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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

पैसेवाला और अमीर बनने के ज्‍योतिषीय योग

आमतौर पर हम समझते हैं कि जिस व्‍यक्ति के पास अधिक पैसा होता है, वह अमीर होता है, लेकिन वास्‍तव में ऐसा नहीं है। जिस व्‍यक्ति के पास आज पैसा है कल नहीं भी हो सकता है, लेकिन अमीर आदमी के पास अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए हमेशा पर्याप्‍त पैसा होता है। यह मूलभत अंतर हमें ज्‍योतिषीय योगों में भी दिखाई देता है। कोई जातक किसी समय विशेष पर पैसे वाला हो सकता है, लेकिन उस दौरान भी ऐसा हो सकता है कि वह अपनी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम न बन पाए। आइए देखते हैं कि ज्‍योतिष में ऐसे कौनसे योग हैं जो हमें पैसे वाला या अमीर बनाते हैं।

कुण्‍डली में दूसरे भाव को ही धन भाव कहा गया है। दूसरे भाव और इसके अधिपति की स्थिति हमारे संग्रह किए जाने वाले धन के बारे में संकेत देती है। कुण्‍डली का चौथा भाव हमारे सुखमय जीवन जीने के बारे में संकेत देता है। पांचवा भाव हमारी उत्‍पादकता के बारे में बताता है, छठे भाव से ऋणों और उत्‍तरदायित्‍वों को देखा जाएगा। सातवां भाव व्‍यापार में साझेदारों को देखने के लिए बताया गया है। इसके अलावा ग्‍यारहवां भाव आय और बारहवां भाव व्‍यय से संबंधित है। प्राचीन काल से ही जीवन में अर्थ के महत्‍व को प्रमुखता से स्‍वीकार किया गया। इसका असर फलित ज्‍योतिष में भी दिखाई देता है। दूसरा, चौथा, पांचवां, छठा, सातवां, ग्‍यारहवां और बारहवां भाव कमोबेश हमारे धन के बारे में ही जानकारी देते हैं। केवल दूसरा भाव सक्रिय होने पर जातक के पास पैसा होता है, लेकिन आय का निश्चित स्रोत नहीं होता, लेकिन दूसरे और ग्‍यारहवें दोनों भावों में मजबूत और सक्रिय होने पर जातक के पास धन भी होता है और उस धन से अधिक धन पैदा करने की ताकत भी। ऐसे जातक को ही सही मायने में अमीर कहेंगे।

दूसरा भाव प्रबल होने पर जातक के पास पैतृक धन बहुतायत से होता है। उसे अच्‍छी मात्रा में पैतृक धन प्राप्‍त होता है। इस भाव की स्थिति और इसके अधिपति की स्थिति अच्‍छी होने पर जातक अपनी पारिवारिक संपत्ति का भरपूर उपभोग कर पाता है। इस भाव में सौम्‍य ग्रह होने पर अच्‍छे परिणाम हासिल होते हैं और क्रूर या पाप ग्रह होने पर खराब परिणाम हासिल होते हैं। दूसरी ओर ग्‍यारहवां भाव मजबूत होने पर जातक अपनी संपत्ति अर्जित करता है। उसे व्‍यवसाय अथवा नौकरी में अच्‍छा धन हासिल होता है। ग्‍यारहवें और बारहवें भाव का अच्‍छा संबंध होने पर जातक लगातार निवेश के जरिए चल-अचल संपत्तियां खड़ी कर लेता है। पांचवां भाव मजबूत होने पर जातक सट्टा या लॉटरी के जरिए विपुल धन प्राप्‍त करता है। किसी भी जातक के पास किसी समय विशेष में कितना धन हो सकता है, इसके लिए हमें उसका दूसरा भाव, पांचवां भाव, ग्‍यारहवां और बारहवें भाव के साथ इनके अधिपतियों का अध्‍ययन करना होगा। इससे जातक की वित्‍तीय स्थिति का काफी हद तक सही आकलन हो सकता है। इन सभी भावों और भावों के अधिपतियों की स्थिति सुदृढ़ होने पर जातक कई तरीकों से धन कमाता हुआ अमीर बन जाता है।

दशाओं का प्रभाव

धन कमाने या संग्रह करने में जातक की कुण्‍डली में दशा की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। द्वितीय भाव के अधिपति यानी द्वितीयेश की दशा आने पर जातक को अपने परिवार से संपत्ति प्राप्‍त होती है, पांचवे भाव के अधिपति यानी पंचमेश की दशा में सट्टे या लॉटरी से धन आने के योग बनते हैं। आमतौर पर देखा गया है कि यह दशा बीतने के साथ ही जातक का धन भी समाप्‍त हो जाता है। ग्‍यारहवें भाव के अधिपति यानी एकादशेश की दशा शुरू होने के साथ ही जातक का अटका हुआ पैसा आने लगता है, कमाई के कई जरिए खुलते हैं और लाभ की मात्रा बढ़ जाती है। ग्रह और भाव की स्थिति के अनुरूप फलों में कमी या बढ़ोतरी होती है। इसी तरह छठे भाव की दशा में लोन मिलना और बारहवें भाव की दशा में खर्चों में बढ़ोतरी के संकेत मिलते हैं।

शुक्र की महिमा

वर्तमान दौर में जहां भोग और विलासिता चरम पर है, किसी व्‍यक्ति के धनी होने का आकलन उसकी सुख सुविधाओं से किया जा रहा है। ऐसे में शुक्र की भूमिका उत्‍तरोतर महत्‍वपूर्ण होती जा रही है। किसी जातक की कुण्‍डली में शुक्र बेहतर स्थिति में होने पर जातक सुविधा संपन्‍न जीवन जीता है। शुक्र ग्रह का अधिष्‍ठाता वैसे शुक्राचार्य को माना गया है, जो राक्षसों से गुरु थे, लेकिन उपायों पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि शुक्र का संबंध लक्ष्‍मी से अधिक है। शुक्र के आधिपत्‍य में वृषभ और तुला राशियां हैं। इसी के साथ शुक्र मीन राशि में उच्‍च का होता है। इन तीनों राशियों में शुक्र को बेहतर माना गया है। कन्‍या राशि में शुक्र नीच हो जाता है, अत: कन्‍या का शुक्र अच्‍छे परिणाम देने वाला नहीं माना जाता।

लग्‍न अनुसार पैसे वाले

मेष लग्‍न के जातकों का शुक्र, वृष लग्‍न के जातकों का बुध, मिथुन लग्‍न के जातकों का चंद्रमा, कर्क लग्‍न वाले जातकों का सूर्य, सिंह लग्‍न वाले जातकों का बुध, कन्‍या लग्‍न वाले जातकों का शुक्र, तुला लग्‍न वाले जातकों का मंगल, वृश्चिक लग्‍न वाले जातकों का गुरु, धनु लग्‍न वाले जातकों का शनि, मकर लग्‍न वाले जातकों का शनि, कुंभ लग्‍न वाले जातकों का गुरु और मीन लग्‍न वाले जातकों का मंगल अच्‍छी स्थिति में होने पर अथवा इनकी दशा एवं अंतरदशा आने पर जातक के पास धन का अच्‍छा संग्रह होता है अथवा पैतृक सं‍पत्ति की प्राप्ति होती है। अगर लग्‍न से संबंधित ग्रह की स्थिति सुदृढ़ नहीं है तो संबंधित ग्रहों का उपचार कर वित्‍तीय स्थिति में सुधार किया जा सकता है।

लग्‍न अनुसार कमाने वाले

कमाई के लिए हमें ग्‍यारहवां भाव देखना होगा। ऐसे में मेष लग्‍न वाले जातकों का शनि, वृष लग्‍न का गुरु, मिथुन लग्‍न का मंगल, कर्क लग्‍न का शुक्र, सिंह लग्‍न का बुध, कन्‍या लग्‍न का चंद्रमा, तुला लग्‍न का सूर्य, वृश्चिक लग्‍न का बुध, धनु लग्‍न का शुक्र, मकर लग्‍न का मंगल, कुंभ लग्‍न का गुरु और मीन लग्‍न का शनि अच्‍छी स्थिति में होने पर जातक अच्‍छा धन कमाता है। इन ग्रहों की दशा में भी संबंधित लग्‍न के जातक अच्‍छी कमाई अथवा लाभ अर्जित करते हैं।

कुछ विशिष्‍ट योग

- किसी भी लग्‍न में पांचवें भाव में चंद्रमा होने पर जातक सट्टा, लॉटरी अथवा अचानक पैसा कमाने वाले साधनों से कमाई का प्रयास करता है। चंद्रमा फलदायी हो तो ऐसे जातक अच्‍छी कमाई कर भी लेते हैं।

- कारक ग्रह की दशा में जातक सभी सुख भोगता है। ऐसे में इस दशा के दौरान जातक को धन संबंधी परेशानियां भी कम आती हैं।

- सातवें भाव में चंद्रमा होने पर जातक साझेदार के साथ व्‍यवसाय करने का प्रयास करता है, लेकिन धोखा खाता है।

- लाल किताब के अनुसार किसी भी लग्‍न में बारहवें भाव में शुक्र हो तो, जातक जिंदगी में कम से कम एक बार करोड़पतियों जैसे सुख प्राप्‍त करता है, चाहे अपना घर बेचकर ही वह उस सुख को क्‍यों न भोगे।

- लेखक का अनुभव है कि छठे भाव का ग्‍यारहवें भाव से संबंध हो तो, जातक पहले ऋण लेता है और उसी से कमाई करता है।

- प्रसिद्ध ज्‍योतिष हेमवंता नेमासा काटवे कहते हैं कि नौकरीपेशा, कर्महीन और आलसी लोगों की जिंदगी में अधिक उतार चढ़ाव नहीं आते, ऐसे में इनका फर्श से अर्श पर पहुंचने के योग बनने पर भी उसके लाभ नहीं मिलते हैं।

- कई बार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और आईएएस की कुण्‍डली में एक समान राजयोग होता है, अंतर केवल उसे भोगने का होता है।

पुरुष पुरातन की वधू

लक्ष्‍मी के बारे में कहा गया है पुरुष पुरातन की वधू क्‍यों न चंचला होए। समुद्र मंथन से निकली इस विष्‍णु की पत्‍नी के पास धन, वैभव और ऐश्‍वर्य का खजाना है, लेकिन इसे जो चाहिए वह है मान। यानि लक्ष्‍मी का सम्‍मान नहीं किया जाए तो यह रूठ जाती है। शेयर बाजार में काम करने वाले दो तरह के निवेशकों को मैं जानता हूं। एक वे जो अपने निवेश से बाजार में ऐसा आकर्षण पैदा करते हैं कि बाकी दूसरे लोग निवेश करने पर आमादा हो जाते हैं। दूसरे वे जो बाजार से आकर्षित होकर निवेश करते हैं।

आकर्षित होकर निवेश करने वाले कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बाजार में पैसा बनाते हैं तो अधिकांश ऐसे होते हैं जो पैसा खोते हैं। ऐसा नहीं है कि संस्‍थागत निवेशकों के कारण चढ़े हुए बाजार में ही ये लोग पैसा लुटा रहे हों, बहुत बार ऐसा भी होता है कि बाजार सामान्‍य चल रहा होता है और किसी ऐसी कंपनी में पैसा फंसाकर बैठ जाते हैं जहां से लाभ की बजाय हानि की आशंका बढ़ती जाती है। बाद में गिरे हुए भाव में अपने शेयर बेचकर पैसा निकालना पड़ता है।

बाजार क्‍यों और कब गिरता है। उसके संकेत कैसे मिल सकते हैं इसके बारे में मेरे लिए बताना मुश्किल ही नहीं असंभव है। लेकिन व्‍यक्तिगत स्‍तर पर यह बताया जा सकता है कि बाजार गिरे या उठे आप लाभ कैसे कमाएं। इसका एक छोटा फार्मूला यह है कि जब किसी व्‍यक्ति की कुण्‍डली में व्‍ययेश की दशा चल रही हो उस समय निवेश कराया जाए और लाभेश की दशा आने पर बाजार से बाहर निकलने की सलाह दी जाए। यानि जब लक्ष्‍मी के हाथ से निकलने का समय हो तब निवेश करके पैसे को खुद से दूर भेज दो और जब लक्ष्‍मी वापस घर आना चाहे यानि एकादशेश की दशा हो तो शेयर बेचकर पैसा घर ले आएं। चाहे बाजार इस प्रवृत्ति का विरोध भी करे तो एक व्‍यक्ति के लाभ और हानि की सीमित संभावना को इसमें बांधा जा सकता है।

बाकी बात रही बाजार में सर्वाइव करने की। यानि वहीं खड़े रहकर लगातार सौदे करके हानि-लाभ के बीच अधिक लाभ और कम हानि का चक्र चलाने की। जिन निवेशकों की कुण्‍डली में अच्‍छी दशा चल रही है उनके लिए यह स्थिति बनाना आसान है। जबकि विपरीत दशा वाले निवेशक कुछ उपाय कर आध्‍यात्मिक स्‍तर पर खुद को सुरक्षित कर सकते हैं। आमतौर पर ये मंगल के उपाय होते हैं।

बुधवार, नवंबर 02, 2011

सोच की गति से पैसा

देखने में यह काल्‍पनिक विषय है लेकिन ऐसा होता है। जो लोग सालों तक बिजनेस में लगे रहते है उन्‍हें पता है कि एक समय ऐसा भी होता है जब सोच की गति से पैसा बनना शुरू हो जाता है। हालांकि हर समय ऐसा नहीं होता। जिन लोगों के जीवनकाल में ऐसा वक्‍त आकर जा चुका होता है वे बार-बार ज्‍योतिषियों के पास जाते हैं और अपने उसी दौर को फिर से जीने की कोशिश करते हैं।

guy with money thoughtज्‍योतिष की नजर में क्‍या होता है सोच की गति से पैसा बनाना और कितने लोग सफल होते हैं इस प्रकार धन कमाने में। यह बताने से पहले मैं स्‍पष्‍ट करता हूं कि प्रकृति के अनुसार लोग चार प्रकार के होते हैं। यह प्रकृति राशियों के आधार पर बनाई गई है।

मेष, सिंह और धुन राशियां अग्नितत्‍वीय होती हैं,

वृष, कन्‍या और मकर राशियां पृथ्‍वीतत्‍वीय होती हैं,

मिथुन, तुला और कुंभ राशियां वायुतत्‍वीय होती हैं

कर्क, वृश्चिक और मीन राशियां जलतत्‍वीय होती हैं।

इन्‍हीं राशियों के आधार पर लोग भी चार प्रकार के होते हैं। हर प्रकार के व्‍यक्ति की कुण्‍डली में ऐसा वक्‍त जरूर आता है जब वह अपने मूल तत्‍व, कारक ग्रह, उसकी दशा और घटनाओं के प्रति सामंजस्‍य बैठा लेता है। यही वक्‍त होता है जब व्‍यवसायी सोच की गति से पैसा बना पाता है। अब एक आम आदमी का सवाल होता है कि उसे कैसे पता चलेगा कि उसका ‘वह’ वक्‍त आ गया है। इसे जानने के लिए आपको पता करना होगा कि आपकी कुण्‍डली का लग्‍न अथवा राशि कौनसी है। कुछ कुण्‍डलियां लग्‍न से ऑपरेट होती हैं तो कुछ राशि से। ऐसे में जो अधिक प्रभावी है वहीं से देखा जाएगा। इसके बाद हर लग्‍न की कुण्‍डली का एक निश्चित कारक ग्रह होता है। उस कारक ग्रह की दशा में ही हमारे प्रयासों के उत्‍कृष्‍ट परिणाम आते हैं। जैसे कि मेष लग्‍न की कुण्‍डली में सूर्य की दशा में और तुला लग्‍न की कुण्‍डली में शनि की दशा में सर्वाधिक अच्‍छे परिणाम आएंगे।

तो कुछ लोगों का सवाल यह भी होता है कि कारक ग्रह की दशा से पहले क्‍या किया जाए। इसके लिए मेरा जवाब यही है कि कारक ग्रह की दशा आने से पूर्व तक आपको इसकी तैयारी करनी होती है। अगर कारक ग्रह की दशा से पहले पर्याप्‍त ठोस जमीन तैयार नहीं की गई होगी तो कारक दशा बीतने तक आप परिस्थितियों को अनुकूल बनाते रहेंगे और बेहतर परिणामों के लिए फिर से किसी अंतरदशा या प्रत्‍यंतर दशा का इंतजार करना पड़ेगा। यानि काम करते रहना होगा, सही समय आने पर उसके बेहतरीन परिणाम में आएंगे। वैसे हर एक की कुण्‍डली का व्‍यक्तिगत विश्‍लेषण कर ही निकाला जा सकता है कि अमुक व्‍यक्ति का स्‍वर्णकाल कब आ रहा है।

रविवार, अक्टूबर 23, 2011

कहां रहे पैसा?

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कई लोगों को लगता है कि उनका पैसा बैंक में पडा सड़ रहा है तो कई लोग बाजार में पैसा लगाकर पछताते हैं। ऐसा एक ही व्‍यक्ति के साथ भी हो सकता है। यानि जब पैसा बैंक में हो तो उसे बाजार चढ़ता हुआ दिखाई देता है और जब पैसा बाजार में हो तो बैंक की ब्‍याज दरें अधिक आकर्षक नजर आती हैं। देखने में ऐसा लगता है कि यह व्‍यक्ति विशेष की मानसिकता से जुड़ा मसला है लेकिन गौर किया जाए तो यह महज टाइमिंग की समस्‍या है।

ज्‍योतिष की नजर में जब कुण्‍डली का दूसरा भाव ऑपरेट हो रहा हो तो पैसे को बैंक में पड़ा रहने देने में ही समझदारी है और जब ग्‍यारहवां भाव ऑपरेट हो रहा हो तो अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के प्रयास करने चाहिए। हालांकि बहुत से व्‍यापारियों या कह दें पुराने बणियों को ज्‍योतिष की इन मूल बातों की जानकारी होती है। एक सामान्‍य व्‍यक्ति के समझने के लिए बता देता हूं कि भाव कुल बारह होते हैं और राशियां भी बारह होती हैं। ये क्रमश: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्‍या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन होती हैं। मेष और वृश्चिक राशियों का स्‍वामी मंगल, वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्‍या का बुध, कर्क का चंद्रमा, सिंह का सूर्य, धनु और मीन का गुरु और मकर व कुंभ राशि का अधिपति शनि होता है। जिस जातक को पता करना हो वह इन राशियों को घड़ी के आकार में जमा ले। मेष से मीन तक। जहां घड़ी की सुई एक बजाती है वहां मेष और जहां बारह बजाती है वहां मीन। इस तरह तैयार हो गई आपकी कुण्‍डली जिसमें भाव भी स्‍पष्‍ट नजर आएंगे। अब आपकी कुण्‍डली में जिस राशि में जो ग्रह बैठा है उसे उसी में टिका दें। एक जगह लिखा होगा लग्‍न। इस लग्‍न वाले अंक को सबसे ऊपर ले आए। इससे लग्‍न कुण्‍डली बन जाएगी। अब कुण्‍डली में देखें कि कौनसे ग्रह की दशा चल रही है। उदाहरण के तौर पर लें तो वृष लग्‍न के जातक की बुध की दशा चल रही हो। ऐसे में दूसरे भाव का अधिपति बुध हुआ तो ऐसे जातक को मोटे तौर पर बैंक या स्‍थाई बांड में अपनी अधिकांश राशि जमा रखनी चाहिए। इसी कुण्‍डली में अगर गुरु की दशा चल रही हो तो इस जातक को कई जगह निवेश कर अपने धन को बढ़ाने का अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए। क्‍योंकि गुरु एकादश भाव का अधिपति हुआ और यह धनलाभ के योग बनाएगा। इसी तरह हर कुण्‍डली का निर्णय निकाला जा सकता है। 2736760-indian-currency-inr-500--indian-rupees-in-a-bundle

सही टाइमिंग पर किया गया निवेश या बैंक में रखा गया धन अधिक से अधिक सुरक्षा और लाभ दिलाएगा। अब सवाल यह है कि किसी व्‍यक्ति का व्‍यापार चल रहा हो तो उसे दशाओं के अनुसार धन का क्‍या उपयोग करना चाहिए। इस पर चर्चा अगले लेख में...

सोमवार, मार्च 30, 2009

बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है

अब ज्‍योतिष का ब्‍लॉग है और मैं यह बात लिख रहा हूं तो आप सोचेंगे कि आखिर आ ही गया अपनी औकात पर। आप कुछ ऐसा समझ सकते हैं। क्‍योंकि मैंने सीखने में कभी कंजूसी नहीं बरती सो हर ऐसे इंसान से सीखने की कोशिश की जिसके बारे में कहा जाता था कि इसे कुछ आता है। सही कहूं तो आज भी यही स्थिति है। जिस तरह कला के जवान होने तक कलाकार बूढा हो जाता है वैसे ही ज्‍योतिष की समझ आने तक फलादेश करने का महत्‍व भी खो सा जाता है। 
खैर में आता हूं विषय पर: बेसिकली मूर्ख बनाने के धंधे पर। 

दरअसल मेरे दो अलग-अलग गुरूओं ने मुझे यह ज्ञान दिया। सही कहूं तो दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्र के माने हुए ज्‍योतिषी हैं। एक रमल ज्‍योतिषी हैं तो दूसरे थाई अंक ज्‍योतिष के प्रकाण्‍ड ज्ञाता। मैं दोनों का ही नाम और चरित्र का वर्णन नहीं करूंगा। वरना आज नहीं तो कल कोई न कोई उन्‍हें  पहचान लेगा। मुख्‍य बात है कि दोनों ने एक ही बात एक ही अंदाज में क्‍यों कही और उसके लिए क्‍या दलीलें दी यह मेरे और अन्‍य नए साधकों के लिए बहुत जरूरी है। 

पहले ज्‍योतिषी जिन्‍हें मैं महाराज से संबोधित करूंगा। महाराज के बारे में कहा जाता है कि वे किसी से नहीं घबराते। न अपने भविष्‍य से न वर्तमान के भूत से। उन्‍होंने भय को जीत लिया है। इसी कांफिडेंस के साथ महाराज ने बीकानेर, जयपुर, दिल्‍ली, मुम्‍बई, कलकत्‍ता, सूरत और दर्जनों महानगरियों में अच्‍छों अच्‍छों को घुटने टिकाए हैं। महाराज किसी से ढंग से बात नहीं करते थे। मैंने दो तीन बार बात करने की कोशिश की तो उन्‍होंने बुरी तरह झिकड़ कर भगा दिया। उन दिनों टीन एजर था सो भागने में मैं भी जल्‍दी दिखाता था। 
एक दिन अपने गुरूजी (जो मेरे हार्ड कोर गुरू हैं) के साथ शनि महाराज के मंदिर गया था। गुरूजी ने कहा तेरी शनि की दशा आने वाली है चल आज शनि महाराज का हैप्‍पी बर्थ डे है। चलकर उनके दरबार में हाजिरी लगा देते हैं। सो हम पहुचे शनि मंदिर। अभी मंदिर में घुसे ही नहीं थे कि महाराज सामने आते मिल गए। महाअक्‍खड़ महाराज को देखते ही मैंने कहा गुरूजी यह महाराज अभी हम दोनों को हड़काएगा। लेकिन गुरूजी मुस्‍कुराए बोले इसकी कुण्‍डली तो मैं देखता हूं देखना अभी करीब आते ही रोने लगेगा कि गुरूजी मर रहा हूं कुछ करो। मुझे यकीन नहीं हुआ। भीड़ के बीच में महराज संयत बने रहे और थोड़ी देर में किनारे आते ही महाराज गुरूजी के पैरों में। बाकायदा गिड़गिड़ा रहे थे। चंद्रास्‍वामी से सीधे पंगा लेने वाले महाराज गुरुजी के चरणों में थे। मुझे देखकर भी यकीन नहीं हो रहा था। गुरूजी ने संबल दिलाया तो महाराज वापस अपने पैरों पर खड़े हुए। मैंने माजरा पूछा तो गुरूजी ने बताया कि महाराज की सूर्य की दशा बीत गई है अब चंद्रमा की दशा में इनकी हालत खराब हो रही है। सो इलाज के लिए घूम रहे हैं। मैं अड़ गया, मैंने कहा ऐसा कैसे हो सकता है कि रमल पद्धति का प्रकाण्‍ड विद्वान, जो रोजाना दो सौ से अधिक लोगों के दुख दूर कर रहा है खुद कैसे परेशानी में आ सकता है। 
अपनी आदत के अनुसार गुरुजी बस मुस्‍कुराते रहे। 
अब मैंने देख लिया कि महाराज गुरूजी के आगे नतमस्‍तक हैं तो मैंने अपने चोटीकट चेला होने का फायदा उठाया और सीधे सीधे बात करनी शुरू कर दी। महाराज जो अब तक मुझे हड़काते रहे थे गुरूजी के सामने मुझसे प्रेमपूर्वक बातें कर रहे थे। मैंने पूछा महाराज आप अपना इलाज खुद क्‍यों नहीं कर लेते। 
महाराज बोले पगले कभी नाई को अपनी हजामत करते हुए देखा है। 
मेरे दिमाग में बात बैठ गई। 
फिर पूछा कि आप दूसरों का ईलाज कैसे करते हैं 
यहां महाराज अटक गए बोले यह तो ट्रेड सीक्रेट है। तुझे बता दूंगा तो तूं मेरी दुकान ही ठण्‍डी करेगा। 
तो गुरूजी बीच में बोले नहीं महाराज यह परम्‍परागत पद्धति से सीख रहा है। आपकी पद्धति में यह रुचि नहीं लेगा। 
तो महाराज हल्‍के हुए 
बोला बेटा ईलाज दो ही तरीके से होता है या तो जातक पैसे से जाएगा या शरीर से जाएगा 
यह बात मेरी समझ में नहीं आई। 
तो महाराज ने एक्‍सप्‍लेन किया कि देख कुण्‍डली में बारहवां भाव मोक्ष का होता है। हर कोई परमआनन्‍द की अवस्‍था में पहुंचना चाहता है। ऐसे में जातक का बारहवां भाव ऑपरेट कराना जरूरी है। बारहवां भाव ऑपरेट नहीं होता है तो आदमी मैदे में मुठ्ठियां मारने लगता है। यानि बिना बात दुखी होने लगता है। ऐसे जातक का ईलाज भी जल्‍दी होता है। 
मैंने पूछा बारहवां भाव कैसे ऑपरेट कराते हैं। 
महाराज ने कहा या तो उसका पैसा खर्च कराता हूं या फिर शरीर। दोनों स्थितियों में खर्चा होता है। इसे रेचन की तरह समझ सकते हो। दिमाग पड़े पड़े भरने लगता है। अब उसे खाली कैसे किया जाए। जो जातक पैसा खर्च करने को राजी हो जाता है उसका इतना पैसा दान और पूजा में खर्च कराता हूं कि वह कई महीनों के लिए ठण्‍डा हो जाता है। खाली हुए बैंक बैंलेंस को भरने में ध्‍यान बंट जाता है और तात्‍कालिक समस्‍याएं गौण नजर आने लगती है। 
दूसरा तरीका है शरीर खर्च कराने का। कुछ लोग इतने मूंझी यानि कंजूस होते हैं कि दुख सह लेते हैं लेकिन अंटी ढीली नहीं करते। कोई बात नहीं उन लोगों के लिए दर्शन डेरे की व्‍यवस्‍था है। ऐसे मंदिर में दर्शन करने का उपाय बताता हूं जो उसके घर से कम से कम पांच किलोमीटर दूर हो। कईयों को तो दस या पंद्रह किलोमीटर दूर का म‍ंदिर भी बताया है। साथ में शर्त जोड़ देता हूं कि जाना पैदल ही है और रास्‍ते में किसी से बात नहीं करनी। जातक अगर ईमानदारी से उपाय करता है तो इतनी लम्‍बी दूरी तक बिना बोले चलने से समस्‍याओं के समाधान खुद ही ढूंढ लेता है या फिर कुछ दिन में उपाय करना बंद कर देता है। समस्‍या दूर हो जाती है तो ठीक वरना उपाय में कसर रहने का जुमला तो है ही। 
मैंने कहा ऐसे तो लोग आपसे दूर हो जाएंगे। 
महाराज ने कहा ऐसा नहीं होता। रोज दो सौ लोग आते हैं। बीस लोग भी ठीक हो जाते हैं तो वे मेरे भोंपू बन जाते हैं। बाकी के पौने दो सौ लोग वापस बोलते ही नहीं है। सो दिन दूनी रात चौगुनी ख्‍याती बढ़ रही है। 
मैंने पूछा कि फिर आप कांफिडेंस कैसे रख लेते हैं। 
इस पर महाराज खिलखिलाकर हंस पड़े। बोले बेटा मेरे पास खोने के लिए है ही क्‍या जो डरूं। 
मैंने कहा महाराज यह तो ज्‍योतिष ही नहीं है। 
तो महाराज ने कहा हां यह बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है। 


हो सकता है आपको लगे यह बातचीत मैंने अपनी कल्‍पना से बनाई है। जब मैं खुद ही यकीन नहीं कर पा रहा हूं तो आप लोगों का यकीन करना और भी मुश्किल है। लेकिन यकीन मानिए यह वास्‍तविक बातचीत थी। 
अब जब भी महाराज को देखता हूं तो मैं मुस्‍कुराता हूं और महाराज हंसकर जवाब देते हैं। दो एक बार उन्‍होंने अपनी कुण्‍डली देखने के लिए भी कहा लेकिन मैं टाल गया। मैं बोला आप तो गुरूजी के क्‍लाइंट हैं।


अगली पोस्‍ट में बताउंगा थाई अंक ज्‍योतिष से उपचार करने वाले बाबू से बातचीत।