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रविवार, अक्टूबर 18, 2009

आदरणीय स्‍वामी नारायणन् जी

हमारे परम गुरूजी स्‍वामी नारायणन् जी




आज मैं आपका परिचय कराना चाहता हूं एक साधू स्‍वामी नारायणन् जी से। किसी से ऑल इंडिया रेडियो में कुछ समय रहने वाले और बाद में केन्‍द्र सरकार के किसी संस्‍थान में नौकरी करने वाले स्‍वामी नारायणन् जी ने करीब सैंतीस साल पहले सन्‍यास ले लिया। तब से अब तक वे एक साधू ही हैं। साल के छह महीने गंगोत्री में रहते हैं और छह महीने निचले इलाकों में आ जाते हैं। हम कुछ लोगों का सौभाग्‍य है कि हम उन तक पहुंच पाए और अब नियमित संपर्क में है। वेद और विज्ञान का उनका अध्‍ययन एक जैसा है। ब्रह्म और इंटरनेट दोनों की बातें इतनी सहजता से करते हैं कि कोई भी उनके सानिध्‍य में खुद को पूरा होता महसूस करने लगता है। हालांकि कुछ साल पहले मुझे भी उनके सानिध्‍य में तीसरी शक्ति का तगड़ा अनुभव हुआ था लेकिन उसे भी उन्‍होंने मेरी ध्‍यान की अवस्‍था बताकर खारिज कर दिया।
सहजता में विश्‍वास करने वाले स्‍वामीजी किसी की बात टालते नहीं हैं। उनके पास कई तरह की खोपडि़यां आती हैं। लेकिन एक झेन साधू की तरह हर किसी के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं जैसे कि वे उनकी तरह ही हों। वे कब कहां और कितने दिन होते हैं कोई कह नहीं सकता। बस लगातार निगरानी रखो तो पता चल जाता है कि इन दिनों स्‍वामी जी कहां हैं। इसी तरह उनके एक शिष्‍य ने उन्‍हें कुछ दिन पहले दिल्‍ली में ढूंढ निकाला और आग्रहपूर्वक बीकानेर ले आए। अपने चार दिन के छोटे प्रवास काल में उन्‍होंने पता नहीं कितने लोगों को अपने स्‍नेह से सराबोर कर दिया। एक दिन मेरे घर भी चाय पीने के लिए आए। तब मेरे अनुज आनन्‍द ने उनसे जी भरकर बातें की।
मेरे श्‍वसुरजी ने उनके कुछ फोटो अपने मोबाइल से लिए। उनसे मांगकर में स्‍वामीजी के कुछ फोटो यहां डाल रहा हूं। ऐसे हैं हमारे परम गुरूजी...