मंगल और रामभक्‍त हनुमान की तुलना

ज्‍योतिष विद्यार्थी - sidharth

रामभक्‍त हनुमान के जन्‍म की कहानी मैंने सुनी ही है। बाद में मैंने इसे मंगल ग्रह के स्‍वभाव से जोड़ दिया। हालांकि मैंने खुद ने गुरु-शिष्‍य परम्‍परा से सीखा है लेकिन दस साल से अधिक लम्‍बा समय होने के बावजूद मुझे किसी नए ज्‍योतिषी को शिष्‍य बनाने में संकोच होता है। अब तक केवल एक विद्यार्थी ऐसा आया जिसने मुझे जबरन गुरू बना लिया। अब उसके लिए मुझे बरबस मेहनत करनी पड़ती है। खैर इसी क्रम में मैंने कहानी को मंगल के साथ जोड़ा है।
गुणपूजक भारतीय मान्‍यता में हर देवता की एक विशिष्‍ट छवि बनाई गई है। हनुमान की भी अपने गुणों की एक छवि है। रामभक्‍त होने के अलावा उनके गुणों के कारण उन्‍हें अधिक पूजा जाता है। देशभर में गौर करके देख सकते हैं कि आज भगवान राम की तुलना में हनुमान के मंदिर अधिक मिलेंगे और हनुमानजी को बुलाने के लिए रामचरितमानस के पाठ होते हैं। रामायण में राम के वनवास के दौरान हनुमान का चरित्र सामने आता है, लेकिन इससे बहुत पहले हनुमान के चरित्र और भक्ति की पृ‍ष्‍ठभूमि तैयार हो चुकी थी।
माता अंजनी ने सालों तक घोर तपस्‍या की और इसके बाद वे अपने पति के आश्रम में लौटीं। वर्षों की भीषण तपस्‍या के कारण माता का मुख कुछ पीलरा सा हो गया। इससे पति ने उनके आते ही उपहास किया कि क्‍या वर्षों की तपस्‍या से माता के पेट में कुछ आ गया है जिसका पोषण करते हुए माता का मुख पीलरा हो रहा है। उपहास से व्‍यथित माता अंजनी ने ‘हा-हा’ की ध्‍वनि के साथ अपनी नाभि पर वार करना शुरू कर दिया। वर्षों का एकत्र हुआ तप नाभि में से फूटकर हनुमान के रूप में प्रकट हुआ। बाद में हनुमान आश्रम में रहने लगे। पराक्रमी और अनन्‍त शक्तियों के मालिक हनुमान के पास कोई दिशा न थी सो वे आश्रम के ऋषियों को तंग करते रहते। उससे तंग होकर एक ऋषि ने हनुमान को अपनी शक्तियां भूलने का श्राप दे दिया। इसके बाद शांत हुए हनुमान राम की भक्ति में ली हो गए। सालों बाद जब समुद्र के किनारे जामवंत ने हनुमान को अपनी शक्तियों की याद दिलाई तो हनुमान एक छलांग में समुद्र लांघ गए।
मंगल की प्रकृति भी कमोबेश ऐसी ही होती है। बलशाली और स्‍वामीभक्‍त। इसी कारण इसे सभी ग्रहों में सेनापति की उपाधि मिली हुई है। यह युद्ध के मैदान में रणनीति भी बना लेते हैं और एक्‍जीक्‍यूशन भी कर लेते हैं। जब तक मंगल को अपनी शक्तियों की याद न दिलाई जाए वह सुप्‍त रहती है। अधिकांशत: विपरीत परिस्थितियां आने पर ही मंगल को अपनी शक्ति का अहसास होता है। ज्‍योतिष के विद्यार्थी जानते हैं कि अपने शत्रु शनि की राशि में पहुंचकर ही मंगल उच्‍च का होता है। मैंने देखा है कि आमतौर पर मांगलिक व्‍यक्ति विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होता है और अपनी धुन में अधिक रमा रहता है। मंगल का श्रेष्‍ठ स्‍वरूप सेना के उच्‍च अधिकारियों और टॉप सर्जन्‍स में देखा जा सकता है और निकृष्‍ट रूप डाकुओं को सीरियल किलर्स में देखा जा सकता है।

फलित पर प्राचीन प्रहार

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

बात यूनान के शासनकाल की है। ऐसा माना जाता है कि भारत में भी यूनानी, जिन्‍हें यवनजातक भी कहते हैं, विद्वान ही ज्योतिष की फलित धारणा लेकर आए थे। भारत में फलित के शुरू होने से पहले यूनानी शासन के जमाने में एक वैज्ञानिक को शंका हुई कि मंदिर में बैठा पूजारी जो फलादेश कर रहा है वह तार्किक नहीं है। उसने शंका पूजारी को बता दी।
यह पूजारी व्‍यापार के लिए विदेश जाने वाले व्‍यापारियों को बताता था कि वे सफल होंगे या नहीं। पूजारी वैज्ञानिक को साथ लेकर भण्डारघर तक गया और उसे दिखाया कि सैकड़ों किलो सोना, चाँदी और कीमती वस्तुएं व्यापारी यहां दान कर गए हैं। वैज्ञानिक चमत्कृत हो गया।
पूजारी ने पूछा- क्या यह सब ज्योतिष की सफलता का नतीजा नहीं है।
अब बारी वैज्ञानिक की थी। उसने पूछा कि क्या तुम्‍हारे पास ऐसा कोई पैमाना है जिससे यह पता चले कि तुमसे सफलता का अशीर्वाद लेकर गए कितने व्यापारी रास्ते में ही काल के ग्रास बन गए, कितनों का व्यापार नहीं चला, कितने असफल होकर लौटे। पूजारी के पास कोई जवाब नहीं था।
यह कहानी मैंने ज्‍योतिषाचार्य नेमीचंद्र शास्त्री की पुस्तक भद्रबाहुसंहिता से ली है। इसी पुस्तक में इस घटना को फलित ज्योतिष पर पहला प्रहार बताया गया है।
इसके बाद तो फलित पर हजारों प्रहार हुए होंगे लेकिन यह विद्या है कि लगातार बढ़ती जा रही है। रुकने का नाम ही नहीं ले रही। हर व्यक्ति को जरूरत है आने वाले अनिश्चित भविष्य को जानने की। जितना विज्ञान और संचार माध्यमों का विकास हुआ है जिन्दगी की रफ्तार उतनी अधिक बढ़ी है। ऐसे में भविष्यि की अनिश्चितता भी बढ़ी है। सो फलित विकासित हो रहा है।
सौ में से पचास बार सही और पचास बार गलत बताने वाले ज्‍योतिषी भी फल-फूल रहे हैं। जिनके उपचार लग जाता है वे लौट आते हैं और जिनके उपचार नहीं लगता वे दूसरे ज्‍योतिषी के पास जाते हैं। कुल मिलाकर कम्‍प्‍यूटर से पहले किसी विधा ने रोजगार के सर्वाधिक अवसर मुहैया कराए तो वह ज्योतिष ही रही होगी।

आपने जिन्‍दगी में संघर्ष बहुत किया है

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

आपने जिन्‍दगी में संघर्ष तो बहुत किया है, आप जितनी मेहनत करते हैं उसका पूरा फल नहीं मिलता। आपकी भावना तो अच्‍छी होती है लेकिन लोग उन्‍हें समझ नहीं पाते, आपको अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं मिलता, आप जिस स्‍थान के लायक है वह अभी आपको मिल नहीं पाया है, आप पैसे बचाने की कोशिश तो करते हैं लेकिन कोई न कोई ऐसा खर्चा आ जाता है कि बैंक बैलेंस खाली हो जाता है, आपके गुप्‍त शत्रु हैं।


जी हां मैं आप ही की बात कर रहा हूं।

एक औसत भारतीय पुरुष या महिला जातक की।

ईमानदारी से बताइए जब ऊपर आप ये सब बातें पढ़ रहे थे तो क्‍या आपके दिमाग में यह नहीं आया कि मैं आप ही के बारे में लिख रहा हूं। सौ में से नब्‍बे लोगों को यही लगेगा। ये ऐसे मनौवैज्ञानिक वाक्‍य हैं जिन्‍हें किसी पर भी फिट किया जा सकता है। एक बार मजाक- मजाक में हम लोगों ने ऐसे 63 योग बना लिए थे। अभी इतने ही याद आए। हम इन्‍हें यूनिवर्सल योग कहते हैं। ज्‍यादातर पोंगा पंडित और रोड साइड ज्‍योतिषी इन्‍हीं योगों के आधार पर कमा खा रहे हैं।

मैं पहले वाक्‍य से शुरू करता हूं।

आपने जिन्‍दगी में संघर्ष तो बहुत किया है

क्‍या मतलब हुआ। यानि जब आप पैदा हुए तब क्‍या घर में रोटी खाने के पैसे नहीं थे और अब आप आईएएस अधिकारी बन गए हैं। नहीं ऐसा नहीं है। हर किसी के लिए संघर्ष के मायने अलग-अलग होते हैं। कोई विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करता है तो कोई शारीरिक विकलांगता से, कोई देश में नाम रोशन करने के लिए संघर्ष कर रहा है तो कोई सांस लेने और दो जून का खाना खाने के लिए। हर एक का अपना संघर्ष है। इसलिए यह डायलॉग हर किसी पर फिट हो जाता है। जैसे ही ज्‍योतिषी के मुंह से यह बात जातक सुनता है और वह समझ बैठता है कि यही है असली ज्‍योतिषी जिसने मुझे भीतर से पहचान लिया है।

आप जितनी मेहनत करते हैं उसका पूरा फल नहीं मिलता

शायद भगवान कृष्‍ण के जमाने से ही यह समस्‍या शुरू हो गई थी। इसे आदिम समस्‍या कहूं तो भी गलत नहीं होगा। तभी तो कृष्‍ण ने कहा कि कर्म कर फल देने का काम भगवान पर छोड़ दे। मैं इस लेख में गीता का ज्ञान नहीं दे रहा बल्कि ह्यूमन साइकोलॉजी बताने का प्रयास कर रहा हूं। एक व्‍यक्ति जो मेहनत करता है वह हमेशा पूरा फल चाहता है। जैसे कि आप अपने बगीचे में चार घण्‍टे काम करने के बाद माली को सौ रुपए देने को तैयार हैं लेकिन यही चार घण्‍टे आप खुद काम करेंगे तो आपको लगेगा कि चार सौ रुपए का काम हो गया है। यानि यह भी सापेक्ष है। इसी साइकोलॉजी का लाभ ज्‍योतिषी उठाते हैं।

आपके गुप्‍त शत्रु हैं

एक व्‍यापारी, एक गुप्‍तचर, एक सेना अधिकारी या ऐसे ही किसी काम में लगे व्‍यक्ति को यह बात कही जाए तो इसका कुछ मतलब भी है लेकिन एक नौकरीपेशा आदमी जो सुबह टिफिन लेकर नौकरी पर जाता है। दिनभर फाइलों में उलझा रहता है। कई बार कुछ काम घर ले आता है। उसकी जिन्‍दगी में ये शब्‍द एक रोमांच भर देते हैं। वह सोचने लगता है कि हां मैं हूं इतना महत्‍वपूर्ण कि कोई अपना कीमती समय बर्बाद कर चोरी छिपे पीछे से मेरी बातें करता होगा या मुझे नुकसान पहुंचाने के प्रयास करता होगा। यही साइकोलॉजी न चाहते हुए भी इस फलादेश को हमेशा सही ठहरा देती है।

एक बार डेल कारनेगी ने कहा था कि हम दो ही चीजों के लिए जिंदा रहते हैं स्‍पर्श और महत्‍व। ज्‍योतिषियों को इस प्रकार के स्‍टेटमेंट हमें इनमें से महत्‍व की अनुभूति करा देते हैं और हम उन्‍हें सही मान लेते हैं बिना लॉजिक देखे। इस बार जब कोई आपको ऐसा ही चंडूखाने का फलादेश दे तो मुझे सूचित कीजिएगा। इसके दो फायदे होंगे। एक तो यह कि मुझे एक नया फलादेश मिलेगा। दूसरा यह कि आपको मैं अधिक स्‍पष्‍ट कर पाउंगा कि फलादेश का अर्थ क्‍या है। 

यानि हथेली की लकीरों के बीच ज्‍योतिषी क्‍या पढ़ रहा है।

संतान पुत्र होगा या पुत्री

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

इस विषय को लेकर आज तक मैंने कुल 23 फलादेश दिए हैं। इनमें से 21 सही रहे और दो गलत। दो फलादेश गलत रहने का कारण भी यह रहा कि मुझे जो जानकारियां मुहैया कराई गई थी वे गलत निकली। बाद में जातक ने अपनी गलती स्वीकार की और मेरे फलादेश को माना। वैसे भारत सरकार के कानून के मुताबिक लिंग परीक्षण करना गैरकानूनी है। इसके बावजूद सोनोग्राफी वाले अंधाधुंध कमाते हैं। हर किसी को पुरुष संतान की चाह है।
अब आप यह सोच रहे होंगे कि मैं सोनोग्राफी वालों के पीछे ही पडा रहूंगा या सैक्स डिटरमिनेशन के बारे में कुछ अमूल्य जानकारी भी दूंगा। दरअसल मेरे पास जो जानकारी है वह ऐसी है कि आप लोगों को लेख के अंत तक बुरा लगने लगेगा।

कैसे?

जब मैंने संतान का लिंग पता करने के बारे में मेरे गुरूजी से पूछा तो उन्होंने जो उत्तर दिया वह अतार्किक लगा। उन्‍होंने कहा यह ईश्‍वर की देन है इस बारे में हमें फलादेश करने की मनाही है। इस विषय को न ही छेड़ें तो बेहतर होगा। बाद में भले ही मुझे उनकी बात खरी लगने लगी हो लेकिन उस समय मैं जोश में था और पता करना ही चाहता था। तो क्या हाथ लगा? बताता हूं। मैं संतान के बारे में निर्णय करने के लिए मेरा खुद का तरीका विकसित किया। इसके लिए मैं पहले जातक की कुण्डली देखता हूं और पता करता हूं कि जातक अमीर बनने के योग हैं या नहीं, दूसरा आने वाले दिनों में जातक धक्के खाता फिरेगा या उसके जीवन में स्थिरता आएगी, तीसरा जातक की पारिवारिक पृष्ठ भूमि कैसी है, चौथा फिलहाल जातक की आर्थिक स्थिति कैसी है, पाँचवाँ जातक के चंद्रमा की क्या स्थिति है।
तो मेरे जातक से सवाल होते हैं
अभी आपके पास कितना पैसा है
आने वाले दिनों की क्या योजना है
जातक के पिताजी क्या करते हैं
अगर तीनों चीजें फेवरेबल हो तो कुण्डाली में देखता हूं कि जातक का खुद का चंद्रमा किस स्थिति में है।
अगर चंद्रमा खराब हुआ और ऊपर की स्थितियां फेवरेबल हुई तो जातक के अवश्य कन्या होगी। और यदि जातक का बैंक बैलेंस खत्म सा हो गया हो, नौकरी में प्रमोशन रुका हुआ हो, पिता ने घर से निकाल दिया हो, रात को समय पर नींद नहीं आती हो और पत्नीर का वज़न बढता जा रहा हो तो जातक को पुत्र संतान की प्राप्ति होगी।

ऐसा क्यों ?

इसके दो कारण हैं। पहला, जातक की असुरक्षा की भावना जितनी अधिक प्रबल होती जाती है, जीवन की समस्याएं जितनी अधिक होती हैं पुरुष संतान होने की संभावना बढ़ जाती है। मैं मानसिक स्‍तरों और इसकी कार्यप्रणाली के बारे में अधिक तो नहीं जानता लेकिन अनुमान लगा सकता हूं कि साइकोलॉजिकली होता यह होगा कि जातक का अवचेतन यह निर्णय करता होगा कि अब अपना तो खेल खत्म हुआ अगली पीढ़ी में अपने रक्त का संचार करने के लिए पुत्र छोड़ दें। दूसरा कारण चंद्रमा का है। चंद्रमा की स्थिति बेहतर होने पर जातक निश्चिंत स्व्भाव का हो जाता है। ऐसे में समृद्धि बढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रहा होता तो गुणसूत्रों में वाई का अनुपात बढ़ जाता होगा। अधिकांश विज्ञान के विद्यार्थी समझ जाएंगे कि ऐसे कैसे वाइ बढ़ सकता है। दोनों विपरीत परिस्थितियां मिलकर पुत्र होना सुनिश्चित करती हैं।
वहीं जिस जातक का स्थाईत्‍व लगातार बढ़ता जा रहा हो, उसके गुणसूत्रों में वाइ का अनुपात घट जाता होगा। ऐसे में कन्या की प्राप्ति होने की संभावना बहुत हद तक बढ़ जाती है। इसमें चंद्रमा का रोल यह रहता है कि कुण्डली में चंद्रमा की खराब स्थिति मानसिकता को ऐसा कर देती है कि मनुष्य लगातार ऊपर चढ़ने का प्रयास करता है। ऐस में कन्या बुध के रूप में उसे अतिरिक्त सहायता देने के लिए आ जाती है।
यह मेरा अनुभूत नियम है कि जिस जातक के कन्या संतान हुई वह या तो पैसे वाला पहले से बन रहा था वरना कन्या संतान के साथ ऐसी परिस्थितियां बनी कि वह पैसे वाला बन गया। अगर अमीर नहीं तो खाते-पीते परिवार का मालिक तो बना ही है। इसके उलट मेरे कुछ जातक पुत्र के जन्म के बाद ट्रांसफर, पैसे का नुकसान, व्यापार में धक्के्, सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट का दंश भोग रहे हैं। मेरे एक दोस्त को इस बारे में जानकारी थी। जब मैंने उससे पूछा कि अभी तुम्हारी माली हालत कैसी है तो उसने चट से जवाब दिया कि बिल्कुल कड़का हूं। मैंने पूरे आत्मसविश्वास के साथ कहा कि तुम्हें पुत्र रत्न की ही प्राप्ति होगी। बाद में उसके पुत्री हुई। मैंने माफी मांग ली, तो मित्र ने बताया कि उसकी दादी मेरे मुंह से पोता होने की बात ही सुनना चाहती थी इसलिए उसने झूठ बोला कि वह कड़का है। मेरे आस-पास रहने के कारण उसे इस पद्धति के बारे में जानकारी थी। उसने अपने भाई के बिजनेस में कुछ लाख रुपए लगा रखे हैं। जो लगातार बढ़ रहे हैं। जब उसने खुलासा किया तो मैं बहुत झल्लाया। खैर जो भी हो, मेरा फलादेश गलत होकर भी अधिक सही रहा। मैं खुद भी इसी योग की चपेट में रहा। जब मेरा पुत्र कान्हा। पैदा हुआ तो मेरी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। सभी खुश थे और मैं चिंतित।

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