The Astrology Online

thought लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
thought लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, अगस्त 27, 2009

नास्‍त्रेदमस की टाइमिंग

15etiqt

इन दिनों 2012 की चिंता के साथ एक बार फिर नास्‍त्रेदमस लाइम लाइट में आ चुके हैं। बहुत छोटा था तब नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक मेरी माताजी खरीद कर लाई थीं। उन्‍हें पक्‍का विश्‍वास था कि दुनिया जल्‍दी ही खत्‍म हो जाएगी। और नास्‍त्रेदमस भी यही कह रहे थे। मेरी माताजी के इस विश्‍वास के कई कारण थे लेकिन नास्‍त्रेदमस के पास कुछ जुदा कारण हैं। किताब के मुखपृष्‍ठ पर नास्‍त्रेदमस का अपने क्रिस्‍टल के साथ इतना आकर्षक फोटो था कि मैं घण्‍टों तक केवल फोटो को ही देखता रहता था। वह मूल किताब का हिन्‍दी अनुवाद था।

मुझे बहुत अधिक समझ नहीं थी लेकिन इतना उसमें स्‍पष्‍ट था कि नास्‍त्रेदमस ने दुनिया का भविष्‍य बहुत साल पहले ही लिख दिया है। और वह जल्‍द ही खत्‍म भी होने वाली है। अलग अलग सूत्रों का विश्‍लेषण करके बताया गया था कि इतिहास में अब तक जो घटनाएं हुई हैं उन्‍हें नास्‍त्रेदमस ने अपने क्रिस्‍टल बॉल में देख लिया था और उलझी हुई भाषा में लिख दिया था। ताकि उसे तत्‍काल कोई परेशान न करे। उसमें यह भी बताया गया था कि अब वे भविष्‍यवाणियां सच साबित हो रही हैं।

इसके बाद कई साल तक नास्‍त्रेदमस का नाम सुनाई नहीं दिया। जब मैं लाल किताब पढ़ रहा था तो उसकी भाषा और नास्‍त्रेदमस की चौपाइयों में कई समानताएं दिखाई दी। भाषा के दृष्टिकोण से। तब नास्‍त्रदेमस की दोबारा याद आई। ढूंढ-ढांढकर किताब निकाली और उसे फिर पढ़ गया। शेर और चीते की लड़ाई का एक दृश्‍य को अब भी ऐसा जेहन में बैठा है कि लगता है लड़ाई मेरे सामने हुई थी। उन दिनों मैंने कई लोगों के समक्ष नास्‍त्रेदमस की बात की। लेकिन उस दौर में किसी को भी मेरी बातों में इंट्रेस्‍ट नहीं आया। मैं किनारे हो गया।

फिर इराक पर हुए हमले और इराक के पास जैविक हथियारों के जखीरे की खबरों के बाद एक बार फिर नास्‍त्रदेमस का नाम चमका। कई किताबें बाजार में आ गई। घोषणा हुई कि वाईटूके वास्‍तव में एक सिंबल है जो बताता है कि दुनिया इक्‍कीसवीं सदी के दर्शन ही नहीं कर पाएगी। कई लोग बहुत चिंतित थे। बीकानेर में जहां हर समय अलमस्‍त मौसम रहता है कई लोगों के चेहरे पर प्रलय का भय दिखाई देने लगा। लोग पाप और पुण्‍य की बातें करने लगे। हालांकि बैकग्राउंड में जैविक हथियारों के काम करने के तरीके पर भी बहस चल रही होती लेकिन मुद्दा वही था कि दुनिया तो खत्‍म हो जाएगी।

इसके बाद अब तीसरा दौर देख रहा हूं। पिछले साल अमरीका बुरी तरह मंदी की चपेट में आ गया। लोगों के घर बिक गए, नौकरियां छूट गई और धंधे बंद हो गए। पूरी तरह ऑटोमैटिक घरों में रहने वाले लोग कारों में रहने और सोने लगे। यानि सोसायटी से कटने के बाद अब सुविधाओं से भी कट चुके लोगों के पास जीने का कोई कारण नहीं बचा। ऐसे में एक बार फिर नास्‍त्रेदमस आ गए हैं। इस बार आए हैं 2012 की भविष्‍यवाणी लेकर। इसमें दुनिया में आज तक हुए बदलावों और मशीनीकरण पर खुलकर चर्चा की गई है। देश, समाज और उपलब्‍ध संसाधनों के तेजी से हो रहे क्षय पर चर्चा है। और साथ में सवाल खड़ा किया गया है कि क्‍या वास्‍तव में नास्‍त्रदेमस के अनुसार वर्ष 2012 में दुनिया खत्‍म हो जाएगी।

यह भूमिका समझिए अगली पोस्‍ट में चर्चा करूंगा कि क्‍यों ऐसा होता है कि जब दुनिया में संकट आता है तभी नास्‍त्रेदमस याद आते हैं। और मुझे नास्‍त्रेदमस की चौपाइयों में क्‍या दिखता है।

चित्र गूगल सर्च से साभार

रविवार, अगस्त 23, 2009

इक्‍कीसिया गणेशजी : विशेष मांग पर

bk1609cb

ज्‍योतिष का यह ब्‍लॉग शुरू किया तो विषय पर लिखने के दौरान कई बार लगता कि ब्‍लॉग सूना-सूना लगता है। सो इस पर अपने ईष्‍टदेव इक्‍कीसिया गणेशजी का फोटो लगा दिया। शुरूआत में लोगों ने ध्‍यान दिया या नहीं लेकिन बाद में बहुत से लोगों ने पूछा कि ये इक्‍कीसिया गणेशजी कहां है, इनका क्‍या महत्‍व है।

शायद ज्‍योतिष के ब्‍लॉग पर  गणेशजी की तस्‍वीर होने के कारण कौतुहल का कारण बनी होगी। आज गणेश चतुर्थी है। गणेशजी का खास दिन है सो लगा आज ही इक्‍कीसिया गणेशजी के बारे में जानकारी देनी चाहिए। बीकानेर शहर के पश्चिमी कोने में किराडूओं की बगीची में स्थित गणेशजी के इस मंदिर की स्‍थापना का दिन तो मुझे नहीं पता लेकिन इसके साथ एक तथ्‍य जुड़ा है। वह यह कि इसे इक्‍कीस पुष्‍य नक्षत्रों के दिन बनाया गया था। जितनी देर तक पुष्‍य नक्षत्र चलता उतनी देर तक मूर्ति बनाने का काम होता और बाद में अगले नक्षत्र पर फिर से शुरू होता। इक्‍कीस पुष्‍य नक्षत्रों तक यह काम चला और मूर्ति बन गई। इसमें गणेशजी की गोद में सिद्धि भी विराजमान है। आमतौर पर मूर्ति का श्रृंगार इतना अधिक होता है कि पता ही नहीं चलता कि मूर्ति का वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या है। एक दिन हमारा फोटोग्राफर नौशाद अली मंदिर पहुंचा तो उसे बिना श्रृंगार के गणेशजी दिखाई दिए। वह उनकी फोटो ले आया। उसी फोटो को मैंने इस ब्‍लॉग पर लगा रखा है।

मन्‍नतें पूरी होती गई

इस मंदिर की खासियत यह है कि इक्‍कीस दिन तक रोजाना बिना बोले मंदिर जाने और गणेशजी की इक्‍कीस फेरी रोजाना लगाने पर मन की इच्‍छा पूरी हो जाती है। मैं जब पहली बार इस मंदिर में गया था तो यह छोटा सा मंदिर था। गर्भग्रह के पीछे इतनी कम जगह थी कि एक बार में दो जन फेरी नहीं लगा पाते थे। लेकिन गणेशजी का चमत्‍कार ही है कि उन्‍होंने लोगों की इच्‍छाएं इतनी तेजी से पूरी की कि मंदिर बड़ा होता गया। अब यह शहर का सबसे ग्‍लोरियस मंदिर बन गया। जब मैंने जाना शुरू किया था तो मैं डिप्रेशन में था और एकांत की खोज में वहां जाकर बैठता था। मन को बड़ा सुकून मिलता था। तीन साल तक रोज जाता रहा। कभी कुछ मांगा नहीं लेकिन मेरी स्थिति में तेजी से बिना मांगे सुधार होता गया। एकाध बार मैंने मन में इच्‍छा लेकर फेरी निकालनी शुरू की तो बाधा आ गई और फेरियां पूरी नहीं कर पाया। तो फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया। जब भी बिना मांगे जाता था तो नियमित रूप से बिना नागा महीनों तक यह क्रम चलता रहता। मांगने पर ही बाधा आती।  बहुत से लोग  इक्‍कीस दिन फेरियां नहीं निकाल पाते हैं। कुछ लोग जो निकाल लेते हैं उन्‍हें पुत्र संपत्ति जैसी चीजें आसानी से मिल जाती है। कालान्‍तर में दूसरे लोगों की इच्‍छाएं पूरी हुई तो मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। अब तो हालात ये हैं कि बुधवार के दिन गणेशजी की परिक्रमा एक साथ चालीस या पचास लोग करते हैं। कई बार तो दर्शन भी मुश्किल से होते हैं। अब मैंने जाना कम कर दिया है। साल में एकाध बार ही जा पा रहा हूं। लेकिन मन में वही पुरानी वाली छवि है। कभी उपापोह में होता हूं तो गणेशजी को याद करता हूं और समस्‍या का समाधान हो जाता है। यह मेरी आस्‍था से अधिक जुड़ा है सो यही मेरे ईष्‍ट हुए।

बस इतनी सी बात है... :)