इस संबंध में बहुत सी बातें बहुत स्‍पष्‍ट तरीके से बताई गई हैं। उन पर बात फिर कभी...
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रविवार, अक्टूबर 18, 2009

आदरणीय स्‍वामी नारायणन् जी

हमारे परम गुरूजी स्‍वामी नारायणन् जी




आज मैं आपका परिचय कराना चाहता हूं एक साधू स्‍वामी नारायणन् जी से। किसी से ऑल इंडिया रेडियो में कुछ समय रहने वाले और बाद में केन्‍द्र सरकार के किसी संस्‍थान में नौकरी करने वाले स्‍वामी नारायणन् जी ने करीब सैंतीस साल पहले सन्‍यास ले लिया। तब से अब तक वे एक साधू ही हैं। साल के छह महीने गंगोत्री में रहते हैं और छह महीने निचले इलाकों में आ जाते हैं। हम कुछ लोगों का सौभाग्‍य है कि हम उन तक पहुंच पाए और अब नियमित संपर्क में है। वेद और विज्ञान का उनका अध्‍ययन एक जैसा है। ब्रह्म और इंटरनेट दोनों की बातें इतनी सहजता से करते हैं कि कोई भी उनके सानिध्‍य में खुद को पूरा होता महसूस करने लगता है। हालांकि कुछ साल पहले मुझे भी उनके सानिध्‍य में तीसरी शक्ति का तगड़ा अनुभव हुआ था लेकिन उसे भी उन्‍होंने मेरी ध्‍यान की अवस्‍था बताकर खारिज कर दिया।
सहजता में विश्‍वास करने वाले स्‍वामीजी किसी की बात टालते नहीं हैं। उनके पास कई तरह की खोपडि़यां आती हैं। लेकिन एक झेन साधू की तरह हर किसी के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं जैसे कि वे उनकी तरह ही हों। वे कब कहां और कितने दिन होते हैं कोई कह नहीं सकता। बस लगातार निगरानी रखो तो पता चल जाता है कि इन दिनों स्‍वामी जी कहां हैं। इसी तरह उनके एक शिष्‍य ने उन्‍हें कुछ दिन पहले दिल्‍ली में ढूंढ निकाला और आग्रहपूर्वक बीकानेर ले आए। अपने चार दिन के छोटे प्रवास काल में उन्‍होंने पता नहीं कितने लोगों को अपने स्‍नेह से सराबोर कर दिया। एक दिन मेरे घर भी चाय पीने के लिए आए। तब मेरे अनुज आनन्‍द ने उनसे जी भरकर बातें की।
मेरे श्‍वसुरजी ने उनके कुछ फोटो अपने मोबाइल से लिए। उनसे मांगकर में स्‍वामीजी के कुछ फोटो यहां डाल रहा हूं। ऐसे हैं हमारे परम गुरूजी...