स्‍थाई योग और उनके प्रभाव

ज्‍योतिष विद्यार्थी - sidharth

वृश्चिक राशि में बुध होगा तो व्‍यक्ति नहाने के ठीक बाद पूजा अर्चना करेगा- गीले कपड़ों में ही, राहू की दशा में चंद्रमा का अन्‍तर और चंद्रमा की दशा में राहू का अन्‍तर हमेशा खराब जाएगा, शनि की महादशा में केतु की अन्‍तरदशा और केतु की महादशा में शनि की अन्‍तरदशा खराब होगी।
इस प्रकार के बहुत से स्‍थार्इ योग या विचार बनाकर रखे गए हैं। कुछ नाड़ी के तहत उपलब्‍ध हैं, तो कुछ ज्‍योतिषियों ने अपने स्‍तर पर निकाले हैं। नाड़ी के बहुत से योगों को मैंने जैसा का तैसा लागू होते और कई योगों को बुरी तरह फेल होते देखा है। ऊपर जो चार-पांच योग लिखे हैं, ये सभी हमेशा लागू हुए हैं। अब तक तो मैंने इन्‍हें फेल होते नहीं देखा। जिन कुण्‍डलियों में इन योगों पर संदेह हुआ, वे कुण्‍डलियां ही बाद में गलत बनी हुई सिद्ध हुईं। लेकिन अब भी मुझे निजी तौर पर इन योगों पर लम्‍बे समय तक विश्‍वास करने का कोई आधार नजर नहीं आता। मैं इसका कारण स्‍पष्‍ट करने की कोशिश करता हूं।

चिकित्‍सक बनने की शर्त

कोई व्‍यक्ति अगर चिकित्‍सक बनना चाहे तो उसकी कुण्‍डली में कम से कम ऐसा योग तो होना ही चाहिए कि वह बीमार व्‍यक्ति को डायग्‍नोस कर ले। जो व्‍यक्ति रोग का निदान ही नहीं कर पाएगा वह इलाज कैसे करेगा?
कुण्‍डली में सूर्य और गुरु का संबंध रोग निदान का रास्‍ता बताते हैं। कुण्‍डली में किसी भी एंगल से जुड़े लेकिन गुरु और सूर्य का आपसी संबंध होना आवश्‍यक है। वर्ष 1990-1992 तक यह योग को पूरी तरह फॉलो करने वाली कुण्‍डलियां ही चिकित्‍सक बना रही थीं। सीखने के दौर में मैंने मिन्‍नतें कर चिकित्‍सकों से जन्‍म समय, जन्‍म स्‍थान और जन्‍म दिवस हासिल किए और कुण्‍डलियां बनाकर देखी। इसी दौर में कुछ दोस्‍तों की ऐसी कुण्‍डलियां भी हाथ में आई जो प्री-मेडिकल टैस्‍ट में सफल हुए थे लेकिन उनकी कुण्‍डली में सूर्य और गुरू का कोई विशेष रोल नहीं था। मेरा चकराना स्‍वाभाविक था। वर्ष 1990 के बाद हुआ ग्‍लोबलाइजेशन। इसने विदेशी निवेश और साधनों के आयाम बदलकर रख दिए। अब चिकित्‍सा केवल सेवा न रहकर व्‍यवसाय बन गई। हर रोग के निदान के लिए मशीनों का जोरदार इस्‍तेमाल बढ़ गया। हो सकता है बड़े शहरों में ऐसा पहले से होता रहा हो, लेकिन हर जगह ऐसा नहीं था। अब जो छात्र चयनित हो रहे हैं, उनकी कुण्‍डली में शुक्र का बेहतर स्थिति में होना दिखाई दिया। यानि चिकित्‍सक पेशा अधिकार, ज्ञान और व्‍यवहारिकता के बजाय डेकोरम की मांग प्रमुखता से कर रहा था। कुछ साल पहले तक कोई मुझसे पूछता कि मेरे बच्‍चे का मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सलेक्‍शन होगा कि नहीं तो मैं कुण्‍डली में गुरु और सूर्य की स्थिति पर ध्‍यान लगाता, लेकिन अब प्रमुखता से शुक्र की स्थिति देखता हूं।
अन्‍य स्‍थाई योग भी कसौटी पर
जब भव्‍यता के मायने शरीर की भव्‍यता के बजाय साधनों की भव्‍यता से लिए जा रहे हैं, जब ज्ञान का अर्थ सूचना और सूचना की व्‍यवस्‍था बन चुकी है, सुंदरता प्‍लास्टिक सर्जनों के हाथ की बात, प्रसिद्धि मीडिया या पर्सनेलिटी मैनेजमेंट के हाथ की बात तो भव्‍यता, ज्ञान और प्रसिद्धि गुरु की बजाय शुक्र दिला रहे हैं। इससे पहले अधिकार की बात के लिए मैं सूर्य के स्‍थान पर शनि की प्रतिष्ठा करने की कोशिश कर चुका हूं। सेना में भी ताकत का स्‍थान भी तकनीक ले रही है। ऐसे में एक उम्‍दा सेना के पास मंगल का जुनून होना चाहिए या गुरु का ज्ञान और सूर्य की अधिकार भावना?

1 विचार आए:

  1. दोस्‍ती दिवस said...

    संडे है
    सब के
    मन का डे।

    पोस्‍ट पसंद
    आई।

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