ज्योतिषी के रूप में लोगों से मिलते हुए मुझे करीब ग्यारह साल हो चुके हैं। बहुत लम्बा तो नहीं लेकिन इतना अनुभव तो होता ही है कि जातक क्या सुनना चाहता है। कई ज्योतिषी ऐसे होते हैं जिन्हें पता होता है कि जातक क्या सुनना चाहता है। और यकीन मानिए वे वही सबकुछ बोलते हैं जो सामने बैठा आदमी सुनना चाहता है। यह कोई चमत्कार की बात नहीं है। आप में से कोई व्यक्ति सालों तक दूसरे लोगों के अंतरंग संबंधों, सोच और विचारों से रूबरू होता रहे तो उसे भी पता लगने लगेगा कि आपके पास आए व्यक्ति के दिमाग में क्या चल रहा है। पंद्रह सोलह साल का लड़का पढ़ाई की बात पूछेगा, बीस से पच्चीस साल का युवक कैरियर की, पच्चीस से तीस साल का युवक प्रमोशन की, तीस से पैंतीस का युवक नौकरी बदलने और परिवार के बारे में पूछेगा, पैंतीस से चालीस साल का आदमी घर बनाने और अन्य घरेलू समस्याओं के साथ पैसा बचाने की बात पूछेगा इस तरह हर आयु, स्थान और देश, काल परिस्थिति के अनुसार जातकों को प्रश्न तय होते हैं। आंख मूंदकर अगर संबंधित सवालों के जवाब दिए जाएं तो जातक रुचि से सुनता है। तो गड़बड़ कहां होती है। जरूरी नहीं कि जब जातक कुण्डली दिखाने जाए उस वक्त ज्योतिषी का दिमाग भी वैसे ही काम कर रहा हो जैसे जातक का दिमाग काम कर रहा होता है। ऐसे में घर की समस्याओं से जूझ रहे ज्योतिषी के पास जातक कैरियर में ग्रोथ का सवाल लेकर आए तो कई देर तक ज्योतिषी का दिमाग चलेगा ही नहीं। ठीक है हम किसी ज्योतिषी को स्थितप्रज्ञ मान भी लें तो भी जरूरी नहीं कि मुण्डेन के संकेत भी उसी सवाल का जवाब दे रहे हों। ऐसे में जो योग ज्योतिषी को दिखाई भी नहीं दे रहे होते हैं उन्हें भी जबरन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है और यही होने से बनाने का चक्कर फलादेश को बुरी तरह प्रभावित करता है।
सालों बाद भी कम्प्यूटर ज्योतिषियों की तरह फलादेश देने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। कम्प्यूटर दिए गए विषयों की सीधी गणना तो कर कुण्डली तो बना देता है, लेकिन कुछ बिन्दु ऐसे होते हैं जिन्हें कैल्कुलेट करने जैसी क्षमता वाले सुपर कम्प्यूटर्स तैयार करने के लिए भी अभी वक्त लगेगा। मैं तीन बिंदुओं पर अपने कथन को सिद्ध करने का प्रयास करता हूं। इसमें पहला है दशाओं की ओवरलेपिंग,
दूसरा है जातक की संप्रेषणीय आग्रहता और
तीसरा अधिक दक्ष कम्प्यूटरों और सॉफ्टवेयर का अभाव।
दशाओं की ओवरलेपिंग
किसी खराब दशा में जातक की हालत खराब हो जाती है। वह ज्योतिषी के पास जाता है और उनसे कंसल्ट करने पर पता चलता है कि आगामी छह माह में चालू महादशा या अन्तरदशा खत्म हो जाएगी इसके बाद समय बेहतर है। चलो, छह माह का समय बीत जाता है लेकिन परिस्िथतियों में कोई दिखाई नहीं देता। ऐसे में जातक फिर ज्योतिषी के पास जाता है और पूछता है कि दशा बदलने के बाद भी समय क्यों नहीं बदला। ज्योतिष सीखने के शुरूआती दौर में ऐसे कई केस मेरे सामने थे। अधिकतर राहू की दशा से संबंधित थे। मैंने गुरूजी से पूछा कि इसका क्या कारण है तो उन्होंने एक शब्द में उत्तर दिया ओवरलेपिंग
मैंने पूछा किस स्तर पर
उन्होंने जवाब दिया हर स्तर पर
अब मेरे सामने अब तक सीखा गया हर शब्द तैर रहा था। अगले कई महीनों तक मुझे हर कड़ी को दोबारा जोड़ना पड़ा। यानि अब तक जो कुछ सीखा था उसमें ओवरलेपिंग भी जोड़नी थी। इसके लिए मुझे काफी मानसिक श्रम करना पड़ा। दशाओं के बाद ऑर्ब और नक्षत्रों तक की ओवरलेपिंग ने मुझे दिमागी रूप से थका दिया। इसके बाद मैंने कुछ निष्कर्ष निकाले जो काफी स्थूल थे लेकिन जो लोग मुझसे सीखने की उम्मीद लेकर आ रहे थे उन्हें पर्याप्त संकेत मिल रहे थे।
इनमें पहला है कि जो दशा जातक भोग लेता है उसका असर जिन्दगी भर उसके साथ रहता है। चाहे वह राहू की दशा हो या सूर्य की। यानि उसके स्वभाव में स्थाई परिवर्तन आते हैं जो जातक के साथ ही रहते हैं। याद कीजिए क्या आपको अपने खराब समय में अच्छे दिनों में योजनाबद्ध तरीके से किए गए काम याद नहीं आते।
इसी तरह आने वाली दशा पहले से अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देती है। यानि राहू के अंतिम दिनों में गुरु की दशा के लक्षण आने लगते हैं। आमतौर पर लोगों के वजन बढ़ने के रूप में यह प्रमुखता से देखा गया है। अब कितनी ओवरलेपिंग होती है इसका अनुमान लगाना थोड़ा टेढ़ा काम है। इसके लिए देखना होगा कि जातक की कुण्डली में प्रभावी ग्रह कौनसे हैं। ग्रहों की खुद की क्या स्ट्रेंथ है और जिस ग्रह की दशा चल रही है वह जातक को कितना सपोर्ट कर रही है। इसके अलावा जातक खुद क्या कर रहा है। जातक के कर्मों को देखने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि कर्म ही इच्छा स्वातंत्रय की संभावना को पैदा करते हैं। चाहे वह खराब दिनों की ओर ले जाए या अच्छे दिनों की ओर।
यह तो हुई दशाओं के ओवरलेपिंग की बात इसी तरह ग्रहों, भावों, राशियों और नक्षत्रों तक की ओवरलेपिंग होती है। इसे समझने के लिए किसी सुपर कम्प्यूटर को कई दिनों तक लगातार गणनाएं करनी होगी। आदमी का दिमाग सुपर कम्प्यूटर से तेज चलता है। यह अतिश्योक्ति नहीं है तो कम से कम अवचेतन मस्तिष्क को तो इसका श्रेय दिया ही जा सकता है। इसलिए जिन लोगों का इंट्यूशन लेवल ठीक होता है उनका अवचेतन कतिपय अधिक दक्षता से कार्य कर रहा होता है। समस्या केवल उस समय होती है जब इंट्यूशन और कल्पना में अन्तर खत्म हो जाता है। यहां अवचेतन की गणनाओं की बजाय सुस्त दिमाग की फेयरीटेल कहानियां होती हैं। जो अनुमान और वातावरण से प्रभावित होती हैं। इसीलिए कहते हैं कि ज्योतिषी के अनुसार ज्योतिष की गणनाएं प्रभावित होती हैं। आगामी पोस्ट में बात करेंगे जातक की संप्रेषणीय आग्रहता की...
ज्योतिष विद्यार्थी सिद्धार्थ जोशी
Saturday, March 29, 2008, 6:50 pm [EST]
Message: meri kundli me rin mukti kab tak, kese hogi kya kaam karu? kuch bhi nahi dikh raha he aage kya hoga? kripaya hindi me uttar de.
11/10/1977 12.14.30pm. Ratlam. 23.31
अभीजी नमस्कार, आपकी कुण्डली का विश्लेषण करने से मुझे लगता है कि: फरवरी 2009 के बाद कर्ज उतरना शुरू हो जाएगा। आपका जो पैसा दूसरे लोगों ने दबा रखा है वह भी वापस आएगा।
अपने ऑफिस का स्थान बदलिए, घर में अपना कमरा बदलिए और सफेद कपड़े में चावल व इत्र की शीशी लक्ष्मी जी के मंदिर में दान कीजिए।
Wednesday, April 2, 2008, 6:46 am [EST]
Message: Panditji, I Have been trying my to do the very best in my business, but I am not reaching anywhere. I need your valued help in attaining some success in my business.
From: Devendra Sood (soodvision@yahoo.co.in)
देवेन्द्र जी नमस्कार,
आपने सवाल तो पूछ लिया लेकिन अपनी डेट ऑफ बर्थ, टाइम ऑफ बर्थ और बर्थ प्लेस के बारे में कुछ जानकारी नहीं दी है। यकीन कीजिए मैं कुण्डली का विश्लेषण कर परिणाम हासिल करने की कोशिश करता हूं न कि चमत्कार से समस्याओं का निपटारा करता हूं। कृपया मुझे अपेक्षित डाटा उपलब्ध कराएं, अगर आपको अपने सवाल का जवाब चाहिए।
Thursday, April 3, 2008, 10:22 am [EST]
Message: i am a house wife. it has been 22 years to my marriage.i have 3 children.my husband is a businessman.i have a doubt that i always think that i have hidden potential but had never got a chance to explore that.i want you to help me to tell that would i be able to do something other than house hold work.so,please tell me about my future and my children future.
my D.O.B is 12 march 1961.
time is 2:30pm , place is jalandhar,punjab
waiting for your reply........
From: veena kapur (rouble_kap1987@yahoo.co.in)
वीना जी, नमस्कार,
आपका सोचना सही है। आपकी कुण्डली में पोटेंशियल जबरदस्त है। लेकिन समय साथ नहीं है। वर्ष 2009 से आपका समय अच्छा् आ रहा है। यानि बहुत अच्छा । फिलहाल गुरू की दशा है और यह कर्क लग्न में निर्माण का काल कहा जाता है। यानि खुद को तैयार करने का काल। 2009 से आप एक निश्चित दिशा में मेहनत करने लगेंगी और 2012 में आपको अपेक्षित सफलता मिलनी शुरू हो जाएगी। 2017 तक आपका समय उत्तम है। वैसे आपको जिन्दगी से बहुत शिकायत नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में आप एक बड़े कुनबे की मालकिन हों सकती हैं। भले ही आपकी संतान आपके पास न रहे लेकिन आपका परिवार बड़ा और भरा पूरा होगा। आप एनजीओ और अन्यआ समाज सुधार के काम कर सकती हैं। हां पैसा नहीं कमाने की इच्छा हो तो प्रसिद्धी आपका इंतजार कर रही है। अपनी दूसरी संतान पर ध्यान दीजिएगा। वह लड़का है तो और भी अधिक ध्यान देने की आवश्यपकता है।
खैर मैंने ज्योतिष का अध्ययन किया और एक समय ऐसा आया जब मैंने ज्योतिष कार्यालय खोल लिया। चूंकि ऊंचे परिवार से था इसलिए पोश कॉलोनी में कार्यालय खोला और नाम रखा पाराशराज एस्ट्रो कंसल्टेंसी लिमिटेड। नाम बड़ा, स्थान बड़ा और फीस ग्यारह सौ रुपए मात्र। आज यह अधिक नहीं लगती लेकिन पांच सात साल पहले बीकानेर जैसे छोटे शहर में अधिकांश मजदूर वर्ग के लोग पूरे महीने में इतना कमा नहीं पाते थे। फीस अधिक रखने का एक फायदा यह हुआ कि भीड़ अधिक नहीं आई सलेक्टिव लोग आते थे। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी आए जिन्होंने मुझे अन्दर तक हिला दिया। एक बुढिया अपने बेटे को लेकर आई। वह पापड़ बेलकर (बीकानेर में पापड़ के व्यवसाय से ऐसे लोग जुड़े हैं जो तीन से पांच रुपए प्रति सौ पापड़ की दर से पापड़ बेलकर ठेकेदार को देते हैं।) गुजारा करती थी। एक बेटा था तीस साल का, शादी की हुई थी। दो पोतियां थी, छोटी-छोटी। बेटा निकम्मा था। कमाता नहीं था सो वह खुद उसके परिवार को पालती थी। मेरे पास लेकर आई अपने बेटे को। उसे पता था कि बड़ी कोठी में ग्यारह सौ रूपए फीस लगती है लेकिन ईलाज हो जाता है। वह बेटे को दिखाने के लिए लेकर आई। साथ में फीस लेकर आई। मुझे उसकी शक्ल देखकर ही लगा कि यह बहुत गरीब औरत है। कपड़े तक जगह-जगह से फट रहे थे।
मैंने उसके बेटे की कुण्डली देखी। बुध छठे भाव में राहू के साथ बैठा था। लग्न निर्बल हो तो यह सीजोफ्रीनिक का प्राथमिक लक्षण है। मैंने बुढिया से उसके बेटे के संबंध में सवाल पूछे जो सीजोफ्रीनिया रोग के लक्षणों से मिलते थे। सीजोफ्रीनिया में प्रमुख लक्षण संदेह करना और गंदा बोलना और फटेहाल रहना है। व्यक्ति काम-धाम भी करना बंद कर देता है। मैंने पूछा तो उसने सभी लक्षणों पर सहमति जताई। मैंने बूढी मां से कहा कि इसे डॉक्टर के पास ले जाओ। दवा दारू करोगी तो ठीक हो जाएगा। काम भी करने लगेगा वरना ऐसे ही घूमता रहेगा। बूढी मां ने अपने ब्लाउज में से एक लिफाफा निकाला और मुझे पकड़ा दिया। मैंने देखा उसमें दस, बीस और पचास के नोट थे। पूरे ग्यारह सौ। मैंने पैसे बुढिया को लौटाते हुए कहा मांजी आप इन पैसों से अपने बेटे का ईलाज कराओ। तो वह अड़ गई कि जो ईलाज करना है आप ही करिए आप जितने पैसे मांगेंगे मैं लाकर दे दूंगी। मैं एक घण्टे से अधिक समय में उसको यह समझा नहीं पाया कि ईलाज मेरे पास नहीं चिकित्सक के पास है। आखिरकार मैंने उसे छोटा-मोटा उपचार बताकर लौटा दिया और तीन महीने बाद मिलने के लिए कहा। पैसों का लिफाफा देने के लिए मुझे कोठी के बाहर तक जाना पड़ा वह किसी प्रकार पैसे वापस लेने के लिए तैयार नहीं थी। उसे लगा कि मैं उसके बेटे का उपचार नहीं करना चाहता। बुढिया के जाने के बाद मेरा मन खराब हो गया। मैंने अपने दो पुराने क्लाइंट की बिना बात क्लास ली और घर आकर सो गया। एक हफ्ते तक कुछ नहीं किया। धीरे-धीरे कार्यालय जाना कम कर दिया। और बाद में कार्यालय बंद ही कर दिया। अब भी सोचता हूं कि मैंने बुढिया के बेटे का ईलाज नहीं किया लेकिन वह किसी दूसरे ज्योतिषी के हत्थे चढ गई होगी।
अब ब्लॉग के जरिए लोगों के दिमाग में गहरे तक जमी ज्योतिष की भ्रांतियों को निकालने का प्रयास कर रहा हूं। मेरा प्रयास तब सफल होगा जब उन गरीब लोगों तक अपनी बात पहुंचा पाउं जो बार-बार ठगे जाते हैं। कभी परिस्थितियों से, कभी धन लोलुपों से तो कभी अपने अंधविश्वास के कारण...
ज्योतिष की किसी भी शाखा में कभी भी कालसर्प जैसा योग नहीं बताया गया है। पिछले दो-तीन दशक में इस योग का जन्म हुआ और इसका असर इतना अधिक व्यापक बताया गया कि यह तेजी से सफल हुआ। आज भारत के किसी भी कोने में चले जाइए, पुराना हो या नया ज्योतिषी, प्राचीन भारतीय ज्योतिष का पक्षधर हो या पश्चिमी हर कोई कालसर्प योग को नकारने में असहज महसूस करेगा।
कैसे हुआ यह ?
इसे एक लाइन में कहूं तो लोगों के छिछले दु:खों ने इस योग का पोषण किया। अधिक स्पष्ट करूं तो प्रगति में बाधा एक ऐसा शब्द है जिसे कई मायनों में उपयोग किया जा सकता है। हर कोई जिन्दगी में भाग्योदय चाहता है। भाग्योदय का अर्थ हुआ कि छप्पर फाड़कर कब मिलेगा। होता यह है कि कुछ लोगों को छप्पर फाड़कर मिलता भी है। बाकी लोगों की आस बाकी रहती है। ऐसे में 'छप्पर फटने में आ रही बाधा' के बारे में लोग जब ज्योतिषी से पूछते हैं तो ज्योतिषी उन्हें बतलाता है कि आपकी कुण्डली में कालसर्प योग है सो आप सफल नहीं हो सकते हैं। अब उपाय करना होगा। और लोग लग जाते हैं उपाय करने। उपाय के दौरान पूरा ध्यान सफलता और उसके प्रयासों पर लगता है। सफलता मिल जाए तो कालसर्प का ईलाज हो गया और सफलता न मिले तो ठीकरा बेचारे कालसर्प पर फूटना है ही।
क्या है कालसर्प योग?
प्राचीन भारतीय ज्योतिष में सर्प योग बताया गया है। इस योग का अर्थ है कि कुण्डली में सात ग्रह राहू और केतु के एक ओर आ गए हैं। फर्ज कीजिए मेष में राहू है और तुला में केतु इसके साथ सारे ग्रह मेष से तुला या तुला से मेष के बीच हों। इसे सर्प योग कहा जाएगा। ऐसा माना गया है कि राहू सरीसृप है और इसके सिर से पूंछ के बीच सारे ग्रह हैं। बाद में जोधपुर के एक ज्योतिषी ने इस योग को कालसर्प बना दिया। यानि समय पर सांप कुण्डली मारकर बैठा हुआ। इन लोगों को उपचार नासिक के महाकाल मंदिर में शुरू किया गया और सफलता मिलने के कसीदे गढ़े गए। अति तो तब हुई जब जोधपुर से नासिक तक बाकायदा बस तक चलने लगी। बाद में देश के अन्य ज्योतिषियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोए। सर्प से कालसर्प बना और कालसर्प से अब विषधकर कालसर्प, नागराज कालसर्प, विपरीत कालसर्प और राजयोग कालसर्प तक बनने लगे हैं। इससे जातकों को इस तरह शापित कर दिया जाता है कि संबंधित व्यक्ति के जुकाम भी हो जाए तो लगता है कालसर्प का दोष आड़े आ रहा है।
कोई नहीं है शापित
एक बार रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि शिशु के जन्म को देखकर लगता है कि ईश्वर अब तक मनुष्य से निराश नहीं हुआ है। मुझे भी ऐसा लगता है। अगर एक इंसान ईश्वर की प्रिय संतान है तो हर इंसान ईश्वर की उतनी ही प्रिय संतान होगा। निर्गुण ब्रह्म की रुचि अलग-अलग इंसान पैदा करने की रही भी नहीं होगी। आवश्यकता है तो बस अपनी क्षमताओं को पहचानकर सफल होने की।

