कई बार योग-प्रतियोग और मुहूर्त की बातें आती हैं तो लिखा होता है कि गंगा के दक्षिण और नर्मदा के उत्तर में रहने वाले लोगों के लिए फलां योग लागू होगा या नहीं होगा। शेष भारत के लिए अलग योग होगा। ऐसा क्यों ?
मुझे इसका कारण यह लगता है कि अधिकतर शैक्षणिक गतिविधियां इसी क्षेत्र से संबंधित रही हैं। सो अधिकतर पांचांग भी यहीं बनते रहे होंगे। अब सटीक गणनाओं और इसके लिए अपनी साख रखने वाले पांचांग पूरे भारत में वितरित होते रहे। इससे कई बार भ्रम की स्थिति पैदा होती रही होगी। सो पांचांगों में लिखा जाने लगा कि गोचर का फलां योग किन स्थानों के लिए लागू हो रहा है।
भारतीय ज्योतिष गणनाएं शुरु से ही पूर्णता लिए रही हैं, लेकिन सूचना क्रांति के बाद तो प्रौद्योगिकी ने दुनिया के हर कोने में हर प्रकार की विधा को पहुंचने में मदद की है। ऐसे में किसी विशेष परिस्थिाति के लिए विशेष स्थान पर की गई गणना हर जगह फैल जाती है। सूचना क्रांति से पहले छापेखाने ने इसे देश के कोने-कोने तक पहुंचाया था।
इससे दो तरह की समस्याएं हुई। एक तो यह कि एक स्थान के लिए की गई गणनाओं को दूसरे स्थानों पर भी लागू किया गया। दूसरा कि छोटे शहरों में जहां ज्योतिष का इतना विकास नहीं हुआ था। इस कारण उन्हीं गणनाओं का इस्तेमाल किया जाने लगा जो कि किसी दूरस्थ शहर के लिए की गई थी।
जो योग सूर्य आधारित हैं उनमें भी अखण्ड भारत में बंगाल से कच्छ तक एक घण्टे का अन्तर पड़ जाता है। चंद्रमा की गति से सूर्य से भी अधिक है। सो गणनाओं में फेरबदल होना स्वाभाविक है। वैसे अच्छे पांचांगों में गणनाओं के साथ अक्षांश और देशान्तर के बारे में पुख्ता जानकारी दी गई होती है। यानि स्थानीय ज्योतिषी अपने समय क्षेत्र के अनुसार गणनाएं कर लें।
जो पांचांग मुझे बेहतर लगते हैं
- विश्वविजयी पांचांग-
- आर्यभट्ट पांचांग -
- लाहिरी एम्फीमरीज
- गणेश पांचांग
(हालांकि अब बूलालजी शास्त्री हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके पुत्र अपने पिता के मार्ग पर चल रहे हैं और श्रेष्ठ पांचांग बना रहे हैं। मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा के कारण ही मैं इस विषय के प्रति गंभीर हूं। वरना मेरे विज्ञान के अध्ययन ने तो मुझे मूढ़ ही बना दिया था।)


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