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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष कक्षा: 3सरा दिन - राशियां, भाव और भावेश

तीसरे दिन की कक्षा तक दो या तीन छात्र ही किताबें लेकर आए। शेष ने बारह दिन की कक्षा के दौरान ही सारी ज्‍योतिषी बोर्ड पर ही समझने की ठान ली थी। इसके चलते उन्‍होंने किताबें खरीदने के बजाय केवल मुझसे सुनकर जितना हासिल हो सके उतना ही हासिल करने का मानस बनाया है। तीसरे दिन कक्षा के बाद मैं पोस्‍ट नहीं लिख पाया। अब कई दिन बाद पोस्‍ट लिख रहा हूं। सो इस बीच छात्रों को किताबें खरीदने के लिए तैयार करने की कोशिश करता रहा। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि कक्षा के बारह छात्रों में से आठ ने किताबें खरीद ली हैं। इनमें से दो ने देवकीनन्‍दन सिंह की ज्‍योतिष रत्‍नाकर खरीदी तो शेष छह पुस्‍तक महल की फलित ज्‍योतिष रेडीरेकनर खरीद लाए हैं। ठीक है एलीमेंट्री ज्‍योतिष के लिए यह किताब भी बुरी नहीं है। कक्षा में पढ़ाए विषय की बात से पहले स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा कि ज्‍योतिष अध्‍ययन बहुत शादी अंदाज है। इसे तब तक पढ़ा नहीं जा सकता जब तक आप समय और धन खर्च करने के लिए मानसिक रूप से पर्याप्‍त तैयार नहीं हो जाते। वरना गद्दी तपने वाले ज्‍योतिषी से अधिक नहीं बन पाएंगे। गद्दी तपने के अंदाज पर एक जुदा पोस्‍ट फिर कभी....
फिलहाल तो ज्‍योतिष की कक्षा का एक फोटो... अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर अजीज भुट्टा ने अपने कैमरे की नजरे इनायत की और हमारा एक फोटो खींचकर हमें मेल कर दिया। हालांकि एक फोटो अखबार में भी छपा था, लेकिन समाचार पत्र की पॉलिसी की वजह से उसमें फैकल्‍टी का फोटो नहीं दिया गया था।

भचक्र की बारह राशियां
तारों और उससे बने नक्षत्रों के बारे में हम पहले पढ़ चुके हैं। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं। नक्षत्रों के नौ चरणों से एक राशि बनती है। यानि सवा दो नक्षत्रों की एक राशि होती है। राशियां कुल बारह हैं। पहली राशि मेष, द्वितीय वृष, तृतीय मिथुन, चतुर्थ कर्क, पंचम सिंह, छठी कन्‍या, सातवीं तुला, आठवीं वृश्चिक, नौंवी धनु, दसवीं मकर, ग्‍यारहवीं कुंभ और बारहवीं राशि मीन है। हर राशि का अधिपति होता है। सूर्य और चंद्रमा के आधिपत्‍य में एक-एक राशि है और शेष अन्‍य ग्रहों के अधिकार में दो-दो राशियां हैं। मेष और वृश्चिक राशि का अधिपति मंगल है। वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्‍या का बुध अधिपति है। चंद्रमा का कर्क राशि पर अधिकार है और सूर्य का सिंह राशि पर। धनु और मीन राशि का अधिपति गुरु है और मकर व कुंभ राशि का शनि अधिपति है।
भाव और भावेश क्‍या है?

भचक्र के 360 अंशों को 12 भागों में बांटा गया है। इनमें से हर भाग 30 डिग्री का है। इस भाग को भाव कहते हैं। जब कोई कुण्‍डली हमारे सामने आती है तो उसमें बारह खाने बने हुए होते हैं। इनमें से सबसे ऊपर वाला पहला भाव होता है। कुण्‍डली के भावों को कुछ इस तरह से बताया जा सकता है। जिस भाव में जो संख्‍या लिखी है वह भाव की संख्‍या है। पहला भाव कुण्‍डली का सबसे महत्‍वपूर्ण भाव होता है। इसे लग्‍न कहते हैं। जातक के जन्‍म के समय यही भाव पूर्व दिशा में उदय हो रहा होता है। लग्‍न से जातक की आत्‍मा, मूल स्‍वभाव, उसका स्‍वास्‍थ्‍य देखा जाता है। अन्‍य विषयों के विश्‍लेषण के दौरान भी लग्‍न की स्थिति प्रमुखता से देखी जाती है। यदि लग्‍न मजबूत होता है तो कुण्‍डली अपने आप दुरुस्‍त हो जाती है। अगर किसी जातक की कुण्‍डली में लग्‍न खराब हो रहा हो तो पहले उसी का उपचार किया जाता है।
जहां दो लिखा है वह द्वितीय भाव है। यहां से जातक का परिवार और धन देखा जाता है। तीसरा भाव भाई बंधु और छोटी यात्राएं देखने के लिए है। चौथा भाव माता और घर की शांति बताता है, पांचवा भाव जातक की उत्‍पादकता और संतान के बारे में बताता है। छठा भाव ऋण, रोग और शत्रुओं की जानकारी देता है। सातवां भाव पत्‍नी और व्‍यापार में साझेदार के बारे में बताता है। आठवां भाव आयु और गुप्‍त कार्यों, नौंवा भाव भाग्‍य, दसवां कर्म, ग्‍यारहवां आय और बारहवां भाव व्‍यय की जानकारी देता है। आय, व्‍यय और कर्म किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।

लग्‍न में कोई भी राशि हो सकती है। बारह राशियों में से जो राशि लग्‍न में होगी जातक का लग्‍न उसी राशि के अनुरुप कहा जाएगा। यदि जातक के जन्‍म के समय मिथुन या तुला राशि का उदय हो रहा है तो कहेंगे कि जातक का लग्‍न मिथुन या तुला का है। फर्ज कीजिए कि एक जातक 7 जून 2011 को रात 8 बजकर 19 मिनट पर बीकानेर में पैदा होता है तो उसकी कुण्‍डली कुछ इस तरह होगी। (दाएं ओर के चित्र में दर्शाए अनुसार)
इसमें कुण्‍डली के लग्‍न में धनु राशि है। ऐसे में कहेंगे कि धनु लग्‍न की कुण्‍डली है। धनु राशि का स्‍वामी गुरु है। ऐसे में कहेंगे कि लग्‍न का अधिपति गुरु है। दूसरे व तीसरे भाव का अधिपति शनि। चौथे का फिर से गुरु, पांचवें व बारहवें का मंगल, छठे व ग्‍यारहवें का शुक्र, सातवें और दसवें का बुध, आठवें का चंद्र, नौंवे का सूर्य अधिपति होगा। ज्‍योतिषीय शब्‍दावली में इसे कहेंगे कि लग्‍नेश गुरु, द्वितीयेश व तृतीयेश शनि, चतुर्थेश गुरु, पंचमेश मंगल, षष्‍ठेश शुक्र, सप्‍तमेश बुध, अष्‍टमेश चंद्र, नवमेश सूर्य, दशमेश बुध, एकादशेश शुक्र, द्वादशेश मंगल है।
ज्‍योतिष की कक्षा में तीसरे दिन हम करेंगे राशियों से परिचय। इसमें हम मेष से मीन तक की बारह राशियों की विशेषताओं पर चर्चा करेंगे।

गुरुवार, मार्च 01, 2012

Who will get success in foreign land

विदेश में सफल होने की संभावना

अपने घर में रहकर सफल और संपन्‍न होने से बेहतर सपना और क्‍या हो सकता है, लेकिन कुछ लोग विदेश (Foreign) में जाकर सफल होना चाहते हैं। विदेश में भी किसी एक देश या राज्‍य नहीं बल्कि पूरे देश या विदेशों में भी न केवल अपनी सफलता (Success) के झण्‍डे गाड़ना चाहते हैं। कुछ लोगों की इच्‍छा घूमने के लिए विदेश जाने की रहती है। कुछ लोग ऐसी परदेस की यात्राओं में सुखी रहते हैं तो कईयों को बहुत दुख उठाने पड़ते हैं और विफल और निराश हो घर लौटते हैं। इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि कौनसे योग हमें विदेश में बेहतर भविष्‍य का वादा करते हैं और कौनसे ग्रह हमारी यात्राओं में बाधा बनते हैं। 

Astrology today by sidharth Joshi

यात्रा के सामान्‍य योग तीसरे भाव (Third House) से बनते हैं। कुण्‍डली का तीसरा भाव उन यात्राओं के लिए देखा जाता है जो आमतौर पर छोटे समय की यात्रा होती है। मूल रूप से यह भाव साहस और सहजता का है। अगर लग्‍न से तीसरा भाव मजबूत हो तो ही व्‍यक्ति सफल यात्राएं कर पाता है। इसके साथ ही बारहवां भाव घर छोड़ने में मदद करता है। विदेशी संबंधों को भी बारहवें भाव से ही देखा जाता है। 

यह भाव मूल रूप से क्षरण (Decay) का भाव है। यह क्षरण पैसा खर्च होने के रूप में भी हो सकता है और शारीरिक क्षरण के रूप में भी। किसी लग्‍न विशेष में तीसरे भाव के अधिपति और बारहवें भाव के अधिपति की दशा अथवा अंतरदशा आने पर जातक को घर से बाहर निकलना पड़ता है। जब तक यह दशा रहती है, जातक घर से दूर रहता है। अधिकतर मामलों में दशा बीत जाने के बाद जातक फिर से घर लौट आता है। जिस व्‍यक्ति की कुण्‍डली में लग्‍न और बारहवें भाव के अधिपतियों का अंतर्संबंध होता है वे न केवल घर से दूर जाकर सफल होते हैं, बल्कि परदेस में ही बस भी जाते हैं। 

पारंपरिक भारतीय ज्‍योतिष के अनुसार तीसरे भाव और बारहवें के अधिपति की दशा अथवा अंतरदशा में जातक छोटी यात्राएं (Short journeys) करता है। वहीं नौंवे और बारहवें भाव के अधिपति की दशा अथवा अंतरदशा में लंबी यात्राओं (Long distance on long time spend at foreign) के योग बनते हैं। छोटी और लंबी यात्रा का पैमाना सापेक्ष है। छोटी यात्रा कुछ सप्‍ताह से लेकर कुछ महीनों तक की हो सकती है तो लंबी यात्रा कुछ महीनों से सालों तक की। इसी के साथ छोटी यात्रा जन्‍म अथवा पैतृक निवास (Paternal land) से कम दूरी के स्‍थानों के लिए हो सकती है तो लंबी यात्राएं घर से बहुत अधिक दूरी की यात्राएं भी मानी जा सकती हैं। 

दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिष के.एस. कृष्‍णामूर्ति (K S Krishnamurthy) द्वारा बनाई गई केपी पद्धति (KP Method) के अनुसार जब तीसरे, नौंवे और बारहवें भाव के कारक ग्रहों (Significant) की दशा अथवा अंतरदशा आती है, तब जातक यात्राएं करता है। कारक ग्रह का निर्धारण तीसरे, नौंवे तथा बारहवें भाव में मौजूद राशि के अधिपति यानी तृतीयेश, नवमेश अथवा द्वादशेश जिन नक्षत्रों में बैठे हों उनके अधिपति के अनुसार होता है। 

किसे कहेंगे विदेश 

कोई व्‍यक्ति विदेश कब जाएगा, यह सवाल आधी सदी पहले तक एक महत्‍वपूर्ण सवाल हुआ करता था। घर को छोड़कर दूसरे देशों की लंबी यात्राओं पर गए परिवार के सदस्‍य की खोज खबर भी केवल चिठ्ठी पत्री से हो पाती थी। समय के साथ परिवहन के साधनों (Transportation) और संचार माध्‍यमों (Communication) का जाल बढ़ा है। ऐसे में किसी जातक के लिए हवाई यात्रा, ट्रेन अथवा बस से यात्रा करने के अलावा विदेश यात्रा के बारे में ना नहीं कहा जा सकता। इसके इतर विदेश यात्रा से अर्थ यह लगाया जाने लगा है कि जातक घर से दूर और लाभ अथवा हानि वाला समय। अगर केवल यात्री की भांति पांच या सात दिन में दूरस्‍थ देशों में घूमकर लौट आए, तो उसे विदेश यात्रा में शामिल करना मुश्किल है। 

लग्‍न के अनुसार प्रकृति 

अपनी गति के अनुसार राशियां तीन प्रकृति की बताई गई हैं। चर, स्थिर और द्विस्‍वभाव। चर (Movable) राशि वाले जातकों को नियमित रूप से चलना अथवा गतिमान रहना उचित लगता है। स्थिर (Static) राशि वाले जातक एक ही स्‍थान पर जमे रहकर काम करने में सुकून का अनुभव करते हैं। द्विस्‍वभाव (Dual) राशि वाले जातकों के घूमने और बैठकर या टिककर काम करने का समय अलग अलग होता है। ऐसे में किसी जातक की कुण्‍डली में लग्‍न, तीसरे, नौंवे और बारहवें भाव से संबंधित ग्रह चर राशियों में बैठे हों तो वह जातक अधिक यात्राएं करता है। 

विदेश में अवसर 

मेष (Mesha) लग्‍न के जातकों के लिए बुध या गुरु की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश जाने के योग बनते हैं। ऐसे जातकों की कुण्‍डली में अगर शनि बेहतर स्थिति में हो तो विदेश में अच्‍छी सफलताएं भी अर्जित कर पाते हैं। शनि भगवान की आराधना विदेश में अच्‍छा लाभ अर्जित करा सकती है। बुध की दशा में जहां छोटी यात्राएं होती हैं वहीं गुरु की दशा में लंबी विदेश यात्राओं के योग भी बनते हैं। 

वृष (Vrishubha) लग्‍न के जातकों के लिए चंद्रमा या मंगल की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश जाने के योग बनते हैं। इन जातकों की कुण्‍डली में गुरु बेहतर स्थिति में होने पर विदेश में सफलताएं अर्जित करना आसान हो जाता है। गुरु का लाभ लेने के लिए विदेश में जातक को नियमित रूप से मंदिर जाना चाहिए। इस राशि में शनि की बेहतर स्थिति धार्मिक यात्राएं कराती हैं। 

मिथुन (Mithuna) लग्‍न के जातक सूर्य की दशा या अंतरदशा में छोटी यात्राएं करते हैं और शुक्र की दशा या अंतरदशा में लंबी दूरी या अधिक समय तक घर से दूर रहने वाली यात्राएं करते हैं। इन जातकों को शनि की शुभ स्थिति धार्मिक यात्राएं कराती हैं। विदेश में अच्‍छा लाभ अर्जित करने के लिए इन जातकों को हनुमान अथवा मुरुगन देवता की आराधना करनी चाहिए। 

कर्क (Karka) लग्‍न के जातक बुध की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश यात्रा का सुख लेते हैं। कुण्‍डली में शुक्र मजबूत स्थिति में होने पर ये जातक यात्रा भी विलासितापूर्ण अंदाज में करते हैं। ऐसे जातकों को यात्रा के दौरान थोड़ी भी असुविधा परेशान कर देती है। आमतौर पर ये लोग यात्राओं को तब तक टालने का प्रयास करते हैं जब तक कि इन्‍हें पूरा भरोसा न हो जाए कि यात्रा की सभी व्‍यवस्‍थाएं पूर्ण हो चुकी हैं। 

सिंह (Simha) लग्‍न के जातक शुक्र की दशा अथवा अंतरदशा में छोटी यात्राएं करते हैं और चंद्रमा की दशा अथवा अंतरदशा में विदेश प्रस्‍थान करते हैं। परदेस की इनकी सफलता का आधार बुध की स्थिति है। अगर इनकी कुण्‍डली में बुध बेहतर स्थिति में भी है तो बुध के वक्री, मार्गी, अस्‍त और उदय होने से इनका लाभ या आय प्रभावित होते रहते हैं। 

कन्‍या (Kanya) लग्‍न के जातकों को मंगल की दशा अथवा अंतरदशा में घर से कुछ समय के लिए बाहर रहने का मौका मिलता है। सूर्य की दशा में ये लोग विदेश यात्राएं भी कर पाते हैं। शुक्र की बेहतर स्थिति इन जातकों को धार्मिक यात्राएं कराती हैं। विदेश में कितने सफल होंगे, यह इन जातकों की चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है। शिव आराधना इन जातकों को विदेश में भी बेहतर सफलता दिला सकती है। 

तुला (Tula) लग्‍न के जातकों को गुरु की दशा अथवा अंतरदशा में यात्रा करने का मौका मिलता है। बुध की अंतरदशा में ये जातक घर से अधिक दूरी की यात्राएं कर पाते हैं। विदेश में अच्‍छा लाभ हासिल करने के लिए ऐसे जातकों की कुण्‍डली में सूर्य बेहतर स्थिति में होना चाहिए। 

वृश्चिक (Vrishchik) लग्‍न के जातकों को शनि की दशा या अंतरदशा में छोटी यात्राएं करनी पड़ती हैं। शनि की दशा में ये जातक कई बार यात्राएं कर वापस घर लौटते हैं। शुक्र की दशा या अंतरदशा में इन्‍हें घर से दूर रहने का मौका मिलता है। ऐसे जातकों की कुण्‍डली में बुध की स्थिति बेहतर होने पर विदेश में सफल होने की स्थिति बनती है। 

धनु (Dhanu) लग्‍न के जातक शनि की दशा या अंतरदशा में घर से बाहर निकलते हैं। इस दशा में जातक छोटी यात्राएं करता है और लंबी यात्राएं करने अथवा अधिक समय तक विदेश में टिकने के लिए इन जातकों को मंगल का सहयोग लेना पड़ता है। अगर कुण्‍डली में शुक्र बेहतर स्थिति में हो तो जातक विदेश जाकर अच्‍छा धन कमा पाता है और सफलताएं अर्जित करता है। 

मकर (Makar) लग्‍न के जातक गुरु की दशा में विदेश यात्रा करते हैं। गुरु की दशा या अंतरदशा में ये जातक छोटी अथवा लंबी दूरी दोनों तरह की यात्राएं कर पाते हैं। ऐसे जातकों की कुण्‍डली में मंगल की बेहतर स्थिति विदेश में लाभ का वादा करती है। हनुमानजी की आराधना करना इन जातकों के लिए विदेश में सफलता दिलाने वाली सिद्ध हो सकती है। 

कुंभ (Kumbh) लग्‍न के जातक मंगल की दशा अथवा अंतरदशा आने पर छोटी यात्राएं करते हैं। वहीं शनि की दशा या अंतरदशा इन जातकों को लंबी दूरी की यात्राएं कराती है। विदेश में इन जातकों को कितना लाभ होगा, यह गुरु की स्थिति पर निर्भर करता है। विष्‍णु की आराधना इन जातकों को विदेश में अच्‍छा लाभ दिला सकती है। 

मीन (Meena) लग्‍न के जातक शुक्र की दशा अथवा अंतरदशा में छोटी यात्राएं करते हैं और शनि की दशा या अंतरदशा में विदेश यात्रा करते हैं। अगर शनि बेहतर स्थिति में बैठा हो और शुभ हो तो जातक न केवल लंबी विदेश यात्रा करता है बल्कि अच्‍छी सफलताएं भी अर्जित करता है।

शनिवार, अप्रैल 25, 2009

Vastu : About your house and its qualities

आपके घर की वास्‍तु विशेषताएं

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घर की बनावट (Design) , उसकी दिशा (Direction), घर के सामान (Belongings), पेड़-पौधे (Plants and harbs) बताते हैं कि घर किस ग्रह (Planet) के प्रभाव में है। आमतौर पर देखा जाता है कि घर की दिशा क्‍या है और उसे संबंधित ग्रह के हवाले कर दिया जाता है लेकिन ऐसा नहीं है। पूर्वमुखी घर में भी राहू की समानताएं हो सकती हैं और पश्चिममुखी घर में बुध की। इससे पहले की घर पर ग्रहों के विशद प्रभाव की चर्चा करूं मैं सरसरी तौर पर बता देना चाहता हूं कि पारंपरिक पध्‍दति में दिशा और ग्रह का क्‍या संबंध है।

सूर्य का घर (Surya)

आमतौर पर पूर्व की दिशा में जिन घरों का मुंह होता है उन्‍हें सूर्य से प्रभावित घर कहते हैं। इनमें परिवार का मुखिया पुरुष होता है यानि पितृ सत्‍तात्‍मक परिवार इसमें निवास करता है। पुरुषों की संख्‍या अधिक होती है और महिलाएं कष्‍ट पाती हैं। घर के वर्किंग मैम्‍बर्स का संबंध राजकीय सेवाओं से होता है चाहे नौकरी के तौर पर हो या ठेकेदारी से। 

बुध का घर (Budh)

इन घरों का मुंह उत्‍तर दिशा में होता है। इनमें कंसल्‍टेंट रहते हैं लेकिन चिकित्‍सक नहीं। उत्‍तर दिशा का संबंध क्रिएटिविटी से जोडा गया है। ऐसे में आर्कीटेक्‍ट, कैरियर काउंसलर, इंटीरियर डेकोरेटर, बैंकिंग सेवाओं से जुडे और मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाने वाले लोगों का स्‍थान बताया गया है। इन घरों में बच्‍चे अच्‍छी संख्‍या में होते हैं और धमाचौकडी मचाते रहते हैं।

शनि का घर (Shani)

इन घरों का मुंह पश्चिम दिशा में होता है। नौकरी पेशा लोगों के रहने की जगह। दिन में किसी सरकारी या निजी प्रतिष्‍ठान में बंधुआ मजदूर की तरह काम करके आने के बाद लोग इस घर में आराम, आमोद-प्रमोद करते हैं और सुख-दुख की बातें होती हैं। ये लोग खुद निर्णय लेने वाले लोग नहीं होते। जैसे जिन्‍दगी इन्‍हें धक्‍का देती है ये उसी रास्‍ते पर निकल पडते हैं। किसी एक की समस्‍या पूरे परिवार के लिए मिशन बन जाती है। एक समस्‍या निपटाने के बाद दूसरी समस्‍या निपटाने की तैयारी शुरू हो जाती है।

मंगल का घर (Mangal)

इन घरों का मुंह दक्षिण दिशा में होता है। इसमें चिकित्‍सक और लौंडे मजे करते हैं और आम आदमी दुख पाता है। आमतौर पर हॉस्‍टल या अस्‍पताल का मुंह दक्षिण में शुभ होता है। सबसे सफल हॉस्‍टल भी दक्षिण दिशा में ही हो सकता है। इन घरों से कोई प्‍यार नहीं करता। न मकान मालिक और न ही रहवासे। लौंडे दिनभर के थके मांदे आते हैं और उल्‍टी-सीधी हरकतें करने के बाद सो जाते हैं। अगले दिन बिना किसी देख-रेख के इसे छोड जाते हैं। चिकित्‍सक सुबह और शाम के समय पूजा पाठ की बजाय लोगों के दुख दर्द सुनता है और पैसा बनाता है। घर का ध्‍यान नौकर या नौकरानी रखते हैं। 

इन चार प्रमुख दिशाओं के आधार पर घरों को शुभ या अशुभ बताया जाता है। इसके अलावा गुरू, चंद्रमा, राहू और शुक्र की भी दिशाएं होती है लेकिन मोटे तौर पर उन्‍हें नजर अंदाज कर दिया जाता है। 

गुरू की दिशा – उत्‍तर पूर्व (North - East)

शुक्र की दिशा– दक्षिण पूर्व (South - East)

चंद्रमा की दिशा– उत्‍तर पश्चिम (North - West)

राहू की दिशा– दक्षिण पश्चिम (South - West)


घर का वातावरण
Atmospheare of Home

अब मैं चर्चा करना चाहूंगा घर के वातावरण और आस-पास के वातावरण के आधार पर घर पर ग्रह के प्रभाव की- 

गुरू का घर: Jupitor's home

इस घर में एयर सर्कुलेशन बेहतरीन होगा। यानि चारों ओर से भले ही खुला न हो लेकिन हवा का असर हर कमरे और कोठरी में देखने को मिलेगा। इस घर का दरवाजा प्राय: उत्‍तर पूर्व में होता है। या फिर किनारे में होगा लेकिन बीच में नहीं होता। घर के आस-पास धार्मिक स्‍थान होता है। पीपल का पेड भी हो सकता है।

सूर्य का घर : Sun's home 

इस घर में प्राकृतिक रोशनी के उत्‍तम साधन होते हैं। घर के हर कोने में सूर्य की रोशनी पहुंचती है। चाहे अंडरग्राउंड ही क्‍यों न हो। घर के मुख्‍य द्वार का संबंध पूर्व दिशा से होता है और मकान के दाहिने हाथ की ओर पानी निकासी की व्‍यवस्‍था होती है। एक बात और ऐसे मकान में डिप्रेशन का मरीज अधिक दिन नहीं रह सकता। अगर रहेगा तो जल्‍दी ही ठीक भी हो जाएगा। इसमें ऊर्जा का प्रवाह जबरदस्‍त होता है। इसे संभाल लेने की क्षमता मुखिया में होती है इसी कारण आमतौर पर इस परिवार का मुखिया मैनेजमेंट या प्रशासन में होता है। निर्णय लेने वाले लोगों की ऐशगाह। 

चंद्र का मकान: House of Moon

इस मकान में पानी की पूर्ति पूरी रहती है। कई बार तो घर के भीतर ही बोरिंग कर पानी की व्‍यवस्‍था की गई होती है। अन्‍यथा घर से थोडी ही दूरी पर पानी का बडा स्रोत अवश्‍य होता है। इस मकान में बडे परिवार रहते हैं। घर की महिलाओं के लिए मुखिया की आज्ञा अंतिम आदेश होती है। अधिकांशत: ऐसे मकान का मुंह उत्‍तर पश्चिम होता है और मुखिया के बैठने की जगह भी उत्‍तर पश्चिम होती है। ये लोग मिल जुलकर काम करने वाले लोग होते हैं। आमतौर पर इस घर में शांति रहती है लेकिन छोटी-मोटी घटना भी इन लोगों को अन्‍दर तक झकझोर देती है। 

शुक्र का मकान: House of Venus

बनावट आलीशान वरना कच्‍ची जमीन के बीच बना हुआ आशियाना। दक्षिण पूर्व में इसका मुंह होने से मंगल और सूर्य की विशेषताएं लेकर शुक्र यहां आमोद करता है। यहां रहने वाले लोग नाजुक स्‍वभाव के और तरक्‍की पसंद होते हैं। इन घरों को कभी दक्षिण में गिन लिया जाता है तो कभी पूर्व में। लेकिन शुक्र का अपना रोल होता है। वह या तो मकान को हद तक खूबसूरत बना देता है या फिर कच्‍ची मिट्टी के बीच बना शांत स्‍थान। दोनों की मामलों में घर के भीतर का वातावरण खुशनुमा रहता है। इस घर में लाल रंग का अधिक उपयोग होता है। महिलाएं तेजी से तरक्‍की करती हैं और पतियों पर राज करती हैं। 

मंगल का मकान: Mar's property

जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं कि ऐसे मकान चिकित्‍सकों के लिए होते हैं। यह आग रखने का स्‍थान है। इसके उपचार के लिए दक्षिण की दीवार पर मंदिर बनाकर आग जलाए रखने से घर की कलह में कुछ हद तक कमी आती है। किस्‍मत वाले लोगों को ऐसा घर बनाने के बाद भी इसमें रहने का अवसर नहीं मिल पाता है। अत: किराए पर अधिक रहता है। 

बुध का मकान: House of Mercury

इस घर का मुंह प्राय: उत्‍तर दिशा में ही होगा लेकिन इसकी विशेषता होगी हर कोने का खुला होना। यानि मालिक अपना घर जमीन के बीचों-बीच बनाने की कोशिश करता है। घर में कच्‍ची जमीन होती है और न भी हो तो पेड पौधों के लिए गुंजाइश रखी जाती है। चाहे गमले में ही क्‍यों न हो। हरी पत्तियों के बीच बैठा इंसान लगातार सोचता है। भले ही आगे बढने की न सोचे पर अपने और दूसरों को जीवन को बेहतर बनाने के बारे में विचार करता रहता है। क्रिएटिव माइंड और कंसल्‍टेंसी इसकी फितरत है। 

शनि का मकान: Saturn's House

घर का बडा दरवाजा पश्चिम दिशा में होगा। घर के भीतर घुसते ही दांयी ओर बनी कोटडी में रोशनी कम होगी। इस कोटडी को जब भी नीम अंधेरे में रखा जाएगा मकान मालिक का दिन अच्‍छा जाएगा। मकान में पत्‍थर गडा होता है। पुराना सा दिखाई देता है। बनाने के कुछ ही दिनों के भीतर ऐसा दिखाई देने लगता है जैसे सालों पहले बनाया हो और अब इसे रंग रोगन की जरूरत है। कितना ही संवार लो सुंदरता आ नहीं पाती। ताजगी का एकांतिक अभाव रहता है। इस घर में बडा गर्डर या खम्‍भे की गुंजाइश हमेशा होती है जो इसे हल्‍की भव्‍यता प्रदान करती है। 

राहू का मकान: House of Rahu

राहू का काम ही गुमनामी का है। आप समझ सकते हैं कि घर के भीतर जाते ही ऐसा महसूस होगा कि जो कुछ दिखाई दे रहा है इससे इतर कुछ और इस मकान में है। भले ही सीधा-सादा मकान ही क्‍यो न हो। मुख्‍य द्वार में प्रवेश करने के बाद दाहिनी ओर गुमनाम गड्ढा होने की संभावना होती है। प्रवेश द्वार के नीचे से घर का गंदा पानी बहता हुआ बाहर निकलता है। सामने का घर या तो खाली होगा या उस मकान के मालिक के कोई संतान नहीं होगी। मकान की दीवारें वही रहती हैं और छत बदलती रहती है। मकान के बिल्‍कुल पास धुंआ छोडने वाली भट्टी होती है या गंदा पानी जमा करने का गड्ढा। कॉमन सेप्टिक टैंक भी हो सकता है जिसमें इलाके के कई घरों का गंदा पानी एकत्र होता हो। 

के‍तू का मकान: Ketu's House

ऐसा घर जिसकी दीवारें दो गलियों से लगी हों। यानि कोने का मकान और तीन तरफ से खुला। इस घर में हवा आती है लेकिन कहां से पता नहीं लगता। साथ का एक मकान या तो गिरा हुआ होगा या‍ फिर बर्बाद हुआ होगा। साथ के मकान में कुत्‍तों के टट्टी जाने का स्‍थान होगा। केतू के मकान में नर संतान तीन या तीन से कम होती है। इससे अधिक नहीं हो पाती।