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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

Oman : A strong tool for Astrological prediction

शक्तिशाली औजार है ओमेन


एक ज्‍योतिषी (Astrologer) जब किसी कुण्‍डली का विश्‍लेषण करता है तो पूर्व में तय किए गए सिद्धांतों और गणितीय गणनाओं के अतिरिक्‍त उसके पास भविष्‍य में झांकने के लिए एक और महत्‍वपूर्ण औजार होता है। इसे कहते हैं ओमेन (Omen)। किसी भी व्‍यक्ति अथवा व्‍य‍वस्‍था के निकट भविष्‍य की जानकारी देने के लिए प्रकृति लगातार संकेत देती रहती है। इन संकेतों को एक ज्‍योतिषी अपने अंतर्ज्ञान से पकड़ पाता है। 

पूर्व में जहां संकेतों को ज्‍योतिषीय गणनाओं से भी अधिक महत्‍व दिया जाता रहा है, वहीं वर्तमान दौर में हम संकेतों को दरकिनार कर केवल कुण्‍डली से निकाले जाने वाले फलादेशों पर ही निर्भर हो गए हैं। ओमेन को समझाने के लिए दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर के.एस. कृष्‍णामूर्ति (KP Astrology) ने अपनी पुस्‍तक फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍टोलॉजी में एक उदाहरण दिया है। पिछले कई दशकों में ओमेन को समझाने के लिए इसे सबसे शानदार उदाहरण माना गया है। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि ओमेन को समझने के लिए हमें प्रकृति को समझने की अपनी दृष्टि भी विकसित करनी होगी।

‘‘एक ज्‍योतिषी अपने शिष्‍यों को ज्‍योतिष का पाठ पढ़ा रहा था। इसी दौरान उसके पास एक व्‍यक्ति दौड़ता हुआ आता है और बताता है कि उसकी पत्‍नी उसे छोड़कर जा चुकी है। ठीक उसी समय ज्‍योतिषी की पत्‍नी कमरे में आती है और बताती है कि कुएं से पानी निकालने के दौरान रस्‍सी टूट गई और बाल्‍टी कुएं में जा गिरी है। ज्‍योतिषी अपने शिष्‍यों से पूछते हैं कि व्‍यक्ति के सवाल और अभी मिले संकेत से क्‍या अर्थ लगाए जा सकते हैं। इस पर सभी शिष्‍य एक मत थे कि दोनों का संबंध बनाने वाली रस्‍सी के टूट जाने का अर्थ है कि जातक की पत्‍नी लौटकर नहीं आएगी। ज्‍योतिष गुरु मुस्‍कुराए। उन्‍होंने कहा नहीं, ऐसा नहीं है। हकीकत में पानी से पानी को अलग करने वाला तत्‍व (रस्‍सी) समाप्‍त हो गया है। ऐसे में पानी फिर से पानी में जा मिला है। इससे संकेत मिलता है कि जातक की पत्‍नी शीघ्र लौट आएगी। ज्‍योतिषी ने जातक से कहा कि वह घर जाए, उसकी पत्‍नी शीघ्र लौटने वाली है। उसी दिन शाम तक जातक की पत्‍नी लौट आई।’’

हम आम जिंदगी में भी रोजाना ऐसे संकेतों (Signs) से रूबरू होते हैं। घर से निकलते ही मिलने वाले संकेतों से हमारा अवचेतन (Subconscious) स्‍वत: कयास लगाने लगता है कि आज का दिन कैसा जाएगा। बस अंतर यह है कि यहां हमारा अवचेतन काम कर रहा होता है। वह हम अपने तरीके से समझाने की कोशिश करता है कि भविष्‍य के क्‍या संकेत हैं। संकेतों को भी ज्‍योतिषियों ने संकेतों के तौर पर इस्‍तेमाल करना शुरू किया होगा, कालान्‍तर में उन्‍हीं संकेतों को शकुन और अपशकुन के तौर पर विकृत रूप से इस्‍तेमाल किया जाने लगा। जबकि ये महज जातक के भविष्‍य का संकेत मात्र हैं, न कि शकुन अथवा अपशकुन देने वाले तत्‍व की समस्‍या। 

शकुन और अपशकुन (Shakun/apshakun)

पंडित नेमीचंद शास्‍त्री ने भद्रबाहु संहिता (Bhadrabahu Samhita) में ऐसे ही संकेतों का विस्‍तार से वर्णन किया है। हालांकि इस संहिता का अधिकांश भाग मण्‍डेन से संबंधित है। यह प्रकृति के संकेतों से प्रांत, स्‍थान विशेष, राष्‍ट्र अथवा राजा से संबंधित सवालों के जवाब देते हैं, लेकिन इनमें भी कुछ संकेत ऐसे भी बताए गए हैं जिन्‍हें हम आमतौर पर जिंदगी में देखा करते हैं। हर्षचरित में बाण शत्रुओं को मिल रहे खराब संकेतों के बारे में जानकारी देते हैं। 

मसलन, दिन में सियार मुंह उठाकर रोने लगे, जंगली कबूतर घरों में आने लगे, बगीचों में असमय फूल खिलने लगे, घोड़ों ने हरा धान खाना बंद कर दिया, रात में कुत्‍ते मुंह उठाकर रोने लगे, महलों के फर्श से घास निकल आई। ऐसे सभी संकेत वास्‍तव में बाण ने यह बताया कि शत्रुओं को अपनी पराजय संकेतों में दिखाई देने लगी थी। एक सामान्‍य व्‍यक्ति भी घर से निकलते समय दूध का सामने आना, सफाईकर्मी का सामने पड़ना, छींक आना या ऐसे सैकड़ों लक्षण जानता है। पीढि़यों से ये संकेत हमारी मदद करते रहे हैं और आज भी भविष्‍य का सटीक संकेत देने का प्रयास करते हैं।

प्रश्‍न ज्‍योतिष में ओमेन (Omen in Prashna Jyotish)

प्रश्‍न कुण्‍डली से फलादेश देने की विधियों में ओमेन की सहायता प्रमुखता से ली जाती रही है। प्रश्‍नकर्ता के ज्‍योतिषी के पास पहुंचने और उसके उठने बैठने की रीतियों से ही सवाल का अधिकांश जवाब मिल जाता है, बाद में प्रश्‍न कुण्‍डली से अगर संकेतों की सहायता कर रहे योग मिल रहे हों तो सटीक उत्‍तर मिलता है। 

प्रश्‍नकर्ता के बोले गए शब्‍दों में प्रथम शब्‍द, उसका अपने शरीर के किस अंग पर स्‍पर्श है, उसके चेहरे की दिशा किस ओर है, उसकी नासिका का कौनसा स्‍वर चल रहा है, प्रश्‍नकर्ता की शारीरिक और मानसिक चेष्‍टाएं प्रश्‍नकर्ता के प्रश्‍न का सहायक अंग मानी गई हैं। ऐसे में जातकों को सलाह दी जाती है कि प्रश्‍नकर्ता ज्‍योतिषी के पास जाते समय फल, पुष्‍प, मांगलिक पदार्थ और द्रव्‍य हाथ में लेकर ज्‍योतिषी के पास जाएं और पूर्वमुख होकर प्रणाम कर अल्‍प शब्‍दों में अपना प्रश्‍न रखे। 

स्‍वर की भूमिका और इसे बदलना (Significance of Swar)

हम कोई काम शुरू करें, तो उसमें सफलता मिलेगी या नहीं। अगर सफलता मिलेगी तो कितनी। इसका तुरंत जवाब हमारा स्‍वर दे देता है। हमारे नाक की दो नासिकाएं हैं। आमतौर पर एक समय में केवल एक नासिका से ही श्‍वसन किया होती है। बाईं नासिका को बायां स्‍वर या चंद्र अथवा इडा नाड़ी (Ida) और दाईं नासिका को दायां स्‍वर या सूर्य अथवा पिंगला (Pingla) नाड़ी कहा जाता है। आदर्श स्थिति यह है कि सूर्योदय से ढाई-ढाई घड़ी (करीब एक घंटे) में स्‍वर बदलता रहता है। 

परिस्थितिवश बहुत बार ऐसा नहीं होता है। जब कभी दोनों स्‍वर चलते हैं तो उसे सुषुम्‍ना कहा जाता है। प्रकृति के आधार पर इडा नाड़ी तम प्रधान है, पिंगला रज प्रधान और सुषुम्‍ना सत्‍व प्रधान नाड़ी है। बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और सोमवार को इडा नाड़ी सूर्योदय से चलनी चाहिए, रविवार, शनिवार और मंगलवार को पिंगला नाड़ी सूर्योदय से चलनी चाहिए। जो नाड़ी चल रही हो उसे बदलने के लिए भी कई उपाय बताए गए हैं। 

पातंजलयोग प्रदीप में बताया गया है कि जिस स्‍वर को चलाना हो उस पर कुछ समय तक ध्‍यान केन्द्रित करने पर वह स्‍वर चलने लगता है। जो स्‍वर चल रहा हो उसके विपरीत करवट लेकर पसली के नीचे तकिया देकर लेटने से दूसरी नाड़ी चलने लगती है। जो स्‍वर चलाना हो उसके विपरीत नासिका में रूई अथवा कपड़ा दबाने पर स्‍वर बदल जाता है। दौड़ने, परिश्रम करने अथवा प्राणायाम से भी स्‍वर बदलता है।

बुधवार, जुलाई 18, 2012

Astrology : Specification of Jatakas Kundali and limitations - 2


ज्‍योतिष : जातक कुण्‍डली और फलादेश, 
भविष्‍य में झांकने की संभावनाएं और सीमाएं



ganeshज्‍योतिष की विभिन्‍न शाखाओं के बारे में विचार के तहत हम बात कर रहे थे जातक कुण्‍डली (Jatak Kundali) की।  जातक कुण्‍डली को देखना शुरू करने से पहले ही कई तरह की समस्‍याएं सामने आती हैं। इनमें प्रमुख है जन्‍म समय का सही होना। जो भी जातक कुण्‍डली लेकर ज्‍योतिषी के पास आता है, वह सटीक फलादेश चाहता है, लेकिन इस बात की गारंटी देने के लिए तैयार नहीं होता है कि उसका जो जन्‍म समय बताया गया है वह मिनटों तक सही है। 

मैंने तो यह तक देखा है कि जो अधिक दावा करते हैं, आमतौर पर उनकी कुण्‍डली गलत ही निकलती है, केवल अपनी जिद को प्रदर्शित करने के लिए वे ज्‍योतिषी (Astrologer) पर दबाव डालते हैं कि वह जो समय बता रहा है वह सौ प्रतिशत सही है। ऐसे में स्‍थूल फलादेश (General prediction) फिर भी सही मिल जाते हैं, लेकिन घटनाओं की समय अवधि और सूक्ष्‍म वर्णन आमतौर पर सही नहीं मिल पाते हैं। उनमें कई बार तो महीनों तक का अंतर आ जाता है। एक लग्‍न तीस अंशों का होता है। अगर जन्‍म समय शुरूआती अंशों या आखिरी अंशों में हो तो लग्‍न बदलनें की आशंका प्रबल हो जाती है। ऐसे में जन्‍म समय को लेकर अधिक सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है। अगर लग्‍न मध्‍य में हो यानी 7-8 डिग्री से 25-26 डिग्री तक, तो एक निश्चिंतता रहती है।

शुरूआती दौर में गलत कुण्‍डलियों (Kundali) की ऐसी समस्‍या हर दूसरे तीसरे जातक के साथ आती थी। ऐसे में गुरुजी ने एक सरल पद्धति बताई जिससे इस समस्‍या का फौरी समाधान निकाला जा सकता है। वह यह कि जब भी जातक कुण्‍डली लेकर आए, उसी समय प्रश्‍न कुण्‍डली भी बना लो। अगर प्रश्‍न कुण्‍डली और जातक का प्रश्‍न उसकी जन्‍म कुण्‍डली के अनुसार मैच होता है तो जातक की लग्‍न कुण्‍डली को सही मान लिया जाए। इस फौरी समाधान से अस्‍सी प्रतिशत तक कुण्‍डलियों को जांचने का काम निपट जाता है। (प्रश्‍न कुण्‍डली पर पूर्व में लिख चुका हूं, इस सीरीज के आगे के लेखों में एक बार फिर कुछ बताने का प्रयास करूंगा)

जन्‍म समय सही मिल जाने और कुण्‍डली की जांच के बाद उसके फलादेश का काम शुरू होता है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष (Traditional vedic astrology) में लग्‍न कुण्‍डली (जो कुण्‍डली पहले पन्‍ने पर बनी हुई होती है) के सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए उसके टुकड़े राशियों के आधार पर किए गए हैं। इसी को नवमांश, (Navmansha) दशमांश या द्वादशांश कहते हैं। इसमें लग्‍न की राशि के अंशों के आधार पर विभाग कर बाकी की कुण्‍डली तैयार कर ली जाती है। 

बैंगलोर के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति (KP) ने राशि के आधार पर अंशों में विभाजन की पद्धति को पूर्णतया नकार दिया और सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए एक नई पद्धति ईजाद की, जो पाराशरीय सिद्धांत पर आधारित थी। ऋषि पाराशर ने विंशोतरी दशा पद्धति (जिसे आप दशा (Dasha) के नाम से जानते हैं) बनाई। इसमें चंद्रमा के नक्षत्र चार के आधार पर एक व्‍यक्ति के जीवनकाल को 120 साल मानकर हर ग्रह को एक निश्चित दशा का आधार दिया। दशाओं के टुकड़े भी उसी अनुपात में किए गए। इसे अंतरदशा कहा गया। अष्‍टोत्‍तरी एवं अन्‍य दशा सिस्‍टम की तुलना में विंशोत्‍तरी दशा पद्धति (Vimshottari dasha system) अधिक सटीक और वैज्ञानिक लगता है। 

केएस कृष्‍णामूर्ति ने पाराशरीय सिद्धांत की पालना करते हुए हर राशि और भाव के उसी के अनुसार टुकड़े कर दिए। ऐसे में 27 नक्षत्रों के 9-9 टुकड़े हुए। पूरी कुण्‍डली के 360 डिग्री को 249 भागों में बांट दिया गया। पारम्‍परिक पद्धति की तुलना में यह पद्धति अधिक सटीक लगती है। इसमें लग्‍न कुण्‍डली का ही विश्‍लेषण पर्याप्‍त है। नवमांश, त्रिशांश, दशमांश आदि का विश्‍लेषण अलग से करने और उनके सिद्धांत याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे में वर्तमान दौर में पारम्‍परिक की तुलना में केपी सिस्‍टम के ज्‍योतिषियों की संख्‍या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।

अगर आप केपी सिस्‍टम को जानना चाहते हैं तो कृष्‍णामूर्ति पद्धति की कुल जमा छह पुस्‍तकों में से प्रथम पुस्‍तक “कास्टिंग द होरोस्‍कोप” (Casting the horoscope) ले आएं। इसमें कुण्‍डली बनाने, दशाओं को निकालने और सूक्ष्‍म टुकड़े किए जाने की पद्धति विस्‍तार से दी गई है।