राक्षसों का गुरू शुभ कैसे हो सकता है : शुक्र विचार

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

गुरु और शुक्र ग्रहों को लेकर हमेशा से ही भ्रम की स्थिति बनी रही है। गुरू जहां देवताओं के गुरू हैं वहीं शुक्र राक्षसों के। ऐसे में शादी विवाह आदि मांगलिक कार्यों में शुक्र उदय होना आवश्‍यक मना गया है बजाय गुरू के। अरविन्‍द मिश्रा जी को भी यही कंफ्यूजन है कि राक्षसों का गुरु उदय होता है तो मांगलिक कार्य क्‍यों होते हैं। हालांकि मिश्राजी को यह भी डर है कि किसी ज्‍योतिषी से इस सवाल का हल पूछा जाएगा तो ऊलूल जुलूल जवाब ही हाथ आएंगे। इसके बावजूद मैं प्रयास करने का जोखिम उठाना चाहता हूं।

यह समझने की बात है कि देवताओं के गुरू बृहस्‍पति और राक्षसों के गुरू शुक्र अलग-अलग खेमों का मार्गदर्शन करते हैं, लेकिन दीगर बात यह है कि इसके बावजूद भी दोनों की प्रकृति एक ही है। यानि मार्गदर्शन करना। वास्‍वत में गुरू सामाजिक प्रतिष्‍ठा, ज्ञान, लोक व्‍यवहार और ऐसे ही कई बिंदुओं के लिए जरूरी है जो इंटरपर्सनल स्किल से जुड़े हैं। वहीं शुक्र आमोद-प्रमोद, विलासिता, दैहिक आनन्‍द, स्‍टेटस और ऐसे ही कई बिंदुओं से जुड़ा है।

किसी मांगलिक कार्य में इन दोनों चीजों की सख्‍त आवश्‍यकता होती है। यानि एक ही समय में दोस्‍तों, नाते-रिश्‍तेदारों और जानकारों तक अपनी खुशी पहुंचाना और उसी खुशी को सेलिब्रेट करना। इनमें से एक भी चीज का अभाव हो तो पूरा आयोजन ही बोझ बन सकता है। शुक्र शृंगार में

गुरू या शुक्र अस्‍त हों तो माना जाता है कि वे सूर्य के काफी करीब पहुंच चुके हैं। एस्‍ट्रोनॉमिकली यह बात अलग से सिद्ध करने की आवश्‍यकता नहीं है। यह हुआ ज्‍योतिष के गणित का भाग। अब फलित ज्‍योतिष का मानना है कि अस्‍त होने की स्थिति में ग्रह अपना प्रभाव सूर्य को सौंप देते हैं। यानि ग्रहों का नैसर्गिक प्रभाव कम या खत्‍म हो जाता है। यह स्थिति भी खराब है।

यहां सूर्य के प्रभाव का अर्थ ऐसे निकाला जा सकता है कि शादी का माहौल हो और घर का मुखिया ओवर कंट्रोल की स्थिति बना दे। न बाजे बजेंगे, ना संगीत होगा और न बिना प्रोटोकॉल के दूसरे लोगों से मिलना है। यानि सबकुछ ओवर मैनेज्‍ड। यह स्थिति अधिकांश लोगों को पसंद नहीं आएगी।

इ‍सलिए कोशिश की जाती है कि मांगलिक कार्यों के दौरान गुरू और शुक्र दोनों में से कोई भी अस्‍त न हो। और दूल्‍हे या दुल्‍हन के परिजन मैरीजनस एटमॉसफीयर का पूरा आनन्‍द ले सकें।

ओलम्पिक सावे की बात

बीकानेर के पुष्‍करणा ब्राह्मण समाज में कई साल पहले तक हर चार साल में एक सावा निकाला जाता था। इसे ओलम्पिक सावा कहते थे। शिव और पार्वती के नाम पर निकाला गया यह सावा ऐसा होता था कि विवाह लग्‍न पूर्णतया शुद्ध हो और इसके आगे और पीछे के पंद्रह-पंद्रह दिन शुभ हों। इसके लिए घेरूलालजी व्‍यास के शिव मंदिर में पंडितों की टोलियां जमा होती। एक-एक सावा यानि विवाह का दिन पेश किया जाता। उस सावे को लेकर घंटों बहसें चलती। हर पंडित अपना पक्ष रखता। एक बार यह बहस ढाई दिन तक भी चल चुकी है। फिर जो सावा निकाला जाता उसमें चार सौ विवाह तक एक दिन में हो जाते। इससे एक ओर विवाह का खर्च बचता दूसरी ओर लोगों को शुद्ध सावा मिलता। कई जोड़े दो-दो साल तक इस सावे का इंतजार करते। बीकानेर की जनसंख्‍या बढ़ने के बाद सावा चार साल की बजाय दो साल में निकाला जाने लगा है। अब बहस भी घंटे दो घंटे में निपट जाती है और सर्वसम्‍मति बन जाती है। सामूहिक विवाह के इस मॉडल पर एक बार मैं पंडित मंगलचंद पुरोहितजी से बात कर रहा था। तो उन्‍होंने कहा कि अब तो लोग सावे को कम मानते हैं और कभी भी शादी करने को तैयार हो जाते हैं। यह तो भला हो गुरू और शुक्र का कि साल के दो महीने अस्‍त रहकर रोक लगा देते हैं और चार महीने चौमासा खा जाता है। वरना तो पूरे साल जीमण (भोज) के दौर चलते रहते। :)

गंगा- नर्मदा के बीच

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

कई बार योग-प्रतियोग और मुहूर्त की बातें आती हैं तो लिखा होता है कि गंगा के दक्षिण और नर्मदा के उत्‍तर में रहने वाले लोगों के लिए फलां योग लागू होगा या नहीं होगा। शेष भारत के लिए अलग योग होगा। ऐसा क्‍यों ?  

मुझे इसका कारण यह लगता है कि अधिकतर शैक्षणिक गतिविधियां इसी क्षेत्र से संबंधित रही हैं। सो अधिकतर पांचांग भी यहीं बनते रहे होंगे। अब सटीक गणनाओं और इसके लिए अपनी साख रखने वाले पांचांग पूरे भारत में वितरित होते रहे। इससे कई बार भ्रम की स्थिति पैदा होती रही होगी। सो पांचांगों में लिखा जाने लगा कि गोचर का फलां योग किन स्‍थानों के लिए लागू हो रहा है। 

भारतीय ज्‍योतिष गणनाएं शुरु से ही पूर्णता लिए रही हैं, लेकिन सूचना क्रांति के बाद तो प्रौद्योगिकी ने दुनिया के हर कोने में हर प्रकार की विधा को पहुंचने में मदद की है। ऐसे में किसी विशेष परिस्थिाति के लिए विशेष स्‍थान पर की गई गणना हर जगह फैल जाती है। सूचना क्रांति से पहले छापेखाने ने इसे देश के कोने-कोने तक पहुंचाया था। 

इससे दो तरह की समस्‍याएं हुई। एक तो यह कि एक स्‍थान के लिए की गई गणनाओं को दूसरे स्‍थानों पर भी लागू किया गया। दूसरा कि छोटे शहरों में जहां ज्‍योतिष का इतना विकास नहीं हुआ था। इस कारण उन्‍हीं गणनाओं का इस्‍तेमाल किया जाने लगा जो कि किसी दूरस्‍थ शहर के लिए की गई थी। 

जो योग सूर्य आधारित हैं उनमें भी अखण्‍ड भारत में बंगाल से कच्‍छ तक एक घण्‍टे का अन्‍तर पड़ जाता है। चंद्रमा की गति से सूर्य से भी अधिक है। सो गणनाओं में फेरबदल होना स्‍वाभाविक है। वैसे अच्‍छे पांचांगों में गणनाओं के साथ अक्षांश और देशान्‍तर के बारे में पुख्‍ता जानकारी दी गई होती है। यानि स्‍थानीय ज्‍योतिषी अपने समय क्षेत्र के अनुसार गणनाएं कर लें। 

जो पांचांग मुझे बेहतर लगते हैं 
- विश्‍वविजयी पांचांग- 
- आर्यभट्ट पांचांग - 
- लाहिरी एम्‍फीमरीज 
- गणेश पांचांग 
(हालांकि अब बूलालजी शास्‍त्री हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके पुत्र अपने पिता के मार्ग पर चल रहे हैं और श्रेष्‍ठ पांचांग बना रहे हैं। मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा के कारण ही मैं इस विषय के प्रति गंभीर हूं। वरना मेरे विज्ञान के अध्‍ययन ने तो मुझे मूढ़ ही बना दिया था।) 

जब होली भी दो बार हो ली

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

यह किस्‍सा बीकानेर के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी पंडित बाबूलालजी किराडू से जुड़ा है। एक बार पहले भी मैं उनका जिक्र कर चुका हूं। बाबूलालजी ने फलित में तो कई कीर्तीमान स्‍थापित किए ही थे, ज्‍योतिष शास्‍त्र के गणित विषय पर भी उनकी गजब की पकड़ थी। इतनी अधिक कि देश के कई प्रसिद्ध शास्त्रियों को उन्‍होंने शास्‍त्रार्थ कर पराजित किया था। तब शंकराचार्य निरंजनदेव ने बीकानेर को छोटी काशी की उपाधि भी दी। शास्‍त्रीजी ने बीकानेर से गणेण पांचांग निकालना शुरू किया। शीघ्र ही यह पांचांग इतना अधिक प्रसिद्ध हुआ कि इसकी तुलना विश्‍वविजयी पांचांग से की जाने लगी। राजस्‍थान से बाहर यानि पश्चिम बंगाल, गुजरात और अन्‍य राज्‍यों में रहने वाले लोगों और पंडितों को किसी अन्‍य पांचांग की तुलना में गणेश पांचांग पर अधिक भरोसा था।

यह संभवत: गणेश पांचांग का स्‍वर्णकाल था। यह बात करीब अठारह साल पहले की बात है। उस साल बाबूलालजी ने पांचांग जारी कर दिया। देश के अन्‍य हिस्‍सों से पांचांग बीकानेर बाद में पहुंचे। बीकानेर के ओझा पंडित तब घनचक्‍कर बन गए जब बाबूलालजी के गणेश पांचांग और देश के अन्‍य हिस्‍सों से आए पांचांग में होली की तारीखे अलग-अलग नजर आई। पंडितों ने बाबूलालजी से सम्‍पर्क किया। अब सौ बार जांच करने के बाद जारी किए गए पांचांग पर बाबूलालजी को रत्‍तीभर भी शक नहीं था। सो पूछने पहुंचे पंडितों को बाबूलालजी में दुर्वासा ऋषि नजर आए। केवल नजर ही नहीं आए सुनाई भी दिए। पंडित तो सिर पर पांव रखकर लौट आए लेकिन समस्‍या जस की तस थी कि होली की कौनसी तारीख तय की जाए। बाबूलालजी के अंधभक्‍तों की संख्‍या अच्‍छी खासी थी। उन सभी लोगों ने आंख मूंदकर मान लिया कि जिस दिन गणेश पांचां में दिया गया है उसी दिन होली है। उसके अलावा दूसरा दिन हो ही नहीं सकता। इसके अलावा एक दूसरा धड़ा और बना। इस धड़े में प्रभावशाली ज्‍योतिषी और पंडित थे। उन लोगों ने बाहरी स्रोतों से पता किया और विश्‍वविजयी पांचांग की तारीख को सही माना। अब होली से संबंधित रस्‍में सात दिन पहले शुरू हो जाती है। तो उस साल आठ दिन पहले शुरू हो गई। लोगों को कुछ भी अटपटा नहीं लगा क्‍योंकि होली की तरंग परवान पर थी। किसे सुध रहे एक दिन की। लेकिन गजब होना बाकी था। बीकानेर में होली के दूसरे दिन यानि धुलंडी के दिन व्‍यास, हर्ष, पुरोहित, रंगा, आचार्य सहित कई जातियों के लोग गेवर निकालते हैं। गेवर एक तरह की रैली होती है जिसमें लोग होली के गीत गाते हुए शहर के मुख्‍य मार्गों और मोहल्‍लों से निकलते हैं।

बाबूलालजी की बताई धुलण्‍डी अन्‍य पांचांगों से एक दिन पहले थी। सो होली के दिन बाबूलालजी के फॉलोअर्स गेवर लेकर शहर के मुख्‍य मार्गों पर पहुंच गए। भांग खाए होली के रसिकों ने समां बांध दिया। एक-दो जगह तो गेवर का स्‍वागत हुआ और महिलाएं घर में रहीं लेकिन बाकी जगहों पर महिलाएं और पुरुष नए कपड़े पहने घूम रहे थे और एक-दूसरे को शुभकामनाएं दे रहे थे। यहां दम्‍माणी चौक एक ऐसी जगह है जहां परकोटे के भीतर की होली मिलकर एक हो जाती है।

यहां का दृश्‍य देखने लायक था। एक ओर साफ सुथरे कपड़ों में लोग एक-दसरे से गप लड़ा रहे थे और अगले दिन होली खेलने की तैयारी में मशगूल थे वहीं दूसरी ओर रंगों से भीगे लोग गेवर लेकर पहुंच गए। पूरा मोहल्‍ला दो भागों में बंट गया। एक ओर बाबूलालजी के चेले रंगों और मस्‍ती में भीगे दूसरी ओर बाकी की जनता दर्शक बनी हुई थी।

इसके बाद अगले दिन बाबूलालजी के चेले राम राम के लिए रिश्‍तेदारों के घर पहुंचे तो रिश्‍तेदार होली खेलने निकले हुए थे। दो दिन घालमेल का माहौल रहा। इस तरह बीकानेर के लोगों ने एक ही साल में दो बार होली मनाई।

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उन्‍होंने कैसे किया यह सब ?

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

golgol

आज नासा की साइट पर देखता हूं तो पता चलता है कि लाखों करोड़ रुपए स्‍पेस साइंस में जो खर्च हो रहा है उससे हासिल बहुत सी जानकारियां हमारी प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष के करीब ही आ पाती हैं। उनसे आगे नहीं निकल रही। नक्षत्रों की स्थिति, उनकी आकृति, उनकी चाल, ग्रहों की चाल, ग्रहण और राहू केतु जैसे सन्निपात जो सूर्य और चंद्रमा की सापेक्ष गति का परिणाम है। यह सब पहले से बताए गए फार्मूलों के अनुसार ही हो रहा है। आधुनिक ज्‍योतिषियों को तो यह भी ज्ञात नहीं कि यह होता कैसे है। कैसे गणनाएं किसी एक बिंदु पर जाकर मिल जाती हैं। जो चीज मुझे आश्‍चर्यचकित करती है वह यह  है कि इस देश के ऋषियों ने एस्‍ट्रोनॉमी की गणित  पहेलियों को बिना साधनों के कैसे हल कर लिया।

वैसे कहा भी जाता है कि ग्रहण ने ही अब तक ज्‍योतिष को डूबने से बचा रखा है। यह सही भी है। ग्रहण एक ऐसी घटना है जो हर साल कई बार होती है और परम्‍परागत गणनाओं से निकाली गई ग्रहण की तारीख और समय इतना सटीक होता है कि आधुनिक विज्ञान वाले भी आश्‍चर्य करते हैं कि बिना लैबोरेट्री और बिना सुपर कम्‍प्‍यूटर यह कैसे संभव हुआ कि घटी और पल तक की सटीक गणनाएं निकाल ली गई। दरअसल वेदों में जिस ज्‍योतिष का उल्‍लेख हुआ है वह यह फलित ज्‍योतिष नहीं बल्कि एस्‍ट्रोनॉमी है। अब ग्रहण उन लोगों को बार-बार याद दिलाता है कि वे जिन चीजों की खोज कर रहे हैं उन सभी की खोज हजारों साल पहले एक सभ्‍यता कर चुकी है।

पश्चिम के ज्‍योतिषियों ने सूर्य को आधार बनाकर राशियों का निर्धारण किया और सूर्य की गति को स्थिर मानते हुए तारीखों के हिसाब से राशियों को फिक्‍स कर दिया। यहां एक छोटी भूल यह है कि सूर्य भी आकाशगंगा के चक्‍कर निकाल रहा है। यद्यपि भारतीय ज्‍योतिष की गणनाएं सूर्य से कहीं अधिक चलायमान चंद्रमा पर आधारित हैं लेकिन किसी भी पिण्‍ड को स्थिर नहीं माना गया है। उनमें करेक्‍शन की पद्धति भी साथ जोड़ी गई है।

कुछ सालों तक तो पश्चिमी ज्‍योतिषी अपनी पद्धति से सूर्य राशि को सही निकालते रहे लेकिन करेक्‍शन की गुंजाइश नहीं होने के कारण उनकी राशियां पिछड़ने लगी। आज स्थिति यह  है कि जब सितम्‍बर के शुरुआत में सूर्य सिंह राशि के मध्‍य में पहुंच चुका होता है तब पश्चिमी ज्‍योतिषी उसे कन्‍या राशि में दिखा रहे होते हैं। करीब एक महीने का यह गैप कई सौ सालों में पैदा हुआ है। इसीलिए जब आप देखते हैं कि भारत में बनी कुण्‍डली में सूर्य को जिस राशि में बताया जाता है पश्चिम में उससे एक राशि आगे सूर्य होता है। के. एस. कृष्‍णामूर्ति ने इस समस्‍या के समाधान के लिए अयनांश करेक्शन कर निरयण भाव चलित की कुण्‍डली बनाई। इसमें करीब चौबीस डिग्री का अन्‍तर स्‍पष्‍ट किया गया है।

फिर भी आज देखता हूं कि पश्चिमी पद्धति के ज्‍योतिषी अंग्रेजी के अखबारों और मैग्‍जीनों में अधिक छपते हैं। भले ही उनकी पद्धति और फलादेश में दम न हो, लेकिन भाषा गजब की होती है। पश्चिमी पद्धति के अधिकांश ज्‍योतिषियों में यही एक बात दीगर लगती है कि वे छोटे से पैराग्राफ में ऐसी बातें लिखते हैं कि पढ़ने वाले हजारों लोगों को लगता है कि यह बात उन्‍हीं के लिए लिखी गई है। उनमें कहीं ठोस भविष्‍यवाणी नहीं, कहीं कोई ठोस निर्णय नहीं, बस बातें और आशीर्वाद। और पढ़ने वाला भी खुश और पढ़ाने वाला भी।

ज्‍योतिष के लेखों में रुचि रखने वाले