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मंगलवार, दिसंबर 27, 2011

यहां कम्‍प्‍यूटर खुद एक वायरस है...

ज्‍योतिष के साथ एक बड़ी समस्‍या है कि नए उपकरणों और साधनों का पुख्‍ता ज्‍योतिषीय अर्थ नहीं निकाला जा रहा। ऐसे में छोटी-बड़ी हर वस्‍तु और साधन के कारकत्‍व की बात कर रहा ज्‍योतिषी मोबाइल और कम्‍प्‍यूटर जैसे साधनों के बारे में बात होते ही चुप हो जाता है। अगर कोई ज्‍योतिषी इस बारे में कोई राय रखता भी है तो वह निजी ही है। मैं अपने इस ब्‍लॉग के मंच से सभी ज्‍योतिषियों को आमंत्रित करता हूं कि मेरे एक अनुभव को सही या गलत होने पर अपनी राय दें। मेरी स्‍पष्‍ट राय है कि कम्‍प्‍यूटर आधुनिक युग में शुक्र का नाश करने वाला है। जिस जातक को शुक्र से लाभ मिलने वाले हैं, उसे कम्‍प्‍यूटर से तुरंत प्रभाव से दूर कर देना चाहिए। मेरी इस राय के पीछे मेरे कुछ प्रयोग समाहित हैं.. आइए उन प्रयासों और प्रयोगों की चर्चा करते हैं।

मेरे एक जातक की कुण्‍डली में तुला लग्‍न और शनि की महादशा चल रही है। शनि में शनि का अंतराल चल रहा था, तब तक छिद्र दशा होने के नाते मैंने उसे कहा कि अभी सही समय आने के लिए तुम्‍हें कुछ दिन इंतजार करना पड़ेगा। जातक ने धैर्य रखा और इंतजार किया। शनि में बुध का अंतर आने के साथ ही जातक को अपने कार्य-व्यवसाय में अच्‍छा लाभ मिलने लगा। आमतौर पर मैं अपने जातकों के साथ जुड़ा रहता हूं, लेकिन जहां मुझे लगता है कि अब कुछ अर्से तक समस्‍या नहीं आएगी तो मेरा ध्‍यान हट जाता है। जो ज्‍योतिष के जानकार हैं वे समझ सकते हैं कि तुला लग्‍न में कारक ग्रह की दशा आने के बाद अधिक समस्‍याएं शेष नहीं रहती, लेकिन एक दिन उसी जातक का फोन आया कि वह कठिन समस्‍या में है। मैंने उसकी कुण्‍डली देखी और कहा कि शनि भगवान के यहां चक्‍कर लगाना शुरू कर दो, समय वैसे भी अच्‍छा चल रहा है, फायदा बढ़ेगा। (कई बार जातकों का आग्रह होता है कि अच्‍छे समय का अधिकतम उपयोग कैसे किया जाए, मैंने इस जातक को भी इसी श्रेणी में रखा था)। जातक ने शनि मंदिर जाना शुरू कर दिया, लेकिन कुछ दिन बाद एक बार फिर उसका फोन आया कि समस्‍या ज्‍यों की त्‍यों है और आय के स्रोत ठप हो गए हैं। यह स्थिति चिंताजनक थी। जातक के प्रतिष्‍ठान का वास्‍तु भी मेरा ही देखा हुआ था, सो उसी दिन मिलने के लिए गया। वहां वास्‍तु संबंधी कुछ फेरबदल दीपावली की सफाई में कर दिए गए थे, लेकिन बहुत बड़े बदलाव नहीं थे। मैंने सोचा वास्‍तु संबंधी बदलाव के कारण बाधा आई होगी। जरूरी फेरबदल भी करवा दिए गए, लेकिन समस्‍या का समाधान नहीं हुआ। यह मेरे लिए निजी तौर पर बहुत अधिक हैरानी की बात थी और जातक भी हताश होने लगा था। मेरे पास दो ही तरीके थे, पहला कि मैं जातक को अपने गुरुजी के पास ले चलूं और दूसरा किसी तांत्रिक की सहायता ली जाए।

अगर जातक को गुरुजी के पास लेकर जाता तो गुरुजी पूछते कि मैंने अपने स्‍तर पर अब तक क्‍या प्रयास किए हैं। फौरी तौर पर जब कोई समस्‍या दिखाई नहीं दे रही तो, जातक क्‍यों परेशान है। इन सवालों को जवाब टेढ़े थे, इस परीक्षा के लिए मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं था, सो तांत्रिकजी के पास चलने का निर्णय किया गया। तांत्रिकजी ने उसी समय अपने घर बैठे बैठे प्रयोग कर दिया। अब किया या नहीं, पता नहीं, या तांत्रिकजी का निशाना गलत लग गया, या जो भी कारण रहा, एक सप्‍ताह और सूखा निकल गया। अब जातक के गले तक आया पानी नाक तक पहुंच चुका था। मैंने गुरुजी के पास जाने से पहले आखिरी प्रयास किया। जातक के पुराने रिकॉर्ड को याद करते हुए मैंने उसे कम्‍प्‍यूटर से दूर होने की सलाह दी। जातक ने बाकी सबकुछ मेरे कहने अनुसार लगा रखा था, लेकिन एक कम्‍प्‍यूटर अपने रेगुलर कस्‍टमर डाटा के लिए उसने अपने डेस्‍क पर ही रख रखा था। कम्‍प्‍यूटर दूर करने की सलाह का निशाना तीर की तरह सही लगा। अगले दो दिन में काम-काज में फिर सुधार होने लगा। एक बार रास्‍ता खुलने के साथ ही जातक का हौसला बढ़ा और फिर से पुरानी लय प्राप्‍त कर ली। लय पकड़ने के साथ ही जातक ने मुझे एक मोटी रकम का चैक दिया और कहा कि गुरुजी फरवरी तक मेरा टारगेट पूरा करा दो, यह चैक भुना लेना।

अब ये ठेकेदारी वाला काम मुझे मुश्किल लग रहा है। Winking smile

 

निष्‍कर्ष - कम्‍प्‍यूटर या कम्‍प्‍यूटर जैसा उपकरण शुक्र का शोषण करता है। ऐसे में शुक्र से लाभान्वित होने वाले जातकों और शुक्र की महादशा वाले जातकों को कम्‍प्‍यूटर से यथासंभव दूर रहने का प्रयत्‍न करना चाहिए।

अब बात शुक्र के शोषण की

शुक्र ग्रह के बारे में कोई राय स्‍थापित करने से पहले इसकी प्रकृति को समझना जरूरी है। पूर्व में भी कई बार शुक्र का जिक्र आ चुका है और भोग व विलासिता के संदर्भ में शुक्र को बहुत से मामलों में गलत भी समझा जाता रहा है। जबकि शुक्र गुणों में देवताओं के गुरु ब्रहस्‍पति के समकक्ष है, क्‍यों शुक्र खुद गुरु है, लेकिन राक्षसों के। जब तुला लग्‍न हो तो इस लग्‍न में शुक्र लग्‍न और अष्‍टम भाव का अधिपति बनता है। इस लग्‍न में शनि कारक ग्रह है। शुक्र को शनि का चेला बताया गया है। यानि जहां शनि का नुकसान हो रहा होता है वहां शुक्र अपना बलिदान कर शनि की रक्षा करता है। कप्‍यूटर एक सेल्‍फ ल्‍युमिनेटेड (स्‍व प्रकाशित) इकाई है। इसकी स्‍क्रीन पर सदैव जगमगाते दृश्‍य तैरते रहते हैं। अगर हम इंटरनेट पर होते हैं तो इन दृश्‍यों के बदलने की तीव्रता और अधिक बढ़ जाती है। जातक के पास अनलिमिटेड इंटरनेट था, जिस पर वह लगातार सर्फिंग कर रहा था। ऐसे में शनि (नियमितता और अनुशासन) को नुकसान पहुंच रहा था। ऐसे में शनि के नुकसान को शुक्र ने भोगा और जातक की आय के स्रोत बेहतरीन दशा के बावजूद बाधित हो गए। जैसे ही जातक की टेबल से कम्‍प्‍यूटर को हटाया गया, शुक्र फिर से मजबूत हुआ और आय के स्रोत खुल गए। यह मेरा ऑब्‍जर्वेशन है।

मनोरंजन के अन्‍य नियमित साधन

नई सदी में हमें मनोरंजन के कम्‍प्‍यूटर की तरह कई साधन मिले हैं, जो हमारे दिनचर्या और जीवनचर्या के महत्‍वपूर्ण भाग का दोहन कर रहे हैं। कहने को यह सूचना क्रांति है, लेकिन हम सूचनाओं के इतर बहुत से दूसरे उपांगों पर अपना ध्‍यान केन्द्रित कर रहे हैं। मसलन टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल। ये सीरियल अच्‍छे मायने में हमें बेहतरीन फिक्‍शन अथवा नॉन फिक्‍शन से रूबरू कराते हैं, लेकिन आधे घंटे का एक कार्यक्रम करीब दस से पंद्रह मिनट का विज्ञापन समय भी लपेटे हुए होता है। अब चूंकि हम इसके प्रति सजग नहीं है, सो वह समय हमारी इच्‍छा के बगैर खाया जा रहा है। इसी तरह मोबाइल उपकरणों में भी ऐसे में तमाम साधन मुहैया कराए गए हैं जो हमारा समय, श्रम, धन और चेतना का ह्रास कर रहे हैं। इनके संदर्भ में भी शुक्र का अध्‍ययन और किए जाने की जरूरत महसूस होती है।

 

आपको भी मोबाइल उपकरण, टीवी, कम्‍प्‍यूटर अथवा आईपोड जैसे उपकरणों से करीबी और दूरी से कोई अनुभव हुए हों तो अवगत कराइएगा... इंतजार रहेगा।

मंगलवार, जून 28, 2011

ज्‍योतिष के बदलते आयाम


ज्‍योतिष और इसके  फलादेशों के आयाम में भी नियमित रूप से परिवर्तन आ रहा है। पिछले कुछ समय में जातक कुण्‍डली दिखाने के बजाय सीधे अपनी समस्‍या से संबंधित प्रश्‍नों को ही लेकर आ रहे हैं। उन्‍हें इस बात की परवाह नहीं है कि उनका मूल स्‍वभाव क्‍या है या उनके श्रेष्‍ठ अंक, रंग या वार कौनसे हैं। लगातार मेहनत करने वाले लोग प्राथमिक स्‍तर पर समस्‍या का समाधान खुद करने का प्रयास करते हैं और निजी प्रयास विफल होने पर ज्‍योतिषी से केवल इतनी राय लेते हैं कि फलां काम में सफलता मिलेगी अथवा नहीं।
दूसरी ओर ज्‍योतिष के प्रति लोगों के बढ़ रहे रुझान के साथ मीडिया और कुछ ज्‍योतिष संस्‍थानों ने ऐसे भ्रम फैलाए हैं कि लोगों को लगता है कि जिंदगी के हर क्षेत्र में ज्‍योतिष का दखल है। हकीकत में जीवन में होने वाली हर घटना की समीक्षा और गणना ज्‍योतिष के जरिए की जा सकती है, लेकिन न तो ज्‍योतिषियों के पास इतना समय है और न ही जातकों के पास कि छोटी मोटी बातों के विश्‍लेषण के लिए वे ज्‍योतिषियों के चक्‍कर निकालें।
विकासशील जातक
विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहे लोगों के सवालों में प्रमुख है कि मेरा अगला प्रमोशन कब तक होगा, व्‍यवसाय में आ रही बाधा का निवारण कैसे होगा, सर्कुलेशन में फंसा पैसा कब तक निकलेगा, जिस काम में लगा हूं उसमें सफलता मिलेगी या नहीं। इनमें से अधिकांश इमानदार सवालों के सीधे सपाट हां या ना में जवाब आ रहे हैं। कुछ मामलों में इतनी स्‍पष्‍ट तारीख आती है कि जातक स्‍वयं भी वही अनुमान लगा रहा होता है।
सालों से खड़ी समस्‍याएं
दूसरी ओर कुछ जातक ऐसे हैं जो विकास के कार्यों के बजाय समस्‍याएं देखने में अधिक रुचि दिखाते हैं। अर्से से खाली बैठा जातक पूछता है कि उसे सफलता किस दिशा में मिलेगी। वास्‍तव में यह कोई सवाल ही नहीं है। ज्‍योतिष के जरिए सफलता का क्षेत्र बताया जा सकता है, लेकिन दिशा का कोई तात्‍पर्य नहीं है। इसी तरह मुझे किससे लाभ होगा, बॉस से बनती नहीं है, सालों से समय खराब है कब सुधरेगा, पत्‍नी का स्‍वभाव खराब है। ऐसी स्थिति में जातक ज्‍योतिषी को तांत्रिक समझकर उससे दूसरे लोगों और परिस्थितियों को दुरुस्‍त करने का आग्रह करने लगता है।
अधूरे सवाल और गलत ईमेल आईडी
प्रश्‍न वाले बक्‍से से आ रहे सवालों में कई तरह की दिक्‍कतें आ रही हैं। पहला तो यह कि कई जातक अपनी ईमेल आईडी सही नहीं लिख रहे हैं। इसका नुकसान स्‍वयं जातक को होता है। अगर ईमेल आईडी सही नहीं होगी तो पाराशराज की ओर से जवाब भेजने का कोई क्रम नहीं बन पाएगा। इसी तरह अपने जन्‍म डाटा सही या अधूरे भरकर भेजने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। पिछले एक महीने में करीब सौ लोगों ने अधूरे सवाल या डाटा भेजे हैं। इनमें से जिन जातकों की ईमेल आईडी सही थी उन्‍हें फिर से डाटा भेजने के लिए कहा गया है, लेकिन जिनकी आईडी ही गलत थी, उनकी समस्‍याएं गंभीर होने के बावजूद पाराशराज को उन्‍हें डिलीट करना पड़ा।
ध्‍यान रखें - बक्‍से में सवाल और डाटा भरते समय अपना नाम, जन्‍म तिथि, जन्‍म समय और जन्‍म स्‍थान के अलावा ईमेल आईडी ध्‍यानपूर्वक भरें। इनमें गलती होने से आगे का संवाद प्राथमिक स्‍तर पर ही खत्‍म हो जाता है।
विस्‍तार से रखें अपनी बात
समस्‍या अथवा जिज्ञासा के बारे में लिखते समय जातक अपनी बात विस्‍तार से लिखेंगे तो पाराशराज को प्रश्‍न का उत्‍तर तैयार करने में आसानी रहेगी। मसलन आगे के अच्‍छे समय के बारे में जानकारी मांगने के साथ ही अगर जातक पहले की कुछ सिलसिलेवार घटनाओं को मय तारीख बताए तो ज्‍योतिषी के लिए एक ओर अध्‍ययन का विषय बनता है तो दूसरी ओर सटीक फलादेश निकालने में मदद मिलती है। अगर आप केवल इतना लिखकर भेजे हैं कि मेरे बारे में बताइए तो इस सवाल का जवाब व्‍यवहारिक तौर पर देना संभव नहीं है। पाराशराज एक प्रोफेशनल यूनिट है। यह न तो किसी दूसरे जातक को आपके बारे में जानकारी देता है और न आपको किसी दूसरे जातक की। ऐसे में आप द्वारा पाराशराज को दी गई सारी जानकारियां संबंधित ज्‍योतिषी तक ही सीमित रहती हैं। जिस प्रकार रोग के इलाज के दौरान आप चिकित्‍सक को अपने रोग के बारे में विस्‍तार से जानकारी देते हैं, उसी प्रकार आप ज्‍योतिषी को भी विस्‍तार से अपने जीवन की बातें बताएंगे तो अधिक सक्षम विश्‍लेषण संभव हो पाएगा।

गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

जातक की भुजिया चखने की बीमारी

जो जातक पहली बार कुण्‍डली दिखाता है वह इतना जैनुइन होता है कि उसे जो कुछ बताते हैं वह सटीक पड़ता हुआ महसूस होता है। मैं यहां कह रहा हूं कि महसूस होता है। कई बार फलादेश सटीक होते हैं तो कई बार जातक भी 'हां' कहने की मुद्रा में ही रहता है। दूसरी तरफ ऐसे जातक होते हैं जो सैकड़ों ज्‍योतिषियों को कुण्‍डलियां दिखा-दिखाकर और चूरण छाप किताबें पढ़कर ऐसे हो जाते हैं कि उन्‍हें डील करने और कुतुबमीनार से छलांग लगा देने में कोई खास अन्‍तर नहीं लगता। ऐसे जातक भाग्‍य के भरोसे ही सबकुछ पा लेने की हसरत पालने लगते हैं। इसी से शुरू होता है एक के बाद दूसरे ज्‍योतिषी के दहलीज पर कदम रखने का सिलसिला, जो कुण्‍डली के फट जाने पर भी नहीं रुकता।

 मैं अपनी बात स्‍पष्‍ट करने से पहले कुछ बात बीकानेरी भुजिया के बारे में बताना चाहूंगा। बीकानेर में भुजिया मोठ की दाल के बनते हैं। मोठ की दाल उत्‍तरी पश्चिमी राजस्‍थान की विशिष्‍ट दाल है। जाहिर है कि यह दाल देश के अन्‍य हिस्‍सों में पैदा नहीं होती। इस दाल से भुजिया बनाने के कई तरीके हैं। शुद्ध दाल के भुजिया, दाल में थोड़ी या अधिक मात्रा में चावल मिलाकर बनाए गए भुजिया, मुल्‍तानी मिट्टी मिलाकर बनाए गए भुजिया। मसालों और उपयोग में ली जाने वाली सामग्री के अलावा बनाने के तरीकों के आधार पर भी भुजिया चार तरह के होते हैं। महीन, तीन नम्‍बर, मोटे और डूंगरशाही। मसालों और आधारभूत उत्‍पादों के वैरिएशन और बनाने के इतने तरीकों के चलते हर भुजिया कारीगर की अपनी शैली बन जाती है। ऐसे में बीकानेरी लोग हमेशा एक ही दुकान के भुजिया खाने के बजाय अलग-अलग दुकानों के भुजिया चखते रहते हैं। 

Bhujia

ये तीन नम्‍बर भुजिया हैं... एक क्‍वालिटी इससे महीन और एक क्‍वालिटी इससे मोटी होती है...

अलग-अलग ज्‍योतिषियों के पास जाने वाले जातकों को मैं ऐसे ही भुजिया चखने वाले लोगों की श्रेणी में रखता हूं। पहली बार किसी ढंग के ज्‍योतिषी के पास पहुंचकर उपचार कर लेने वाले जातक को अपनी जिंदगी में प्रभावी बदलाव दिखाई देते हैं तो वह बार-बार उसी ज्‍योतिषी के चक्‍कर लगाना शुरू कर देता है। आखिर एक दिन वह ज्‍योतिषी हाथ खड़े कर देता है। जातक को भी ज्‍योतिषी का पुराना उपचार और उससे आए बदलाव उकताने लगते हैं। ऐसे में वह दूसरे ज्‍योतिषी के पास जाता है। दूसरा ज्‍योतिषी दूसरे कोण से कुण्‍डली देखता है। नए उपचार बताता है और उससे होने वाले नए लाभ बताता है। कई दिन में दूसरे ज्‍योतिषी का स्‍वाद भी 'जीभ' खराब करने लगता है तो जातक तीसरे, चौथे और ऐसे बहुत से ज्‍योतिषियों के पास जाता रहता है। इस बीच जातक को लगता है कि उसे भी कुण्‍डली की समझ पड़ने लगी है। आखिर अपनी कुण्‍डली का विश्‍लेषण करने के लिए वह एक किताब खरीद लाता है। अगर बहुत महंगे ज्‍योतिषियों से पाला पड़ा हुआ होता है तो वह शानदार और महंगी किताबें खरीदता है और अगर सस्‍ते और मुफ्त के ज्‍योतिषियों से लाभान्वित हुआ होता है तो सौ या दो सौ रुपए की किताबें खरीदकर 'पढ़ाई' शुरू कर देता है। इसके बावजूद फलादेश न कर पाता है न समझ पाता है, लेकिन प्राथमिक ज्ञान हासिल करने के बाद नए ज्‍योतिषियों से बहस करने के लिए तैयार हो जाता है।

करीब बीस ज्‍योतिषियों के चक्‍कर लगाने और पांच चूरण छाप ज्‍योतिष की किताबें पढ़ने के बाद मेरे पास फटी हुई कुण्‍डली लेकर पहुंचे जातक को देखकर ही मेरा माथा ठनक जाता है। अपने अंतर्ज्ञान से मुझे पहले ही भान हो जाता है कि अब यह कई दिन तक मुझे खून के आंसू रुलाएगा। ऐसे जातक आमतौर पर क्‍या सवाल करते हैं, इसकी एक बानगी आप भी देखिए...

- मेरी तुला लग्‍न की कुण्‍डली है, बुध की दशा में गुरु का अन्‍तर कैसा जाएगा। (भैया जैसा किताब में लिखा है वैसा ही जाएगा...)

- फलां सिंहजी ने उपचार बताया था, उससे पहले तो फायदा हुआ, लेकिन अब उपाय बेअसर साबित हो रहे हैं (फलासिंह जी को ही वापस जाकर क्‍यों नहीं पूछते)

- मेरा 2000 से 2007 तक का पीरियड को शानदार गया, लेकिन पिछले चार साल से कोई खास लाभ नहीं हो रहा है... शायद उपचार काम नहीं कर रहे (क्‍या अच्‍छा समय हमेशा बना रहेगा, या रोज लॉटरी खुलेगी)

- फलां किताब में लिखा है कि शनि और सूर्य साथ होने से मेरी अपने पिता से लड़ाई रहेगी, लेकिन मेरी तो उनसे बातचीत ही नहीं होती (तो शनि और सूर्य के सम्‍बन्‍ध को ढंग से समझने के लिए और किताबें पढ़ने की जरूरत है)

- थोड़ा बहुत समय बीच में ठीक गया था, लेकिन प्रभावी उपचार नहीं होने से मेरा पूरा समय अच्‍छा नहीं जा रहा (मैं ब्रह्मा हूं आओ पूरा समय ठीक कर देता हूं, बताओ कहां-कहां गड़बड़ लग रही है)

- काम तो कोई नया शुरू नहीं किया, यही नौकरी है, लेकिन पैसा कब होगा मेरे पास (जादू की छड़ी घुमाने भर की देरी है, जब पात्र ही नहीं होगा तो ऊपर वाला भी नेमत नहीं बरसा पाएगा)

- ये मेरी पत्‍नी की कुण्‍डली है, वह हमेशा घर में तनाव बनाए रखती है (और आपकी कुण्‍डली क्‍या कहती है --- एक हाथ से ताली बजाकर दिखाओ)

इसके अलावा कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका दूसरा छोर कहीं नहीं होता जैसे -- आप ही कुछ बता दो, -- आपको मेरी कुण्‍डली में क्‍या दिखाई देता है, -- मेरे भाग्‍य में क्‍या लिखा है, -- फलां सिंहजी ने यह बताया था, वह अब तक तो नहीं हुआ, आपका क्‍या कहना है, -- आपने अब तक जितना अध्‍ययन किया है उसके अनुसार जो भी समझ में आए सब बता दो (ये आमतौर पर फोकटिया जातक होते हैं, इन्‍हें बताया जाए कि एक प्रश्‍न का जवाब ग्‍यारह सौ रुपए मात्र है तो दोबारा जिंदगी में दिखाई नहीं देंगे)

भुजिया चखने के इन मरीजों का आज तक मुझे तो कोई इलाज नहीं मिला है, आपके पास कोई इलाज हो तो बताइएगा.. मुस्‍कान 

सोमवार, मार्च 30, 2009

बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है

अब ज्‍योतिष का ब्‍लॉग है और मैं यह बात लिख रहा हूं तो आप सोचेंगे कि आखिर आ ही गया अपनी औकात पर। आप कुछ ऐसा समझ सकते हैं। क्‍योंकि मैंने सीखने में कभी कंजूसी नहीं बरती सो हर ऐसे इंसान से सीखने की कोशिश की जिसके बारे में कहा जाता था कि इसे कुछ आता है। सही कहूं तो आज भी यही स्थिति है। जिस तरह कला के जवान होने तक कलाकार बूढा हो जाता है वैसे ही ज्‍योतिष की समझ आने तक फलादेश करने का महत्‍व भी खो सा जाता है। 
खैर में आता हूं विषय पर: बेसिकली मूर्ख बनाने के धंधे पर। 

दरअसल मेरे दो अलग-अलग गुरूओं ने मुझे यह ज्ञान दिया। सही कहूं तो दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्र के माने हुए ज्‍योतिषी हैं। एक रमल ज्‍योतिषी हैं तो दूसरे थाई अंक ज्‍योतिष के प्रकाण्‍ड ज्ञाता। मैं दोनों का ही नाम और चरित्र का वर्णन नहीं करूंगा। वरना आज नहीं तो कल कोई न कोई उन्‍हें  पहचान लेगा। मुख्‍य बात है कि दोनों ने एक ही बात एक ही अंदाज में क्‍यों कही और उसके लिए क्‍या दलीलें दी यह मेरे और अन्‍य नए साधकों के लिए बहुत जरूरी है। 

पहले ज्‍योतिषी जिन्‍हें मैं महाराज से संबोधित करूंगा। महाराज के बारे में कहा जाता है कि वे किसी से नहीं घबराते। न अपने भविष्‍य से न वर्तमान के भूत से। उन्‍होंने भय को जीत लिया है। इसी कांफिडेंस के साथ महाराज ने बीकानेर, जयपुर, दिल्‍ली, मुम्‍बई, कलकत्‍ता, सूरत और दर्जनों महानगरियों में अच्‍छों अच्‍छों को घुटने टिकाए हैं। महाराज किसी से ढंग से बात नहीं करते थे। मैंने दो तीन बार बात करने की कोशिश की तो उन्‍होंने बुरी तरह झिकड़ कर भगा दिया। उन दिनों टीन एजर था सो भागने में मैं भी जल्‍दी दिखाता था। 
एक दिन अपने गुरूजी (जो मेरे हार्ड कोर गुरू हैं) के साथ शनि महाराज के मंदिर गया था। गुरूजी ने कहा तेरी शनि की दशा आने वाली है चल आज शनि महाराज का हैप्‍पी बर्थ डे है। चलकर उनके दरबार में हाजिरी लगा देते हैं। सो हम पहुचे शनि मंदिर। अभी मंदिर में घुसे ही नहीं थे कि महाराज सामने आते मिल गए। महाअक्‍खड़ महाराज को देखते ही मैंने कहा गुरूजी यह महाराज अभी हम दोनों को हड़काएगा। लेकिन गुरूजी मुस्‍कुराए बोले इसकी कुण्‍डली तो मैं देखता हूं देखना अभी करीब आते ही रोने लगेगा कि गुरूजी मर रहा हूं कुछ करो। मुझे यकीन नहीं हुआ। भीड़ के बीच में महराज संयत बने रहे और थोड़ी देर में किनारे आते ही महाराज गुरूजी के पैरों में। बाकायदा गिड़गिड़ा रहे थे। चंद्रास्‍वामी से सीधे पंगा लेने वाले महाराज गुरुजी के चरणों में थे। मुझे देखकर भी यकीन नहीं हो रहा था। गुरूजी ने संबल दिलाया तो महाराज वापस अपने पैरों पर खड़े हुए। मैंने माजरा पूछा तो गुरूजी ने बताया कि महाराज की सूर्य की दशा बीत गई है अब चंद्रमा की दशा में इनकी हालत खराब हो रही है। सो इलाज के लिए घूम रहे हैं। मैं अड़ गया, मैंने कहा ऐसा कैसे हो सकता है कि रमल पद्धति का प्रकाण्‍ड विद्वान, जो रोजाना दो सौ से अधिक लोगों के दुख दूर कर रहा है खुद कैसे परेशानी में आ सकता है। 
अपनी आदत के अनुसार गुरुजी बस मुस्‍कुराते रहे। 
अब मैंने देख लिया कि महाराज गुरूजी के आगे नतमस्‍तक हैं तो मैंने अपने चोटीकट चेला होने का फायदा उठाया और सीधे सीधे बात करनी शुरू कर दी। महाराज जो अब तक मुझे हड़काते रहे थे गुरूजी के सामने मुझसे प्रेमपूर्वक बातें कर रहे थे। मैंने पूछा महाराज आप अपना इलाज खुद क्‍यों नहीं कर लेते। 
महाराज बोले पगले कभी नाई को अपनी हजामत करते हुए देखा है। 
मेरे दिमाग में बात बैठ गई। 
फिर पूछा कि आप दूसरों का ईलाज कैसे करते हैं 
यहां महाराज अटक गए बोले यह तो ट्रेड सीक्रेट है। तुझे बता दूंगा तो तूं मेरी दुकान ही ठण्‍डी करेगा। 
तो गुरूजी बीच में बोले नहीं महाराज यह परम्‍परागत पद्धति से सीख रहा है। आपकी पद्धति में यह रुचि नहीं लेगा। 
तो महाराज हल्‍के हुए 
बोला बेटा ईलाज दो ही तरीके से होता है या तो जातक पैसे से जाएगा या शरीर से जाएगा 
यह बात मेरी समझ में नहीं आई। 
तो महाराज ने एक्‍सप्‍लेन किया कि देख कुण्‍डली में बारहवां भाव मोक्ष का होता है। हर कोई परमआनन्‍द की अवस्‍था में पहुंचना चाहता है। ऐसे में जातक का बारहवां भाव ऑपरेट कराना जरूरी है। बारहवां भाव ऑपरेट नहीं होता है तो आदमी मैदे में मुठ्ठियां मारने लगता है। यानि बिना बात दुखी होने लगता है। ऐसे जातक का ईलाज भी जल्‍दी होता है। 
मैंने पूछा बारहवां भाव कैसे ऑपरेट कराते हैं। 
महाराज ने कहा या तो उसका पैसा खर्च कराता हूं या फिर शरीर। दोनों स्थितियों में खर्चा होता है। इसे रेचन की तरह समझ सकते हो। दिमाग पड़े पड़े भरने लगता है। अब उसे खाली कैसे किया जाए। जो जातक पैसा खर्च करने को राजी हो जाता है उसका इतना पैसा दान और पूजा में खर्च कराता हूं कि वह कई महीनों के लिए ठण्‍डा हो जाता है। खाली हुए बैंक बैंलेंस को भरने में ध्‍यान बंट जाता है और तात्‍कालिक समस्‍याएं गौण नजर आने लगती है। 
दूसरा तरीका है शरीर खर्च कराने का। कुछ लोग इतने मूंझी यानि कंजूस होते हैं कि दुख सह लेते हैं लेकिन अंटी ढीली नहीं करते। कोई बात नहीं उन लोगों के लिए दर्शन डेरे की व्‍यवस्‍था है। ऐसे मंदिर में दर्शन करने का उपाय बताता हूं जो उसके घर से कम से कम पांच किलोमीटर दूर हो। कईयों को तो दस या पंद्रह किलोमीटर दूर का म‍ंदिर भी बताया है। साथ में शर्त जोड़ देता हूं कि जाना पैदल ही है और रास्‍ते में किसी से बात नहीं करनी। जातक अगर ईमानदारी से उपाय करता है तो इतनी लम्‍बी दूरी तक बिना बोले चलने से समस्‍याओं के समाधान खुद ही ढूंढ लेता है या फिर कुछ दिन में उपाय करना बंद कर देता है। समस्‍या दूर हो जाती है तो ठीक वरना उपाय में कसर रहने का जुमला तो है ही। 
मैंने कहा ऐसे तो लोग आपसे दूर हो जाएंगे। 
महाराज ने कहा ऐसा नहीं होता। रोज दो सौ लोग आते हैं। बीस लोग भी ठीक हो जाते हैं तो वे मेरे भोंपू बन जाते हैं। बाकी के पौने दो सौ लोग वापस बोलते ही नहीं है। सो दिन दूनी रात चौगुनी ख्‍याती बढ़ रही है। 
मैंने पूछा कि फिर आप कांफिडेंस कैसे रख लेते हैं। 
इस पर महाराज खिलखिलाकर हंस पड़े। बोले बेटा मेरे पास खोने के लिए है ही क्‍या जो डरूं। 
मैंने कहा महाराज यह तो ज्‍योतिष ही नहीं है। 
तो महाराज ने कहा हां यह बेसिकली मूर्ख बनाने का धंधा है। 


हो सकता है आपको लगे यह बातचीत मैंने अपनी कल्‍पना से बनाई है। जब मैं खुद ही यकीन नहीं कर पा रहा हूं तो आप लोगों का यकीन करना और भी मुश्किल है। लेकिन यकीन मानिए यह वास्‍तविक बातचीत थी। 
अब जब भी महाराज को देखता हूं तो मैं मुस्‍कुराता हूं और महाराज हंसकर जवाब देते हैं। दो एक बार उन्‍होंने अपनी कुण्‍डली देखने के लिए भी कहा लेकिन मैं टाल गया। मैं बोला आप तो गुरूजी के क्‍लाइंट हैं।


अगली पोस्‍ट में बताउंगा थाई अंक ज्‍योतिष से उपचार करने वाले बाबू से बातचीत।