पता नहीं कितनी जिंदगियां बदल गई

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

पिछले दिनों सूर्यग्रहण हुआ। कहीं अधिक तो कहीं कम दिखाई दिया। बीकानेर ग्रहण पथ से सुदूर उत्‍तर में था, सो यहां खण्‍डग्रास सूर्य ग्रहण हुआ। यानि केवल तीस प्रतिशत ग्रहण ही दिखाई दिया। यह ग्रहण दिन के साढ़े ग्‍यारह बजे से शाम पौने चार बजे तक था। यानि दिन के सबसे एक्टिव समय में। क्‍या होना चाहिए था। यही कि दुकानें बंद, दफ्तरों से कर्मचारियों की छुट्टी और लोग घरों में बंद। बीकानेर एक छोटा और परम्‍परागत मूल्‍यों को मानने वाले लोगों का शहर है। बहुत से लोगों ने कुछ ऐसे ही प्रतिक्रिया की, लेकिन सबने नहीं। सबके लिए यह संभव भी नहीं था। अधिकांश ऑफिसर ग्रेड के लोगों को समय पर ऑफिस पहुंचना पड़ा। पंचायतराज चुनाव के कारण बहुत से लोगों को ग्रहण काल में भी ड्यूटी के लिए बाहर निकलना पड़ा।

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क्‍या फर्क पड़ा, कितने लोग पागल हुए, कितनों को व्‍यवसाय में नुकसान उठाना पड़ा, पता नहीं लेकिन कोई बड़ी सूचना हमें तो नहीं मिली। मुझे विश्‍वास है कि आगे भी नहीं मिलेगी। हां, इतना जरूर हुआ कि जिन लोगों ने दुकानें खुली रखी उन्‍होंने जमकर बिक्री की। क्‍योंकि कई बड़ी और स्‍थापित दुकानें बंद थी और लोगों को जरूरत का सामान चाहिए था। कई बार सामान्‍य सी खगोलीय घटना को इस तरह पेश किया जाता है मानो इस घटना के बाद पूरी दुनिया में भारी उथल-पुथल होगी। हर राशि के जातक के साथ कुछ विशेष होने वाला है। पांचांग में भी सूर्य और चंद्र गहण जैसी खगोलीय घटना के बारे में जानकारी दी गई होती है। समय और तिथि इतने अधिक सटीकता के साथ दिए गए हैं कि लगता है कि ज्‍योतिषीय गणना करने वालों ने इतना जान लिया है तो और भी कुछ बता सकते होंगे। अब यह अलग बात है कि गणना करने वाले कई पांचांगकर्ताओं को यह भी पता नहीं कि वे जो जोड़ बाकी गुणा भाग कर रहे हैं तो किस करेक्‍शन को ध्‍यान में रखकर कर रहे हैं और गणना के दौरान आए आंकड़े ग्रह की गति को किस प्रकार इंगित कर रहे हैं।

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और इंटरनेट ने लोगों को इतना अधिक परोसा कि लोग न चाहते हुए भी भरोसा करने लगे। अब ग्रहण की घटना को कई दिन बीत चुके हैं। पाठकों में से अवश्‍य कई लोगों ने ग्रहण से राशि पर होने वाले प्रभावों के बारे में पढ़ा होगा। मेरा उनसे आग्रह है कि वे मुझे भी बताएं कि ग्रहण के दिन और उसके बाद उनकी जिंदगी में क्‍या और कितना परिवर्तन हुआ।

--- क्‍या संघर्ष कम या बेशी हो गया, कितनी शत्रु बढ़े या कम हो गए, कितने लोगों के लॉटरी लगी, कितने लोगों को अब दफ्तर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, कितने लोगों के बॉस का व्‍यवहार बदला है, कितने लोगों की पत्‍नी ग्रहण के बाद से मीठा बोलने लगी है, कितने युवकों को मनचाही नौकरी मिल गई, कितने लोगों को खोया प्‍यार मिल गया... सवाल अनंत हैं और जवाब मुझे पता कि सब कहेंगे कुछ भी तो नहीं बदला। फिर ग्रहण पर इतना जोर क्‍यों... 

ग्रहण पर हावी मजबूरी

एक बार पहले बीकानेर में पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई दिया था। उस समय भी पूर्ण नहीं बल्कि 99 प्रतिशत अंश ही ढका हुआ दिखाई दे रहा था। इस बार जहां वलयाकार सूर्यग्रहण था वहीं उस दौरान सिग्‍नेट रिंग दिखाई दी थी। उस ग्रहण के दौरान मैं और मेरे तीन भाई छत पर जब सूर्य के सामने शीशा रखकर और उस पर कागज का गोला लगाकर दीवार पर ग्रहण की अवस्‍थाएं देख रहे थे, तब हमारे घर की ऊंची छत से हमने देखा कि किसी भी छत पर कोई आदमी दिखाई नहीं दिया। इस बार भी ग्रहण के दिन मैं बाहर घूम रहा था। अंतर यह था कि ग्रहण काल दिन के सक्रिय समय में था तो लोगों को मजबूरी में बाहर निकलते देख रहा था।

धारणाओं को भी कैसे खारिज कर दूं

अब मैं बात करूंगा परम्‍परागत धारणाओं की। मैं उन्‍हें बिना किसी ठोस कारण के निरस्‍त नहीं कर सकता। पक्षी अपना स्‍वाभाविक रास्‍ता छोड़ घरों की ओर दौड़ने लगते हैं। वातावरण में कुछ अतिरिक्‍त ठण्‍ड आ जाती है और पशुओं का व्‍यवहार भी अजीब सा डरा हुआ दिखाई देने लगता है। ऐसे में कुछ तो परिवर्तन होते ही होंगे। मैं इसे ऐसे समझता हूं कि सूर्य के चारों ओर पृथ्‍वी की स्‍वाभाविक गति और दिन-रात के सामान्‍य चक्र के बीच यह एक अजीब घटना होती है। इस दौरान वातावरण में क्‍या और कितने परिवर्तन होते हैं या हो सकते हैं उनकी गणना करना संभव नहीं है। पुराने समय में लोगों ने अनुभवों के आधार पर कुछ नियम बनाए होंगे। चूंकि लिखने या कारणों को अंकित करने का कोई साधन नहीं था, और हो सकता है कि ऋषियों की शृंखला में ऐसे लोग भी आए हों जो कारणों को यथा स्‍वरूप समझते न हों। ऋषि की बात ऋषि समझ भी जाए तो यह जरूरी नहीं कि आम आदमी को भी वही बात समझ में आ जाए। ऐसे में आम आदमी के लिए तय नियम बना दिए गए। उन्‍हें फॉलो करोगे तो सुखी रहोगे।

दिन तो ठीक है लेकिन भविष्‍य...

यहां तक की बात पूरी तरह समझ में आ जाती है कि एक दिन में हो रहा परिवर्तन उस दिन हमें सावधान रहने के लिए आगाह करता है लेकिन भविष्‍य में इससे कुछ परिवर्तन हों। यह बात कुछ कम पचती है। क्‍योंकि ग्रहण कब होगा और कहां कितना क्षेत्र प्रभावित होगा इसकी गणना सौ साल की आज ही की जा सकती है। ऐसे में ग्रहण का राशियों पर प्रभाव भी होता तो उसे सौ साल पहले ही बता दिया जाता। यहां ऐसा नहीं है। मेरा मत है कि ग्रहण का किसी व्‍यक्ति के दिन पर तो प्रभाव हो सकता है लेकिन भविष्‍य पर नहीं। क्‍योंकि अस्‍थाई घटना अस्‍थाई प्रभाव ही पैदा कर सकती है। यह मेरा कॉमन सेंस कहता है...

...और अगर कुछ परिवर्तन आपको दिखा है तो मुझे बताइएगा

... आपके दृष्टिकोण का इंतजार रहेगा।

वर्ष 2010 का फलादेश सभी राशियों के लिए...

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

ऐसा पहली बार हो रहा है कि मैं अपने ही ब्‍लॉग पर वह लिख रहा हूं जो मैं कभी लिखना नहीं चाहता। फिर भी मेरी मजबूरी है कि अब लिखना ही पड़ेगा। इसके मूल में भी वही कंसेप्‍ट है कि विपरीत हैडिंग से ही सही शायद आपके दिमाग से ज्‍योतिष से जुड़ी ऊटपटांग धारणा को निकाल सकूं।

मैं पहले एक बार बारह राशियों का सच लिख चुका हूं। तो लगता है एक बार फिर उस बात को दोहराने की आवश्‍यकता नहीं है लेकिन याद करने की बात है कि आज के दिन में एक सूत्र छिपा है। जो लोग भारतीय ज्‍योतिष को गालियां निकालते हैं उनके लिए भी कि गौर कीजिए तकरीबन हर मीडिया में पहली जनवरी को फलादेशों की बाढ़ आने वाली है। ऐसा होगा आपका साल, वैसा होगा आपका साल, ये रत्‍न पहने, वह रंग काम में लें वगैरह वगैरह, एक साथ छह अरब लोगों के लिए यह साल नया साल बनकर आया है। अंग्रेजी कलेण्‍डर से। भारतीय कलेण्‍डर से तो अभी तीन महीने और लग जाएंगे, लेकिन फर्क तब भी नहीं पड़ेगा। छह अरब लोगों में आज की रात और अगले साल की सुबह भी कुछ लोग गाजा पट्टी के उस आतंक के बीच होंगे, पाकिस्‍तान में सैन्‍य ठिकानों पर आतंकवादियों का प्रशिक्षण जारी रहेगा, सिंहली तमिलों से और तमिल सिंहलियों से घृणा करते रहेंगे, पुल टूटते रहेंगे, नए बनते रहेंगे, पर्वतारोही चढ़ते रहेंगे। अन्‍य भौतिक घटनाओं की तरह साल का बदल जाना भी उतनी ही सामान्‍य घटना है जितना कि सूर्योदय और सूर्यास्‍त। कुछ लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार समय को बांटने के खूंटे बनाए और अब ये जिंदगी को निर्धारित करने वाले कारक बनते जा रहे हैं।

न कर्म रेखाएं बदलेंगी न धर्म रेखाएं बस इंतजार है भाग्‍य रेखा के बदलने का... यकीन कीजिए नए साल के इंतजार से पहले भी इसे बदला जा सकता था... और जब नया साल आ ही गया है तो अब भी बदल डालिए... हो सकता है जिसे असंभव समझ रहे हों वह इतना आसान हो कि कोशिश करते ही तकदीर का पत्‍थर पलट जाए...

फिर भी आज मेरा मन है कि एक फलादेश करूं

सभी राशियों के लिए कि

अगला साल ऐसा बीते कि अपने लेखों में इतना प्रभाव ले आउं कि आप लोगों के दिमाग से ज्‍योतिष को लेकर बनी कुछ और ग्रंथियों को निकाल जाए... यह फलादेश से अधिक कामना है, गणेशजी का आशीर्वाद रहा तो इसमें कामयाब भी हो जाउंगा।

अब अगला लेख नास्‍त्रेदमस की भविष्‍यवाणी में कितना दम विषय पर होगा...

ज्‍योतिष के लेखों में रुचि रखने वाले