हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष 22 मार्च 2012 को रात 7.10 बजे विक्रम संवत् 2069 का प्रारंभ कन्या लग्न में होगा। इस वर्ष विश्वावसु नाम का संवत्सर रहेगा, जिसका स्वामी राहु है। विक्रमादित्य के समय इस कलेण्डर की शुरूआत हुई थी। इस कारण इसे विक्रम संवत कहा जाता है। यही भारतीय पंचांग और काल निर्धारण का आधार भी है। ऐसा माना जाता है कि यह सृष्टि रचना का पहला दिन है। आज से एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी। इसी तरह नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में राज्य स्थापित करने के लिए यही दिन चुना। महाभारत के अनुसार 5111 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
पश्चिमी कलेण्डर गणना पद्धति जहां सौर गणना पर आधारित है वहीं भारतीय गणना पद्धति मास यानी महीने की गणना चंद्रमा और वर्ष की गणना सूर्य के आधार पर करती है। इसके लिए ऋग्वेद में एक सूत्र है
‘वेदमासो घृतव्रतो द्वादश प्रजावत:। वेदा य उपजायते।’
इसका अर्थ है घृतव्रत अर्थात वरुण बारह महीनों और उनमें उत्पन होने वाले प्राणियों अर्थात अधिक मास को जानता है। यहां अधिक मास स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन इस वाक्य में अधिक मास निहित है। इसी ऋचा में स्पष्ट किया गया है कि सामान्य तौर पर वर्ष में बारह महीने होते हैं। चंद्रमा को गणना का आधार बनाने का एक कारण यह स्पष्ट होता है कि रात के समय नक्षत्रों से होकर तेज गति से गुजरता चंद्रमा दिखाई देता था, जबकि दिन में सूर्य की रोशनी में नक्षत्रों को देखने का तब कोई साधन नहीं रहा होगा। ऐसे में मास की गणना चंद्रमा के आधार पर की गई। इसके बहुत बाद में सौरमास का प्रचलन शुरू हुआ होगा।
संवत्सर के रूप को बताने वाली ऋचाएं वेदों में मिलती हैं।
‘द्वादश प्रघयश्चक्रमेकं त्रीणी नभ्यानि क उ तच्चिकेत।
तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शंकवोSर्पिता: षष्टिर्न चलाचलास:।।’
इसका अर्थ है कि संवत्सर रूप एक चक्र है। बारह मास ही उसके बारह अरे हैं और 360 दिन उसके 360 कांटे हैं। रात और दिन जुड़े हुए हैं। इसी तरह मास के नाम भी स्पष्ट किए गए हैं। इनके नाम हैं मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभस्, नभस्य, इष, ऊर्ज, सहस्, सहस्य, तपस् तथा तपस्य । मधु और माधव महीने वसंत ऋतु के, शुक्र और शुचि महीने ग्रीष्म ऋतु के, नभस और नभस्य महीने वर्षा ऋतु के, इष और ऊर्ज महीने शरद ऋतु के, सहस और सहस्य महीने हेमंत ऋतु के तथा तपस और तपस्य महीने शिशिर ऋतु के हैं। इस तरह छह ऋतुओं का एक संवत्सर होता है।
वर्ष के दौरान ग्रहों की स्थिति
विक्रम संवत् 2069 में शनि अधिकांश समय तुला राशि में ही व्यतीत करेगा। यह शनि की उच्च राशि है। हालांकि 16 मई को ही यह वक्र गति से घूमता हुआ कुछ समय के लिए कन्या राशि में लौटेगा। यहां शनि का ठहराव 4 अगस्त तक रहेगा और फिर से तुला राशि में लौट आएगा और पूरे संवत्सर वहीं रहेगा। वृहस्पति साल के शुरूआत में जहां मेष राशि में होगा वहीं 17 मई को यह अपनी राशि बदलकर वृष में चला जाएगा। मेष जहां मंगल के अधिकार की राशि है वहीं वृष शुक्र के अधिकार वाली राशि है। संवत्सर समाप्त होने तक गुरु इसी राशि में बना रहेगा। नववर्ष प्रवेश के समय राहू वृश्चिक और केतू वृष राशि में होंगे। हमेशा वक्री चलने वाले ये छाया ग्रह 6 दिसम्बर को राशि बदलेंगे। राहू तुला और केतू मेष राशि में आ जाएंगे। बड़े ग्रहों का राशि परिवर्तन संकेत देता है कि मई के बाद देश, समाज, व्यापार एवं अन्य क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन दिखाई देंगे। सितम्बर में राजनीति में बड़ी उथल-पुथल के संकेत हैं।
राशियों पर प्रभाव
मेष : मेष राशि के जातकों के लिए इस वर्ष स्थायीत्व में कमी आ सकती है लेकिन अप्रेल और मई जहां शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अपेक्षाकृत उत्तम हैं वहीं साल के अंत तक वित्तीय स्थिति में सुधार होने की गुंजाइश है।
वृष :वृष राशि के जातकों के लिए हालांकि वर्ष की शुरूआत इतनी अच्छी नहीं है, लेकिन मई से 4 अगस्त तक स्थितियां फिर से कुछ बेहतर होंगी। वर्ष के अंत में चिंताएं बढ़ सकती हैं।
मिथुन: वर्ष की शुरूआत मिथुन राशि के जातकों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर है। जून के बाद बाहरी संबंधों से भी लाभ मिल सकता है। बीमारियों का निदान अथवा समाधान दिसम्बर के बाद पुख्ता होने की संभावना है। स्वास्थ्य का ध्यान रखे जाने की जरूरत है।
कर्क: इस वर्ष आय के स्रोत अपेक्षाकृत कम लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं। कर्क राशि के जातकों के परिवार में मांगलिक कार्य होंगे। वर्ष के अंत तक छोटी के योग बन रहे हैं।
सिंह : सिंह राशि वाले जातकों के लिए स्थावर संपत्तियां बनाने के लिए यह वर्ष उपयोगी सिद्ध हो सकता है। वर्ष की शुरूआत छोटी यात्राओं के साथ हो सकती है, लेकिन साल के अंत तक यात्राओं का दौर कम होगा।
कन्या : साल के अंत तक कई अटके हुए काम निकलने शुरू होंगे। कन्या राशि के जातकों को दिसम्बर में केतू के राशि परिवर्तन के बाद परिस्थितियों में अपेक्षाकृत तेज सुधार दिखाई देगा।
तुला: शनि के तुला राशि में प्रवेश के साथ ही समय में अपेक्षाकृत सुधार दिखाई देना शुरू हो चुका होगा। मई से अगस्त के बीच का समय कुछ कठिन होगा, लेकिन इसके बाद फिर से काम बनने शुरू हो जाएंगे।
वृश्चिक: रोगों के प्रति सावधान रहें। वृश्चिक राशि के जातकों के दिमाग में एक के बाद दूसरा फितूर हावी रह सकता है। भैरव उपासना से लाभ होगा। जीवन साथी के प्रति संबंधों को गंभीरता से लें।
धनु: लाभ के कई अवसर बनेंगे। धनु राशि वाले जातक उन्हें भुनाने का प्रयास करें। साल की शुरूआत की तुलना में साल के आखिरी महीने अधिक लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। उत्पादन से जुड़े लोग अधिक लाभ में रहेंगे।
मकर: कार्यक्षेत्र में प्रगति के अवसर मिलेंगे। मकर राशि के जातकों के पिता एवं बॉस के साथ संबंध सुधरेंगे। कार्य अथवा व्यापार में साख एवं प्रसिद्धि में बढ़ोतरी होने की गुंजाइश है।
कुंभ: कुंभ राशि के जातकों के लिए मांगलिक कार्यों अथवा आमोद-प्रमोद के लिए यात्राओं का सिलसिला चल सकता है। इस साल नए कार्य शुरू करने पर भाग्य भी साथ देगा। माता के स्वास्थ्य के प्रति गंभीर रहें।
मीन : अब तक आई जड़ता इस साल खत्म हो सकती है। मीन राशि के जातकों के लिए कुछ यात्राएं करना लाभदायक सिद्ध होगा। कुछ आकस्मिक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं।
ऐसे मनाते हैं नववर्ष
नववर्ष की पूर्व संध्या पर दीप दान किया जाता है। घरों में शाम 7 बजे घंटा घडियाल व शंख बजा कर मंगल ध्वनि से नए साल का स्वागत किया जाएगा। इसके साथ ही शुरू होगा बधाई पत्रों, ई-मेल व एसएमएस के जरिए शुभकामनाएं भेजने का सिलसिला। नववर्ष के पहले दिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य देव को प्रणाम किया जाएगा और इसके बाद हवन करें तथा नए साल के लिए संकल्प लिया जाएगा। इसी दिन नवरात्रा घट स्थापना भी होगी। नवरात्रा के नौ दिन तक साधक देवी का ध्यान कर मंत्रों को सिद्ध करेंगे। इससे जीवन में श्रेष्ठ साधनों और अध्यात्म में नए सोपान प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। शास्त्रों में देवी को शक्ति का रूप माना गया है। जो साधक जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं वे नवरात्रा के नौ दिन उपवास कर देवी का ध्यान करें, इससे कई तरह की समस्याओं का समाधान होगा और विकास की गति तेज होगी।
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