नास्‍त्रेदमस का प्‍वाइंट

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

नास्‍त्रेदमस 2012 में बताया गया है कि हाल ही में नास्‍त्रेदमस की पुस्‍तक के कुछ दुर्लभ पन्‍ने हाथ लगे हैं। इन सात पन्‍नों में नास्‍त्रेदमस ने सृष्टि के अंत के बारे में स्‍पष्‍ट किया है। इसका मूल बनाया गया है एक खगोलीय घटना को। पहले इसी खगोलीय घटना को समझने का प्रयास करते हैं। इसके अनुसार सूर्य आकाशगंगा के चारों ओर एक निश्चित रफ्तार से चक्‍कर लगा रहा है। सूर्य की इस गति का परिणाम यह होता है कि कई हजार साल बाद सूर्य इस स्थिति में आ जाता है कि पृथ्‍वी से देखने पर सूर्य के पीछे आकाशगंगा एक रोशनी की रेखा के रूप में आ जाती है। बस यही वह समय होता है जब पृथ्‍वी पर बड़े उत्‍पात होंगे। यह  समय तय किया गया है 23 दिसम्‍बर 2012 का। नास्‍त्रेदमस के चित्रों और बुक ऑफ लाइफ को इस तथ्‍य से जोड़ा गया है। इससे दो तरह के निष्‍कर्ष निकाले गए। एक तो यह कि इसी दौरान जलजला आएगा और पृथ्‍वी खत्‍म या यह कि अंत की शुरूआत हो जाएगी। पृथ्‍वी के इतिहास में आइस ऐज में पहले एक बार यह स्थिति बन चुकी है। उसी को भविष्‍य की घटनाओं का कथन करने का आधार बनाया गया है।

इसमें बताया गया है कि पिछले सवा सौ सालों में मानवजाति ने जितने आपदाएं झेली हैं उतनी तो पहले की किसी भी सभ्‍यता ने नहीं झेली। प्राकृतिक आपदाओं के अलावा महामारियां, प्रदूषण, आतंकवाद, गृह युद्ध, जातिगत लड़ाइयां, बदलते मौसम चक्र, बढ़ती बेरोजगारी और असंतुष्‍टता, विश्‍व युद्ध, खत्‍म होता तेल, वैश्विक मंदियां, परमाणु हमलों की आशंका जैसे बिंदू संकेत करते हैं कि अब अंत निकट है। नास्‍त्रेदमस ने नई किताब में सात चित्रों की शृंखला है। इसमें पहले चित्र में सूर्य और शेर को साथ दिखाया गया है। इससे वैज्ञानिकों ने निष्‍कर्ष निकाला है कि सूर्य तब सिंह राशि में होगा और हमारा सौरमण्‍डल आकाशगंगा के ऐसे कोण पर होगा जब पूरी आकाशगंगा की ऊर्जा सूर्य की ओर केन्द्रित हो जाएगी। यही बदलाव का कारण बनेगा। इसका आधार यह लिया गया है कि पृथ्‍वी की साढ़े 66 डिग्री के झुकाव के साथ घूर्णन गति के चलते सभी आकाशीय पिण्‍ड एक निश्चित क्रम में चलते हुए दिखाई देते हैं। हर छब्‍बीस हजार साल बाद पृथ्‍वी वापस उसी कोण पर पहुंच जाती है जहां से सूर्य आकाशगंगा के बीचों-बीच दिखाई देने लगता है।

बहुत पहले एक जर्मन वैज्ञानिक ने हर ग्‍यारह साल बाद सूर्य में होने वाले बड़े विस्‍फोटों और उससे दुनिया पर होने वाले प्रभावों के बारे में बताया था। तब उस  वैज्ञानिक को चुप करा दिया गया था। अब लगभग उसी सिद्धांत से मेल खाता एक नया सिद्धांत तैयार है कि एक समय ऐसा आता है जब मिल्‍की वे 'हमारी आकाशगंगा' जो एक तश्‍तरी की तरह है के बीचों-बीच सूर्य आ जाता है। यहां बीचों-बीच से मतलब आकाशगंगा के कोर से नहीं बल्कि पृथ्‍वी से दिखाई देने वाली अवस्‍था से है। जब सूर्य ऐसे कोण में आएगा तो पृथ्‍वी पर बहुत बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होंगे।

नास्‍त्रेदमस पर किताबें लिख रहे लेखक ही यह पूछते हैं कि क्‍या ये सब संयोग है या किसी अनहोनी का संकेत। वे मानते हैं कि मिश्र सभ्‍यता, प्राचीन कैथोलिक चर्च, दक्षिण अमरीका के होपी और माया सभ्‍यता में भी पृथ्‍वी या सृष्टि के खत्‍म होने का एक समय निश्चिता किया गया है। लेखकों ने उन सभ्‍यताओं की विभिन्‍न प्रणालियों से मिल रहे संकेतों को भी नास्‍त्रेदमस के संकेतों के साथ मिलाया है और सिद्ध किया है कि शीघ्र ही पृथ्‍वी का अंत होने वाला है।

इसी क्रम में पहले मैं भी एक सवाल खड़ा कर चुका हूं कि क्‍या मौसम चक्र में हो रहा परिवर्तन, मण्‍डेन में हो रहे बड़े परिवर्तनों का सूचक नहीं है।  यह परिवर्तन हमें किस ओर लेकर जाता है। मुझे तो यह व्‍यवस्‍था में परिवर्तन का विरोध मात्र लगता है। प्राकृतिक आपदाएं कब नहीं थी, लेकिन मौसम चक्र में परिवर्तन पहले कभी नहीं रहा होगा। अब चूंकि यह शताब्दियों में घटने वाली घटना है तो इसका सही सही अनुमान नहीं किया जा सकता।

इन सबके बावजूद होपी, माया, मिश्र सहित कई सभ्‍यताओं में दुनिया के खत्‍म होने का समय निकाला गया है और यह 2012 में आना वाला है।  खास बात यह है कि हर सभ्‍यता ने दुनिया के खत्‍म होने का समय तय किया है। पर भारतीय सभ्‍यता में ऐसा नहीं है। ठीक है उस प्‍वाइंट पर बाद में विचार करेंगे लेकिन यहां संकेत देना जरूरी है कि प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में इस संबंध में बहुत सी बातें बहुत स्‍पष्‍ट तरीके से बताई गई हैं। उन पर बात बाद में...

आदरणीय स्‍वामी नारायणन् जी

ज्‍योतिष विद्यार्थी - सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

हमारे परम गुरूजी स्‍वामी नारायणन् जी




आज मैं आपका परिचय कराना चाहता हूं एक साधू स्‍वामी नारायणन् जी से। किसी से ऑल इंडिया रेडियो में कुछ समय रहने वाले और बाद में केन्‍द्र सरकार के किसी संस्‍थान में नौकरी करने वाले स्‍वामी नारायणन् जी ने करीब सैंतीस साल पहले सन्‍यास ले लिया। तब से अब तक वे एक साधू ही हैं। साल के छह महीने गंगोत्री में रहते हैं और छह महीने निचले इलाकों में आ जाते हैं। हम कुछ लोगों का सौभाग्‍य है कि हम उन तक पहुंच पाए और अब नियमित संपर्क में है। वेद और विज्ञान का उनका अध्‍ययन एक जैसा है। ब्रह्म और इंटरनेट दोनों की बातें इतनी सहजता से करते हैं कि कोई भी उनके सानिध्‍य में खुद को पूरा होता महसूस करने लगता है। हालांकि कुछ साल पहले मुझे भी उनके सानिध्‍य में तीसरी शक्ति का तगड़ा अनुभव हुआ था लेकिन उसे भी उन्‍होंने मेरी ध्‍यान की अवस्‍था बताकर खारिज कर दिया।
सहजता में विश्‍वास करने वाले स्‍वामीजी किसी की बात टालते नहीं हैं। उनके पास कई तरह की खोपडि़यां आती हैं। लेकिन एक झेन साधू की तरह हर किसी के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं जैसे कि वे उनकी तरह ही हों। वे कब कहां और कितने दिन होते हैं कोई कह नहीं सकता। बस लगातार निगरानी रखो तो पता चल जाता है कि इन दिनों स्‍वामी जी कहां हैं। इसी तरह उनके एक शिष्‍य ने उन्‍हें कुछ दिन पहले दिल्‍ली में ढूंढ निकाला और आग्रहपूर्वक बीकानेर ले आए। अपने चार दिन के छोटे प्रवास काल में उन्‍होंने पता नहीं कितने लोगों को अपने स्‍नेह से सराबोर कर दिया। एक दिन मेरे घर भी चाय पीने के लिए आए। तब मेरे अनुज आनन्‍द ने उनसे जी भरकर बातें की।
मेरे श्‍वसुरजी ने उनके कुछ फोटो अपने मोबाइल से लिए। उनसे मांगकर में स्‍वामीजी के कुछ फोटो यहां डाल रहा हूं। ऐसे हैं हमारे परम गुरूजी...

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