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रविवार, अक्टूबर 05, 2025

ज्‍योतिष की कक्षा - पांचवां दिन

अब तक हमने पढ़ा है ज्‍योतिष की जरूरत क्‍यों है, ग्रह, नक्षत्र और राशियां क्‍या है और पिछली पोस्‍ट में हमने राशियों से परिचय प्राप्‍त करना शुरू किया था। मेष, वृष और मिथुन राशि के बाद आज हम पढ़ेंगे कर्क राशि के बारे में। हालांकि मैं इन राशियों के बारे में छोटी छोटी जानकारी ही दे रहा हूं, लेकिन ये वह जानकारी है जिसे पढ़ने के बाद आप जातक को देखकर अनुमान लगा सकते हैं कि यह किस राशि का जातक हो सकता है। या किस राशि का प्रभाव जातक पर अधिक है। इस बारे में विशद जानकारी के लिए आपको ज्‍योतिष रत्‍नाकर और फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी पुस्‍तकें भी पढ़नी चाहिए। अगर आप पढ़ेंगे नहीं तो... अब क्‍या कहें।

सर्वाधिक राजयोग बनाने वाली कर्क राशि

दरअसल मुझे पहली बार इस राशि का परिचय ऐसे ही प्राप्‍त हुआ था। आप गौर कीजिए कि कर्क लग्‍न होने पर कुण्‍डली क्‍या बनेगी।

इस कुण्‍डली में चारों केन्‍द्र ऐसे हैं जिनमें ग्रह उच्‍च के होते हैं। लग्‍न में कर्क राशि में गुरु आएगा तो उच्‍च का होगा, चौथे भाव में शनि उच्‍च का होगा, सातवें भाव में मंगल और दसवें भाव में सूर्य उच्‍च का होगा। इसके अलावा लग्‍न से ग्‍यारहवां भाव आय का है। चंद्रमा अगर उच्‍च का हुआ तो इस भाव में होगा। सूर्य, बुध और शुक्र के सर्वाधिक संबंध बनते हैं। ऐसे में कर्क लग्‍न वालों के धन और आय के संबंध के योग भी कमोबेश अधिक बनते हैं। शुक्र बेहतर होने पर पैसा और प्रसिद्धि साथ साथ मिलते हैं। किसी भी लग्‍न में पाया जाने वाला यह दुर्लभ योग है जो कर्क में सहजता से उपलब्‍ध होता है। इन सभी बिंदुओं के चलते कर्क लग्‍न को राजयोग का लग्‍न कहा गया है।

कर्क राशि की विशेषताएं

यह पृष्‍ठ से उदय होने वाली राशि है। इनका बेढंगा शरीर, दुर्बल अवयव और शक्तिशाली पंजा होता है। इनके शरीर का ऊपर हिस्‍सा बड़ा होता है। उम्र बढ़ने के साथ इनकी तोंद भी बढ़ती जाती है। केश कत्‍थई और भूरापन लिए होते हैं। अस्थिर चेतना वाले इन जातकों की जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आते हैं। चंद्र का आधिपत्‍य इन्‍हें उर्वर कल्‍पनाशीलता होती है। धन संपन्‍नता या सम्‍मान की स्थिति पाने के लिए ये लोग दक्षता से जन समूह को प्रेरित कर देते हैं। ये लोग घर परिवार औ सुख की कामना करते हैं। उपहास और समालोचना का भय इन्‍हें विचारशील, कूटनीतिज्ञ और लौकिक बना देता है। जातक का स्‍वास्‍थ्‍य जवानी में खराब रहता है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ स्‍वास्‍थ्‍य सुधरता जाता है। इस राशि वाले जातकों के लिए मंगलवार का दिन शुभ होता है। हस्‍तलेखन अस्थिर होता है, शुभ रंग श्‍वेत, क्रीम और लाल है। शुक्रवार को ये लोग आनन्‍द और लाभ अर्जित कर सकते हैं।

कर्क राशि से प्रभावितों के उदाहरण

भारतीय राज व्‍यवस्‍था में कर्क राशि का बड़ा महत्‍व रहा है। आजानुभुज राम कर्क लग्‍न के थे। उनकी कुण्‍डली में सूर्य, मंगल, गुरु, शनि, शुक्र और चंद्रमा उच्‍च के थे। वर्तमान दौर में इंदिरा गांधी, अटलबिहारी वाजपेयी और अब सोनिया गांधी की कुण्‍डली कर्क लग्‍न की बताई जाती है। मैंने खुद ने अब तक ये कुण्‍डलियां देखी नहीं है इसलिए मैंने लिखा बताई जाती हैं, अटल बिहारी वाजपेयी की कुण्‍डली तो जिस ज्‍योतिषी ने देखी उन्‍होंने ही मुझे बताया कि उनके कर्क लग्‍न और लग्‍न में शनि है।

लेख बड़ा हो गया इसलिए इस बार केवल कर्क राशि का ही विश्‍लेषण करेंगे। अगली कक्षा में हम बात करेंगे सिंह और कन्‍या राशि की...

बुधवार, जुलाई 18, 2012

Astrology : Specification of Jatakas Kundali and limitations - 2


ज्‍योतिष : जातक कुण्‍डली और फलादेश, 
भविष्‍य में झांकने की संभावनाएं और सीमाएं



ganeshज्‍योतिष की विभिन्‍न शाखाओं के बारे में विचार के तहत हम बात कर रहे थे जातक कुण्‍डली (Jatak Kundali) की।  जातक कुण्‍डली को देखना शुरू करने से पहले ही कई तरह की समस्‍याएं सामने आती हैं। इनमें प्रमुख है जन्‍म समय का सही होना। जो भी जातक कुण्‍डली लेकर ज्‍योतिषी के पास आता है, वह सटीक फलादेश चाहता है, लेकिन इस बात की गारंटी देने के लिए तैयार नहीं होता है कि उसका जो जन्‍म समय बताया गया है वह मिनटों तक सही है। 

मैंने तो यह तक देखा है कि जो अधिक दावा करते हैं, आमतौर पर उनकी कुण्‍डली गलत ही निकलती है, केवल अपनी जिद को प्रदर्शित करने के लिए वे ज्‍योतिषी (Astrologer) पर दबाव डालते हैं कि वह जो समय बता रहा है वह सौ प्रतिशत सही है। ऐसे में स्‍थूल फलादेश (General prediction) फिर भी सही मिल जाते हैं, लेकिन घटनाओं की समय अवधि और सूक्ष्‍म वर्णन आमतौर पर सही नहीं मिल पाते हैं। उनमें कई बार तो महीनों तक का अंतर आ जाता है। एक लग्‍न तीस अंशों का होता है। अगर जन्‍म समय शुरूआती अंशों या आखिरी अंशों में हो तो लग्‍न बदलनें की आशंका प्रबल हो जाती है। ऐसे में जन्‍म समय को लेकर अधिक सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है। अगर लग्‍न मध्‍य में हो यानी 7-8 डिग्री से 25-26 डिग्री तक, तो एक निश्चिंतता रहती है।

शुरूआती दौर में गलत कुण्‍डलियों (Kundali) की ऐसी समस्‍या हर दूसरे तीसरे जातक के साथ आती थी। ऐसे में गुरुजी ने एक सरल पद्धति बताई जिससे इस समस्‍या का फौरी समाधान निकाला जा सकता है। वह यह कि जब भी जातक कुण्‍डली लेकर आए, उसी समय प्रश्‍न कुण्‍डली भी बना लो। अगर प्रश्‍न कुण्‍डली और जातक का प्रश्‍न उसकी जन्‍म कुण्‍डली के अनुसार मैच होता है तो जातक की लग्‍न कुण्‍डली को सही मान लिया जाए। इस फौरी समाधान से अस्‍सी प्रतिशत तक कुण्‍डलियों को जांचने का काम निपट जाता है। (प्रश्‍न कुण्‍डली पर पूर्व में लिख चुका हूं, इस सीरीज के आगे के लेखों में एक बार फिर कुछ बताने का प्रयास करूंगा)

जन्‍म समय सही मिल जाने और कुण्‍डली की जांच के बाद उसके फलादेश का काम शुरू होता है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष (Traditional vedic astrology) में लग्‍न कुण्‍डली (जो कुण्‍डली पहले पन्‍ने पर बनी हुई होती है) के सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए उसके टुकड़े राशियों के आधार पर किए गए हैं। इसी को नवमांश, (Navmansha) दशमांश या द्वादशांश कहते हैं। इसमें लग्‍न की राशि के अंशों के आधार पर विभाग कर बाकी की कुण्‍डली तैयार कर ली जाती है। 

बैंगलोर के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति (KP) ने राशि के आधार पर अंशों में विभाजन की पद्धति को पूर्णतया नकार दिया और सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए एक नई पद्धति ईजाद की, जो पाराशरीय सिद्धांत पर आधारित थी। ऋषि पाराशर ने विंशोतरी दशा पद्धति (जिसे आप दशा (Dasha) के नाम से जानते हैं) बनाई। इसमें चंद्रमा के नक्षत्र चार के आधार पर एक व्‍यक्ति के जीवनकाल को 120 साल मानकर हर ग्रह को एक निश्चित दशा का आधार दिया। दशाओं के टुकड़े भी उसी अनुपात में किए गए। इसे अंतरदशा कहा गया। अष्‍टोत्‍तरी एवं अन्‍य दशा सिस्‍टम की तुलना में विंशोत्‍तरी दशा पद्धति (Vimshottari dasha system) अधिक सटीक और वैज्ञानिक लगता है। 

केएस कृष्‍णामूर्ति ने पाराशरीय सिद्धांत की पालना करते हुए हर राशि और भाव के उसी के अनुसार टुकड़े कर दिए। ऐसे में 27 नक्षत्रों के 9-9 टुकड़े हुए। पूरी कुण्‍डली के 360 डिग्री को 249 भागों में बांट दिया गया। पारम्‍परिक पद्धति की तुलना में यह पद्धति अधिक सटीक लगती है। इसमें लग्‍न कुण्‍डली का ही विश्‍लेषण पर्याप्‍त है। नवमांश, त्रिशांश, दशमांश आदि का विश्‍लेषण अलग से करने और उनके सिद्धांत याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे में वर्तमान दौर में पारम्‍परिक की तुलना में केपी सिस्‍टम के ज्‍योतिषियों की संख्‍या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।

अगर आप केपी सिस्‍टम को जानना चाहते हैं तो कृष्‍णामूर्ति पद्धति की कुल जमा छह पुस्‍तकों में से प्रथम पुस्‍तक “कास्टिंग द होरोस्‍कोप” (Casting the horoscope) ले आएं। इसमें कुण्‍डली बनाने, दशाओं को निकालने और सूक्ष्‍म टुकड़े किए जाने की पद्धति विस्‍तार से दी गई है। 

गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

जातक की भुजिया चखने की बीमारी

जो जातक पहली बार कुण्‍डली दिखाता है वह इतना जैनुइन होता है कि उसे जो कुछ बताते हैं वह सटीक पड़ता हुआ महसूस होता है। मैं यहां कह रहा हूं कि महसूस होता है। कई बार फलादेश सटीक होते हैं तो कई बार जातक भी 'हां' कहने की मुद्रा में ही रहता है। दूसरी तरफ ऐसे जातक होते हैं जो सैकड़ों ज्‍योतिषियों को कुण्‍डलियां दिखा-दिखाकर और चूरण छाप किताबें पढ़कर ऐसे हो जाते हैं कि उन्‍हें डील करने और कुतुबमीनार से छलांग लगा देने में कोई खास अन्‍तर नहीं लगता। ऐसे जातक भाग्‍य के भरोसे ही सबकुछ पा लेने की हसरत पालने लगते हैं। इसी से शुरू होता है एक के बाद दूसरे ज्‍योतिषी के दहलीज पर कदम रखने का सिलसिला, जो कुण्‍डली के फट जाने पर भी नहीं रुकता।

 मैं अपनी बात स्‍पष्‍ट करने से पहले कुछ बात बीकानेरी भुजिया के बारे में बताना चाहूंगा। बीकानेर में भुजिया मोठ की दाल के बनते हैं। मोठ की दाल उत्‍तरी पश्चिमी राजस्‍थान की विशिष्‍ट दाल है। जाहिर है कि यह दाल देश के अन्‍य हिस्‍सों में पैदा नहीं होती। इस दाल से भुजिया बनाने के कई तरीके हैं। शुद्ध दाल के भुजिया, दाल में थोड़ी या अधिक मात्रा में चावल मिलाकर बनाए गए भुजिया, मुल्‍तानी मिट्टी मिलाकर बनाए गए भुजिया। मसालों और उपयोग में ली जाने वाली सामग्री के अलावा बनाने के तरीकों के आधार पर भी भुजिया चार तरह के होते हैं। महीन, तीन नम्‍बर, मोटे और डूंगरशाही। मसालों और आधारभूत उत्‍पादों के वैरिएशन और बनाने के इतने तरीकों के चलते हर भुजिया कारीगर की अपनी शैली बन जाती है। ऐसे में बीकानेरी लोग हमेशा एक ही दुकान के भुजिया खाने के बजाय अलग-अलग दुकानों के भुजिया चखते रहते हैं। 

Bhujia

ये तीन नम्‍बर भुजिया हैं... एक क्‍वालिटी इससे महीन और एक क्‍वालिटी इससे मोटी होती है...

अलग-अलग ज्‍योतिषियों के पास जाने वाले जातकों को मैं ऐसे ही भुजिया चखने वाले लोगों की श्रेणी में रखता हूं। पहली बार किसी ढंग के ज्‍योतिषी के पास पहुंचकर उपचार कर लेने वाले जातक को अपनी जिंदगी में प्रभावी बदलाव दिखाई देते हैं तो वह बार-बार उसी ज्‍योतिषी के चक्‍कर लगाना शुरू कर देता है। आखिर एक दिन वह ज्‍योतिषी हाथ खड़े कर देता है। जातक को भी ज्‍योतिषी का पुराना उपचार और उससे आए बदलाव उकताने लगते हैं। ऐसे में वह दूसरे ज्‍योतिषी के पास जाता है। दूसरा ज्‍योतिषी दूसरे कोण से कुण्‍डली देखता है। नए उपचार बताता है और उससे होने वाले नए लाभ बताता है। कई दिन में दूसरे ज्‍योतिषी का स्‍वाद भी 'जीभ' खराब करने लगता है तो जातक तीसरे, चौथे और ऐसे बहुत से ज्‍योतिषियों के पास जाता रहता है। इस बीच जातक को लगता है कि उसे भी कुण्‍डली की समझ पड़ने लगी है। आखिर अपनी कुण्‍डली का विश्‍लेषण करने के लिए वह एक किताब खरीद लाता है। अगर बहुत महंगे ज्‍योतिषियों से पाला पड़ा हुआ होता है तो वह शानदार और महंगी किताबें खरीदता है और अगर सस्‍ते और मुफ्त के ज्‍योतिषियों से लाभान्वित हुआ होता है तो सौ या दो सौ रुपए की किताबें खरीदकर 'पढ़ाई' शुरू कर देता है। इसके बावजूद फलादेश न कर पाता है न समझ पाता है, लेकिन प्राथमिक ज्ञान हासिल करने के बाद नए ज्‍योतिषियों से बहस करने के लिए तैयार हो जाता है।

करीब बीस ज्‍योतिषियों के चक्‍कर लगाने और पांच चूरण छाप ज्‍योतिष की किताबें पढ़ने के बाद मेरे पास फटी हुई कुण्‍डली लेकर पहुंचे जातक को देखकर ही मेरा माथा ठनक जाता है। अपने अंतर्ज्ञान से मुझे पहले ही भान हो जाता है कि अब यह कई दिन तक मुझे खून के आंसू रुलाएगा। ऐसे जातक आमतौर पर क्‍या सवाल करते हैं, इसकी एक बानगी आप भी देखिए...

- मेरी तुला लग्‍न की कुण्‍डली है, बुध की दशा में गुरु का अन्‍तर कैसा जाएगा। (भैया जैसा किताब में लिखा है वैसा ही जाएगा...)

- फलां सिंहजी ने उपचार बताया था, उससे पहले तो फायदा हुआ, लेकिन अब उपाय बेअसर साबित हो रहे हैं (फलासिंह जी को ही वापस जाकर क्‍यों नहीं पूछते)

- मेरा 2000 से 2007 तक का पीरियड को शानदार गया, लेकिन पिछले चार साल से कोई खास लाभ नहीं हो रहा है... शायद उपचार काम नहीं कर रहे (क्‍या अच्‍छा समय हमेशा बना रहेगा, या रोज लॉटरी खुलेगी)

- फलां किताब में लिखा है कि शनि और सूर्य साथ होने से मेरी अपने पिता से लड़ाई रहेगी, लेकिन मेरी तो उनसे बातचीत ही नहीं होती (तो शनि और सूर्य के सम्‍बन्‍ध को ढंग से समझने के लिए और किताबें पढ़ने की जरूरत है)

- थोड़ा बहुत समय बीच में ठीक गया था, लेकिन प्रभावी उपचार नहीं होने से मेरा पूरा समय अच्‍छा नहीं जा रहा (मैं ब्रह्मा हूं आओ पूरा समय ठीक कर देता हूं, बताओ कहां-कहां गड़बड़ लग रही है)

- काम तो कोई नया शुरू नहीं किया, यही नौकरी है, लेकिन पैसा कब होगा मेरे पास (जादू की छड़ी घुमाने भर की देरी है, जब पात्र ही नहीं होगा तो ऊपर वाला भी नेमत नहीं बरसा पाएगा)

- ये मेरी पत्‍नी की कुण्‍डली है, वह हमेशा घर में तनाव बनाए रखती है (और आपकी कुण्‍डली क्‍या कहती है --- एक हाथ से ताली बजाकर दिखाओ)

इसके अलावा कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका दूसरा छोर कहीं नहीं होता जैसे -- आप ही कुछ बता दो, -- आपको मेरी कुण्‍डली में क्‍या दिखाई देता है, -- मेरे भाग्‍य में क्‍या लिखा है, -- फलां सिंहजी ने यह बताया था, वह अब तक तो नहीं हुआ, आपका क्‍या कहना है, -- आपने अब तक जितना अध्‍ययन किया है उसके अनुसार जो भी समझ में आए सब बता दो (ये आमतौर पर फोकटिया जातक होते हैं, इन्‍हें बताया जाए कि एक प्रश्‍न का जवाब ग्‍यारह सौ रुपए मात्र है तो दोबारा जिंदगी में दिखाई नहीं देंगे)

भुजिया चखने के इन मरीजों का आज तक मुझे तो कोई इलाज नहीं मिला है, आपके पास कोई इलाज हो तो बताइएगा.. मुस्‍कान