यह समझ का खेल है

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

ज्‍योतिष में मैंने निजी तौर पर अनुभव किया है कि कई बार ज्‍योतिषी गलत होता है तो कई बार जातक भी समझने में चूक कर जाता है। अधिकांशत: ऐसा होता है कि जातक वही सुनना चाहता है जो वह सोचकर आया है। ज्‍योतिषी तो उसके लिए महज एक बहाना होता है। उसकी हां में अगर ज्‍योतिषी दस प्रतिशत हां करता है तो वह उसे सौ प्रतिशत हां मानकर चलता है और ना में कर दे तो पांच प्रतिशत ना स्‍वीकार करता है।

शेयर बाजार की नब्‍ज
इस बात की कोई सीमा अब तक तय नहीं की गई है कि कौनसे विषयों पर ज्‍योतिषी अधिकारपूर्वक उत्‍तर दे सकता है और कौनसे विषयों पर तथ्‍यात्‍मक रूप से सही नहीं बताया जा सकता। इसके लिए मैं उदाहरण लेना चाहूंगा शेयर बाजार की भविष्‍यवाणी के। पूर्व में कई ज्‍योतिषी शेयर बाजार की भविष्‍यवाणियां करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे, लेकिन कुछ लोग ही होते हैं जो बाजार की नब्‍ज के बहुत करीब पहुंच पाते हैं, वह भी कुछ समय के लिए बाद में वह नब्‍ज भी उनसे कहीं गुम हो जाती है। मेरा मानना है कि इसमें बड़ा दोष होता है बाजार को देखने के नजरिए का।

कैसे पैदा होती है समस्‍या
इसे ऐसे समझिए कि शेयर बाजार एक ऐसी टर्म है जिसमें काफी चीजें एक साथ समाई हुई हैं। ऐसे में किसी एक ग्रह या किसी एक भाव का तो इस पर असर देखा नहीं जा सकता। अब किसी एक व्‍यक्ति का भाग्‍य भी इससे जुड़ा नहीं हो सकता। इसके अलावा किसी एक कंपनी या किसी कंपनी समूह के बारे में बात करें तो भी बेमानी हो जाएगी, क्‍योंकि पहली तीस कंपनियों में इस पांच साल में जो कंपनियां शामिल रहेंगी, जरूरी नहीं है कि अगले पांच साल में भी वही रहें। पल-पल अपनी स्थिति बदल रहे शेयर बाजार की गणना किस आधार पर की जाएगी। यह शोध का विषय है...

बात यहीं खत्‍म नहीं हो जाती
बात यहीं खत्‍म नहीं हो जाती। अब ज्‍योतिषी कहता है कि बाजार अच्‍छा रहेगा। इसका मतलब मोटे तौर पर यह निकाला जा सकता है कि बाजार में तेजी रहेगी। नहीं, ऐसा कदापि नहीं है। बाजार अच्‍छा रहेगा इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि शेयर बाजार का स्‍वास्‍थ्‍य ठीक रहेगा। इसके लिए कंपनियों के निवेश, घोटालों का पकड़ा जाना और संस्‍थागत तेजडि़यों और मंदडि़यों का दूर होना भी शामिल हैं। आमतौर पर ऐसी गतिविधियों से बाजार नीचे आ गिरता है। भले ही फौरी तौर पर यह नुकसान की स्थिति दिखाई दे लेकिन दीर्धकाल के पैमाने पर देखें तो यह बाजार के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए अच्‍छी घटनाएं हैं। तो वह ज्‍योतिषी कहां गलत हुआ जो कह रहा है कि बाजार की स्थिति अभी ठीक है। नियमित रूप से बाजार का उठाव और उसके करेक्‍शन के लिए गिरावट सामान्‍य बातें हैं। पर बाजार में हमेशा ऐसा ही नहीं होता है। इसके उलट कई बाते हैं जिन्‍हें परखने की कोशिश की जा सकती है।

तो सही विश्‍लेषण कैसे हो सकता है
इसके लिए कोई तय फार्मूला मुझे तो दिखाई नहीं देता। कभी बाजार गुप्‍त क्रियाओं में लगा हो और अपनी स्थिति मजबूत कर रहा हो तो उसे भी मैं तो अच्‍छी स्थिति कहूंगा, लेकिन बाजार में पैसा फेंक रहे निवेशक को यह बात नहीं जमेगी। इसलिए सबसे सुरक्षित तरीका तो यही है कि जातक की व्‍यक्तिगत कुण्‍डली का विश्‍लेषण करके ही पता लगाया जाए कि उसे फायदा होगा कि नहीं। बाजार की नब्‍ज पहचानने के लिए कोई फार्मूला बनाने के लिए तो एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों ज्‍योतिषियों के समूह को बैठकर लम्‍बे समय तक विश्‍लेषण करना पड़ेगा। तभी कोई ऐसा नियम निकल पाएगा जो बता सके कि आज बाजार कैसा रहेगा।

नास्‍त्रेदमस का प्‍वाइंट

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

नास्‍त्रेदमस 2012 में बताया गया है कि हाल ही में नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक के कुछ दुर्लभ पन्‍ने हाथ लगे हैं। इन सात पन्‍नों में नास्‍त्रेदमस ने सृष्टि के अंत के बारे में स्‍पष्‍ट किया है। इसका मूल बनाया गया है एक खगोलीय घटना को। पहले इसी खगोलीय घटना को समझने का प्रयास करते हैं। इसके अनुसार सूर्य आकाशगंगा के चारों ओर एक निश्चित रफ्तार से चक्‍कर लगा रहा है। सूर्य की इस गति का परिणाम यह होता है कि कई हजार साल बाद सूर्य इस स्थिति में आ जाता है कि पृथ्‍वी से देखने पर सूर्य के पीछे आकाशगंगा एक रोशनी की रेखा के रूप में आ जाती है। बस यही वह समय होता है जब पृथ्‍वी पर बड़े उत्‍पात होंगे। यह  समय तय किया गया है 23 दिसम्‍बर 2012 का। नास्‍त्रेदमस के चित्रों और बुक ऑफ लाइफ को इस तथ्‍य से जोड़ा गया है। इससे दो तरह के निष्‍कर्ष निकाले गए। एक तो यह कि इसी दौरान जलजला आएगा और पृथ्‍वी खत्‍म या यह कि अंत की शुरूआत हो जाएगी। पृथ्‍वी के इतिहास में आइस ऐज में पहले एक बार यह स्थिति बन चुकी है। उसी को भविष्‍य की घटनाओं का कथन करने का आधार बनाया गया है।

इसमें बताया गया है कि पिछले सवा सौ सालों में मानवजाति ने जितने आपदाएं झेली हैं उतनी तो पहले की किसी भी सभ्‍यता ने नहीं झेली। प्राकृतिक आपदाओं के अलावा महामारियां, प्रदूषण, आतंकवाद, गृह युद्ध, जातिगत लड़ाइयां, बदलते मौसम चक्र, बढ़ती बेरोजगारी और असंतुष्‍टता, विश्‍व युद्ध, खत्‍म होता तेल, वैश्विक मंदियां, परमाणु हमलों की आशंका जैसे बिंदू संकेत करते हैं कि अब अंत निकट है। नास्‍त्रेदमस ने नई किताब में सात चित्रों की शृंखला है। इसमें पहले चित्र में सूर्य और शेर को साथ दिखाया गया है। इससे वैज्ञानिकों ने निष्‍कर्ष निकाला है कि सूर्य तब सिंह राशि में होगा और हमारा सौरमण्‍डल आकाशगंगा के ऐसे कोण पर होगा जब पूरी आकाशगंगा की ऊर्जा सूर्य की ओर केन्द्रित हो जाएगी। यही बदलाव का कारण बनेगा। इसका आधार यह लिया गया है कि पृथ्‍वी की साढ़े 66 डिग्री के झुकाव के साथ घूर्णन गति के चलते सभी आकाशीय पिण्‍ड एक निश्चित क्रम में चलते हुए दिखाई देते हैं। हर छब्‍बीस हजार साल बाद पृथ्‍वी वापस उसी कोण पर पहुंच जाती है जहां से सूर्य आकाशगंगा के बीचों-बीच दिखाई देने लगता है।

बहुत पहले एक जर्मन वैज्ञानिक ने हर ग्‍यारह साल बाद सूर्य में होने वाले बड़े विस्‍फोटों और उससे दुनिया पर होने वाले प्रभावों के बारे में बताया था। तब उस  वैज्ञानिक को चुप करा दिया गया था। अब लगभग उसी सिद्धांत से मेल खाता एक नया सिद्धांत तैयार है कि एक समय ऐसा आता है जब मिल्‍की वे 'हमारी आकाशगंगा' जो एक तश्‍तरी की तरह है के बीचों-बीच सूर्य आ जाता है। यहां बीचों-बीच से मतलब आकाशगंगा के कोर से नहीं बल्कि पृथ्‍वी से दिखाई देने वाली अवस्‍था से है। जब सूर्य ऐसे कोण में आएगा तो पृथ्‍वी पर बहुत बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होंगे।

नास्‍त्रेदमस पर किताबें लिख रहे लेखक ही यह पूछते हैं कि क्‍या ये सब संयोग है या किसी अनहोनी का संकेत। वे मानते हैं कि मिश्र सभ्‍यता, प्राचीन कैथोलिक चर्च, दक्षिण अमरीका के होपी और माया सभ्‍यता में भी पृथ्‍वी या सृष्टि के खत्‍म होने का एक समय निश्चिता किया गया है। लेखकों ने उन सभ्‍यताओं की विभिन्‍न प्रणालियों से मिल रहे संकेतों को भी नास्‍त्रेदमस के संकेतों के साथ मिलाया है और सिद्ध किया है कि शीघ्र ही पृथ्‍वी का अंत होने वाला है।

इसी क्रम में पहले मैं भी एक सवाल खड़ा कर चुका हूं कि क्‍या मौसम चक्र में हो रहा परिवर्तन, मण्‍डेन में हो रहे बड़े परिवर्तनों का सूचक नहीं है।  यह परिवर्तन हमें किस ओर लेकर जाता है। मुझे तो यह व्‍यवस्‍था में परिवर्तन का विरोध मात्र लगता है। प्राकृतिक आपदाएं कब नहीं थी, लेकिन मौसम चक्र में परिवर्तन पहले कभी नहीं रहा होगा। अब चूंकि यह शताब्दियों में घटने वाली घटना है तो इसका सही सही अनुमान नहीं किया जा सकता।

इन सबके बावजूद होपी, माया, मिश्र सहित कई सभ्‍यताओं में दुनिया के खत्‍म होने का समय निकाला गया है और यह 2012 में आना वाला है।  खास बात यह है कि हर सभ्‍यता ने दुनिया के खत्‍म होने का समय तय किया है। पर भारतीय सभ्‍यता में ऐसा नहीं है। ठीक है उस प्‍वाइंट पर बाद में विचार करेंगे लेकिन यहां संकेत देना जरूरी है कि प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में इस संबंध में बहुत सी बातें बहुत स्‍पष्‍ट तरीके से बताई गई हैं। उन पर बात बाद में...

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