गीता में ज्योतिष के उपचार

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

महाभारत के युद्ध से ठीक पहले कृष्ण ने अर्जुन को जीवन के सूत्र दिए। गीता के इन सूत्रों में नीतिगत बातें अधिक हैं। कई साल तक ज्योतिष पढने के बाद मुझे लगा कि सामान्य मानवीय व्यवहार के साथ जीवन जी रहे लोगों को उनकी समस्याओं का समाधान गीता में मिल सकता है। ज्योतिषी के पास आने वाले लोगों में से करीब साठ प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं जिनकी समस्या वर्तमान परिस्थिति के इतर मानसिक अधिक होती है। इस प्रकार की समस्याओं के निदान के लिए गीता के उपचार दिखाई दिए। शुरुआत में मैंने प्रयोग के तौर पर लोगों को ये उपचार बताए। साथ ही उन लोगों को यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह प्रयोग के तौर पर ही हैं। जिन जातकों ने गीता के उपचार किए उनमें से अधिकांश का भले ही इच्छित कार्य नहीं हुआ हो लेकिन संतुष्ट सभी नजर आए। ऐसा नहीं है कि गीता ने उन्हें शांत कर दिया बल्कि लगभग सभी को या तो कार्य पूरे होने के रास्ते नजर आने लगे या फिर उन लोगों को नए रास्ते मिल गए। बहुत अधिक विस्तार से यहां चर्चा नहीं की जा सकती लेकिन प्राथमिक तौर पर जो उपचार हैं उन पर एक प्रारंभिक दृष्टिकोण दे रहा हूं जिन जातकों का चंद्रमा कमजोर होता है उनमें इसके प्रभाव अधिक तेजी से दृष्टिगोचर होते हैं।

अध्यायों के संकेत: गीता के अठारह अध्यायों में कृष्ण ने जो संकेत दिए हैं उन्हें मैंने ज्योतिष के आधार पर विश्लेषित करने का प्रयास किया है। इसमें ग्रहों का प्रभाव और उनसे होने वाले नुकसान से बचने और उनका लाभ उठाने के संबंध में यह सूत्र बहुत काम के हैं-

प्रथम अध्याय शनि संबंधी पीडा के लिए
द्वितीय अध्याय - जब जातक की कुण्डिली में गुरु की दृष्टि शनि पर हो
तृतीय अध्याय - जब 10वां भाव शनि, मंगल और गुरु के प्रभाव में हो
चतुर्थ अध्या‍य - कुण्डली का 9वां भाव तथा कारक ग्रह प्रभावित हो
पंचम अध्यायय - भाव 9 तथा 10 का अंतर्परिवर्तन हो
छठा अध्याय - तात्कालिक रूप से भाव 8 एवं गुरु शनि का प्रभाव हो, साथ ही शुक्र की भाव स्थिति हो
सप्तम अध्याय - 8वें भाव से पीडि़त और मोक्ष चाहने वालों के लिए
आठवां अध्याय - कुण्डली में कारक ग्रह और 12वें भाव का संबंध हो
नौंवा अध्याय - लग्नेश, दशमेश और मूल स्ववभाव राशि का संबंध हो
दसवां अध्याय - इसका आम स्वरूप है और कर्म प्रधानता है। सभी के लिए
ग्यारहवां अध्याय - जिनकी कुण्डली में लग्नेश 8 से 12 भाव तक हो
बारहवां अध्याय - भाव 5 9 तथा चंद्रमा प्रभावित होने पर
तेरहवां अध्याय - भाव 12 तथा चंद्रमा के प्रभाव से संबंधित
चौदहवां अध्याय - आठवें भाव में किसी भी उच्च के ग्रह की स्थिति में
पंद्रहवां अध्याय - लग्न एवं 5वें भाव के संबंध में देखेंगे
सोलहवां अध्याय - मंगल और सूर्य की खराब स्थिति में

अध्यायों के संकेत

गीता की टीका तो बहुत से योगियों और महापुरुषों ने की है लेकिन ज्योतिषीय अंदाज में मुझे कहीं भी इसकी टीका नहींमिली। बहुत दिन तक गुणने से कुछ सूत्र हाथ लगे हैं। गीता की एक विशेषता यह है कि इसे पढने वाले व्यक्ति के अनुसार ही इसकी टीका होती है। यानि हर एक के लिए अलग। मैंने भी संकेत देने के साथ इस स्वतंत्रता को बनाए रखने की कोशिश की है। संकेत मात्र ही होंगे तो आगे विश्लेषण करना आसान रहेगा। बहुत अधिक लिखूंगा तो स्वतंत्रता की संभावना कम हो जाएगी।

1 विषाद का अकेलापन- विषाद में आदमी को लगता है कि वह अकेला पड़ चुका है। आमतौर पर आदमी के गहन भीतरी विचार ऐसे होते हैं जो अधिकांश लोगों में कॉमन होते हैं। प्रथम अध्याय में मोह और कर्तव्य के बीच तनाव से उपजे अकेलेपन का वर्णन है। ऐसा ही विषाद शनि पैदा करता है। केमद्रुम योग में ऐसा विषाद देखा जाता है।

2 कृष्ण की दया- विषाद के बाद अर्जुन को गुरुज्ञान मिलता है कृष्ण से। शनि पर गुरू की दृष्टि से यह लाभ होता है। कुण्डली में यही स्थिति होने पर दूसरे अध्याय का पठन लाभ देता है।

3 शंका और समाधान- कर्म के प्रति शंका होना 10वें भाव पर शनि का प्रभाव है। इसके बाद जोश दिलाने का काम मंगल करता है और गुरु बताता है कि सही रास्ता क्या है।

4 कर्म के धर्म की स्थापना- व्यक्तित्व में स्थाई भाव की कमी को चौथा अध्याय पूरा कर सकता है।

5 धर्म और कर्म का मेल- नौंवे तथा दसवें भाव का अंतर्संबंध धर्म और कर्म में द्वंद्व पैदा करता है। ऐसे में पांचवा अध्याय दोनों का रोल स्पष्ट कर शंकाओं का समाधान प्रस्तुतत करता है।

6 कर्म शुरु कब किया जाए- जब आठवां भाव और गुरु तथा शनि का काल हो। यानि स्याह अंधेरी रात के बाद की रोशनी में यह अध्याय बताता है किअबशुरु किया जाए। शुक्र लालसा पैदा करता है और शनि लालसा के बावजूद विरक्त रखता है।

7 सभी समस्याओं का अंत- जब तक जीवन है समस्याएं बनी रहेंगी। फिर मोक्ष, सही सवाल। घटनाओं और साधनों का प्रभाव चित्त पर पडना बंद हो जाए। आमतौर पर जिन लोगों का आठवां भाव खराब हो यानि मोक्ष की ओर ले जाने की बजाय सांसारिकता में उलझाने वाला हो उन्हें इस अध्याय में अपेक्षित उत्तर मिलेंगे।

8 मौत का डर- जिन लोगों को मौत का डर सता रहा हो यानि आठवें भाव का संबंध बारहवें से हो उन्हें यह अध्याय पढना चाहिए।

9 खुद को जानने की कवायद- बहुत से लोगों में क्षमताएं तो बहुत होती है लेकिन वे बिलो-प्रोफाइल काम करते हैं और धीरे-धीरे अपनी क्षमताओं पर विश्वास खो देते हैं। लग्नेश, दशमेश और मूल स्वभाव राशि का संबंध होने पर ऐसे लोग फिर से अपनी लय पाने में कामयाब होते हैं। नवां अध्याय इसमें सहायता करता है।

10 अपनी पहचान- खुद को जानने की कवायद की पराकाष्ठा होती है खुद के स्वरूप तक पहुंचने की। ऐसे में कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि परमब्रह्म से पैदा हुए तुच्छ से दिखने वाले मनुष्य का असली स्वरूप क्या है। तत्वमसि और अहम् ब्रह्मास्मि का क्या अर्थ है यहीं पता चलता है।

11 काम लगातार करते रहें- काम करते-करते एक बार विचार आता है कि क्यों कर रहे हैं। इस प्रकार का विचार लग्नेश के आठवें से बारहवें भाव तक के जातकों में कई बार आता है। ऐसे में बिना आसक्ति के लगातार काम में जुटे रहने के लिए ग्यारहवां भाव प्रेरित करता है। कई शंकाओं का समाधान भी होता है।

12 प्रारब्ध और भाग्य के साथ- पिछले जन्मों में हमने जो कार्य किए उनके साथ ही हमें इस जन्म में पैदा होना होता है। इसके साथ ही इस जन्म के लिए भी ईश्व हमें कुछ देकर भेजता है। नेमतों के लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हुए दिमाग को स्थिर करने का उपाय भक्ति योग में।

13 दूसरी दुनिया से संबंध- इसके लिए चंद्रमा और बारहवें भाव का संबंध होना चाहिए।

14 अकस्मात लाभ- आठवें भाव में उच्च का ग्रह अचानक अध्यात्मिक उन्नति का लाभ दिलाता है। इसके लिए नियमित तैयारी होनी चाहिए।

15 संभावनाएं- पिछले जन्म में क्या किया और इससे इस जन्म में कहां तक आगे बढा जा सकता है। पांचवा भाव लग्न को जो कुछ दे सकता है उसका लाभ लेने की कोशिश।

16 शक्ति हो और नियमित न हो- सूर्य या मंगल की कुण्डली में खराब स्थिति में यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण हो उठता है। इसके अध्ययन से अपनी गलतियों से बंद हो रहे रास्ते खुलते हुए नजर आने लगते हैं।

नोट- अभी बहुत कुछ कहा जाना बाकी है लेकिन हर लेख की एक सीमा होती है। उसी सीमा का ध्यान रखते हुए मैं इस लेख को विराम देता हूं लेकिन वार्ता जारी रहेगी।

कब करें निवेश?

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शेयर बाजार जब चढता है तो लोग कहते हैं कि यह निवेश का सही समय है लेकिन निवेश करने के साथ ही बाजार गिरने लगता है और लगाया हुआ पैसा डूबता हुआ नजर आता है। ऐसा ही कुछ बाजार गिरने के समय सुनाई देता है कि अब शेयर बाजार पर्याप्‍त गिर चुका है और अब ऊपर जाएगा इसलिए इसमें निवेश करने का सबसे सही वक्‍त है। लेकिन इस बार भी ऐसा ही कुछ होता है। यानि गिरते हुए बाजार में एक बार फिर पूंजी डूबती नजर आती है।
तो कब करना चाहिए निवेश
यह बहुत ही सीधा और स्‍पष्‍ट सवाल है और इसका जवाब इतना ही टेढा और उलझा हुआ। ज्‍योतिष के मायने से देखा जाए तो मैंने इसका एक हल निकाला है। हर व्‍यक्ति की कुण्‍डली में ग्‍यारहवां घर होता है आय का और बारहवां घर होता है व्‍यय का। शेयर बाजार और सट्टे में एक मूल अन्‍तर है वह यह कि सट्टे में पूरी रकम एक साथ लगती है और बाद में एकसाथ आती है लेकिन शेयर बाजार में ऐसा नहीं होता। शेयर में निवेश करने का अर्थ हुआ कि हम अमुक कंपनी में अपना विश्‍वास व्‍यक्‍त कर रहे हैं और समय आने पर लाभ का हिस्‍सा लेंगे। यानि निवेश इस तरह से कि पैसा न तो एकसाथ आता है और न एकसाथ जाता है।
सट्टे में पांचवां भाव प्रमुख रूप से देखा जाता है। इसके अलावा ग्‍यारहवां भाव। वहीं शेयर बाजार में निवेश के लिए मैंने बहुत से लोगों को बारहवां भाव ऑपरेट होने पर निवेश करने की सलाह दी। यानि उन लोगों के हाथ से खर्च कराया वह भी निवेश के रूप में। बाद में जब ग्‍यारहवां भाव ऑपरेट हो रहा था उन दिनों में उन्‍हें पैसे निकाल लेने की सलाह दी गई। कुछ मामलों में लोगों को अच्‍छा लाभ हुआ तो कुछ में आंशिक लाभ की स्थिति रही। लेकिन नुकसान किसी को नहीं हुआ। यह एक सामान्‍य ट्रिक थी। इसके साथ समय भी अच्‍छा चलता हुआ होना चाहिए वरना निवेश किया गया पैसा डूब भी सकता है। समय खराब हो तो ग्‍यारहवां भाव भी परेशानियां लेकर आता है। आमतौर पर सार्वजनिक संबंध अत्‍यधिक बढने के रूप में या फिर दूसरे लोगों की जमानत देने और उनके पचडों में पडने के रूप में।

एक घर सपनों का

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थोडा कमाई कर लेने और नौकरी में जम जाने के बाद आदमी की इच्‍छा होती है कि वह एक ऐसा घर बनाए जिसमें वह तमाम सुविधाएं हों जिनकी वह हमेशा इच्‍छा करता रहा है। अधिकांश सफल लोग अपने जीवन के तीसरे या चौथे दशक में ऐसा घर बना लेते हैं। यहां सफल कहने से मेरा मतलब है संतोषजनक स्थिति तक स्‍थापित हो जाना। जिससे आगे बढने के लिए आदमी पूरी ताकत से प्रयास नहीं करता।

किसका घर कब बनेगा

जिस जातक की कुण्‍डली में चौथा घर बहुत बेहतर स्थिति में होता है वह जल्‍दी घर बना लेता है। कुण्‍डली का चौथा घर घरेलू वातावरण और माता की मानसिक स्थिति का परिचायक भी होता है। जिन लोगों को शांत वातावरण और अच्‍छे जेस्‍चर वाली माता मिलती है वे लोग शीघ्र बनाते देखे गए हैं। इसके अलावा चतुर्थ भाव के स्‍वामी और इस भाव पर दूसरे ग्रहों की दृष्टि भी महत्‍वपूर्ण होती है। इससे पता चलता है कि घर कैसा होगा।

वास्‍तु के अनुसार परफेक्‍ट घर

वास्‍तु के अनुसार पूर्व और उत्‍तर दिशा गृह मालिक के लिए सर्वश्रेष्‍ठ होती है। पूर्वमुखी घर का मालिक एडमिनिस्‍ट्रेशन और सरकार में अच्‍छी दखल रखता है। ऐसा घर पितृसत्‍तात्‍मक होता है। यानि पुरुषों की अधिक चलती है। दंपत्ति में पति पत्‍नी के बाद तक जीवित रहता है।
उत्‍तरमुखी घरों में ज्‍यादातर कंसल्‍टेंट रहते हैं। यानि नौकरी संबंधी सलाह देने वाले, बैंकर्स, इंश्‍योरेंस एजेण्‍ट, आयुर्वेद और होम्‍योपैथी के चिकित्‍सक और ऐसे अन्‍य लोग जो क्रिएटिव एप्रोच के साथ लोगों को सलाह देते हैं। आमतौर पर दूसरे लोगों को सलाह देने के साथ ही इनका पेशा जुडा होता है। ऐसे घरों के बच्‍चों की स्थिति बेहतर होती है। परिवार तेजी से बढता है। कन्‍याएं अधिक हों तो परिवार अधिक फलता-फूलता है।
पश्चिम मुखी घरों में अधिकांश नौकरीपेशा लोग रहते हैं। ये जिन्‍दगी का अधिकतर हिस्‍सा व्‍यवस्‍थाएं बनाने में बिता देते हैं। इन घरों में ऊर्जा का स्‍तर कम होता है। धीरे बोलने वाले और छोटी-छोटी समस्‍याओं को भी जरूरत से अधिक गंभीरता से सुलझाने वाले लोग इस श्रेणी में आते हैं।
दक्षिणमुखी घरों को सबसे खराब दिशा वाले घर बताया गया है। कुछ स्‍थानों पर तो लिखा है कि ऐसे घरों में विधवाएं, विधुर और स्‍यापा करने वाले लोग रहते हैं। लेकिन एलोपैथ चिकित्‍सकों और हॉस्‍टलों के अलावा दुकानों को इन दिशा में बेहतर परिणाम देते देखा गया है। ध्‍यान देवें तो पता चलता है चिकित्‍सक के घर रोने वाले लोग अधिक आते हैं। हॉस्‍टल में रहने वाले लोग कभी हॉस्‍टल से आत्‍मीय रिश्‍ता नहीं जोड पाते हैं और दुकान के प्रति दुकानदार का यह नजरिया होता है कि यह जितनी जल्‍दी खाली हो बेहतर है ताकि दूसरा माल लाकर डाला जा सके।

इंट्यूशन और कल्‍पना में अन्‍तर

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

(Difference between Intuition and Imagination)
कई बार सुबह उठते ही आपको आभास होता है कि आज आपका दिन कैसा जाएगा। कहीं घूमने जाते हैं तो लगता है कि आज कोई पुराना अमुक दोस्‍त मिलेगा और वह मिल भी जाता है। आप किसी से किसी घटना विशेष के लिए सावधानी बरतने के लिए कहते हैं और बाद में पाते हैं कि सावधानी नहीं बरतने के कारण दुर्घटना हो गई। यकीन कीजिए ऐसा संयोग से नहीं होता। हमारा दिमाग हमारे लिए यह काम पूरी खामोशी से करता है और हमें ही चौंका देता है। दिमाग के दो भाग होते हैं। पहला भाग चेतन मस्तिष्‍क होता है जो हमें दैनिक कार्य संपन्‍न करने में सहायता करता है। दूसरा भाग होता है अवचेतन मस्तिष्‍क जो बाकी की गणनाएं हमारे लिए करके रखता है। यह दुनिया के किसी भी सुपर कम्‍प्‍यूटर से अधिक तेज चलता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि दिमाग का एक प्रतिशत से भी कम हिस्‍सा चेतन भाग होता है और शेष अवचेतन।
हमें बहुत सी घटनाओं का हमें पूर्वाभास होता है। इसके लिए हमारा अवचेतन मस्तिष्‍क जिम्‍मेदार होता है। अवचेतन मस्तिष्‍क चेतन की तुलना में कहीं अधिक तेजी से सही गणनाएं कर लेता है। यही गणनाएं बताती हैं कि आगे क्‍या होने की प्रबल संभावना है। जो लोग अपने सेकण्‍ड माइंड के भीतर तक उतर जाते हैं उनके लिए पूर्वाभास करना अपेक्षाकृत आसान होता है। नियमित रूप से पूर्वाभास करने वाले लोगों को इंट्यूशनिस्‍ट कहा जाता है। ये लोग नियमित रूप से सेकण्‍ड माइंड में उतरते रहते हैं। जिन लोगों को पास प्राकृतिक रूप से यह क्षमता नहीं होती वे योग एवं अन्‍य पद्धतियों से अपने दिमाग को इस तरह ट्रेंड करते हैं कि कभी भी दूसरे दिमाग में उतर जाते हैं। कुछ लोग नियमित रूप से पूर्वाभास करने लगते हैं। प्रेक्टिकली यह संभव नहीं है। आम आदमी के लिए तो बिल्‍कुल ही नहीं। लेकिन हो सकता है कुछ लोग मुझसे जिद भी जाएं कि नहीं जी हम तो नियमित रूप से पूर्वाभास करते हैं। लेकिन मैं अपनी बात पूरी करना चाहूंगा। हम अधिकांशत: जो निर्णय प्रकट अवस्‍था में पेश करते हैं उनमें अधिकांश आशंकाओं पर आधारित होते हैं। कुछ ही निर्णय ऐसे होते हैं जो हमें भविष्‍य के गर्भ में छिपे रहस्‍य तक लेकर जाते हैं।
इंट्यूशनिस्‍ट कहता है अगले मोड पर ट्रक मिलेगा तो कल्‍पनाशील व्‍यक्ति कहता है अगले मोड पर भीड होगी। भीड पूर्व के अनुभव और वर्तमान आभास से जुडा है और इंट्यूशन वातावरण की समग्रता से। इसी तरह इंट्यूशनिस्‍ट कहेगा कि आज लाटरी का यह नम्‍बर निकलेगा वहीं कल्‍पनाशील व्‍यक्ति कहता है कि लॉटरी के ये नम्‍बर अधिक आकर्षक नजर आ रहे हैं। इंट्यूशनिस्‍ट के पास किसी सवाल का एक जवाब होता है या तो हां या नहीं। जबकि कल्‍पनाशील के पास दो जवाब देने के बाद तीसरा ऑप्‍शन भी बचा रहता है शायद यह भी हो सकता है।

सेकेण्‍ड माइंड के लिए देखें मेरा दूसरा ब्‍लॉग दर्शन और अध्‍यात्‍म

हर क्षण समग्रता से महसूस होता है

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

आम आदमी की ज्‍योतिष पर निर्भरता के संबंध में एक बार एक उच्चिष्‍ठ गणेश के उपासक ज्‍योतिषी ने कहा था कि जैसे-जैसे इंसान की आस-पास के वातावरण और घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता में कमी आती जाती है वैसे वैसे उसकी भविष्‍य की घटनाओं पर पकड कम होती जाती है। एक समय जातक को व्‍यक्तिगत निर्णय भी दूसरों की सहायता लेने की नौबत आ जाती है।
ज्‍योतिष के अध्‍ययन के दौरान भी ऐसा वक्‍त आता है जब कुण्‍डली में बताए योग और व्‍यक्ति के‍ व्‍यक्तिव में एकाकार नहीं हो पाता, प्रश्‍न कुण्‍डली और घटना में एका नहीं हो पाता, घटनाओं और उनके मुण्‍डेन कारण एक नहीं हो पाते हैं। ऐसे में ओमेन ही एकमात्र जरिया बचता है घटनाओं का तात्‍कालिक कारण और उनके संकेत जानने का।

ओमेन क्‍या है ?

प्रश्‍नकर्ता के प्रश्‍न पूछने के दौरान वातावरण में घट रही घटनाओं को ओमेन कहते हैं। इसका आयाम घटाकाश से सर्वाकाश तक हो सकता है। घटाकाश का यहां अर्थ है एक कमरे के भीतर हो रही हलचल और सर्वाकाश का अर्थ है पूरे ब्रह्माण्‍ड की हलचल। उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूं। सबसे पहले प्रसिद्ध उदाहरण- ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णामूर्ति अपने शिष्‍यों के साथ बैठे थे। उसी समय एक व्‍यक्ति भागता हुआ आया और बताया कि उसकी पत्‍नी कहीं गुम हो गई है। इसी समय संकेत मिला कि घर के कुएं में से पानी निकालते समय रस्‍सी टूटने के कारण बाल्‍टी कुएं में ही गिर गई है। कृष्‍णामूर्ति ने अपने शिष्‍यों से पूछा कि इससे क्‍या संकेत मिलता है। शिष्‍यों ने कहा कि रस्‍सी के टूटने का अर्थ है कि उक्‍त आदमी की पत्‍नी का उससे संबंध खत्‍म हो गया है और वो चली गई है। कृष्‍णामूर्ति मुस्‍कुराए और बोले नहीं!
रस्‍सी के टूटने का अर्थ है कि पानी से पानी को अलग करने वाला तत्‍व टूट चुका है। उस व्‍यक्ति की पत्‍नी शीघ्र ही घर लौटने वाली है। और यकीन कीजिए उस आदमी की पत्‍नी जल्‍दी ही लौट आई।
एक और उदाहरण लेता हूं- एक दिन मैं अपने गुरूजी के साथ हमारे ऑफिस से लौट रहा था। उस दिन हमारे पास एक अजीब केस आया। एक व्‍यवसायी था जिसने बताया कि उसकी फैक्‍ट्री में पिछले कुछ समय से अजीब घटनाएं हो रही है। अधिकतर शार्ट सर्किट और चीजों के गुम हो जाने के संबंध में है।
आदमी के चले जाने के बाद ऑफिस से लौटते हुए मैंने गुरूजी से पूछा कि इस आदमी को क्‍या समस्‍या है। उन्‍होंने कहा कि राहू की समस्‍या हो सकती है। मैंने चारों ओर नजर घुमाई लेकिन कहीं भी राहू से संबंधित चीज का नामोनिशान नजर नहीं आ रहा था। मैंने कहा गुरूजी इस बार हमें ओमेन सपोर्ट नहीं कर रहा है। गुरूजी मुस्‍कुराए बोले ओमेन घटाकाश से सर्वाकाश तक फैला होता है और अपनी अंगुली बादलों की ओर कर दी। आमतौर पर बीकानेर में बादल कम ही होते हैं। मैंने नजर उठाकर आसमान की ओर देखा तो बादल का एक टुकडा सूर्य की ओर बढ रहा था। पूरे आसमान में बादल का केवल एक टुकडा था। मेरे देखते-देखते उसने पूरी तरह सूर्य को ढक दिया। अब सूर्य की किरणें बादलों के पीछे से झांकते हुए बादलों की कोर पर सुनहरी कोर बना रही थी। मैंने कहा कि काले बादलों के साथ राहू का संबंध बना लूं तो सुनहरी कोर का क्‍या अर्थ है तो गुरूजी ने समझाया कि सूर्य और गुरू से उक्‍त व्‍यवसायी का ईलाज होगा।
व्‍यवसायी बुध का अवतार था जिस पर राहू की छाया स्‍पष्‍ट दिखाई दे रही थी। यानि निचला होठ लटका हुआ। लगातार बोलने वाला, शक्‍ल से बुद्धू दिखाई देने वाला गणित में होशियार आदमी। राहू की छाया का असर सबसे पहले आंखों पर होता है। हल्‍के डार्क सर्कल्‍स उभर आते हैं। उस व्‍यक्ति की कुण्‍डली में राहू की दशा चल रही थी और यहीं से उसका ईलाज शुरू किया गया। लेकिन व्‍यवसायी स्थिति को संभाल नहीं पा रहा था। गुरूजी ने व्‍यवसायी के पिता को उसका सहयोग करने की सलाह दी। जल्‍दी ही सूर्य और गुरू (पिता और ज्‍योतिषी) की सहायता से व्‍यवसायी का डूबता व्‍यवसाय फिर से खडा हो गया। पहले से भी अधिक अच्‍छी स्थिति में।

अगली बार ओमेन के इतर इंट्यूशन और कल्‍पना के अंतर के बारे में...

आदर्श पुरुष- ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

किसी भी परिवार में नए सदस्‍य का प्रवेश एक विशेष मौका होता है। शादी के लिए दुल्‍हन ढूंढने के बारे में पहले बात कर चुका हूं। अब संतानोत्‍पत्ति के बारे में चर्चा करूंगा। संतान क्‍या होगी लडका या लडकी इस बारे में चर्चा करने पर ज्‍योतिष में निषेध कहा गया है। कई बडे ज्‍योतिषियों ने कहा है कि जन्‍म और मृत्‍यु ऐसे रहस्‍य हैं जिन्‍हें ब्रह्मा ने अपने पास ही रखना उचित समझा। फिर भी इस बारे में यदा-कदा शोध होते रहे हैं। लेकिन अधिकांशत: इस बारे में मनाही है इसलिए मैं संतान के लिंग के संबंध में मौन ही रहूंगा। बात आगे बढाते हुए कहना चाहूंगा कि संतान पैदा होने पर पिता के मन में होता है कि इसका भविष्‍य क्‍या होगा। इसी संदर्भ में संतान की कुण्‍डली बनाई जाती है और भविष्‍य आंकने की कोशिश की जाती है।

पुरुष संतान होने पर-

देखा जाता है कि उसका लग्‍न कैसा है। जो भी लग्‍न हो उस पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि तो नहीं है। शुभ ग्रहों से युक्‍त लग्‍न बलशाली होता है।
लग्‍नेश कहां है। लग्‍न का उपाधिपति कैसा है। उपाधिपति के बारे में विस्‍तृत वर्णन में फिर कभी करने की कोशिश करूंगा लेकिन इतना हिंट कर देना पर्याप्‍त होगा कि उपाधिपति पहले, दूसरे, तीसरे, नौंवे, दसवें और ग्‍यारहवें भाव को सिग्‍नीफाइ करे तो व्‍यक्ति की कुण्‍डली प्रथम श्रेणी की होती है। दुनिया के करीब पचास प्रतिशत लोगों को जिन्‍दगी में सबकुछ पाने का हक होता है। कुछ लोगों के साथ बंधन जुडे होते हैं बाकी लोग मानसिक विकलांगता के शिकार होते हैं।
खैर लग्‍नेश के बाद देखा जाता है चंद्रमा-
चंद्रमा अन्‍य शुभ ग्रहों के साथ या उनसे दृष्‍ट हो तो बलशाली होता है। आमतौर पर गुरु, मंगल और शुक्र के साथ होना चंद्रमा के लिए लाभदायी सिद्ध होता है।
शारीरिक रूप रंग और व्‍यवहार-
पुरुष के लिए शारीरिक रूप रंग मायने नहीं रखता जितना कि उसका व्‍यवहार। कुण्‍डली में मुख्‍य रूप से बारह राशियां होती है। इसके अनुसार बारह लग्‍न होते हैं। हर लग्‍न की अपनी खासियत होती है। इसके बारे में थोडा बहुत वर्णन मैं उस आदमी की शक्‍ल तो देखो पोस्‍ट में कर चुका हूं। बाकी हर पुरुष और स्‍त्री विशिष्‍ट होते हैं। किसी भी दो व्‍यक्तियों को एक पैमाने पर फिट नहीं किया जा सकता। केवल ज्‍योतिषीय योगों की ही बात करें तो इतने योग हो सकते हैं कि उन्‍हें गिना नहीं जा सकता। इसके अलावा परसेप्‍शन का भी एक आयाम होता है। इसे ज्‍योतिष की भाषा में कहते हैं

ओमेन


इसके बारे में बात अगली बार...

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