11 May, 2008

ग्रहों के प्रभाव दिखाने का समय

कुण्‍डली में नौ ग्रह अपना समय आने पर पूरा प्रभाव दिखाते हैं। वैसे अपनी दशा और अन्‍तरदशा के समय तो ये ग्रह अपने प्रभाव को पुष्‍ट करते ही हैं लेकिन 22 वर्ष की उम्र से इन ग्रहों का विशेष प्रभाव दिखाई देना शुरू होता है। जातक की कुण्‍डली में उस दौरान भले ही किसी अन्‍य ग्रह की दशा चल रही हो लेकिन उम्र के अनुसार ग्रह का भी अपना प्रभाव जारी रहता है। देखते हैं कि ज्‍योतिष के अनुसार उम्र में कौनसा ग्रह प्रभावी होता है-

22 से 24 वर्ष तक - इस समय सूर्य का प्रभाव अधिक रहता है। आदमी टीन एज को पार कर वयस्‍क अवस्‍था में पहुंचता है। अधिकार बढते हैं और आंखों में सूर्य का तेज झलकने लगता है। इस समय जो व्‍यक्ति झूठ से दूर रहता है और किए गए वादे निभाता है सूर्य लम्‍बे समय तक उसके साथ रहता है। यह वय बीत जाने के बाद भी सूर्य का प्रभाव बना रहता है। सूर्य प्रभावी लोगों के लिए जहां यह उत्‍तम काल होता है वहीं शनि एवं राहू प्रभावी लोगों के लिए कष्‍टकारी समय होता है।

24 से 25 वर्ष - यह चंद्रमा का काल होता है। नए आइडिया आते हैं। दिमाग अधिक उपजाऊ हो जाता है। जातक अपना विस्‍तार करता है। पढाई, नौकरी, परिवार या अन्‍य उन क्षेत्रों में जिन में वह पहले से लगा होता है। इस समय जातक की आंखों में शीतल चमक आने लगती है। ये शुद्ध प्रेम का काल होता है।

25 से 28 वर्ष - यह शुक्र का काल है। इस काल में जातक में कामुकता बढती है। शुक्र चलित लोगों के लिए स्‍वर्णिम काल होता है और गुरू और मंगल चलित लोगों के लिए कष्‍टकारी। मंगल प्रभावी लोग काम से पीडित होते हैं और शुक्र वाले लोगों को अपनी वासनाएं बढाने का अवसर मिलता है। इस दौरान जो लव मैरिज होती है उसे टिके रहने की संभावना अन्‍य कालों की तुलना में अधिक होती है। शादी के लिहाज से भी इसे उत्‍तम काल माना जा सकता है।

28 से 32 वर्ष - यह मंगल का काल है। हालांकि मंगल को उग्र बताया गया है लेकिन यह 28 वर्ष की उम्र के बाद अपने सर्वाधिक शानदार परिणाम देताह है। गौर करें कि वास्‍तव में मंगल सेनापति होता है। यानि पराक्रम और बुद्धि कौशल साथ-साथ ऐसे में गधिया पच्‍चीस (25 साल की उम्र तक जवान लोग काफी बेवकूफियां करते हैं कभी जोश में तो कभी अज्ञान में इसलिए इसे गधिया पच्‍चीसी कहता हूं।) का समय बीत जाने के बाद जातक सेनापति बनने के लिए तैयार होता है। अपने परिवार के लिए, कैरियर के लिए या फिर आपदाओं पर नियं‍त्रण के लिए।

32 से 36 वर्ष - यह बुध का काल होता है। जातक अपने भले बुरे के अलावा आगामी जीवन के बारे में अधिक कुशलता से सोचने लगता है। बच्‍चों और संबंधों पर अधिक गौर किया जाता है। बुध का काल इतना अधिक प्रभावी और महत्‍वपूर्ण है कि इसे छोटे पैराग्राफ में समेटा नहीं जा सकता। लेकिन इतना कहा जा सकता है कि यह परिवर्तन का सबसे महत्‍वपूर्ण काल होता है। इसके बारे में चर्चा बाद में विस्‍तार से करूंगा।

36 से 42 वर्ष - शनि का काल। यह रुककर देखने का समय है कि चल क्‍या रहा है। बाकी लोग क्‍या कर रहे हैं। लम्‍बी प्‍लानिंग बनती है। व्‍यवस्‍थाएं स्थिरता की ओर जाती है। लम्‍बे एग्रीमेंट होते हैं जो जीवन को स्‍थाई बनाने का प्रयास करते हैं। जातक इस काल में घर भी बना लेता है। परिवार को जमाने का काम किया जाता है।

42 से 48 वर्ष - राहू का समय। यह विशुद्ध रूप से चिंता का काल होता है। इस समय आदमी चिंतन करता है। हर बात पर। चाहे वह उससे संबंधित हो या न हो। इन्‍हें थिंक टैंक की बजाय चिंता का टैंक कहा जा सकता है। कई लोग इस दौरान डूम शोवर हो जाते हैं। यानि उन्‍हें लगता है कि बस बहुत हो गया अब तो प्रलय आ ही जाएगी।

48 से 54 वर्ष - यह सक्रिय जीवन का लगभग अंतिम काल है। इस समय जातक जिस काम को अब तक करता आया है उसे लगातार करता रहता है। उससे पीडित भी रहता है और उसे ढोता भी है। यानि रो धो कर यह काल निकालता है। विकास कितना होता है यह तो स्‍पष्‍ट नहीं होता लेकिन काम बहुत रहता है। जो लोग 48 से पहले खाली बैठे होते हैं उनके इस काल के दौरान खाली बैठे रहने की संभावना अधिक होती है। कार्यशील लोग नया काम करने की बजाय जिस काम में लगे हैं उसी में लगे रहते हैं।

इसके बाद का समय प्रभावी नहीं माना गया है। ऊपर बताए गए ग्रह और समय अन्‍य ग्रहों की दशा में भी अपना प्रभाव दिखाते हैं। यह एक सामान्‍य नियम है हर कहीं लागू नहीं होता लेकिन अन्‍य ग्रहों की गणना के दौरान ज्‍योतिषी इसका भी ध्‍यान रखते हैं इससे प्रॉब्‍लम सॉल्‍व करने में मदद मिलती है।

15 Apr, 2008

उपचार का विवाद

एक आदमी ज्योतिषी (astrologer) के पास जाता है और अपनी कुण्डली दिखाता है। ज्योतिषी उसके भले और बुरे ग्रहों के बारे में प्राथमिक जानकारी देता है। अब जातक का अगला सवाल होता है कि बुरे प्रभाव से बचने अथवा अच्छे प्रभाव को बढाने के लिए क्या उपचार किए जा सकते हैं।
यहीं से शुरू होता है उपचार का विवाद:
किस ग्रह का उपचार किया जाए, ग्रह की स्थिति के लिए उपचार किया जाए कि उसकी दशा के लिए रत्न (gem) धारण कराया जाए अथवा दान कराया जाए, मंदिर (tample) में भेंट पूजा चढाने की सलाह दी जाए अथवा मंदिर से दूर रहने की। सैंकडों उपचार है। प्राचीन भारतीय ज्योतिष (astrology) में तो केवल शांति पाठ के बारे में ही प्राथमिक जानकारी दी गई है। यानि जिस ग्रह से कष्ट हो उसकी शांति के लिए पाठ कराकर ब्राह्मणों को दान कर कष्टं का निवारण हो सकता है। कुछ बीज और कवच मंत्र (chants) भी शामिल कर लिए जाएं तो आदमी की इच्छाशक्ति बढाने के इतर अधिक उपचार की संभावना दिखाई नहीं देती। बाद में आई लाल किताब जिसने ज्योतिष में उपचार के आयामों को ही बदल कर रख दिया। एक ओर जहां ग्रहों द्वारा दिए जाने वाले कष्ट के बारे में चिंतन चल रहा था वहीं लाल किताब ने कहा कि इस ग्रह को ही यहां से हटा दो। हर ग्रह को निश्चित भाव में पहुंचाने के लिए विशिष्ट उपचार हैं।
बाद में के.एस. कृष्णावमूर्ति ने ग्रहों की स्थिति और तत्वों (matter) के बीच संबंध की विशद व्याख्या की तो बहुत से ज्योतिषियों ने इसे बखूबी इस्ते माल किया। कुछ ने पीडित जातक की जेब में भिंडी रखवाई तो कुछ ने घरों में उल्टी छतरी टंगवा दी।
इसके बाद आया फेंग शुई (feng shui) यानि घर के वास्तु (architect) का उपचार करके भाग्य को उदय करने का साधन। इसने उपचारों के विज्ञान को नया आयाम दिया। बिना जातक से पूछे ही उसके उपचार किए जाने लगे। पानी की कुण्डी में तांबे का टुकडा डाल दो या फिर हंसता हुआ बुढ्ढा (laughing buddha) अथवा दांतों में सिक्के दबाए मेंढक फलां जगह लगा दो इससे भाग्य उदय हो जाएगा। इससे भाग्य उदय होते तो नहीं देखा लेकिन घरों में चाइनीज (chinease) सामानों की भरमार जरूर देख ली। पिछले दिनों सुना कि अब तो चाइनीज माल भी भारत (india) में बनने लगा है।

छोडिए, मैं फिर से विषय पर आता हूं इन उपचारों की व्यांख्या पढकर आपको एकबारगी लग सकता है कि मजाकिया दिखने वाले इन उपचारों से क्या हो सकता है लेकिन यकीन मानिए इनमें से कई उपचार तो काम भी कर गए। मेरे पास इन मुद्दों के सफल परिणाम ले चुके लोग आए हैं। कई लोगों की कहानियां (stories) सुनने के बाद मुझे लगा कि मुझे भी इन्हें सीखना चाहिए। कई साल बाद अब नए ज्योतिषियों को वही पुरानी कलाबाजियां करते देखता हूं तो पुराने दिनों के द्वंद्व मानस पर फिर से उभर आते हैं।

उपचार क्या् है?
उपचार के बारे में आप आगे पढें इससे पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उपचार वास्तव में क्या हैं। मूल रूप से उपचार किसी जातक की प्राकृतिक (natural) दशा में अन्य साधनों की सहायता से परिवर्तन के संबंध में होते हैं। यहां जातक की प्राकृतिक दशा से मतलब है कि पिछले जन्म के कर्मों और इस जन्म में अब तक किए गए कर्मों से आदमी जिस अवस्था में पहुंचा है उस अवस्था से उसे उस अवस्था तक पहुंचाना जहां वह वास्त‍व में जाना चाहता है। इसके लिए कुछ ज्योतिषियों का मत है कि जिस ग्रह की दशा अथवा अंतरदशा चल रही हो उसके उपचार किए जाएं जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि किसी कुण्डली के कारक ग्रह के अनुरूप ही जातक का उपचार किया जाए।

उपचारों का वर्गीकरण:

मेरे अनुसार अवधि के आधार पर उपचार तीन प्रकार के हो सकते हैं। इनमें पहला है दीर्ध अवधि उपचार - जातक की कुण्डली में कारक ग्रह, भाग्येश अथवा लग्न देखकर उसके अनुसार पत्थर (gems) पहना दिया जाता है। कोई पत्थर कैसे और कितना काम करता है इसके बारे में हम कभी किसी और दिन चर्चा करेंगे। हां, तो आपने बहुत से लोगों की अंगुलियों में ऐसी अंगुठियां (rings) देखी होंगी। किसी ने एक तो किसी दो और कुछ ने तो दस अंगुठियां तक पहनी हैं।

कौन याद आ गया?
अमिताभ बच्चन (amitabh bachchan)

सदी का यह सबसे बडा सितारा अपने सितारों (stars) के गर्दिश में आने के बाद इतना टूट गया कि उम्र के तीसरे पडाव में एक-एक अंगुली में दो-तीन अंगुठियां तक पहनने लगा। अमिताभ ने खुद के और बुरे ग्रहों के बीच जैसे चमकीले नगीनों की दीवार ही खडी कर दी है। इसके दोस्ते अमर सिंह ने तो अंगूठे तक में रिंग पहनने का रिवाज शुरू कर दिया है। मैंने कई मोटे और ठिगने लोगों को अंगूठे में रिंग पहने देखा है। पतले लोगों पर तो यह फबती भी नहीं है।

खैर,
ज्योतिषी द्वारा सुझाए गए इन पत्थरों को लोग सालों तक पहने रहते हैं। इस बीच कई दशाएं आती और जाती रहती है, अन्य‍ उपचार भी किए जाते हैं लेकिन अंगुठियां अंगुलियों (finger’s) में ही बनी रहती है। ये लोग कभी-कभार इन्हें खोलने की हिम्मत भी करते हैं तो थोडी-बहुत परेशानी आने के बाद फिर से अंगूठी पहनकर बैठ जाते हैं। लम्बे अर्से तक ये अंगुठियां इन लोगों के लिए स्थाई भाव का काम करती है।

दूसरे प्रकार के उपचार हैं मध्यम अवधि उपचार: ये उपचार आमतौर पर मंदिर (temple) में फेरियां निकालने, नियमित दान करने और व्रत-उपवास प्रकार के होते हैं। समस्या से गुजर रहे जातक को ये उपचार बताए जाते हैं। इस कारण crisis के खत्म होने तक ही ये जारी रहते हैं। बाद में धीरे-धीरे मंद होते हुए आखिर में बन्द हो जाते हैं।
तीसरे प्रकार के होते हैं लघु अवधि उपचार: ये अधिकांशत: तांत्रिक उपचार होते हैं। किसी particular task के लिए ये उपचार शुरू किए जाते हैं और काम होने के साथ ही ये उपचार बंद कर दिए जाते हैं। ये one shoot तरीके से काम करते हैं। एक बार इस्तेमाल में लिए जाने के बाद किसी तरह जातक के दोबारा काम में नहीं आते। कुछ सयाने जातक एक बार सफलता से प्रयोग में आ चुके उपचार को अपने स्तर पर ही दोबारा प्रयोग करते हैं और परिणाम नहीं आने पर दोष ज्योतिषी को देते हैं। उपचार करने पर भले ही अपेक्षित परिणाम हासिल न हो लेकिन परिवर्तन तो होता ही है इसलिए ऐसे जातक जल्द ही पकड में भी आ जाते हैं।

इस सबके बावजूद मुझे कृष्णामूर्ति का कथन हमेशा याद रहता है जिसमें उन्होंने कहा है कि

‘destiny can’t be faked’

इसके बावजूद मेरा मानना है कि भले ही भाग्य को धोखा नहीं दिया जा सकता हो लेकिन जिंदगी को और जिन्दादिली से जिया जा सकता है। आज शायद कृष्णामूर्ति भी होते तो कहते
हां...

7 Apr, 2008

अन्‍य विधाओं के साथ ज्‍यो‍तिष

हर विषय के मूल में दर्शन होता है। चाहे वह गणित, विज्ञान हो या फिर इतिहास और राजनीति। ज्‍योतिष का भी अपना दर्शन होता है। आइंस्‍टीन से थ्‍योरी ऑफ रिलेटिविटी निकालने के बाद अपने जीवन के अंतिम वर्षों में यूनिफाइड थ्‍योरी निकालने की कोशिश भी की। कुछ लोगों का मानना है कि वे इस थ्‍योरी के काफी करीब तक पहुंच भी गए थे। यानि वे ऐसे सिद्धांत ढूंढ निकालना चाह रहे थे जिससे की ब्रह्माण्‍ड के सभी नियम संचालित होते हों। मेरा मानना है कि ऐसा सिद्धांत निकाला जा सकता है। ज्‍योतिष के अध्‍ययन के साथ मैंने इसे कई अन्‍य विधाओं के साथ जोडने का‍ प्रयास किया है। आयुर्वेद में तो बहुत से स्‍थानों पर ज्‍योतिष का सहारा लिया जाता रहा है। बीकानेर में कई पुराने वैद्यों के पास ऐसे हस्‍तलिखित पोथे पडे भी हैं लेकिन वे इन्‍हें निकालकर देना नहीं चाहते। एक-दो किताबों में मैंने देखा कि आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में रत्‍नों का इस्‍तेमाल बताया गया है। हडप्‍पा सभ्‍यता में भी गोमेद रत्‍न बहुतायत से पाए गए हैं। निश्‍चय ही ज्‍योतिष के नजरिए से न सही लेकिन रत्‍नों का इस्‍तेमाल होता था। वर्तमान में राहू की दशा खराब होने पर गोमेद का इस्‍तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार पन्‍ना और मूंगा भी इस्‍तेमाल होते रहे हैं। आयुर्वेद से बाहर आएं और होम्‍योपैथी में चलें तो वहां मैंने इस विषय की अपेक्षाकृत नई शाखा बैच फ्लावर थैरेपी के बारे में पढा। इसमें फूलों की सुगंध से ही अधिकांश बीमारियों का ईलाज कर दिया गया है। दवा में किसी पदार्थ की वास्‍तविक उपस्थित नगण्‍य ही होती है। इसे पढकर लगा कि बैच फ्लावर थैरेपी को ज्‍योतिष से जोडा जा सकता है। इन दिनों एक होम्‍योपैथिक चिकित्‍सक से पूछ रहा हूं कि वे मेरी कितनी सहायता कर सकते हैं। उनका सहयोग मिला तो शीघ्र ही इस ब्‍लॉग पर होम्‍यापैथी में ज्‍योतिष के उपचार विषय पर लेख मिल सकेगा। वैसे एलोपैथी और ज्‍योतिष पर तो पहले भी काफी लिखा जा चुका है। इनमें अधिकांश में रोग होने की संभावना और दुरुस्‍त होने के समय के संबंध में है। इस पर भी चर्चा करूंगा।