मौसम चक्र में परिवर्तन

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

हर साल मानसून से लेकर सर्दी तक और सर्दी से वापस लू तक के सफर को ग्रहों और नक्षत्रों के अलावा निश्‍चत समय पर बादलों की उपस्थिति या अनुपस्थिति, हवाओं का रुख, चंद्रमा पर वलय आदि भौगोलिक अवस्‍थाओं के आधार पर योग बनाए गए। हालांकि इनमें से अधिकांश लोक कहावतों के रूप में होते हैं, लेकिन जो योग अधिक पुनरावृत्त हो रहे होंगे उन्‍हें ज्‍योतिष में भी शामिल किया गया। पिछले दिनों एक सवाल आम आदमी के सामने था और ज्‍योतिषी उससे नजर चुरा रहे थे। वह सवाल है मौसम चक्र में परिवर्तन क्‍यों हो रहा है?
यहां के एक वरिष्‍ठ ज्‍योतिषी ने कहा कि अगर ग्रहों और नक्षत्रों की चाल के आधार पर पूछ रहे हो, तो भूल जाओ सभी सैलेस्टियल बॉडीज अपने निर्धारित रास्‍ते पर ही है। फिर इस बार गर्मी में अधिक ताप क्‍यों नहीं पडा और सर्दी में अधिक सर्दी क्‍यों नहीं पड़ रही है। बीकानेर में पारा शून्‍य से अड़तालीस डिग्री के बीच झूलता है। इस बार गर्मियों में यह चालीस से ऊपर नहीं गया और दिसम्‍बर आधा बीत गया है तब तक छह डिग्री से नीचे नहीं गया है। सर्दी-गर्मी कम होने का क्‍या आधार होगा?
पंडित जी ने हिंट दिया कि सूर्य एक साल में 59 विकला आगे बढ़ता है।
अब मैंने ध्‍यान दिया कि पिछले साल से मकर सक्रांति भी 14 के बजाय 15 जनवरी को होगी। सभी ग्रहों की सूर्य के चारों ओर की चाल के अतिरिक्‍त पूरे सौर मण्‍डल की चाल भी है। सूर्य आकाशगंगा के चक्‍कर लगा रहा है। कुल 61 साल और 3 महीने में एक अंश पीछे रह जाता है। सूर्य की धीमी होती गति के कारण मौसमी परिवर्तन हो सकते हैं। अब यह परिवर्तन इतने लम्‍बे अंतराल में धीरे-धीरे होता है कि ज्‍योतिषियों की एक या दो पीढ़ी इसे स्‍पष्‍ट रूप से महसूस नहीं कर पाती। इस कारण ये सीधे-सीधे गणनाओं का हिस्‍सा नहीं बन पाती। पूर्व में हो सकता है ऐसा रहा हो कि एक ही ज्‍योतिष स्‍कूल के विद्यार्थियों की कई पीढि़यां इस विषय पर विश्‍लेषण करती रहीं हों लेकिन वर्तमान में ऐसा कोई घराना नहीं है जो कई पीढि़यों तक ऐसा एक ही विषय लेकर विश्‍लेषण करे। सो एक ज्‍योतिषी के व्‍यक्तिगत विश्‍लेषण से जितना हासिल हो सकता है उतना ही हो पाता है।
मेरा मानना है कि दुनिया में होने वाले सभी परिवर्तनों को ज्‍योतिष के दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। ऐसे में ग्‍लोबल वार्मिंग को किसी व्‍यक्ति या समुदाय विशेष की गलती ठहरा देने की बजाय इसे ज्‍योतिषीय एंगल से देखना मैं अधिक पसंद करूंगा। कुछ हजार सालों में सूर्य लगातार पीछे छूटता जा रहा है। हर 61 सालों में एक अंश। इसके साथ ही धरती भी लगातार गर्म होती जा रही है। हिम युग से अब ग्‍लेशियर पिघलने तक का सफर सूर्य की धीमी होती र‍फ्तार से जोड़ा जा सकता है। हालांकि अब तक ये हिंट के रूप में ही है। मुझे खुद इसका पुख्‍ता विश्‍लेषण करने में लम्‍बा समय लगेगा। मेरा विश्‍वास पुख्‍ता होता जा रहा है कि मौसमी परिवर्तनों को सूर्य की रफ्तार से जोड़कर देखा जा सकता है। सबसे धीमी रफ्तार वाला शनि ग्रह भी तीस साल में सभी राशियों का चक्र पूरा कर लेता है लेकिन इस अवधि में स्‍थाई मौसमी परिवर्तन नहीं होते। कुण्‍डली के अन्‍य ग्रहों की चाल तुलना में सूर्य की आकाशगंगा के चारों ओर चक्‍कर निकालने की गति सबसे धीमी है।

कुछ अनुभूत और सिद्ध योग

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

ज्‍योतिष अध्‍ययन के दौरान पढ़ने का तरीका भले ही परम्‍परागत हो लेकिन नाड़ी की तर्ज पर कुछ योग ऐसे भी बने जो वर्तमान दौर में अधिकांशत: ठीक बैठते हैं। इनके आधार पर विश्‍लेषण और फलादेश किया जाए तो उनके सटीक होने की संभावना बढ़ती है। हमारे ग्रुप में हर एक के पास खुद के नोट्स हैं जिनमें इस प्रकार के अनुभूत और सिद्ध योगों को समेटा गया है। अपनी डायरी के पन्‍नों में अलग-अलग बिखरे हुए कुछ योगों को यहां समेटने का प्रयास कर रहा हूं।

- फुटबॉल और क्रिकेट के खेल में मैच से पूर्व किसी जातक द्वारा सवाल पूछा जाने पर जिस टीम का नाम पहले आए उसे लग्‍न बना दो और दूसरी टीम को सातवें भाव का आधिपत्‍य दे दो। इससे दोनों टीमों की कुण्‍डलियां बन जाएंगी। पहली टीम के पांचवे भाव से टॉस का निर्णय होगा और ग्‍यारहवें भाव से होने वाले गोल की संख्‍या या पहली बारी में बनने वाले रनों की संख्‍या का अनुमान लगाया जा सकता है। फुटबाल वर्ड कप में यह प्रयोग बहुत सफल रहा था। बाद में इसे क्रिकेट पर भी लगाकर देख चुका हूं। बहुत करीबी फलादेश आते हैं।

- जो ग्रह दशानाथ के नक्षत्र में स्थित होता है वह अपने भाव और राशि के अनुसार दशानाथ के साथ मिलकर किसी दशा का परिणाम देता है।

- पाराशर की मानें तो दशा की तुलना में अंतरदशा अधिक सूक्ष्‍म विश्‍लेषण पेश करती है। इसी की तर्ज पर कहा जा सकता है कि किसी राशि में बैठे ग्रह की तुलना में यह देखना अधिक सटीक होगा कि ग्रह किस नक्षत्र में स्थित है।

- केतू की दशा में शनि और शनि की दशा में केतू हमेशा खराब परिणाम ही देंगे। चाहे ये किसी भी राशि या भाव में क्‍यों न हो। ऐसा ही फलादेश चंद्रमा और राहू के लिए भी होना चाहिए।

- शेयर और सट्टे में मूल अन्‍तर यह है कि शेयर में पैसा लगाने के बाद जातक के हाथ में कुछ बचा रहता है। यह पूर्णतया तरल न भी हो तो इसका कुछ हिस्‍सा तरल होने की क्षमता रखने वाला होता है वहीं दूसरी ओर सट्टा एक साथ लगता है और पूरे पैसे लगते हैं। यानि सीधा हार जीत का सौदा होता है। शेयर में नुकसान की सीमा आंशिक से अधिकतम तक होती है वहीं सट्टे में सौ प्रतिशत लाभ या हानि होते हैं। इसलिए दोनों के लिए कारक और ग्रह स्थितियां अलग-अलग होंगे

- आठवां भाव ऑपरेट होने वाला हो और कुण्‍डली में अप्रत्‍याशित लाभ के योग भी हों तो पूरी तैयारी के साथ शेयरों की खरीद की जा सकती है। आठवां भाव अपना समय आते ही उम्‍मीद से ज्‍यादा लाभ दिला सकता है।

- भौतिक संयोग फलादेश में कुण्‍डली पठन और सामुद्रिक के बराबर भूमिका का निर्वहन करते हैं। इन्‍हें ओमेन से समझा जा सकता है।

- मूक प्रश्‍न में चंद्रमा जिस भाव में सवाल उसी के संबंध में होता है। और यदि ज्‍योतिषी अपनी मर्जी से जातक के बताने से पहले प्रश्‍न का उत्‍तर देना चाहता है तो जातक के आने के समय जहां लग्‍नेश होगा प्रश्‍न भी उसी से संबंधित होगा। अन्‍यथा लग्‍न अथवा चंद्रमा में से जो अधिक शक्तिशाली हो वहां से फलादेश देना उत्‍तम रहेगा।

- राहू ऐसा ग्रह है जो कुण्‍डली में बद होने के साथ ही जातक को गंदे पानी के पास ला बैठाता है। राहू का प्रभाव अधिक होने पर जातक अपना कमरा भी दक्षिणी पश्चिमी कोने में शिफ्ट कर लेता है।

- राहू का उत्‍तम प्रभाव ऐसा होता है कि जातक अठारह साल की दशा के दौरान संयुक्‍त परिवार में रहता है। बाग बगीचे लगाता है और लगातार अपना विकास करता है लेकिन दिमागी फितूर का दौर तो फिर भी जारी रहता है।

- कुण्‍डली में कहीं भी सूर्य और केतू की युति हो तो जातक आदतन झूठ बोलने वाला होता है। यह मेरा अनुभूत योग है। मैं इस योग को आंकने से चूकने की गलती दो बार कर चुका हूं। इसका मुझे दुष्‍परिणाम भी भोगना पड़ा। मैं यह नहीं कहता कि ये लोग अपने लाभ के लिए झूठे होते हैं। ये यों ही झूठ बोल देते हैं बिना किसी कारण के। कई बार जब स्‍पष्‍ट झूठ बोल रहे होते हैं तो पकड़े जाने के बावजूद ढिठाई से अपने झूठ के साथ चिपके रहते हैं। इन लोगों के चेहरे पर मैंने तो कभी शिकन भी नहीं देखी।

आज इतना ही पूरी डायरी पड़ी है मेरे पास। धीरे धीरे सबकुछ बता दूंगा। ऊपर बताए गए योगों और जानकारियों को पचाने में भी तो वक्‍त लगेगा। तब तक


शेष शुभम्

विज्ञान क्‍या बीमारी है?

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

दस साल से ज्‍योतिष पढ़ रहा हूं। विज्ञान के विद्यार्थियों से भरे परिवार में बायोलॉजी का स्‍टूडेंट था तो एक ओर घर में विज्ञान की बातें तो दूसरी ओर दोस्‍तों और सर्किल में विज्ञान। इस बीच इतिहास की एक छोटी सी पुस्‍तक पढ़ने को मिली। लेखक थे ई एच कार और पुस्‍तक का नाम था ऐति‍हासिकतावाद। इस पुस्‍तक के जारी होने से पहले ऐसा कोई शब्‍द इतिहासकारों की डिक्‍शनरी में नहीं था। कार ने पहली बार इस शब्‍द का इस्‍तेमाल किया और इसका अर्थ भी समझाया। मुझे जो कुछ समझ में आया वह यह कि हर विषय को विज्ञान की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। यानि हर चीज को सही सिद्ध करने के लिए उसको विज्ञान सिद्ध करना जरूरी नहीं है।

ऐसा कैसे हो सकता है कि एक विषय सभी विषयों का जांचकर्ता बन जाए। वह भी ऐसा विषय जो सूक्ष्‍मता में अब भी अधूरापन लिए बैठा हो। हाइजनबर्ग कहता है किसी पदार्थ विशेष की स्थिति और संवेग एक साथ ज्ञात नहीं किए जा सकते, डार्विन कहता है हम शायद बंदरों की संतान हैं (वैसे एनानिमस की हरकतों को देखकर लगता तो है :)), न्‍यूटन ने कहा गति के नियम शाश्‍वत हैं और आइंस्‍टाइन ने इसे झूठ साबित कर दिया। ब्रह्माण्‍ड की उत्‍पत्ति बिग बैंग से हुई या यह शुरू से ही ऐसा था, प्रकाश से तेज रफ्तार में क्‍या होता है, ब्‍लैक होल क्‍या है, हीरे की बाहरी संरचना में तीन-तीन फ्री कार्बन क्‍यों नहीं होते और अगर होते हैं तो वह अक्रिय कैसे होता है। सैकड़ों सवाल है जो अनुत्‍तरित हैं। फिर भी पश्चिम द्वारा थोपे गए विज्ञान को सिर पर बैठाया जाता है और हमारे ऋषियों द्वारा अर्जित ज्ञान को नीचा दिखाया जाता है। मेरी समझ में तो यह गुलामी की मानसिकता से अधिक और कुछ नहीं है।

मैं निजी तौर पर योग सिखाने वाले बाबा रामदेव का फैन हूं। इसका कारण यह नहीं है कि वे अपनी योग कक्षाओं में बैठने की फीस लेते हैं बल्कि इसके बावजूद उन्‍होंने सहज योगासनों और सामान्‍य प्राणायामों से लोगों को सक्रिय कर दिया है। आज स्थिति यह है कि किसी चिकित्‍सक को जब यह कहा जाता है कि इस बीमारी का हल तो बाबा रामदेव ने इस योग में बताया है तो चिकित्‍सक मारने को दौड़ता है। पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव है कि चिकित्‍सक यह मानने को तैयार नहीं होता कि सांस लेने से भी कोई ठीक हो सकता है। श्‍वास के साथ जुड़े प्राण को अंग्रेजों ने नकारा तो भारतीयों ने भी नकार दिया। अब विदेशी लोग योग करते हैं और ग्‍लेज पेपर वाली मैग्‍जीन्‍स में भारतीय उनके फोटो देखते हैं।

वापस विषय पर आता हूं
इतिहास के संदर्भ में ही देखें तो प्रयोग, प्रेक्षण और परिणाम की कसौटी पर इतिहास के किसी तथ्‍य को नहीं रखा जा सकता। जैसी दुनिया आज है वैसी दस साल पहले नहीं थी और जैसी दस साल पहले थी वैसी सौ साल पहले नहीं थी। तो कैसे तो प्रयोग होगा, किस पर प्रेक्षण किया जाएगा और आने वाले परिणामों को किस कसौटी पर जांचा जाएगा।

मेरा मानना है कि ज्‍योतिष के साथ भी कुछ ऐसा ही है। पूर्व में ग्रहों और राशियों की स्थिति की पुनरावृत्ति के साथ घटनाओं का तारतम्‍य देखकर उसके सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर योगों का निर्माण किया गया होगा। सालों, दशकों या शताब्दियों के निरन्‍तर प्रयास से योगों को स्‍थापित किया गया और आज के संदर्भ में इन योगों का इस्‍तेमाल भविष्‍य में झांकने के लिए किया जाता है। अब जो लैण्‍डमार्क पीछे से आ रहे रास्‍ते को दिखा रहे हैं उनसे आगे का रास्‍ता बता पाना न तो गणित के सामर्थ्‍य की बात है और न कल्‍पना के। ऐसे में ज्‍योतिषी के अवचेतन को उतरना पड़ता है। जैसा कि मौसम विभाग के सुपर कम्‍प्‍यूटर करते हैं। अब तक हुई भूगर्भीय गतिविधियों को लेकर आगामी दिनों में होने वाली घटनाओं की व्‍याख्‍या करने का प्रयास।

इसके साथ ही बदलावों को तेजी से समझना और उन्‍हें आज के परिपेक्ष्‍य में ढालना भी एक अलग चुनौती होती है। पचास साल पहले कोई ज्‍योतिषी यह कह सकता था कि अमुक घटना हुई है या नहीं इसकी सूचना आपको एक सप्‍ताह के भीतर मिल जाएगी वहीं अब मोबाइल और इंटरनेट ने सूचनाओं के प्रवाह को इतना प्रबल बना दिया है कि घटना और सूचना में महज सैकण्‍डों का अन्‍तर होता है। अब देखें कि इससे क्‍या फर्क पड़ा। सबसे बड़ा फर्क पड़ा बुध के प्रभाव के बढ़ने का। दूसरा फर्क मोबाइल और इंटरनेट के इस्‍तेमाल के दौरान व्‍यक्ति पर आ रही किरणों के असर का। इसे बुध राहू के रूप में लेंगे या शनि चंद्रमा के रूप में, ये निर्णय होने से अभी बाकी है। ऐसे में कोई ज्‍योतिषी करीब-करीब सही फलादेश कर देता है तो उसे और उसके अवचेतन को धन्‍यवाद देना चाहिए।
शेष शुभम्

काटवे की देव विचार माला

ज्‍योतिष विद्यार्थी - sidharth

पुस्‍तक का परिचय में उनकी किताबों से निकले हुए कुछ वाक्‍यों से करना चाहूंगा जो मुझे जब-तब आन्‍दोलित करते रहते हैं।

-     मेरे अनुभव के अनुसार वेतनभोगी, कामचोर, आलसी, शिक्षक, प्राध्‍यापक, क्‍लर्क, जागीरदार, पैतृक संपत्ति पर जीविका चलाने वाले,  निश्चित आय वाले लोगों की जिंदगी में ग्रहों के फल नजर नहीं आते। ग्रहों के प्रभाव ऐसे लोगों की जिंदगी में अधिक नजर आएंगे जिनका जीवन अधिक स्‍वतंत्र प्रकृति का हो।

-     जिनकी संतान की अल्‍प आयु में मृत्‍यु होती है या बिल्‍कुल संतान नहीं होती उनके परिवार के स्‍वप्‍नों में छोटे बालक दिखते हैं तथा स्‍वप्‍नों में मारपीट और झगड़ों के दृश्‍य दिखाई देते हैं।

-     जन्‍म के समय गुरु-शुक्र युति हो तो यह द्ररिद्रतादर्शक है, लेकिन ये लोग बहुत बुद्धिमान होते हैं

-     रवि मेष राशि में तापदायी तथा तुला में कल्‍याणकारी और सुखदायी होता है यानि उच्‍च राशि में खराब प्रभाव और नीच राशि में हितकारी होता है। l

-     इसके अलावा मैं बीसीयों वाक्‍य और लिख सकता हूं लेकिन यहां केवल एक नजीर ही पेश करना चाहता था कि कैसे काटवे सोचने का नजरिया तक बदल देते हैं।

मैं काटवे की हर पुस्‍तक के बारे में विस्‍तार से लिख सकता हूं। साठ से सौ पृष्‍ठों की इन पुस्‍तकों में इतना कुछ दिया गया है कि दिमाग की खिड़कियां खुल जाती हैं। देव विचार माला की कुल सत्रह छोटी पुस्‍तकें हैं। काटवे ने ज्‍योतिष विद्यार्थियों को मछली पकड़कर देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाने में अधिक रुचि दिखाई है। इसके चलते हर पुस्‍तक अपने आप में पूर्ण, सोचने के लिए मजबूर करने वाली और विषय पर बनी रहने वाली है। जो लोग परम्‍परागत ज्‍योतिष पढ़ते हैं उनके लिए तो यह पुस्‍तक अपरिहार्य है ही जो कृष्‍णामूर्ति पद्धति के अनुसरणकर्ता हैं वे भी ज्‍योतिष के इस दूसरे आयाम को पढ़ें तो बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है।

देव विचार श्रंखला की किताबों में: सात ग्रहों के लिए अलग अलग विचार और राहू-केतू के लिए एक अलग पुस्‍तक है। इसके अलावा भाव, भावेश, तेज, देव विचार, देव रहस्‍य, अध्‍यात्‍म, प्रश्‍न, गोचर तथा शुभाशुभ ग्रह निर्णय किताबें शामिल हैं।

काटवे का परिचय

हेमवंता नेमासा काटवे का जन्‍म कर्नाटक के बेलगांव के शहापुर में 6 फरवरी 1892 में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। मूलत: कन्‍नड़ होने के बावजूद काटवे मराठी, संस्‍कृत, हिन्‍दी, गुजराती और अंग्रेजी में वार्तालाप कर लेते थे। अपने मामा से ज्‍योतिष का शौक लिया और बाद में रुचि बढ़ती गई। विषय में पारंगत होने के बाद कुछ वर्ष काशी में रहे। बाद में उन्‍होंने ज्‍योतिष भास्‍कर और ज्‍योतिष दीप पत्रिकाओं में भी लिखा। वर्ष 1936 में काटवे नागपुर पहुंचे। हनुमानजी के इस भक्‍त को ज्‍योतिष पर थोथी बहस करने वालों को मजा चखाने में आनन्‍द आता था। चाय के आदी और नसवार के प्रेमी काटवे बैठे-बैठे तीन-चार घण्‍टे की समाधि लगा लेते। अपनी मित्र मण्‍डली को एक साल पहले जानकारी दी और 11 अगस्‍त 1949 में संसार छोड़ दिया।

स्रोत देव विचार माला, नागपुर प्रकाशन

क्रूरता का भ्रम

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

एक जातक के लग्‍न में राहू कू्र राशि में बैठा है इस कारण इसका स्‍वभाव भी क्रूर है। दूसरे जातक का कर्क लग्‍न है और लग्‍न में चंद्रमा बैठा है तो इसका स्‍वभाव शीतल है। इसी तरह कुण्‍डली के अन्‍य भावों में राशियों और ग्रहों की स्थिति के अनुरूप जैसे का तैसा फलादेश निकालने का क्रम मैं सालों से देख रहा हूं। मैं इस बात से भी इनकार नहीं करता कि शुरूआती दौर में मैंने भी ऐसी ही गलतियां की। गुरूजी के सामने किसी कुण्‍डली का फलादेश निकालते समय ऐसी भूल अकसर कर दिया करता और बुरी तरह झाड़ खाता। हर बार एक नया और भरा पूरा लेक्‍चर सुनने को मिलता। गलती समझ में आने में कुछ समय लगा। अब कुछ स्‍पष्‍ट कर सकता हूं। हो सकता है आम लोगों के लिए यह उतना काम का न हो लेकिन ज्‍योतिष के नए विद्यार्थियों के लिए इसे समझना बहुत जरूरी समझता हूं।
ज्‍योतिष की शब्‍दावली और आम शब्‍दावली में थोड़ा सा अन्‍तर होने के कारण बहुत से नौसिखिए ज्‍योषियों ने ग्रहों और राशियों के स्‍वरूप को जैसा का तैसा लोगों पर भी लागू करना शुरू कर दिया। इस परिणाम यह हुआ कि ग्रहों का स्‍वभाव लोगों का स्‍वभाव बना दिया गया। वास्‍तव में ऐसा नहीं होता। जहां राशियों का स्‍वभाव बीतने वाले समय के प्रकार को इंगित करता है वहीं ग्रहों का स्‍वभाव और राशि का संबंध अपने कारक के प्रति रूचि को दिखाते हैं।
इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कर्क लग्‍न में लग्‍न में बैठा शनि। यहां लग्‍न आत्‍मा का कारक है, कर्क राशि जलतत्‍वीय राशि है और शनि धीमा और ठण्‍डा है। अब आदमी का स्‍वरूप देखा जा सकता है। यानि सप्‍तमेश और अष्‍टमेश लग्‍न में जलतत्‍वीय राशि में है। चंद्रमा जिस स्‍थान पर होगा उसके अनुरूप शनि का प्रभाव होगा। अगर चंद्रमा कमजोर होगा तो इसे कहा जाएगा कि शनि की जमीन कमजोर है। तो ऐसा व्‍यक्ति धीमे स्‍वभाव और नकारात्‍मक जमीनी सोच के बावजूद दूर तक की सोच पाने में नाकाम रहेगा। यहीं पर चंद्रमा मजबूत स्थिति में होता है तो व्‍यक्ति शांत प्रकृति और नकारात्‍मक सोच के बावजूद दूर तक स्‍पष्‍ट देख लेने वाला होगा। यानि एक ही राशि में शनि जैसा ग्रह जो अपना स्‍वभाव बहुत धीरे बदलता है वह भी दो प्रकार के परिणाम देगा। यहां कारण बनेगा चंद्रमा। इसी तरह अन्‍य लग्‍नों में भी देखा जाएगा।

उदाहरण के चलते हो सकता है मैं विषय से कुछ दूर आ चुका हूं। अब वापस विषय पर
सूर्य और मंगल क्रूर ग्रह हैं लेकिन किस राशि में बैठे हैं और इनके अधिपत्‍य की राशियां कहां हैं। इस बात पर निर्भर करेगा कि कुण्‍डली में क्रूरता की क्‍ स्थिति क्रूरता का अर्थ किसी इंसान को मारकर खा जाना नहीं बल्कि परिणामों की तीव्रता से है। राहू और केतू पाप ग्रहों को अर्थ यह नहीं कि इनसे प्रभावित लोग पाप करते हैं बल्कि इन ग्रहों को ही शाप लगा हुआ है। इनके साथ बैठे ग्रह इनकी कमियां और विशेषताएं ग्रहण कर लेते हैं या कहें ये उनकी विशेषताएं और कमियां ग्रहण कर लेते हैं और उनके मुताबिक परिणाम देते हैं। बुध के साथ बैठा राहू बुध के परिणामों में बदलाव कर देगा। यानि अपने परिणाम बुध के साथ मिला देगा। ऐसे योग वाला व्‍यक्ति संपादन, बैंकिंग और संचार के काम में भी बैकस्‍टेज पर अधिक नजर आएगा। यानि मुखपृष्‍ठ पर नजर आने वाले लोगों में भले ही उनका स्‍थान न हो कुण्‍डली की मजबूत स्थिति में संस्‍थान के बेहतरीन पदों पर होने के बाद भी ऐसे लोग पीछे रहकर काम करेंगे।
तो इस बार कोई आपसे कहे कि आपकी कुण्‍डली के सातवें घर में क्रूर ग्रह है इसलिए आपकी पत्‍नी से बनती नहीं है तो मानिएगा मत। क्‍योंकि क्रूर ग्रह संबंधों में तीव्रता तो लाते हैं लेकिन खराब होंगे या अच्‍छे यह सप्‍तमेश की स्थिति, आपके शुक्र और पत्‍नी के गुरू पर निर्भर करेगा।

शेष शुभम्

ज्‍योतिष के लेखों में रुचि रखने वाले