रविवार, अक्टूबर 05, 2025
ज्योतिष कक्षा: दूसरा दिन - ग्रह, तारा, नक्षत्र, राशि
ग्रह : सिद्धांत ज्योतिष अथवा एस्ट्रोनॉमी के अनुसार सूर्य (जो कि एक तारा है) के चारों ओर चक्कर लगाने वाले पिण्डों को ग्रह कहते हैं। इसी तरह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे चंद्रमा को उपग्रह कहते हैं। पर, फलित ज्योतिष में सूर्य और चंद्रमा को भी ग्रह माना गया है। इस तरह सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, वृहस्पति और शनि के अलावा हमें चंद्रमा ग्रह के रूप में मिल जाते हैं। इसके अलावा सूर्य और चंद्रमा की अपने पथ पर गति के फलस्वरूप दो संपात बनते हैं। इनमें से एक को राहू और दूसरे को केतू माना गया है। इनकी वास्तविक उपस्थिति न होकर केवल गणना भर से हुई उत्पत्ति के कारण इन्हें आभासी या छाया ग्रह भी कहा जाता है।
तारा : अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित पिण्ड को तारा कहते हैं। जैसा कि एस्ट्रोनॉमी बताती है कि हमारा सौरमण्डल आकाशगंगा में स्थित है। यह 61.3 साल में भचक्र में एक डिग्री आगे निकल जाता है। चूंकि सभी ग्रह सौरमण्डल के इस मुखिया को चारों ओर चक्कर निकालते हैं। अत: पृथ्वी से देखने पर यह अपेक्षाकृत स्थिर नजर आता है।
नक्षत्र : तारों का एक समूह नक्षत्र कहलाता है। आकाश को 360 डिग्री में बांटा गया है। इन्हीं के बीच तारों के 27 समूहों को 27 नक्षत्रों का नाम दिया गया है। हर नक्षत्र का स्वामी तय कर दिया गया है। पहले से नौंवे नक्षत्र तक के स्वामी क्रमश: केतू, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहू, गुरु, शनि और बुध होते हैं। इसी तरह यह क्रम 27वें नक्षत्र तक चलता है। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं।
राशि : आकाश का तीस डिग्री का भाग एक राशि का भाग होता है। राशियां कुल बारह हैं। ये क्रमश: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। सवा दो नक्षत्र की एक राशि होती है। यानि एक राशि में नक्षत्रों के कुल नौ चरण होते हैं।
इसके अलावा कक्षा के बाकी समय में विद्यार्थियों ने अपनी कई जिज्ञासाओं पर बातचीत की। उन पर अलग पोस्ट बना सकते हैं। सबसे रोचक सवालों में बच्चे का जन्म कब माना जाए और कम से कम कितने समय में ज्योतिष सीखी जा सकती है। ये सवाल भले ही रोचक न लगें, लेकिन इनके जवाब खासे रोचक बन पड़े थे। तीसरी कक्षा में हम राशियों का परिचय प्राप्त करेंगे।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
ज्योतिष कक्षा:4था दिन - राशियों का परिचय - मेष, वृष व मिथुन राशि
आकाश को बारह बराबर हिस्सों में बांटकर बारह राशियां बना दी गई हैं। पहली राशि मेष, दूसरी वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और बारहवीं मीन राशि है। हर राशि का अपना स्वभाव है। आज की कक्षा में हम केवल तीन राशियों का परिचय प्राप्त करेंगे।
अगली कक्षा में हम बात करेंगे कर्क, सिंह और कन्या राशि की...
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अनजान हैं हम नक्षत्रों के नैसर्गिक गुणों से
ज्योतिष की किताबों में आपको ग्रहों, राशियों और भावों के बारे में विस्तार से जानकारी मिल जाएगी। इससे अधिक देखने पर हम पाते हैं कि राशियों को नक्षत्रों के अनुसार विशिष्टता दी गई है। चंद्रमा भी नक्षत्रों पर से गुजरते हुए हमें रोज के बदलावों की जानकारी देता है। ज्योतिष की प्राचीन और नई पुस्तकों में यह तो दिया गया है कि अमुक नक्षत्र में चंद्रमा के विचरण का फलां फल है, लेकिन कहीं यह नहीं बताया गया है कि नक्षत्र का नैसर्गिक स्वभाव क्या है या उस पर किसी ग्रह के स्वामित्व का वास्तविक अर्थ क्या है।
पाराशर ऋषि ने नक्षत्र चार के आधार पर ही दशाओं का विभाजन किया लेकिन नक्षत्रों के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी। इसी तरह प्रोफेसर केएस कृष्णामूर्ति ने केवल चंद्रमा के नक्षत्र चार से बाहर आकर हर भाव और ग्रह के नक्षत्रों तक उतरकर विशद् विश्लेषण पेश किया, लेकिन उन्होंने ने भी कहीं नक्षत्रों की निजी विशिष्टताओं के बारे में स्पष्ट नहीं किया गया है। जबकि वृहत्त संहिता और दूसरी एकाध प्राचीन पुस्तक में नक्षत्रों के स्वरूप का वर्णन तक मिलता है। इन नक्षत्रों के स्वरूप के आधार पर ही उनके गुण भी बताए गए हैं।
जब नक्षत्र के बारे में इतनी सटीक जानकारी उपलब्ध है तो उनके निजी या एकांगिक गुणों के बारे में कहीं स्पष्ट नहीं किया जाना कुछ खल जाता है। नक्षत्रों में विचरण को दौरान अगर चंद्रमा के स्वभाव में नियमित रूप से परिवर्तन आता है तो क्या अन्य ग्रहों पर भी ऐसे प्रभाव का अध्ययन जरूरी नहीं है।
पहले पता करते हैं कि नक्षत्र हैं क्या?
पहले हमने देखा कि बारह राशियां भचक्र के 360 डिग्री को बराबर भागों में बांटती हैं। इस तरह आकाश के हमने बारह बराबर टुकड़े कर दिए। तारों का एक समूह मिलकर नक्षत्र बनाता है। ऐसे सत्ताईस नक्षत्रों की पहचान की गई है। इससे आकाश को बराबर भागों में बांटा गया है। हर नक्षत्र के हिस्से में आकाश का 13 डिग्री 20 मिनट भाग आता है। जब हम चंद्रमा के दैनिक गति की बात करते हैं कि इसमें नक्षत्रों की विशेष भूमिका होती है। राशि वही हो और नक्षत्र बदल जाए तो चंद्रमा का स्वभाव भी बदल जाता है। इसी तरह हर ग्रह के स्वभाव में भी नक्षत्र चार के दौरान बदलाव आता है। चूंकि नक्षत्रों का स्वामित्व ग्रहों को ही दिया गया है। ऐसे में स्वभाव में परिवर्तन भी ग्रहों के अनुसार ही मान लिया जाता है। जबकि हकीकत में यह नक्षत्र की नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुसार होना चाहिए।
सत्ताईस नक्षत्र और उनका विभाजन
अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र बताए गए हैं। ये इसी क्रम में रहते हैं।
इन नक्षत्रों का स्वामित्व कुछ इस तरह दिया गया है कि केतू, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहू, गुरु, शनि और बुध क्रमश: पहले से नौंवे नक्षत्र के अधिपति है। इसके बाद दसवें नक्षत्र का अधिपति फिर से केतू हो जाता है। नौ ग्रहों में से हर एक के हिस्से में तीन-तीन नक्षत्र आते हैं। राशियों ने नक्षत्रों के टुकड़ों को बांटा है। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं। इस तरह 27 नक्षत्र हर चरण के आधार पर आकाश के टुकड़े करे तो कुल 108 टुकड़े होंगे। एक राशि के तहत सवा दो नक्षत्र आते हैं। यानि नक्षत्र के नौ चरण।
नक्षत्रों का वर्गीकरण (वृहत्त संहिता के अनुसार)
ध्रुव नक्षत्र – उत्तराषाढ़ा, उत्तरा फाल्गुनी और उत्तरा भाद्रपद व रोहिणी
तीक्षण – मूल, आर्द्रा, ज्येष्ठा और आश्लेषा
उग्र – पूर्व फाल्गुनी, पूर्वषाढ़ा, पूर्वभाद्रपद, भरणी और मघा
क्षिप्र - हस्त, अश्विनी और पुष्य
मृदु - अनुराधा, चित्रा, रेवती और मृगशिरा
मृदु तीक्ष्ण – कृतिका और विशाखा
कारा - श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु और स्वाति
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मन के उपचार का महीना - श्रावण
श्रावण मास में हम मन का उपचार अच्छी तरह कर सकते हैं। श्रावण मास का मन, चंद्रमा और शिव से क्या संबंध है। बेहतरी के लिए श्रावण मास में क्या किया जा सकता है आइए देखते हैं...
मन की गति को कोई नहीं पकड़ सकता। यह मन ही है जो हमें सपने दिखाता है और उन्हें पूरे करने की ताकत भी देता है। मन में पैदा हो रहे विचार की शक्ति ही हमें पशुओं से अलग करती है। ये विचार ही हैं जो हमें सपनों के रूप में मिलते हैं और विचार ही हमें सपने पूरे करने की ताकत देते हैं। मन की इसी ताकत के कारण हम दूसरों से कुछ अलग होते हैं।
ज्योतिष में मन का कारक चंद्रमा को बताया गया है। जिस तरह राशियों, नक्षत्रों और तारों के बीच चंद्रमा सबसे तेज रफ्तार का ग्रह है, ठीक उसी तरह मन की भी गति है। चंद्रमा पर शिव का अधिकार है। शिव की आराधना हमारे चंद्रमा को मजबूती देती है, इसी से हम अपने मन पर नियंत्रण करने में अधिक सक्षम हो पाते हैं।
चंद्रमा की गति बहुत तेज है। हमारे विचार भी उसी गति से बदलते हैं। एक पत्र या ईमेल या फोन कॉल सुनते समय किसी व्यक्ति के दिमाग में कितने विचार आते-जाते हैं। पत्र, मेल या फोन आने पर व्यक्ति खुश होता है, उसी संदेश में दुख की बात होने पर दुखी होता है, उससे असंतोष भी उपजा लेता है और वार्तालाप आगे बढ़ने पर संतुष्ट भी होता चला जाता है। चंद्रमा का उपचार कर लिया जाए तो हम अपने मन पर भी नियंत्रण कर सकते हैं।
मन पर नियंत्रण हमें क्रोध पर नियंत्रण, अवसाद से मुक्त रहने, उत्साहित बने रहने, लम्बी सोच की ताकत देने, नकारात्मकता को नियंत्रित करने, स्फुरित विचारों पर नियंत्रण, निर्णय लेने की क्षमता में बढ़ोतरी और परिस्थितियों से सामना करने की ताकत देता है। मन पर नियंत्रण हमें चिंता से मुक्त रख सकता है। तेजी से दौड़ रही इस दुनिया में अधिकांश बीमारियों का कारण चिंता है। अगर चिंता न हो तो हम काम करने के लिए प्रेरित नहीं होंगे और चिंता अधिक हो तो किसी काम को करने लायक नहीं रहेंगे। ऐेसे में मजबूत मन या मानसिकता हमें चिंता पर नियंत्रण का अधिकार देती है।
चंद्रमा पर शिव का अधिकार है। पौराणिक दृश्यों में भी चंद्रमा को शिव के मस्तक पर शोभायमान बताया गया है। शिव की आराधना करने से हमारा चंद्रमा मजबूत होता है। इसीलिए श्रावण मास में ब्राह्मण रुद्र अष्टाध्यायी का पाठ कर शिव का प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। हर व्यक्ति रुद्री नहीं कर सकता। ऐसे में आम लोगों को शिव के महामंत्र का जाप करना चाहिए। यह मंत्र है “ऊं नम: शिवाय”। हम अपनी आम जिंदगी में इसे इतनी बार और इतने स्थानों पर सुनते हैं कि लगता है कि सामान्य मंत्र है, लेकिन कर्मकाण्ड के प्रकाण्ड ज्ञाताओं से लेकर तांत्रिकों तक का मत है कि यह सर्वश्रेष्ठ और महान मंत्र है। किसी के मन को शांति देने के लिए इस मंत्र की एक माला का जप पर्याप्त है। जो जातक मन पर नियंत्रण चाहते हैं वे इस श्रावण मास में रोजाना सुबह अथवा शाम के समय शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर जल अथवा दूध की धारा प्रवाहित करते हुए इस मंत्र का जाप करते रहें। कहने की जरूरत नहीं है कि रिजल्ट अपने आप मिलेगा।
श्रावण मास ही क्यों?
मानसूनी हवाएं भारत में उन ऋतुओं को बनाती हैं जिससे भारत देश विशिष्ट बना है। यही मानसून श्रावण मास में पूरे देश को बादलों से आच्छादित कर देता है। बादलों की उपस्थिति आम इंसान को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभावित करती है। एक ओर जहां रिमझिम बारिश हमें ऊर्जा से सराबोर कर देती है तो दूसरी ओर अवसाद भी पैदा कर सकती है। बादलों का जमावड़ा गर्मी कम करता है, लेकिन महिलाओं में साइको-सोमेटिक अवसाद पैदा करता है। इसे वातावरण जनित अवसाद कहते हैं। यानि मौसम में आए बदलाव का मानसिकता पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। इसी प्रभाव को न्यून करने के लिए श्रावण मास में व्रत करने, पूजा पाठ करने, विशेष तौर पर शिव आराधना करने और सादा भोजन करने की सलाह दी गई है।
हर राशि और हर नक्षत्र का जातक किसी भी लग्न में पैदा हुआ हो, वह शिव आराधना कर सकता है। चंद्रमा मजबूत होने से किसी भी जातक को कोई नुकसान नहीं होता। यहां तक कि चंद्रमा को अष्टमेष का दोष भी नहीं लगता। ऐसे में हर व्यक्ति को श्रावण मास में शिव आराधना कर अपने मन को मजबूत करने का उपाय उत्साह से करना चाहिए।
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उपायों का असर
ज्योतिष में उपायों के असर पर सालों से मंथन चल रहा है। एक ओर जहां भाग्य को पूर्व नियत मानकर बहुत से ज्योतिषियों ने उपायों को सिरे से खारिज कर दिया है, वहीं वैदिक ज्योतिष से लाल किताब तक हर स्तर पर उपायों की चर्चा की गई है। अगर तंत्र वाले हिस्से को छोड़ दिया जाए तो हम देखते हैं कि उपाय को फलित ज्योतिष के एक भाग के रूप में स्वीकार किया गया है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या उपायों का असर होता है। अब तक के मेरे अभ्यास में मैंने देखा है कि उपायों का असर होता है। अब भले ही यह प्रारब्ध में ही क्यों न बंधा हो। जातक का ज्योतिषी के पास आना, ज्योतिषी का उपाय बताना और उस उपाय का लागू होना तक प्रारब्ध का हिस्सा हो सकता है। मैं उपचार बताता हूं और जातक को इसका लाभ दिखाई देता है, मैं इसका अर्थ लगाता हूं कि उपचार प्रभावी होते हैं। ज्योतिष सीखने के शुरूआती दौर में मैंने खुद ने कई रत्नों और लाल किताब के उपचारों को अपनाया। भले ही अपेक्षित परिणाम नहीं आया, लेकिन अवस्था और मानसिकता में भारी अंतर महसूस किया।
पहला असर मानसिकता पर
उपायों का पहला असर मैं जातक की मानसिकता पर देखता हूं। इसका एक कारण यह भी है कि जिन जातकों ने एक ज्योतिषी के तौर पर मुझे मान्यता दी और मेरे बताए उपचारों को पूरी श्रद्धा के साथ किया उन्हें तुरंत और अच्छे परिणाम हासिल हुए। कई बार तो इतने जल्दी कि मुझे खुद भी आश्चर्य हुआ। मैं किसी भी जातक को उपचार बताने के साथ एक तय अवधि भी देता हूं, जिसमें उस उपचार का लाभ न होने पर उपचार बंद करने की नसीहत शामिल होती है। तय तिथि से पहले उपचार का असर मिलना हर बार मेरे लिए सुखद अनुभूति होती है। अगर ज्योतिष यह कहती है कि जो भाग्य में लिखा है वह होकर रहेगा, तो इसी विषय ने यह भी सिखाया है कि जो कुछ पहले से बदा है उसके प्रभाव में कमी या बढ़ोतरी करना संभव है। अब यह कमी या बढ़ोतरी कितनी और कैसे होती है, इस बारे में कहीं स्पष्ट नहीं किया गया है। संभवत: यह जातक की श्रद्धा और प्रयासों पर भी निर्भर करता है। ऐसे में ज्योतिषी की भूमिका कुछ कम हो जाती है।
उपचार ही नहीं कर पाते
ऐसा नहीं है कि एक जातक ज्योतिषी के पास जाए, उससे उपचार के बारे में जानकारी ले और वापस आकर उपचार कर ले और आगत समस्याओं से बच जाए। कई बार उपचार बता देने के बाद भी जातक उपचार नहीं कर पाते हैं। ऐसा नहीं है कि जातक के मन में श्रद्धा नहीं है अथवा जातक उपचार करना नहीं चाहता, लेकिन उपचार करने में विफल रहने वाले अधिकांश जातक लौटकर बताते हैं कि घटनाओं का चक्र कुछ इस तरह चला कि वे उपचार कर नहीं पाए। वैदिक ज्योतिष में जहां केवल दान, पूजा और जप वाले ही उपचार थे, वहीं लाल किताब और सुनहरी किताबों में ऐसे सरल और वैकल्पिक उपाय बताए गए हैं जो हर कोई आसानी से कर सकता है। इसके लिए अधिक प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। इसके बावजूद जातक उपाय नहीं कर पाते हैं।
कहां से क्या उपचार
वैदिक ज्योतिष में उपचार के लिए दान और जप के उपचार बताए गए हैं। सूर्य के लिए सूर्य, बुध के गणेश, गुरु के लिए सरस्वती, शुक्र के लिए देवी उपासना, शनि के लिए शनि महाराज, मंगल के लिए हनुमानजी और चंद्रमा के लिए शिव आराधना के उपचार बताए गए हैं। इससे खराब ग्रहों का प्रभाव कम होता है और अच्छे ग्रहों का प्रभाव बढ़ता है। दूसरी ओर दान के लिए ग्रहों से संबंधित वस्तुओं का दान करने से खराब प्रभाव का असर कम हो जाता है। अच्छे ग्रहों से संबंधित रत्नों और वस्तुओं को धारण करने की सलाह दी जाती है। जप के संबंध में ग्रहों की युति को लेकर भी देवताओं और अराधना के नियम तय किए गए हैं। इन्हें करने से शीघ्र लाभ होता है।
अगले लेख में हम उपचारों के संबंध में लाल किताब की भूमिका पर बात करेंगे। हालांकि लाल किताब को ज्योतिष की मुख्य ध्यारा से अलग माना गया है, लेकिन फिर भी उपचारों के मामले में लाल किताब की कोई तुलना नहीं है।
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तोते को भी मिलते हैं भविष्य के संकेत...
मैं यह बात कह रहा हूं और मुझे इस पर पूरा विश्वास है। आपको यकीन नहीं होता, न सही लेकिन यह बात सत्य है, समझने की जरूरत है।
...तो मुझे अब ज्योतिष का अध्ययन छोड़कर अब तोता पालना चाहिए।
नहीं...
क्यों?
बताता हूं
अभी अधिक समय नहीं बीता है जब मीडिया पर फुटबॉल के साथ पॉल बाबा राज कर रहे थे। वर्ल्ड कप में शामिल हुई टीमों के विश्लेषकों और खेल के जानकारों को भले ही कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन एक अदने से ऑक्टोपस ने खेल दर खेल सफल भविष्यवाणियां की। यह आसान काम नहीं था, लेकिन पॉल बाबा ने कर दिखाया। भारत में यह काम सैकड़ों वर्षों से होता रहा है, वह है तोते से भविष्यफल करवाने का। बहुत से लोग तोते वाले के पास जाते हैं, उसे दस या बीस रुपए देते हैं, तोते का मालिक तोते को पिंजरे से बाहर निकालता है, तोता तरतीब से फैलाए हुए कार्ड्स में से एक कार्ड का चुनाव करता है। तोते का मालिक उस कार्ड को हाथ में लेता है और पूछने वाले को उसका भविष्य बता देता है।
इस विधि को अंधविश्वास बोलने से पहले मैं ज्योतिष के ही एक दूसरे विषय के बारे में आपको जानकारी देना चाहूंगा। यह विधि पहले भी थी और आज भी है, लेकिन प्रोफेसर केएस कृष्णामूर्ति ने इस पर अधिकार के साथ लिखा और मेरे गुरुजी ने इसे विस्तार से समझाया। हो सकता है मैं आप तक इस विचार को सफलतापूर्वक पहुंचा पाउं।
इसे कहते हैं - - - - - - - - - - - - - - ओमेन
ज्योतिष की यह शाखा संकेतों के विज्ञान पर काम करती है। आपने पॉल (अरे अब पॉल बाबा की बात नहीं कर रहा मैं कह रहा हूं पॉल कोएलो) के बारे में सुना होगा। अरे वही एल्केमिस्ट वाले। उन्होंने अपने नॉवेल में लिखा कि जब हम किसी चीज को शिद्दत से चाहते हैं तो पूरी कायनात उसे हमसे मिलाने की साजिश करती है। (हां, आपको याद आ गया यह तो ओम शांति ओम फिल्म में था, लेकिन यकीन मानिए ओम शांति ओम में पॉल के उपन्यास से चुराया हुआ वाक्य है। इस फिल्म का दूसरा डॉयलॉग ऑरीजिनल हो सकता है 'मेरे दोस्त, पिक्चर अभी बाकी है')
हां, तो वापस बात करते हैं कि पॉल कोएलो के एल्केमिस्ट की। उन्होंने एक कीमियागर (रसायनों की मदद से सोना बनाने का प्रयास करने वाले) की सोने की खोज के साथ यह वाक्य जोड़ा था। इसका कांसेप्ट यह है कि पूरी सृष्टि के तार आपस में जुड़े हुए हैं। यदि हम दिल से चाहें तो सृष्टि हमें अपने इच्छित से मिलाने का जतन करती है।
बात उलझती जा रही है। मुझे थोड़ा आसान करना होगा।
इसे समझिए कि आपका चाहना और प्रकृति का चाहना एक ही बात है। इसे भले ही ऐसे मान लें कि जैसा प्रकृति चाहेगी वैसा ही आप चाहेंगे या जैसा आप चाहेंगे वैसा ही प्रकृति चाहेगी। या फिर दोनों ही बातें होती है, फर्क केवल इच्छाशक्ति का होता है। ओमेन आपकी या प्रकृति की इच्छा को समझने का विज्ञान है। अब ये संकेत कैसे मिलते हैं, कौन देता है, कितनी तीव्रता के होते हैं, कब मिलेंगे या क्या संकेत होंगे। इस बारे में कहीं भी स्पष्ट जानकारी नहीं है। बस संकेत होते हैं और इसे ग्रहण करने वाले होते हैं। उन्हें इंट्यूशनिस्ट या अंतर्ज्ञान प्राप्त कहा जाता है। पाल बाबा और तोता भले ही इन संकेतों को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं, लेकिन इनके आस पास के लोग इन्हें अपने अवचेतन से समझ पाते हैं। कुछ इन्हें व्यक्त कर देते हैं तो कुछ नहीं कर पाते। अंतर्ज्ञान प्राप्त व्यक्तियों के लिए यह कतिपय आसान होता है, लेकिन जिन लोगों के पास प्रकृति (इसमें सजीव और निर्जीव दोनों शामिल हैं) के प्रति संवेदनशीलता का अभाव होता है, वे इसे समझ नहीं पाते हैं।
अब बात ज्योतिषीय दृष्टिकोण की...
भद्रबाहु संहिता की एक टीका पंडित नेमीचंद शास्त्री ज्योतिषाचार्य ने लिखी है। प्राचीन ग्रंथों का विशद संदर्भ देने वाले शास्त्रीजी ने प्राचीन भारतीय साहित्य (प्रमुख रूप से संस्कृत कथाओं) में संकेतों के माध्यम से वातावरण के जरिए निकट भविष्य के ईष्ट और अनिष्ट के बारे में संकेतों का उल्लेख किया है। उदाहरण के तौर पर
“शत्रुओं के हमले की सूचना मिलने के बाद नगर के क्षत्रियों को शीशे में अपने सिर कटे हुए नजर आने लगे, पशुओं ने भोजन त्याग दिया, मयूर ने नृत्य करना छोड़ दिया, महिलाओं को जल में अपनी छवि विधवाओं जैसी दिखाई देने लगी।”
और ऐेसे सैकड़ों संकेत।
वे साहित्य के इस प्रयास के साथ प्राचीन भारत में संकेतों से भविष्य कथन का महत्व बताते हैं। भद्रबाहु संहिता में भी संकेतों के जरिए भविष्य को जानने के सूत्र बताए गए हैं। प्रश्न ज्योतिष में भी संकेतों का प्रबल महत्व है। एक जातक ज्योतिषी के पास आता है, अपना सवाल पूछता है, उसके आने के तरीके, बैठने के तरीके, सवाल पूछने के दौरान ज्योतिषी का स्वर (इडा या पिंगला नाड़ी का चलना), जातक का स्वर, आस पास के माहौल में घट रही घटनाएं और प्राकृतिक घटनाएं सवाल का जवाब देना शुरू कर देती हैं। जातक जिस काल में प्रश्न करता है, उसी काल अवधि की कुण्डली बनाई जाती है। मान लीजिए कोई जातक 16 सितम्बर 2011 को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर एक प्रश्न पूछता है, तो उसकी कुण्डली कुछ इस तरह बनेगी।
यह उस प्रश्न की ही कुण्डली है। अब ज्योतिषी प्रश्न का भविष्य बताएगा। प्रश्न पूछने के दौरान चंद्रमा सातवें स्थान पर है, तो बहुत अधिक संभावना है कि प्रश्न व्यापार में साझेदार अथवा पत्नी के संबंध में हो सकता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह जानकारी मिलने के साथ ही आस पास की घटनाओं से मिल रही जानकारी को इसमें समाहित करने पर हमें पुख्ता जवाब भी मिल जाएगा। चूंकि चंद्रमा केतू के नक्षत्र में विचरण कर रहा है अत: बारहवां भाव भी इसमें शामिल हो जाएगा। लग्न तुला और लग्नेश शुक्र का भी बारहवें स्थान पर होना, बाहरी संबंधों का सूचक है। इस तरह समय विशेष की कुण्डली हमें आगत के संकेत देती है और ओमेन (प्राकृतिक घटनाओं से मिले संकेत) हमें सटीक उत्तर देने में मदद करते हैं।
तो यह है ज्योतिष और ओमेन का संबंध.. अब मैं आमंत्रित करता हूं आपके सवाल।
- अगर आपको ओमेन समझ में आया है तो क्या इस लेख में और कुछ शामिल किए जाने की जरूरत है।
- अगर मेरी बात समझ से परे है तो आपको और क्या जानकारी की जरूरत है।
- क्या आपको भी वातावरण की घटनाओं से भविष्य के कभी संकेत मिले हैं।
- क्या आपको लगता है कि प्रकृति खुद हमें संकेत देती है।
और ऐसी ही ढेरों जिज्ञासाओं का मुझे इंतजार रहेगा। ईश्वर आपके दिन को मंगलमय बनाए...
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प्रश्न कुण्डली और फलादेश
कई बार लोगों की उलझन होती है कि हमारा जन्म समय या तिथि सही ज्ञात नहीं है। ऐसे में ज्योतिष संबंधी फलादेश कैसे किए जाएं। ज्योतिष में इसका सटीक जवाब प्रश्न कुण्डली है। प्रश्न कुण्डली में कार्य भाव और कार्येश की भूमिका अहम होती है। कार्य से यहां अर्थ उस विचार या इच्छा से है जिसके लिये प्रश्न कुण्डली का निर्माण किया गया है। जैसे अगर कोई व्यक्ति यह जानना चाहता है कि क्या वह यात्रा करेगा, तो इस स्थिति में कार्यभाव तृतीय भाव हो गया। कार्येश से अभिप्राय कुण्डली के उस भाव से है, जिससे संबन्धित प्रश्न किया गया है। इस प्रश्न में यात्रा के विषय में कहा गया है तो तृ्तीय भाव का स्वामी कार्येश हो गया। इस प्रकार प्रश्न कुण्डली में कार्य भाव और कार्येश का संबन्ध प्रश्न की सफलता दर्शाता है। सप्तम भाव वह व्यक्ति या विषय वस्तु है, जिससे संबन्धित प्रश्न किया गया है। उस व्यक्ति की स्थिति को समझने के लिये सांतवें घर का विश्लेषण किया जाता है.
प्रश्न कुण्डली वास्तव में समय विशेष की एक कुण्डली है जो उस समय बनाई जाती है, जिस समय जातक प्रश्न पूछता है। इस कुण्डली से जातक के प्रश्न का ही भविष्य देखने का प्रयास किया जाता है। इस विधि में सवाल कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर तात्कालिक समस्या ही सवाल होती है। ऐसे में समस्या समाधान का जवाब देने के लिए प्रश्न कुण्डली सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है। ध्यान रखने की बात यह है, कि प्रश्न के सामने आते ही उसकी कुण्डली बना ली जाए। इससे समय के फेर की समस्या नहीं रहती। इसके साथ ही जातक की मूल कुण्डली भी मिल जाए और वह प्रश्न कुण्डली को इको करती हो तो समस्या का हल ढूंढना और भी आसान हो जाता है। कई बार जातक जो मूल कुण्डली लेकर आता है, वह भी संदेह के घेरे में होती है। ओमेन (संकेतों का विज्ञान) बताता है कि जातक का ज्योतिषी के पास आने का समय और जातक की कुण्डली दोनों आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। ऐसे में प्रश्न कुण्डली बना लेना फलादेश के सही होने की गारंटी को बढ़ा देता है। पूर्व में जब हाथ से कुण्डली बनाई जाती थी, तब हाथों हाथ प्रश्न कुण्डली बनाना संभव नहीं था, लेकिन वर्तमान दौर में कंम्प्यूटर और सक्षम सॉफ्टवेयर की मदद से जब हाथों हाथ कुण्डलियां बनाई जा रही है, तब ज्योतिषी जातक की मूल कुण्डली के साथ ही प्रश्न कुण्डली बना लेते हैं। यह फलादेश के काम को आसान बना देता है।
छद्म प्रश्नों की समस्या
प्रश्न कुण्डली के साथ बड़ी समस्या है जातक के सवाल का सही नहीं होना। ज्योतिष की जिन पुस्तकों में प्रश्नों के सवाल देने की विधियां दी गई हैं उन्हीं में छद्म प्रश्नों से बचने के तरीके भी बताए गए हैं। इसका पहला नियम यह है कि ज्योतिषी को टैस्ट करने के लिए पूछे गए सवालों का जवाब कभी मत दो। ऐसा इसलिए कि ओमेने के सिद्धांत के अनुसार छद्म सवाल का कोई उत्तर नहीं होता। जातक का सवाल सही नहीं होने पर प्रश्न और कुण्डली एक-दूसरे के पूरक नहीं बन पाते हैं। ऐसे में प्रश्न कुण्डली बनाने के साथ ही ज्योतिषी को प्रश्न के स्वभाव का प्रारंभिक अनुमान भी कर लेना चाहिए। इससे प्रश्न में बदलाव की संभावना कम होती है।
कमोबेश एक जैसे सवाल
ज्योतिष कार्यालय चलाने वाले लोग जानते हैं कि एक दिन में एक ही प्रकार की समस्याओं वाले लोग अधिक आते हैं। इसका कारण यह है कि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति होती है उससे पीडि़त होने वाले लोगों का स्वभाव भी एक जैसा ही होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि समान राशि या कुण्डली वाले लोगों को एक जैसी समस्याएं होगी बल्कि ग्रह योगों की समान स्थिति से समान स्वभाव की समस्याएं सामने आएंगी। मेरा अनुभव बताता है कि जिस दिन गोचर में चंद्रमा और शनि की युति होगी, तो उस दिन मानसिक समस्याओं से घिरे लोग अधिक आएंगे। हां, मानसिक समस्याओं का प्रकार लग्न और अन्य ग्रहों के कारण बदल जाता। कोई सिजोफ्रीनिया से पीडि़त हो सकता है तो कोई क्रोनिक डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। किसी को दिमागी सुस्ती की समस्या हो सकती है तो कोई साइको-सोमेटिक डिजीज से ग्रस्त हो सकता है। इस तरह प्रश्न कुण्डली से एक ओर जातक का विश्लेषण आसान हो जाता है तो दूसरी ओर भूतकाल स्पष्ट करने के बजाय भविष्य कथन में अधिक ध्यान लगाया जा सकता है।
जन्म समय की समस्या का समाधान
पिछले कुछ सालों में अस्पतालों में शिशु जन्म की स्थितियां बढ़ने के कारण जन्म समय कमोबेश सही मिलने लगे हैं। पर अब भी जन्म समय को लेकर कई तरह की उलझनें बनी हुई है। आमतौर पर शिशु के गर्भ से बाहर आने को ही जन्म समय माना जाता है। इसके अलावा माता से नाल के कटने या पहली सांस लेने का भी जन्म समय लेने के मत ज्योतिष में देखने को मिलते हैं। सही जन्म समय को लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में प्रश्न कुण्डली ऐसा जवाब है जिससे जन्म तिथि और जन्म समय के बिना फलादेश किया जा सकता है। सामान्यता: प्रश्न कुण्डली की आयु वार्षिक मानी गई है। प्रश्न कुण्डली में लग्न समय निश्चित होता है। प्रश्न कर्ता की चिन्ताओं की जानकारी चन्द्रमा से देखी जा सकती है। प्रश्न कुण्डली में लग्न भाव में बली चन्द्र की स्थिति निवास चिन्ता, दूसरे भाव में धन, तीसरे भाव में घर से दूर रहने की चिन्ता, चौथे भाव में मकान/ पानी से संबधित परेशानी, पांचवे भाव में संतान, छठे भाव में ऋण, सांतवेंभाव में विवाह या साझेदारी, आंठवें भाव में पैतृक संम्पति में या अप्रयाशित लाभ, नवम भाव में चन्द्र लम्बी दूरी की यात्रा, दशम भाव में आजीविका, एकादश भाव में आय वृ्द्धि / पदोन्नति, द्वादश भाव में बली चन्द्र विदेश यात्रा से जुडी चिन्ताएं होने का संकेत देता है.
प्रश्न कुण्डली के फायदे
- जन्म समय का फेर नहीं होता
- अगर आपको पास सॉफ्टवेयर है तो यह हाथों-हाथ तैयार हो जाती है
- सही सवालों के जवाब स्पष्ट मिलते सकते हैं
- हर तरह के सवाल का जवाब दिया जा सकता है, बशर्ते सवाल सही हो।
- जिन लोगों को जन्म समय नहीं हैं, उनके अलावा जिन लोगों की गलत कुण्डली बनी हुई है वे भी अपनी चिंताओं का सही जवाब ले सकते हैं।
- भविष्य कथन के बजाय मौजूदा समस्याओं से संबंधित कई सवालों के सटीक जवाब मिलते हैं
- पूर्ण भविष्य कथन के बजाय ऐसे सवाल जिनके हां या ना में उत्तर होते हैं उनके अपेक्षाकृत सटीक जवाब मिलते हैं।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
फलादेश में कारकों की भूमिका...
कारक विचार फलादेश की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। कई बार जातक जब समस्या बताता है तो नए ज्योतिषियों को पता ही नहीं चलता है कि इसे किस भाव या ग्रह से देखें। ऐसे में जितने कारक फौरी तौर पर ध्यान में होते हैं, उन्हीं के अनुसार ज्योतिषी निष्कर्ष पेश करने की कोशिश करते हैं। कई बार तो यह भी स्पष्ट नहीं हो पाता है कि सवाल का जवाब कुण्डली में कहां खोजा जाए। हेमवंता नेमासा काटवे की कारकत्व विचार पुस्तक में इतने कारक दिए गए हैं कि लगता है कि हर सवाल का जवाब दिया जा सकता है। इसके अलावा केएस कृष्णामूर्ति की फण्डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्ट्रोलॉजी पुस्तक में कारकों की एक लंबी शृंखला उपलब्ध होती है। अगर हमें कारकों के बारे में स्पष्ट जानकारी हो तो कमोबेश हर सवाल का जवाब से दिया जा सकता है। आइए देखते हैं कि भावों के अनुसार कारक कौनसे होते हैं।
प्रथम भाव
इस भाव का कारक सूर्य है। यह सबसे प्रमुख भाव है। इसी भाव की राशि, इसमें बैठे ग्रह और इसके अधिपति ग्रह की स्थिति से जातक की स्थिति की प्राथमिक जानकारी मिल जाती है। बाकी भावों की तुलना में जातक की आत्मा को जानने का यह सबसे महत्वपूर्ण भाव है। जातक की जन्मकुण्डली अथवा प्रश्नकुण्डली के किसी सवाल के जवाब में उसके स्वास्थ्य, जीवंतता, सामूहिकता, व्यक्तित्व, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, आत्मप्रकाश, आत्मा आदि को देखा जाता है। हर सवाल के जवाब में पहले लग्न देखना ही होगा। ऐसे में लग्न की राशि, इसमें स्थित ग्रह और लग्न पर प्रभावों के अनुसार कारकत्व का निर्धारण किया जाएगा।
दूसरा भाव
इस भाव का कारक गुरु है। ज्योतिष में इसे धन भाव कहा जाता है। इससे बैंक एकाउण्ट, पारिवारिक पृष्ठभूमि, कई मामलों में आंखें देखी जाती है। यह भाव संसाधन, नैतिक मूल्य और गुणों के बारे में बताता है। किसी भी जातक का परिवार कितना बड़ा या छोटा है अथवा स्थावर संपत्ति की क्या स्थिति है, इसी भाव से देखेंगे।
तीसरा भाव
इस भाव का कारक मंगल है। इसे सहज भाव भी कहते हैं। कुण्डली को ताकत देने वाला भाव यही है। भाग्य के इतर अपनी बाजुओं की ताकत से कुछ कर दिखाने वाले लोगों का यह भाव बहुत शक्तिशाली होता है। बौद्धिक विकास, साहसी विचार, दमदार आवाज, प्रभावी भाषण एवं संप्रेषण के अन्य तरीके इस भाव से देखे जाएंगे। छोटी अवधि की यात्राएं और छोटे भाई के लिए भी इसी भाव को देखा जाएगा।
चौथा भाव
इसका कारक चंद्रमा है। यह सुख का घर है। किसी के घर में कितनी शांति है इस भाव से पता चलेगा। इसके अलावा माता के स्वास्थ्य और घर कब बनेगा जैसे सवालों में यह भाव प्रबल संकेत देता है। शांति देने वाला घर, सुरक्षा की भावना, भावनात्मक स्थिति, पारिवारिक प्रेम जैसे बिंदुओं के लिए हमें चौथा भाव देखना होगा। यह भाव वाहन सुख के बारे में भी जानकारी देता है।
पांचवां भाव
इसका कारक गुरु है। इसे उत्पादन भाव भी कह सकते हैं। इंसान क्या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्य और पुत्र से लेकर पेटेंट वाली खोजें और कृतियां तक शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा आनन्दपूर्ण सृजन, सुखी बच्चे, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्द, सत्कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखा जाता है।
छठा भाव
इस भाव का कारक मंगल है। इसे रोग का घर भी कहते हैं। प्रेम के सातवें घर से बारहवां यानि खर्च का घर है। शत्रु और शत्रुता भी इसी भाव से देखे जाते हैं। कठोर परिश्रम, सश्रम आजीविका, स्वास्थ्य, घाव, रक्तस्राव, दाह, सर्जरी, डिप्रेशन, उम्र चढ़ना, कसरत, नियमित कार्यक्रम के सम्बन्ध में यह भाव संकेत देता है।
सातवां भाव
इसका कारक शुक्र है। लग्न को देखने वाला यह भाव किसी भी तरह के साथी के बारे में बताता है। राह में साथ जा रहे दो लोगों के लिए, प्रेक्टिकल के लिए टेबल शेयर कर रहे दो विद्यार्थियों के लिए, एक ही समस्या में घिरे दो साथ-साथ बने हुए लोगों के लिए यह भाव देखा जाएगा। जीवनसाथी, व्यावसायिक भागीदार, करीबी दोस्त, सुंदरता, लावण्य जैसे विषय इसी भाव से जुड़े हुए हैं। सभी विपरीत लिंग वालों के लिए।
आठवां भाव
इसका कारक शनि है। स्वाभाविक रूप से गुप्त क्रियाओं, अनसुलझे मामलों, आयु, धीमी गति के काम इससे देखे जाएंगे। इसके अलावा दूसरे के संसाधनों का सृजन में इस्तेमाल, जिंदगी की जमीनी सच्चाइयां, तंत्र-मंत्र के लिए यही भाव है।
नौंवां भाव
इसका कारक भी गुरु है। इसे भाग्य भाव भी कहते हैं। पिछले जन्म में किए गए सत्कर्म प्रारब्ध के साथ जुड़कर इस जन्म में आते हैं। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा से अधिक कब और कितना मिल सकता है। धर्म, अध्यात्म, समर्पण, आशीर्वाद, बौद्धिक विकास, सच्चाई से प्रेम, मार्गदर्शक जैसे गुणों को भी इसमें देखा जाता है।
दसवां भाव
इसके कारक ग्रह अधिक हैं। गुरु, सूर्य, बुध और शनि के पास दसवें घर का कारकत्व है। हम जो सोचते हैं वही बनते हैं। यह भाव हमारी सोच को कर्म में बदलने वाला भाव है। हर तरह का कर्म दसवें भाव से प्रेरित होगा। बस बाध्यता इतनी है कि क्रिया हमारी होनी चाहिए। प्रतिक्रिया के बारे में यह भाव नहीं बताता। व्यावसायिक सफलताएं, साख, प्रसिद्धि, नेतृत्व, लेखन, भाषण, सफल संगठन, प्रशासन, स्किल बांटना जैसे काम यह भाव बताता है।
ग्यारहवां भाव
इसका कारक भी गुरु है। यह ज्यादातर उपलब्धि से जुड़ा भाव है। आय, प्रसिद्ध, मान सम्मान और शुभकामनाएं तक यह भाव एकत्रित करता है। हम कुछ करेंगे तो उस कर्म का कितना फल मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह भाव अधिक स्पष्ट करता है। यह कर्म का संग्रह भाव है। उपलब्धि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। धैर्य, विकास और सफलता भी इसी भाव से देखे जाते हैं।
बारहवां भाव
इसका कारक शनि है। यह खर्च का घर है। हर तरह का खर्च, शारीरिक, मानसिक, धन और जो भी खर्च हो सकते हैं सभी इसी से आएंगे। विद्या का खर्च भी इसी भाव से होता है। इस कारण बारहवें भाव में बैठा गुरु बेहतर होता है ग्यारहवें भाव की तुलना में क्योंकि सरस्वती की उल्टी चाल होती है, जितना संग्रह करेंगे उतनी कम होगी और जितना खर्च करेंगे उतनी बढ़ेगी। इसके अलावा बाहरी सम्बन्धों, विदेश यात्रा, धैर्य, ध्यान और मोक्ष इस भाव से देखे जाएंगे।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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बुधवार, फ़रवरी 08, 2012
Naptune cycle in houses
नेप्च्यून (Naptune) को एक राशिचक्र (Cycle) पूरा करने में तकरीबन 164 साल का समय लगता है। एक सामान्य व्यक्ति को इतनी लंबी अवधि तक जिंदा नहीं रहता है। दूसरी बात यह भी है कि कोई एक ज्योतिषी नेप्च्यून के प्रभावों का अध्ययन करने जितना भी नहीं जी सकता। ऐसे में प्राचीन घटनाओं, महापुरुषों की जीवनियों और इतिहास के साक्ष्यों को नेप्च्यून के गोचर के साथ मिलाकर अध्ययन कर कुछ निष्कर्ष निकाले गए हैं। रहस्य के मालिक इस ग्रह के विभिन्न भावों में प्रभावों के बारे में कई जगह बताया गया है। नेप्च्यून के अधिकार की राशि गुरु की दूसरी और भचक्र की आखिरी राशि मीन दी गई है। इसी के साथ बारहवां भाव भी नेप्च्यून का प्रिय भाव बताया गया है। इस नए नवेले और धीमे चलने वाले ग्रह के बारे में कुछ पश्चिमी पुस्तकों से मिली जानकारी को संक्षेप में यहां पेश करने का प्रयास कर रहा हूं। इसी के साथ कुण्डलियों पर इस ग्रह के स्थाई प्रभाव के बारे में अध्ययन जारी है। इसे master of disguise भी कहा जाता है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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मंगलवार, दिसंबर 27, 2011
यहां कम्प्यूटर खुद एक वायरस है...
ज्योतिष के साथ एक बड़ी समस्या है कि नए उपकरणों और साधनों का पुख्ता ज्योतिषीय अर्थ नहीं निकाला जा रहा। ऐसे में छोटी-बड़ी हर वस्तु और साधन के कारकत्व की बात कर रहा ज्योतिषी मोबाइल और कम्प्यूटर जैसे साधनों के बारे में बात होते ही चुप हो जाता है। अगर कोई ज्योतिषी इस बारे में कोई राय रखता भी है तो वह निजी ही है। मैं अपने इस ब्लॉग के मंच से सभी ज्योतिषियों को आमंत्रित करता हूं कि मेरे एक अनुभव को सही या गलत होने पर अपनी राय दें। मेरी स्पष्ट राय है कि कम्प्यूटर आधुनिक युग में शुक्र का नाश करने वाला है। जिस जातक को शुक्र से लाभ मिलने वाले हैं, उसे कम्प्यूटर से तुरंत प्रभाव से दूर कर देना चाहिए। मेरी इस राय के पीछे मेरे कुछ प्रयोग समाहित हैं.. आइए उन प्रयासों और प्रयोगों की चर्चा करते हैं।
मेरे एक जातक की कुण्डली में तुला लग्न और शनि की महादशा चल रही है। शनि में शनि का अंतराल चल रहा था, तब तक छिद्र दशा होने के नाते मैंने उसे कहा कि अभी सही समय आने के लिए तुम्हें कुछ दिन इंतजार करना पड़ेगा। जातक ने धैर्य रखा और इंतजार किया। शनि में बुध का अंतर आने के साथ ही जातक को अपने कार्य-व्यवसाय में अच्छा लाभ मिलने लगा। आमतौर पर मैं अपने जातकों के साथ जुड़ा रहता हूं, लेकिन जहां मुझे लगता है कि अब कुछ अर्से तक समस्या नहीं आएगी तो मेरा ध्यान हट जाता है। जो ज्योतिष के जानकार हैं वे समझ सकते हैं कि तुला लग्न में कारक ग्रह की दशा आने के बाद अधिक समस्याएं शेष नहीं रहती, लेकिन एक दिन उसी जातक का फोन आया कि वह कठिन समस्या में है। मैंने उसकी कुण्डली देखी और कहा कि शनि भगवान के यहां चक्कर लगाना शुरू कर दो, समय वैसे भी अच्छा चल रहा है, फायदा बढ़ेगा। (कई बार जातकों का आग्रह होता है कि अच्छे समय का अधिकतम उपयोग कैसे किया जाए, मैंने इस जातक को भी इसी श्रेणी में रखा था)। जातक ने शनि मंदिर जाना शुरू कर दिया, लेकिन कुछ दिन बाद एक बार फिर उसका फोन आया कि समस्या ज्यों की त्यों है और आय के स्रोत ठप हो गए हैं। यह स्थिति चिंताजनक थी। जातक के प्रतिष्ठान का वास्तु भी मेरा ही देखा हुआ था, सो उसी दिन मिलने के लिए गया। वहां वास्तु संबंधी कुछ फेरबदल दीपावली की सफाई में कर दिए गए थे, लेकिन बहुत बड़े बदलाव नहीं थे। मैंने सोचा वास्तु संबंधी बदलाव के कारण बाधा आई होगी। जरूरी फेरबदल भी करवा दिए गए, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। यह मेरे लिए निजी तौर पर बहुत अधिक हैरानी की बात थी और जातक भी हताश होने लगा था। मेरे पास दो ही तरीके थे, पहला कि मैं जातक को अपने गुरुजी के पास ले चलूं और दूसरा किसी तांत्रिक की सहायता ली जाए।
अगर जातक को गुरुजी के पास लेकर जाता तो गुरुजी पूछते कि मैंने अपने स्तर पर अब तक क्या प्रयास किए हैं। फौरी तौर पर जब कोई समस्या दिखाई नहीं दे रही तो, जातक क्यों परेशान है। इन सवालों को जवाब टेढ़े थे, इस परीक्षा के लिए मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं था, सो तांत्रिकजी के पास चलने का निर्णय किया गया। तांत्रिकजी ने उसी समय अपने घर बैठे बैठे प्रयोग कर दिया। अब किया या नहीं, पता नहीं, या तांत्रिकजी का निशाना गलत लग गया, या जो भी कारण रहा, एक सप्ताह और सूखा निकल गया। अब जातक के गले तक आया पानी नाक तक पहुंच चुका था। मैंने गुरुजी के पास जाने से पहले आखिरी प्रयास किया। जातक के पुराने रिकॉर्ड को याद करते हुए मैंने उसे कम्प्यूटर से दूर होने की सलाह दी। जातक ने बाकी सबकुछ मेरे कहने अनुसार लगा रखा था, लेकिन एक कम्प्यूटर अपने रेगुलर कस्टमर डाटा के लिए उसने अपने डेस्क पर ही रख रखा था। कम्प्यूटर दूर करने की सलाह का निशाना तीर की तरह सही लगा। अगले दो दिन में काम-काज में फिर सुधार होने लगा। एक बार रास्ता खुलने के साथ ही जातक का हौसला बढ़ा और फिर से पुरानी लय प्राप्त कर ली। लय पकड़ने के साथ ही जातक ने मुझे एक मोटी रकम का चैक दिया और कहा कि गुरुजी फरवरी तक मेरा टारगेट पूरा करा दो, यह चैक भुना लेना।
अब ये ठेकेदारी वाला काम मुझे मुश्किल लग रहा है। ![]()
निष्कर्ष - कम्प्यूटर या कम्प्यूटर जैसा उपकरण शुक्र का शोषण करता है। ऐसे में शुक्र से लाभान्वित होने वाले जातकों और शुक्र की महादशा वाले जातकों को कम्प्यूटर से यथासंभव दूर रहने का प्रयत्न करना चाहिए।
अब बात शुक्र के शोषण की
शुक्र ग्रह के बारे में कोई राय स्थापित करने से पहले इसकी प्रकृति को समझना जरूरी है। पूर्व में भी कई बार शुक्र का जिक्र आ चुका है और भोग व विलासिता के संदर्भ में शुक्र को बहुत से मामलों में गलत भी समझा जाता रहा है। जबकि शुक्र गुणों में देवताओं के गुरु ब्रहस्पति के समकक्ष है, क्यों शुक्र खुद गुरु है, लेकिन राक्षसों के। जब तुला लग्न हो तो इस लग्न में शुक्र लग्न और अष्टम भाव का अधिपति बनता है। इस लग्न में शनि कारक ग्रह है। शुक्र को शनि का चेला बताया गया है। यानि जहां शनि का नुकसान हो रहा होता है वहां शुक्र अपना बलिदान कर शनि की रक्षा करता है। कप्यूटर एक सेल्फ ल्युमिनेटेड (स्व प्रकाशित) इकाई है। इसकी स्क्रीन पर सदैव जगमगाते दृश्य तैरते रहते हैं। अगर हम इंटरनेट पर होते हैं तो इन दृश्यों के बदलने की तीव्रता और अधिक बढ़ जाती है। जातक के पास अनलिमिटेड इंटरनेट था, जिस पर वह लगातार सर्फिंग कर रहा था। ऐसे में शनि (नियमितता और अनुशासन) को नुकसान पहुंच रहा था। ऐसे में शनि के नुकसान को शुक्र ने भोगा और जातक की आय के स्रोत बेहतरीन दशा के बावजूद बाधित हो गए। जैसे ही जातक की टेबल से कम्प्यूटर को हटाया गया, शुक्र फिर से मजबूत हुआ और आय के स्रोत खुल गए। यह मेरा ऑब्जर्वेशन है।
मनोरंजन के अन्य नियमित साधन
नई सदी में हमें मनोरंजन के कम्प्यूटर की तरह कई साधन मिले हैं, जो हमारे दिनचर्या और जीवनचर्या के महत्वपूर्ण भाग का दोहन कर रहे हैं। कहने को यह सूचना क्रांति है, लेकिन हम सूचनाओं के इतर बहुत से दूसरे उपांगों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। मसलन टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल। ये सीरियल अच्छे मायने में हमें बेहतरीन फिक्शन अथवा नॉन फिक्शन से रूबरू कराते हैं, लेकिन आधे घंटे का एक कार्यक्रम करीब दस से पंद्रह मिनट का विज्ञापन समय भी लपेटे हुए होता है। अब चूंकि हम इसके प्रति सजग नहीं है, सो वह समय हमारी इच्छा के बगैर खाया जा रहा है। इसी तरह मोबाइल उपकरणों में भी ऐसे में तमाम साधन मुहैया कराए गए हैं जो हमारा समय, श्रम, धन और चेतना का ह्रास कर रहे हैं। इनके संदर्भ में भी शुक्र का अध्ययन और किए जाने की जरूरत महसूस होती है।
आपको भी मोबाइल उपकरण, टीवी, कम्प्यूटर अथवा आईपोड जैसे उपकरणों से करीबी और दूरी से कोई अनुभव हुए हों तो अवगत कराइएगा... इंतजार रहेगा।
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रविवार, अक्टूबर 23, 2011
कहां रहे पैसा?
कई लोगों को लगता है कि उनका पैसा बैंक में पडा सड़ रहा है तो कई लोग बाजार में पैसा लगाकर पछताते हैं। ऐसा एक ही व्यक्ति के साथ भी हो सकता है। यानि जब पैसा बैंक में हो तो उसे बाजार चढ़ता हुआ दिखाई देता है और जब पैसा बाजार में हो तो बैंक की ब्याज दरें अधिक आकर्षक नजर आती हैं। देखने में ऐसा लगता है कि यह व्यक्ति विशेष की मानसिकता से जुड़ा मसला है लेकिन गौर किया जाए तो यह महज टाइमिंग की समस्या है।
ज्योतिष की नजर में जब कुण्डली का दूसरा भाव ऑपरेट हो रहा हो तो पैसे को बैंक में पड़ा रहने देने में ही समझदारी है और जब ग्यारहवां भाव ऑपरेट हो रहा हो तो अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के प्रयास करने चाहिए। हालांकि बहुत से व्यापारियों या कह दें पुराने बणियों को ज्योतिष की इन मूल बातों की जानकारी होती है। एक सामान्य व्यक्ति के समझने के लिए बता देता हूं कि भाव कुल बारह होते हैं और राशियां भी बारह होती हैं। ये क्रमश: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन होती हैं। मेष और वृश्चिक राशियों का स्वामी मंगल, वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्या का बुध, कर्क का चंद्रमा, सिंह का सूर्य, धनु और मीन का गुरु और मकर व कुंभ राशि का अधिपति शनि होता है। जिस जातक को पता करना हो वह इन राशियों को घड़ी के आकार में जमा ले। मेष से मीन तक। जहां घड़ी की सुई एक बजाती है वहां मेष और जहां बारह बजाती है वहां मीन। इस तरह तैयार हो गई आपकी कुण्डली जिसमें भाव भी स्पष्ट नजर आएंगे। अब आपकी कुण्डली में जिस राशि में जो ग्रह बैठा है उसे उसी में टिका दें। एक जगह लिखा होगा लग्न। इस लग्न वाले अंक को सबसे ऊपर ले आए। इससे लग्न कुण्डली बन जाएगी। अब कुण्डली में देखें कि कौनसे ग्रह की दशा चल रही है। उदाहरण के तौर पर लें तो वृष लग्न के जातक की बुध की दशा चल रही हो। ऐसे में दूसरे भाव का अधिपति बुध हुआ तो ऐसे जातक को मोटे तौर पर बैंक या स्थाई बांड में अपनी अधिकांश राशि जमा रखनी चाहिए। इसी कुण्डली में अगर गुरु की दशा चल रही हो तो इस जातक को कई जगह निवेश कर अपने धन को बढ़ाने का अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए। क्योंकि गुरु एकादश भाव का अधिपति हुआ और यह धनलाभ के योग बनाएगा। इसी तरह हर कुण्डली का निर्णय निकाला जा सकता है।
सही टाइमिंग पर किया गया निवेश या बैंक में रखा गया धन अधिक से अधिक सुरक्षा और लाभ दिलाएगा। अब सवाल यह है कि किसी व्यक्ति का व्यापार चल रहा हो तो उसे दशाओं के अनुसार धन का क्या उपयोग करना चाहिए। इस पर चर्चा अगले लेख में...
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गुरुवार, अक्टूबर 13, 2011
पाखण्डी तर्क और ईश्वर की आवधारणा
एक नास्तिक प्रोफेसर दर्शनशास्त्र की कक्षा में अपने छात्रों से चर्चा कर रहे थे। विषय था ईश्वर के संबंध में विज्ञान की समस्या। प्रोफेसर ने नए विद्यार्थियों में से एक को खड़ा किया और पूछा...
प्रोफेसर : तो क्या तुम ईश्वर में यकीन करते हो?
विद्यार्थी : बिल्कुल, सर।
प्रोफेसर : क्या ईश्वर अच्छे हैं?
विद्यार्थी : यकीनन।
प्रोफेसर : क्या ईश्वर में सभी शक्तियां निहित हैं?
विद्यार्थी : हां।
प्रोफेसर : मेरा भाई कैंसर से मर गया, उसने ईश्वर से खुद को बचाने की प्रार्थना की थी। हम किसी आम व्यक्ति को भी पुकारें तो वह मदद के लिए आता है, लेकिन मेरे भाई की सहायता के लिए ईश्वर नहीं आए।
विद्यार्थी चुप रहा...
प्रोफेसर : तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है ?, ठीक है मेरे युवा दोस्त दोबारा शुरू करते हैं, क्या ईश्वर अच्छे हैं?
विद्यार्थी : हां।
प्रोफेसर : क्या शैतान अच्छा है?
विद्यार्थी : नहीं।
प्रोफेसर : शैतान कहां से आते हैं?
विद्यार्थी : ईश्वर के जरिए...
प्रोफेसर : बिल्कुल सही, बेटा, बताओ क्या दुनिया में बुराई है?
विद्यार्थी : हां।
प्रोफेसर : ईश्वर ने हर चीज बनाई है, और बुराई हर जगह है, क्यों ?
विद्यार्थी : हां।
प्रोफेसर : तो बुराई को किसने जन्म दिया ?
(विद्यार्थी ने कोई जवाब नहीं दिया)
प्रोफेसर : दुनिया में बीमारी, मौत, घृणा और गंदगी जैसी भयावह चीजें भी हैं?
विद्यार्थी : हां, सर।
प्रोफेसर : उन्हें किसने बनाया है?
(विद्यार्थी के पास कोई जवाब नहीं था)
प्रोफेसर : विज्ञान कहता है कि दुनिया को महसूस करने के लिए आपने पास पांच संवेदक हैं। इन्हीं से आप अपने आस पास की दुनिया को देखते और समझते हैं। बेटा, बताओ क्या तुमने कभी ईश्वर को देखा है?
विद्यार्थी : नहीं, सर।
प्रोफेसर : हमें बताओ, क्या तुमने कभी ईश्वर की आवाज सुनी है ?
विद्यार्थी : नहीं, सर।
प्रोफेसर : क्या तुमने उसे कभी महसूस किया है, उसका स्वाद या सुगंध ली है ? अपने किसी भी जैविक संवेदक से ईश्वर को महसूस किया है?
विद्यार्थी : नहीं, सर। मेरा ऐसा कोई अनुभव नहीं है।
प्रोफेसर : और तुम, अब भी ईश्वर में यकीन करते हो ?
विद्यार्थी : हां।
प्रोफेसर : अनुभव से प्राप्त ज्ञान, स्वाद और प्रदर्शन के तरीकों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है। इस पर तुम क्या कहोगे, बेटा ?
विद्यार्थी : कुछ नहीं। मैं केवल उस पर विश्वास करता हूं।
प्रोफेसर : हां, विश्वास। और यही विज्ञान के साथ समस्या है।
विद्यार्थी : प्रोफेसर, क्या उष्मा (HEAT) जैसी कोई चीज होती है ?
प्रोफेसर : हां।
विद्यार्थी : और शीत (COLD) जैसी कोई चीज होती है ?
प्रोफेसर : हां।
विद्यार्थी : नहीं, शीत कुछ नहीं होती।
(अब कक्षा में गंभीरता आ गई)
विद्यार्थी : सर, आपके पास उष्मा हो सकती है, बहुत सारी उष्मा या कम उष्मा, लेकिन शीत जैसा कुछ नहीं होता, शून्य से नीचे के तापमान पर जाया जा सकता है, लेकिन एक सीमा के बाद वहां से भी आगे जाने की गुंजाइश नहीं है। शीत केवल उष्मा की अनुपस्थिति के बारे में जानकारी देता है। इसी कारण हम शीतलता को माप नहीं सकते। उष्मा ऊर्जा है, लेकिन शीतलता इसका विलोम नहीं है। शीतलता केवल उष्मा की अनुपस्थिति है।
(अब कक्षा में इतनी शांति थी, कि सुई के गिरने की आवाज भी सुन सकते थे)
विद्यार्थी : प्रोफेसर, अंधेरा क्या है, क्या ऐसी कोई चीज होती है ?
प्रोफेसर : हां, अंधेरा होता है, अगर अंधेरा न हो तो फिर रात क्या है ?
विद्यार्थी : आप एक बार फिर गलत हैं सर, अंधेरा किसी चीज की अनुपस्थिति के बारे में बताता है। आपके पास धीमी या तेज रोशनी हो सकती है, लेकिन आपके पास अंधेरा नहीं हो सकता। अगर आप अंधेरा बना सकते तो अंधेरे को अधिक या कम अंधेरे में भी तब्दील कर सकते। क्यों है ना ?
प्रोफेसर : तो, युवक तुम कहना क्या चाहते हो ?
विद्यार्थी : सर, मेरा मत है कि आपके दार्शनिक सिद्धांत में कुछ गलत है।
प्रोफेसर : गलत ? क्या तुम बता सकते हो कैसे ?
विद्यार्थी : सर, आप द्वैत के सिद्धांत पर काम कर रहे हैं। आप तर्क देते हैं कि यह जीवन है और यह मृत्यु है। अच्छे ईश्वर हैं और बुरे ईश्वर हैं। आप ईश्वर को इस तरह देख रहे हैं जैसे किसी परिमित वस्तु को देखते हैं, जिसे हम नाप या माप सकते हैं। सर, विज्ञान तो एक विचार तक की व्याख्या नहीं कर सकता। विज्ञान इलेक्ट्रिसिटी और मैग्नेटिज्म का इस्तेमाल करता है, लेकिन कभी इन्हें देखा नहीं है। हम अगर मृत्यु को जीवन के विलोम के रूप में देखते हैं तो इस तथ्य को नकार देते हैं कि मृत्यु का कोई अस्तित्व नहीं है, यह केवल जीवन की अनुपस्थिति है।
अब मुझे बताएं प्रोफेसर, आप जिन छात्रों को पढ़ा रहे हैं, क्या वे बंदरों का विकसित रूप हैं ?
प्रोफेसर : अगर तुम प्राकृतिक उद्वविकास प्रक्रिया की बात कर रहे हो तो, हां, मैं उन्हीं बंदरों को पढ़ा रहा हूं।
विद्यार्थी : क्या आपने कभी उद्वविकास को अपनी आंखों से देखा है ?
(प्रोफेसर ने अपना सिर हिलाया और मुस्कुराए, अब वे समझ रहे थे कि बह का विषय किस ओर जा रहा है)
विद्यार्थी : अब जबकि किसी ने भी उद्वविकास की प्रक्रिया को नहीं देखा है और हम इसे साबित भी नहीं कर सकते, तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप हमें केवल अपने विचार पढ़ा रहे हैं, सर ?, आप प्रोफेसर हैं या धर्मप्रचारक?
(कक्षा में खुसफुसाहट शुरू हो गई)
विद्यार्थी : कक्षा में क्या कोई ऐसा है जिसने प्रोफेसर का दिमाग देखा हो?
(कक्षा में जोरदार ठहाका गूंजा)
विद्यार्थी : कक्षा में किसी ने प्रोफेसर के दिमाग को सुना है, महसूस किया है या किसी ने प्रोफेसर के दिमाग को दुआ या सूंघा है?, ऐसा कोई नहीं है जिसने ऐसा किया हो। ऐसे में विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार हम कह सकते हैं सर, कि आपके पास दिमाग नहीं है। मैं पूरे आदर के साथ पूछना चाहूंगा कि ऐसे में हम आपके भाषण पर कैसे यकीन करें?
(अब कक्षा पूरी तरह शांत थी, प्रोफेसर उसे विद्यार्थी के भावहीन चेहरे को ताक रहे थे)
प्रोफेसर : मुझे लगता है कि तुम्हें इसे विश्वास के आधार पर मानना चाहिए, बेटा।
विद्यार्थी : यही बात मैं कह रहा हूं... इंसान और ईश्वर के बीच का संबंध भी विश्वास पर आधारित है। इसी से सभी चीजें चल रही हैं और जीवित हैं।
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मैंने फेसबुक पर कहीं ये स्टोरी पढ़ी थी। मूलत: अंग्रेजी के इस पीस को हिन्दी में अनुवाद किया है। उम्मीद है आपको पसंद आया होगा। पिछले कई दिनों से फेसबुक पर छद्म रेशनलिस्ट ज्योतिष को लेकर ऐसे ही भ्रम पैदा कर रहे हैं। ज्योतिष की शब्दावली और सामान्य शब्दावली के अंतर को लेकर कई लोग खुद को आम आदमी का समर्थक और सही किताब बेचने वाला साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कथन है कि फलित ज्योतिष है ही नहीं। यह लेख उसका सटीक जवाब है।
फेसबुक का यह आलेख अंत में कहता है कि यह वार्ता देश के पूर्व राष्ट्पति मिसाइलमैन एपीजे अब्दुल कलाम (विद्यार्थी) और उनके प्रोफेसर के बीच हुई थी। मैं नहीं जानता कि डॉ. कलाम ज्योतिष को मानते हैं या नहीं, लेकिन ईश्वर और उसमें विश्वास को लेकर जो करारा जवाब है, ठीक यही जवाब ज्योतिष को लेकर भी है। आप क्या कहते हैं...
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi is One of the best astrologer having good practice in India. He mastered in traditional Parashar Paddathi, Lal Kitab, Krishnamurti Paddhati and Vastu Shastra. With his accurate horoscope prediction and effective remedies, he got attention from Indians who are spread all over the globe. His premier customer is from USA, Australia, England, Europe, Middle East, China as well as all over India.
मंगलवार, दिसंबर 14, 2010
राफेल की मुण्डेन ज्योतिष
राफेल की पुस्तक का पहला भाग
क्या है मुण्डेन ज्योतिष
वास्तव में यह ज्योतिष की एक शाखा है जो देशों, राज्यों और शहरों का भाग्य बताती है। एक सामान्य कुण्डली की तरह किसी स्थान विशेष की कुण्डली बनाई जाती है। किसी राष्ट्र के सम्बन्ध में बात करते समय कारकों का वर्गीकरण निम्न अनुसार होगा।
प्रथम भाव - यह आम आदमी से सम्बन्धित होगा। जनता का स्वास्थ्य, राष्ट्र की सामान्य परिस्थितियां और सामान्य तौर पर देश की गृह विभाग की स्थिति।
द्वितीय भाव- राष्ट्रीय एक्सचेंजर, रेवेन्यू, स्टॉक मार्केट, बैंकें, व्यावसायिक मामले और ट्रेडिंग इस भाव से देखी जाएगी।
तृतीय भाव- रेलवे और इससे सम्बन्धित अन्य मुद्दे, ट्रेफिक, स्टॉक एवं शेयर, टेलिग्राफ, टेलिफोन एवं पोस्टल मुद्दे, यातायात के साधन, मोटरें, बसें, किताबें, समाचारपत्र और साहित्यिक गतिविधियां इस भाव से देखी जाएंगी।
चतुर्थ भाव- मौसम, कृषि, फसलें और जमीन सम्बन्धी मुद्दे, खानें, सार्वजनिक इमारतें। इसके अलावा देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी इस भाव से देखेंगे।
पंचम भाव- थियेटर, म्युजिक हॉल और मनोरंजन के स्थान, बच्चे, शिक्षा, जन्मदर, स्कूलें, नैतिक मूल्य और सट्टा प्रवृत्ति इस भाव से देखी जाएगी।
छठा भाव- बीमारी, जनता का स्वास्थ्य, थल और जल सेना, आराधना के तरीके और सामान्य तौर पर कामकाजी जनता को इससे देखा जाएगा।
सातवां भाव- विदेशी मामले और अन्य ताकतों के साथ सम्बन्ध, युद्ध व अंतरराष्ट्रीय स्तर के विवाद, शादियां, तलाक और विदेशी व्यापार इससे देखा जाएगा।
आठवां भाव- मृत्युदर, आत्महत्याएं और गुप्त समूहों को इससे देखा जाएगा।
नौंवा भाव- अदालतें, जज, पंडित, इमाम, पादरी और हुजूरी के अलावा कॉलोनियल ट्रेड अफेयर, व्यावसायिक ताकतें, विज्ञान, शिपिंग और इससे जुड़े अन्य मामले इस भाव से देखे जाएंगे।
दसवां भाव- राजा, शाहीपन, सरकारें, सत्ताधारी ताकतें, एरिस्टोक्रेसी, नोबेलिटी व समाज इस भाव से देखे जाएंगे।
ग्यारहवां भाव- संसद, राज्यसभा, लेजिस्लेशन इस भाव से देखेंगे।
बारहवां भाव- कैदी, वर्कशॉप या गोदियां, अस्पताल, दानदाता ट्रस्ट, अपराध, हत्याएं, अपराधी, जासूस और गुप्त शत्रु इस भाव से देखने होंगे।
यह तो हुआ भावों के कारकों का उल्लेख। अब इनके इस्तेमाल के तरीके आगामी पोस्टों में बताने का प्रयास करूंगा। अभी इतना ही यह था भाग एक...
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सोमवार, मार्च 30, 2009
दूसरे ज्योतिषी हैं बाबू मास्टर
महाराज की कथा के बार अब मैं बताना चाह रहा हूं बाबू मास्टर के बारे में। चाहता तो था कि साथ ही लिख दूं लेकिन इससे पोस्ट बहुत लम्बी हो जाती।
अब बात बाबू मास्टर की। लम्बा चौड़ा शरीर, घोड़े जैसे दांत, सिर मुंडाया हुआ और पीछे मोटी चोटी। और वर्णन करूंगा तो पहचान पुख्ता हो जाएगी। हां, तो बाबू मास्टर से मिलना कुछ इस तरह हुआ कि वे बीकानेर आए हुए थे। उनके सो कॉल्ड गुरूजी बीकानेर के ही हैं। हालांकि उनके गुरू का ज्योतिष के बजाय अध्यात्म में अधिक रुझान है। क्या कहूं। बाबू मास्टर जिन्हें गुरुजी कहता है उनकी छवि इतनी बड़ी है कि लगता है बाबू मास्टर ने केवल अपनी छतरी पुख्ता करने के लिए उनका नाम इस्तेमाल किया। अब उनके गुरू ऐसा क्यों करने दे रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं है।
मैं अपने एक रिश्तेदार के साथ उनसे मिलने के लिए पहुंचा। हमारी मुलाकात से पहले बाबू मास्टर को बताया गया था कि एक ऐसा मरीज आ रहा है जो बिल्कुल सुस्त है और कुछ काम नहीं करना चाहता। ज्योतिष के नाम पर निठल्ला बैठा है। कहता है समय खराब है सो कुछ करना बेकार है। वह रोगी साथ ही था।
हम जब उनके आश्रमनुमा स्थान पर पहुंचे तो बाबू मास्टर ने मुझे देखते ही पहचान लिया और अपनी दमदार आवाज में झिड़कने लगे कि क्यों ऐसी क्या समस्या है कि सब काम छोड़कर बैठे हो। मैं सकपका गया, लेकिन हाथों-हाथ संभल गया। मैंने बताया कि हम इसे दिखाने लाए हैं मैं तो नौकरी करता हूं। बाबू ने पूछा क्या नौकरी करता है। मैंने कहा पत्रकार हूं। अब बाबू ने पलटवार किया कहा तेरी नौकरी तो कुछ नहीं करने के बराबर ही है। मैंने खून का घूंट पी लिया। कुछ सीखने की गरज जो थी। अब शुरू हुआ ईलाज का क्रम। बाबू मास्टर ने रोगी से नाम पता और डेट ऑफ बर्थ पूछी। रोगी बता रहा था और बाबू के दो असिस्टेंट नोट कर रहे थे। रोगी बोल रहा था कि बाबू ने अपने असिस्टेंटों से चर्चा करनी शुरू कर दी। बातचीत में लगातार विदेशी शब्द आ रहे थे। कुछ देर की चर्चा के बाद बाबू रोगी की ओर मुड़े और बोले कोई समस्या नहीं है। यह लड़का कुछ काम नहीं करना चाहता इसलिए ऐसा कहता है। इसका भाग्य प्रबल है। हमने उन्हें बताया नहीं था कि जिस रोगी को लाया गया है वह स्किजोफ्रीनिया का पेशेंट है। सो उनके इस कथन के बाद मैंने बता दिया। तो बाबू बिफर गए। बोले मुझे सिखाता है क्या। मैं सहमकर चुप हो गया।
कुछ देर बाद रोगी को एक मंत्र देकर पीछे भेज दिया और कहा जब तक न कहूं उठना मत। इसके बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ। इतनी देर में बाबू को समझ आया कि मैं ज्योतिष में रुचि रखता हूं। सो उन्होंने एस्ट्रोलॉजिकल टर्म इस्तेमाल करनी ही बंद कर दी। अपनी हर बात को थाई अंक पद्धति से शुरू किया और वहीं पर खत्म कर दिया। मैं मूर्खों की तरह बस मुंह बांए बैठा रहा।
बातचीत के बीच एक के बाद एक, दो फोन आए। बाबू ने बिना जातक से प्रश्न पूछे इलाज बता दिया और फोन रख दिया। बाबू के व्यवहार से अब तक मैं पूरी तरह हतोत्साहित हो चुका था लेकिन फोन कॉल के बाद तो मैं हैरान था। अपनी रौ में लगातार बोल रहे बाबू को मैंने टोका कि आपने बिना समस्या पूछे समाधान कैसे बता दिया। उन्होंने कहा कि यह तो मेरा काम है। इसके बाद वे अपने कामों का वर्णन करते रहे। एक इंटरनेश्ाल बैंक में एनालिस्ट का पद छोड़ चुके थे, इसके बाद एक फाइनेंस कंसल्टेंसी फर्म खोली वह भी बंद कर दी। इसके बाद मार्केटिंग का काम किया और वह भी छोड़ दिया। आखिरी बार जिस अंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे उसमें थाईलैण्ड में पोस्टेड थे। वहां थाई अंक ज्योतिष सीखी और नौकरी छोड़ पूरी तरह ज्योतिष में लग गए। यह सारी बातें उन्होंने ने ही बताई है। मैंने आज तक वापस इसकी पुष्टि नहीं की है।
खैर मैंने कहा कि ज्योतिष की ऐसी कौनसी विद्या है जिसमें बिना जातक को जाने, बिना उससे सवाल जवाब किए उसके बारे में इतना स्पष्ट बताया जा सकता है। थोड़ी देर बाद तो मैंने दावा भी कर दिया कि यह ज्योतिष ही नहीं है। बाबू हैरान करने पर ही तुले हुए थे। उन्होंने कहा हां मैं ज्योतिष नहीं करता। मैंने कहा तो क्या करते है। बाबू ने कहा मैं लोगों को मूर्ख बनाता हूं। मेरा धंधा मूर्ख बनाने का ही है। यह जवाब मैं पहले सुन चुका था। अब दूसरी बार सुन रहा था। ज्योतिष के क्षेत्र में कई साल तक लोगों के सम्पर्क में रहने और नौकरी के कारण काफी पॉलिश भी हो चुका था। सो मैं संयत बना रहा। मैंने अध्यात्मिक गुरू के आश्रम की आड़ लेकर पूछा कि आपको संतुष्टि मिल जाती है लोगों को ऐसे मूर्ख बनाकर। तो बाबू बोले मैं खुद थोड़े ही जाता हूं मूर्ख बनाने के लिए। वे खुद आते हैं। और सही पूछो तो लोग मूर्ख ही बनना चाहते हैं। आप उन्हें समस्याओं का ठोस कारण बताओगे तो वे पचा नहीं पाएंगे। एक आम आदमी की समस्या है कि वह गलतियां खुद करता है और उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना चाहता है। मैं तो बस उनकी मदद करता हूं। कभी ठीकरा वास्तु के सिर फूटता है, कभी ज्योतिष पर तो कभी किसी व्यक्ति विशेष पर। उन्होंने कहा तूं मुझे बस तडि़त चालक समझ सकता है। जो बिजली गिरने की दिशा तय करता है।
अब तक मैं हंसने लगा था। यह ईलाज का दूसरा व्यवहारिक तरीका था। पहले तरीके में महाराज प्रायश्चित करा रहे थे तो यहां बाबू मास्टर लोगों को लॉलीपॉप पकड़ा रहा था। दोनों ही लोगों ने ग्लानि को आवरण दिया और सहारा लिया ज्योतिष का। इन दोनों ही लोगों को अपने क्षेत्र का प्रकाण्ड विद्वान समझा जाता है। महाराज ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब बड़ा घर और कार ले चुका है और बाबू मास्टर अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी में तीस से चालीस हजार रुपए तक की तनख्वाह पाता था अब रोज के पांच से सात हजार रुपए कमा रहा है। लोगों के दुख और तकलीफ जितने बढ़ते जाते हैं इन लोगों का रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है। पता नहीं ईलाज किसका हो रहा है लेकिन इन दोनों ने एक बीमारी को कुछ समय के लिए तो खत्म कर ही दिया है। और वह बीमारी है खुद की गरीबी। :)
इन दोनों के बाद मैं आपको बताउंगा एक ऐसे ज्योतिषी के बारे में जो परम्परागत भारतीय पद्धति से कुण्डलियां देखता था लेकिन उन्हें मैनेज इंग्लिश स्टाइल से करता था। उसने इतना तगड़ा नेटवर्क बनाया कि उसकी मृत्यु के पांच साल बाद भी उनके पुत्र आराम से अपनी जीविका चला रहे हैं। भले ही वे अपने पिता जितने अच्छे ज्योतिषी नहीं है लेकिन सिस्टम ने उन्हें दौड़ में जमा रखा है।
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Famous Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
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