संकेतों का ज्‍योतिषीय संदर्भ

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

पूर्व में अपने दो या तीन लेखों में अलग अलग तरीके से संकेतों की चर्चा कर चुका हूं। इस बार सीधे संकेत पर ही चर्चा करनी पड़ेगी। लेख के शुरू में ही मैं बता देना चाहता हूं कि मैं संकेतों का विशेषज्ञ नहीं हूं। हालांकि मेरी कुण्‍डली के योग और वंशक्रम में पाराशर गोत्र का होने के कारण मुझे विरासत में संकेतों को समझने की नेमत मिली है। इन्‍हें समझ लेना और इनका विशेषज्ञ होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मेरे लेख को पढ़ने वाले गुणीजनों में कोई विशेषज्ञ भी हो तो मेरा आग्रह है कि वे मेरा मार्गदर्शन करें। अब भगवान गणेश को नमन करते हुए मैं अपनी बात रखता हूं।

संकेतों से मेरा परिचय कब का है पता नहीं लेकिन जब ज्‍योतिष सीखी तो इसे समझने का क्रम भी शुरू हुआ। गुरूजी प्रदीप पणियाजी ने मुझे बताया कि मैं अपनी विशेषता का कैसे इस्‍तेमाल कर सकता हूं। इसके लिए पहले जरूरत है ओमेन को समझने की। हमारे चारों ओर का वातावरण हम पर और हम अपने वातावरण पर नियमित रूप से प्रभाव डालते हैं। भले ही हम इसके लिए सक्रिय रूप से सोच रहे हों या नहीं। यह देखने में ऐसी बात लगती है जैसा कि चण्‍डूछाप तांत्रिक कहते हैं या फिर बहुत सिद्ध योगी। ईश्‍वर ने किसी भी एक को विशेषाधिकार देकर नहीं भेजा है। उसकी नजर में सब बराबर हैं। हां कभी कभार लगता है कि वह खुद तक एप्रोच बनाने के रास्‍ते सभी को अलग-अलग देता है। कोई बात नहीं पहुंचेंगे तो वहीं। तो जब ईश्‍वर ने सभी को एक जैसी शक्तियां दी हैं तो हर कोई उसे इस्‍तेमाल भी कर सकता है, निर्भर करता है कि अपनी सोई शक्तियों को जगाने के लिए हमने कितना प्रयास किया।

चाहे हेमवंता नेमासा काटवे हों या के.एस. कृष्‍णामूर्ति सभी यही कहते हैं कि जब हम अपने आस-पास के वातावरण के प्रति संवेदनशीलता खो देते हैं तो आगामी घटनाओं की जानकारी लेने के लिए ज्‍योतिष का सहारा लेना पड़ता है। कई साल ज्‍योतिष के साथ जुड़े रहने के बाद अब यह बात समझ में आने लगी है। कैसे हम घटनाओं और वस्‍तुओं के साथ तारतम्‍य बना लेते हैं और कैसे पूर्व की घटनाएं, वस्‍तुएं और अन्‍य संकेत आने वाले समय की सूचना देने लगते हैं।

एक उदाहरण देना चाहूंगा। यह मेरा सुना हुआ है। हो सकता है इसमें अतिरंजना हो लेकिन समझने के लिए अच्‍छा है। सामान्‍य बातें धीरे-धीरे समझ में आती है और अतिरंजना बड़ी तस्‍वीर का काम करती है।

एक वणिक था। उसे एक पंडित ने कहा कि रोजाना किसी ने किसी भूखे या अतृप्‍त को भोजन कराओगे तो तुम्‍हारा व्‍यवसाय दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। वणिक ने भोजन कराना शुरू भी कर दिया। कुछ दिन में उसका व्‍यवसाय फलने फूलने लगा। एक दिन ऐसा हुआ कि उसे सुबह से दोपहर तक कोई अतृप्‍त नहीं मिला। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है लेकिन नहीं मिला। सो वह ढूंढता हुआ पहाड़ी की ओर निकल गया। वहां एक सांड जैसा आदमी सोया हुआ दिखा। उसके होठों पर भी पपड़ी जमी हुई थी। वणिक ने सोचा यही सही व्‍यक्ति है। उसने पालकी मंगवाई और उस बलिष्‍ठ दिखने वाले व्‍यक्ति को घर ले आया। उसे पानी पिलाकर होश में लाया और भरपेट खाना खिलाया। थोड़ी ही बातचीत में पता चल गया कि वह शरीर से तो तंदुरुस्‍त है लेकिन अकल से गूंगा है। जैसे ही उस आदमी ने खाना खाया उसे जोश आ गया। खाना खिलाने के बाद वणिक ने तो उस आदमी को विदा कर दिया लेकिन रास्‍ते में उस मेंटली रिटार्टेड आदमी ने सड़क पर पड़ा लठ्ठ लेकर एक गाय पर भीषण प्रहार किया। इस प्रहार से गाय की मौत हो गई। उधर गाय मरी और इधर वणिक की हालत खराब होने लगी। एक जहाज विदेश से माल लेकर आ रहा था वह पानी में डूब गया। राजा ने शास्ति लगा दी। व्‍यापार में घाटा आने लगा। अब वणिक भागा वापस ज्‍योतिषी के पास। ज्‍योतिषी से पूछा कि आपके बताए अनुसार उपचार किए लेकिन मेरी तो हालत खराब हो रही है। कहां चूक हुई। ज्‍योतिषी ने पिछले कुछ दिनों का हाल पूछा और पता लगाने की कोशिश की कि कहां गड़बड़ हुई है। काफी देर की कसरत के बाद पता लगा लिया गया कि गाय की मौत का ठीकरा वणिक के सिर फूटा है। इसके दो कारण हैं। गाय को मारते वक्‍त उस आदमी के पेट में वणिक का अन्‍न था। तो उस आदमी के सिर दोष होना चाहिए। हो भी सकता था लेकिन वह आदमी को मेंटली रिटार्टेड था सो उसे इस बात का विवेक ही नहीं था। यानि वह केवल वणिक और गाय की मौत के बीच माध्‍यम भर बना था। इसके बाद ज्‍योतिषी ने गाय की हत्‍या के कुछ उपचार वणिक को बताए। उन्‍हें करने के बाद वणिक की स्थिति वापस सुधरने लगी।

इसमें अतिरंजना तो यह हुई कि उपचारों पर ही पूरा व्‍यापार खड़ा कर दिया गया है, दूसरा यह कि गणना से यह पता लगा लिया गया कि गाय की मौत हुई है। जो भी हो कहानी है...

मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम ऐसे करते हैं जिनका मंतव्‍य अच्‍छा होता है और काम भी अच्‍छे दिखते हैं लेकिन उनके परिणाम कितनी दूरी पर जाकर क्‍या रंग लाते हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। वणिक नहीं चाहता था कि गाय की मौत हो लेकिन हुई और वणिक उसका एक बड़ा कारण बना। न वह उस आदमी को घर लेकर आता और न उसे खाना खिलाता तो गाय की मौत नहीं होती।

तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के कामों का क्‍या परिणाम निकलेगा इसका पता कैसे लगाया जाए। जैसा कि मस्तिष्‍क पर शोध करने वाले लोग कुछ साल पहले तक कहते थे कि हम अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत हिस्‍सा काम में लेते हैं, कुछ दिन पहले तक कहने लगे कि एक प्रतिशत ही काम में लेते हैं और कुछ समय पहले तो सुना कि एक प्रतिशत से भी कम काम में लेते हैं। इसीलिए मुझे विज्ञान और इसमें शोध कर रहे लोगों पर कभी पूरा भरोसा नहीं होता। खैर जो भी है...

शेष 99 प्रतिशत भाग अवचेतन का है। वह हमारे लिए गणना करता है कि आपकी गतिविधियों, आपके व्‍यवहार, मौसम, आपके घर का सामान, आपके दोस्‍तों, उनके द्वारा बोली गई बातों, रास्‍ते में बज रहे संगीत, बस में आपकी सीट के पास बैठे व्‍यक्ति की हरकतों, पशु पक्षियों की मुद्राएं और आवाजों और हजारों संकेतों के क्‍या मायने हो सकते हैं। चूंकि हम एक विशिष्‍ट भाषा और शैली से बोलना, चलना और समझना सीखते हैं। जिंदगी के पहले पांच सालों में इसकी जबरदस्‍त ट्रेनिंग होती है। बस वही भाषा हमें आती है। बाकी संकेतों को हम उतने बेहतर तरीके से समझ नहीं पाते। एलन पीज ने अपनी पुस्‍तक बॉडी लैंग्‍वेज में इसी अवचेतन के संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। स्‍टीफन आर कोवे इसी अवचेतन को सक्रिय करने के लिए सात आदतें डालने का आग्रह करते नजर आते हैं।

अब फिर से बात करता हूं कि जिन लोगों ने भविष्‍य देखने या इंट्यूशन की प्रेक्टिस नहीं की है उन्‍हें यह सब कैसे और क्‍यों दिखाई देता है। ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण से कुण्डली का आठवां भाव और बारहवां भाव तथा राहू और कमजोर चंद्रमा हमें ऐसे दृश्‍य देखने और सोचने में सहायता करते हैं। आम चिकित्‍सक के पास जाने पर वह आपको खुद को व्‍यस्‍त रखने की सलाह देता है। अल्‍पनाजी को यह पता है। उन्‍होंने इसके अलावा कोई और उपाय हो तो बताने के लिए कहा है। ठीक है एक सवाल के साथ...

अब यहां एक और गंभीर सवाल है जो आमतौर पर नए ज्‍योतिषीयों के समक्ष आता है वह यह कि इंट्यूशन और कल्‍पना में क्‍या अन्‍तर है। मैंने अपने लेख इंट्यूशन और कल्‍पना में अन्‍तर में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की थी। इसमें मैंने कुछ हद तक स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है कि दोनों में क्‍या अन्‍तर है। कई बार हमारे भय,  चिंताएं, विचारों की शृंखला, भीषण घटनाएं हमारे दिमाग में अनिष्‍ट या ईष्‍ट की इच्‍छा के बुलबुले बनाने लगते हैं। नए ज्‍योतिषियों के साथ तो ऐसा होता है कि वे जातक की आर्थिक स्‍िथति और पर्सनेलिटी तक से प्रभावित हो जाते हैं और उसके सुखद या दुखद भविष्‍य की कल्‍पना कर बैठते हैं। वे इतने जोश में होते हैं कि उसी कल्‍पना को इंट्यूशन समझकर फलादेश भी ठोंक देते हैं। जब जातक लौटकर आता है तो शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है।

इसी दौरान एक और बात आई वह थी एक ही अंक का बार बार दिखना। अखिल तिवारी जी कहते हैं कि पिछले कई सालों से एक विशेष समय को कभी घड़ी, कभी मोबाइल. कभी कंप्यूटर तो कभी कही भी, दीवाल पे, नही तो सामने जाती हुई गाड़ी के नम्बर पर.. एक विशेष combination (12:22) रोज दीखता है.  हम किसी भी दो संयोगों को मिलाकर चार कर सकते हैं। और जब तक दो और दो चार होते रहें तब तक तो ठीक है लेकिन कई बार यही दो और दो पांच दिखने लगे तो कठिनाई आती है। अब इसी उदाहरण की बात की जाए तो मैं सोच सकता हूं कि इस विशेष नम्‍बर से कहीं उनका जुड़ाव होगा। अगर वे देखने की बजाय आब्‍जर्व करने लगें तो पता चलेगा कि केवल ये विशेष संख्‍याएं ही नहीं अनन्‍त संख्‍याएं उनके सामने आती हैं लेकिन जिंदगी में कही न कहीं इन संख्‍याओं से जुड़ी याद होने के कारण ये अधिक तेजी से उनके दिमाग में ब्लिंक करती हैं। अब संख्‍या तो आ रही है लेकिन उसके साथ जुड़ी याद अवचेतन में पीछे कहीं दूर धकेल दी गई है। सो उनका परेशान होना स्‍वाभाविक है। अगर मैं एक न्‍यूमरोलॉजिस्‍ट की तरह बात करूं यानि सिट्टा हाथ में उठा लूं, तो पहले तो इन संख्‍याओं को जोडकर सात बना लूंगा। फिर बताउंगा कि चूंकि ये संख्‍याएं दो भागों में बंटी है इसलिए पहले तीन का और बाद में चार का असर आएगा। यानि तीन की संख्‍या से गुरू और चार की संख्‍या से सूर्य आता है। इससे पता चलता है कि जब आप किसी प्रॉब्‍लम में उलझे होते हैं तो आपको किताबों और ऑथेरिटी की जरूरत होती है। अगर अखिल जी मेरी बात को सीरियस लेते हैं तो वे याद करेंगे और उन्‍हें याद भी आ जाएगा कि उन्‍होंने कई बार प्रॉब्‍लम में होने पर किताबों में जानकारी ली और अपने सीनियर्स की मदद भी। लेकिन एक सिस्‍टम एनालिस्‍ट ऐसे नहीं बनता है। यकीन मानिए। उसे समस्‍याओं को खुद ही हल करना होता है। चाहे किसी की भी सहायता ले लेकिन लगातार सामने आ रही समस्‍या उसकी निजी होती है और उससे लड़ने वाला भी वह खुद ही होता है। अब जिन बातों का जस्टिफिकेशन हमारे पास नहीं होता उन बातों के लिए हम उन लोगों पर निर्भर हो जाते हैं जिन्‍हें वास्‍तव में खुद कुछ नहीं मालूम। जैसा कि मेरे एक दोस्‍त कहते हैं दो अंधे मिलकर एक आंख से देखने लगते हैं। अब (12:22) संकेत तो है लेकिन भविष्‍य का हो जरूरी नहीं।

अब बात पराभौतिक कनेक्‍शन की: यह हर किसी का होता है। चाहे वह उसे प्रदर्शित कर पाए या नहीं। जब हाजिर दिमाग काम करना बंद कर देता है तब यह पराभौतिक कनेक्‍शन अधिक मुखरता से महसूस होने लगते हैं। हम किसी से कोई बात करते हैं, कोई जानकारी लेते या देते हैं, कोई गाना सुनते हैं, कोई समाचार देखते हैं तो दिमाग तत्‍काल जो रिएक्‍शन देता है वह हाजिर दिमाग की होती है। मान लीजिए कि आपने टीवी में एक सड़क दुर्घटना का दृश्‍य देखा। इससे आपके दिमाग में हाथों हाथ यह आएगा कि आजकल सड़क दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं, लोग लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं वगैरह वगैरह.. कुल मिलाकर तात्‍कालिक प्रतिक्रियाएं तत्‍काल आती हैं और समाप्‍त भी हो जाती हैं। इसी दौरान आपका अवचेतन गणना करने लगता है। (यह केवल उदाहरण के लिए है सिद्धांत नहीं) वह आपको याद दिला देता है कि आपका छोटा भाई भी लापरवाही से गाड़ी चलाता है। आजकल किसी बड़े शहर में है जहां उसके पास दुपहिया वाहन भी है। हालांकि दुपहिया वाहन कम चलाता है लेकिन चलाता तो है। अब दूसरा विचार कि आपके भाई का शहर और दुर्घटना वाला शहर कितना मिलता जुलता है। इस जैसे हजारों विचार दिमाग के बैकग्राउंड में चलते हैं। इसी दौरान आपके भाई का दोस्‍त भी यही देख रहा होता है और शायद उसका अवचेतन भी ऐसी ही कुछ चाल चलता है। अब आप और आपके दोस्‍त का भाई कहीं रास्‍ते में मिलते हैं। आपका दिमाग बात करता है गाड़ी को सही मेंनटेंन करने और सही तरीके से चलाने के बारे में यही आपके भाई के दोस्‍त के दिमाग में भी चल रहा होता है। दोनों मिलकर बात कर लेते हैं। और निष्‍कर्ष निकाल लेते हैं कि आपका भाई तो ढंग से गाड़ी चलाता है। इसके लिए कहीं भी आपके भाई या दुर्घटना का जिक्र नहीं होता। लेकिन मैसेज कन्‍वे हो गया। अब आपकी चिंता बढ़ रही है और आप अपने भाई को फोन लगाते हैं तो वह वही बातें कर रहा होता है जो आपने अब तक सोची थी। लेकिन वह यह बताना भूल जाता है कि उसके दोस्‍त का भी फोन आया था। आपकी सोच बदल जाती है। आप सोचने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। जबकि तीनों लोगों के अवचेतन इस कांबिनेशन को बना रहे थे। यह एक उदाहरण है। लेकिन इससे स्‍पष्‍ट हो सकता है कि कैसे हम कोई बात सोचते हैं दूसरा उसी बात को बोलता है। इसे मैं दो लोगों के एक ही मानसिक स्‍तर में होना कहता हूं। साइकोलॉजिस्‍ट क्‍या कहते हैं मुझे पता नहीं। अब अल्पना वर्मा जी कहती हैं कि एक व्यक्ति को कभी कभी कोई घटना -अक्सर दुर्घटना - दिमाग में बार बार तब तक दिखायी देती रहे..और कुछ दिन में या कुछ घंटे या मिनटों के अन्तर पर वो सच हो जाए। कभी कोई मिलने आने वाला हो और घर के नज़दीक होने पर उस की तस्वीर दिमाग में स्पष्ट दिखायी दे। यह यकीनन कोई मनोरोग नहीं है। हां यह मनोरोग नहीं है बस आपके अवचेतन का एक ट्रेलर मात्र है। बिल्‍कुल वैसी की वैसी घटना न भी हो तो आपकी कल्‍पना की घटना और वास्‍तविक घटना की एकरूपता को जस्टिफाई आपका दिमाग ही तो करेगा। अगर वह क्रूर विश्‍लेषण करे तो दोनों घटनाओं में हजारों अन्‍तर ढूंढ निकालेगा और मनोविनोद की बात हो तो अंतर ढूंढने का कारण ही नहीं रह जाएगा। हम भविष्‍य तो देख भी लें तो वह वैसा हमारे सामने कभी नहीं आएगा जैसा कि वास्‍तव में है। बस संकेत आते हैं। आप जिनती कुशलता से इन संकेतों को समझ लेते हैं वही भविष्‍य की या दूरदृष्टि है।

शेष शुभम्

शायद... मेरी लॉटरी लग गई है

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

जब ब्‍लॉग में लिखना शुरू किया तो लगा कि लोग पढ़ेंगे और मुझसे सवाल जवाब करेंगे। इससे एक ओर मैं अपना अध्‍ययन जारी रख सकूंगा और दूसरी ओर मुझे लोगों की आम जिज्ञासाओं की जानकारी भी मिलेगी। लेकिन शुरू में दो तरह के लोग लगातार आ रहे थे। पहले वे जो अपनी समस्‍याएं पूछ रहे थे तो दूसरे शाबासी दे रहे थे। नए विचार और नए सवाल नदारद ही रहे। मैं इसे अपने संप्रेषण की चूक मानता हूं। अगर मैंने सही तरीके से संदेश पहुंचाया होता तो मुझे सही सवाल मिलते।

देर आयद दुरुस्‍त आयद...

अब तो लगता है जैसे लॉटरी ही खुल गई है। जैसे ही मैंने आग्रह किया कि विचार चाहिए, अंतरजाल से विचारों की बारिश शुरू हो गई है। पिछली दो पोस्‍ट मैं उधार के विचारों पर लिख चुका हूं। अब अगली पोस्‍ट के लिए अल्‍पना जी और विष्‍णु बैरागी जी मुझे विचार दे चुके हैं।

उन्‍होंने सवाल खड़ा किया है कि ' विज्ञान के इस युग में ऐसी बात शायद अविश्वसनीय लगे - मगर एक व्यक्ति को कभी कभी कोई घटना -अक्सर दुर्घटना - दिमाग में बार बार तब तक दिखायी देती रहे..और कुछ दिन में या कुछ घंटे या मिनटों के अन्तर पर वो सच हो जाए। कभी कोई मिलने आने वाला हो और घर के नज़दीक होने पर उस की तस्वीर दिमाग में स्पष्ट दिखायी दे.यह यकीनन कोई मनोरोग नहीं है-यह परामनोविज्ञान से जुडा हुआ प्रश्न है। इस तरह की घटनाएँ अक्सर बहुत परेशान करने वाली होती हैं.और बैचनी को बढाती हैं.ऐसा मेरी एक करीबी सहेली के साथ होता है। ख़ुद को व्यस्त रखने के अलवा क्या कोई और उपाय सुझायेंगे?

यह सवाल बहुत गहरा और जरूरी भी है। वास्‍तव में हम लोग रोजाना नहीं तो कई मौकों पर ऐसी पराभौतिक परिस्थितियों से रूबरू होते हैं। इस बारे में मैं थोड़ी लम्‍बी पोस्‍ट लिखूंगा। बस एक दिन लगेगा। विष्‍णु बैरागी जी के अंधों के हाथी पर भी एक लम्‍बी पोस्‍ट के लिए तैयार रहिए। उसमें मैं जमकर बोर करूंगा। :)

कुछ सवालों के जवाब में पोस्‍ट

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

बस सुंदर हो घर पिछली पोस्‍ट में जो सवाल आए उन्‍हें लिखने बैठा तो लगा कि पूरी पोस्‍ट ही बन जाएगी। सो कॉपी पेस्‍ट किया और पोस्‍ट ही ठेल रहा हूं। सवाल पिछली पोस्‍ट में है यहां जवाब लिख रहा हूं।

रंजना जी अगर आपको अपना घर रेलगाड़ी के डब्‍बे जैसा लगता है तो इसमें घर का नहीं बल्कि घर में जिस तरह के वस्‍तुएं जमाई गई हैं उस तरीके का दोष है। यकीन मानिए कोई घर खराब नहीं होता। कुछ हमारे खुद के प्रयास तो कभी चेतना को प्रभावित करने वाली वस्‍तुओं के जमाव का तरीका बदलने से घर के प्रति आपका और अन्‍य देखने वालों का बदल जाएगा। कोशिश कीजिएगा तो अच्‍छे परिणाम भी आएंगे। वास्‍तव में हमारा दृष्टिकोण अहम है बजाय व्‍यवस्‍थाओं के।

सीमाजी प्रोफेशनली कहूं तो घर के अंक का महत्‍व है। क्‍योंकि अंक विद्या ने पता नहीं कितने घरों में सुबह शाम का आटा चावल दाल का प्रबंध किया हुआ है। मंदी के दौर में जो विद्या दो पैसे कमाने के लिए आधार दे, वह सही है। वैसे वास्‍तु की दृष्‍िट से घर के अंक को कैसे लिया जाए यह मैं नहीं जानता क्‍योंकि जब ग्रामीण परिवेश था तो वहां नगर निगम, नगर परिषद या नगर पालिकाएं नहीं थी। इससे पहले कबीलाई संस्‍कृति में ऐसा नहीं रहा होगा। प्राचीन शहरों में भी गृहस्‍वामी का महत्‍व अंक से अधिक रहा होगा। अंक तो अब नई व्‍यवस्‍था में आए हैं जब लोग नाम की बजाय अपने घर, मोबाइल या गाड़ी के नम्‍बर से पहचाने जाने लगे हैं। इन अंकों को बेवजह वास्‍तु या भाग्‍य से जोड़ने की तुक समझ में नहीं आती सिवाय इसके कि आपके वास्‍तुकार का सिट्टा सिक रहा हो।

अल्‍पनाजी, आपके सवाल के जवाब में एक और सवाल कि क्‍या किसी बच्‍चे को जन्‍म के गोलू या चुन्‍नू कहा जाए तो क्‍या बाद में उसका नाम नहीं रखा जा सकता। यही स्थिति पूजन के बारे में भी है। पद्धति तो कहती है कि नींव खोदते समय ही पूजन करा लेना चाहिए। लेकिन हमारी व्‍यवस्‍था इतनी लचीली है कि बाद में भी पूजन के कई प्रावधान रखे गए हैं। आप किसी अच्‍छे पंडित से मिलकर पूछ लें। वह आपको कोई गृह शुद्धि का पूजन बता देगा। करा लें। इससे आपका वहम भी खत्‍म होगा और कोई वास्‍तु संबंधी बाधा होगी तो उसका भी निराकरण हो जाएगा। एक बार फिर कहता हूं घर अच्‍छा या खराब नहीं होता उसके प्रति हमारी दृष्टि महत्‍वपूर्ण है। एक ही घर में मां-बाप खुश और संपन्‍न रहते हैं उसी घर को लेकर बाद में बच्‍चे लड़ते झगड़ते रहते हैं। बिना वास्‍तु में बदलाव के।

राजीव माहेश्‍वरी जी का सवाल जोरदार है। वह इस सेंस में कि मैं जहां रहता हूं वहां अब तक फ्लेट सिस्‍टम शुरू नहीं हुआ है। इक्‍का दुक्‍का सरकारी बिल्डिंगें हैं जिनमें दो या तीन मंजिलें बनाई हुई हैं। बाकी अधिकांश घर अब भी जमीन पर ही बन रहे हैं। तो यह महानगरीय सवाल हुआ। इसके लिए मुझे एक बार महानगरीय अंदाज में सोचना पड़ेगा। मैं अपने कुछ वरिष्‍ठ साथियों से भी बात करूंगा और इसके लिए वास्‍तव में जमीनी तौर पर क्‍या सिद्धांत होने चाहिए इस पर चर्चा कर कोई निष्‍कर्ष निकालने का प्रयास करेंगे। वैसे गृह प्रवेश का पूजन अपने आप में पूर्ण होता है।

कब तक डरते रहोगे साढ़ेसाती से

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

बहुत जगहों पर पढ़ता रहा हूं। साढ़ेसाती के बारे में। अब तक सैकड़ों सवाल भी सुन और झेल चुका हूं। हर बार समझाने की कोशिश करता हूं कि साढ़ेसाती से डरने का कोई फायदा नहीं है। इसका कोई उपचार भी नहीं है। तो इतना पुस्‍तकों, मैग्‍जीनों, न्‍यूज चैनलों और पंडितों के यहां साढ़े साती के बारे में सुना है क्‍या सब फिजूल है।

मेरा जवाब है हां जी सबकुछ फिजूल है। मैं स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करता हूं। पहले यह कि साढ़ेसाती होती क्‍या है। आपकी कुण्‍डली में चंद्रमा जिस राशि में जिस डिग्री पर बैठा है उस चंद्रमा से 45 डिग्री के घेरे में जब गोचर का शनि (यानि फिलहाल जो शनि की गति है उसके हिसाब से) आता है तो आपको शनि की साढ़ेसाती लग जाती है। साढ़ेसाती का अर्थ है यह साढ़े सात साल तक चलती है। 45 डिग्री के दायरे में आने के साथ शुरू होती है और चंद्रमा से आगे निकलकर 45 डिग्री दूर चली जाए तब तक चलती है। एक राशि तीस डिग्री की होती है। शनि का एक राशि में भ्रमण ढाई साल का होता है। चंद्रमा के दोनों ओर डेढ़ डेढ़ राशि तक इसका भ्रमण यह स्थिति पैदा करता है। यानि ढाई ढाई साल के तीन हिस्‍से किए जा सकते हैं।

अब सवाल कि यह करती क्‍या है। जैसा कि मैंने किताबों में पढ़ा है और मेरे वरिष्‍ठजनों से राय ली है साढ़े साती हमें अधिक मेहनत करने के लिए विवश करती है। जब हम समय के साथ इसके अनुसार दौड़ नहीं पाते तो निठल्‍ले होकर बैठ जाते हैं। किसी व्‍यक्ति पर साढ़ेसाती का बुरा प्रभाव है या नहीं यह चैक करने के लिए मेरे पास एक बहुत आसान रास्‍ता है। मैं उस व्‍यक्ति से पूछता हूं कि अभी क्‍या समय हुआ है। साढ़ेसाती का पीडि़त अधिकांशत: इसका गलत जवाब देगा। अगर शनि खराब प्रभाव नहीं कर रहा है तो जवाब सही आएगा। इस फार्मूले को निकालने के पीछे ठोस कारण यह है कि खराब शनि हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्‍टम पर आक्रमण करता है और हमारे दैनिक कार्य करने में भी परेशानी आने लगती है। इसी से शुरू होती है टाइमिंग की समस्‍या। यानि गलत समय पर आप सही जगह पर पहुंचते हैं या सही समय पर गलत जगह पर। यह साढ़ेसाती का दूसरा बड़ा साइन है।

यह तो मैंने बताया कि समस्‍या कहां दृष्टिगोचर होती है और कैसे होती है। अब सवाल कि इससे डरा क्‍यों जाए और डरा क्‍यों न जाए। पहले सवाल का जवाब है कि जब पता चल गया कि शनि की साढ़ेसाती टाइमिंग और टाइम सेंस को खराब करती है तो सबसे पहले इसी पर चेक लगाया जाए। यानि इसे दुरुस्‍त करने के जमीनी उपाय शुरू कर दिए जाएं। मसलन घड़ी पहनी जाए और दिनांक और समय के प्रति सचेत रहा जाए। प्‍लान बनाकर काम किए जाएं और जहां जाएं वहां समय नष्‍ट करने के बजाय पूर्व में पूरी जानकारी एवं समय लेकर पहुंचा जाए। इसी तरह के खुद के मैनेजमेंट के हजारों उपाय हैं।

इससे साढ़ेसाती का असर नब्‍बे प्रतिशत तक कम हो जाएगा। दूसरा सवाल कि डरा क्‍यों न जाए। वह इसलिए कि एक आदमी की औसत आयु सत्‍तर साल भी मान ली जाए तो उस व्‍यक्ति की जिंदगी में तीन बसा साढ़ेसाती आएगी। यानि साढे़ बाइस साल तक साढ़ेसाती का काल रहेगा। यही नहीं कुछ योग शनि के कंटक के भी बनेंगे। यानि उस दौरान भी साढ़ेसाती के कुछ असर रहेंगे। इस तरह तो पहले चालीस साल के सक्रिय जीवनकाल में ही पंद्रह साल ऐसे आ जाएंगे जब इस डर के साथ जीना पड़ेगा। अब यह बात कैसे मानी जा सकती है कि किसी व्‍यक्ति के चालीस में से पंद्रह साल तो खराब ही हो गए। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। साढ़े साती पूरी तरह खराब भी नहीं होती। अपने तीन चरणों में वह सिर, पेट और पैर में या इससे ठीक उल्टे क्रम में रहती है। जब सिर में होगी तो सोचने के लिए मजबूर करेगी और जब पांव में होगी तो दौड़ने के लिए और जब पेट में होगी तो ढेर सारा धन दिलाएगी। यानि पेट भर देगी। अगर ऐसी है साढ़ेसाती तो डरने की नहीं बल्कि रोलर कोस्‍टर राइड करने का समय है। तो अब मैं सोच सकता हूं कि इस बार जब कोई आपको बताएगा कि आपकी साढ़ेसाती शुरू होती है अब... और आपको दिमाग में आएगा कि ठीक है चलो चलते हैं राइड पर।

कब चिंता करनी चाहिए...

जब आपके किसी वृद्ध परिजन को साढ़ेसाती लगे तो चिंता करनी चाहिए। आमतौर पर तीसरी साढ़ेसाती जीवन के साथ ही खत्‍म होती है और तीसरी किसी तरह निकल जाए तो चौथी आखिरी होती है। हर कोई जानता है कि वृद्ध लोग रोलरकोस्‍टर राइड नहीं कर पाते हैं। साढेसाती में यही होता है। इसी से बड़े बूढों को दिल और दिमाग की बीमारियां होती है। कुछ लोग शारीरिक रूप से थक कर हार जाते हैं तो कुछ मानसिक लड़ाई में टूटते हैं। लेकिन जवानों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता।

मैंने आपकी जिंदगी के पहले पचास साल सिक्‍योर कर दिए हैं साढ़ेसाती के प्‍वाइंट आफ व्‍यू से। अब आपकी बारी है मुझे नया विचार देने की। :)

वास्‍तु और इसके नियम

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

पिछली पोस्‍ट में एक बेहतरीन सवाल मेरे पास आया वह यह कि जिन घरों में भूमि पूजन नहीं कराया गया हो वहां कैसे सुख समृद्धि रहेगी। वास्‍तु के हिसाब से वे कैसे अच्‍छे घर सिद्ध हो सकते हैं। यह सवाल किया था अल्‍पना वर्मा जी ने उन्‍हीं के शब्‍दों में

'अगर किसी कारणवश किसी इमारत को बनाने से पहले नींव पूजन न होसके तो क्या करना चाहिये?
भारत के अलावा कई पश्चिमी देशों में भूमि पूजन या नींव पूजन आदि नहीं कराये जाते तब भी वहां सब ठीक रहता है.'

यहां मैं बताना चाहूंगा कि वास्‍तु विषय के मुताबिक पूजन कराना अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि एक सुविधा है। यानि अगर पूजन नहीं भी कराया है तो उस घर में सुखी और समृद्ध बनकर रहा जा सकता है। लेकिन अब भी वास्‍तु के नियम वही रहेंगे।

बात कुछ उलझ रही लग सकती है। ठीक है पहले समझते हैं वास्‍तु आखिर में है क्‍या। किसी भी स्‍थान की अवस्‍था को वास्‍तु कहा जा सकता है। स्‍थान की अवस्‍था का आकलन करने के लिए यह देखा जाएगा कि वह कहां स्थित है, हवा, पानी, रोशनी आदि की कैसी व्‍यवस्‍था है, घर के बाहर के क्‍या हालात हैं आदि। यह तो हुई स्‍थान की इंडिपेंडेंट बात। अब उस स्‍थान के मालिक और स्‍थान में भी एक संबंध होता है। यही संबंध तय स्‍थान पर हुए निर्माण में दृष्टिगोचर होता है। कैसे ?

बहुत सामान्‍य बात है। शनि से प्रभावित लोगों के घरों में आप ट्यूबलाइट अधिक देखेंगे और वह भी धीमी जल रही होगी। बाकी अधिकांश घर ऐसा होगा कि दिन में भी अंधेरा महसूस हो। मंगल और सूर्य से प्रभावित लोग अपने घर के आगे और पीछे इतनी जगह छोड़ते हैं कि देखने वाले को लगता है कि जमीन कुछ ज्‍यादा ही बड़ी ले ली लेकिन घर छोटे भाग में ही बनाया है। हर व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व की छाप उसके आवास पर दिखाई देगी। अब यह तो बात हुई वास्‍तु की उपस्थिति की। अब यह पूजन का क्‍लॉज कब जुड़ गया। मैं तो कहूंगा कि यह भी जरूरी भाग है। प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक भारत से शुरू से ही नहीं समझा। पहले योगियों का भी मजाक उड़ाया जाता था अब योग फैशन बन रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि प्राणायाम के क्‍या क्‍या लाभ हैं इसका निर्णय होना अभी बाकी है। यह न केवल सामान्‍य रोगों को ठीक करता है बल्कि कई प्रकार के जेनेटिक डिसऑर्डर को भी दुरुस्‍त कर देता है। ऐसी ही स्थिति नींव पूजन के साथ भी है। बहुत से लोगों को पता नहीं है कि इसका क्‍या महत्‍व है।

लेकिन जब तक इसका महत्‍व लैबोरेट्रीज में पता चले उससे पहले तो कम से कम इसे जिंदा रखने के लिए हमें भूमि पूजन कराते रहना चाहिए। रही बात पश्चिमी सभ्‍यता के लोगों की जो भूमि पूजन नहीं कराते हैं। वे हमारी तरह ही कभी सुखी कभी दुखी होते रहते हैं। हां हम एक बात में उनसे आगे रहते हैं वह यह कि हमें महसूस होता है कि हां कोई तीसरी शक्ति है जो पर्दे के पीछे रहकर लगातार हमारी सहायता कर रही है। बस यही है भूमि पूजन का वास्‍तविक महत्‍व...

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मेरा शहर बीकानेर, अगली बार बताउंगा विश्‍व और आपके शहर का वास्‍तु

निष्‍कपट सवाल और नालायक ज्‍योतिषी

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

आज क्षमा दिवस नहीं है 

मैं जानता हूं 
लेकिन फिर भी दिल में कुछ कचोट रहा है सो मेरे अजीज लोगों से माफी मांगने का दिल कर रहा है। 
पिछले दस महीने में सैकड़ों लोगों ने मुझे सवाल पूछे। कई महीने तो ऐसे बीते कि एक ही महीने में सवालों का आंकड़ा सौ को पार कर गया। इनमें से बहुत से लोग जानते हैं कि ज्‍योतिष दर्शन पर लिखने वाला यह जोशी बातें तो बड़ी-बड़ी करता है लेकिन सवालों के जवाब नहीं देता। कई लोगों ने पलटकर मेल भी लिखे। कईयों ने रिमाइण्‍डर लिखे। कुछेक ऐसे भी थे जिन्‍होंने ईमानदारी से मोटी मोटी गालियां दी। 

मैं यह शिकायत नहीं कर रहा बल्कि यह कहना चाह रहा हूं कि मैं इन लोगों की भावना को समझता हूं। जो व्‍यक्ति अपने दिल की गिरह खोल कर रख दे और मुझे मेल में ऐसी बातें लिखे जिसे वह अपने मां, पिता, पत्‍नी या पति से भी शेयर नहीं करे और पलटकर मेरा जवाब नहीं मिले तो ऐसी खीज स्‍वाभाविक है। 

मैं हृदय से उन सभी लोगों से माफी मांगता हूं जिन लोगों के सवालों के जवाब मैं अब तक नहीं दे पाया हूं। लेकिन कुछ  मुश्किलें मेरे साथ भी है। 

इनमें पहली है कि मैं एक फुल टाइम जर्नलिस्‍ट हूं। इसका मतलब हुआ कि सुबह ग्‍यारह बजे से रात दस बजे तक का टाइड शिड्यूल। यह थका देता है। जब नेट पर बैठता हूं। तो बीस से चालीस मेल रोज मेरा इंतजार कर रही होती है। इन्‍हें पढ़ना और कुछ का जवाब देना भी टेढ़ा काम है। थकान इस काम को दो से तीन घण्‍टे तक बढ़ा देती है। 

दूसरी समस्‍या: मेरी रुचि लोगों की कुण्‍डलियां देखने और उन्‍हें भविष्‍य बताने से अधिक ज्‍योतिष पढ़ने, दूसरे ज्‍योतिषियों से बात करने, नए बिंदुओं पर घण्‍टों सोचने, ज्‍योतिष से जुड़ी भ्रांतियों का कारण जानने और उनके जवाब ढ़ूंढने में अधिक है। इस कारण मैं किसी के सवालों का जवाब मेरे लेख में निकलता हो तो कोशिश करता हूं कि लेख लिख दूं। जवाब का जवाब हो जाएगा और मुझे एक अतिरिक्‍त लेख मिल जाएगा। 

तीसरी समस्‍या: जब प्रश्‍न बॉक्‍स मेरे ब्‍लॉग पर लगाया तो लगा कि इंटरनेट को दुनियाभर में देखा जाता है। इस कारण पूरी दुनिया से ऐसे सवाल मिलेंगे कि मुझे विषय पर अधिक पढ़ना और गुरुओं से अधिक चर्चा करने का अवसर मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चाहे देश के किसी भी कोने से हो या दुनिया के किसी भी शहर से समस्‍याएं एक जैसी हैं। किसी को अपनी बच्‍ची की शादी की फिक्र है तो किसी को अपने बच्‍चे के कैरियर की। किसी को प्रमोशन चाहिए तो कोई बिजनेस सेटअप करना चाहता है। यानि फिर से वही चक्र शुरू हो रहा है जिसे सालों पहले मैं छोड़कर आया था। 

चौथी समस्‍या: मैंने एक बार ईमानदारी से सवालों के जवाब देने शुरू भी किए। लेकिन पहले पंद्रह सवालों के जवाब दिए तो आठ में फेलियर नोटिस आया। यानि मेल भेजने वालों ने अपने ईमेल आईडी गलत भर दी थी। अब मैंने कई घण्‍टे लगाकर जो मेहनत की वह खराब हो गई। इस दुर्घटना ने मुझे बुरी तरह हतोत्‍साहित किया। बाद में मैंने उन्‍हीं मेल्‍स को जवाब दिया जो सीधे मेरे इनबॉक्‍स में आई। जो लोग मुझे मेल भेजते हैं उन्‍हें मेरी ईमेल आईडी पहले ही जवाब में मिल जाती है। ऐसे में लोग मुझे दोबारा मेल करते हैं। जो लोग गंभीर होते हैं। उनकी बात पहले सुनने की कोशिश करता हूं। कई लोगों को जवाब दिए और दिल में संतुष्टि है कि उन लोगों को संतुष्‍ट कर पाया। 

तो क्‍या किया जाए 

यह सवाल महत्‍वपूर्ण है। जो लोग मुझसे गंभीरता से सवाल पूछना चाहते हैं वे मेरी ईमेल आईडी लेकर उसी पर मेल करें। हां इंतजार जरूर करें क्‍योंकि मेरे पास इतना समय नहीं है कि में हाथों-हाथ कुण्‍डली बनाकर उसका विश्‍लेषण करूं और जवाब लिख भेजूं। जिन लोगों को मामला अधिक गंभीर लगता है और उन्‍हें लगता है कि पूछे बिना काम नहीं चलेगा। वे मुझे शनिवार के दिन सुबह कॉल कर सकते हैं। इस दिन मेरा व्‍हीकली ऑफ रहता है। लेकिन मेरी गुजारिश है कि बहुत जरूरी होने पर ही इस युक्ति को काम में लें। 

कुछ मेरे लिए भी 

विचारों की भूख ऐसी है कि खत्‍म नहीं होती। जब भी कोई सवाल हटकर आता है या फिर किसी भ्रांति से जुड़ा होता है तो मुझे लगता है कि सोचने और लिखने के लिए नया मसाला मिल गया है। आप अगर मुझे ऐसे विचार भेजेंगे तो मुझे लगेगा कि मेरे ब्‍लॉग पर पूर्व के लेख पढ़ने के बाद आपने मुझे रिटर्न गिफ्ट दिया है। :) 

ज्‍योतिष के लेखों में रुचि रखने वाले